Sunday, May 13, 2007

रात आधी खींच कर मेरी हथेली : 'बच्चन' की कविता, अमिताभ का स्वर...

कविता या गजल की अदायगी, उसमें कही हुई भावनाओं को श्रोता के दिल तक पहुँचाने में एक उत्प्रेरक का काम करती हैँ । पिताजी बताते हैं कि उनके जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हरिवंश राय बच्चन मंच से जब अपनी मधुशाला का काव्य पाठ करते, तो सब के सब मंत्रमुग्ध हो कर सुनते रहते । बच्चन को तो सुनने का सौभाग्य मुझे सिर्फ आडियो कैसेट में ही हुआ है। पर हाई स्कूल में जब पहली बार दूरदर्शन पर नीरज को पूरे भावावेश के साथ कविता पढ़ता देखा तो मन रोमांचित हो गया था ।

वैसे वीर रस के कवियों के लिए तो ये अदाएगी, उनकी रोजी रोटी का सवाल है । पता नहीं आप लोगों ने कभी ऐसा महसूस किया कि नहीं पर जहाँ तक मेरा अनुभव है, जब भी इस कोटि के कवि मंच पर आते हैं तो पूरा सम्मेलन कक्ष उनकी आवाज से गुंजायमान हो जाता है और अगर तालियों के अतिरेक ने उनका उत्साह बढ़ा दिया तो आगे की दर्शक दीर्घा के श्रोताओं के लिए कान के पर्दों के फटने का भी खतरा मंडराता रहता है ।:)

वैसे ये काबिलियत कितनी अहम है इसका अंदाजा आप इस पुरानी घटना से लगा सकते हैं। ये उस वक्त की बात है जब इन्दीवर के गीत फिल्मों में काफी मशहूर हो रहे थे।एक बार काफी पैसे देकर इन्दीवर को एक कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया और जैसा कि अमूमन होता है उन्हें सबसे अंत में काव्य पाठ करने को बुलाया गया । उन्होंने अपने एक बेहद मशहूर गीत से शुरुआत करी पर उनकी अदायगी इतनी लचर थी कि जनता गीत के बीच से ही उठ कर अपने घर को पलायन कर गई और आयोजक अपने तुरुप के पत्ते का ऐसा हश्र होते देख सर धुनते रह गए ।

पर बात शुरु की थी मैंने हरिवंश राय बच्चन से और आज उन्हीं की एक कविता आपके सामने उनके सुपुत्र अमिताभ बच्चन के स्वर में पेश कर रहा हूँ। ये कविता प्रेम और विरह की भावनाओं से लबरेज है । इतनी खूबसूरती से 'बच्चन जी' ने एक प्रेमी के दर्द को उभारा है कि क्या कहा जाए ! और जब आप इसे अमिताभ की गहरी आवाज में सुनते हैं तो उसका असर इस कदर होता है कि मन कवि की पंक्तियों को अपने दिल में आत्मसात सा पाता है ।

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रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग उस संसार में है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर...
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ।
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

- हरिवंशराय बच्चन
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18 comments:

Udan Tashtari on May 13, 2007 said...

मनीष भाई

आनन्द आ गया. आज पहली यह कविता अमिताभ बच्चन की आवाज में सुनीं.

आप तो पूरा का पूरा खजाना रखें हैं. वाह ,वाह. साधुवाद.

आगे भी इंतजार है. आपकी हर पोस्ट गजब की होती है.

अभिनव on May 13, 2007 said...

वाह मनीष भाई,
यह ठीक बात है मंच पर कविता के साथ साथ परफार्मेंस का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। मेरे सबसे प्रिय कवियों में से एक हैं साहिर लुधियानवी, परंतु यदि कभी आप उनको सुनें तो मामला उतना ज़ोरदार नहीं लगता है। वहीं हमारे हरि ओम पँवार जी जब मंच पर आते हैं तो ऐसा लगता है कि कहीं उनके ओज के प्रताप से मंच पर आग न लग जाए।
बाकी बच्चन तो बढ़िया हैं ही। इतनी बढ़िया पोस्ट के लिए धन्यवाद।

अनूप शुक्ल on May 13, 2007 said...

बहुत अच्छा लगा कविता पढ़ना/सुनना!

नीरज दीवान on May 13, 2007 said...

बहुत बढ़िया. मनीष भाई. कविता पढ़ने के साथ सुनने का आनंद आया.. कई दिनों बाद ऐसा प्रयास देखने मिला. आपको बधाई.

परमजीत बाली on May 14, 2007 said...

भाई,हरिवंशराय बच्चन जी की रचनाओं का क्या कहना! उन की सभी रचनाएं दिल मे उतर जाती हैं।

Sanjeet Tripathi on May 14, 2007 said...

बहुत बढ़िया। धन्यवाद।
बच्चन जी की कुछ कविताएं अमिताभ की आवाज़ में मैनें अपने चिट्ठे पर अपलोड कर रखीं हैं जिन्हें चाहिए डाउनलोड कर सकते हैं

mamta on May 14, 2007 said...

बहुत ख़ूब । अब का तो पता नही पर पहले दूरदर्शन पर नियमित रुप से कवि सम्मेलन प्रसारित होते थे जो बहुत ही अच्छे होते थे।

rachana on May 14, 2007 said...

वाह!!! मजा आया सुनकर और पढकर!

Priyankar on May 15, 2007 said...

हिंदी कविता के वाचिक उत्कर्ष के वे दिन अभूतपूर्व थे . नेपाली जैसे गीतकारों और भवानी भाई जैसे कवियों को आमने-सामने सुनना कितना अपूर्व अनुभव रहा होगा .

हिंदी समाज में कविता को लोकप्रिय बनाने का एक तरीका उसकी आवृत्ति का शास्त्र रचकर उसे जन-जन के बीच ले जाने और पाठ तथा प्रस्तुति के अधिकाधिक अवसर सृजित करने का हो सकता है . अब तो इसमें प्रौद्योगिकी की मदद भी ली जा सकती है .

Sukesh Srivastava on May 15, 2007 said...

Manish jee,
Agar bachchan jee ke aatmkatha ke pahle aur doosre khanD aapne pade ho toh usme unhone apni pahli patni Shyama ke saath beetaye hue samay ka, unki beemari ka aur lambi beemari ke baad unki mrityu ka bada marMsparshi aur sajeev chitraN kiya hai.
Mera vichar hai ki ye kavya-rachna unhone Shyama ke saath uski peeda ko bhogte hue kisi raat ke sandarbh me likhi hai.
Es kavita ko es roop me lane ke liye dhanyawad...
Ek baat aur.... agar Bachahcn jee ki aatmkatha nahin padee hai toh unki aatmkatha ke pahle aur doosre khanD zarror padiyega.
Agar ye nahin pada toh yeh samajh lijiye ki hindi-aatmkatha vidhi ki ek mahaan rachna aap jaise pathak se vanchit rah gayee.

~Sukesh

Manish on May 15, 2007 said...

समीर जी शुक्रिया ! जानकर खुशी हुई कि आपको आनंद आया ।

अनूप जी,रचना जी नीरज शुक्रिया !
परमजीत सही कहा आपने बच्चन के काव्य के बारे में !

Manish on May 15, 2007 said...

अभिनव जी सही कहा आपने ओजपूर्ण कविता रहे तो मन में और अगर नही तो तन बदन में आग लगा देते हैं ऐसे कवि :)

संजीत बहुत बहुत शुक्रिया बताने के लिए ! बढ़िया संग्रह अपलोड कर रखा है आपने !

Rohit on May 16, 2007 said...

बहुत खूब मनीष! क्या यह पन्क्तियाँ 'bachhan vs bacchan' कॅसेट में से हैं? मैं मानता हूँ के हिन्दी कविता में हरिवँशराय बच्चन का स्थान उर्दू में ग़ालिब के बराबर है. हाल ही में 'मधुशाला की प्रस्तुति मन्ना डे की आवाज़ में सुनी - मन्त्रमुग्ध हो गया. और आज आपके चिट्ठे पर यह मोती..भई वाह!

Manish on May 16, 2007 said...

प्रियंकर जी यकीनन वो अभूतपूर्व दृश्य रहा होगा । इन कवियों से मेरा परिचय तो हाई स्कूल की किताबों तक ही सीमित रहा है ।
आज भी उत्कृष्ट रचनाएँ लिखीं जाती हैं जिनमें भावनाओं की गहराई तो होती है पर वो मधुरता और लय नहीं होती जो उस काल के कवियों में थी । आमजनमानस को कविता से जोड़ने के लिए ये बेहद आवश्यक है ऐसा मेरा मानना है । आपने जो इस बारे में सुझाव दिया है उसमें हम चिट्ठाकार भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं ।

Manish on May 16, 2007 said...

ममता जी आजकल हास्य कवि सम्मेलन तो खूब आते हैं विभिन्न चैनलों पर । रही बात दूरदर्शन की तो वहाँ होली ,गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर हर साल इसका प्रसारण होता है .


रोहित हाँ उसी कैसेट से है । संजीत जि के चिट्ठे से आप upload कर सकते हैं वैसे । पसंदगी का शुक्रिया ।

Manish on May 16, 2007 said...

सुकेश जी मुझे उनकी आत्मकथा का कुछ अंश पढ़ने का ही मौका मिला है । हाई स्कूल में जब उनकी कविता जो बीत गई पढ़ी थी तब ही उसका भावार्थ लिखने के लिए श्यामा जी वाले प्रसंग से रूबरू हुए थे । आपकी सलाह पर शीघ्र ही अमल करूँगा ।

Kaushalendra on January 23, 2010 said...

Sukesh ji - bahut sahi kaha aapne. Aajkal main Need ka nirman phir padh raha hun. Yeh pustak aapko batlati hai ke bachchan saab sirf ek uttam darje ke kavi hi nahi, balki unka gadya bhi utna hi saras aur sundar tha. dhanya ho bachchan saab..dhanya tumhari kavita

Manish ji - yeh pustaken aap pehli fursat mein padh len.

Dileep Kumar said...

मनीष जी,

i like your blog too much. it is really nice. if possible please send
me whole poem. i will like to meet u in ranchi.

with warm regards,
Dileep Kumar

 

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