Sunday, December 31, 2006

वार्षिक संगीतमाला - २००६ : साल के २५ बेहतरीन गीतों का सफर !

'एक शाम मेरे नाम' पर आने वाले दोस्तों । साल का अंत आ पहुँचा है और हमेशा की तरह मेरे लिये ये मौका होता है अपनी वार्षिक संगीतमाला :) शुरु करने का । दरअसल बचपन से रेडियो सीलोन से आने वाली बिनाका गीत माला के हम लोग जबरदस्त फैन थे । जैसे ही बुधवार का दिन आता था और घड़ी की सुइयाँ सात के पास आती थीं हम तीनों भाई-बहन शार्ट वेव के २५ मीटर बैन्ड पर रेडियो सीलोन के स्टेशन लगाने की जुगत में भिड़ जाते थे । फिर अगले एक घंटे तक अमीन सयानी की दिलकश आवाज के साथ गीतों को पायदान पर चढ़ता उतरता देखना अपने आप में हमारे लिये एक जबरदस्त मनोरंजन था ।

जब से चिट्ठाकारी शुरु की गीत -संगीत मेरे चिट्ठे का अहम हिस्सा रहे हैं इसलिए संगीतमाला का ये सिलसिला मेरे रोमन ब्लॉग पर जारी रहा । गीतों को सुनना, उन्हें दिल से महसूस करना, गुनगुनाना और फिर उन्हें अपने दोस्तों में बाँटना मेरे दिल को हमेशा से बेहद सुकून देता है ।

इसीलिए
२००४ एवं २००५ के बाद पहली बार ये सिलसिला पहली बार हिन्दी चिट्ठाजगत में शुरु कर रहा हूँ। २५ की उलटी गिनती से शुरु होगी ये श्रृंखला ... और अंत होगा सरताज गीत के साथ :) ।

पिछली बार रतिया अँधियारी रतिया और उसके पहले ये सेहरा पहना था
खुल के मुस्करा दे तू ने !
मुझे यकीन है कि इनमें से कई गीतों ने आपके दिलों भी उतनी ही गहराई से छुआ होगा ।

चूंकि साल का अंत भी है तो गीतों के साथ थोड़ी मौज मस्ती भी चलेगी साथी चिट्ठाकारों के साथ !

नए साल की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ !

Friday, December 29, 2006

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी (अंतिम भाग)

आँखें जितना कुछ कहती हैं उतना ही उसे छुपाने का प्रयास भी करती हैं । आँखों का ये छल लेकिन करीबियों की पकड़ में आ ही जाता है। अब देखें कैफी आजमी साहब क्या कहते हैं इस बारे में

तुम इतना जो मुस्करा रहे हो
क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

आँखों में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो


चुप चाप जल जाने वालों को लोग निराशावादी की श्रेणी में ला खड़ा कर देते हैं, पर इश्क की राह में चलने वालों को दुनिया की परवाह कहाँ !

तुम्हारी आँख में गर मैं कभी चुपचाप जल जाऊँ
तुम अपनी आँख में लेकिन मेरा सदमा नहीं लिखना

मेरी आँखों में बातें हैं मगर चेहरे पे गहरी चुप
मेरी आँखें तो लिख देना मेरा चेहरा नहीं लिखना


पर आँखों का दर्द छुपाना कितना कष्टप्रद है उसकी झलक मीना कुमारी की इस नज्म में दिखायी देती है

टुकड़े टुकड़े दिन बीता
धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था
उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम बूंदों में जहर भी है
और अमृत भी
आँखें हँस दी, दिल रोया
ये अच्छी सौगात मिली


और जब ये दर्द असहनीय हो जाए तो राज की बात राज नहीं रह पाती। बकौल कासिमी

हौसला तुझ को ना था मुझसे जुदा होने का
वर्ना काजल तेरी आँखों में ना फैला होता


पर ये क्या? यहाँ तो शायर इश्क में मायूस हो कर भी अपनी आँखें नम नही करना चाहता क्योंकि वो सोचता है कि उससे मोहब्बत की तौहीन होती है

करना ही पड़ेगा जब्त-ए-गम, पीने ही पड़ेंगे ये आँसू
फरियाद-ए-फुगां से ऐ नादान, तौहीन-ए-मोहब्बत होती है
जो आ के रुके दामन पे 'साहिल' वो अश्क नहीं हैं पानी है
जो अश्क ना छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है


और कुछ ऐसी ही सोच इन जनाब की भी है

पलट कर आँख नम करना हमें हरगिज नहीं आता
गये लमहों को गुम करना हमें हरगिज नहीं आता
मोहब्बत हो तो बेहद हो, जो हो नफरत तो बेपाया
कोई भी काम कम करना हमें हरगिज नहीं आता


पर आँखों से ही सब कुछ हो जाता तो क्या बात थी ! बात तब आगे बढ़ती है जब साथ ही साथ होठों को भी मशक्कत दी जाये । पर क्या हर समय ऐसा हो पाता है। अजी कहाँ जनाब..... बारहा रिश्ते आँखों के दायरे में ही सिमट कर रह जाते हैं। गुलजार साहब ने किस खूबसूरती से इस बात को लफ्जों का जामा पहनाया है, यहीं देख लीजिए

मुस्कुराहट सी खिली रहती है आँखों में कहीं
और पलकों पे उजाले से झुके रहते हैं
होठ कुछ कहते नहीं, कांपते होठों पे मगर
कितने खामोश से अफसाने रुके रहते हैं


बहुत सी बातें ऍसी होती हैं जो वक्त की नजाकत और प्रतिकूल हालातों की वजह से दिल के कोने में दफन करनी पड़ती हैं । आँखें उनकी झलक भले दिखला दें पर होठों के दरवाजे उनके लिए सदैव बंद रहते हैं। साजिद हाशमी का दिल को छूता हुआ ये शेर सुनिये

झलक जाते हैं अक्सर दर्द की मानिंद आँखों से
मगर खामोश रहते हें बयां होने से डरते हैं

कुचल देती है हर हसरत हमारी बेरहम दुनिया
दिल- ए -मासूम के अरमां जवां होने से डरते हैं


और बकौल अमजद इस्लाम अमजद

जो आँसू दिल में गिरते हें वो आँखों में नहीं रहते
बहुत से हर्फ ऐसे हैं जो लफ्जों में नहीं रहते

किताबों में लिखे जाते हैं दुनिया भर के अफसाने
मगर जिनमें हकीकत है किताबों में नहीं रहते


तो ये तो था आँखों में दर्द और उदासी का रंग ! लेकिन आप सब पर उदासी की चादर ओढ़ा कर इस सिलसिले का समापन करूँ ये अच्छा नहीं लगता । इसलिये चलते चलते पेश है मेरे प्रिय शायर गुलजार की ये नज्म जो किसी की प्यारी सी आखों को जेहन में रखकर लिखी गयी हैं

तेरी आँखों से ही खुलते हें सवेरों के उफक
तेरी आँखों से ही बंद होती है ये सीप की रात
तेरी आँखें हें या सजदे में है मासूम नमाजी
पलकें खुलती हैं तो यूँ गूंज के उठती है नजर
जैसे मंदिर से जरस की चले नमनाक हवा
और झुकी हैं तो बस जैसे अजान खत्म हुई हो
तेरी आँखें, तेरी ठहरी हुई गमगीन सी आँखें
तेरी आँखों से ही तखलीक हुई है सच्ची
तेरी आँखों से ही तखलीक हुई है ये हयात


उफक - आसमान का किनारा,क्षितिज, नमनाक - गीली, तखलीक - सृजन हयात - जीवन


श्रेणी : आइए महफिल सजायें में प्रेषित

Tuesday, December 19, 2006

चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है...

ये आफिस के दौरे मेरे इस चिट्ठे की गाड़ी पर बीच - बीच में ब्रेक लगा देते हैं । आज फिर से हाजिर हूँ इस गीत के साथ...
याद है ना, पिछली बार की शाम
मजाज के जीवन की उदासी ले के आई थी । आज मामला वैसा तो नहीं पर उससे खास जुदा भी नहीं ।
देखिये ना, जनाब मजरूह सुलतानपुरी अँधेरे के बीच खड़े होकर आवाजें लगा रहे हैं , उस हमसफर के लिये जो ना जाने कहाँ गुम हो गया है !
और तो और शायर के हृदय में छाई इस कालिमा को हटाने में ना सितारों की फौज काम आ रही है ना ही बहारों की खूबसूरती..
अब तो सच्चे दिल से लगाई इस पुकार का ही सहारा है.....शायद पहुँच जाए उन तक...




चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है
कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेऽऽरा है

कहाँ से लाऊँ, वो रंगत गई बहाऽरों की
तुम्हारे साथ गई रोशनी नजाऽरों की
मुझे भी पास बुलाओ बहुत अँधेऽऽरा है
चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है

सितारों तुमसे, अँधेरे कहाँ सँभलते हैं
उन्हीं के नक्शे कदम से चराग जलते हैं
उन्हीं को ढ़ूंढ़ के लाओ बहुत अँधेरा है
चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है


अब आप सोच रहें होंगे कि इस गीत की याद मुझे अचानक कहाँ से आ गई । सो हुआ ये कि मेरे
रोमन हिन्दी ब्लॉग के एक पाठक ने भेंट स्वरूप मुझे ये गीत भेजा । यूँ तो चिराग के बाकी गीत मेरे सुने हुए थे पर ये गीत मैंने पहली बार, उस अनजान मित्र के जरिये ही सुना।
एक बार फिर शुक्रिया दोस्त इस प्यारे गीत को मुझ तक पहुँचाने के लिए । अब मुझे कोई गीत अच्छा लगे और वो आप सब के पास ना पहुँचे ये कभी हुआ है भला ? इस गीत को सुनने के लिये यहाँ
क्लिक कीजिए ।

चलचित्र चिराग (१९६९) के लिये ये गीत मोहम्मद रफी की आवाज में रिकार्ड किया गया था। धुन बनाई थी मदन मोहन साहब ने ।

Saturday, December 09, 2006

मजाज़ लखनवी की जिंदगी का आईना 'आवारा' (भाग 2)

जनाब असरार उल हक उर्फ 'मजाज़ ' एक शायराना खानदान से ताल्लुक रखते थे।  उनकी बहन का निकाह जावेद अख्तर के पिता जानिसार अख्तर के साथ हुआ था । अपने शायराना सफर की शुरुआत सेंट जान्स कॉलेज में पढ़ते वक्त उन्होंने फनी बदायुनी की शागिर्दी में की थी । प्रेम मजाज की शायरी का केन्द्रबिन्दु रहा जो बाद में दर्द में बदल गया। जैसा कि स्पष्ट था कि मजाज़ को चाहने वालों की कभी कमी नहीं रही थी । पर प्रेम के खुले विकल्पों को छोड़ एक अमीर शादी शुदा स्त्री के इश्क ने उनकी जिंदगी में वो तूफान ला दिया जिस में वो डूबते उतराते ही रहे.... कभी उबर ना सके ।
 
मुन्तजिर* है एक तूफां -ए -बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने दरवाजे हैं वा** मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा अहद -ए- वफा मेरे लिए
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
*इंतजार में,  ** खुला हुआ

जी में आता है कि अब अहद- ए -वफा* भी तोड़ दूँ
उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये जंजीर -ए- हवा भी तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
*वफा करने का वादा

क्या अजीब चीज है ये इश्क ! पास रहे तो सब खुशनुमा सा लगता है और दूर छिटक जाए तो चमकती चाँदनी देने वाला माहताब भी बनिये की किताब सा पीला दिखता है । रातें बीतती गईं। चाँद रोज रोज अपनी मनहूस शक्लें दिखलाता रहा । मजाज़ का दिल कातर और बेचैन ही रहा..और उन्होंने लिखा
 
इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा*, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस** की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
* पगड़ी,  **गरीब
 
