Saturday, April 28, 2007

तुम निकम्मों के लिये मै ही भला कब तक मरूँ?

घबराइए मत ये जीतू भाई हम सब से क्रुद्ध और हताश हो कर नहीं कह रहे :), ये तो बालकवि बैरागी की रचना है। बैरागी जी ने अपनी इस अनुपम कविता में बात की है चमकते हुए सूर्य और अपनी लौ से अँधेरे को दूर भगाते दीपक की ।

एक ओर सारे दिन अपनी रोशनी बिखेरता सूर्य है तो दूसरी ओर अंधकार से लड़ता दीपक । बैरागी जी ने बड़े ही भावनात्मक तरीके से रात भर जलते इस दीपक के चरित्र में झांकने की कोशिश की है । काली अँधियारी रात के राजदरबार में उसके सेनापति पवन से लड़ता ये दीपक उसकी मार से टिमटिमा जरूर उठता है पर युद्धक्षेत्र में डँटा रहता है....अविचलित ....निडर...

पर ये निडरता किस काम की? ये जानते हुए भी कि उसका संघर्ष सवेरे तक भुला दिया जाना है ....।उसकी इस मनोदशा को कितनी खूबसूरती से शब्दों में बाँधा है बैरागी जी ने

मैं जानता हूं तुम सवेरे मांग उषा की भरोगे
जान मेरी जायेगी पर ऋण अदा उसका करोगे!!


पर अँधेरे पर विजय पाने के लिए जो मूलमंत्र बैरागी जी देते हैं वो कितना सीधा और सहज है वो इन पंक्तियों से देखें

आकाश की आराधना के चक्करों मे मत पडो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मै लडूँ, कुछ तुम लडो!!


सच कौन कह सकता है कि अपने आस पास की ये वस्तुएँ निर्जीव हैं । एक छोटा सा दीपक कितनी मूर्त और अमूर्त भावनाओं को अपने दिल में छुपा कर बैठा है , पर हमने कब खबर ली उसकी। धन्य है ये कवि जो अपनी संवेदनशीलता से हमारे आस पास की इन निर्जीव वस्तुओं में उपमाओं के माध्यम से ऐसा प्राण फूंकते हैं कि लगता है उनके कृत्यों में भी कोई संदेश है, कोई गूढ़ बात है जो अब जाकर उद्घाटित हुई है ।

और इससे पहले मध्य प्रदेश के नीमच से ताल्लुक रखने वाले 'बालकवि बैरागी' जी की पूरी कविता आपके सामने पेश करूँ, मैं बेहद आभारी हूँ रचना जी का जिन्होंने इस कविता को मुझे पढ़ने के लिए भेजा ।

कविता का नाम है "दीवट(दीप पात्र) पर दीप"

हैं करोडों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के,
जो न दे हमको उजाला, वे भला किस काम के?
जो रात भर जलता रहे उस दीप को दीजै दु‍आ
सूर्य से वह श्रेष्ठ है, क्षुद्र है तो क्या हुआ!
वक्त आने पर मिला लें हाथ जो अँधियार से
संबंध कुछ उनका नही है सूर्य के परिवार से!

देखता हूँ दीप को और खुद मे झाँकता हूँ मैं
फूट पडता है पसीना और बेहद काँपता हूँ मैं
एक तो जलते रहो और फिर अविचल रहो
क्या विकट संग्राम है,युद्धरत प्रतिपल रहो
हाय! मैं भी दीप होता, जूझता अँधियार से
धन्य कर देता धरा को ज्योति के उपहार से!!

यह घडी बिल्कुल नही है शान्ति और संतोष की
सूर्यनिष्ठा संपदा होगी गगन के कोष की
यह धरा का मामला है, घोर काली रात है
कौन जिम्मेवार है यह सभी को ज्ञात है
रोशनी की खोज मे किस सूर्य के घर जाओगे
दीपनिष्ठा को जगाओ, अन्यथा मर जाओगे!!

आप मुझको स्नेह देकर चैन से सो जाइए
स्वप्न के संसार मे आराम से खो जाइए
रात भर लडता रहूंगा मै घने अँधियार से
रंच भर विचलित न हूंगा मौसमो की मार से
मैं जानता हूं तुम सवेरे मांग उषा की भरोगे
जान मेरी जायेगी पर ऋण अदा उसका करोगे!!

आज मैने सूर्य से बस जरा-सा यों कहा-
आपके साम्राज्य मे इतना अँधेरा क्यों रहा?
तमतमाकर वह दहाडा--मै अकेला क्या करूँ?
तुम निकम्मों के लिये मै ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों मे मत पडो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मै लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो !!


कितने सही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं बैरागी जी। जग के इस अंधकार को ना तो ये विशाल सूरज मिटा सकता है ना वो छोटा सा नन्हा सा दीपक। जरूरत मिल कर मुकाबला करने की है क्यूँकि अलग थलग होकर इस अँधेरे के साम्राज्य को भेद पाना अत्यंत कठिन है ।

भाषागत और चिट्ठाजगत के आजकल के विवादों के परिपेक्ष्य में देखें तो हम सब राष्टभाषा और अपनी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं की खोयी हुई अस्मिता जगाने के लिए प्रयासरत हैं । और इसके लिए असंख्य दीपकों की जरूरत है और साथ ही मार्गदर्शन देने वाले कुछ सूर्यों की...इसलिए छोटे छोटे लक्ष्यों को पूरा करने में अपनी शक्ति व्यर्थ गंवाने के को उस बड़े लक्ष्य के सामने कर के देखें । अपनी इच्छा को आप आकार में बिलकुल ही बौना पाएँगे।

Tuesday, April 24, 2007

हिन्दी चिट्ठाकारिता : कैसा है इसका वर्तमान ? और क्या होगा इसका भविष्य ?

मैंने आज तक हिंदी चिट्ठा जगत पर कभी कुछ नहीं लिखा। इससे जुड़े अनेक विवादों से मैंने अपने को दूर रखने की कोशिश की है ताकि अपनी उर्जा का सही उपयोग कर सकूँ। पिछले एक वर्ष में हिंदी चिट्ठा जगत के स्वरूप के बारे में जो मैं अब तक महसूस करता आया हूँ और इसके भविष्य के प्रति मेरी जो सोच है, मेरी ये १०० वीं पोस्ट उसी का निचोड़ है।

इससे पहले मुख्य विषय पर आऊँ कुछ पुरानी बातें बताता चलूँ। दो साल पहले जब चिट्ठाकारिता जगत में कदम रखा था तो देवनागरी में लिखने का ख्याल बिलकुल नहीं था। मैंने शुरुआत अपने रोमन और अंग्रेजी चिट्ठों से की थी। जल्द ही वहाँ अपनी छोटी-मोटी मित्र मंडली बन चुकी थी। चिट्ठाकारी में मजा आने लगा था । कुछ महिने तक लिखते रहने के बाद ये तो पता लगा कि हिन्दी में चिट्ठे भी हैं । हिंदी में लिखने की उत्सुकता जगी पर थोड़ी खोज बीन के बाद पता चला कि WIN 98 में यूनीकोड सहायता ना होने की वजह से ये कार्य दुष्कर है । फिर एक दिन तख्ती डाउनलोड की पर उससे बात नहीं बनी । एक दिन ब्लॉगर के कुछ फीचर इस्तेमाल ना कर पाने की वजह से इंटरनेट एक्सप्लोरर अपग्रेड किया और फिर कुछ जादू हुआ कि हिंदी WIN 98 पर भी दिखने लगी। उसके बाद तख्ती की सहायता से हिंदी में लिखना जो चालू हुआ वो आजतक जारी है।

विगत एक साल में हिंदी चिट्ठाजगत में काफी परिवर्तन आए हैं। हिंदी में लिखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है ।एक छोटे समूह से सबको एक साथ लेकर आगे तक चलने से ये परिवार बड़ा हुआ है। पर आगे साझेदारी के लिए वही प्रयास सफल हो पाएँगे जो सबके लिए समान रूप से उपयोगी हैं और जिसमें सब की भागीदारी हो । हिंदी चिट्ठा जगत के वर्तमान और भविष्य के बारे में जब सोचता हूँ तो ये ख्याल मन में उभरते हैं

ब्लॉग एग्रगेटर्स
आज की तारीख में नारद और हिंदी ब्लॉग्स डॉट काम के रूप में हमारे पास दो विकल्प हैं चिट्ठों की झलक देखने के लिए । जैसे जैसे चिट्ठों की संख्या बढ़ेगी एक दिन की तो बात ही छोड़िए एक घंटे में ही पहले पृष्ठ आपकी पोस्ट अदृश्य हो जाएगी । ऐसे में ये जरूरी हो जाएगा कि ये एग्रगेटर पोस्ट को उनकी श्रेणियों (कविता, लेख, व्यंग्य, पुस्तक,फिल्म, यात्रा,खेल आदि) के हिसाब से छांट सकें और उनको अलग अलग पृष्ठों पर ले जा सकें ।

अपनी उपयोगिता की वजह से जो प्रचार नारद जैसे एग्रगेटर को मिल रहा है उसे देखकर शायद ऐसे ही अन्य प्रयास भी सामने आएँ इसकी भी प्रबल संभावनाएँ है । चूंकि नारद से हम सब इतने दिनों से जुड़े हैं ये जरूर चाहेंगे कि वक्त के साथ इसमें सुधार आता रहे। कुछ तकनीकी समस्याओं मसलन ब्लॉगस्पाट वाले ब्लॉगों से फीड ना दिखा पाने की समस्या से नारद जूझता रहा है। आशा है जल्द ही इससे निजात पाने का कोई उपाय उसके पास होगा ।

हिंदी फोरम , बुलेटिन बोर्ड
फिलहाल हिंदी में परिचर्चा के आलावा कोई फोरम नहीं है । परिचर्चा हिंदी जगत में आने बाले नवआगुंतकों के लिए सशक्त माध्यम है । अक्सर हिंदी में रुचि रखने वाले लोग यहाँ पहुंचते हैं। दूसरों को हिंदी में लिखता देख चिट्ठा बनाने के लिए प्रेरित होते हैं ।हिंदी चिट्ठाजगत की दिशा और दशा से जुड़े सवालों को भी परिचर्चा जैसे मंचों पर उठाना चाहिए । पर अभी भी फोरम में शांतिपूर्ण और सुलझे हुए ढ़ंग से बात को अंजाम तक पहुँचा पाने में हम सभी वो परिपक्वता हासिल नहीं कर पाए हैं जो ऐसे फोरम के लिए जरूरी है ।
जिस तादाद में कविता लिखने या गजल कहने वाले चिट्ठाकारिता से जुड़ रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब सिर्फ काव्य और शायरी पर आधारित मंचों का निर्माण हो । युवा पीढ़ी को हिन्दी की ओर खींचने में ये एक अहम भूमिका निभा सकते हैं और इनके महत्व को नजरअंदाज करना नादानी होगी

हिन्दी के सर्च इंजन
अभी तक सर्च इंजन से हिंदी चिट्ठों को मिलने वाले पाठक ना के बराबर हैं और यही हिन्दी चिट्ठों के व्यवसायीकरण में सबसे बड़ा बाधक है। मेरे रोमन चिट्ठे पर पूरी हिट्स का ६०-७० प्रतिशत हिस्सा इन्हीं लोगों का रहा करता है और दो सालों में वहाँ की हिट्स ४२००० तक पहुँच गईं हैं, वो भी तब जब की इधर मैंने वहाँ पूरी पोस्ट लिखना छोड़ दिया है। वहीं एक साल में हिन्दी चिट्ठे पर ये आंकड़ा ९००० तक ही पहुँचा है । शायद जब हिंदी के सर्च इंजन लोकप्रिय हो जाएँगे तो ये स्थिति बदले ।

सामूहिक चिट्ठे
चिट्ठा चर्चा और हिंद-युग्म अभी सामूहिक चिट्ठों के दो सफल प्रयोग हैं। भविष्य में चिट्ठा चर्चा देशी पंडित जैसी शक्ल इख्तियार करेगा ऐसी उम्मीद है । हिन्द-युग्म के जरिए भी अच्छा लिखने वाले युवा कवि उभर रहे हैं ये हर्ष की बात है ।

ब्लॉगजीन
फिलहाल निरंतर और तरकश* इस भूमिका को निभा रहे हैं । ब्लॉगजीन कहलाने वाली ये पत्रिकाएँ मुझे वेबजीन ज्यादा और ब्लॉगजीन कम लगती हैं। वेबजीनों की तरह यहाँ भी संपादक मंडल एक्सक्लयूसिव रचनाओं की मांग करते हैं और फिर चिट्ठाकारों की लिखी इन रचनाओं को चिट्ठाकारों से पढ़ने की गुजारिश करते हैं ।
(* पुनःश्च भूल सुधार: तरकश के सामूहिक पोर्टल के स्वरूप के बारे में पंकज जी की टिप्पणी देखें। पर जैसा मैंने कहा ‍ exclusive रचनाओं की प्रतिबद्धता वहाँ भी है। )
मेरी समझ से एक अच्छी ब्लॉगजीन/ चिट्ठा जगत से जुड़ा सामूहिक पोर्टल वो है जो चिट्ठे में लिखी जाने वाली अच्छी रचनाओं को छांटे और उसे उस पाठक वर्ग तक पहुँचाए जो अच्छा हिंदी लेखन पढ़ने के लिए इच्छुक है पर जिसके पास रोज सारे चिट्ठों को पढ़ने का समय नहीं है। चिट्ठे में लिखे जाने वाली सामग्री और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं मे यही तो अंतर है कि ये अनगढ़ होती हैं, इसे लिखते वक्त लेखक के सामने संपादक की इच्छाओं की तलवार नहीं लटका करती । इसीलिए इनमें ताजगी का वो पुट होता है जो कई बार सावधानी से गढ़ी हुई रचनाओं में नदारद होता है
और यही तो एक चिट्ठे के स्वाभाविक रूप को उजागर करती हैं। आशा है इतनी मेहनत से पत्रिका चलाने वाले लोग इस बात पर ध्यान देंगे ।

चिट्ठाकार और मीडिया
पिछले महिनों में हिंदी चिट्ठाजगत में सबसे अच्छी बात हुई है कि इसमें अलग अलग विधा से जुड़े लोग जुड़ रहे हैं। इनमें पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग भी है। पत्रकारों के आने से एक बात अच्छी हुई है कि चिट्ठों में प्रोफेशनल लेखन से हम सब रूबरू हुए हैं । पर साथ में आरोप -प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरु हुआ है जो चिट्ठाजगत के लिए बहुत सुखदायक बात नहीं है। सृजनात्मक लेखन की बजाए इस ने ललकारवादी ( आवा हो मैदान में, देख लीं तोहरा के !)प्रवृति को जन्म दिया है । इसमें पोस्ट के साथ हिट्स दिखाने वाले नारद का भी परोक्ष रुप से योगदान है क्यूँकि ऐसी मसालेदार सवाल जवाबी को हिट्स भी खूब मिला करती हैं

मीडिया में हिन्दी चिट्ठाकारिता को जगह मिल रही है ये खुशी की बात है । इससे बाहर के लोगों में हिन्दी में लिखने की प्रेरणा मिलेगी । पर अगर प्रियंकर जी के शब्दों का सहारा लूँ तो प्रचारप्रियता की मानसिकता और इस मानवीय कमजोरी पर फलते-फूलते इस लघु एवम कुटीर उद्योग का चलन हिंदी चिट्ठाजगत में अंग्रेजी चिट्ठाजगत की अपेक्षा कहीं ज्यादा है । मीडिया का अभी की परिस्थितियों में महत्त्व है पर हमारी सारा ध्यान उसी पर केंद्रित हो जाए तो उसे सही नहीं ठहराया जा सकता ।उससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि हम किन विषयों पे लिख रहे हैं और वो हमारे पाठकों के लिए कितना सार्थक सिद्ध हो रहा है।

Saturday, April 21, 2007

रेत पे बिखरे हुए आँसू उठा सकते नहीं !

बशीर बद्र की शायरी का कमाल ही इस बात में है कि उनका हर एक शेर सादगी का लिबास पहन कर आता है ...जुमलों में कोई क्लिष्टता नहीं, भाषा में कोई अहंकार नहीं पर भावों की गहराई ऐसी कि बिना दिल को छू कर निकल जाए ये नामुमकिन है ।

ऍसी ही एक गजल से आज आपको रूबरू करा रहा हूँ जिसे वर्षों पहले कहीं से पढ़्कर अपनी डॉयरी में लिखा था। इसका हर एक शेर मन में इस तरह नक्श हो गया है कि जब भी बद्र साहब का जिक्र होता है ये गजल खुद-ब-खुद जेहन में आ जाती है।

साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं
इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं

देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं

इस की भी मजबूरियाँ हैं, मेरी भी मजबूरियाँ हैं
रोज मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं

आदमी क्या है गुजरते वक्त की तसवीर है
जाने वाले को सदा देकर बुला सकते नहीं

किस ने किस का नाम ईंट पे लिखा है खून से
इश्तिहारों से ये दीवारें छुपा सकते नहीं

उस की यादों से महकने लगता है सारा बदन
प्यार की खुशबू को सीने में छुपा सकते नहीं

राज जब सीने से बाहर हो गया अपना कहाँ
रेत पे बिखरे हुए आँसू उठा सकते नहीं

शहर में रहते हुए हमको जमाना हो गया
कौन रहता है कहाँ कुछ भी बता सकते नहीं

पत्थरों के बर्तनों में आँसू को क्या रखें
फूल को लफ्जों के गमलों में खिला सकते नहीं
सुनिए इस ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में

Wednesday, April 18, 2007

ये शाम आपके नाम : पहले साल में क्या रहा आपका कथन.. आपका सुखन !

