Tuesday, July 31, 2007

संत माइकल हाई स्कूल,पटना और कहानी कक्षा '10 D' की....

ये घटना करीब बीस साल पुरानी है।
घटना स्थल था... शहर के एक बेहद सम्मानीय मिशनरी स्कूल का आहाता, जहाँ का छात्र होना उस शहर में एक विशिष्ट पहचान दिलाता था....
पर उस अनुशासन प्रिय स्कूल के गेट पर ये मज़मा कैसा?
अरे ! ये लड़के तो प्राध्यापक और उप-प्राध्यापक के ना जाने क्या-क्या अपशब्द कह रहे हैं। सामूहिक नारेबाजी से सारा माहौल गर्म है। कतार में लगी बसों के ड्राइवर और कंडक्टर इस अभूतपूर्व दृश्य को देख कर आनंदित हैं।
और क्यूँ ना हों...स्कूल के इतिहास में ऐसी धृष्टता पहले कभी किसी ने नहीं की थी।

फ़िर आख़िर कक्षा '10 D' के छात्र ऍसा क्यूँ कर रहे थे?
 
चार साल पहले ही मैं इस स्कूल में दाखिल हुआ था। अंग्रेजी माध्यम से एक अन्य स्कूल में जाने की अपेक्षा मैंने हिंदी माध्यम से पढ़ना ज्यादा बेहतर समझा था। हिंदी माध्यम उस स्कूल में नया-नया ही शुरु हुआ था और मैं इसके दूसरे बैच का छात्र था। उस वक़्त हर कक्षा में चार सेक्शन हुआ करते थे। 'A', 'B', 'C' अँग्रेजी मीडियम और 'D' हिंदी मीडियम का सेक्शन था। स्कूल में बिताए पहले तीन सालों में शायद ही मुझे कोई शिकायत रही थी।

बारिश के दिनों में स्कूल के पीछे बहती गंगा नदी का पानी उफनते देख कर खुश होना (पानी का स्तर बढ़ने से स्कूल में छुट्टियाँ हो जाया करती थीं) , सबा करीम के छक्के, कैंटीन में दस पैसे का समोसा, फुटबॉल के मैदान में मारा पहला और अंतिम गोल..ये सब कुछ ऐसी स्मृतियाँ हैं जिनके बारे में सोचकर आज भी चेहरे पर मुस्कुराहट आ ही जाती है।
 
कक्षा में हर तरह के छात्रों का जमावड़ा था। कुछ बेहद होनहार, कुछ सामान्य तो कुछ बेहद खुराफाती। पर नवीं कक्षा तक सब कुछ एक आम स्कूल की तरह ही बीत रहा था और कक्षा की कमान सामान्य और होनहार ही सँभाले हुए थे। पर कुछ बातें रह-रह कर सारी क्लॉस को परेशान कर रही थीं।

बेहद छोटी छोटी बातों से शुरु हुआ था वो सब ...,
'डी' सेक्शन का नाम खेल प्रतियोगिता में विजयी होकर भी ना बुलाया जाना,
अंग्रेजी मीडियम के साथ साथ मूवी शो देखने की अनुमति ना देना,
पुराने शिक्षकों को हटा कर नए शिक्षकों को पढ़ाने का काम सौंप देना....

ऐसा सबको लगने लगा था कि हिंदी माध्यम के छात्रों की, स्कूल की नज़र में वो अहमियत नहीं है जो अंग्रेजी माध्यम की है। दसवीं बोर्ड का डर सबको सता रहा था और कक्षा में अनुभवी आध्यापकों की कमी खटक रही थी। सबसे पहले प्रिंसपल साहब को दो तीन बार शिक्षकों के माध्यम से अपनी परेशानी बताई गई। पर उसका कोई नतीजा नहीं निकला।

नतीजन,खुराफाती दिमाग वालों की बन आई। वे क्लॉस के अगुआ बन गए। फ़ैसला हुआ कि अगर प्रिसिंपल उनकी बात नहीं सुनेगा तो वो भी नए नवेले शिक्षकों की नाक में दम कर देंगे। अर्थशास्त्र की शिक्षिका हमारी क्लॉस टीचर थीं । पिछले साल ही क्लॉस को पढ़ा रहे एक वरीय शिक्षक की जगह उन्हें लिया गया था। थीं तो वो सीधी-साधी पर तज़ुर्बे की कमी कह लें या उनका ढीला ढाला व्यक्तित्व, कक्षा पर उनका नियंत्रण कदाचित ही हो पाता था। ज्यादातर छात्र उनसे निज़ात पाना चाहते थै। सो कक्षा की उद्दंडता का पहला निशाना वो बन गईं।

मार्च का महिना था,होली आने वाली थी। मिस ग्रोवर ने कक्षा के मॉनीटर को किसी कार्य से टीचर्स रूम में बुलाया। जब वो उससे बात कर वापस पहुँची तो सहअध्यापक विस्मित से पूछ बैठे !

ये किसने किया मिस ग्रोवर ?

उन्हें तभी पता चला कि पीछे से उनके सारे कपड़े, स्याही की छोटी-छोटी बूँदों से अटे पड़े हैं। शिकायत ऊपर पहुँची..पर माफीनामे और चेतावनी के बाद मॉनीटर महोदय बरी हो गए।

कक्षा की खुराफ़ाती मंडली के दूसरे शिकार भूगोल के शिक्षक हुए। मिशनरी स्कूलों में अक्सर ऍसे शिक्षकों की बहाली होती है जिनकी एकमात्र योग्यता उनका धर्म होता है। भूगोल के नए नियुक्त शिक्षक इसी श्रेणी में आते थे। वो आते के साथ बोर्ड पर कुछ लिखना शुरु करते और बिना कुछ समझाए बगैर लिखाते-लिखाते कक्षा का समय समाप्त कर देते थे। सो एक दिन वो आए ओर आते ही उन्हें भेंट स्वरूप एक कैलेंडर प्रस्तुत किया गया। कैलेंडर पर क्या था ये बताने की जरूरत नहीं पर उसे दिखाकर लड़कों ने उनकी वो रैगिंग की, कि वो हफ्तों स्कूल में दिखाई नहीं पड़े।

ये सब सही नहीं हो रहा था...पर समझने को कोई पक्ष तैयार नहीं था। '10 D' कक्षा की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी थी। स्कूल की शिक्षिकाएँ सामने के बजाए दूर के रास्ते से गुजरना पसंद करतीं ।

अगर अभी तक प्रिंसपल कुछ कर नहीं पा रहे थे तो वो इस वजह से कि कक्षा को अंग्रेजी पढ़ाने वाले अमरीकी रेक्टर ने उन्हें मना किया था। उनका पढ़ाने का तरीका इतना प्यारा था कि उनकी कक्षा में सभी एकाग्रचित्त होकर पढ़ते थे। वो समझ ही नहीं पाते थे कि इतनी अनुशासित क्लॉस, कैसे इतनी अभद्रता पर उतर आती है? उन्होंने शिक्षकों के बारे में हमारी शिकायत को अपनी छुट्टी के बाद पूरा करने का वायदा भी किया था।

पर वो छुट्टी कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई थी। अगर वो घटना के समय रहते तो बात कुछ दूसरी होती...

सितंबर के आसपास का महिना चल रहा था। स्कूल में बड़े पर्दे पर फिल्म दिखाई जा रही थी। सभी देख रहे थे कि दसवीं के बाकी सेक्शन पंक्तिबद्ध होकर जा रहे हैं। हिंदी की कक्षा थी। छात्रों ने सर को बताया कि A,B और C वाले चले गए और अब section D की बारी है। अनुमति मिल गई ...पर जैसे ही कक्षा ने थि॓एटर रूम में प्रवेश किया, प्रिंसिपल सभी को देखते ही आग बबूला हो गए और दहाड़ते हुए बोले

JUST GO BACK AND STAND UP ON YOUR BENCH....

बेंच पर खड़ा होने की परंपरा हम सभी सातवीं कक्षा से ही भूल चुके थे। और दसवीं को ऐसा सज़ा मिलना तो सबके लिए अप्रत्याशित था...

इस बार गलती हमारी नहीं थी। अनुमति लेकर हम सब वहाँ गए थे। हमें वापस जाने को कहा जा सकता था पर बेंच पर सारी कक्षा को खड़ा करने का कोई तुक नहीं था। इस अपमान से सभी आहत थे। बीस पचीस मिनट इसी तरह खड़े रहे..और क्लॉस में कोई नहीं आया। समय के सा्थ छात्रों के खून की गर्मी भी बढ़ती गई। सारे बच्चे कक्षा छोड़ने को आमादा थे।

पर मैं ये जानता था कि इस दंड का पालन ना करने से हानि हम सब की ही होनी है। सब को ये समझाते व़क्त मन के किसी कोने में आत्मसम्मान कचोट रहा था...शायद कह रहा था कि अगर सारी कक्षा राजी है तो क्या तेरी ही गैरत ख़त्म हो गई है...इसलिए मैंने भी वही किया जो सारी कक्षा ने किया..मँझधार के साथ बहने का फ़ैसला ये जानते हुए भी कि इसमें सबको साथ ही डूबना है।

और फिर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए।

जब तक हम चिल्लाते रहे पलड़ा हमारा भारी रहा क्यूँकि उस स्थिति में हमारा न्यूसेंस वैल्यू ज्यादा रहा। पर दो तीन बार जब बड़े प्यार से हमें अंदर आकर बातचीत से मामला हल करने के लिए कहा गया तो हम सब शांत हुए। पर अंदर जाते ही हमारी हेकड़ी ख़त्म हो गई। प्रिंसिपल के कक्ष में जम कर झाड़ मिली। स्कूल से निकाल दिए जाने की धमकियाँ दी गयीं। अंत में यही कहा गया कि अगर स्कूल मे पढ़ना है तो उन्हीं शिक्षकों से पढ़ना होगा, जो हमें स्वीकार्य नहीं था। लिहाज़ा स्कूल ने हमें छः महीनों के लिए छुट्टी दे दी। बोर्ड की परीक्षा हमने बिना स्कूल के सहायता के दी।

यानि जो तय बात थी वही हुई...नुक़सान स्कूल से ज्यादा छात्रों का हुआ। +2 में हमें स्कूल ने लेने से इनकार कर दिया और हम लोगों को इंटर में अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिला।

संत माइकल की गणना आज भी पटना के सम्मानित स्कूलों में होती है। पर मेरे लिए स्कूल में बिताए मीठे लमहों के ऊपर स्कूल के दिनों के पटाक्षेप की दुखद स्मृतियों ही ज्यादा हावी हो गईं है। इसलिए हममें से ज्यादातर ने पटना में रहकर भी अपने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा। दो तीन छात्रों के आलावा मुझे आज अपने सहपाठियों की कोई ख़बर नहीं है।
आशा है, मेरी तरह वे भी उस चोट से उबर गए होंगे..शायद उन्होंने अनुशासन के महत्त्व को समझा होगा..और शायद मेरा स्कूल भाषाई पूर्वाग्रह से ग्रसित वैसे प्राध्यापकों से मुक्त हो गया होगा....

(स्कूल जाते वक़्त एक ही बस में सफ़र करने वाले सहपाठी अमिताभ माहेश्वरी को साभार, जिन्होंने मुझे इस पोस्ट को लिखने के लिए प्रेरित किया)

इस प्रविष्टि के सारे चित्र यहाँ से लिए गए हैं।

Tuesday, July 24, 2007

मैं, उत्तरांचल, जोशी जी और 'कसप'...आइए चलें इस पुस्तक यात्रा पर भाग : २

पिछली मुलाकात का किस्सा तो आप पढ़ चुके, बेबी और डीडी की अगली मुलाकात की कहानी सुनने के पहले शास्त्री जी के लिए क्या कहेंगे आप! पुत्री के पत्र बांचते-बाँचते उन्हें भी ये समझ आ रहा है कि शादी-विवाह के बीच का वो अल्प मेल-मिलाप, दोनों बच्चों के मन में एक दूसरे के लिए अनुरक्ति जगा चुका है। क्या इतना भर साक्षात प्रेम हो जाने के लिए पर्याप्त है? लेखक उनके मन से प्रश्न का जो उत्तर पाठकों के सामने निकाल के लाता है वो सचमुच ही अद्भुत है। आप भी गौर करिए...

"प्यार वह भार है जिससे मानस-पोत जीवन सागर में संतुलित गर्वोन्नत तिर पाता है। इस भार के लिए छोड़े गये स्थान की पूर्ति हम यथाशक्य अपने प्रति अपने प्यार से करते हैं किंतु कुछ स्थान फिर भी बच रहता है। इसे कैसे भी, किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के प्रति प्यार से भरा जाना जरूरी है, भरा जाता भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम किसी अज्ञात, अनाम तक से भी प्यार कर सकते हैं! "
उपन्यास में अगला मोड़ तब आता है, जब शादी के फिल्मांकन के लिए डीडी टैक्सी से अल्मोड़ा आता है। एक मामूली से सहायक डीडी के दोबारा इस रूप में लौटने से हुई कस्बाई हलचल पर चुटकी लेते हुए जोशी जी कहते हैं...

डीडी की सारे घर में चर्चा है। नगर में चर्चा है। डीडी सुन रहा है क्योंकि इस नगर में जो भी कहा जाता है, सबको सुनाकर कहा जाता है। पीठ पीछे भी कहा जाता है तो किसी ऍसे भरोसे के व्यक्ति से जो 'किसी से ना कहना' के गूढ़ार्थ जानता है, 'यहाँ से जाते ही सब से कह देना।'
इस उपन्यास का एक दूसरा मजबूत पक्ष है, जोशी जी की साफगोई और उनका बेबाक लेखन। नायक और नायिका के वीच के अंतरंग क्षणौं को जिस तरह उन्होंने विवेचन किया है वो प्रशंसनीय है। मात्र भदेस के डर से वो अपनी लेखनी के प्रवाह पर रोक नहीं लगाते और इस क्रम में पाठक के मन में जो बिंब उभरता है वो इतना वास्तविक होता है कि मन की गहराइयों को छूता सा निकलता है। अब यही प्रकरण देखें जहाँ नायक नायिका के बीच का संवाद एक स्लेट पर हो रहा है..

" नायिका जानना चाहती है कि नायक को साना हुआ नीबू कैसा लगता है? नायक को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, बहुत खट्टी चीजें वो खा नही पाता।
नायिका जानना चाहती है कि खट मिट्ठी चीजें कैसी लगती हैं उसे? वे अच्छी लगती हैं नायक को ।
नायिका जानना चाहती है कि बेबी कैसी ठहरी, खट्टी या खट मिट्ठी?

नायक का उत्तर आप जानते ही हैं. सच तो ये है कि मेरे सुधी पाठक यह सब जानते हैं।.....हर प्रेमी जानता है कि प्रतिपक्ष क्या चाह रहा है, किंतु जानकर भी न जानने का विधान है।..गड़बड़जाला निर्बाध जारी है।
नायक के 'खट‍ मिट्ठी' लिखने पर नायिका ने लिख दिया है जब चखा नहीं, फिर कैसे मालूम?
और नायक उसका पेंसिलवाला हाथ पकड़ लेता है और अपने ओठ उसके ओठों की ओर बढ़ाने लगता है....

...जॉनसन एण्ड मास्टर्स प्रभृति अर्वाचीन मनीषी इन सबकी अपनी प्रयोगशालाओं में नाप जोख करके पोथे लिख चुके हैं। ...किंतु फिर भी मुझे सम्भ्रम होता है कि बात यहीं समाप्त नहीं होती। आर्डेनेलिन नोरादेनेलिन आदि रासायनों, रक्तचाप वृद्धि, हृत्कंप वृद्धि आदि लक्षणों से अधिक भी कुछ होता है इन क्षणों में।

मुँह का सूखना भय का लक्षण है, माना। ....पर सामाजिक मर्यादा के उल्लंघन के भय से परे यहाँ कौन सा भय है? कौन सी है वह उच्चतर मर्यादा जिसे तोड़ने की भयमिश्रित चुनौती उपस्थित है यहाँ इस दयनीय होटल के इस तंग दुर्गंधयुक्त कक्ष के गंदे फर्श पर पड़े एक होलडॉल पर चिपटी दो युवा देहों के मध्य? "

जोशी जी के उपन्यास के नायक-नायिका आम मध्यमवर्गीय भीरू मन रखने वाले नहीं हैं। उनमें एक तरह का जुनून है,समाज से मुकाबला करने का ज़ज़्बा है। शादी दूसरी जगह तय होने के बाद भी इसीलिए नायिका मन ही मन निश्चिंत है कि अगर उसका ब्याह होगा तो डीडी के साथ। घर से दूर गणानाथ मंदिर में सहेलियों के साथ जाते वक्त वो डीडी को बुलाना नहीं भूलती। और ये नायक का पागलपन ही है कि उस बुलावे के आगे पीछे का ना सोचते हुए भागते दौड़ते भी वो वहाँ पहुँच जाता है। पर क्या ये जुनून उसके प्यार का मार्ग खोल पाता है। इसका उत्तर तो हाँ भी है और नहीं भी। नायिका की नज़रों में अपने इस कृत्य की वजह से चढ़ जाता है पर समाज उसे पुनः दुत्कार ही वापस भेजता है।

ये मार और दुत्कार नायक के मन को हिला देती है। शायद इसके पीछे उसका दुखद पारिवारिक इतिहास रहा है। पर बेबी....., क्या वो अपनी बदनामी और अपने कृत्य से किंचित मात्र भी ग्लानि महसूस कर रही है। नहीं जी हमारी बेबी अलग मिट्टी की ठहरी। जोशी जी ने उसके चरित्र को अपने लेखन कौशल से बखूबी उभारा है। इन्हीं पंक्तियों को लें जब नायक द्वारा अपने पत्र में पूरे प्रकरण पर क्षोभ का अनुभव करने पर वो लिखती है...

