Tuesday, January 29, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १२ - हम तो ऐसे हैं भैया..

बनारस शहर से मेरा कोई खास परिचय नहीं, अलबत्ता ये जुरूर है कि एक बार यहाँ की गलियों में भटकते भटकते रास्ता भूल बैठा हूँ। अपने तरह का शहर है ये बनारस..। इसकी एक छवि पंकज मिश्रा ने भी उतारी थी अपनी किताब दि रोमान्टिक्स में...।

शहर के बदलते स्वरूप के बारे में पंकज अपनी किताब की शुरुआत में कहते हैं..
नए मध्यमवर्ग की कुलीनता बनारस में भी दिखने लगी है। सदियों से हिन्दुओं का ये पवित्र तीर्थ स्थल जहाँ लोग पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाने आते थे, अब एक छोटा भीड़ भरा व्यवसायिक शहर बन चुका है। इसीलिए पंकज आगे कहते हैं

".....This is as it should be: one can't feel too sad about such, changes. Benares -destroyed & rebuilt so many times during centuries of Muslim & British rule - is, the Hindus say the abode of Shiva, the god of perpetual creation & destruction.The world constantly renews itself and when you look at it that way, regret & nostalgia seem equally futile. ...."

सच ही तो है वक़्त के पहिए को कौन रोक पाया है।

पंकज ने तो बनारस की पृष्ठभूमि में अपनी कथा को आगे बढ़ाया था पर उस किताब और इस गीत में साम्य बस इतना है कि यहाँ भी उसी पृष्ठभूमि में 'लागा चुनरी में दाग' फिल्म की कथा विकसित होती है। सुबह की बेला .. मंदिर से बजती घंटियाँ और दूर किसी साधक का स्वर, मवेशियों और लोगों से पटी ऐसी ही चंद आवाज़ों के साथ बनारस की गलियों का ये संगीतमय सफ़र शुरु होता है दो बहनों की आपसी बातचीत से।

स्वानंद किरकिरे ने कुछ मिनटों के गीत में बनारस के कई रूपों को छूने की कोशिश की है । शहर के बारे में कहते-कहते वो एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की समस्याओं को भी बड़ी खूबसूरती से बोलों में बाँध जाते हैं। स्वानंद निश्चित रूप से अपने इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं। इस गीतमाला में स्वानंद आगे भी हाज़िरी देंगे तब उनके बारे में विस्तार से चर्चा होगी।

बोलों के आलावा सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल की बेहतरीन युगल गायिकी को सुन कर मन से वाह वाह निकलती है। इसमें कोई शक नहीं की १२ वीं पायदान का ये गीत इस साल का सर्वश्रेष्ठ युगल गीत है। समव्यस्क बहनों के बीच जो अपनापन होता है वो इन दोनों गायिकाओं ने क्या खूब उभारा है। सुनिधि का पान खाए हुए व्यक्ति की तरह गाना तो मुझे बिलकुल कमाल लगा।

पहले स्वानंद किरकिरे के बोलों का आनंद लें..

जेब में हमरी दू ही रूपैया
दुनिया को रखें ठेंगे पे भैया
सुख दुख को खूँटी पे टांगे
और पाप पुण्‍य चोटी से बाँधें
नाचे हैं ताता थैया
हम तो ऐसे हैं भैया
ये अपना फैशन है भैया
हम तो ऐसे हैं भैया


एक गली बम बम भोले
दूजी गली में अल्‍ला-मियां
एक गली में गूंजें अज़ानें
दूजी गली में बंसी बजैया

सबकी रगों में लहू बहे है
अपनी रगों में गंगा मैया
सूरज और चंदा भी ढलता
अपने इशारों पे चलता
दुनिया का गोल गोल पहिया
हम तो ऐसे हैं भैया ....

आजा बनारस का रस चख ले आ
गंगा में जाके तू डुबकी लगा
रबड़ी के संग संग चबा लेना उंगली
माथे पे भांग का रंग चढ़ा
चूना लगई ले,पनवा खिलईदे
उसपे तू ज़र्दे का तड़का लगई दे
पटना से अईबे, पेरिस से अईबे
गंगा जी में हर कोई नंगा नहइबे
जीते जी जो कोई काशी ना आए
चार चार कांधों पे वो चढ़के आए

हम तो ऐसे हैं भईया..हम तो ऐसे हैं भईया..
ये अपनी नगरी है भईया..अरे हम तो ऐसे हैं भईया..
दीदी अगर तुझको होती जो मूँछ
मैं तुझको भईया बुलाती तू सोच
अरे छुटकी अगर तुझको होती जो पूँछ
तो मैं तुझको गैया बुलाती तू सोच
दीदी ने ना जाने क्‍यूँ छोड़ी पढ़ाई
घर बैठे अम्‍मां संग करती है लड़ाई
अम्‍मां बेचारी पिसने है आई
रात दिन सुख दुख की चक्की चलाई
घर बैठे बैठे बाबूजी हमारे
लॉटरी में ढूंढते हैं किस्‍मत के तारे
3...2....1272
मंझधार में हमरी नैया
फिर भी देखो मस्‍त हैं हम भैया
हम तो ऐसे हैं भैया

दिल में आता है यहाँ से
पंछी बनके उड़ जाऊँ
शाम ढले फिर दाना लेकर
लौट के अपने घर आऊँ
हम तो ऐसे हैं भैया , अरे हम तो ऐसे हैं भैया ...


तो अनीता कुमार जी और मनीष जोशी साहब इंतज़ार की घड़ियाँ हुई समाप्त। जितना ये गीत आप दोनों को पसंद है उतना मुझे भी है तो लीजिए सुनिए शान्तनु मोइत्रा द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को




इस संगीतमाला के पिछले गीत


Monday, January 28, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १३ - ना है ये पाना, ना खोना ही है...

तो दोस्तों गीतों के इस सफ़र पर आ पहुँचे हैं हम इस संगीतमाला के ठीक मध्य में। और मेरी तेरहवीं पायदान के हीरो हैं इस गीत के गायक मोहित चौहान ! क्या कमाल किया है उन्होंने इरशाद कामिल के लिखे और प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध इस प्यारे से नग्मे में , ये आप गीत सुनकर ही महसूस कर सकते है।


आप में से बहुतों ने मोहित चौहान को शायद ही पहले सुना हो। मैंने पहली बार इन्हें फिल्म 'मैं, मेरी पत्नी और वो' में 'गुनचा कोई तेरे नाम कर दिया...' गाते सुना था और वास्तव में उस गीत को सुनकर मैं मोहित से मोहित हुए बिना नहीं रह पाया था । उस गीत को मैंने इस चिट्ठे पर यहाँ पेश किया था

मोहित की संगीत यात्रा शुरु हुई १९९७ में। उन्हें सफलता का स्वाद उसी साल तब मिला जब मोहित की अगुवाई में बने बैंड सिल्क रूट के पहले एलबम बूंदें के गीत डूबा डूबा... को 'चैनल वी' ने अपने शो में साल के गैर फिल्मी एलबम में सबसे बढ़िया गीत के रूप में चुना। सिल्क रूट प्रथम दो वर्षों की चर्चा के बाद धीरे धीरे अपनी लोकप्रियता खोता गया। पिछले चार पाँच वर्षों में मोहित को फिल्मों में गिने चुने मौके मिले हैं। पर चाहे वो 'मैं, मेरी पत्नी और वो' या फिर 'रंग दे वसंती' या फिर इस साल की 'जब वी मेट' , उन्होंने हर मिले मौके से अपनी प्रतिभा को साबित किया है।

मोहित चौहान, हिमाचल से आते हैं। वो कहा करते हैं कि शुरुआती दिनों में अपने गायन में वो गूँज या 'थ्रो' पैदा करने के लिए व्यास नदी के किनारे चले जाते थे। हिमाचल की ज्यादातर संगीत बिरादरी के साथ उन्होंने काम किया हुआ है और वहाँ के लोक संगीत से भी वो जुड़े रहे हैं। आठ साल की उम्र से ही मोहित संगीत में दिलचस्पी लेने लगे। गाने के साथ एकाउस्टिक गिटार में भी वो उतने ही प्रवीण हैं। उनकी गायिकी की खासियत ये है कि वो गीत की संपूर्ण भावनाएँ आत्मसात कर अपनी अदाएगी में झोंक देते हैं।

इस गीत के बोलों को लिखा है पंजाब के इरशाद कामिल ने जो तत्कालीन कविता में डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित है। स्क्रिप्ट लेखन से अपना फिल्मी कैरियर शुरु करने वाले इरशाद अब 'जब वी मेट' में गीतकार की हैसियत से उतरे हैं और आप तो जानते ही हैं कि इस फिल्म के गीत कितने लोकप्रिय हो रहे हैं.

क्या खूबसूरत मुखड़ा दिया है उन्होंने.... ना है ये पाना, ना खोना ही है, तेरा ना होना जाने ,क्यूँ होना ही है ?....और इस लय के साथ जब मोहित की आवाज़ बहने लगती है तो इस गीत से वशीभूत हुए बिना कोई चारा नहीं बचता...

ना है ये पाना, ना खोना ही है
तेरा ना होना जाने .
क्यूँ होना ही है ?

तुम से ही दिन होता है
सुरमयी शाम आती है
तुमसे ही तुमसे ही

हर घड़ी साँस आती है
ज़िंदगी कहलाती है
तुमसे ही तुमसे ही

ना है या पाना......होना ही है ?

आँखों मे आँखें तेरी
बाहों में बाहें तेरी
मेरा न मुझमें कुछ रहा
हुआ क्या
बातों में बातें तेरी
रातें सौगातें तेरी
क्यूँ तेरा सब ये हो गया
हुआ क्या
मैं कहीं भी जाता हूँ
तुमसे ही मिल जाता हूँ
तुमसे ही तुमसे ही
शोर में खामोशी है
थोड़ी सी बेहोशी है
तुमसे ही तुमसे ही

आधा सा वादा कभी
आधे से ज्यादा कभी
जी चाहे कर लूँ इस तरह, वफा का
छोड़े ना छूटे कभी
तोड़े ना टूटे कभी
जो धागा तुमसे जुड़ गया, वफा का...

मैं तेरा सरमाया हूँ
जो भी मैं बन पाया हूँ
तुमसे ही तुमसे ही
रास्ते मिल जाते हैं
मंजिलें मिल जाती हैं
तुमसे ही तुमसे ही

ना है ये पाना....


तो आइए सुनें जब वी मेट के इस गीत को





इस संगीतमाला के पिछले गीत

Saturday, January 26, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १४- चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका..हौले से हौले से पलकों में छुप जा

तो सज्जनों गणतंत्र दिवस के इस पावन दिन पर जॉज संगीत से बाहर निकलते हैं और चलते हैं विशुद्ध मेलोडी की दुनिया में ! और यहाँ शान से खड़ा है १४ वीं पायदान का ये गीत जो उस गीत-संगीतकार जोड़ी का है जिसकी एक रचना रतिया अँधियारी रतिया..२००४ में मेरी वार्षिक गीतमाला का सरताज गीत बनी थी। इसे गाया है एक नई गायिका ने, जो पहली बार इस गीतमाला में दाखिल हो रही हैं। पर उनकी बात थोड़े देर में..।

चंदा यानि चाँद को संबोधित इस छोटे से गीत के मुख्य सितारे हैं इसके संगीतकार शान्तनु मोइत्रा । जैसे ही आप इस गीत के मुखड़े को सुनते हैं, मन अज़ीब सी शांति से तर जाता है और इसकी सुरीली पंक्तियों को गुनगुनाने के लोभ से अपने आपको मैं अलग नहीं रख पाता। 'परिणिता' के उस सरताज गीत और इस गीत में एक समानता तो जरूर है। और वो है पार्श्व में रह-रह कर बजते घुंघरुओं की झनझनाहट। गौर करने की बात है कि पीछे से हल्के हल्के बजता संगीत आपका ध्यान गीत के बोलों पर जमाए रखता है। बीच-बीच में आती बाँसुरी और तबले की संगत भी मन को आनंदित करती चलती है। तो आइए इस गीत के बोलों से पहले रूबरू हो लें

चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका
हौले से हौले से
पलकों में छुप जा
हौले से हौले से... छन छन छन छन छन छन खन छना
बादल के झूले पे...खन खन खन खन खन खन खन खना
हौले से हौले से,बादल के झूले पे
मुसका
चंदा रे, चंदा .......छुप जा

