Thursday, September 04, 2008

'कहानी एक परिवार की' : गुरुचरण दास का एक नीरस उपन्यास

अच्छी किताबों के बारे में तो हम अक्सर चर्चा करते रहते हैं। पर वो किताबें जो हमें इतनी ज्यादा नहीं जँचती उन पर बात करना हम पसंद नहीं करते। आज की चर्चा एक ऍसी ही किताब के बारे में है जिसे लिखा है जाने माने बुद्धिजीवी गुरुचरण दास ने।


अखबारों को नियमित रूप से पढ़ने वालों और औद्योगिक जगत में रुचि रखने वालों के लिए गुरुचरण दास का नाम किसी परिचय का मुहताज नहीं है। कॉलेज के समय से टाइम्स आफ इंडिया में अक्सर रविवार के दिन उनके लिखे कॉलम पर निगाह गुजरती थी और वहीं ये भी लिखा मिल जाता था कि लिखने वाला प्राक्टर एंड गेम्बल (Proctor & Gamble) का CEO है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में स्नातक रह चुके गुरुचरण दास की सबसे मशहूर किताब India Unbound है जो उन्होंने सन २००० में लिखी थी।

'कहानी एक परिवार की' जो कि लेखक का पहला उपन्यास है, १९९० में प्रकाशित हुआ। ये उपन्यास पूर्वी पंजाब में रहने वाले और विभाजन के समय भारत में आने वाले परिवार की कहानी है। अंग्रेजी में A Fine Family के नाम से छपी इस किताब का हिंदी अनुवाद नरेंद्र सैनी, जो कि खुद एक पत्रकार रह चुके हैं, ने किया है।

उपन्यास शुरुआत में लॉयलपुर कस्बे के मशहूर वकील बाउजी के व्यक्तित्व का परिचय कराता हुआ उनके परिवार के इर्द गिर्द घूमता है, जबकि विभाजन के बाद की गाथा पूरी तरह उनके पोते अर्जुन की जिंदगी की जद्दोज़हद से जुड़ी है। विभाजन पर लिखे अन्य उपन्यासों की तरह ये उपन्यास भी उस के पूर्व और बाद की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करता है। गुरुचरण दास ने उस वक़्त की हिंदू और मुस्लिम सोच को उभारने की सफल कोशिश की है।

पर कहानी कहने का लेखक का अंदाज बेहद नीरस और उबाऊ है। कई पात्र कहानी के साथ चलते-चलते अचानक से गायब हो जाते हैं। वैसे तो ये एक अनुवाद है पर लेखक की भाषा बिना किसी लोच-लचक के सीधी सपाट ही चलती रहती है। मुझे यकीं है कि ३९५ पृष्ठों वाली इस किताब को ख़त्म करना आपके लिए चुनौती जरूर होगा। इसलिए मेरी राय यही है कि २२५ रुपये की पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक पर हाथ ना ही डालें तो बेहतर है।

इस चिट्ठे पर आप इन पुस्तकों के बारे में भी पढ़ सकते हैं

असंतोष के दिन, गुनाहों का देवता, कसप, गोरा, महाभोज, क्याप, एक इंच मुस्कान, लीला चिरंतन, क्षमा करना जीजी, मर्डरर की माँ, दो खिड़कियाँ, हमारा हिस्सा, मधुशाला,
मुझे चाँद चाहिए

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7 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] on September 04, 2008 said...

चलिए अच्छा हुआ बता दिया आपने ...इस तरह से चर्चा करना भी जरुरी है शुक्रिया

अभिषेक ओझा on September 04, 2008 said...

Gurucharan Das se milne aur sunane ka mauka mila tha. par nirasha hi haath lagi... unaki kai baatein vaastavikta se pare thi. unke vyakhyaan se hi ek post likhi thi 'i sab india mein hota hoga... bharat mein kahan hota hai?'

swati on September 04, 2008 said...

shukriya....

अनुराग on September 04, 2008 said...

shukriya mansih.....

mamta on September 04, 2008 said...

धन्यवाद मनीष जी इस किताब के बारे मे बताने के लिए।

Udan Tashtari on September 04, 2008 said...

ऐसे आलेख एवं समीक्षाऐं ज्यादा जरुरी हैं-बहुत आभार!!

anitakumar on September 05, 2008 said...

Gurucharandas ka naam toh badhi izzat se liya jataa hai, ho sakta hai ki jo vyakti economic issues par itna achcha likh sakta ho woh kahaani likhne ka saamrthy na rakhta ho aur fir kahaani likhna toh apne aap mein ek kalaa hai..achcha hua aap ne bataa diya, ab hum paisa aur time barbaad nahi karenge is kitaab ko khareedne mein, dhanywaad

 

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