"तुझे मुझसे सादी करनी थी कि मेरे घरवालों से? मुझसे करनी थी तो मैं कह रही हो गई सादी। मेरी सादी के मामले में मुझसे ज्यादा कह सकने वाला कौन हो सकने वाला हुआ? मैंने अपनी दादी की सादी वाला घाघरा-आँगड़ा पहनकर माँग में गणानाथ का सिंदूर भरकर अपने इजा-बाबू, ददाओं-बोज्यूओं सारे रिश्तेदारों के सामने कह दिया उसी दिन गरजकर : मेरी हो गई उस लाटे से सादी। कोई उस पर हाथ झन उठाना। कोई उसे गाली झन देना। तब उन्होंने कहा ठहरा : बच्चों का खेल समझ रखा सादी? अब तू भी वही पूछ रहा ठहरा।

तेरे लिए गणानाथ क्या हुआ? तू वहाँ क्यों आया ठहरा? यह तू जान। मेरे लिए मंदिर ठहरा वह। उसी मंदिर में मुझे भक्ति करने का सा जैसा मन होनेवाला ठहरा। मैं गई ठहरी वहाँ सादी से पहले पूजा करने। मैंने तुझे बुलाया हुआ यह सोचकर कि जो तू भी वहाँ पहुँच गया इतने कम समय में तो तू ही होगा वो लाटा जिसके लिए मैं पैदा हो रही। "
नायिका ने तो अंततः माता पिता को राजी कर ही लिया पर बात इतने से ही खत्म नहीं होती। नायक अपने अपमान की तिलमिलाहट को भुला नहीं पाया है और अपने को कुछ लायक बना पाने के लिए अमेरिका में मिल रही छात्रवृति का लाभ उठाकर अपनी प्रतिभा का सही मूल्य अर्जित करना चाहता है, चाहे इसके लिए विवाह में थोड़ा विलंब ही क्यूँ ना आ जाए। नायिका के लिए ये स्वीकार्य नहीं है। उसे समझ नहीं आता कि जिसके लिए उसने समाज की बदनामी सही, भाई बंधुओं को कुपित किया, उसके लिए अपनी प्रियतमा के साथ तत्काल शादी कर एक साथ पढ़ाई पूरी करने के बजाए अमेरिका जाना ज्यादा जरूरी क्यूँ है? सच, इस प्रश्न को खड़ा कर लेखक ने एक बेहद महत्त्वपूर्ण विषय हम पाठकों के सामने रखा है जिस पर विचार करते समय मन उलझ सा जाता है...

"प्रेम जब ये चाहने लगे कि मैं अपने प्रिय को एक नए आकार में ढाल लूँ, प्रेम जब ये कल्पना करने लगे कि वह जो मेरा प्रिय है, मिट्टी का बना है ओर मैं उसे मनचाही आकृति दे सकता हूँ...अलग अलग कोणों से मिट्टी सने हाथों वाले किसी क्षण परम संतोष को प्राप्त हो सकता हूँ, तब प्रेम, प्रेम रह जाता है कि नहीं, इस पर शास्त्रार्थ की परम संभावना है।"
 नायक के अमेरिका जाने के पहले नायिका से किया गया वार्त्तालाप इस उपन्यास की धरोहर है। या यूँ कहे कि आम मुम्बईया फिल्म का क्लाइमेक्स है। पर मैं उसकी कोई झलक पेश नहीं करने जा रहा। पर जैसा कि वास्तविक जिंदगी में होता है कहानी उस क्लाइमेक्स के आगे भी चलती रहती है। मैं आपको ये भी नहीं बताना चाहता कि देवीदत्त तिवारी किस तरह अमेरिका में एक अच्छा दिग्दर्शक और बेबी उर्फ मैत्रेयी एक अल्हड़ कन्या से विदुषी बन बैठी।

क्या अपनी-अपनी जिंदगी की राहें अलग करने के बाद वो खुश रह पाए? क्या उनका प्रेम अतीत की तहों में दब कर रह गया? क्या वो दुबारा मिल पाए? ये सब ऍसे प्रश्न है जो इस किताब को पढ़ कर ही आप जान पाएँगे।

मूल प्रश्न तो वही है कि नायक या नायिका ने जो निर्णय लिया, क्या वो सही था? क्या एक दूसरे की बात मान कर वो ज्ञान की ऊंचाईयों को प्राप्त कर पाते? क्या व्यक्ति निजी महत्त्वाकांक्षाओं को दरकिनार कर जिंदगी भर प्रेम में डूबा रह सकता है?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके सीधे सपाट उत्तर दे पाना मुश्किल है। पर इस उपन्यास की सार्थकता भी इसी बात में निहित है कि ये प्रेम के मनोविज्ञान के बारे में पाठकों को सोचने को विवश करता है। अगर आपने ये उपन्यास पढ़ा है तो ये जरूर बताएँ कि आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

Saturday, July 21, 2007

मैं, उत्तरांचल, जोशी जी और 'कसप'..आइए चलें इस पुस्तक यात्रा पर - भाग: १

मेरा उत्तरांचल से क्या संबंध है? कुछ ख़ास नहीं। बस इतना भर कि रुड़की में मैं डेढ़ वर्ष रहा हूँ और प्रवीण सिंह खेतवाल जो मेरे यात्रा विवरणों में आपको हमेशा दिखाई पड़ते हैं और मेरे अभिन्न मित्र हैं, खुद कुमाऊँ से हैं। खेतवाल जी की शान में एक बात ये भी कहने योग्य है कि उनका महेंद्र सिंह धोनी के घर, जो कि हमारे आफिस के पास है, आना जाना है। कार्यालय में हम सभी मन में ये आस लगाएँ हैं कि कभी ना कभी वो साक्षात हमें धोनी से मिलवा पाएँगे।


पर रुड़की का मेरा प्रवास हो या खेतवाल जी का सानिध्य, कोई मुझे उत्तरांचल की मिट्टी के इतने पास नहीं ले गया जितना वो शख़्स जिससे मैं कभी नहीं मिला और ना ही मिल पाऊँगा। जी हाँ, मैं मनोहर श्याम जोशी जी की बात कर रहा हूँ, जिनकी किताब क्याप की चर्चा कुछ दिनों पहले मैंने इसी चिट्ठे पर की थी। आज आपके समक्ष जोशी जी के एक अलग तरह के उपन्यास 'कसप' की चर्चा करूँगा। अलग इसलिए कि जोशी जी अपने व्यंग्यात्मक लेखन कौशल के लिए ज़रा ज्यादा जाने जाते हैं और ये कथा है गाँव के एक अनाथ, साहित्य सिनेमा प्रेमी, मूडियल लड़के देवीदत्त तिवारी यानि डीडी और शास्त्रियों की सिरचढ़ी, खिलन्दड़ और दबंग लड़की बेबी के प्रेम की। किताब में इस बात का जिक्र है कि जोशी जी ने ये उपन्यास अपनी पत्नी भगवती के लिए लिखा और वो भी मात्र ४० दिनों में। विचित्र शीर्षक रखने की परंपरा (कुरु कुरु स्वाहा, कसप, क्याप) को कायम रखने के आरोप को ख़ारिज करते हुए लेखक कहते हैं..

."आपकी तरह मैं भी चौंकाने वाले साहित्य का विरोधी हूँ। बल्कि मुझे तो समस्त ऐसे साहित्य से आपत्ति है जो मात्र यही या वही करने की कसम खाए हुए हों। पर इस कथा के जो भी सूझे मुझे विचित्र शीर्षक सूझे। कदाचित इसलिए कि इस सीधी-सादी कहानी के पात्र सीधा-सपाट सोचने में असमर्थ रहे।"
सही ही कह रहे हैं जोशी जी पूरे उपन्यास में नायक-नायिका की खट्टी-मीठी प्रेम कथा पढ़ कर भी ये निर्णय करना मुश्किल हो जाता है कि जिसने जो किया क्या वो सही था? और उतना सोचने के बाद जवाब यही निकल कर आता है कि कसप !(कुमाऊँनी में कसप का मतलब है क्या जाने ! )

हमारी आंचलिक भाषाएँ कितनी मीठी है ये कसप जैसे उपन्यासों को पढ़ कर महसूस होता है। जोशी जी ने कुमाऊँनी हिंदी का जो स्वरूप पाठकों के समक्ष रखा है वो निश्चय ही मोहक हे। इससे पहले ऐसा ही रस फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों को पढ़ने में आया करता था। जोशी जी ने कुमाऊँनी समाज की जो झांकी अपनी इस कथा में दिखाई है, उसे पाठकों के हृदय तक पहुँचाने का श्रेय बहुत कुछ उनके द्वारा प्रयुक्त की गई भाषा का है। पूरे उपन्यास में जोशी जी सूत्रधार की भूमिका निभाते दिखते हैं। प्रेम कथा तब प्रारंभ होती है जब हमारे नायक-नायिका यानि डीडी और बेबी पहली बार शादी के एक आयोजन में मिलते हैं। अब ये मत समझ लीजिएगा कि ये मुलाकात नैनीताल के मनभावन तालों के किनारे किसी हसीन शाम में हुई होगी। अब जोशी जी क्या करें बेचारे ! खुद कहते हैं...
"यदि प्रथम साक्षात्कार की बेला में कथानायक अस्थायी शौच में बैठा है तो मैं किसी भी साहित्यिक चमत्कार से उसे ताल पर तैरती किसी नाव पर तो नहीं बैठा सकता।"

बिलकुल सही और इसीलिए नायक, नायिका से पहली मुलाकात में चाँद सितारों की बात ना कर उस मारगाँठ (पैजामे में लगी दोहरी गाँठ) का ज़िक्र करता है जो अस्थायी शौच में उसे देखकर हड़बड़ाकर उठने से लगी थी।

ख़ैर, जोशी जी की नोक-झोंक के ताने बाने में बढ़ती प्रेम कथा को थोड़ी देर के लिए विराम देते हैं। अपने उपन्यास में जब-तब वो अपने सरस अंदाज़ में उत्तरांचल के समाज की जो झलकियाँ दिखाते हैं, वो कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। अब यही देखिए एक नव आगुंतक के परिचय लिए जाने का कुमाऊँनी तरीका.....

"'कौन हुए' का सपाट सा जवाब परिष्कृत नागर समाज में सर्वथा अपर्याप्त माना जाता है। यह बदतमीजी की हद है कि आप कह दें कि मैं डीडी हुआ। आपको कहना होगा, न कहिएगा तो कहलवा दिया जाएगा, मैं डीडी हुआ दुर्गादत्त तिवारी, बगड़गाँव का, मेरे पिताजी मथुरादत्त तो बहुत पहले गुजर गए थे, उन्हें आप क्या जानते होंगे, बट परहैप्स यू माइट भी नोइंग बी.डी तिवारी,वह मेरे एक अंकल ठहरे.....वे मेरे दूसरे अंकल ठहरे।
उम्मीद करनी होगी कि इतने भर से जिज्ञासु समझ जाएगा। ना समझा तो आपको ननिहाल की वंशावली बतानी होगी।
किस्सागोई की कुमाऊँ में यशस्वी परंपरा है। ठंड और आभाव में पलते लोगों का नीरस श्रम साध्य जीवन किस्सों के सहारे ही कटता आया है। काथ, क्वीड, सौल-कठौल जाने कितने शब्द हैं उनके पास अलग अलग तरह की किस्सागोई के लिए! यही नहीं, उन्हें किस्सा सुनानेवाले को 'ऐसा जो थोड़ी''ऐसा जो क्या'कहकर टोकने की और फिर किस्सा अपने ढ़ंग से सुनाने की साहित्यिक जिद भी है।"
वैसे लोगों की किसी भी अजनबी के लिए उत्सुकता , भारत के हर छोटे गाँव या कस्बे का अभिन्न अंग है जहाँ अभी भी महानगरीय बयार नहीं बही है। वापस प्रेम कथा पर चलें तो हमारा नायक विवाह के आयोजन में नायिका के साथ खिलंदड़ी कर अपने संभावित साले से दुत्कार झेलने के बाद मायानगरी मुंबई का रुख कर चुका है जहाँ वो किसी व्यवसायिक दिग्दर्शक का सहायक है। अब वहाँ पहुँचकर नायक, नायिका को पत्र लिखने की सोचता है। पर ये तथाकथित प्रेम पत्र, दिल का मज़मूं बयां करने के बज़ाए नायक के सारे साहित्यिक और फिलासिफिकल ज्ञान बघारते नज़र आते हैं। अब बेबी उन्हें पढ़ कर करे भी तो क्या, आधे से ज्यादा सिर के ऊपर से गुजर जाने वाला ठहरा। पहला ही पत्र पढ़कर कह बैठी...

"बाब्बा हो, जाने कैसे लिख देते होंगे लोग इतना जड़ कंजड़ ! कहाँ से सूझता होगा इन्हें? बरेली से बंबई तक जाने के बारे में ही पाँच कागज़ रँग रखे।....और लिख भी इस डीडी ने ऐसी हिंदी रखी जिसमें से आधा मेरी समझ में नहीं आती। नेत्र निर्वाण क्या ठहरा बाबू ?"

तेर ख्वारन च्यूड चेली !(ओ तेरे सिर पर चिउरे बच्ची...ऐसी आशीर्वादवत गालियाँ कुमाऊंनी विशेषता हैं।)...इधर दिखा यह कैसी नेत्र निर्वाण रामायण लिख रखी है उस छोरे ने.."
सो पत्र व्यवहार का एकतरफा सिलसिला जो प्रेमी युगलों के बीच शुरु हुआ, वो वास्तव में डीडी और शास्त्रीजी के संवाद में बदल गया। पत्र का साहित्यिक और वैचारिक मर्म खुद पिता पुत्री को समझाने में लग गए, आख़िर शास्त्री जो ठहरे। धीरे-धीरे ही सही बेबी की बुद्धि खुली और लिख ही डाली उसने अपनी पहली पाती....

"तू बहुत पडा लिखा है। तेरी बुद्धी बड़ी है। मैं मूरख हूँ। अब मैं सोच रही होसियार बनूँ करके। तेरा पत्र समझ सकूँ करके। मुसकिल ही हुआ पर कोसीस करनी ठहरी। मैंने बाबू से कहा है मुझे पडाओ।....हम कुछ करना चाहें, तो कर ही सकनेवाले हुए, नहीं? वैसे अभी हुई मैं पूरी भ्यास (फूहड़)। किसी भी बात का सीप (शऊर) नहीं हुआ। सूई में धागा भी नहीं डाल सकने वाली हुई। लेकिन बनूँगी। मन में ठान लेने की बात हुई। ठान लूँ करके सोच रही।"
भाषा की सीमाएँ भावनाओं के संप्रेषण में कभी बाधा नहीं बनती ये कितनी सहजता से साबित कर दिया जोशी जी ने। आश्चर्य नहीं कि हमारा नायक इस पत्र को बार-बार चूमे जा रहा है और इस सरल सहज पत्र को उच्च कोटि के प्रेम पत्र में शुमार कर रहा है।

जोशी जी के इस उपन्यास की ख़ासियत ये भी है कि वो नायक या नायिका या हर चरित्र के किसी भी कृत्य के पश्चात बड़े ही रोचक अंदाज में उसका विश्लेषण करते हैं। पाठकों के मन में उस वक़्त चल रही भावनाओं और भीतरी द्वंद्व को समझते हुए अपनी त्वरित प्रतिक्रिया भी दे डालते हैं जिससे पढ़ने का आनंद और बढ़ जाता है।

डीडी और बेबी की अगली भेंट एक दूसरे वैवाहिक आयोजन में होती है... कैसा रूप लेती है ये कथा ये जानते हैं इस चर्चा के अगले भाग में..

Thursday, July 19, 2007

जाने क्या चाहे मन... बावरा, अखियन मेरे सावन चला....

मेरे शहर में आषाढ़ की घटाओं का राज है। रोज़ ठीक कार्यालय जाते वक़्त ही, अपना रौद्र रूप दिखा कर वो मुझे भिंगो डालती हैं। पर इसमें नई बात क्या है? ये बारिश तो इस मौसम में आपको भी गीला कर ही रही होगी।

ऊपरवाले की बरखा तो खाली शरीर भिगोती है ... पर अगर दिल में उदासी के बादल उमड़े घुमड़ें तो पूरा मन भींग जाता है... परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि नहीं चाहते हुए भी आपको मन की पुकार को अनसुना कर देना पड़ता है... नतीजन दिल की ये उदासी दर्द का रूप ले लेती है ... और जब ये दर्द असहनीय हो जाता है तो आँसुओं का बाँध टूट सा जाता है...
मयूर पुरी ने सीधे साधे लफ़्जों में यही कोशिश की है अपने इस गीत में। मैंने परसों पहली बार इस गीत को सुना और यक़ीन मानिए ये किसी भी तरह मेरे ज़ेहन से उतर नहीं रहा।


इसका सारा श्रेय जाता है असम के युवा गायक जुबीन गर्ग को। जुबीन मेरे चिट्ठे के लिए नए नहीं है। पिछले साल उनका एक गीत मेरी गीतमाला में शामिल था। इस खूबसूरती से उन्होंने गीत के बोलों का मर्म पकड़ा है कि उनके साथ गुनगुनाते - गुनगुनाते गीत ख़त्म होने तक आँखें नम हो जाती हैं। मुखड़े के बाद का उनका आलाप गीत को एक शास्त्रीय रंग देता है। अतिश्योक्ति नही होगी अगर मैं ये कहूँ कि ये गीत सच ही मन को बावरा बना देता है।

प्रीतम ने अपनी चिरपरिचित शैली में पश्चिमी और पूर्वी वाद्य यंत्रों का समायोजन किया है। गीत के अंतरे के बीच-बीच में बजती पश्चिमी बीट्स के साथ सारंगी की मधुर तान कानों तक पहुंचती है तो मन उसका कोर-कोर ज़ज़्ब करने को उद्यत हो जाता है।

तो लीजिए सुनिये 2006 में रिलीज हुई प्यार के साइड एफेक्ट्स का ये गीत।
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feelin’ blue,feelin’ blue,feelin’ blue…
my heart sayscan't be, can't be, true…
only…, can't be through, my heart says can't be, can't be, true

जाने क्या चाहे मन... बावरा..
जाने क्या चाहे मन... बावरा..
अखियन मेरे.. सावन चला
अखियन मेरे.. सावन चला
जाने क्या चाहे मन... बावरा....सावन चला

feelin’ blue,feelin’ blue,feelin’ blue…

सघन, अचल सराबोर होवे
सजन, असुवन में क्या जोर होवे

क्या जोर होवे...
अपने जिया पे...
मन तो मरा ये मनचला
जाने क्या चाहे
मन बावरा..

जाने क्या चाहे मन बावरा
अखियन मेरे.. सावन चला

पवन पुरवा में यूँ उड़ता जावे
बदरा चंदा से मन जुड़ता जाए
आवे हवा का...
झोंका फिर ऐसा..
टूटे पतंग की डोर सा

जाने क्या चाहे मन बावरा
अखियन मेरे.. सावन चला

Tuesday, July 17, 2007

परवीन शाकिरः बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना...

