Sunday, September 23, 2007

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता : ब्रह्म से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है....

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्मदिन है। दिनकर का जन्म २३ सितंबर १९०८ में बिहार के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। सो जन्मदिन के साथ-साथ ये उनका जन्मशती वर्ष भी है। बचपन से वो मेरे सबसे प्रिय कवि रहे हैं। मुझे याद है कि छठी से दसवीं तक जब भी हिंदी की नई पाठ्य पुस्तक मिलती थी, तो सबसे पहले मैं ये देखता था कि कविता वाले भाग में दिनकर की कोई कविता है या नहीं। उनकी कविता को कभी मन ही मन नहीं पढ़ा जाता था। बार बार पढ़ते और वो भी जोर जोर से बोल के जैसे खुद की ही कविता हो। जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के छायावादी रहस्यों को समझने की उम्र नहीं थी पर दिनकर की पंक्तियाँ ना केवल बड़ी आसानी से कंठस्थ हो जाती थीं बल्कि वे मन में एक ऐसा ओज भर देती थीं जिसका प्रभाव कविता की आवृति के साथ बढ़ता चला जाता था।

पहली बार छठी कक्षा में उनका किया इस प्रश्न ने मन में हलचल मचा दी थी

दो में से तुम्हें क्या चाहिए ?
कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव
या तन में शक्ति अजय आपार !

तो वहीं सातवीं या आठवीं में शक्ति और क्षमा पढ़ने के बाद उनकी काव्य शैली ने मुझे पूरी तरह मोहित कर दिया था

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो


पूरी कविता आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

दसवीं की परीक्षा में इन पंक्तियों का भावार्थ लिखते वक़्त लगा ही नहीं था कि इसके लिए कुछ अलग से याद करना पड़ा हो..

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर लौटा हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर


आज उनकी एक और अच्छी कविता पढ़ी। पता नहीं ये पूर्ण है या नहीं, पर इसकी पंक्तियाँ मन को छू गईं।
सब हो सकते तुष्ट एक सा 
सब सुख पा सकते हैं 
चाहें तो , पल में  धरती को 
स्वर्ग बना सकते हैं

छिपा दिये सब  तत्त्व आवरण 
के नीचे  ईश्वर  ने 
संघर्षों  से खोज निकाला 
उन्हें उद्यमी  नर ने 
 
ब्रह्म से कुछ लिखा भाग्य में
मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने
भुजबल से ही पाया है

प्रकृति नहीं डरकर झुकती है
कभी भाग्य के बल से
सदा हारती वह मनुष्य के
उद्यम से, श्रमजल से


भाग्यवाद  आवरण पाप का 
और शस्त्र  शोषण का ,
जिससे रखता  दबा  एक जन 
भाग दूसरे जन का । 

पुछो किसी भाग्यवादी से 
यदि विधि अंक प्रबल है 
पद  पर क्यों देती न स्वयं 
वसुधा निज रत्न उगल है ? 

उपजाता क्यों विभव प्रकृति को 
सींच -सींच वह जल से ? 
क्यों न उठा लेता निज  संचित 
कोष भाग्य  के बल से । 

और मरा  जब पूर्व जन्म में 
वह धन संचित  करके 
विदा हुआ था न्यास समर्जित
किसके घर में  धर  के । 

जन्मा  है वह जहां , आज 
जिस पर उसका शासन है 
क्या है यह  घर वही ? और 
यह उसी न्यास का धन है ? 

यह भी पूछो  , धन जोड़ा 
उसने जब प्रथम -प्रथम था 
उस संचय के पीछे तब 
किस भाग्यवाद  का क्रम था ? 

वही मनुज के श्रम का शोषण 
वही अनयमय  दोहन ,
वही मलिन  छल नर - समाज से 
वही ग्लानिमय  अर्जन । 

एक मनुज संचित करता है 
अर्थ पाप के बल से , 
और भोगता उसे दूसरा 
भाग्यवाद  के छल से । 

नर - समाज  का भाग्य  एक है 
वह श्रम , वह भुज - बल है , 
जिसके सम्मुख  झुकी हुई 
पृथिवी, विनीत  नभ - तल है । 

जिसने श्रम जल दिया , उसे 
पीछे मत रह जाने दो , 
विजित  प्रकृति  से सबसे पहले 
उसको सुख पाने दो । 

जो कुछ न्यस्त प्रकृति में  है , 
वह मनुज मात्र का धन है , 
धर्मराज , उसके कण -कण  का 
अधिकारी जन - जन है ।


पूज्यनीय को पूज्य मानने
में जो बाधाक्रम है
वही मनुज का अहंकार है
वही मनुज का भ्रम है

रामधारी सिंह 'दिनकर'

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17 comments:

neeshoo on September 23, 2007 said...

मनीष जी आपने कविराज दिनकर जी के जन्म पर कविताओं अच्छा संग्रह प्रस्तुत किया ।

काकेश on September 23, 2007 said...

अच्छी पंक्तियां हैं.धन्यवाद.

Sanjeet Tripathi on September 23, 2007 said...

वाकई आपने छात्र जीवन की यादें तो ताज़ा करवा ही दी साथ ही छोटा सा संग्रह भी पढ़वा दिया!
शुक्रिया!

राजीव on September 23, 2007 said...

दिनकर जी की ऐसी ओज भरी कविताएं आज बी प्रासंगिक हैं और हमें विनम्रता और विवेक के साथ कर्मशीलता तथा शक्ति का आह्वान करने की प्रेरणा देती हैं।

इन्हें प्रस्तुत करने का धन्यवाद!

Udan Tashtari on September 24, 2007 said...

किन शब्दों में आपका आभार कहा जाये, आप खुद तय करें. इससे बेहतरीन कोई और तरीका क्या होता दिनकर जी का जन्म दिन मनाने का.

आपको बहुत साधुवाद.

yunus on September 24, 2007 said...

दोनों में से तुम्‍हें क्‍या चाहिये कलम या तलवार । मेरी प्रिय कविता है । आपको दो बातें बतानी है । 3 अक्‍तूबर को
विविध भारती के पचास साल पूरे हो रहे हैं । उस दिन हम अपने खजाने की अनमोल चीजों को निकालकर दिन भर
प्रसारित करेंगे । इन्‍हीं तैयारियों में मुझे दिनकर जी की रिकॉर्डिंग भी मिली । उनकी आवाज़ सुनकर धन्‍य धन्‍य हो गया ।
ये वो कविता है जो चीन युद्ध के बाद उन्‍होंने लिखी थी । शांतिदूत । दूसरी बात ये कि शत्रुघ्‍न सिन्‍हा से जब मैंने इंटरव्‍यू
लिया था तो मैंने उनसे पूछा कि आपको तो रश्मिरथी पूरी याद है ना, फिर क्‍या था इतनी तेज़ी के साथ उन्‍होंने रश्मिरथी
की पंक्तियां सुनाईं की हमारी पूरी रिकॉर्डिंग टीम दंग रह गयी । वे रिकॉर्डिंग भी हमारे पास है । दिनकर जी के बहाने
कितनी कितनी बातें याद आ गयीं ।

rachana on September 24, 2007 said...

आपके ब्लॉग पर उपलब्ध कविताएँ मेरे जैसों के लिये बहुत उपयोगी हैं..मै उन्हे पुन: पुन: पढती रहती हूँ..धन्यवाद.

सजीव सारथी on September 24, 2007 said...

मनीष जी पुराणी यादें ताज़ा कर दी आपने यही कवितायें ही तो है जो हमारे अवचेतन मन मे बसी हुई हैं

अभिनव on September 24, 2007 said...

बहुत सुंदर। मनीष जी, दिनकर जी मुझे भी बहुत पसंद हैं। आपकी पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। आपको दिनकर जी के जन्मदिवस की अनेक शुभकामनाएँ।

कंचन सिंह चौहान on September 24, 2007 said...

मनीष जी! आपकी पोस्ट पढ़ कर लग रहा है कि मेरे विचार आपकी कलम से लिख दिये गये हैं, दिनकर जी मेरे भी बचपन से प्रिय रहे हैं और कारण जो आपने बताया वही सही था कि इनकी और सुभद्रा जी की कविताओं की रिदम बाल मन को जल्दी प्रभावित करती थी।

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर लौटा हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर

सच ही सहज समझ में आ जाती थीं।

वे अपनी ओज भरी कविताओं के लिये तो प्रसिद्ध ही हैं, परंतु पिछले वर्ष जब मैने उनकी उर्वशी पढ़ी, तो पाया कि श्रृंगार पर भी उनकी गज़ब की पकड़ है।

नेहरू जी से उन्होने कहा था कि "राजनीति जब भी डगमगाती है, उसे साहित्य ही सहारा देता है।"

परंतु आज अखबार में यह पढ़कर बहुत कष्ट हुआ कि उनकी जन्मस्थली सिमरिया माफियाओं का अड्डा बन गई है, जिसके कारण उनके वंशज पटना में अपना जीवन बिताने को मजबूर हैं

मेरा शत शत नमन्

Manish on September 26, 2007 said...

नीशू, काकेश, राजीव जी, समीर जी, रचना जी, संजीत, सजीव एवम् अभिनव आप सब की बातों से लगा की दिनकर की कविताएँ मेरी तरह आप सबके मन में भी तरोताजा हैं। शुक्रिया इस कविता को सराहने के लिए।

Manish on September 26, 2007 said...

यूनुस भाई आपने जिन प्रसंगों का ज़िक्र किया उन्हें जानकर ही मन गदगद हो गया, सुनने में कितना मज़ा आएगा ये सोच रहा हूँ। दिनकर से जुड़ा अगर कोई कार्यक्रम प्रसारित हो रहा हो तो कृपा कर के निर्धारित समय के साथ सूचना दे दीजिएगा।

कंचन जानकर खुशी हुई कि दिनकर की कविताओं के बारे में हमारे विचार एकरूप हैं। सिमरिया की हालत सच में अच्छी नहीं है।
सिमरिया में दिनकर के नाम का स्कूल शिक्षकों के आभाव में त्रस्त है। बेरोज़गारी काफी है। पुराने पुस्तकालय में जाने की अपेक्षा लोग सरस सलिल पढ़ना पसंद कर रहे हैं ये सब मैंने भी पढ़ा था।

bandhu on February 13, 2009 said...

dinkar ji ki kavita padhna aur padhana ekm vilakshan anuibhav hai. apne BBA ke vidhyarthiyon ko padhane ke liye jab yeh kavita dhoodh raha th to shri manish ji ke is sansar mein pahucha hoon. aaj bhi ye kavita prasangik hai apitu aaj jyada prasangik hai. aangreji ke dushprabhav se hamari peedhi na aangreji ki hai na aapni kisi bhasha ke prati usmein koi lagav hai na utsah. aagami teen- chaar varshon mein hamari sanskrati bhi itihas ka vishaya ho jayegi. hamare tathkatit yadhyapi chune hue neta shiksha ka madhyam apni bhasha karna he nahin chahte, unhein apne rashtra aur rashtra bhasha per koi shraddha nahi hai. keval kuch pustak vikreta aur dilli mein rahene wale aangregi ke gulamon ko hi vey vidvan mante hain.
Aastu dhanyavad manish ji, shri yunus ji (vividh bharti) ki aap logon ko sunkar aur padhkar lagta hai ki hindi aur devnagri jinda hai.
Aapka vinod Mishra
vyakhyata
Prestige Institute of Management and Reserch, Indore.

Manish Kumar on February 13, 2009 said...

विनोद मिश्रा जी आप इस चिट्ठे पर आए और अपने विचारों को यहाँ बाँटा इसके लिए आपका आभारी हूँ। हिंदी ब्लॉग्स की दुनिया में आज कई लोग अच्छे साहित्य को रुचिपूर्ण तरीके से पेश कर रहे हैं । हिंदी साहित्य में जो कुछ अच्छा है उसे बाँटने का सम्मिलित प्रयास कर हम सब अपनी भाषा के गौरव को बनाए रख सकेंगे ऍसा विश्वास है।

I ME MYSELF on April 01, 2010 said...

An excellent blog. Hats off to you. you have touched my heart and given so many options in poems, gazals... your deep love and knowledge about Dinkarji needs to be applauded. Keep writing and I'll keep following you ... Happy writing. Anvita

sheetal ojha said...

The title of this poem was himmat shram aur mehnet.please can I get this complete poem.it further read as...prakrati nahi darr kar jhukti kabhi bhagya ke bal se sada harti hai wah manushya ke udyam se shram jal se.
Brhma ka abhilekh padha karte nirudyami prani dhote wahi kuank bhaal ka baha bhruvon se pani.please I need it

Manish Kumar on November 10, 2014 said...

शीतल ओझा दरअसल दिनकर की ये कविता कुरुक्षेत्र से ली गई हैं। मैंने आपके अनुरोध पर इस सर्ग से जुड़े कुछ हिस्से पोस्ट में डाल दिए हैं। आशा है आपका कार्य इससे हो जाएगा।

 

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इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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