Tuesday, July 24, 2007

मैं, उत्तरांचल, जोशी जी और 'कसप'...आइए चलें इस पुस्तक यात्रा पर भाग : २

पिछली मुलाकात का किस्सा तो आप पढ़ चुके, बेबी और डीडी की अगली मुलाकात की कहानी सुनने के पहले शास्त्री जी के लिए क्या कहेंगे आप! पुत्री के पत्र बांचते-बाँचते उन्हें भी ये समझ आ रहा है कि शादी-विवाह के बीच का वो अल्प मेल-मिलाप, दोनों बच्चों के मन में एक दूसरे के लिए अनुरक्ति जगा चुका है। क्या इतना भर साक्षात प्रेम हो जाने के लिए पर्याप्त है? लेखक उनके मन से प्रश्न का जो उत्तर पाठकों के सामने निकाल के लाता है वो सचमुच ही अद्भुत है। आप भी गौर करिए...

"प्यार वह भार है जिससे मानस-पोत जीवन सागर में संतुलित गर्वोन्नत तिर पाता है। इस भार के लिए छोड़े गये स्थान की पूर्ति हम यथाशक्य अपने प्रति अपने प्यार से करते हैं किंतु कुछ स्थान फिर भी बच रहता है। इसे कैसे भी, किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के प्रति प्यार से भरा जाना जरूरी है, भरा जाता भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम किसी अज्ञात, अनाम तक से भी प्यार कर सकते हैं! "
उपन्यास में अगला मोड़ तब आता है, जब शादी के फिल्मांकन के लिए डीडी टैक्सी से अल्मोड़ा आता है। एक मामूली से सहायक डीडी के दोबारा इस रूप में लौटने से हुई कस्बाई हलचल पर चुटकी लेते हुए जोशी जी कहते हैं...

डीडी की सारे घर में चर्चा है। नगर में चर्चा है। डीडी सुन रहा है क्योंकि इस नगर में जो भी कहा जाता है, सबको सुनाकर कहा जाता है। पीठ पीछे भी कहा जाता है तो किसी ऍसे भरोसे के व्यक्ति से जो 'किसी से ना कहना' के गूढ़ार्थ जानता है, 'यहाँ से जाते ही सब से कह देना।'
इस उपन्यास का एक दूसरा मजबूत पक्ष है, जोशी जी की साफगोई और उनका बेबाक लेखन। नायक और नायिका के वीच के अंतरंग क्षणौं को जिस तरह उन्होंने विवेचन किया है वो प्रशंसनीय है। मात्र भदेस के डर से वो अपनी लेखनी के प्रवाह पर रोक नहीं लगाते और इस क्रम में पाठक के मन में जो बिंब उभरता है वो इतना वास्तविक होता है कि मन की गहराइयों को छूता सा निकलता है। अब यही प्रकरण देखें जहाँ नायक नायिका के बीच का संवाद एक स्लेट पर हो रहा है..

" नायिका जानना चाहती है कि नायक को साना हुआ नीबू कैसा लगता है? नायक को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, बहुत खट्टी चीजें वो खा नही पाता।
नायिका जानना चाहती है कि खट मिट्ठी चीजें कैसी लगती हैं उसे? वे अच्छी लगती हैं नायक को ।
नायिका जानना चाहती है कि बेबी कैसी ठहरी, खट्टी या खट मिट्ठी?

नायक का उत्तर आप जानते ही हैं. सच तो ये है कि मेरे सुधी पाठक यह सब जानते हैं।.....हर प्रेमी जानता है कि प्रतिपक्ष क्या चाह रहा है, किंतु जानकर भी न जानने का विधान है।..गड़बड़जाला निर्बाध जारी है।
नायक के 'खट‍ मिट्ठी' लिखने पर नायिका ने लिख दिया है जब चखा नहीं, फिर कैसे मालूम?
और नायक उसका पेंसिलवाला हाथ पकड़ लेता है और अपने ओठ उसके ओठों की ओर बढ़ाने लगता है....