दिल में एक शोला भड़क उठा है आखिर क्या करूँ ?
मेरा पैमाना छलक उठा है आखिर क्या करूँ ?
जख्म सीने का महक उठा है आखिर क्या करूँ ?
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
जी में आता है कि चाँद तारे नोच लूँ
इस किनारे नोच लूँ , उस किनारे नोच लूँ
एक दो का जिक्र क्या, सारे के सारे नोच लूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मजाज़ को ऊँचे तबके के लोगों की महफिलों में उठने बैठने के कई अवसर मिले थे । अक्सर ऐसी महफिलों में अपने मनोरंजन के लिए मजाज को आमंत्रित किया जाता था । अमीरों के चरित्र का खोखलापन और आम जनता की गरीबी को उन्होंने करीब से देखा था । अन्य प्रगतिशील शायरों की तरह उनमें भी तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश था , जो आगे की इन पंक्तियों में साफ जाहिर होता है
 
मुफलिसी और ये मजाहिर हैं नजर के सामने
सैकड़ों चंगेज-ओ-नादिर हैं नजर के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबिर* हैं नजर के सामने
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
* अत्याचारी

ले के चंगेज के हाथों से खंजर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या ना तोड़े मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
बढ़ के इस इन्दर सभा का साज-ओ-सामां फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ* फूँक दूँ,
तख्त-ए-सुल्तान क्या मैं सारा कस्र-ए-सुल्तान** फूँक दूँ,
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?
* शयनगार,  **शाही महल

१९५४ में मजाज़ को दोबारा पागलपन का दौरा पड़ा । पागलपन के इस दौरे से बच तो निकले पर शराब से नाता नहीं टूट सका । उनके मित्र प्रकाश पंडित ने लिखा है कि अक्सर रईसों की महफिलों में उनके बुलावे आते। औरतें उनकी गजलियात और नज्में सुनतीं और साथ- साथ उन्हें खूब शराब पिलाई जाती । जब मजाज की साँसें उखड़ने लगतीं और मेजबान को लगता कि अब वो कुछ ना सुना सकेगा तो उन्हें ड्राइवर के हवाले कर किसी मैदान या रेलवे स्टेशन की बेंच पर छोड़ आया जाता था ।
 
मजाज़ की जिंदगी की आखिरी रात भी कुछ ऐसी ही थी । फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार महफिल से शेरो शायरी का दौर तो खत्म हुआ पर मजाज को लखनऊ में दिसंबर की उस सर्द रात में लोगों ने छत पर ही छोड़ दिया । और अगली सुबह १५ दिसंबर १९५५ को दिमाग की नस फटने से वो इस दुनिया से कूच कर गए आज इस बात को गुजरे ५१ साल बीत चुके हैं पर आज भी कहकशाँ में जगजीत सिंह की आवाज में गर कोई इस नज्म को सुने तो मजाज के उस दर्द को महसूस कर सकता है ।

मजाज़ की जिंदगी उनकी दीवानगी, महकदे के चक्करों और बेपरवाही में गुजर गई । शायद उनके खुद कहे ये शेर उनके जीवन की सच्ची कहानी कहते हैं ।
कुछ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूँ के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं
हम महकदे की राह से होकर गुजर गए
वर्ना सफर हयात का बेहद तवील* था
*लम्बा
मेरी बर्बादियों के हमनशीनों
तुम्हें क्या मुझे भी गम नहीं है
*************************************
पुनःश्च :
इस लेख में जिक्र किए गए तथ्य प्रकाश पंडित और मराठी लेखक माधव मोहोलकर के संस्मरणों पर आधारित हैं ।१९५३ में आई फिल्म ठोकर में तलत महमूद साहब ने भी इस नज्म को अपनी आवाज दी है ।


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इस नज़्म का पिछला भाग आप इस पोस्ट में यहाँ पढ़ सकते हैं।

Wednesday, December 06, 2006

मजाज़ 'लखनवी' की जिंदगी का आईना : 'आवारा '