अरे लुक्का छिपी खेले चंदा तारों के संग
कौन थामे डोरी, तू है किसकी पतंग
चंदा ओ रे चंदा तेरा कैसा गुरूर
हँस दे जरा सा बरसा दे तू नूर

चंदा रे, चंदा रे धीरे से मुसका
हौले से हौले से
पलकों में छुप जा




इस गीत के बोल लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने जो मेरी गीतमाला में हर साल ऊपर की पायदानों में अपना दखल अवश्य रखते हैं। स्वानंद की बात इस गीतमाला में आगे भी होगी पर अगर आपने गीत सुनना शुरु कर दिया है तो आपका ध्यान हवा के झोंके सी ताज़ी इस नई आवाज़ पर अवश्य गया होगा।


इसे गाया है पुणे में जन्मी ३५ वर्षीय हमसिका अय्यर ने जो गोरेगाँव, मुंबई निवासी हैं और १९९५ में सा रे गा मा... पे हिस्सा भी ले चुकी हैं। हमसिका के पिता संगीतज्ञ हैं और बांसुरी बजाते हैं। इस गीत को सुनने के कई घंटे बाद भी उनकी स्पष्ट गायिकी दिलो दिमाग में गूंजती रहती है। आशा है हमसिका आगे भी अपने गायन से संगीतप्रेमियों का दिल जीतती रहेंगी। तो आइए सुनें एकलव्य दि रॉयल गार्ड जो इस साल भारत की ओर से आस्कर पुरस्कारों के लिए आधिकारिक तौर पर नामांकित फिल्म है, के इस गीत को



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Thursday, January 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १५ - जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ...

नहीं, नहीं मैं सिगरेट नहीं पीता। सिगरेट के धुएँ से एलर्जी तो मैंने विरासत में पाई है पर कॉलेज और नौकरीपेशा जिंदगी में, सुट्टेबाजों की सोहबत में रहने का मौका, बहुधा मिला है। सिगरेट की तलब उठने पर उनके चेहरे की बेचैनी को आप नज़रअंदाज नहीं कर सकते।

मेरी इस संगीतमाला के १५ वीं पायदान का गीत इन्ही सिगरेट प्रेमियों के मनोविज्ञान को सामने लाता है। ये अपने आप में एक अनूठा गीत है एक ऍसे विषय पर, जो अब तक गीतकारों के लिए अनछुआ ही रहा है।

सिगरेट पीने के नुकसानों को भली-भांति समझने वाले भी क्यूँ उसे चाह कर भी छोड़ नहीं पाते उसे गुलज़ार साहब ने बड़ी खूबसूरती से लिखा है और इसके लिए वो तारीफ़ के पात्र हैं। पर खास बात ये है कि उतने ही बेहतरीन अंदाज में इसे अपना स्वर दिया है अदनान सामी ने। अदनान के द्वारा गाए इस गीत को सुनते ही आप को ऍसा लगता है कि आप किसी ऍसी महफिल का हिस्सा बन गए हों जहाँ संगीत और नृत्य के बीच धुएँ के कश रह-रह कर उठ रहे हों।

तो गुलज़ार के शब्दों पर गौर करें।

Hey I Waana Tell You About This Thing
This Stick Of Cigarette, Yeah

फिर तलब, तलब, है तलब, तलब
बेसबब, बेसबब फिर तलब, है तलब
शाम होने लगी है, शाम होने लगी
लाल होने लगी है, लाल होने लगी


जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
आग पे पाँव पड़ता है, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
फिर किसी ने जलाई एक दियासलाई
फिर किसी ने जलाई एक दियासलाई
ओ.. आसमां जल उठा है, शाम ने राख उड़ाई
उपले जैसा सुलगता हूँ, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ

लम्बे धागे धुएँ के, साँस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है, होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है, शाम होने लगी
ओ.. लाल होने लगी है , लाल होने लगी

कड़वा है धुआँ जो निगलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ
आग में पांव पड़ता है, कमबख्त धुएँ में चलता हूँ
जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूँ


वैसे तो 'नो स्मोकिंग' नहीं चली पर इसका गीत संगीत बम्बइया फिल्मी गीतों से कुछ हट के है। विशाल भारद्वाज की बहुमुखी प्रतिभा का अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने इस गीत में पश्चिमी संगीत की एक विधा जॉज का प्रयोग किया है जिसमें सेक्सोफोन, ट्रम्पेट जैसे वाद्य यंत्रों की प्रधानता रहती है। पर मुख्य बात ये है कि गीत और संगीत को इस तरह से रचा गया है कि वे एक दूसरे से गुथे नज़र आते हैं.

तो आइए सुनते हैं ये गीत




इस संगीतमाला के पिछले गीत

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १६ - रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...तेरी यादों में हम..

वार्षिक संगीतमाला की इस पायदान पर गीत वो, जिसे पहले तो मैंने रखा था बीसवीं सीढ़ी पर बार-बार सुनने के बाद ये और ज्यादा अच्छा लगने लगा। इस गीत के साथ ही एक नई तिकड़ी का आगमन हो रहा है इस गीतमाला में। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये गीत, इस साल के सबसे रूमानी गीतों में एक है। इसके बोलों को लिखा चंडीगढ़ के युवा गीतकार मुन्ना धीमन ने। मुन्ना बचपन से ही लेखन में रुचि लेते आए हैं। नाटकों के लिए स्क्रिप्ट से लेकर कैडबरी के एड जिंगल तक की रचना उन्होंने की है।

इस गीत में कहीं कोई बनावटीपन नहीं दिखता। बस निश्चल प्रेम में कहे गए सीधे सच्चे से शब्द जो सीधे दिल पर जाकर लगते हैं और इसलिए असरदार साबित होते हैं।

पर मुन्ना के बोलों को अपनी गहरी संवेदनशील आवाज़ से सँवारा है अमिताभ बच्चन ने। अमिताभ के गाए गंभीर गीतों में मुझे 'सिलसिला ' का उनका गाया गीत नीला आसमान सो गया.... सबसे ज्यादा पसंद है। इस गीत को नीचे के सुरों से जैसे उन्होंने ऊपर की ओर उठाया है वो मन को छू लेता है। अपनी गायिकी में अमिताभ ने मुन्ना के भावों को यथासंभव उभारने की कोशिश की है।

इस गीत के साथ ही पहली बार इस साल आए हैं विशाल भारद्वाज इस गीतमाला में। विशाल ने पिछले साल ओंकारा में अपने बेमिसाल संगीत से सारे सुधी संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया था। विशाल इस गीत के बारे में कहते हैं
"कि जब इस गीत की रिकार्डिंग चल रही थी तो अमित जी ने कहा कि विशाल, तुम्हारे सामने मैं ये गीत गाने में असहज महसूस करूँगा इसलिए तुम स्टूडियो के बाहर ही बैठो।"

विशाल का मत है कि जिस खूबसूरती से अमित जी ने इस गीत को निभाया है कि उन्हें अन्य सितारों के लिए भी पार्श्व गायन करना चाहिए।

किसी ऐसे शख्स जिससे हमने कभी बेइंतहा मोहब्बत की हो, उसे जिंदगी से भौतिक रूप से अलग करना जितना सहज है, उतना ही कठिन है उसे अपनी यादों से जुदा करना। सोते जागते जिंदगी के हर लमहे में वो चेहरा मंडराता ही रहता है। किस हद तक हम इन यादों में डूबते चले जाते हैं वो आप इस गीत के लफ़्जों में महसूस कर सकते हैं
रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...

उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
तुझको लिए घर लौटूँ और, घर से निकलता हूँ मैं
इक पल को भी जाता नहीं तेरे बिन कहीं
यूँ रात दिन, बस तुझमें ही, बस तुझमें ही
लिपटा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..रोज़ाना

रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...
रोज़ाना जलें रोज़ाना घुलें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..हम्म..रोज़ाना

हर दिन तेरी, आँखों से इस, दुनिया को तकता हूँ मैं
तू जिस तरह, रखती थी घर, वैसे ही रखता हूँ मैं
तेरी तरह, संग संग चलें, यादें तेरी
यूँ हर घड़ी, बातों में बस, बातों में तेरी
गुम सा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...

कुछ गाऊँ तो याद आते हो
गुनगुनाऊँ तो याद आते हो
कुछ पहनूँ तो याद आते हो
कहीं जाऊँ तो याद आते हो
कुछ खोने पे याद आते हो
कुछ पाऊँ तो याद आते हो

रोज़ाना चले, यादों पर तेरी
ज़िंदगी का सफ़र....
तुझसे है रोशन, तुझसे है जिंदा
ये दिल का शहर... ये दिल का शहर..
रोज़ाना..रोज़ाना..रोज़ाना.........
तो आइए सुनें फिल्म निशब्द से लिया हुआ ये भावपूर्ण गीत




इस संगीतमाला के पिछले गीत

Sunday, January 20, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १७ - चका चका ची चा चो चक लो रम...बम बम बोले

दफ़्तर के दौरों की वज़ह से ये संगीतमाला अटकती हुई आगे बढ़ रही है और इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। आज सुबह ही नागपुर से लौटा हूँ और रात में फिर एक दूसरे काम से प्रस्थान करना है। खैर ये सब तो चलता ही रहेगा । तो आज आपके सामने है इस संगीतमाला की पायदान १७ जिस पर एक ऐसी फिल्म का गीत है जिसके गाने इस पूरी श्रृँखला में दो तीन बार नहीं बल्कि पूरे चार बार बजने वाले हैं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ 'तारे जमीं पर' कि जिसका मूल विषय नन्हे बच्चों की जिंदगी से जुड़ा है। अब जहाँ बच्चे हों और मौज मस्ती का माहौल ना हो ऍसा कहीं हो सकता है।

मेरे प्रिय गीतकार प्रसून जोशी ने बच्चों की इसी उमंग को बनाए रखा है अपने खूबसूरत बोलों के लिए। बच्चे कितना खुले दिमाग से सोचते हैं..उनकी कल्पनाएँ बिना किसी पूर्वाग्रह के रचित होती हैं..इस ख्याल को प्रसून इतने बेहतरीन अंदाज़ में शब्दों का जामा पहनाते हैं कि मन उनकी इस काबिलियत को नमन करने को होता है।

अब देखिए तो बारिश को आसमान के नल खुले होने से जोड़ना , या पेड़ की जगह किसी व्यक्ति के लबादा ओढ़ खड़े होने की बात हो। ये सोच सहज ही एक बाल मन को सामने ले आती है। प्रसून ने साथ ही इस गीत और इस फिल्म के अन्य गीतों में भी वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में रट्टेबाजी की अहमियत को आड़े हाथों लेते हुए मौलिक चिंतन को तरज़ीह देने पर बल दिया है। उनकी ये सोच निश्चय ही प्रशंसनीय है और इस गीत के माध्यम से एक अच्छा संदेश देने में सफल रहे हैं।



इस गीत को संगीतबद्ध किया है शंकर-अहसान-लॉए की तिकड़ी ने और इसे स्वर दिया है शान के साथ खुद आमिर खान ने। कुल मिलाकर ये एक ऍसा गीत है जो बच्चों के साथ साथ बड़ों को भी गुनगुनाने में बेहद आनंद देता है। मैंने इसके बोलों को गीत के साथ सुनते हुए लिखने की कोशिश की है ताकि गीत सुनते सुनते आप भी आमिर की तरह अक्को टक्को करते चलें :)।


चका चका ची चा चो चक लो रम
गंडो वंडो लाका राका टम
अक्को टक्को इडि इडि इडि गो
इडि पाई विडि पाई चिकी चक चो
गिली गिली मल सुलु सुलु मल
माका नाका हुकू बुकू रे
टुकू बुकू रे चाका लका
बिक्को चिक्को सिली सिली सिली गो
बगड़ दुम चगड़ दुम चिकी चका चो


देखो देखो क्या वो पेड़ है
चादर ओढ़े या खड़ा कोई
बारिश है या आसमान ने
छोड़ दिए हैं नल खुले कहीं
हो... हम जैसे देखें ये ज़हां है वैसा ही
जैसी नज़र अपनी
खुल के सोचें आओ
पंख जरा फैलाओ
रंग नए बिखराओ
चलो चलो चलो चलो
नए ख्वाब बुन लें

हे हे हे........
सा पा, धा रे, गा रे, गा मा पा सा
बम बम बम, बम बम बम बोले
बम चिक बोले, अरे मस्ती में डोले
बम बम बोले.....मस्ती में डोले
बम बम बोले..मस्ती में तू डोल रे


भला मछलियाँ भी क्यूँ उड़ती नहीं
ऐसे भी सोचो ना
सोचो सूरज, रोज़ नहाए या
बाल भिगोके ये, बुद्धू बनाए हमें
ये सारे तारे, टिमटिमाए
या फ़िर गुस्से में कुछ बड़बड़ाते रहें
खुल के सोचें आओ
पंख जरा फैलाओ
रंग नए बिखराओ
चलो चलो चलो चलो
नए ख्वाब बुन लें

हे हे हे........
बम बम बोले.....मस्ती में डोले
बम बम बोले..मस्ती में तू डोल रे

ओ रट रट के क्यूँ टैंकर फुल
...टैंकर फुल टैंकर फुल...
आँखें बंद तो डब्बा गुल
... डब्बा गुल डब्बा गुल...
ओए बंद दरवाजे खोल रे
...खोल रे खोल रे खोल रे...
हो जा बिंदास बोल रे
...बोल बोल बोल बोल रे
मैं भी हूँ तू भी है
मैं भी तू भी हम सब मिल के
बम चिक, बम बम चिक, बम बम चिक, बम बम चिक
बम बम बम

ऍसी रंगों भरी अपनी दुनिया हैं क्यूँ
सोचो तो सोचो ना
प्यार से चुन के इन रंगों को
किसी ने सजाया ये संसार है
जो इतनी सुंदर, है अपनी दुनिया
ऊपर वाला क्या कोई कलाकार है
खुल के सोचें आओ
पंख जरा फैलाओ
रंग नए बिखराओ
चलो चलो चलो चलो
नए ख्वाब बुन लें
बम बम बोले.....मस्ती में डोले
बम बम बोले..मस्ती में तू डोल रे



तो आइए सुनें १७ वीं पायदान का ये गीत





Tuesday, January 15, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १८ - हलके हलके रंग छलके, जाने अब क्या होने को है

तो वार्षिक संगीतमाला की १८ वीं पायदान पर गीत वो जिसे सुनते ही मन हल्का और प्रफुल्लित सा महसूस करता है। इसे आवाज़ दी प्रतिभावान गायक नीरज श्रीधर ने , बोल लिखे जावेद अख्तर ने और संगीतबद्ध किया विशाल‍-शेखर ने। २००५ में 'यू बोमसी एंड मी' में इन्हीं का गाया हुआ गीत 'कहाँ हो तुम मुझे बताओ' मुझे बेहद पसंद आया था और २००५ की संगीतमाला में वो नवीं पायदान का गीत बना था।

नीरज श्रीधर पहली बार लोगों की नज़र में तब चढ़े थे जब उन्होंने पुराने हिदी नग्मों को एक नए रूप में पेश किया था। , जो सामान्य रिमिक्स संगीत से अलहदा था। इसलिए इनके द्वारा पुनर्निर्मित वो चली वो चली...., छोड़ दो आँचल.... और हवा में उड़ता जाए.... जैसे गीत समीक्षकों द्वारा भी सराहे गए थे।
दिलचस्प बात ये है कि बॉम्बे वाइकिंग नामक बैंड की शुरुआत भारत में नहीं बल्कि स्वीडन जैसे देश में शुरु हुई, जहाँ वो पले बढ़े हैं। सुदूर पश्चिम के इस देश में इस तरह का नाम चुनने का कारण बस इतना था कि वो चाहते थे कि स्वीडन में उनके बैंड के भारतीय रिश्ते को लोग महसूस कर सकें। अपने शुरुआत के दिनों में मैकडानल्ड में काम करने वाले नीरज को संगीत में जैज (Jaaz) बेहद प्रिय है।

तो आइए लौटें गीत की तरफ जिसमें विशाल-शेखर की धुन ऐसी है जो गीत पर हावी नहीं होती पर उसे खूबसूरती से उभरने में सहायता प्रदान करती है। जावेद के बोल दिल में उमंगें जगाते हैं और नीरज की दिलकश आवाज़ मन को मोहती चली जाती है।

आँखों की हर डाली पर खिल गए....
फूल कई, जब दिल से दिल मिल गए....
आँखें आँखों से, कहने लगीं हैं, इक नई दास्तां.........
हलके हलके, रंग छलके, जाने अब क्या होने को है...

साहिल पे जैसे, आती हैं लहरा के मौजें
दिल में आई हैं उमंगें
भीगीं हवाएँ गाती हैं मीठी सी धुन में
जागी जागी हैं तरंगें
अज़नबी जो, कल मिले थे
फ़ासले उनके कम हो गए
हलके हलके, रंग छलके, जाने अब क्या होने को है

फूलों की रुत में भँवरे भी दीवाने से हैं
कलियाँ खिलती हैं शर्मीली
अब जिंदगी ने ओढ़ी है इक महकी महकी
ख्वाबों की चादर रँगीली
तुम से मिलके, साथ चलके
क्या से क्या देखो हम हो गए
हलके हलके रंग छलके, जाने अब क्या होने को है

तो आइए सुनें ''हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड' फिल्म से लिया हुआ ये प्यारा सा नग्मा



इस संगीतमाला के पिछले गीत

Sunday, January 13, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १९ - लमहा ये जाएगा कहाँ ..लमहा ये जाएगा कहाँ ..

वार्षिक संगीतमाला की १९ वीं पायदान आपके सामने हैं मित्रों। और इस पर गाना वो जो अस्सी के दशक में बनी फिल्म 'गोलमाल' फिल्म ले उस अंतरे की याद दिलाता है जिसे गुलज़ार साहब ने लिखा था । याद है ना 'आने वाला पल जाने वाला है' का ये जुमला

इक बार वक़्त से लमहा गिरा कहीं
वहाँ दास्तां मिली लमहा कहीं नहीं


जीवन के इस सफ़र में कितने ही सुनहरे लमहों से हम दो चार होते हैं पर समय रहते उन के साथ जीने की इच्छा को दबाते हुए दौड़ में आगे बढ़ जाते हैं। पर मुकाम पर पहुंच जाने के बाद लगता है अरे ! बहुतेरी बातें तो करनी रह ही गईँ... ।

और फिर याद आती है अतीत की गर्द से झांकते उन लमहो की ...पर क्या हम उन्हें फिर से तालाश पाते हैं? शायद नहीं।
ऍसे ही लमहों की कहानी लेकर आएँ हैं नवोदित गीतकार प्रशांत पांडे। देखिए तो वो क्या कह रहे हैं...


