Monday, November 24, 2008

जल्लाद की डॉयरी : फाँसी लगाने वाले की मनःस्थिति को व्यक्त करता एक अनूठा उपन्यास


आपने मृत्यु को क्या बिल्कुल नजदीक से देखा है? या कभी ये सोचा है कि जब आप किसी को बिना विद्वेष के मार दें तो उसके बाद आपकी क्या मनःस्थिति होगी। कैसा लगता है जब आम जिंदगी में लोग आपको और आपके पेशे को एक तरह के खौफ़ से देखते हैं। एक आम जन के लिए ये सवाल बेतुके और बेमानी से लगेंगे। पर जब बात एक पेशेवर जल्लाद की हो तो ये प्रश्न बेहद प्रासंगिक हो उठते हैं।
इन्ही प्रश्नों को लेकर केरल के एंग्लोइंडियन उपन्यासकार शशि वारियर पहुँच जाते हैं जनार्दन पिल्लै के पास, जिन्होंने त्रावणकोर के राजा के शासन काल और उसके उपरांत में तीन दशकों में ११७ फाँसियाँ दीं थीं। लेखक ने इस उपन्यास में उन सारी बातों को बिना लाग लपेट पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है जिसे जनार्दन ने अपनी सोच और समझ के हिसाब से लेखक द्वारा दी गई कापियों में लिखा और अपने मरने के पहले लेखक को सौगात के रूप में छोड़ गया।

ये पुस्तक सबसे पहले १९९० में Hangman's Journal के नाम से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई और इसका हिंदी संस्करण पहली बार पेंगुइन बुक्स ने यात्रा बुक्स के सहयोग से २००६ में निकला। इस संस्करण का अंग्रेजी से अनुवाद कुमुदनि पति ने किया है। इस उपन्यास का विषय कुछ ऍसा है जो ना चाहते हुए भी आपको ये सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि फाँसी के समय जान जाने वाले और लेने वाले की क्या दशा होती है। पर उस बारे में बाद में बात करते हैं पहले ये बताइए कि फाँसी लगने की बात कहते हुए क्या आपने कभी सोचा है कि वास्तव में ये प्रक्रिया है क्या? पर लेखक पाठक को इस दुविधा में ज्यादा देर नहीं रखते और उपन्यास का आगाज़ कुछ यूं करते हैं...

"......इसे पतन कहते हैं
इसके लिए जेलरों के पास एक लघु तालिका होती है, यह बताने के लिए कि अपराधी व्यक्ति गर्दन में लगे फंदे सहित कितनी दूरी तक गिरे जिसे उसका काम सफाई से तमाम हो। विशेषज्ञों का कहना है कि उसे उतना ही गिरना चाहिए कि उसके वेग से रस्सी उसकी गर्दन तोड़ दे। यदि शरीर अधिक दूर गिरता है तो रस्सी उसकी गर्दन में धँस जाती है और बहुत संभव है कि सिर को अलग कर दे। यदि शरीर पर्याप्त दूरी पर नहीं गिरता है तो गर्दन नहीं टूटेगी और व्यक्ति को दम घुटकर मिटने में कुछ मिनट लगेंगे।..."
जनार्दन अपने संस्मरण में कई बार फाँसी देने के पहले होने वाली क़वायद का जिक्र करते हैं। फाँसी के तख्ते का परीक्षण पहले बिना वज़न के और फिर वज़न के साथ किया जाता है। जल्लाद का सबसे प्रमुख कार्य होता है रस्सी की गाँठ को सही जगह लगाना। गाँठ सही जगह लगी तो गर्दन तुरंत टूटती है वर्ना क़ैदी की दम घुटकर धीरे धीरे मौत होती है। पुराने ज़माने में रस्सी खुद जल्लाद तैयार करता था। रस्सी का उस हिस्से को चिकना रखने के लिए जो गर्दन को छूता है, मक्खन या रिफांइड तेल का इस तरह इस्तेमाल होता था कि मक्खन रस्सी के रेशों में पूरी तरह समा जाए। अब तो नर्म कपास का प्रयोग होने लगा है।

तख्ता, लीवर, रस्सी की जाँच के बाद लीवर छोड़ा जाता है तो तख्ता नीचे दीवार से लगी पैडिंग से टकराता है जो आवाज़ को कम करने के लिए लगाया गया होता है। परीक्षण हो चुका है। सब कुछ सहजता से सम्पन्न होने के बाद भी जनार्दन असहज महसूस कर रहे हैं। वे जानते हैं कि आज की रात फाँसी लगने के पहले वाली रात कोई क़ैदी उनसे आँखें नहीं मिलाएगा। उस रात जनार्दन खुद से सवाल पूछते हैं

"..मौत को जीवन से सहज बनाने के लिए हम अपने जीवन का इतना समय क्यूँ लगा देते हैं? .."

पर ये किताब फाँसी की प्रक्रिया से कहीं ज्यादा फाँसी देने वाले के अन्तर्मन में झाँकती है और यही इस उपन्यास का सबसे सशक्त पहलू भी है। किसी को मारना चाहे वो आपकी ड्यूटी का हिस्सा क्यों ना हो मानसिक रूप से बेहद यंत्रणा देने वाला होता है। और जनार्दन इस यंत्रणा से हर फाँसी के बाद डूबते उतराते हैं। क्यों ये पेशा चुना उन्होंने? पेट पालने के लिए इसके आलावा कोई चारा भी तो नहीं था। मन को समझाते हैं। आखिरकार वे राजा के निर्णय का पालन भर कर रहे हैं। वो राजा जिसे धरती पर भगवान का दूत बनाकर भेजा गया है। पर कुछ सालों के बाद जब जनार्दन स्कूल के समय के अपने पुराने शिक्षक से मिलते हैं तो वे राजा के भी एक सामान्य इंसान होने की असलियत से वाकिफ़ होते हैं और उनके दिल पर हत्या का बोझ हर फाँसी के बाद बढ़ता चला जाता है।

पर किसी की जान लेने के पाप से बचने का डर सिर्फ जल्लाद की परेशानी का सबब नहीं था,. खुद राजा भी इस पाप के भागीदार नहीं बनने के लिए एक अलग तरह की नौटंकी को अंजाम देते थे। लेखक ने इस दिलचस्प प्रकरण का खुलासा अपनी पुस्तक में किया है।
हर मृत्युदंड के ठीक पहले वाले दिन दोपहर तक उसकी क्षमा याचना की अर्जी राजा के पास पेश की जाती थी। राजा शाम को फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल देते पर उनके इस निर्णय को अमल में लाने के लिए उनका हरकारा सूर्योदय के बाद निकलता ताकि जब तक वो जेल तक पहुँचे, फाँसी लग चुकी हो। पता नहीं राजा ऍसा करके किसको छलावा देते थे पर बेचारा जल्लाद क्या करता उसके पास तो इन छलावों की ढाल भी नहीं थी। इसलिए तो उन दी गई फाँसियों के बारे में जनार्दन सोचना नहीं चाहता। उसे लेखक पर क्रोध आता है कि क्यों उनके चक्कर में पड़ा। पर सोचना पड़ता है चेतन मन में ना सही तो अचेतन स्वप्निल मन से....

".मैं पहले सीढ़ियाँ देखता हूँ, बेतरतीब पत्थर की सीढ़ियाँ, जो फाँसी के तख्ते के नीचे बने अँधेरे कुएँ की ओर जाती हैं। .............फाँसी के तख़्ते पर, फंदे के ठीक नीचे नकाब पहने आदमी खड़ा है। उसकी धारीदार पोशाक कड़क ओर ताजा है। वह नक़ाब कुछ अज़ीब सा है।........ सुदूर ढोल की आवाज़ तेज होती है और मैं समझ जाता हूँ कि क्या गड़बड़ी है। नक़ाब अधिक चपटा सा है। कम से कम वो उठा हुआ हिस्सा होना चाहिए , जहाँ आदमी की नाक उठती है। ....अंतरदृष्टि से एक पल में जान लेता हूँ कि नकाब के पीछे कोई चेहरा नहीं है। नक़ाब ही चेहरा है। भय गहरा होता जाता है . मुझे यहाँ से किसी तरह बच निकलना है। वह लोहे का दरवाज़ा मुझसे लगभग तीस फुट दूर है पर मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ। मैं बहुत तकलीफ़ के साथ धीरे धीरे दरवाज़े तक पहुँचता हूँ, पर यह क्या? दरवाज़े पर भारी ताला पड़ा है जिसे मैं हिला नहीं सकता।
किसी पूर्वाभास के चलते मुड़ता हूँ। वहाँ चपटे नक़ाब वाला आदमी दिखता है, उसके हाथ पैर पूरी तरह मुक्त हैं। मैं अपनी गर्दन के इर्द गिर्द उसके मज़बूत हाथों को कसता हुआ महसूस करता हूँ। मैं सांस नहीं ले पा रहा
... मैं आँखें बंद करने की कोशिश करता हूँ ताकि उसका चपटा सा नक़ाब मेरी आँखों से ओझल हो जाए, पर लाख चाहकर भी ये संभव नहीं हो पाता। जैसे जैसे अपने घुटनों पर धसकता जाता हूँ मुझे मालूम होता है कि मेरी छाती के भीतर दिल फट जाएगा।..."

जनार्दन ऍसे स्वप्न से अचानक जाग उठे हैं। पर अपनी पुरानी यादों को ताज़ा करने के क्रम में ये स्वप्न और भयावह होते जाते हैं। आखिर कौन सा अपराध बोध उन्हें सालता है और उससे निकलने के लिए वे किस तरह अपने आपको मानसिक रूप से तैयार करते हैं ? इन बातों से जुड़ी इस रोचक और एक अलग तरह के उपन्यास की चर्चा जारी रहेगी अगली कड़ी में ...
इस चिट्ठे पर आप इन पुस्तकों के बारे में भी पढ़ सकते हैं
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15 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] on November 24, 2008 said...

रोचक लगा यह पढ़ना ..अगली कड़ी का इन्तजार ..पढ़ना पड़ेगा इस किताब को ..शुक्रिया मनीष आपका

कंचन सिंह चौहान on November 24, 2008 said...

sach me bahut hi kathin anubhavo par likhi gai kitaab..! paap punya ke antardwandva se gujarna aur paap karne se khud ko rok bhi na paana.....!! bahut peedadaayak sthiti hai...!

aage ki kadi ki pratiksha..!

Udan Tashtari on November 24, 2008 said...

गजब भई...यह किताब तो पढ़ना पड़ेगी..वाकई..एक नया अनुभव होगा.हर प्रोफेशन के कैसे अनुभव होते हैं यह जानना कितना रोचक होता है.

आपका आभार.

आपका मोबाईल जरा फिर ईमेल करियेगा.

अभिषेक ओझा on November 24, 2008 said...

समीक्षा में ही खो गया मैं तो किताब कितनी रोचक होगी... एक अलग ही अनुभव रहेगा इसको पढ़ना.

PN Subramanian on November 25, 2008 said...

हमारा जल्लाद भारतीय है. जीव और जीवन के प्रति हमारी अवधारणायेँ हमारी संस्कृति की देन है. अतः उस जल्लाद के अंतर्मन की हलचल समझी जा सकती है. आपकी किताब को लेकर प्रस्तुति बेहतरीन है. आभार. (आप को अलग से एक वीडियो क्लिप भेज रहा हूँ, मीडीया प्लेयर पर ना चले तो वी एल सी प्लेयर का प्रयोग करें. - सावधान - बच्चों को ना दिखाएँ - रूह कांप जाएगी)

mehek on November 25, 2008 said...

padhkar hi dar lgta hai pphir jis insaan ka jallad ka pesha hoga uski mansik halat kya hgi,samiksha mein hi kho gaye,sundar

Poonam on November 25, 2008 said...

जो दोषी हैं और जिनके लिए राजा ने सज़ा-ऐ-मौत मुक़र्रर की है उन फांसियों में शायद जल्लाद थोडा संभल भी जाता होगा ,पर जब वह ऐसे किसी शख्स को फांसी लगाता है जिसको वह जानता है कि निर्दोष है ,तब.... ? क्या ऎसी किसी घटना का ज़िक्र आया है?

विनीता यशस्वी on November 25, 2008 said...

Bahut hi rochak laga. mai to is kitab ko jarur padhungi.

राकेश जैन on November 25, 2008 said...

very intereseting subject..emotional...!!!!!!!!!

anitakumar on November 26, 2008 said...

मनीष जी बहुत ही रोचक और मार्मिक विषय है, इस उपन्यास के बारे में बताने के लिए धन्यवाद, हम तो इसे आप के चिठ्ठे पर ही पढ़ेगें , अगली कड़ी का इंतजार है।

एस. बी. सिंह on November 26, 2008 said...

सुंदर और संवेदनशील आलेख । बधाई

डॉ .अनुराग on November 26, 2008 said...

वाकई एक अद्भुत उपन्यास होगा ये .कही किसी जल्लाद के बेटे का इंटरव्यू पढ़ रहा था .....जो अपने पिता का पेशा नही अपनाना चाहता था ...इंग्लिश में एक मूवी भी बनी है ओल्ड क्लासिक में इस विषय पर .

Manisha Dubey said...

Manishji, mene books toh bahut padhi hain, aalag alag vishyon par kintu aisa ajeeb anubhv pahle kabhi nahi hua,isske liye aap badhai ke paatra hain ,agli kadi ka intzar rahega.

Anonymous said...
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Vivek Rastogi on February 04, 2012 said...

एक नये विषय के बारे में पढ़कर बहुत ही रोमांच महसूस हो रहा है और विषय भी वह जिसके बारे में केवल कयास लगाये जाते हैं, किसी को ज्यादा जानकारी नहीं, बहुत पहले मैंने एक किताब पढ़ी थी नाम ठीक से याद नहीं परंतु उसमें फ़ांसी लगाने की सारे तकनीकी जानकारी संजोयी गई थी।

 

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