Sunday, July 16, 2006

मर्डरर की माँ

धमाकों से उपजे आतंक के इस वातावरण में पुलिस की खोजबीन जारी है !
पर किसकी खोज कर रही है पुलिस?....... चंद कठपुतलियों की ?
शायद वो पता कर सकें की इन कठपुतलियों के तार किन शातिर दिमागों से जुड़े हैं !
ऍसा भी नहीं कि वे जानते नहीं कि इनकी चाभी किसके पास है ?
पर घृणा और नफरत फैलाने वाले सौदागरों का बाल भी बांका नहीं होने वाला !
गाज गिरनी है तो इन कठपुतलियों पर ! पर उससे क्या समस्या का निदान हो पाएगा।
नहीं कदापि नहीं!
जब तक मौत के ये ठेकेदार धरती पर रहेंगे नई-नई कठपुतलियाँ रंगमंच पर आती रहेंगी और ये धरा रक्त-रंजित होती रहेगी।
अगर थोड़ा परिदृश्य बदलें तो पाएँगे कि देश के अंदर भी ऐसे महानुभावों की कमी नहीं जो ऊपर से तो भले और सम्मानित लोगों की गिनती में आते हैं पर जिनकी मुट्ठी में अनगिनत टूटती‍-बनती कठपुतलियाँ हैं जो उनके फायदे कि लिये किसी भी पल किसी तरह के अपराध को अंजाम देने के लिये तैयार हैं।
बंगाल की प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी का उपन्यास मर्डरर की माँ ऐसी ही शक्तियों की ओर इशारा करता है जो अपराधियों को पैदा करती हैं, उनसे घृणित कृत्य करवाती हैँ और अपना मतलब पूरा होने पर उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकती हैं। पार्टियाँ बदलती हैं, कहने को नई विचारधारा वाले लोग आते हैं पर कुछ दिनों बाद जनता ठगी-ठगी सी देखती हे कि अरे सभ्य समाज के दुश्मन रहे लोग फिर से नयी व्यवस्था पर काबिज हो गये हैं।
लेखिका के इन शब्दों पर गौर करें
" मेरे बेटे के हाथ में छुरा थमाया भवानी बाबू ने! ये लोग मर गए ! तपन भी मर जाएगा। लेकिन भवानी बाबू जैसे लोग और मर्डरर ले आयेंगे। जो खून करता है वह जरूर मुजरिम है।....लेकिन दारोगा बाबू, जो लोग मर्डर कराते हैं, वे लोग तो खुले ही छूट गये। आजाद ही छूट गए। यह कैसा फैसला है? तपन क्या अकेला ही मर्डरर हैं ? भवानी बाबू क्या हैं ?
तपन की मां की सूखी-सूखी आंखों में सूखा-सूखा हाहाकार !
भवानी बाबू जेसे लोग भी तो मर्डरर हैं , लेकिन उन लोगों को कोई नहीं पकड़ेगा, कोई गिरफ्तार नहीं करेगा ।


आज अगर भय और आतंक रहित समाज की स्थापना करनी है तो पहली चोट करनी होगी आतंक और अपराध का निर्माण करने वाली इन शक्तियों की । ऐसी ताकतों की पैठ समाज के हर तबके, हर धर्म, हर दल में है। पर अगर देश की सारी जनता इन दुश्मनों को चिन्हित कर इनका सफाया करने के लिये सरकार पर दबाव डाले तभी इस देश में शांति सदभाव की एक नयी सुबह का आगमन हो सकता है ।

श्रेणी :
किताबें बोलती हैं में प्रेषित
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3 comments:

SHUAIB on July 16, 2006 said...

इस वकत पुलिस का काम ही खोज लगाना है अगर कोई नही मिला तो मासूम लोगों को अंदर करदेती है ये बताने के लिए कि पुलिस भी कुछ कर रही है।

कंचन सिंह चौहान on March 11, 2008 said...

aapki pichhali link dekhate hue dhyan gaya is link par.... kisi mahila ki yaad aa gai aur un sab ke bare me.n sochna pad gaya jo chahati to nahi.n ki beta aise rasto.n par jaye jaha.n se aana mumkin hi na ho....! unka dard kaun janega jo rone me.n bhi darti hai.n kyo.nki tab log kahte hai.n ki "tere ladke ne bhi aise hi logo ko ulaya hai...."

Manish on March 11, 2008 said...

जी समझ सकता हूँ आपकी बात...

 

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