पिछली शाम से आपके विचारों की इस यात्रा को और आगे बढ़ाते हैं । तो आज की शुरुआत अवधिया जी से
श्री जी.के.अवधिया ने बात चलाई कि क्या आज के इस युग में मेलोडी मर गई है । मैंने आज के संगीत के सशक्त पहलुऔं को रखा। जीतू भाई ने प्रतिध्वनि कि और....कहा
"मेलोडी नही मरती, कभी नही मरती। हाँ उपलब्धता कम ज्यादा हो सकती है। लगभग, कभी रोजे तो कभी ईद वाला हाल होता है। शोर मे से भी कभी ना कभी सुरीला संगीत निकल कर आ ही जाता है।"

अवधिया साहब का जवाब था..
"मैं मानता हूँ कि आज भी बहुत सारे प्रतिभावान संगीतकार और गीतकार हैं और मैं उनके साथ अन्याय भी नहीं करना चाहता पर उनसे केवल यह उम्मीद करना चाहता हूँ कि वे ऐसा संगीत दें कि उनकी विशिष्ट पहचान बन जाये यह तो आपको भी मानना पड़ेगा कि आज हजारों गीतों में केवल एक-दो रचनाएँ ही कर्णप्रिय बन पा रही हैं और फिर उनकी आयु भी बहुत ही कम होती है, कुछ ही दिनों बाद ही उन्हें हम भूल जाते हैं " खैर बहस जारी रही.......

हिन्दी चिट्ठाजगत में गुलजार प्रेमियों की कमी नहीं और मैं तो खुद ही उनसे कितना प्रभावित हूँ और जब-तब आप सब को उनके द्वारा लिखे हुए गीतों,गजलों और नज्मों से रूबरू कराता रहा हूँ । पर अब प्रतीक पांडे क्या कहते हैं गुलजार की लेखनी बारे में ये देखिए

"गुलज़ार साहब का काव्य ज़मीनी सुगन्ध से सुवासित और हृदय की गहराईयों से निकला होता है, इसलिए सीधे पढ़ने/सुनने वाले के दिल में उतर जाता है। वास्तव में यह गीत बहुत अच्छा बन पड़ा है और संगीत भी कर्णप्रिय है।"

"'कोई बात चले' के बारे में उनका कहना था वल्लाह... इन शेरों और त्रिवेणियों को पढ़ कर ही दिल के सारे तार झंकृत हो गए, सुनकर न जाने क्या होगा? लगता है यह एल्बम कोई बात चले ख़रीदनी ही पड़ेगी।"

फिर आया पचमढ़ी का यात्रा विवरण और इस यात्रा को सबसे उत्सुकता से पढ़ा हमारे मध्य प्रदेश के साथियों ने...आखिर उनके प्रदेश की बात थी । नागपुर से पंचमढ़ी में जो झटके हमने खाए वो दर्द बयां किया तो हमारे राकेश खंडेलवाल जी से रहा ना गया । कह उठे :)

राह खड्डदार हो
ठोकरों की मार हो
औ' किनारे हो रहा
चाय का व्यापार हो
टिको नहीं डिगो नहीं
बहादुरो! बढ़े चलो ...
जबलपुर के समीर जी का मन हरिया उठा -कहने लगे मन हरा कर दिये, इसे वाकई कहीं छपने भेजें.बधाई, पचमढ़ी घुमाने के लिये.

अब नीरज दीवान का पंचमढ़ी में ननिहाल है या नहीं हम भला पहले से थोड़ी ही जानते थे । सो तभी तो उन्हें वहाँ के अप्सरा विहार में अप्सराओं के मिलने का जिक्र किया और फिर आगे लिखा

"आपने जंगल का कुंवारा सौंदर्य देखा है. सतपुड़ा की इन पहाड़ियों में कई अनजानी जगहें हमें प्रकृति की गोद में ले जाती हैं. शहरो में कुदरत का ऐसा अनमोल और निर्मल वात्सल्य पाने से हम वंचित रहते हैं. खुशनसीब हैं आप जो पर्यटन करते रहते हैं."
भइया खुशनसीब आप भी कम नहीं आपका तो ननिहाल हैं वहाँ :)

खैर कविता करने वाले गर आपकी प्रविष्टि को पढ़ें और प्रतिक्रिया में चंद पंक्तियाँ लिख डालें तो प्रविष्टि की खूबसूरती और बढ़ जाती है । देखिए तो पंचमढ़ी पुराण पर रचना जी की प्रतिक्रिया
आपका यात्रा वर्णन अनोखा होता है.
"हों पहाडी वादियाँ,या फिर हो जंगलों मे विचरण,
दृष्टि देखे भिन्न सृष्टि, जब मुसाफिर हो कवि मन!"

और इस चित्र के बारे में उनका कहना था
'ढलती शाम के चित्र हैं सुन्दर,
शब्दों से वर्णन भी रूचिकर,
लेकिन ठहरी जहाँ नजर,
वो है झील किनारे का घर!'

कोई कविता से अपनी भावनाओं को जोड़ता है तो कोई पुरानी यादों को व्यक्त कर के। अब नेपच्यून को ही लें उन्होंने पंचमढ़ी की बात से अपने स्कूल के दिनों की यादें ताजा कीं.....
"काफी साल पहले की बात है । तब मै ८वीं कक्षा में थी। मजे कि बात है कि टीचर को बताया कि घर में शादी है और चल पड़ी पंचमढ़ी। पर वहाँ जाकर पाया कि १२वीं कक्षा के विद्यार्थियों के साथ वो टीचर भी आईं हैं जिनसे मैंने अनुमति ली थी ।:)".....

पूर्वी भारत के अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ की सुचि आर्या ने झारखंड के ब्लागर्स पर स्टोरी की । हम लोगों के हिंदी ब्लॉग का भी जिक्र हुआ । सवाल उठा हिंदी के समाचार पत्र इनमें पीछे क्यूँ हैं? संजय बेंगाणी का जवाब था....
." अधिकतर हिन्दी अखबारो में जागरूगता की कमी है, तथा उनका (अधिकतर) पाठकवर्ग भी इन सब मामलो में रूचि नहीं रखता"...