मजाज़ लखनवी की ये नज्म आवारा उर्दू की बेहतरीन नज्मों में से एक मानी जाती है । यूँ तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मजाज, प्रगतिशील शायरों में एक माने जाते थे, पर दिल्ली में अपना दिल खोने के बाद अपनी जिंदगी से वे इस कदर हताश हो गए कि शराब और शायरी के आलावा कहीं और अपना गम गलत नहीं कर सके ।
देखा जाए तो मजाज़ लखनवी की पूरी जिंदगी का दर्द इस नज्म के आईने में समा गया है । दिल्ली से वापस लखनऊ और फिर मुम्बई में किस्मत आजमाने आए मजाज का जख्म इतना हरा था कि उन्हें मुम्बई की चकाचौंध कहाँ से पसंद आती । सो उन्होंने लिखा

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ?
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मुंबई की मेरीन ड्राइव का रात का सौंदर्य भला किससे छुपा है?
पर जब दिल में किसी की बेवफाई की चोट हो तो ये मोतियों सरीखी टिमटिमाती रोशनी भी सीने में तेज धार वाली तलवार की तरह लगती हैं? न उस वक्त चाँद की चाँदनी दिल को शीतलता पहुँचाती हे ना खूबसूरत सितारों से पटी आकाशगंगा ही दिल को सुकूं दे पाती है

झिलमिलाते कुमकुमों की राह में, जंजीर सी
रात के हाथों में दिन की, मोहनी तसवीर सी
मेरे सीने पर मगर ,दहकी हुई शमशीर सी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

ये रूपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तस्सवुर, जैसे आशिक का हाल
आह ! लेकिन कौन समझे कौन जाने दिल का हाल ?
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

दिल की हालत तो तकदीर की गिरफ्त में कैद है ! किसी के भाग्य में फुलझड़ियों की चमक है तो कहीं टूटे तारों की टीस भरी यादें..

फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आये ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर लगी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मजाज का मन भटकता रहा कभी मयखाने में तो कभी हुस्न की मलिका की महफिल में . पर हर वक्त वो महफिलें भी कहाँ से मयस्सर होतीं ! अगर कोई चीज हमेशा मजाज के साथ रही तो सिर्फ अकेलापन, उदासी और रुसवाई ।

रात हँस-हँस कर ये कहती है कि मैखाने में चल
फिर किसी शहनाज-ए-लालारुख के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

हर तरफ बिखरी हुई रंगीनियाँ रअनाईयाँ
हर कदम पर इशरतें लेतीं हुईं अंगड़ाईयाँ
बढ़ रहीं हैं गोद फैलाए हुए रुसवाईयाँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मजाज पहले प्यार को ना पाने के गम में ऐसा टूटे कि अपना संतुलन खो बैठे । पर वो फिर से उपचार के बाद उबर सके । माता पिता ने सोचा उनकी शादी करा दी जाए। पर अब मजाज के बिगड़े मानसिक संतुलन की खबर फैल चुकी थी और उनकर लिये आए कई रिश्ते अंत-अंत में टूट गए । ये हुआ एक ऐसे शायर के साथ जिसके बारे में इस्मत चुगताई ने कहा था कि कॉलेज के जमाने में उनकी शायरी पर लड़कियाँ जान देती थीं । पर मजाज जिंदगी के इस अकेलेपन से लड़ते रहे। अपनी जिंदगी की कशमकश को किस बखूबी से उन्होंने इन पंक्तियों में उतारा है

रास्ते में रुक के दम ले लूँ, मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाये, ये किस्मत नहीं
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मजाज की लाचारी और मायूसी इस नज्म की हर पंक्तियों में नुमायां हैं । अब मैं आप सब को अभी और उदास नहीं करूँगा । मजाज की कुछ और बातों के साथ अगली पोस्ट में पेश करूँगा इस नज्म का अगला हिस्सा !

जगजीत सिंह ने कहकशाँ एलबम में इस लंबी नज़्म के कुछ हिस्सों को अपनी जादुई आवाज़ से सँवारा है...