...जॉनसन एण्ड मास्टर्स प्रभृति अर्वाचीन मनीषी इन सबकी अपनी प्रयोगशालाओं में नाप जोख करके पोथे लिख चुके हैं। ...किंतु फिर भी मुझे सम्भ्रम होता है कि बात यहीं समाप्त नहीं होती। आर्डेनेलिन नोरादेनेलिन आदि रासायनों, रक्तचाप वृद्धि, हृत्कंप वृद्धि आदि लक्षणों से अधिक भी कुछ होता है इन क्षणों में।

मुँह का सूखना भय का लक्षण है, माना। ....पर सामाजिक मर्यादा के उल्लंघन के भय से परे यहाँ कौन सा भय है? कौन सी है वह उच्चतर मर्यादा जिसे तोड़ने की भयमिश्रित चुनौती उपस्थित है यहाँ इस दयनीय होटल के इस तंग दुर्गंधयुक्त कक्ष के गंदे फर्श पर पड़े एक होलडॉल पर चिपटी दो युवा देहों के मध्य? "

जोशी जी के उपन्यास के नायक-नायिका आम मध्यमवर्गीय भीरू मन रखने वाले नहीं हैं। उनमें एक तरह का जुनून है,समाज से मुकाबला करने का ज़ज़्बा है। शादी दूसरी जगह तय होने के बाद भी इसीलिए नायिका मन ही मन निश्चिंत है कि अगर उसका ब्याह होगा तो डीडी के साथ। घर से दूर गणानाथ मंदिर में सहेलियों के साथ जाते वक्त वो डीडी को बुलाना नहीं भूलती। और ये नायक का पागलपन ही है कि उस बुलावे के आगे पीछे का ना सोचते हुए भागते दौड़ते भी वो वहाँ पहुँच जाता है। पर क्या ये जुनून उसके प्यार का मार्ग खोल पाता है। इसका उत्तर तो हाँ भी है और नहीं भी। नायिका की नज़रों में अपने इस कृत्य की वजह से चढ़ जाता है पर समाज उसे पुनः दुत्कार ही वापस भेजता है।

ये मार और दुत्कार नायक के मन को हिला देती है। शायद इसके पीछे उसका दुखद पारिवारिक इतिहास रहा है। पर बेबी....., क्या वो अपनी बदनामी और अपने कृत्य से किंचित मात्र भी ग्लानि महसूस कर रही है। नहीं जी हमारी बेबी अलग मिट्टी की ठहरी। जोशी जी ने उसके चरित्र को अपने लेखन कौशल से बखूबी उभारा है। इन्हीं पंक्तियों को लें जब नायक द्वारा अपने पत्र में पूरे प्रकरण पर क्षोभ का अनुभव करने पर वो लिखती है...

"तुझे मुझसे सादी करनी थी कि मेरे घरवालों से? मुझसे करनी थी तो मैं कह रही हो गई सादी। मेरी सादी के मामले में मुझसे ज्यादा कह सकने वाला कौन हो सकने वाला हुआ? मैंने अपनी दादी की सादी वाला घाघरा-आँगड़ा पहनकर माँग में गणानाथ का सिंदूर भरकर अपने इजा-बाबू, ददाओं-बोज्यूओं सारे रिश्तेदारों के सामने कह दिया उसी दिन गरजकर : मेरी हो गई उस लाटे से सादी। कोई उस पर हाथ झन उठाना। कोई उसे गाली झन देना। तब उन्होंने कहा ठहरा : बच्चों का खेल समझ रखा सादी? अब तू भी वही पूछ रहा ठहरा।