पिछली पोस्ट में आपने परवीन शाकिर की कुछ रचनाएं पढ़ी और उन्हें मुशायरे में अपना क़लाम पढ़ते देखा। अब उनकी शायरी के सफ़र पर आगे चलें। एक छद्म नाम 'बीना' से लिखना शुरु करने वाली परवीन शाकिर उर्दू के मशहूर शायर अहमद नदीम क़ासमी को आपना गुरु मानती थीं। 'ख़ुशबू' के आलावा अपने जीवनकाल में उनके चार अन्य काव्य संग्रह 'सद बर्ग' (१९८०), 'खुद कलामी' और 'इंकार' (१९९०) और 'माह-ए-तमाम' (१९९४) प्रकाशित हुए। ख़ुशबू के बारे में तो पिछली पोस्ट में चर्चा हुई थी, पर इसके बाद परवीन शाकिर ने जो कुछ लिखा वो कुछ कुछ उन टूटे ख़्वाबों की कहानी जैसा ही लगता है। इन संग्रहों में प्रियतम की संवेदनहीनता और बेवफ़ाई को उन्होंने अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया है। शायद इसका कारण उनके निजी जीवन की परेशानियाँ रही थीं। अस्सी के दशक में डा. नसीर अहमद से परवीन का निकाह हुआ था। पर ये रिश्ता ज्यादा दिन चल नहीं पाया और अंततः इनके बीच तालाक हो गया। इस रिश्ते से उनके बेटे मुराद का जन्म हुआ जिसने उनकी काव्यात्मकता को एक नई दिशा दी। उनके संग्रह ख़ुद क़लामी में मातृत्व से जुड़ी कुछ नज़्में भी पढ़ने को मिलती हैं।

पर ख़ुशबू के बाद उनकी लेखनी में मायूसी और उदासी का पुट बढ़ता चला गया। ये ग़ज़ल, बहुत हद तक जीवन की शाम में टूटे सपनों की चोट से आहत परवीन की आवाज़ लगती है

अक़्स-ए-खुशबू हूँ बिखरने से ना रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को ना समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं सोच कर तनहाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम ना पढ़ ले कोई


जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुजरता भी नहीं
अब किस उम्मीद पर दरवाजे से झांके कोई

कोई आहट, कोई आवाज, कोई छाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई

परवीन शाकिर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी किताबों को एक आत्मकथ्य का रूप दिया। उनकी किताबों में कविताओं का क्रम उनके रचे जाने के हिसाब से है। इसलिए एक आम पाठक भी सहजता से उसे एक किशोरी (खुशबू) , पत्नी (सद बर्ग), माँ (खुदक़लामी) और एक परिपक्व स्त्री के रूप में गढ़ी रचनाओं में बाँट सकता है। पर ये भी सही था कि उनका आत्मकथ्य का लहजा इतना खुला भी नहीं था कि सीधे-सीधे उनकी निजी जिंदगी का हाल समझा दे। अपने महबूब से उन्हें शिकायतें रहीं जो रह-रह के उनके लेखन में दिखती रहीं।

अजीब तर्ज-ए-मुलाकात अब के बार रही
तुम्हीं थे बदले हुए या मेरी निगाहें थीं
तुम्हारी नजरों से लगता था जैसे मेरे बजाए
तुम्हारे ओहदे की देनें तुम्हें मुबारक थीं

सो तुमने मेरा स्वागत उसी तरह से किया
जो अफ्सरान-ए-हुकूमत के ऐतक़ाद में है
तकल्लुफ़ान मेरे नजदीक आ के बैठ गए
फिर *एहतराम से मौसम का जिक्र छेड़ दिया
*आदर

कुछ उस के बाद सियासत की बात भी निकली
अदब पर भी दो चार तबसरे फ़रमाए
मगर तुमने ना हमेशा कि तरह ये पूछा
कि वक्त कैसा गुजरता है तेरा जान-ए-हयात ?

पहर दिन की *अज़ीयत में कितनी शिद्दत है
उजाड़ रात की तन्हाई क्या क़यामत है
शबों की सुस्त रावी का तुझे भी शिकवा है
गम-ए-फिराक के किस्से **निशात-ए-वस्ल का जिक्र
रवायतें ही सही कोई बात तो करते.....

*अत्याचार **मिलन की खुशी

और एक शेर में तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की

कुछ जुमले परवीन शाकिर की शायरी में हर जगह पाए जाते हैं। खासकर ख़ुशबू जिसके बारे में वो अपनी किताब में कहती हैं कि जब उस प्यारी हवा ने फूल को चूमा......एक ख़ुशबू सी सारी फ़िज़ा में फ़ैल गई। काव्य समालोचक सी. एम. नईम साहब कहते हैं कि प्रतीकात्मक लहजे में परवीन की कविताओं में वो फ़ूल और कोई नहीं बल्कि वो खुद हैं और वो अल्हड़ हवा उनकी ओर खिंचे वे लोग, जिनके संसर्ग से उनके ख़्याल शायरी के रुप में उभरे। अब इसी ग़ज़ल को लें.. क्या खूबसूरत मतला है !

तेरी ख़ुशबू का पता करती है
मुझ पे एहसान हवा करती है

वैसे बाकी के शेर भी कुछ कम नहीं

दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है

*अब्र बरसे तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
*बादल

मसला जब भी उठा चिराग़ों का
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

और ये अशआर भी कमाल के हैं

चेहरा मेरा था निगाहें उस की
ख़ामोशी में भी वो बातें उस की

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं
शेर कहती हुई आँखें उस की

बाकी रूमानी शायरों की तरह परवीन को भी चाँद, चाँदनी और बारिश आकर्षित करते रहे। पर यहाँ देखिए कितने दिलकश अंदाज में उन्होंने यहाँ चाँदनी, नींद और ख़्वाब की बातें की है।

चाँदनी ...
उस रोशन झरोखे को छू कर आए, न आए
मगर ...
मेरी पलक़ों की तकदीर से नीदें चुनती रहे
और उस आँख के ख़्वाब बुनती रहे ...

और चाँद में अपनी तनहाई का अक्स ढ़ूंढ़ते हुए उन्होंने कहा

एक से मुसा़फिर हैं
एक सा मुक़द्दर है
मैं जमीं पर तनहा
और वो आसमां में ...

बारिश से मुक्तलिफ़ कुछ नज्में तो यूनुस की प्रतिक्रिया के जवाब में यहाँ लिखी हैं। यहाँ बारिश से जुड़ी एक ग़ज़ल जो मुझे बेहद प्रिय है के चंद शेर पेश कर रहा हूँ

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गये
मौसम के हाथ भीग के *सफ़्फ़ाक हो गये
*खूनी

बादल को क्या ख़बर कि बारिश की चाह में
कितने बुलन्द-ओ-बाला *शज़र ख़ाक हो गये
*पेड़

जुगनू को दिन के वक़्त पकड़ने की ज़िद करें
बच्चे हमारे *अहद के चालाक हो गये
*समय

लहरा रही है बर्फ़ की चादर हटा के घास
सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक हो गये

परवीन शाकिर की ग़ज़लियात को महदी हसन, ताहिरा सईद, रूना लैला जैसे फ़नकारों ने अपनी आवाज दी है। पर मुझे इन सबमें ताहिरा सईद की गाई बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना... बेहद पसंद है।



*बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना
मैं समन्दर देखती हूँ तुम किनारा देखना
*जहाज का पाल

यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दुबारा देखना

किस *शबाहत को लिये आया है दरवाज़े पे चाँद
ऐ **शब-ए-हिज्राँ ज़रा अपना सितारा देखना
*सूरत **वियोग की रात

आईने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिये
जाने अब क्या क्या दिखायेगा तुम्हारा देखना
परवीन शाकिर ने अपनी जिंदगी उस तेज चलती हवा सी जी, जिसे अपनी मंजिल पर जल्द से जल्द पहुँचना हो। उनके पूरे जीवन को देखें तो युवावस्था में मिली ख्याति, सिविल सर्विसेज में सफलता, शादी फिर बेटे मुराद का जन्म, तालाक, कस्टम के कमिश्नर पद तक उनकी तरक्की, अपने जीवन काल में ही उनकी सारी रचनाओं का प्रकाशन सब कुछ इतना जल्दी होता चला गया मानो उन्हें पहले से मालूम हो कि उनके पास समय ज्यादा नहीं है। २६ दिसम्बर १९९४ में की सुबह उनकी कार की बस से टक्कर हो जाने की वजह से उन्होंने ४२ वर्ष की उम्र में अचानक ही इस दुनिया से कूच कर दिया। पर उर्दू शायरी के प्रेमी ना उनको भूले हैं ना उनकी रचनाओं को। आखिर खुद उन्होंने ही तो लिखा था

मर भी जाऊँ तो कहाँ लोग भुला देंगे
लफ़्ज मेरे होने की गवाही देंगे..........

Friday, July 13, 2007

परवीन शाकिरः अपनी छोटी सी जिंदगी में उर्दू अदब में पहचान बनाने वाली शायरा !

अपने चिट्ठे पर आपके साथ मैं फै़ज अहमद फै़ज का कलाम बाँट चुका हूँ। आज की ये महफिल है परवीन शाकिर के नाम। परवीन शाकिर का नाम पहली बार एक अंतरजाल पर उर्दू कविता के एक मंच पर सुना था। वक्त के साथ उसी मंच पर इस मशहूर पाकिस्तानी शायरा की कई गजलें और नज्में पढ़ने का मौका मिला और उनके काव्य की संवेदनशीलता और साफगोई ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया। कोशिश करूंगा कि उनकी चंद बेहतरीन कृतियाँ आपके सामने रख सकूँ जो उनकी शख्सियत को आपके सामने ज़ाहिर कर सके।

परवीन शाकिर को ऐसी शायरा में शुमार किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता में वो सब बेबाकी से बयां किया जो उन्होंने अपनी जिंदगी में महसूस किया और सहा। उनका सबसे पहला ग़जलों और नज्मों का संग्रह ख़ुशबू (१९७६) तब प्रकाशित हुआ जब वो २४ वर्ष की थीं। यमन टाइम्स ने परवीन शाकिर के इस संग्रह के बारे में लिखा है कि यूँ तो कविताओं में खुशबू एक ऐसा प्रतीक है जो उस प्यार की कहानी कहता है जो कभी मिला नहीं। पर परवीन जिस ख़ुशबू की बात करती हैं वो एक ऍसे फूल की है जिसने पूरी शिद्दत से फ़िजा में अपनी महक बिखेरी, पर वो अपनों द्वारा उपेक्षित ही रहा । वो भी उस सूरत तक कि आखिरकार वो मुरझाकर मिट्टी की ग़र्द फांकने पर मजबूर हुआ। उनका एक बेहद मशहूर शेर याद पड़ता है

वो तो ख़ुशबू है हवाओं में बिखर जायेगा
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा

दरअसल, ये संग्रह किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था में प्रवेश करती लड़की के ख़्वाबों, खुशियों और रुसवाइयों का आईना है। अब उनकी इसी नज्म को देखें...किस तरह यहाँ अपने साथी की कल्पनाओं में खोई ये लड़की मधुर सपनों के जाल बुनते-बुनते एक चुभती सच्चाई के रूबरू आ जाती है।

अपने बिस्तर पर बहुत देर से मैं नीम दराज
सोचती थी कि वो इस वक्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर इस कूचा-ए-रंग बू में
रोज़ की तरह वो आज भी आया होगा
और जब उसने वहाँ मुझ को ना पाया होगा


आपको इल्म है वो आज नहीं आईं हैं?
मेरी हर दोस्त से उसने यही पूछा होगा
क्यूँ नहीं आईं क्या बात हुई है आखिर
खुद से इस बात पर सौ बार वो उलझा होगा
कल वो आएगी तो मैं उससे नहीं बोलूँगा
आप ही आप कई बार वो रूठा होगा
वो नहीं है तो बुलंदी का सफर कितना कठिन
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने ये सोचा होगा
राहदारी में, हरे लॉन में, फूलों के करीब
उस ने हर सिमत मुझे आ के ढूंढा होगा

.............................................
.............................................
याद कर के मुझे नम हो गई होगी पलकें
"आँख में कुछ पड़ गया कुछ" कह के टाला होगा
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मेरा चेहरा उभर आया होगा
जब मिली होगी मुझे मेरी हालत की खबर
उस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगा
सोच कर ये थम जाए परेशानी-ए-दिल
यूंही बेवजह किसी शख्स को रोका होगा

इत्तिफ़ाकन मुझे उस शाम मेरी दोस्त मिली
मैंने पूछा कि सुनो , आए थे वो? कैसे थे?
मुझको पूछा था? मुझे ढू्ढा था चारों जानिब
उसने इक लमहे को देखा मुझे और फिर हँस दी
उस हँसी में वो तल्खी थी कि उससे आगे
क्या कहा उसने मुझे याद नहीं है लेकिन
इतना मालूम है, ख्वाबों का भरम टूट गया...


परवीन शाकिर ने अंग्रेजी में स्नात्कोत्तर किया । नौ साल तक वो काँलेज में शिक्षिका रहीं। इसी दौरान इनका दूसरा काव्य संग्रह सद-बर्ग (सौ पत्ते) छप चुका था। पढ़ने-लिखने में इनकी काबिलियत का आलम ये था कि १९८६ में जब पहली बार पाकिस्तान सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठीं तो चुन ली गईं। मजे की बात ये रही कि उस इम्तिहान में एक सवाल इनकी कविता से भी पूछा गया।

ग़जल में तो हमेशा से प्रेम, वियोग, एकाकीपन, उदासी, बेवफ़ाई, आशा और हताशा से जुड़ी भावनाओं को प्रधानता मिली है। काव्य समीक्षकों का ऐसा मानना है कि परवीन शाकिर ने ना केवल अपनी ग़जलों और नज्मों में इन भावनाओं को प्रमुखता दी , बल्कि साथ साथ इन विषयों को उन्होंने एक नारी के दृध्टिकोण से देखा जो तब तक उर्दू कविता में ठीक से उभर के आ नहीं पाया था। परवीन, नाज़ुक से नाज़ुक भावनाओं को सहजता से व्यक्त करना बखूबी जानती थीं। मिलन के कोमल मुलायम
ज़ज्बातों को जिस खूबसूरती से उन्होंने अपनी इस नज्म में उकेरा है, उसकी मिसाल समकालीन उर्दू शायरी में निकाल पाना मुश्किल है।

सब्ज़ मद्धम रोशनी में सुर्ख़ आँचल की धनक
सर्द कमरे में मचलती गर्म साँसों की महक

बाज़ूओं के सख्त हल्क़े में कोई नाज़ुक बदन
सिल्वटें मलबूस पर आँचल भी कुछ ढलका हुआ

गर्मी-ए-रुख़्सार से दहकी हुई ठंडी हवा
नर्म ज़ुल्फ़ों से मुलायम उँगलियों की छेड़ छाड़

सुर्ख़ होंठों पर शरारत के किसी लम्हें का अक्स
रेशमी बाहों में चूड़ी की कभी मद्धम धनक

शर्मगीं लहजों में धीरे से कभी चाहत की बात
दो दिलों की धड़कनों में गूँजती थी एक सदा


काँपते होंठों पे थी अल्लाह से सिर्फ़ एक दुआ
काश ये लम्हे ठहर जायें ठहर जायें ज़रा


और यहाँ देखें प्यार के खुशनुमा अहसास को यादों कि गिरफ्त में क़ैद करती ये ग़जल अपने प्रवाह में पाठक को किस तरह बहा ले जाती है।

सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानाँ
धूप आँखों तक आ पहुँची है रात गुज़र गई जानाँ

भोर समय तक जिसने हमें *बाहम उलझाये रखा
वो अलबेली रेशम जैसी बात गुज़र गई जानाँ
*एक दूसरे में


सदा की देखी रात हमें इस बार मिली तो चुप के से
ख़ाली हाथ पे रख के क्या सौग़ात गुज़र गई जानाँ

किस कोंपल की आस में अब तक वैसे ही सर-सब्ज़ हो तुम
अब तो धूप का मौसम है बरसात गुज़र गई जानाँ


लोग न जाने किन रातों की मुरादें माँगा करते हैं
अपनी रात तो वो जो तेरे साथ गुज़र गई जानाँ

जो शख़्स तीस की उम्र के पहले ही सेलीब्रेटी का दर्जा पा चुका हो उसकी जिंदगी में खुशियों की क्या कमी । पर क्या ऍसा हो पाया था परवीन के साथ ? काव्य और नौकरी दोनों में कम उम्र में इतनी तरक्की पा कर भी अपनी निजी जिंदगी में उन्हें काफी निराशा हाथ लगी थी। ग़म और खुशी का ये मिश्रण उनकी लेखनी में जगह-जगह साफ दिखाई पड़ता है।

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन *चेत का उस पे तेरा **जमाल भी
* एक महिने का नाम ** सुंदरता

सब से नज़र बचा के वो मुझ को ऐसे देखते
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लो
*शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
* शीशे पर काम करने वाला

उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ *मुहाल भी
* मुश्किल

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी


शाम की नासमझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी

उस के ही बाज़ूओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी


अगली पोस्ट में बाते होंगी उनकी कुछ और मशहूर रचनाओं की। तो चलते-चलते एक झलक देखिए उन्हें खुद एक मुशायरे में

Thursday, July 05, 2007

दिल्ली है दिलवालों कीः लेंस में कैद कुछ हल्के फुल्के लमहे चिट्ठाकार भेंटवार्त्ता से।

खबरी आए पत्रकारी झोले और अपनी खूबसूरत सी फ्रेंच कट दाढ़ी ले कर। अब बात पे ध्यान दें या दाढ़ी पर इसी पशोपेश में है :)। (चित्र अमित गुप्ता के सौजन्य से) बीच में दिख रहे हैं सजीव सारथी









तीन घंटे की चर्चा के बाद कमरे से बाहर का रास्ता लिया गया । मैथिली और अरुण तब तक जा चुके थे।


कॉफी और भाई लोग....




शैलेश और अमित के चेहरे की खुशी का राज क्या है ?
लो जी चर्चा कर-कर के बिलकुल पका दिया, अब जाकर आने वाला है कुछ असली माल !



जब भी तकनीक या पकवानों की बात हो अमित के चेहरे की चमक देखने लायक होती थी । अब यही् देखिए प्लेट खाली कर देने के बाद भी भोजन में कितने तल्लीन दिख रहे हैं हमारे अमित भाई :)










और लीजिए अपने को कैसे छोड़ दें। पूरे साल की बतकूचन छः घंटे में टिका दी । देखिए अमित की लेंस का कमाल ...कैसे मुँह फाड़ रहे हैं ;)


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

Sunday, July 01, 2007

दिल्ली है दिलवालों कीः कौन से मुद्दे उठे आपसी बातचीत में भाग :२

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह हम सब २९ की शाम को दिल्ली के पार्क होटल में इकठ्ठे हुए। अब पढ़िए उसके आगे की दास्तान...

बात अरुण जी से शुरु हुई कि आखिर वो पंगे लेते ही क्यूँ हैं? पिछली रात को फोन पर वैसे वो इनकी पृष्ठभूमि मुझे विस्तार से बता चुके थे। मैंने उनसे कहा कि बहुत सारे लोग तो आपके चिट्ठे का नाम देखकर ही घबड़ा जाते हैं। उन्होंने भी स्वीकार किया कि वक्त के साथ वो समझ रहे हैं कि ब्लागिंग के और भी आयाम हैं। और आगे से वो पंगो तक ही अपनी लेखनी सीमित नहीं रखेंगे और अपने तकनीकी अनुभवों को सबके साथ बाँटेंगे।

मैंने तो सबसे यही कहा कि आप समझें कि कोई आपको उकसाने के लिए कुछ लिख रहा है तो त्वरित बहस में मत कूदें। उससे भाषा पर संयम जाता रहता है और उस विषय पर स्वस्थ वाद-विवाद तो नहीं बढ़ पाता पर मसाले की तालाश में आए पाठकों के लिए अच्छी सामग्री का जुगाड़ हो जाता है। नारद पर हुए हाल के वाद विवाद में मैंने समर जी के चौखंभा पर लिखे लेख का जिक्र किया जो मुझे पूरे प्रकरण का सबसे संतुलित विवेचन लगा था । इस बारे में सबकी अपनी‍‍‍-अपनी मुक्तलिफ राय थी पर इस बात में हम सब एकमत थे कि नारद पर जिस तरह के भी निर्णय लिए जाएँ वो consistent हों। अगर एक दशा में एक निर्णय लिया गया है तो आगे से वो उसी निष्पक्षता के साथ दूसरी दशा में भी लिया जाए तभी वो निर्णय सर्वमान्य होगा।

चिट्ठा चर्चा के बारे में विचार उठे। शैलेश ने अपने विचार दुहराए कि जो लोग उसको सँभाल रहे हैं ये उनकी पूरी जिम्मेदारी है कि वे उसके स्तर को बनाए रखें। अमित ने उनकी बात से असहमति जाहिर की। कहा कि भाई जो चिट्ठा चर्चा जैसे ढ़ंग से करना चाहे ये उसकी मर्जी है, अगर अपने ढ़ंगसे करना चाहते तो खुद भी मैदान में कूदो। मैंने दोनों ही विचारों से अपने आप को पूर्णतः सहमत नहीं पाया। पर चूंकि उस टीम का कोई सदस्य हमारे बीच नहीं था इसलिए बाकी लोगों ने विस्तार से इस मसले पर कुछ नहीं कहा। शायद मसिजीवी होते तो वो इसके संचालकों का पक्ष रख पाते।

मैथिली जी ने हिंदी के सॉफ्टवेयर के विकास में अपनी संस्था के योगदान का जिक्र किया। हिंदी चिट्ठाकारी से अधिकाधिक लोगों के जुड़ने के लिए उनकी दिल्ली और मुंबई में ऐसी कार्यशाला आयोजित करने का विचार है जिसमें इसके बारे में व्यवहारिक जानकारी दी जा सके। शैलेश भारतवासी ने भी बताया कि वो हिंद युग्म के सदस्यों के सहयोग से फोन के द्वारा हिंदी ब्लागिंग की जानकारी देने की योजना को मूर्त्त रूप देने का विचार कर रहे हैं। ये सारे छोटे-छोटे कदम बेहद सराहनीय लगे। अगर हम सब इनकी पुनरावृति अपने अपने इलाकों में कर सकें तो हिंदी में इस विधा के फैलने में मदद मिल सकेगी।

प्रश्न उठा कि अक्सर जब चिट्ठाकार बंधु कुछ मेहनत कर सार्थक जानकारी अपने चिट्ठे पर उपलब्ध कराते हैं, उन्हें उस पर वो प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती जो उन्हें उस तरह के सतत लेखन के लिए प्रेरित कर सके। जगदीश भाटिया जी ने पूंजी बाजार में नया कुछ ना लिखने के लिए पाठकों की इस उदासीनता का जिक्र किया। दरअसल आम पाठक जो हिंदी चिट्ठाजगत में ज्यादातर खुद चिट्ठाकार होता है, इतनी जल्दी में होता है कि जिस विषय को समझने में ज्यादा दिमाग लगाना पड़े उससे वो कतराने लगता है। पर सबने महसूस किया कि अगर हम सार्थक सामग्री थोड़ा-थोड़ा कर के ही सही पर लगातार परोसते रहे तो सर्च इंजन का रास्ता पकड़ कर पहुंचने वाले पाठकों की तादाद बढ़ती रहेगी। चूंकि वो पाठक उस खास विषय को ढ़ूंढ़ता हुआ वहाँ पहुँचा है इसलिए वो वक्त देकर उससे लाभान्वित हो पाएगा। रवि रतलामी जी ने हाल ही में ये बात कही थी कि अंग्रेजी चिट्ठाजगत में ऐसे कई नामी चिट्ठे हैं जहाँ प्रतिक्रियाएँ तो बहुत कम दिखती हैं, पर जो पाठकों की आवाजाही में अव्वल नम्बर रखते हैं। अमित ने भी अपने अंग्रेजी के तकनीकी चिट्ठे के बारे में बताया कि पिछले दो साल से अक्रियाशील होने के बावजूद उसपर सामग्री की वजह से होने वाली हिट्स हजारों में होती है।

दिल्ली में ही हो रही अगली ब्लागर मीट में जगह के बारे में भी बात चली। कितने लोग आएँगे उस संख्या को लेकर अभी भी सबके विचार भिन्न दिखे। दिल्ली के साथियों से मैंने ये भी गुजारिश की कि वो मध्य प्रदेश, छत्तिसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश में भी ऐसे सम्मेलन कराने की सोचें ताकि हमारे बाकी के साथी भी एक दूसरे मिल सकें।


मैथिली जी और अरुण जी को दूर जाना था सो ६.३० बजे तक उन्होंने हमसे इजाजत ले ली। मैंने सबको कहा कि भाई चाय पानी के लिए तो हम सबको बाहर ही निकलना पड़ेगा पर चर्चा जोर पकड़ चुकी थी। सबकी सहमति बनी की अभी बहस जारी रखी जाए।

देवेश खबरी से मैं पूर्णतः परिचित नहीं था। बातचीत हुई तो पता चला कि नवोदित पत्रकार हैं और डाक्यूमेंट्री बनाने का शौक रखते हैं। जगदीश भाटिया जी ने उनसे पत्रकारिता के गिरते स्तर का सवाल उठाया। ये बताना जरूरी होगा कि भाटिया जी एक बेहद सजग पाठक हैं और समाचारपत्रों में छपी खबरों को वो हमेशा से पत्थर की लकीर मानते थे। विगत कुछ वर्षों से उनके मन का मिथक टूटा है और इससे वो आहत दिखे। देवेश ने माना कि स्तरीय पाठकों के लिए वो सामग्री उपलब्ध नहीं हो रही जो होनी चाहिए.पर बात ये है कि ऐसे पाठकों की संख्या ५ प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। उनका कहना था कि बाकी व्यापारों की तरह पत्रकारिता भी एक व्यापार है जिसका मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच कर ज्यादा लाभ कमाना है।

सबके मन में ये जानने की उत्सुकता थी कि पत्रकार जब तरह-तरह के विषयों पर रिपोर्टिंग करता है तो उस सामग्री की विश्वसनीयता को किस तरह परखता है। क्या इस संबंध में कई लोगों से राय ली जाती है? खासकर,हिंदी चिट्ठाजगत के बारे में अब तक जितनी रिपोर्टिंग हुई है उसमें कुछ को छोड़कर सबमें गहराई का आभाव दिखा, ऐसा सबका मत था। देवेश ने कहा कि अक्सर जितने भी संपर्क सूत्र होते हैं हम उनका सहारा लेते हैं। पर ये संपर्क सूत्र हमेशा सही सूचना नहीं दे पाते।

मुझे एक बात तो स्पष्ट लगी कि जिस तरह हम पर समयाभाव में काम का दबाव बनाया जाता है उससे काम की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता ही है। ये बात पत्रकारों पे भी लागू होती हे कि उन्हें उनके आकाओं द्वारा कितना वक्त दिया जाता है मामले की तह तक पहुँचने के लिए। बाकी क्षेत्रों की तरह यहां भी कम और ज्यादा समर्पित लोग तो होते ही होंगे। खैर ये चर्चा तो अगली मीटिंग में चलती रहेगी जब हमारे वरीय पत्रकार बंधु उपस्थित रहेंगे। सृजनशिल्पी,नीरज,उमाशंकर,रवीश भाई होते तो इस मसले पर और गहराई से बात हो पाती।

सजीव सारथी जी एक नए चिट्ठाकार हैं। नौकरी के साथ साथ कुछ सृजनात्मक करने में दिलचस्पी रखते हैं। हमारे बहुतेरे चिट्ठाकारों की तरह घंटे दो घंटे साइबर कैफे में गुजार पाते हैं। उन्होंने उसी समस्या का जिक्र किया जिसके बारे में पहले भी हम सब कहते रहे हैं। यानि एग्रगेटर के मुखपृष्ठ पर विषय आधारित पोस्ट चुनने के लिए क्या किया जा सकता है ताकि समय की बचत हो सके। शायद इसके लिए सभी चिट्ठों को समान टैग प्रणाली अपनाने की जरुरत पड़े। पर इस समस्या का निदान सभी एग्रगेटरों के लिए जरूरी है। अमित ने इसके लिए नारद के साफ्टवेयर में परिवर्त्तन लाने की बात कही। आशा है प्रतीक भी इस बात को अपने एग्रगेटर में लाने की कोशिश में जुटे होंगे।

बातचीत का ये दौर साढ़े आठ तक पहुँच चुका था। होटल में कुछ चित्र लेने क पश्चात हम क्लब काफी हाउस की ओर बढ़ चले।

काफी की चुस्कियों के बीच में अमित, जगदीश और देवेश अपनी बातों में लगे रहे। फिर शैलेश और सजीव के सा्थ हिंदी युग्म में कविताओं के स्तर, उसमें सुधार के निरंतर उपायों पर विस्तृत चर्चा हुई। सजीव ने हिंद युग्म के आवरण पृष्ठ को बदलने का सुझाव दिया। शैलेश ने इस बाबत सीमा कुमार से सहयोग के विचार का खुलासा किया। हम सब ने माना कि हिंद युग्म में कई प्रतिभाएँ हैं और कुछ का स्तर साधारण भी है पर समय के साथ उनमें सुधार आ रहा है। शैलेश एक उत्साही युवक हैं और हिंद युग्म से अच्छे अच्छे कवियों के जुड़ने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए वो अक्सर नामी साहित्यकों से मिलते भी रहे हैं।

दस बजे सजीव को विदा कर हम बगल के दक्षिण भारतीय भोजनालय में गए. करीब ग्यारह बजे जगदीश जी शैलेश और देवेश ने विदा ली । अमित से अगले एक घंटे तक परिचर्चा में सुधारों की जरूरत पर विचार विमर्श हुआ। इस बात का जिक्र हुआ कि प्रबंधन मंडल में से कई सदस्य समयाभाव की वजह से अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं। महफिल ओर तकनीकी अनुभागों में तो थोड़ी बहुत चहल पहल रहती है पर बाकी में कुछ खास नही होता। किताबों और घूमने फिरने से जुड़े नए अनुभाग बनाए जा सकते हैं। महफिल को भी दो अलग अनुभागों उर्दू शायरी और हिंदी कविता में बाँटा जा सकता है।हैं। परिचर्चा की असीम संभावनाओं को देखते हुए इसमें नए उत्साही लोगों के समन्वय की जरूरत है जो इसे और आगे ले जा सकें।


चिट्ठाजगत के इन्हीं पहलुओं को छूते हुए हमारा ये मिलने जुलने का कार्यक्रम समाप्त हुआ। विचार हमारे हर विषय पर एक से नहीं थे। फिर भी अलग अलग व्यक्तित्व ओर विचार के लोगों से मिलकर आपकी सोच विस्तृत होती है मन में खुशी होती है इसमें कोई शक नहीं हो सकता। आपस के मेल जोल से आप सामने वाले को एक अलग नजरिए से देख पाते हैं।
आशा है यही भावना हमारी अगली महापंचायत के प्रतिभागियों में विद्यमान रहेगी। :)



अगले भाग में चित्रों के साथ बाँटेंगे इस मुलाकात के कुछ हल्के फुल्के क्षण....:)

दिल्ली है दिलवालों कीः किस्सा साथी चिट्ठाकारों से मेरी मुलाकात का भाग :1

सच कहूँ तो मैं निजी जिंदगी में अपने शहर से बाहर निकलने पर बहुत मिलनसार नहीं रहा हूँ, इसमें आलस्य का ही मुख्य योगदान रहा है। कानपुर में तो सच ही मेरे पास शादी से निकलने का वक्त नहीं था पर कोलकाता में प्रियंकर जी से इसी वजह से मुलाकात नहीं कर पाया था।

२७ तारीख को जब मैं दिल्ली के लिए निकल रहा था तो इसी असमंजस में था कि सबको बता तो दिया है, पर मैं क्या खुद ही वक्त निकाल पाऊँगा सबसे मिलने जुलने का? विमान के केबिन कक्ष से उदघोषणा हो रही थी कि दिल्ली के चारों ओर मानसूनी बादलों का पहरा है...विमान के उतरने के पहले की डगमगाहट के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें। पर ये क्या जब दिल्ली पास आई तो बादलों का कोई नामोनिशान तक नहीं था। शाम के सात बजे भी अँधेरा दिल्ली को निगल नहीं पाया था। ३६ डिग्री तापमान के साथ उमस भरी शाम हमारा इंतजार कर रही थी । करोलबाग में होटल में तरोताजा होने के बाद फोन नंबर की फेरहिस्त निकाली जो कि मुझे मेल और चिट्ठे पर मिली थी। हमारी सोशल नेटवर्किंग का जनाब हाल ये है कि फोन की कौन कहे उनमें से ९० फीसदी लोगों से चैट तक में भी कभी मेरी बात नहीं हुई थी।

मेरे पहले निशाने पे थे जगदीश भाटिया साहब...नंबर तुरंत लगा और उधर से शांत चित्त स्वर सुनाई पड़ा। मेरा नाम सुनकर कुछ देर तक वो चुप रहे....आखिर वास्तविक दुनिया से नेट की दुनिया में आने में कुछ समय तो लगता ही हैना । फिर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया, मौसम, शेयर, घर परिवार की बातें हुईं...फिर कहा जरूर मुलाकात होगी। भोजन के बाद फिर फोन सँभाला, अब रात के वक्त तो जो तयशुदा बैचलर्स हैं उन्हें ही परेशान किया जा सकता है। सो पहले अमित से बात हुई , फिर राजेश रौशन और सबसे अंत में शैलेश भारतवासी से। अमित के बारे में ब्लॉगर मीट के पहले के किस्सों और परिचर्चा में साथ होने की वजह से मुझे उसके व्यक्तित्व का अंदाजा था। बातचीत से बिलकुल नहीं लगा कि पहली बार बात हो रही हो। राजेश रौशन राँची के हैं ये मुझे पता नहीं था। पहले शशि फिर अविनाश .. सचिन और अब राजेश ..जानकर प्रसन्नता हुई की ब्लागिंग परिवार में झारखंड से किसी ना किसी रूप में जुड़े पत्रकारों की फेरहिस्त लंबी होती जा रही है।

हाँ तो हिन्दी युग्म के शैलेश जी से संपर्क करना आसान सिद्ध नहीं हुआ। मजे की बात ये कि रात के ग्यारह बजे के बाद भी उनका फोन व्यस्त चल रहा था। हमारे दिमाग की घंटी बजी..कहीं इनका कोई चक्कर वक्कर तो नहीं चल रहा? खैर दस मिनट बाद फिर कोशिश की तो कहने लगे कि एक पुराने सखा थे , उन से अक्सर जब भी बात होती है लंबी ही चलती है। अब वे वास्तव में सखा थे या सखि इसकी पुष्ट खबर तो हमारे देवेश खबरी जी ही दे सकते हैं :p। मुझे इस पोस्ट के छपते-छपते अभी भी उनकी इस बारे में अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।

अगली सुबह कार्यालय निकलने के ठीक पहले मैथिली जी से संपर्क साधा। इतने प्यार से उन्होंने मिलने की इच्छा जताई कि मन अभिभूत हो गया। इससे पहले मैं उनके बारे में बस इतना जानता था कि वो कैफे हिंदी चलाते हैं जिसकी शुरुआत में लेखों को चिट्ठे से लेने के संबंध में विवाद हुआ था। मसिजीवी को जब फोन किया तो वो कॉलेज जाने की तैयारी में थे। कनॉट प्लेस में उनका कॉलेज है तो वहाँ मुलाकात होने की संभावना हो पाएगी ऐसा उन्होंने कहा। फिर संगीत में रुचि रखने वाले सजीव सारथी से बात हुई। बहुत अच्छी आवाज लगी उनकी। बातों से पता चला कि वो भी कनॉट प्लेस के पास ही काम करते हैं और वो जरूर आएँगे।

अरुण अरोड़ा से बात शुरु हुई तो उन्होंने पहली बात ये कही कि मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि आप मुझे फोन करेंगे। दरअसल अरुण जी सबसे पहले परिचर्चा में आए थे और पंगेबाज बनने से पहले सबसे पहली नोंक झोंक (श्रीश, याद है आपको) उनकी मुझसे ही हुई थी :)। अरुण जी की २९ को एक मीटिंग थी। पर २८ को फोन पर ही उनसे काफी बातें हुईं। मैंने उन्हें अपने फरीदाबाद के पुराने अनुभव बताये और उनसे उनके व्यापार से जुड़ी जद्दोजहद की कहानी सुनीं।

२८ का सारा दिन और शाम कार्यालय के काम में निकल गया। रात को राजीव रंजन प्रसाद से बात हुई। पता चला कि २९ को शायद ही उन्हें समय मिल पाए। बात उनकी कविताओं से चलकर बस्तर की नक्सली समस्या तक पहुँच गई। अपने क्षेत्र की समस्याओं के प्रति उनकी भावनाएँ अपने जिले से उनके ममत्व को दर्शाती दिखीं। कुल मिलाकर मुझे वो जिंदादिल व्यक्तित्व के स्वामी लगे।

२८ को मैंने अपना ठिकाना करोलबाग से हटाकर कनॉट प्लेस के होटल पार्क में कर लिया। होटल तो बेहतर था ही ,साथ में सबसे बातचीत से ये अनुमान भी लग गया कि मिलन स्थल कनॉट प्लेस में रहने से सुविधा होगी। शाम ५ बजे का वक्त अमित ने सुझाया ताकि आफिस से सीधे लोग उधर चलें जाएँ। सबको sms कर दिया गया। चार बजे तक मैं होटल पहुँच गया था। पाँच बज गए पर भारतीय मानकों के हिसाब से कोई नहीं आया। सबसे पहली घंटी साढ़े पाँच बजे अमित ने बजाई , और करीब साढ़े छः तक सारे लोग एक-एक कर आ चुके थे। हैरत की बात थी कि एक ही शहर में रहकर भी बहुत से लोग पहली बार आपस में मिल रहे थे।



(चित्र में बायें से शैलेश भारतवासी,सजीव सारथी, देवेश खबरी, अमित गुप्ता, मनीष यानि मैं खुद :), अरुण अरोड़ा,जगदीश भाटिया और मैथिली गुप्त जी)

साढ़े पाँच बजे हमारी गपशप रात बारह बजे तक चली। बीच-बीच में लोग रुखसत होते गए। विभिन्न मसलों पर हम सब एक दूसरे के विचारों से अवगत हुए और साथ ही एक दूसरे की शख्सियत से वाकिफ हुए।

हमने रात तक क्या किया वो किस्सा इस पोस्ट की अगली कड़ी में आपके समक्ष बाकी चित्रों के साथ जल्द ही पेश करूँगा।
 

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