इस नज़्म का अगला भाग आप इस पोस्ट में यहाँ पढ़ सकते हैं।

Tuesday, December 05, 2006

किताबी कोना : आशापूर्णा देवी रचित 'लीला चिरन्तन'

आशापूर्णा देवी अहिन्दीभाषी साहित्यकारों में मेरी सर्वाधिक प्रिय कथाकार रहीं हैं । उनकी बेहद चर्चित उपन्यास-त्रयी प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता और बकुल कथा ब्रिटिश साम्राज्य से लेकर स्वतंत्र भारत और आज के दौर की नारी की चेतना के उत्तरोत्तर विकास की अमर गाथा है । आशापूर्णा जी की नायिकाएँ हमेशा से स्वाभिमानी , दूरदर्शी और तत्कालीन सामाजिक तौर तरीकों से ना दबने वाली रही हैं ।

लीला चिरन्तन की नायिका कावेरी भी इनसे भिन्न नहीं है । वर्ना शादी के बीस सालों बाद अचानक एक सुबह कोई अपने जवान बेटे और बेटियों को छोड़कर भरी सभा में ये घोषणा कर दे कि वो अगली पूर्णमासी के दिन वैराग्य ग्रहण कर लेगा और कोई इस दर्द को चुपचाप पी कर, बिना ऊपरी रोष व्यक्त किये अपने काम में लग जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता है भला।

वैसे घर के मुखिया आनंद लाहिड़ी ने ये निर्णय अकस्मात लिया हो ऐसा भी नहीं है । इच्छा तो जाहिर पहले ही कर चुके थे पर घर के लोग बस इसी आस में थे कि उनकी इच्छा, इच्छा ही रह जाए । आखिरकार पागलपन की हद तक बढ़ चुके प्रेम के बाद जिस दाम्पत्य बंधन का श्री गणेश हुआ हो , उसका पटाक्षेप इस तरह होगा ये किसने सोचा था ।

लीला चिरन्तन में आशापूर्णा जी ने ये कथा आनंद लाहिड़ी की युवा पुत्री के मुख से कहलवाई है ।घर की ऐसी परिस्थिति एक युवा मन को कैसे उद्वेलित करती है, इसका सटीक चित्रण इस उपन्यास में किया गया है । बिना खुद की कोई गलती के, अचानक ही अपने परिवार को लेकर सारे मोहल्ले में हो रही फूहड़ चर्चा का ना तो सामना करना आसान है ना उससे बच के निकलना । और इसी पशोपेश में पड़ी "मौ" मन में उमड़ते अनेक अनुत्तरित प्रश्नों की झुंझलाहट अपने मित्र नक्षत्र या प्यारे नक्खा पर उतारती है।

पर बात तो वहीं जाकर शुरु होती है कि आखिर आनन्द लाहिड़ी को वैराग्य पर जाने को सूझी क्यों ?
और गए तो फिर कुछ महिनों में ही गुरू आश्रम से उनका मोह भंग क्यों हुआ ?
क्या कावेरी वापस लौटे पति को क्षमा कर पाई ?

इन सारे प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये आपको १४० पन्नों का ये लघु उपन्यास पढ़ना पड़ेगा।

आशापूर्णा जी की लेखन शैली का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ । उनके कथानक में जरूरत से ज्यादा दार्शनिकता का पुट नहीं रहता। सीधा सहज भाष्य पाठकों की रुचि को बनाए रखता है। इसलिये कभी भी बीच- बीच के पन्नों को बिना पढ़े आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती । हाँ ,ये जरूर है कि ये लघु उपन्यास पात्रों के चरित्र-चित्रण में उनकी बाकी कालजयी कृतियों की तुलना में उतना कसा हुआ नहीं लगता ।

पुस्तक के बारे में

नाम - लीला चिरन्तन
लेखिका - स्व. आशापूर्णा देवी
अनुवादक - डॉ. रणजीत साहा
प्रकाशक - ज्ञानपीठ प्रकाशन
पुरस्कार - प्रथम प्रतिश्रुति के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित
मूल्य - ५० रुपये

श्रेणी : किताबें बोलती हैं में प्रेषित
 

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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