तेरे लिए गणानाथ क्या हुआ? तू वहाँ क्यों आया ठहरा? यह तू जान। मेरे लिए मंदिर ठहरा वह। उसी मंदिर में मुझे भक्ति करने का सा जैसा मन होनेवाला ठहरा। मैं गई ठहरी वहाँ सादी से पहले पूजा करने। मैंने तुझे बुलाया हुआ यह सोचकर कि जो तू भी वहाँ पहुँच गया इतने कम समय में तो तू ही होगा वो लाटा जिसके लिए मैं पैदा हो रही। "
नायिका ने तो अंततः माता पिता को राजी कर ही लिया पर बात इतने से ही खत्म नहीं होती। नायक अपने अपमान की तिलमिलाहट को भुला नहीं पाया है और अपने को कुछ लायक बना पाने के लिए अमेरिका में मिल रही छात्रवृति का लाभ उठाकर अपनी प्रतिभा का सही मूल्य अर्जित करना चाहता है, चाहे इसके लिए विवाह में थोड़ा विलंब ही क्यूँ ना आ जाए। नायिका के लिए ये स्वीकार्य नहीं है। उसे समझ नहीं आता कि जिसके लिए उसने समाज की बदनामी सही, भाई बंधुओं को कुपित किया, उसके लिए अपनी प्रियतमा के साथ तत्काल शादी कर एक साथ पढ़ाई पूरी करने के बजाए अमेरिका जाना ज्यादा जरूरी क्यूँ है? सच, इस प्रश्न को खड़ा कर लेखक ने एक बेहद महत्त्वपूर्ण विषय हम पाठकों के सामने रखा है जिस पर विचार करते समय मन उलझ सा जाता है...

"प्रेम जब ये चाहने लगे कि मैं अपने प्रिय को एक नए आकार में ढाल लूँ, प्रेम जब ये कल्पना करने लगे कि वह जो मेरा प्रिय है, मिट्टी का बना है ओर मैं उसे मनचाही आकृति दे सकता हूँ...अलग अलग कोणों से मिट्टी सने हाथों वाले किसी क्षण परम संतोष को प्राप्त हो सकता हूँ, तब प्रेम, प्रेम रह जाता है कि नहीं, इस पर शास्त्रार्थ की परम संभावना है।"
 नायक के अमेरिका जाने के पहले नायिका से किया गया वार्त्तालाप इस उपन्यास की धरोहर है। या यूँ कहे कि आम मुम्बईया फिल्म का क्लाइमेक्स है। पर मैं उसकी कोई झलक पेश नहीं करने जा रहा। पर जैसा कि वास्तविक जिंदगी में होता है कहानी उस क्लाइमेक्स के आगे भी चलती रहती है। मैं आपको ये भी नहीं बताना चाहता कि देवीदत्त तिवारी किस तरह अमेरिका में एक अच्छा दिग्दर्शक और बेबी उर्फ मैत्रेयी एक अल्हड़ कन्या से विदुषी बन बैठी।

क्या अपनी-अपनी जिंदगी की राहें अलग करने के बाद वो खुश रह पाए? क्या उनका प्रेम अतीत की तहों में दब कर रह गया? क्या वो दुबारा मिल पाए? ये सब ऍसे प्रश्न है जो इस किताब को पढ़ कर ही आप जान पाएँगे।

मूल प्रश्न तो वही है कि नायक या नायिका ने जो निर्णय लिया, क्या वो सही था? क्या एक दूसरे की बात मान कर वो ज्ञान की ऊंचाईयों को प्राप्त कर पाते? क्या व्यक्ति निजी महत्त्वाकांक्षाओं को दरकिनार कर जिंदगी भर प्रेम में डूबा रह सकता है?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके सीधे सपाट उत्तर दे पाना मुश्किल है। पर इस उपन्यास की सार्थकता भी इसी बात में निहित है कि ये प्रेम के मनोविज्ञान के बारे में पाठकों को सोचने को विवश करता है। अगर आपने ये उपन्यास पढ़ा है तो ये जरूर बताएँ कि आप क्या सोचते हैं इस बारे में?
Related Posts with Thumbnails

14 comments:

कंचन सिंह चौहान on July 23, 2007 said...

उपन्यास तो मैने नही पढ़ा, लेकिन

"प्रेम जब ये चाहने लगे कि मैं अपने प्रिय को एक नए आकार में ढाल लूँ, प्रेम जब ये कल्पना करने लगे कि वह जो मेरा प्रिय है, मिट्टी का बना है ओर मैं उसे मनचाही आकृति दे सकता हूँ...अलग अलग कोणों से मिट्टी सने हाथों वाले किसी क्षण परम संतोष को प्राप्त हो सकता हूँ, तब प्रेम, प्रेम रह जाता है कि नहीं, इस पर शास्त्रार्थ की परम संभावना है।"

अच्छी लगी!

Manish on July 23, 2007 said...

ऐसी हालत में क्या प्रेम, प्रेम रह जाता है, इस पर आप की सोच क्या है ?

Udan Tashtari on July 23, 2007 said...

मनीष जी

उपन्यास तो हमारा पढ़ा हुआ है मगर जिस रोचकता से आप बात बढ़ाते हैं वो वाकई काबिले तारीफ है. बहुत बढ़िया. ऐसे ही सुनाते रहें.

Sanjay said...

Kasap ke upar likhi hui iss post ne bahut prabhavit kiya. Abhi tak to vho noval nahi para hai lakin post padhne ke bad lagta hai ki jald hi padhna padhega.

Anonymous said...

चाहे जोशीजी ने यह कहानी एक फिल्मी लहजे में भी लिखी है फिर भी इस का स्क्रीनप्ले बनाना बहुत कठिन है - क्योंकि इसकी खूबी इसकी शास्त्रीय व आलोचनात्मक शैली है जिसे परदे में उतारना बेहद मुश्किल है .

मुरीद

Manoj Kumar Sharma on August 14, 2010 said...

मैने पढ़ा है यह उपन्यास, कई बार पढ़ा है. पहले कॉलेज की लाइब्ररी से लेके पढ़ा था. उसे छुट्टियों मैं घर ले गया, फिर आते वक़्त घर पर रहा गया. पुस्तक की कीमत से ज़्यादा फाइन दिया था. घर से रजिस्ट्री से मँगाया गया. फाइन माफ़ करने के लिए डा. सचान से मिन्नतें की गयी पर फाइन पूरा ही भरना पड़ा. पर मुझे तो इश्क हो गया था कसप से. फिर इसकी चर्चा
होती थी राजेश प्रसाद त्रिपाठी से.
फिर कॉलेज के बाद खरीद ही लिया था बाज़ार से. सोचा पत्नी के साथ पढ़ा जाएगा. पढ़ा भी पर मेरी श्रीमती को अच्छा नहीं लगा. वो श्रीमति जोशी जैसी पाठईका नहीं है. और नौकरी ने बस इसके कुछ ही दिनों बाद सहित्य को पूर्ण विराम लग गया. पर यह मेरी प्रिय पुस्तक है. इस बार भारत आने पर अपनी कुछ किताबें लेके आऊंगा. कसप, गीता और प्रेमचंद की कुछ किताबें.

मनोज कुमार शर्मा, दोहा, क़तर

Manish Kumar on August 14, 2010 said...

मनोज जी जानकर प्रसन्नता हुई की ये किताब आपकी यादों में निरंतर बनी हुई है। कुछ तो अलग है ही इस पुस्तक में जो एक पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है।

Anonymous said...

Priya Manish ji - many many thanks for this blog. Maine " Kasap" kai baar parhi hain. Har baar ek naya maja aata hain ese parhne main. warm regards.

Manish Kumar on January 13, 2012 said...

@ Anonymous Kripya comment karte samay apne naam ka ullekh karein to behtar hoga.

अनूप शुक्ल on February 02, 2012 said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने इस उपन्यास के बारे में।

Rahul Singh on January 10, 2013 said...

मजेदार. वैसे भी कसप मेरी टॉप टेन सूची में है, लेकिन जब तक यह ध्‍यान में रहती है, यही नंबर 1 होती है.

Sourabh Dixit on August 24, 2013 said...

Ha kai bar, aur jitne bar pdta hu utna aur pdne ka man karta hai, ek ajeezb se dard hota hai ise pdkar, Joshi ji ko bahut bahut dhanyabad ke pyar ki jo vyakhaya unhone ke hai shayad us tak pahunch pana har kisi ke liye asan nahi hai

SAKSHI on June 24, 2014 said...

कंचन जी आपने सही सवाल उठाया है... जब आप किसी को अपने मुताबिक ढालने की कोशिश करो या फिर ये चाहो कि वो वही करे जो आप चाहते हो... फिर उसमें प्रेम कहां... और फिर ऐसी चीजों को बड़े व्याख्यानों या शायरी से भी जोड़ दिया जाए तो मतलब नहीं...

Manish Kumar on June 25, 2014 said...

हाँ साक्षी मुझे मनोहर श्याम जोशी जी का ये कथन बहुत उचित लगा इसीलिए मैंने इस लेख में उसे उद्धृत किया।

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie