Tuesday, September 04, 2007

यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में...भाग: ८

किशोर को मुंबई की फिल्मी दुनिया और उसके लोग कभी रास नहीं आए। १९८५ में संन्यास का मन बना चुकने के बाद उन्होंने कहा था...

"......कौन रह सकता है इस चालबाज, मित्रविहीन दुनिया में, जहाँ हर पल लोग आपका दोहन करने में लगे हों। क्या यहाँ किसी पर विश्वास किया जा सकता है? क्या कोई भरोसे का दोस्त मिल सकता है यहाँ? मैं इस बेकार की प्रतिस्पर्धा से निकलना चाहता हूँ। कम से कम अपने पुरखों की ज़मीन खंडवा में तो वैसे ही जी सकूँगा जैसा मैं हमेशा चाहता था। कौन इस गंदे शहर में मरना चाहेगा ?......."


दरअसल इस कथन का मर्म जानने के लिए फिर थोड़ा पीछे जाना होगा। किशोर की ये कड़वाहट उनके फिल्म जगत में बिताए शुरु के दिनों की देन है। वे कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। चाहते थे तो सिर्फ गाना पर बड़े भाई दादा मुनि का कहना टाल भी नहीं पाए। अभिनय में गए तो सफलता भी हाथ लगी पर गायक के रूप में ज्यादातर संगीत निर्देशकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। खुद किशोर ने अपनी लाचारी और अपने अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ये सफाई पेश की है...

"...मैं सिर्फ गाना चाहता था। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि मुझे अभिनय की दुनिया में आना पड़ा। मुझे अभिनय में बिताया अपना का हर एक पल नागवार गुजरा। मैंने कौन-कौन से तरीके नहीं अपनाए इस दुनिया से पीछा छुड़ाने के लिए...अपने संवाद की पंक्तियाँ गलत बोलीं, पागलपन का नाटक किया, बाल मुंडवाए, गंभीर दृश्यों के बीच यूडलिंग शुरु कर दी। मीना कुमारी के सामने वो संवाद बोले, जो किसी दूसरी फिल्म में बीना रॉय को बोलने थे..........पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और आखिरकार एक सफल नायक बना ही दिया।...."

किशोर ने यहाँ कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। उनके अज़ीबोगरीब हरकतों के कुछ किस्से तो पहले भी यहाँ लिखे जा चुके हैं, अब कुछ की बानगी और लें...

भाई-भाई की शूट में निर्देशक रमन के द्वारा अपने ५००० रुपए देने के लिए अड़ गए। अशोक कुमार के समझाने पर अनिच्छा पूर्वक वो दृश्य करने को तैयार हुए। छोटे से शाँट में उन्हें सिर्फ बड़बड़ाना था और थोड़ी चहलकदमी करनी थी।

तो किशोर ने क्या किया, कुछ दूर चलते ..कलाबाजी खाते और जोर से कहते पाँच हजार रुपया। ऐसी कलाबाजियाँ खाते-खाते वो कमरे के दूसरी तरफ पहुँचे जहाँ एक पहिया गाड़ी खड़ी थी. किशोर उस पर होते हुए सीधे बाहर पहुँचे और एक छलाँग मार कर अपनी गाड़ी पर सवार होकर चलते बने । बाद में रमन ने स्वीकार किया कि वो किशोर को पैसा चुका पाने की हालत में नहीं थे।

एक निर्माता को तो उन्होंने इतना परेशान किया कि वो उनके खिलाफ़ कोर्ट से सम्मन ले आए कि किशोर उनके आदेशानुसार ही काम करेंगे।
नतीजा ये हुआ कि सेट पर अपनी कार से उतरने के पहले भी वो निर्माता का आदेश मिलने के बाद ही उतरते। एक बार वो शूटिंग के दौरान गाड़ी को लेते हुए खंडाला चले गए, तुर्रा ये कि डॉयरेक्टर ने शॉट के बाद 'कट' नहीं बोला तो मैं क्या करता...

पर ये सब उन्होंने सिर्फ फिल्मी दुनिया से निकलने के लिए किया ऐसा भी नहीं था। कुछ बचपना कह लें और कुछ उनके खुराफाती दिमाग का फ़ितूर, अपनी निजी जिंदगी में उन्होंने अपनी इमेज को ऍसा ही बनाए रखा।

उनसे जुड़ी कहानियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेतीं। शयनकक्ष में खोपड़ी की आँखों से निकलती लाल रोशनी, ड्राइंग रूम में उल्टी पड़ी कुर्सियाँ, मेहमानों पर उनके इशारों पर भौंकते कुत्ते, गौरीकुंज के अपने आवास के बाहर लगा बोर्ड,

Beware of Kishore Kumar !

उनके मिज़ाज की गवाही देता है।

पर इतना सब जानते हुए भी उनके करीबी उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। साथी कलाकार महमूद का कहना था


"....वो ना तो सनकी थे ना ही कंजूस, जैसा कि कई लोग सोचते हैं। वास्तव में वो एक जीनियस थे। वो राज कपूर के बड़बोले रुप थे, एक हरफनमौला जिसे सिनेमा के हर पहलू की जानकारी थी और जिसे हो हल्ला मचाकर लोगों की नज़रों में बने रहने का शौक था।....."




वहीं अभिनेत्री तनुजा का मानना था

"......मुझे समझ नहीं आता कि वो पागलपन का मुखौटा क्यूँ लगाए रहते थे?
शायद, एक आम इंसान की तरह वो दुनिया से अपने अक़्स का कुछ हिस्सा छुपाना चाहते थे। जब वो अच्छे मूड में रहते तो अपने चुटकुलों से हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देते थे। ...."



संगीत निर्देशक कल्याण का कहना था

"....किशोर मूडी इंसान थे, पर मैं समझता हूँ कि किसी कलाकार को ये छूट तो आपको देनी ही होगी। उनसे कुछ करवाने के लिए मुझे बच्चों जैसा व्यवहार करना पड़ता था। सो मैं जो उनसे चाहता ठीक उसका उलटा बोलता।...."

किशोर के जीवन वृत को पत्रकार कुलदीप धीमन ने एक अच्छा सार दिया है। कुलदीप कहते हैं...

".....शुरुआती दौर में अपनी बतौर गायक पहचान बनाने के क्रम में मिली दुत्कार ने उनके दिल में वो ज़ख्म किए जो वक़्त के साथ भर ना पाए और जिन्होंने उन्हें एकाकी बना डाला। पर उनके अंदर का खुराफ़ाती बच्चा कभी नहीं मरा। यही वज़ह रही कि प्रशंसक और दोस्तों को उनकी कोई स्पष्ट छवि बनाने में दुविधा हुई। सामान्यतः हम जीवन में श्वेत श्याम किरदार देखने के आदि हैं पर किशोर की जिंदगी में स्याह रंग की कई परते थीं जिन्होंने उनके चरित्र को जटिल बना दिया था.... "

१९८७ में हृदयगति रुक जाने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। आइए देखें इस दुर्लभ वीडियो में पत्नी लीना चंद्रावरकर उनकी यादों को किस तरह सँजो रही हैं....



इस श्रृंखला की समापन कड़ी में मेरी पहली पायदान के गीत के साथ होंगे वो दस गीत जिन्हें किशोर दा ने खुद अपना पसंदीदा माना था।

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त
Related Posts with Thumbnails

8 comments:

Sagar Chand Nahar on September 04, 2007 said...

पोस्ट दर पोस्ट कई नई बातें जाननें को मिली किशोरदा के जीवन और उनके व्यक्तित्व के बारे में। हमेशा की तरह लाजवाब रही यह पोस्ट।
साधूवाद।

Neeraj नीरज نیرج on September 04, 2007 said...

अथक परिश्रम से तैयार सामग्री चल रही है .. किशोर दा लाजवाब थे। हरफनमौला.. प्रकाशन पर बधाई स्वीकार करें.

Udan Tashtari on September 04, 2007 said...

वाकई, एक के बाद एक-नायाब प्रस्तुति. बधाई.

कंचन सिंह चौहान on September 05, 2007 said...

जैसा कि अक्सर ही हो जाता है आपकी पोस्ट पढ़ के बाद, लीना जी का इण्टर्व्यू देख कर आँखें भर आईं, कितना कटु अनुभव.... जिनके बिछड़ने की कल्पना हमें सोने नही देती उनसे बिछड़ कर पता नही कैसे हम जिंदगी जी लेते हैं....!

SHUAIB on September 05, 2007 said...

अच्छी जानकारी पोस्ट और लिंक्स दिए हैं।

Manish on September 11, 2007 said...

नाहर भाई, समीर जी, नीरज, कंचन और शोएब इस पोस्ट को सराहने के लिए आप सब का धन्यवाद !

Smita said...

manishji... "kissa kishore ka" pooorrraa padh liya.. behatarein...!!! especially the vidoe of leena chandavarkar was outstanding... She came out as a warm person!!

deo kumar singh on October 01, 2014 said...

kishor kumar ke baare me pad kar bahut achchha laga.manish ji bahut bahut dhanywaad.

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie