Sunday, November 18, 2007

बहुत दिन हो, गए सच्ची, तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं :अनुपम खेर की आवाज में गुलज़ार की नज़्म

क्या आपकी जिंदगी में ऐसा नहीं हुआ ? कुछ अजीज शक्लें गुजरते लमहों की परतों पर क्या स्याह होती नहीं चली गईं? कुछ तो है ये वक़्त भी अजीब चीज, खुद तो कभी बूढ़ा नहीं होता पर अपने साथ रिश्तों की मुलायमियत में सिलवटें खड़ी कर देता है। पुराने चेहरे या रिश्ते वैसे ही हो जाते हैं जैसे कच्ची सड़क पर चलते वाहनों की वज़ह से धूल धूसरित शुष्क और निस्तेज पत्ते ।

पर इन धुँधले चेहरों रूपी पत्तों पर वर्षों से ना सुनी आवाज़ की बौछारें जब पड़ती हैं तो फिर हरियाली लौट आती है और सब खुशनुमा सा हो जाता है.....गुलज़ार साहब ऐसी ही आवाज़ों की प्रतीक्षा में हैं अपनी इस नज़्म में..

वैसे गुलज़ार का लिखा वो गीत तो याद है ना आपको

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे...


इस नज़्म में गुलजार साहब के कुछ जुमलों पर गौर करें

तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके, मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ
कि जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एलबम में


उफ्फ कोई क्या कहे उनके इस वाक्य विन्यास पर !
और फिर यहाँ देखें किस बारीकी से चेहरों पर बनते हाव भावों को नज़्म में उतारा है उन्होंने..

तेरा बे को दबा कर बात करना
Wow ! पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था


मामूली बातों को अद्भुत बनाना कोई गुलज़ार से सीखे।
तो सुनिए अनुपम खेर की शानदार आवाज़ में गुलजार की ये नज़्म....





मैं कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको

मैं कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको
तेरा चेहरा भी धुँधलाने लगा है अब तख़य्युल* में
बदलने लग गया है अब वह सुबह शाम का मामूल
जिसमें तुझसे मिलने का भी एक मामूल** शामिल था


तेरे खत आते रहते थे
तो मुझको याद रहते थे
तेरी आवाज़ के सुर भी
तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके
मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ
कि जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एलबम में


तेरा बे को दबा कर बात करना
वॉव पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था
बहुत दिन हो गए देखा नहीं ना खत मिला कोई
बहुत दिन हो, गए सच्ची
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं
* कल्पना, ** रीति

दस कहानियों फिल्म से संकलित गुलजार की चुनिंदा नज्मों की इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ


  1. बस एक लमहे का झगड़ा था.... दिया मिर्जा की आवाज में

  2. पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाजी देखी मैंने... नसीरुद्दीन शाह की आवाज में.

Friday, November 16, 2007

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय : सुनिए मेरा सबसे पसंदीदा छठ गीत

आज छठ पर्व है। आज श्रृद्धालु डूबते सूरज को अर्घ्य देंगे और  कल भोर में दूसरा अर्घ्य उगते सूरज को दिया जाएगा। छठ का नाम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन पर्वों में शुमार होता है। विश्व में जहाँ कहीं भी इन प्रदेशों के लोग गए हैं वो अपने साथ इसकी परंपराओं को ले कर गए हैं। छठ जिस धार्मिक उत्साह और श्रृद्धा से मनाया जाता है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब तीन चौथाई पुलिसवालों के छुट्टी पर रहते हुए भी बिहार जैसे राज्य में इस दौरान आपराधिक गतिविधियाँ सबसे कम हो जाती हैं।

अब छठ की बात हो और छठ के गीतों का जिक्र ना आए ये कैसे हो सकता है। बचपन से मुझे इन गीतों की लय ने खासा प्रभावित किया था। इन गीतों से जुड़ी एक रोचक बात ये है कि ये एक ही लए में गाए जाते हैं और सालों साल जब भी ये दिन आता है मुझे इस लय में छठ के गीतों को गुनगुनाने में बेहद आनंद आता है। यूँ तो शारदा सिन्हा ने छठ के तमाम गीत गा कर काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है पर आज जिस छठ गीत की मैं चर्चा कर रहा हूँ उसे मैंने टीवी पर भोजपुरी लोक गीतों की गायिका देवी की आवाज में सुना था और इतने भावनात्मक अंदाज में उन्होंने इस गीत को गाया था कि मेरी आँखें भर आईं थीं।

इससे पहले कि ये गीत मैं आपको सुनाऊँ, इसकी पृष्ठभूमि से अवगत कराना आपको जरूरी होगा। छठ में सूर्य की अराधना के लिए जिन फलों का प्रयोग होता है उनमें केला और नारियल का प्रमुख स्थान है। नारियल और केले की पूरी घौद गुच्छा इस पर्व में प्रयुक्त होते हैं।

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे। पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।
ये गीत थोड़ी बहुत फेर बदल के बाद सभी प्रमुख भोजपुरी गायकों द्वारा गाया गया है। तो पहले सुनें मेरी इसे गुनगुनाने की कोशिश

केरवा जे फरेला घवद से
ओह पर सुगा मेड़राय

उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से
सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से
सुगा गिरे मुरझाय

उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से
आदित होइ ना सहाय
देव होइ ना सहाय

अब देवी का गाया हुआ ये गीत तो मुझे नहीं मिल सका पर आप सब के लिए अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये गीत प्रस्तुत है



Thursday, November 15, 2007

सुनिए गुलज़ार की दो बेहतरीन नज़्में: 'बस एक लमहे का झगड़ा था' और 'पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाजी देखी मैंने'

कुछ आवाज़ें मन में गूँज रही हैं। कुछ अहसास पीछा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। दिल है कि डूबता जा रहा है। बार-बार रीप्ले का बटन दब रहा है। क्यों हो रहा है ऐसा? जब शब्दों के जादूगर गुलज़ार कि एक से बढ़कर एक खूबसूरत नज़्में सुनने को मिलें तो ऐसा ही होता है। फिल्म दस कहानियाँ में हर कहानी को ध्यान में रखकर लिखी ये नज़्में रूपहले पर्दे के कलाकारों की आवाज़ में और निखर गई हैं। आज ले के आया हूँ इस गुलदस्ते की चंद पसंदीदा नज़्मों की ये पहली कड़ी...

कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर गुलज़ार ने कई मर्तबा लिखा है। और हर बार उन्हीं भावनाओं को अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से बड़ी सहजता से अपनी बातों को वो हमारे दिल तक पहुँचाते रहे हैं। ऍसा ही उनका एक प्रिय विषय है 'रिश्तों की तल्खियाँ'' जिस पर जब भी उन्होंने लिखा है, मन को अपनी भावनाओं के सा् बहाने में वो सफल रहे हैँ। याद है ना आपको इनकी नज्म


कोई मौसम का झोंका था, जो इस दीवार पर लटकी हुई तसवीर तिरछी कर गया है...
गए सावन में ये दीवारें सीमी नहीं थीं
ना जाने क्यूँ इस दफ़ा इन में सीलन आ गई है
दरारें पड़ गई हैं
और सीलन इस तरह बहती हे जैसे
खुश्क़ रुखसारों पर आँसू चलते हैं....


अगर ये पढ़कर आपका मन ना भीगा हो तो दिया मिर्जा की मखमली आवाज़ में इसे सुनकर जरूर भींग जाएगा


बस एक लमहे का झगड़ा था....
दर-ओ-दीवार पर ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है
हर एक शय में गई, उड़ती हुई, जलती हुई किरचियाँ
नज़र में, बात में, लहज़े में
सोच और साँस के अंदर
लहू होना था एक रिश्ते का, सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा कर फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्ज़ें
न की आवाज़ तक कुछ भी
कि कोई जाग ना जाए
बस एक लमहे का झगड़ा था........
*****************************************************************


आपने कभी सोचा है कि दूर आकाशगंगा के किसी छोर पर सृष्टिकर्ता और एक कवि आपने सामने बैठे हों और जीवन रूपी शतरंज की बिसात बिछी हो। याद कीजिए प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' के नायकों को। कैसे दिमाग के पुर्जे भिड़ाते भिड़ाते, म्यान से तलवारें निकल आईं थीं और शाम के ढलते सूरज की लालिमा रक्त की बूदों से और गहरी हो गईं थीं। पर वे तो दोनों मानव थे, इसलिए उन्होंने एक दूसरे पर बल प्रयोग किया तो उसे मानवोचित दुर्गुण मान कर मन को समझा लेना होगा।


पर यहाँ मामला कुछ दूसरा है । मुहरों के इस खेल में बड़ी रोचक स्थिति है। एक ओर साक्षात भगवन हैं तो दूसरी ओर उनके समक्ष है एक अदना सा शायर। पर इतनी आसानी से घुटने नहीं टेकने वाला हमारा कवि। देखिए तो जिंदगी को उलझाती भगवन की हर चाल का इस खूबी से जवाब दे रहा है कि बाजी पलटती नज़र आ रही है...


नसीरुद्दीन शाह ने जिस अंदाज़ में इस नज़्म को पढ़ा है वो काबिलेतारीफ़ है।


पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाजी देखी मैंने...

काले घर में सूरज रखके
तुमने शायद सोचा था मेरे सब मुहरें पिट जाएँगे
मैंने एक चिराग जला कर अपना रास्ता खोल दिया
तुमने एक समंदर हाथ में लेकर मुझ पर ढेल दिया
मैंने नूर की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लमहा-लमहा जीना सीख लिया
मेरी ख़ुदी को तुमने चंद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया
मौत की शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई
मैंनें जिस्म का खोल उतार कर सौंप दिया और रुह बचा ली

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाजी...



दस कहानियाँ फिल्म से ली गई गुलज़ार की नज़्मों का ये सफ़र अगली कड़ी में भी जारी रहेगा.....

Tuesday, November 13, 2007

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है....सुनिए नूरजहाँ और मेहदी हसन की आवाज़ में ये गज़ल़

पिछला हफ्ता अंतरजाल यानि 'नेट' से दूर रहा। जाने के पहले सोचा था कि नूरजहाँ की गाई ये ग़ज़ल आपको सुनवाता चलूँगा पर पटना में दीपावली की गहमागहमी में नेट कैफे की ओर रुख करने का दिल ना हुआ। वैसे तो नूरजहाँ ने तमाम बेहतरीन ग़ज़लों को अपनी गायिकी से संवारा है पर उनकी गाई ग़ज़लों में तीन मेरी बेहद पसंदीदा रही हैं। उनमें से एक फ़ैज़ की लिखी मशहूर नज़्म "....मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना माँग....." इस चिट्ठे पर आप पहले सुन ही चुके हैं। अगर ना सुनी हो तो यहाँ देखें।

तो आज ज़िक्र उन तीन ग़ज़लों में इस दूसरी ग़ज़ल का। ये ग़ज़ल मैंने पहली बार १९९५-९६ में एक कैसेट में सुनी थी और तभी से ये मेरे मन में रच बस गई थी। लफ़्जों की रुमानियत का कमाल कहें या नूरजहाँ की गहरी आवाज़ का सुरूर कि इस ग़ज़ल को सुनते ही मन पुलकित हो गया था। इस ग़जल की बंदिश 'राग काफी' पर आधारित है जो अर्धरात्रि में गाया जाने वाला राग है। वैसे भी महबूब के खयालों में खोए हुए गहरी अँधेरी रात में बिस्तर पर लेटे-लेटे जब आप इस ग़ज़ल को सुनेंगे तो यक़ीन मानिए आपके होठों पर शरारत भरी एक मुस्कुराहट तैर जाएगी।


हमारी साँसों में आज तक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है
लबों पे नग्मे मचल रहे हैं, नज़र से मस्ती झलक रही है

वो मेरे नजदीक आते आते हया से इक दिन सिमट गए थे
मेरे ख़यालों में आज तक वो बदन की डाली लचक रही है

सदा जो दिल से निकल रही है वो शेर-ओ-नग्मों में ढल रही है
कि दिल के आंगन में जैसे कोई ग़ज़ल की झांझर झनक रही है

तड़प मेरे बेकरार दिल की, कभी तो उन पे असर करेगी
कभी तो वो भी जलेंगे इसमें जो आग दिल में दहक रही है


इस ग़जल को किसने लिखा ये मुझे पता नहीं पर हाल ही मुझे पता चला कि इस ग़ज़ल का एक हिस्सा और है जिसे जनाब मेहदी हसन ने अपनी आवाज़ दी है। वैसे तो दोनों ही हिस्से सुनने में अच्छे लगते हैं पर ये जरूर है कि नूरजहाँ की गायिकी का अंदाज कुछ ज्यादा असरदार लगता है।

शायद इस की एक वज़ह ये भी हैं कि जहाँ इस ग़ज़ल के पहले हिस्से में महकते प्यार की ताज़गी है तो वहीं दूसरे हिस्से में आशिक के बुझे हुए दिल का यथार्थ के सामने आत्मसमर्पण।

तो मेहदी हसन साहब को भी सुनते चलें,इसी ग़ज़ल के एक दूसरे रूप में जहाँ एक मायूसी है..एक पीड़ा है और कई अनसुलझे सवाल हैं...

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है
लबों पे नग्मे मचल रहे हैं, नज़र से मस्ती झलक रही है

कभी जो थे प्यार की ज़मानत वो हाथ हैं गैरो की अमानत
जो कसमें खाते थे चाहतों की, उन्हीं की नीयत बहक रही है

किसी से कोई गिला नहीं है नसीब ही में वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना, हिना वहीं पे महक रही है

वो जिन की ख़ातिर ग़ज़ल कही थी, वो जिन की खातिर लिखे थे नग्मे
उन्हीं के आगे सवाल बनकर ग़ज़ल की झांझर झनक रही है

Monday, November 05, 2007

हमने हसरतों के दाग आँसुओं से धो लिए:सुनिए गुलाम अली की गाई ये ग़ज़ल

जिंदगी में कितनी बार ऍसा होता है कि आप अपने मित्र से रूठ जाते हैं। बात चीत बंद हो जाती है। आप सोचते हैं कि इस बार मैं नहीं बोलने वाला। उसे ही मुझे मनाना होगा। पर फिर एक दिन अनायास ही सब पहले जैसा हो जाता है, झुकता कोई एक है पर खुशी दोनों को होती है।

मेरे एक मित्र हैं जो बताते हैं कि कुछ ऍसा ही मसला उनके साथ कॉलेज के ज़माने में पेश आया था। अब बात कॉलेज की है तो आप समझ ही रहे होंगे कि ये दोस्ती किस तरह की थी। सब कुछ सही चल रहा था कि इन्होंने कुछ कह दिया और उधर मुँह ऍसा फूला कि लोगों ने होठ ना हिलाने की कसम खा ली। अब ये संवादहीनता की स्थिति कब तक बर्दाश्त हो पाती?

पर क्या करें जनाब ....बहुत उपाय सोचे गए और अंत में एक दिन आनन फानन में ये गुलाम अली की कैसेट खरीदी और दे आए साथ में इस ग़जल का मतला लिख कर...

हमने हसरतों के दाग आँसुओं से धो लिए
आपकी खुशी हुजूर बोलिए ना बोलिए

अब गुलाम अली की आवाज़ कहिए या मतले की गहराई मामला फिर ऍसा चल निकला कि आज तक दौड़ रहा है। :) तो आप के साथ कभी ऍसा हो तो आप भी ये तरकीब अपना सकते हैं।

अब लौटें इस ग़ज़ल पर..वास्तव में ये पूरी ग़ज़ल बड़ी प्यारी है। खासकर पहले दो शेर तो वाकई कमाल के हैं। यक़ीन नहीं आता तो खुद ही सुन लें..

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हमने हसरतों के दाग आँसुओं से धो लिए
आपकी खुशी हुजूर बोलिए ना बोलिए


क्या हसीन ख़ार* थे, जो मेरी निगाह ने
सादगी से बारहा, रूह में चुभो लिए

*काँटे
मौसम-ए-बहार है, अम्बरीन* खुमार है
किसका इंतज़ार है, गेसुओं को खोलिए

*इत्र

जिंदगी का रास्ता काटना तो था अदम*
जाग उठे तो चल दिये, थक गए तो सो लिए

*कठिन

Sunday, November 04, 2007

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ :शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो ?

बहुत अर्से पहले की बात है। अंतरजाल पर एक शायरी समूह में हरिवंशराय बच्चन की कविता "..जो बीत गई सो बात गई, मानो वो बेहद प्यारा था.." की बात चल रही थी। उसी सिलसिले में बात निकली की फ़ैज अहमद फ़ैज ने भी कुछ ऍसा ही लिखा था ..."तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर, दामन में छुपाए बैठे हो...शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो..."। उस बातचीत का असर ये हुआ कि नज़्म का मुखड़ा दिमाग में रह गया। बाद में जब ये नज़्म, 'फै़ज़' के एक संकलन में पूरी पढ़ी तब समझ आया कि जहाँ बच्चन ने अपनी कविता पहली पत्नी के देहांत के बाद अपने व्यक्तिगत वियोग से ऊपर उठने के लिए लिखी थी, वहीं फ़ैज ने जेल से लिखी इस नज्म में जीवन के व्यक्तिगत सपनों के टूटने से उपजी उदासी को भुलाकर, सामाजिक असमानता को कम करने के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया था।

फ़ैज़ की ये नज़्म आज के सामाजिक हालातों को देखते हुए भी उतनी ही सापेक्षिक है। बहुत पहले इसे मैंने इसके कुछ हिस्सों को अपने रोमन चिट्ठे पर चढ़ाया था पर इस नज़्म को आज यहाँ अश्विन्दर सिंह की गुजारिश पर पूरी पेश कर रहा हूँ


मोती हो कि शीशा, जाम कि दुर1
जो टूट गया सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया, सो छूट गया
1. एक तरह का माणिक

तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वो साग़रे-दिल2 है जिसमें कभी
सद नाज़3 से उतरा करती थी
सहबाए-गमें-जानां की परी
2. हृदय रूपी मदिरा पात्र, 3.गर्व से

फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये सागर लेकर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर4 तोड़ दिया
4. सबसे मज़बूत पंख

ये रंगी रेजे5 हैं शाहिद6
उन शोख बिल्लूरी7 सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
खल्वत8 को सजाया करते थे

5. टुकड़े, 6. साक्षी, 7. काँच, 8. एकाकीपन

नादारी 9, दफ्तर, भूख और गम
इन सपनों से टकराते रहे
बेरहम था चौमुख पथराओ
ये कांच के ढ़ांचे क्या करते

9. दरिद्रता

या शायद इन जर्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज्जत का
वो जिस से तुम्हारे इज्ज़10 पे भी
शमशादक़दों11 ने नाज़ किया
10. विनम्रता 11. सरों के पेड़ ऍसे कद वालों ने

उस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर भी बहुत रहजन भी बहुत
है चोर‍नगर, यां मुफलिस की
गर जान बची तो आन गई

ये सागर शीशे, लालो- गुहर
सालम हो तो कीमत पाते हैं
यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फकत12
चुभते हैं, लहू रुलवाते हैं

12. सिर्फ

तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

यादों के गरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बखिया उधेड़ा, एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है

इस कारगहे-हस्ती13 में जहाँ
ये सागर शीशे ढ़लते हैं
हर शै का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं
13. संसार

जो हाथ बढ़े यावर14 है यहाँ
जो आंख उठे वो बख़्तावर15
यां धन दौलत का अंत नहीं
हों घात में डाकू लाख यहाँ
14. सहायक, 15. भाग्यवान

कब लूट झपट में हस्ती16 की
दुकानें खाली होती हैं
यां परबत परबत हीरे हैं
या सागर सागर मोती है
16. जीवन

कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
पर्दे लटकाया फिरते हैं
हर परबत को हर सागर को
नीलाम चढ़ाते फिरते हैं

कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
ये पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाईगीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं


इन दोनों में रन१७ पड़ता है
नित बस्ती बस्ती नगर नगर
हर बसते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर
१७. संघर्ष

ये कालक भरते फिरते हैं
वो जोत जगाते रहते हैं
ये आग लगाते फिरते हैं
वो आग बुझाते रहते हैं

सब सागर शीशे, लालो-‍गुहर
इस बाज़ी में बिद जाते हैं
उठो, सब ख़ाली हाथों को
इस रन से बुलावे आते हैं


फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'

Thursday, November 01, 2007

या रब्बा...दे दे कोई जान भी अगर..: सुनिए कैलाश खेर की आवाज में ये उदास नग्मा

किसी शायर ने क्या खूब कहा है...

तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम ही मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यूँ, तू कहीं भी हो मेरे साथ है
तेरा इश्क मुझ पे है मेहरबान, मेरे दिल को हासिल है दो ज़हां
मेरी जान-ए-जां इसी बात पर मेरी जान जाए तो बात है


पर हक़ीकत अगर इससे ठीक उलट हो तो कोई क्या करे? वो प्रेम जिसका कोई प्रतिकार ना मिले, जो सिर्फ हमारे एकतरफा खुशनुमा ख्याल रूपी बुलबुलों का पुलिंदा हो..., व्यर्थ है, कभी भी फट सकता है ये समझने में अक्सर युवा काफी समय लगा देते हैं। और जब बात समझ आती है तो भी उसे स्वीकार करने को दिल तैयार नहीं होता क्योंकि तब तक हम अपनी कितनी मानसिक उर्जा खर्च कर चुके होते हैं। मन रास्ता दिखाता है सबसे कट जाओ..अकेलेपन को गले लगा लो..चुपचाप अपनी घुटन और बेचैनी बर्दाश्त करो..

कुछ ऍसे ही दर्द की अभिव्यक्ति करता समीर का लिखा गीत मैंने पिछले शनिवार रेडिओ पर सुना। और ये कैलाश खेर की आवाज़ का जादू था कि एक बार सुनकर ये गीत दिल की वादियों में अटक सा गया पर बोल याद ना रह पाए इसलिए मुश्किल थी कि खोजूँ कैसे और यक़ीन मानिए उस गीत को दुबारा सुनने के लिए रविवार को वो चैनल सुबह से लगातार ट्यून किया तो शाम को जाकर ये गीत मुझे दुबारा सुनने को मिला।

क्या शुरुआत है गीत की..शंकर-एहसान-लॉए का कलरव सा करता संगीत...कैलाश खेर की दिलकश गहरी आवाज़ आपको एकदम से बाँध लेती है और फिर गिटार के वो कमाल के नोट्स और बाँसुरी की तान। गीत के बढ़ने के साथ खेर की आवाज़ में गहराता दर्द , समीर के बोलों को आत्मसात करने को बाध्य कर देता है। कैलाश खेर के कैरियर के शुरुआती सफ़र और गायिकी के बारे में तो यहाँ पहले भी बात हो चुकी है। बस इस गीत को सुनने के बाद नम आँखों से बस यही दुआ निकलती है

या रब्बा ये बंदा बस ऍसे ही गाता रहे....

तो लीजिए सुनिए फिल्म सलाम-ए-इश्क का ये गीत


प्यार है या सज़ा, ऐ मेरे दिल बता
टूटता क्यूँ नहीं दर्द का सिलसिला
इस प्यार में हों कैसे कैसे इम्तिहान
ये प्यार लिखे कैसी कैसी दास्तान

या रब्बा... दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर
हो..या रब्बा... दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर
प्यार है या सज़ा, ऐ मेरे दिल बता
टूटता क्यूँ नहीं दर्द का सिलसिला ?


कैसा है सफ़र वफ़ा की मंजिल का
ना है कोई हल दिलों की मुश्किल का
धड़कन धड़कन बिखरी रंजिशें
सासें सासें टूटी बंदिशें
कहीं तो हर लमहा होठों पे फ़रियाद है
किसी की दुनिया चाहत में बर्बाद है
या रब्बा... दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर
हो..या रब्बा... दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर

कोई ना सुने सिसकती आहों को
कोई ना धरे तड़पती बाहों को
आधी आधी पूरी ख्वाहिशें
टूटी फूटी सब फ़रमाइशें
कहीं शक है कही नफ़रत की दीवार है
कहीं जीत में भी शामिल पल पल हार है
या रब्बा... दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर
हो..या रब्बा.. दे दे कोई जान भी अगर
दिलबर पे हो ना, दिलबर पे हो ना कोई असर
प्यार है या सज़ा, ऐ मेरे दिल बता
टूटता क्यूँ नहीं दर्द का सिलसिला

ना पूछो दर्दमंदों से
हँसी कैसी, खुशी कैसी
मुसीबत सर पे रहती है
कभी कैसी कभी कैसी
हो...रब्बा....रब्बा.हो...
 

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