खुशनुमा आवारा सा, बेसबब, बेचारा सा लमहा था
जिंदगी के आसमां में टूटा सा वो तारा था, तनहा था
कह रहे है जर्रे देखो, रास्तों से गुजरा था यहाँ
ढूंढते हैं उसको लेकिन, गायब हैं पैरों के निशान
लमहा ये जाएगा कहाँ ..लमहा ये जाएगा कहाँ...
लमहा कहाँ ये खो गया, इक पल में तनहा हो गया

आए जो मौसम नए, मंजर बदल जाएँगे
शाखों से पत्ते गिरे, गिरके किधर जाएँगे
कह रहे हैं जर्रे देखो, रास्तों से गुजरा था यहाँ
ढूंढते हैं उसको लेकिन, गायब हैं पैरों के निशान
लमहा ये जाएगा कहाँ ..लमहा ये जाएगा कहाँ...
लमहा कहाँ ये खो गया, इक पल में तनहा हो गया

शबनम का कतरा है ये, शोले बुझा जाएगा
कर जाएगा आँखें नम, यादों में बस जाएगा
बारिशों की बूंदें बरसे, बादलों के दिल हल्के हुए
जाने पहचाने चेहरों के, अक्स भी क्यूँ धुंधले हुए
लमहा ये जाएगा कहाँ ..लमहा ये जाएगा कहाँ...
तनहा ये जाएगा कहाँ... तनहा ये जाएगा कहाँ


और उनके खूबसूरत बोलों को सँवारा है के. मोहन ने अपनी आवाज़ से। तो आइए सुनें फिल्म दिल दोस्ती ईटीसी का ये गीत



इस संगीतमाला के पिछले गीत

Friday, January 11, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २० - जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए, जितने भी मौसम दिए...सब नम दिए

जैसे-जैसे वार्षिक संगीतमाला की ऊपर की पायदानों की ओर रास्ता खुल रहा है गीतों को क्रम देने की मशक्कत बढ़ती जा रही है। एक बार क्रम बना लेने के बाद मैं बार-बार उन गीतों को सुनता रहता हूँ और फिर लगता है कि नहीं, इस गीत को कुछ और ऊपर बजना चाहिए । इसी वज़ह से २० वीं पायदान के गीत ने पाँच पायदानों की छलाँग लगा कर रुख किया है १५ वीं पायदान का :)। और २० वीं पायदान पर सीधे विराज रहा है ये नया गीत।

इस संगीतमाला में ये दूसरी बार ऍसा हुआ है कि किसी पायदान पर संगीतकार ही गायक का किरदार सँभाल रहे हैं। और मजे की बात ये है कि इस युवा संगीतकार का आज यानि ११ जनवरी को २२ वाँ जन्मदिन है.

जी हाँ दोस्तों मैं बात कर रहा हूँ मिथुन शर्मा की जिन्होंने पहली बार मेरी २००६ की संगीतमाला के ५वें नंबर के गीत 'तेरे बिन मैं कैसे जिया....' के रूप में प्रवेश किया था और जिनके फिल्म अनवर के दो गीत 'मौला मेरे' और 'तो से नैना लागे सांवरे' २००६ की मेरी सूची में आते-आते रह गए थे। खैर मिथुन प्रतिभावान हैं इसमें तो कोई शक नहीं है पर ये प्रतिभा बहुत कुछ उन्हें खानदानी विरासत के रूप में मिली है। वे संगीतज्ञ नरेश शर्मा के पुत्र और प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत प्यारेलाल वाले) के भतीजे हैं।

बीसवीं पायदान पर जो गीत मैंने चुना है वो फिल्म 'दि ट्रेन' से है। मिथुन का गाने का अंदाज बहुत कुछ आतिफ असलम जैसा है और बहुधा लोग उनकी आवाज़ को सही नहीं पकड़ पाते हैं। पर २० वीं पायदान पर इस गीत के होने की वज़ह सईद कादरी के बोल भी हैं। गीत का ये अंतरा मुझे सबसे पसंद है

जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए
जितने भी मौसम दिए...सब नम दिए


इक मुकम्मल कशमकश है जिंदगी
उसने हमसे की कभी ना...दोस्ती

जब मिली, मुझको आँसू के, वो तोहफे दे गई
हँस सके हम, ऍसे मौके कम दिये


जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए
जितने भी मौसम दिए...सब नम दिए


तो सुनिए २० वीं पायदान का ये गीत जो मौसम के नाम से भी जाना जाता है



और हाँ चलते-चलते एक बात और इस गीतमाला के आगे के सारे गीतों में आप मनभावन गीत का टैग देखेंगे यानि ये ऍसे गीत हैं जिनका ना केवल संगीत पर उनके बोल भी मुझे दिल से छूते हैं।


इस संगीतमाला के पिछले गीत

Thursday, January 10, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २१ - आँखों में तेरी अज़ब सी अज़ब सी अदाएँ हैं...

'ओम शांति ओम' मुझे कोई खास पसंद नहीं आई पर युवा संगीतकारों की जोड़ी विशाल और शेखर का संगीत सराहनीय लगा। तो हुजूर इस गीत को सुनने के पहले कुछ दिलचस्प बातें विशाल और शेखर की युगल जोड़ी के बारे में। विशाल यानि विशाल ददलानी एक संगीतकार के साथ गायक भी हैं और मुंबई के रॉक बैंड 'पेंटाग्राम' के सदस्य भी, वहीं शेखर यानि शेखर रवजियानी ने भी शास्त्रीय संगीत सीखा हुआ है।

वैसे तो झंकार बीट्स में अपने उम्दा संगीत की वजह से ये जोड़ी चर्चा में आई पर पिछले साल इनका सितारा तब चमका जब ए. आर. रहमान ने किन्हीं कारणों से 'ओम शांति ओम' का संगीत देने का विचार त्याग दिया और ये फिल्म विशाल‍ ‍शेखर की झोली में आ गिरी।

तो २१ वीं पायदान पर गीत है..आँखों में तेरी अजब सी.. जिसे लिखा जावेद अख्तर साहब ने । जावेद साहब की ये खूबी है कि वो अपने गीतों में बिना किसी क्लिष्टता के वो खूबसूरती ले आते हैं जो आम गीतों में नहीं मिलती। गीत का मुखड़ा तो प्यारा है ही

आँखों में तेरी अज़ब सी अज़ब सी अदाएँ हैं
दिल को बना दे जो पतंग
साँसे ये तेरी, वो हवाएँ हैं

और अंतरे में उनकी ये सोच भी खूब लगती है

तेरे साथ साथ ऍसा, कोई नूर आया है
चाँद तेरी रोशनी का हल्का सा इक साया है...

तो पहले देखिए अमानत अली खाँ को सारेगामा पर ये गीत गाते हुए साथ में दीपिका भी दिखेंगी अपनी खबसूरत आँखों को झपकाते हुए.



और फिर केके की आवाज़ में ये गीत सुनिए









इस संगीतमाला के पिछले गीत

Tuesday, January 08, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २२ - तो फिर आओ, मुझको सताओ...

इस संगीतमाला के २२ वें नंबर का गीत एक अलग सा मूड लिए हुए है। इसे गाया है पाकिस्तान के नवोदित गायक मुस्तफा ज़ाहिद ने।

मन मायूस हो और दिल बेहद भरा भरा सा तो अपनी आंतरिक पीड़ा बाहर निकालने की छटपटाहट हृदय को व्याकुल कर ही देती है और अपनी हताशा को निकलने के लिए ऍसे ही स्वर प्रस्फुटित होते हैं। बड़ी बखूबी निभाया है मुस्तफा ने इसे। दरअसल मुस्तफा ज़ाहिद ने ये गीत अपने एलबम Rozen-e-deewar (राक्सन) में खुद रचा था और वो २००६ में पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय हुआ था।

राहत फतेह अली खां और उसके बाद आतिफ असलम के संगीत को भारत के लोगों के बीच पहुँचाने वाले निर्देशक महेश भट्ट ने जब मुस्तफा ज़ाहिद का ये एलबम सुना तो उसे वो अपनी फिल्म 'आवारापन' में लेने के लिए तैयार हो गए। संगीत को प्रीतम ने फिर से पुनः संयोजित किया और सईद कादरी ने भी बोलों में और असर लाने के लिए थोड़े बदलाव किए। मैंने इस गीत के दोनों रूप आरंभिक और परिवर्त्तित दोनों सुने हैं और उस हिसाब से प्रीतम और कादरी साहब ने गीत को भावनाओं को और पुरजोर ढ़ंग से रखा है।

पर गीत के असली हीरो मुस्तफा ज़ाहिद हैं। २५ वर्षीय मुस्तफा को जब ये गीत गाने को कहा गया तो उन्होंने स्टूडिओ की पूरी बत्तियाँ बंद करने की मांग की। ज़ाहिद कहते हैं कि फिल्म के निर्देशक मोहित सूरी ने कहा कि ये गीत फिल्म के climax में आता है और तुम्हें इसे इस तरह गाना है कि इसकी हर पंक्ति से वो दर्द उभरे जो नायक का किरदार महसूस कर रहा है। तो मुस्तफा ज़ाहिद ने ये गाना घने अंधकार में गाया और जब वो रिकार्डिंग स्टूडियो से बाहर निकले तो उनकी आँखों की लाली किसी से छुप नहीं रही थी।

तो फिर आओ मुझको सताओ
तो फिर आओ मुझको रुलाओ

दिल बादल बने, आँखें बहने लगें
आहें ऍसे उठें जैसे आँधी चले
तो फिर आओ मुझको सताओ
तो फिर आओ मुझको रुलाओ
आ भी जाओ.....

ग़म ले जा तेरे, जो भी तूने दिए
या फिर मुझको बता, इनको कैसे सहें
तो फिर आओ मुझको सताओ
तो फिर आओ मुझको रुलाओ,
आ भी जाओ, आ भी जाओ,......

अब तो इस मंज़र से, मुझको चले जाना है
इन राहों पे मेरा यार है
उन राहों को मुझे पाना है
तो फिर आओ मुझको सताओ
तो फिर आओ मुझको रुलाओ,
आ भी जाओ, आ भी जाओ......

तो जनाब आप भी शांत माहौल में इस गीत को सुनें इसका असर खुद-ब-खुद महसूस करेंगे



इस संगीतमाला के पिछले गीत


Sunday, January 06, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २३- कसक उठी मेरे मन में पिया मुझे गले लगा ले....

वार्षिक संगीतमाला की २३ वीं सीढ़ी में दिशा बदलते हैं मौज मस्ती से मेलोडी की ओर। कई गीतें ऐसे होते हैं जिनके बोल तो सीधे सहज होते हैं, पर गीत की मेलोडी ऍसी होती है कि आप उस के साथ डूबने लगते हैं। तो इस पायदान पर आपका इंतजार कर रहा है ऍसा ही एक गीत जिसकी धुन बनाई और गाया आनंद राज आनंद ने संभवतः लिखा भी उन्होंने ही।


पूरे गीत का प्रवाह ऍसा है कि आप के मन में प्रेम की एक निर्मल स्वच्छ धारा सी बहती महसूस होती है। बांसुरी की तान पूरे गीत के साथ चलती है जो मन को काफी सुकून पहुँचाती है।

अब थोड़ी बातें, इस गीत के पीछे के शख्स के बारे में। आनंद राज 'आनंद' , दिल्ली के ऍसे परिवार से आते हैं जो आभूषणों के व्यवसाय से जुड़ा था। बचपन से ही उनकी संगीत में रुचि थी। जब वे स्कूल में पढ़ते थे तब भी संगीत कार्यक्रम में फिल्मी गाने ना चुन कर अपने द्वारा स्वरबद्ध रचना को सुनाना पसंद करते थे। मुंबई नगरिया में उनका आगमन १९९२ में हुआ पर एक गायक, गीत और संगीतकार के तीनों रूपों को निभाने के अवसर उन्हें ज्यादा नहीं मिले। मुंबई फिल्म उद्योग ने उन्हें गंभीरता से तब लेना शुरु किया जब उनका एक गीत 'छोटा बच्चा समझ के मुझे ना धमकाना रे' लोकप्रिय हो गया। फिर निर्माता निर्देशक संजय गुप्ता की टीम के वो लगभग स्थायी सदस्य हो गए और 'काँटे' से लेकर आज की 'वेलकम' तक उनका सफ़र बदस्तूर ज़ारी है।

तो आईए सुनें आनंद राज 'आनंद' को 'छोड़ो ना यार' के इस गीत में




इस संगीतमाला के पिछले गीत

Saturday, January 05, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २४ - झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम...

पिछले गीत ने अगर थिरकने को मजबूर ना किया हो तो अब भी देर नहीं हुई इस बार गुलज़ार के बोलों पर ही झूम लें। हाँ हुजूर सही पहचाना आपने इस संगीतमाला की २४ वीं पायदान पर गीत वो जिसे लिखने के पीछे प्रेरित किया गुलज़ार को सत्तर के दशक की इस कव्वाली ने। बचपन में मैंने भी इसका खूब आनंद उठाया था। अगर बोल ना याद आ रहे हों तो मैं आपकी मदद कर देता हूँ

काली घटा है, मस्त फ़जां है
काली घटा है, मस्त फ़जां है जाम उठा कर घूम घूम घूम
झूम बराबर झूम शराबी, झूम बराबर झूम....


नज़ा शोलापुरी की इस रचना को आवाज़ दी थी १९७४ में बनी फिल्म 5 Rifles में अजीज नजां ने और सुनने वाले झूम-झूम के मस्त हो गए थे। पर गुलज़ार ने फिल्म 'झूम बराबर झूम' में जो गीत रचा उसमें शराब का नशा तो नहीं रहा पर विशुद्ध पंजाबी तड़का जरूर लगा दिया। इस गीत के फिल्म में तीन रूप हैं। एक में शंकर महादेवन का सोलो है तो दूसरे में वो सुनिधि चौहान और जुबीन गर्ग के साथ हैं और तीसरे में सुखविंदर सिंह, महालक्ष्मी अय्यर और केके के साथ सुर मिला रहे हैं।

गीत के पहले रूप में गुलज़ार इश्क की पेचदियों से उलझ रहे हैं.. पूरे बोल के लिए ये लिंक देखें

ये इश्क पुराना पापी
हर बार खता करता है, रब्बा….
हर बार बचाता हूं मैं
हर बार ये जा मरता है, रब्बा….
हो पास कोई आ गया तो
रास कोई आ गया तो
बार बार कल्रेजे पे ना मार अखियाँ
उड़ती उड़ती अखियों के
लड़ गये पेचे लड़ गये वे
गीत लगा के झूम झूम झूम
झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम....


गुलज़ार वहीं तीसरे रूप में चाँद, रात और आसमान से खेलते हुए वे अपने स्वाभाविक रंग में दिखाई पड़ते हैं

हो चाँद की उतार ली है दोनों बालियाँ
आजा आजा हाथ मार दे तालियाँ
ओ बिल्लोनी बिल्लोनी हाथ मार दे तालियाँ
आजा चाँदनी कूटेंगे, आसमान को लूटेंगे
चल धुआँ उड़ा के झूम झूम
झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम....


पर इस गीत में, बोल से ज्यादा मुझे शंकर-‍अहसान‍-लॉए की सांगीतिक व्यवस्था ज्यादा आकर्षित करती है। गीत की शुरुआत से ही की बोर्ड, गिटार, बैगपाइपर, ड्रम और ढोल सब मिलकर ऐसा अदभुत समा बनाते हैं जिसकी मस्ती में आप भी झूमने को विवश हो जाते हैं। तो आनंद लीजिए इस चौबिसवें नंबर के गीत का




इस गीत का दूसरा वर्जन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।

Friday, January 04, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान २५- बस दीवानगी दीवानगी है...

जैसा कि आपसे वादा था, केरल के १३ दिन के प्रवास के बाद पुनः हाजिर हूँ वार्षिक संगीतमाला २००७ में पिछले साल के अपने चुनिंदा २५ गीतों को लेकर। विगत तीन वर्षौं से मेरी ये कोशिश रही है कि आज के इस धूम धड़ाकेदार संगीत के दौर में जो कुछ सुरीला और अर्थपूर्ण हो रहा उसे आप तक पहुंचा सकूँ। कई बार कह ही चुका हूँ कि रेडिओ सीलोन की सिबाका गीतमाला से मेरा जुड़ाव बचपन से रहा है। इसलिए इस श्रृंखला में भी मैं आपको २५ गीतों की सीढ़ियाँ चढ़वाता हुआ, अपनी पहली पायदान पर ले जाउँगा बहुत कुछ अमीन चाचा के अंदाज़ में। इस संगीतमाला में वर्ष २००७ में जिन फिल्मों के म्यूजिक रिलीज हुए हैं उन्हें लिया गया है। इसी वज़ह से गुरु सरीखी फिल्मों के गीतों का समावेश नहीं है क्योंकि उनकी म्यूजिक रिलीज २००६ में ही हो गई थी।

जैसा हमेशा से होता आया है नए साल का आग़ाज मस्ती भरे कुछ ऍसे गीतों से जिन्होंने आम जनमानस को थिरकने पर मज़बूर किया अच्छे संगीत के बल पर। तो बहनों और भाईयों 'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमाला २००७ की २५ वीं पायदान पर गाना वो जिसे गाया राहुल सक्सेना, शान, उदित नारायण, श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान ने, लिखा जावेद अख्तर ने पर ये अभिनीत किया गया मुंबई मायानगरी के ३१ जगमगाते सितारों द्वारा। वैसे तो फराह खान चाहती थीं कि ये गीत आमिर, सैफ, शाहरुख और संजय दत्त मिलकर गाएँ। पर आमिर , तारे जमीं पर की शूटिंग पर इस कदर व्यस्त रहे कि समय नहीं निकाल पाए। लिहाजा गीत को उनके बगैर ही शूट करना पड़ा। अमिताभ , अभिषेक की शादी में वयस्त रहे। अब बाकी स्टार को फराह ने इस गीत में कैसे नचाया वो तो आप इस वीडिओ में देख सकते हैं पर जब धर्मेंद्र पा जी की बारी आई तो फराह ने अपने घुटने टेक दिए और उनसे कहा कि आप जो कर सकते हैं कर दीजिए।


पूरी फिल्म में इस गीत का मैंने सबसे ज्यादा आनंद लिया और उसका पूरा श्रेय विशाल-शेखर के मधुर संगीत और फराह की कोरियोग्राफी को देना चाहिए। तो आप भी सुनिए, तब तक मैं कल फिर हाज़िर होता हूँ २४ वीं पायदान के गीत के साथ
 

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