खैर अब तो स्थिति बदल रही है ना संजय भाई, तब आपने कहाँ सोचा होगा कि कल को हिन्दी पत्रकार भी ब्लागिंग में आने लगेंगे और यहाँ की बात अखबार में पहुँचाएगे।
मजाज लखनवी की गजल ऐ गमे दिल क्या करूँ... पर उनकी जिंदगी की रुप रेखा खींची तो प्रियंकर जी ने कहा ....
"मजाज़ पर बेहतरीन प्रस्तुति के लिए साधुवाद स्वीकारें . 'अब तो गम,वहशत और तंगदश्ती बढती ही जाती है आज अगर मजाज़ होते कितने बेचैन रहते और क्या लिखते ? "
आशापूर्णा जी की बँगला किताब लीला चिरंतन के बारे में सुपर्णा ने अनुवादक की भूमिका पर कुछ अच्छे प्रश्न सामने रखे
अनुवाद की प्रक्रिया में विशेष रुचि है, इसलिए आपका मत जानना चाहूँगी। आपने सीधे सहज भाष्य के बारे में टिप्पणी की है पर इसमें लेखक के आलावा अनुवादक की भूमिका भी जरूर होगी । क्या मूल लेखनी की सहजता और अनुवादित लेख की भाषा में कोई खास नाता है? क्या जटिल भाषा सहज रूप से अनुवादित हो पाती है ? मैंने खुद एक मराठी आत्मचरित्र को अनुवादित करने का प्रयास किया है। किस हद तक सफलता पाई है उसका मूल्यांकन नहीं कर पाई हूँ ।
अमृता प्रीतम की दो खिड़कियों के बारे में मान्या ने कहा सचमुच उनके लेखन में कुछ अलग है, गूढ़ भाव लयबद्धता, ज्यादा क्या कहूँ ऐसे दिग्गजों के बारे में।
बात चली चाँद और उसकी चाँदनी की ! चाँद के बारे में आपकी अलग अलग भावनाएँ सामने आईं ।और देखिए रचना बजाज जी ने उसमें क्या पाया

"हुई रात, अब चाँद फिर से है आया,
तभी मैने अपने मे, अपने को पाया!
उसी ने नये कल का सपना दिखाया,
उसी ने मुझे घट के बढना सिखाया!"

और पूनम मिश्रा जी की ख्वाहिश पे गौर करें

"जी नहीं चाह्ता कि यह रात गुज़र जाए
चाँद छिप जाए और चाँदनी सिमट जाए
पर आपका वादा है फिर से आने का
उसी सहारे ,शायद ,यह दिन निकल जाए".

जीतू भाई ने भी डा० शैल रस्तोगी की एक उम्दा हाइकू परोसी
उगा जो चाँद
चुपके चुरा लाई
युवती झील।

फिर आया वार्षिक संगीतमाका का दौर और मेरी अमीन सयानी वाली स्टाइल पर अनुराग श्रीवास्तव जी ने चुटकी ली......."ऐसा लगता है जैसे रेडियो से चिपक कर 'बिनाका गीत माला' सुन रहे हैं. हुम्म भाइयों बहनों अगली पायदान पर है सरताज गीत . . . .लेकिन उसके पहले यह सरताज बिगुल ह्म्म . . .भई ये तो बहुउत हीई अच्छी बाआत हुईई है...हुम्म्म्म भाइयों आओर बहनोंओं कि अब पढ़ने के साआथ साआथ सुनने को भीई मिल रहा है...हुम्म्म्म. :)

मेरी गीतमाला के पहले नंबर के गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो के बारे में उनका कहना था

पुरानी वाली 'उमराव जान अदा' में भी ऐसा ही एक गीत था "भैया को दियो बाबुल महल-दुमहला, हमको दियो परदेस". दोनों ही गीतों में पीड़ा वही है.कुछ लोग जागरूक हो रहे हैं - कुरीतियों को हटाने का प्रयास भी कर रहे हैं. कुछ ने पाखण्ड की दीवार को ही परंपरा का नाम दे दिया है, दीवार के भीतर सति के मंदिर बन रहे हैं - कन्या भ्रूण दफ्न हो रहे हैं. जब कि असली परंपरा दीवार के दूसरी तरफ है. तुम्हारे लिखे हुये से तुम्हारी पीड़ा और बेबसी को मैं महसूस कर सकता हूं.


गीतमाला आगे बढ़ी और पुराने संगीत के शौकीन सागर भाई ने कहा...."सही कहा मनीष जी आपने कैसे ना हो कोई कैलाश का दीवाना। किसी और गायक की नकल करने के बजाय कैलाश ने अपनी अलग शैली बनाई और कामयाब रहे बाकी आजकल के लगभग सारे गायकों पर रफ़ी साहब और किशोर दा का प्रभाव स्पष्ट महसूस होता है। "

अनूप शुक्ला जी कानपुर शब्द सुनते ही हरकत में आ जाते हैं अभिजीत का जिक्र आते ही कह बैठे "ये कनपुरिया है। तभी कहें कि ये कैसे इतना अच्छा गाता है और बात-बात पर लिटिल चैम्पस में काहे बमक जाता था! "

पर गुलजार प्रेमी जगदीश भाटिया जी की ओंकारा के बारे में इस टिप्पणी की तो बात ही क्या !
गीत का फिल्मांकन भी बहुत अच्छा हुआ है, एक ही शॉट में करीना और अजय आहाते से छत पर जाते हैं,छत का चक्कर काटते हैं और फिर सीढ़ियों से नीचे उतर आहाते से होते बाहर चले जाते हैं, कैमरा संगीत के साथ साथ घूमता है, मगर शॉट नहीं कटता। खूबसूरत और काव्यातम्क फिल्मांकन है गीत का। गायकों की आवाज से आमतौर पर उनकी सांसों की आवाज गीत में से मिटा दी जाती है, मगर एक खास इफैक्ट देने के लिये गायकों की सांसों की आवाज को उभारा गया है, जो कि गीत में एक अलग ही असर छोड़ता है। मैं तो यही कहूंगा फिल्म संगीत इतिहास की एक अमर कृति। माचिस के संगीत में गुलजार और विशाल ने एक नयी छाप छोड़ी थी, ओंकारा में नयी बुलंदियों को छुआ है।

पोस्ट कुछ ज्यादा लंबी हो गई , पर ये संतोष है कि आप सब की जो बातें मन को खुशी दे गई वो आप तक पहुँची । आशा है आपका ये साथ बरकरार रहेगा आने वाले कल में भी ।:)

Monday, April 16, 2007

ये शाम आपके नाम : चिट्ठे की पहली सालगिरह आपकी टिप्पणियों के आईने में !

यूँ तो मेरे इस चिट्ठे का पहला साल मार्च के अंतिम सप्ताह में ही पूरा हो गया, पर अपना चिट्ठा किसी छोटे बच्चे की तरह तो है नहीं कि मुँह खोल कर शिकायत कर सके कि मेरा जन्मदिन २६ मार्च को ही क्यूँ नहीं मनाया । सो देर आए दुरुस्त आए की शैली में इस चिट्ठे की ये और अगली कुछ प्रविष्टियाँ समर्पित रहेंगी हिन्दी चिट्ठाकारिता के अपने पहले साल पर ।

साल भर से तो मैं लिखता आ ही रहा हूँ, सो मैंने सोचा कि पहली वर्षगाँठ पर गुजरे साल के सफर पर आपकी क्या राय रही मेरे प्रविष्टियों के बारे में उसकी एक झलक पेश करूँ । ये टिप्पणियाँ कुछ ऐसी हैं जिनसे मुझे लगा कि मैंने जो कहना चाहा है उसे आप तक पहुँचाने में सफल रहा हूँ और ऐसा तब ही होता है जब अपने मन की भावनाएँ को आपके शब्दों में लिखा पाता हूँ । कई बार आपकी राय उस विषय के प्रति एक नई सोच को दर्शाती है तो कई बार आपके सराहने का अंदाज इतना प्यारा होता है कि मन में अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है । ऐसी ही कुछ टिप्पणियों से शुरु करते हैं इस पहली सालगिरह का सफर जिसकी अगली कुछ शामें आप सब पाठकों के नाम हैं ।

तो सबसे पहले बात विनोद राहुल जी की जिन्होंने नरेंद्र कोहली के उपन्यास क्षमा करना जीजी पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कुछ प्रश्न हमारे समाज के सामने रखे..



क्या वास्तव में आज के समाज का व्यक्ति अपने रिश्तों को निभा पाता है ? ये अजीब विडंबना है...क्यूँ व्यक्ति नई वधू आने के बाद पुराने रिश्तों को भूलने लगता है ? लोगों को इस बारे में स्वयम् में झांक कर देखने की जरूरत है। ऐसे समय में इस प्रकार की रचनाएँ भाव विभोर करके कर्तव्य बोध कराती हैं। मैं लेखक को अपनी तरफ से कोटिशः धन्यवाद देता हूँ ।




यात्रा वृतांत मेरे इस चिट्ठे का अभिन्न अंग रहा है । पिछले साल अप्रैल में जब मैं सिक्किम गया तो वहाँ की अपनी आपबीती आपके साथ बाँटी । और जिस तरह आपने उसे सराहा उसका मैं आभारी हूँ ।

रत्ना शुक्ला जी का कहना था..आपके साथ बिताई शामें य़ादगार बन जाती है, एक दम रोचक यात्रा की तरह।
और जीतू भाई अपने उसी चिरपरिचित मजाहिया लहजे में कह उठे....बहुत भाग्यशाली हो यार! जो वहाँ सिक्किम पर मौज ले रहे हो, अपन तो यार कुवैत की रेत मे ही चहल कदमी कर रहे है। सिक्किम घूमने की इच्छा जगा दी है आपने, आएंगे एक दिन वहाँ भी।
पंकज बेंगाणी ने १७००० फीट की ऊँचाई पर पहुँचने के लिए कहा ...मुझे नही लगता इस जिन्दगी में मै कभी इतनी उँचाई तक जा पाउंगा. आपको साधुवाद. तस्वीरें तो लाजवाब है ही.
और ई छाया ने तो उस याक पर ही टिप्पणी कर डाली ..अच्छा है, वह याक तो धन्य हो गया, उसने कितने देश विदेश और समय की सीमायें लांघ लीं, हम तक पँहुचा और न जाने कितनों तक जायेगा।
प्रेमलता पांडे जी (मन की बात) ने तो इतनी तारीफ कर दी जिसके मैं लायक भी नहीं हूँ । यात्रा की समापन किश्त पर उन्होंने लिखा "आप जैसे लिखने वालों ने ही यात्रा-वृतांत जैसी विधाओं को जन्म दिया। बहुत ही सुंदर, सिलसिलेवार चित्रात्मक वर्णन किया है। पूरा वृतांत एक बार पुनः पढ़ लिया। शुरु से अंत तक पाठक बँधा रहता है। बहुत आनंददायी है।"

मुंबई बम कांड ने पूरे भारत को हिला कर रख दिया था।जावेद अख्तर के सवाल ईश्वर अल्लाह तेरे जहाँ में नफरत क्यूँ है जंग है क्यूँ पर प्रतिक्रिया मेंसिंधु श्रीधरन का कहना था



हाँ, ईश्वर अल्लाह! वहीं ईश्वर अल्लाह जिसे दुनिया शुरु से इतनी भक्ति से पूजती आयी हैं। वहीं ईश्वर अल्लाह, जो जो आतंकवादियों को भाग जाने दे देता हैं, मासूम लोगों ही जान ले लेकर तमाशा देखने।
इस हादसे के बाद भगवान पर विश्वास हट गया, मनीष जी। कोई भगवान नहीं हैं। हैं इंसान और इंसान का नफ़रत भरा दिल।




जुलाई में आया फुटबाल का महापर्व विश्व कप। तो मेरा प्रश्न था कि कितने लोगों ने वास्तव में फुटबाल खेला है?



ई छाया का जवाब था "खुदा झूठ न बुलवाये, मैने भी कुछ गिने चुने अवसरों पर ही फुटबाल खेला होगा। वर्ल्ड कप देख देख कर फिर जोश चढा और पिछली ही चार जुलाई को (अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर) दस दस मिनट के दो अंतराल खेले, सच में आज तक लंगडा कर चल रहा हूँ यार।




पर अगर सबसे रोचक बहस हुई धर्मवीर भारती की किताब गुनाहों का देवता पर ।

दिल्ली ब्लॉग की सुर ने कहा...करीब दो साल पहले पढ़ी थी. काफी सुना था पुस्तक के बारे में. गुनाहों का देवता शीर्षक काफी सार्थक लगा था. जिस सच्चे प्यार का त्याग करके इंसान महानता की मिसाल कायम करता है, देवता बनता है, उसे महानता को बनाए रखना आसान नहीं. असली परीक्षा बाद में ही होती है. एक बार कठोर होकर फैसला लेना आसान है. यही चंदर के साथ भी हुआ.

प्रियंकर जी का कहना था .....



" गुनाहों का देवता' पढ़ना युवावस्था की ओर बढ़ते सभी किशोरों के लिये अभूतपूर्व अनुभव है . हम सब, जिन्होंने इसे पढ़ा है एक खास काल-खंड में और एक खास उम्र में वे इसके इंद्रजाल के असर में रहे हैं .और इस उपन्यास के माध्यम से अपने भीतर की कुछ जानी और कुछ अनजानी भावनाओं को समझने का भी प्रयास किया है .पर अन्ततः 'गुनाहों का देवता'
के चन्दर और सुधा की त्रासदी प्यार की नहीं बल्कि सच्चे प्यार के नकार की त्रासदी है .शायद इसीलिए एक खास उम्र के बाद -- ज्ञान और तर्क का 'वर्जित सेब' खा लेने के बाद यह उपन्यास वैसा प्रभाव नहीं छोड़ता . पर एक खास उम्र वालों के लिए तो यह उपन्यास हमेशा ऐसा ही जादू बिखेरता रहेगा और उनको भी अपने 'मैजिकल स्पैल' में बांधे रखेगा जिनमें किशोरावस्था लंबे समय के लिए ठहर गई है




अनूप भार्गव जी ने कहा..." अपने कॉलेज के दिनों में पढी थी यह किताब और सचमुच दीवाना सा बना दिया था । कई बार पढी और हर बार आंखों को नम होनें से बचानें के लिये अपनें आप से लड़ना पड़ा ।
कई बार सवाल उठता है कि ऐसी महानता और आदर्श भी क्या जिस से किसी को भी लाभ न हुआ हो (और सब को दुख ही मिला हो) ?"

पर नंदिनी को ये किताब कितनी बुरी लगी ये आप उनकी प्रतिक्रिया से अंदाजा लगा सकते हैं
" Sorry i disagree,I HATED the book....maybe hate is a strong word to use for it but then again so is 'love'.I have no respect for any of the characters and i feel blessed to have 'escaped' the era where such spineless, masochistic idea of romance was in fashion.
Give me the honest Rajendra Yadav and Manohar Shyam Joshi, hard hitting Krishan Chander or Krishan Baldev Vaid anyday, keep me away from Dharmveer Bharti..."

आँखों की कहानी जब मैंने शायरों की जुबानी सुनाई तो प्रेमलता जी ने ऐसा प्रश्न दागा कि मैं क्लीन बोल्ड हो गया:)।
'और यह-
"नैनों की कर कोठरी,पुतली पलंग बिछाय।
पलकों की चिक डार के, पिय को लियो रिझाय॥"
(बताएँ किसने लिखा है?)

राँची की दुर्गापूजा की बात राँची वालों राजीव और प्रत्यक्षा में नोस्टाल्जिया जगा गई ।
राजीव ने कहा..मैं स्वयं भी राँची का हूँ, पर दशकों से राँची की दुर्गा पूजा नहीं देखा। मेन रोड, अपर बजार आदि के भव्य आयोजन काफी मिस करता हूँ।कचहरी रोड पर गोलगप्पे के ठेले अभी भी याद है। आपका बहुत धन्यवाद, आपके वर्णन से मेरी यादें ताजा हो गई।
प्रत्यक्षा का कहना था कि यहाँ गुडगाँव में तो सब फीका ही रहता है । पटना और राँची के खासकर दशहरा से लेकर छठ तक जो रौनक रहती है उसका जवाब नहीं ।

कविता के नाम पर हमसे इस साल में एक ही कविता लिखी गई तो हौसला बढ़ाने वाले पीछे कैसे रहते रत्ना जी ने हमें पेड़ पर चढ़ाना चाहा ...."भाषा सराहें या भाव, दोनों ही अनुपम है।लगता है हमें अब थ से खत्म होने वाली कविता लिखनी पड़ेगी ताकि आपकी एक सुन्दर कृति देखने को मिले। पर हमारी कविता झेलने से अच्छा है आप स्वयं ही कविता की सरिता बहाते रहें।"

हमने ठीक इसका उलट किया क्योंकि रत्ना जी का असली मतलब वही था :) :p

शादी के लिए होने वाले इंटरव्यू की बात चली तो रवि रतलामी जी से ना रहा गया कह उठे
मेरी बात मानें तो ये इंटरव्यू का चक्कर छोड़ें. वैसे भी 40 मिनट में कुछ नहीं होता. उत्तम विचार होगा कि जाति-पांति के बंधन से उठकर अपने विचारों से मिलते जुलते विचारों वाली लड़की जिसे आप जानते हों उससे रिश्ता बनाएं, या फिर तलाशें, जान पहचान बनाएँ, फिर शादी करें. अब, ये मैं अपने अनुभव बता रहा हूँ. :)

और हमारे परिचर्चा वाले अमित गुप्ता ने अपने बेबाक अंदाज में कहा बहुत सही बात सामने रखी है मनीष भाई. आजकल वर पक्ष के लोगों की मण्डी में आलू चुनने और अपने बेटे के लिये वधू चुनने की मानसिकताओं में कोई विशेष अन्तर नहीं रह गया है. इस प्रक्रिया में सहजता लाने में भावी वर ही कुछ कर सकता है, अन्यथा मैं तो वर को घोड़ी पर बैठे हुए गधे से कम नहीं समझता!

आपकी चुनिंदा टिप्पणियों का सिलसिला अगले भाग में जारी रहेगा......

Wednesday, April 04, 2007

लाफ्टर चैलेंज, पैरोडी.... हँसी की फुलझड़ी या हास्य का अवमूल्यन ?

हास्य कवियों की आजकल बड़ी शामत है । जबसे सिद्धू और शेखर सुमन के लाफ्टर चैलेंज ने बाजार पकड़ा है लोग अब मनोरंजन के नाम पर हास्य कवियों की जगह राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल ,नवीन प्रभाकर, अहसान कुरैशी या लाफ्टर चैलेंज के अन्य महारथियों को ही बुलाने लगे हैं। स्टार वन का ये मशहूर शो जब शुरु हुआ था तो लगा था कि ये स्वस्थ मनोरंजन की तरफ एक सार्थक पहल है । और अपने पहले साल में इसने के सीरीज के सीरियलों और अझेल न्यूज चैनलों से उकताई जनता को हँसी के कुछ मीठे पल भी दिए थे ।

पर जैसे जैसे इनकी लोकप्रियता बढ़ी, लगभग सारे न्यूज चैनल उसे भुनाने में पीछे नहीं रहे । अब इतने कम समय में इतनी जल्दी -जल्दी स्क्रिप्ट बदल कर भला ये हँसी के सौदागर नया क्या पेश करते? लिहाजा एक ओर तो व्यापक पैमानों पर चुटकुलों की चोरी शुरु हो गई तो दूसरी ओर चुटकुलों में भोंडापन बढ़ता गया । आजकल सिद्धू वैसे चुटकुलों पर भी भयंकर ठहाका लगाते हुए दिखते हैं जिसमें अश्लीलता का पुट शामिल हो । हास्य के इन नए दिग्गजों का कहना है कि श्रोता ऐसा मसाला ही सुनना पसंद करते हैं ।

चुटकुलों की बात छोड़ भी दें तो लोग बाग पुराने कवियों की मौलिक रचना को तोड़ मरोड़ कर पेश करने को
काव्य की एक विधा (पैरोडी) का नाम फक्र से देने लगे हैं ।

क्या आम जनमानस में हास्य का इस कदर अवमूल्यन हुआ है ? शायद हुआ है , और ये देख कर मन ही मन कष्ट जरूर होता है ।

मुझे याद है कि हम जब स्कूल में थे तो सारे भाई बहन धर्मयुग के होली विशेषांक की बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे क्योंकि उसमें एक से बढ़ कर एक हास्य कविताएँ होती थीं । विविध भारती से आने वाले प्रायोजित कार्यक्रम में हमारा सारा परिवार सुरेन्द शर्मा की मै बोल्यो..... पत्नी जी की कड़ियाँ हफ्ते दर हफ्ते सुनने के लिए रेडियो से कान सटा कर बैठा रहता था ।

काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, गोपालप्रसाद व्यास, शैल चतुर्वेदी, ओमप्रकाश आदित्य, अशोक चक्रधर ने हमारे जीवन में जिस स्वस्थ हास्य का पुट भरा था वो आज इतने निम्न स्तर तक पहुँचने लगेगा किसने सोचा था। हमारे जीवन में हास्य का कितना महत्त्व है ये तो सर्वविदित है । ऐसे में ये विधा इन महान रचनाकारों से छिटक कर हँसी पैदा करने के लिए किसी हद तक जाने वालों के जिम्मे चली जाए उसके लिए हमारी पीढ़ी ही दोषी कहलाएगी ।

गोपाल प्रसाद व्यास की ये कविता काफी दिनों पहले मैंने परिचर्चा में पोस्ट की थी । ये कविता उन लोगों को खास तौर पर समर्पित है जो स्वस्थ हास्य और फूहड़ता के अंतर को समझ पाने में असमर्थ रहे हैं ।

आराम करो !

एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ -- है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ -- सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास

Monday, April 02, 2007

कौन सा मौसम लगा है ? दर्द भी लगता सगा है ।

वर्षों पहले की बात है । ओशो यानि रजनीश की किताब पढ़ते वक्त ये कविता पढ़ने को मिली थी । कविता पढ़ते-पढ़ते मन उद्विग्न हो गया था ....शायद भावनाओं के अतिरेक से ..
.
मुझे तो यही प्रतीत होता है कि गर शब्दों को सही ताने बाने में बुना जाए तो उनकी शक्ति की सीमा को कभी कभी हम खुद भी आंक नहीं पाते ! इस कविता के शब्दों ने जिंदगी के कई मोड़ों पर मुझे एक संबल प्रदान किया है । एक नई उर्जा दी है...

क्या आप इस उर्जा के प्रवाह में नहीं बहना चाहेंगे ?

गंध से बोझल पवन है
और फिर चंचल चरण हैं
कौन सा मौसम लगा है ?
दर्द भी लगता सगा है ।

अनमिली स्वर लहरियों के गीत जादू डालते हैं
शारदी मेघों तले मैदान फूल उछालते हैं


आज तो वश में ना मन है
गीत से भीगा गगन है
प्राण को किसने ठगा है ?
दर्द भी लगता सगा है


ओ उदासी की किरण भटकी हुई क्या कह रही तू
धुंधलके के पार यूँ, निस्सार सी क्यूँ बह रही तू ?


प्रीत का कोई वचन है
नित निभाना प्रणय प्रण है
नयन में सपना जगा है
दर्द भी लगता सगा है


पूर्ण यौवन भार खेतों में लचकती सांध्य वेला
बांसुरी के स्वर सरीखा एक मेरा स्वर अकेला


टेरता मानो विजन है
और तन मन में चुभन है
कौन सा मौसम लगा है ?
दर्द भी लगता सगा है।

पुनःश्च - अगर इस कविता के रचनाकार का नाम आपको पता हो तो मुझे अवश्य बताएँ ।
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie