Wednesday, February 27, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ पायदान संख्या ३ हीरे मोती मैं ना चाहूँ, मैं तो चाहूँ संगम तेरा.... कैलाश खेर

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी सुरक्षित है एक ऍसी आवाज़ के लिए जो अपने आप में दिव्य है। एक ऍसा कलाकार जो जब अपनी पूरी लय में डूबा होता है तो ऍसा लगता है कि परम पिता परमेश्वर तक उसके गायन की गूँज पहुँच रही होगी। जी हाँ मैं कैलाश खेर की बात कर रहा हूँ। मेरठ की गलियों से दिल्ली और फिर अँधेरी के प्लेटफार्म से काली होंडा सिटी की सवारी करने वाले कैलाश के सांगीतिक सफ़र की दास्तां तो मैं पहले यहाँ सुना ही चुका हूँ।

कैलाश की गायिकी में उनके बचपन के ग्रामीण परिवेश और पिता के अध्यात्म प्रेम का सीधा असर है। कैलाश कहा करते हैं, कि बचपन से उनके घर में संतों, फकीरों का आना जाना लगा रहता था। एकतारे पर गाते हुए जब कैलाश उन्हें देखते तो उनकी बातों का पूर्ण अर्थ ना समझते हुए उसे गाने लगते। लोक धुनों के प्रति कैलाश का झुकाव भी इसी परिवेश की उपज रहा है। कैलाश का मानना है जो गीत जीवन और प्रकृति के सत्यों को उद्घाटित करे वो ही मन को सबसे ज्यादा सुकून देता है और वो इसी बात को मन में रखकर अपने गीतों का ताना बाना बुनते हैं।


इस श्रृंखला का ये एकमात्र गैर फिल्मी गीत है। तीसरी पायदान का ये गीत कैलाश के इस साल रिलीज हुए एलबम झूमो रे से लिया गया है। यूँ तो सलाम-ए-इश्क में कैलाश खेर का गीत या रब्बा..... भी मुझे बेहद पसंद है पर मैं उसे इसलिए इस गीतमाला में शामिल नहीं कर सका कि गुरु की तरह सलाम- ए-इश्क का संगीत भी पिछले साल ही रिलीज हो गया था और दुर्भाग्यवश मै उसे उस वक्त सुन नहीं पाया था।

कैलाश खेर के लिखे इस गीत की धुन बनाने में सहयोग दिया है उनके बैंड के सदस्य प्रकाश कामथ और नरेस कामथ ने। इन तीनों ने मिलकर इस गीत के लिए अद्भुत संगीत रचा है। मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है अंतरे के बीच ताली और सेतार का प्रयोग। सेतार इरान का वो वाद्ययंत्र है जिससे भारतीय सितार विकसित हुआ। इस गीत में सेतार बजाने के लिए कैलाश ने इरान के सेतार वादक तहमुरेज़ को बुलाया था।

तो आइए पढ़ें प्रेम में पूरी तरह अपने आप को समर्पित करने वाली प्रेयसी की अपने सैयाँ के लिए ये प्रणय निवेदन...

हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं तो तेरी सैयाँ.. तू है मेरा
सैयाँ सैयाँ....


तू जो छू ले प्यार से, आराम से, मर जाऊँ
आ जा चंदा बाहों में, तुझ में ही गुम हो जाऊँ मैं
तेरे नाम में खो जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


मेरे दिन खुशी से झूमें गाएँ रातें
पल पल मुझे डुबाएँ रातें जागते
तुझे जीत जीत हारूँ, ये प्राण प्राण वारूँ
हाए ऍसे मैं निहारूँ, तेरी आरती उतारूँ
तेरे नाम से जुड़े हैं सारे नाते
सैयाँ सैयाँ.......


बनके माला प्रेम की तेरे तन पे झर झर जाऊँ
मैं हूँ नैया प्रीत की संसार से हर जाऊँ मैं
तेरे प्यार से तर जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


ये नरम नरम नशा है बढ़ता जाए
कोई प्यार से घूँघटिया देता उठाए
अब बावरा हुआ मन, जग हो गया है रौशन
ये नई नई सुहागन, हो गई है तेरी जोगन
कोई प्रेम की पुजारन मंदिर सजाए
सैयाँ सैयाँ.......


हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं ना जानूँ तू ही जाने
मैं तो तेरी, तू है मेरा




(चित्र साभार हिंदुस्तान टाइम्स)

Sunday, February 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ४ - पूछ रहे हैं स्वानंद कि क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल ?

वार्षिक संगीतमाला की चौथी कड़ी समर्पित है गीतकार, गायक और संवाद लेखक, रंगमंच कर्मी स्वानंद किरकिरे को जिन्होंने 'परिणिता 'और 'हजारों ख्वाहिशें ऍसी' के गीतों से मेरे दिल में पिछले तीन सालों से एक विशेष जगह बना ली थी। खोया खोया चाँद के इस गीत को जब मैंने उड़ते उड़ते सुना तो मैं आवाक रह गया कि इन्होंने तो मज़ाज लखनवी की नज़्म आवारा की पंक्तियाँ ही इस्तेमाल कर ली हैं। उस वक्त ये ध्यान नहीं रहा कि गीत की अगली पंक्ति में बकायदा स्वानंद ने 'मज़ाज' की प्रेरणा को चिन्हित किया था। वैसे तो मुझे पूरा गीत ही भाता है पर इसका ये हिस्सा मेरे लिए बेहद खास है ,लगता है अपनी ही भावनाओं को शब्द मिल गए हैं

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल

और जब कोई लेखक या गीतकार बार-बार ये एहसास दिलाते रहे कि वो आपकी बात कर रहा है तो दिल में उसकी जगह विशिष्ट हो जाती है। चाहे वो रात हमारी तो चाँद की सहेली हो..... या फिर बावरा मन देखने चला एक सपना..... स्वानंद ने हमेशा मेरी अनुभूतियों को छुआ है। आखिर स्वानंद में ये खासियत कहाँ से आई? चलिए ढ़ूंढ़ते हैं इस जवाब का हल उन्ही के कथ्यों द्वारा.. ..

क्या आपको पता है कि स्वानंद वाणिज्य के स्नातक हैं और उनके माता पिता खुद कुमार गंधर्व के शिष्य रहे हैं। पर स्वानंद का कहना है कि उन्होंने कभी संगीत के क्षेत्र में जाने का सपना नहीं देखा था। युवावस्था में वो यही सोचा करते कि माता पिता तो संगीत से जुड़े हैं ही, मैं कुछ नया क्यूँ ना करूँ ? उनकी ये सोच उन्हें ले गई नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में। आज जिस बहुमुखी प्रतिभा का जौहर वो दिखा रहे हैं वो बहुत कुछ रंगमंच से जुड़े उनके दिनों की देन हैं। वो खुद कहते है कि नाटक में तो हमें सब करना होता था। धारावाहिक की कहानियों से लेकर संवाद लेखन तक, निर्देशन से गीतकार तक का ये सफ़र स्वानंद के लिए अपने विरासत मे मिले संस्कारों की तरफ बढ़ना भर है।

हाल ही में स्वानंद ने अपने एक साक्षात्कार में कहा
" मैं अभी भी बोलचाल की भाषा और दैनिक जीवन में दिखने वाले बिंबों का प्रयोग करता हूँ। नए जमाने के गीतकार की हैसियत से मैं सिर्फ तितलियों और नदी जैसे रुपकों का इस्तेमाल बारहा नहीं कर सकता। एक लेखक मूलतः अपने लिए लिखता है पर व्यवसायिक बंदिशों की वज़ह से ऐसा हमेशा नहीं हो पाता। आप भले ही खाना अच्छा बनाते हों पर एक खानसामे की हैसियत से ये भी जरूरी हे कि अगर आप ५ व्यंजन अपने ग्राहकों को खिलाएँ तो सात अपनी ओर से भी परोसें।"

गुलज़ार की तरह उनका मानना है कि गीत ऍसे ना हों जिनमें सब स्पष्ट हो, कुछ ऍसा भी होना चाहिए जो सुनने वाले को सोचने को मज़बूर करे उसे बार बार उस गीत को सुनने के लिए विवश करे। स्वानंद गीतकार का किरदार किसी भी हालत में संगीतकार से कम नहीं मानते। वो कहते हैं कि मैं खुद एक गीतकार बना क्यूंकि गाने सुनते वक्त मेरा ध्यान सबसे ज्यादा गीत के बोलों पर रहता था। आखिर सही तो कहते हें वो, ज्यादातर गीत जो हमें याद रह जाते हैं वो उनके बोलों की वज़ह से।

तो चलिए अब सुनते हैं ये गीत 

आज शब जो चाँद ने है रूठने की ठान ली,
गर्दिशों में है सितारे बात हमने मान ली!
अंधेरी स्याह जिंदगी को सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

जिंदगी सवालों के जवाब ढूँढ़ने चली,
जवाब में सवालों की इक लंबी सी लड़ी मिली।
सवाल ही सवाल हैं सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली!

जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
एक दो का ज़िक्र क्या मैं सारे नोच लूँ !
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
सितारे नोच लूँ मैं सारे नोच लूँ

क्यूँ तू आज इतना वहशी है, मिज़ाज में मज़ाज़ है ऐ गम ए दिल
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोए खोए चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
कयूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,


खोया खोया चाँद के इस गीत की धुन बनाई शान्तनु मोइत्रा ने और स्वानंद के साथ सहयोगी स्वर है उनके पुराने जोड़ीदार अजय झींगरन
 


इस संगीतमाला के पिछले गीत



  • पायदान १८ - हलके हलके रंग छलके ..... गीत - जावेद अख्तर संगीत - विशाल‍-शेखर चलचित्र - हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड
  • पायदान १९ - लमहा ये जाएगा कहाँ..... गीत - प्रशांत पांडे संगीत - अग्नि चलचित्र - दिल दोस्ती ईटीसी
  • पायदान २० - जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए... गीत - सईद क़ादरी संगीत - मिथुन चलचित्र - दि ट्रेन
  • Friday, February 22, 2008

    सुदर्शन फ़ाकिर सहज शब्दों में गहरी बात कहने वाला बेमिसाल शायर :मेरी श्रृद्धांजलि

    कल यूनुस के चिट्ठे पर सुदर्शन फ़ाकिर के ना रहने की खबर पढ़ कर कलेजा धक से रह गया। सुदर्शन उन शायरों में से थे जिसने मेरे जैसे आम संगीत प्रेमी को ग़ज़ल से जोड़ा। उर्दू की ज्यादा जानकारी ना रखने वालों को भी गज़लों की ओर मुखातिब करने में उनका योगदान कोई भुला नहीं सकता। पिछले एक साल से उन पर आधारित एक श्रृंखला शुरु करने की मेरी मंशा थी पर ये पता ना था कि मैं अपनी ये इच्छा पूरी करूँ उससे पहले ही ये महान शायर दुनिया से रुखसत हो जाएगा।

    सुदर्शन साहब ने अपने जीवन का एक अहम हिस्सा पंजाब के शहर जालंधर में बिताया। जालंधर के डी ए वी कॉलेज से राजनीति शास्त्र और अंग्रेजी में परास्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले फ़ाकिर ७३ साल की उम्र में एक लंबी बीमारी के बाद गत सोमवार को अपना शहर छोड़ गए। युवावस्था से फ़ाकिर को रंगमंच और शायरी का शौक था। कॉलेज के जमाने में मोहन राकेश का लिखा नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का उन्होंने निर्देशन किया और वो जनता द्वारा काफी सराहा भी गया। कुछ दिनों तक उन्होंने रेडिओ जालंधर में काम किया और फिर मुंबई चले आए।

    अस्सी के दशक में जगजीत-चित्रा की जोड़ी को जो सफलता मिली उसमें सुदर्शन फा़किर की लिखी नायाब ग़ज़लों का एक अहम हिस्सा था। वो कागज़ की कश्ती.. इश्क़ ने गैरते जज़्बात..और पत्‍थर के ख़ुदा पत्‍थर के सनम पत्‍थर के ही इंसां पाए हैं... का जिक्र तो यूनुस अपनी पोस्ट में कर ही चुके हैं । सुदर्शन साहब की जो नज़्में और ग़ज़लें मेरे दिल के बेहद करीब रहीं हैं उनका एक छोटा सा गुलदस्ता मैं अपनी इस प्रविष्टि के माध्यम से श्रृद्धांजलि स्वरूप उन्हें अर्पित करना चाहता हूँ....

    बात १९९४ की है जब इनकी ये ग़ज़ल सुनी थी और इसका नशा वर्षों दिल में छाया रहता था । आज भी जब इनकी ये ग़ज़ल गुनगुनाता हूँ तो वही मस्ती मन में समा जाती है।



    चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी
    शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गयी
    गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है
    हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    लबों से लब जो मिल गये, लबों से लब जो सिल गये
    सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी


    जगजीत जी ने इस ग़ज़ल को गाया भी बड़ी खूबसूरती से है।
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    फ़ाकिर ने कुछ फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। फिल्म यलगार के संवाद लेखन भी उन्होंने किया। NCC कैम्पस में गाया जाने वाला समूह गान उन्हीं का रचा हुआ है। पर असली शोहरत उन्हें अपनी ग़ज़लों से ही मिली। सीधे सहज शब्दों से गहरी बात कहने का हुनर उनके पास था। अब इन्हीं शेरों पर गौर करें मरी मरी सी जिंदगी को ढ़ोने की मजबूरी पर क्या तंज कसे हैं उन्होंने बिना किसी कठिन शब्द का सहारा लिए हुए


    किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
    मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी
    फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो
    अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर'
    भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


    आइए सुने इस ग़ज़ल को चित्रा सिंह की आवाज़ में
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    सुदर्शन फ़ाकिर ने ना केवल अपनी ग़जलों से कमाल पैदा किया बल्कि कई खूबसूरत नज़्में भी लिखीं। उनकी ये नज़्म मुझे सरहद पार के एक मित्र से करीब दस वर्षों पहले पढ़ने को मिली और ये तभी से मेरी प्रिय नज़्मों में एक है।

    ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे
    किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें
    मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
    न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें

    अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी
    हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का
    लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे
    मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का

    मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये
    मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे
    ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो
    कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे

    जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा
    नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से
    रवायत है शायद ये सदियों पुरानी
    शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से


    फ़ाकिर की एक और खूबसूरत ग़ज़ल है शायद मैं ज़िन्दगी की सहर जिसे गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है..


    शायद मैं ज़िन्दगी की सहर ले के आ गया
    क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

    ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
    अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

    नश्तर है मेरे हाथ में, कांधों पे मैक़दा
    लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर लेके आ गया

    "फ़ाकिर" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
    इक ज़ख़्म भर गया था इधर लेके आ गया


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    फ़ाकिर के बारे में उनके मित्र कहते हैं कि वो अपने आत्मसम्मान पर कभी आंच नहीं आने देते थे। छोटी छोटी बातों पर वे कभी समझौता नहीं करते थे। फ़ाकिर ने अपनी शायरी में जिंदगी और समाज के अनेक पहलुओं को छुआ चाहे वो बचपन की यादें हो, युवावस्था के स्वप्निल दिन, समाज की असंवेदनशीलता हो या बढ़ती सांप्रदायिकता। मिसाल के तौर पर उनकी ये ग़ज़ल देखें..

    आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
    ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है

    जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
    फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

    अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
    अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

    ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर"
    वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

    फ़ाकिर आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी भाषाई क्लिष्टता से मुक्त सीधे दिल तक पहुँचने वाली शायरी हमेशा हमारे साथ रहेगी।

    सुदर्शन साहब की ग़जलों का संग्रह आप कविताकोश में पढ़ सकते हैं
    (सुदर्शन फ़ाकिर के बारे में व्यक्तिगत जानकारी पंजाब के अंग्रेजी अखबार 'दि ट्रिब्यून' से साभार)

    Tuesday, February 19, 2008

    वार्षिक संगीतमाला 2007 : पायदान संख्या 5 - तेरे बिन, सन सोणिया कोई होर नहीं ओ लभना

    हाँ तो दोस्तों करीब डेढ़ महिने की संगीतमय यात्रा को पूरा कर मैं आ पहुँचा हूँ इस संगीतमाला की 5 वीं सीढ़ी पर। अब इस गीत के बारे में लिखने के लिए मुझे कुछ ज्यादा नहीं करना क्योंकि पिछले सितंबर में इस के बारे में मैं विस्तार से लिख चुका हूँ। जी हाँ पाँचवी पायदान के हीरो हैं रब्बी शेरगित जिनके इस गीत को फिल्म दिल्ली हाइट्स में शामिल किया गया था। तो आइए एक बार फिर से बात करें इस गीत के बारे में....

    पश्चिमी रॉक , लोक संगीत और सूफ़ियाना बोल का मिश्रण सुनने में आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता। ज़ाहिर है जरुर लगता होगा। मुझे भी लगा था जब मैंने इस नौजवान को नहीं सुना था। पर 2005 में जब मैंने 'बुल्ला कि जाणा मैं कौन' सुना तो रब्बी शेरगिल की गायिकी का मैं कायल हो गया। आज, बुल्ले शाह के सूफी लफ़्जों को गिटार के साथ इतने बेहतरीन ढ़ंग से संयोजित कर प्रसिद्धि पाने वाले रब्बी शेरगिल किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। आज की तारीख़ में उनके पास प्रशंसकों की अच्छी खासी जमात है। पर रब्बी को ये शोहरत आसानी से नहीं मिली।

    सितंबर १९८८ में ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कान्सर्ट में संगीत को अपना पेशा चुनने की ख़्वाहिश रखने वाले रब्बी सत्रह साल बाद अपना खुद का एलबम निकालने का सपना पूरा कर पाए। ख़ैर बुल्ला ..के बाजार में पहुँचने की दास्तान तो अपने आप एक पोस्ट की हकदार है, वो बात कल करेंगे। आज चर्चा करेंगे रब्बी के गाए इस गीत की जिसे एक बार सुन कर ही मन प्रेमी के शब्दों की मासूमियत में बहता चला जाता है। अब देखिए ना, पंजाबी मेरी जुबान नहीं फिर भी इस गीत के बोल, पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू मेरे इर्द गिर्द फैला ही जाते हैं।

    अब भला एक अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी, गिटार के इस महारथी को पंजाबी में गाने की कौन सी जरुरत आन पड़ी? रब्बी इस प्रश्न का जवाब कुछ यूं देते हैं....

    "...हम जाट सिख लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है। वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल सकती। दूसरी भाषा में सोचने का मतलब उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेना होगा। वैसे भी अंग्रेजी में गाकर मुझे दूसरे दर्जे का रॉक सिंगर नहीं बनना। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मैं कौन हूँ. ....."

    काश हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार भी अपनी भाषा के बारे में ये सोच रखते!

    खैर रब्बी की आवाज, उनके खुद के लिखे बोल, अंतरे के बीचों-बीच में गिटार की मधुर बंदिश इस गीत में खोने के लिए काफ़ी हैं। तो लीजिए इस गीत का आनंद उठाइए। क्या कहा पंजाबी नहीं आती !

    गीत का दर्द तो आप इसकी भाषा जाने बिना भी महसूस कर सकेंगे पर आपकी सुविधा के लिए इस गीत का हिंदी अनुवाद भी इसके बोल के साथ साथ देने की कोशिश की है।

    तेरे बिन, सन सोणिया
    कोई होर नहींऽओ लभना
    जो देवे, रुह नूँ सकून
    चुक्के जो नखरा मेरा

    तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मूझे कोई और पसंद नहीं। तुम्हारे आलावा कौन है जो मेरे नखरे सहे और जिस का साथ दिल को सुकून दे सके?

    मैं सारे घूम के वेखिया, अमरीका, रूस, मलेशिया
    ना किते वी कोई फर्क सी, हर किसे दी कोई शर्त सी
    कोई मंगदा मेरा सी समा, कोई हूंदा सूरत ते फ़िदा
    कोई मंगदा मेरी सी वफा, ना कोई मंगदा मेरियां बला
    तेरे बिन, होर ना किसे, मंगनी मेरियां बला
    तेरे बिन, होर ना किसे, करनी धूप विच छां
    तेरे बिन, सन सोणिया...


    मैंने कहाँ कहाँ घूम कर नहीं देखा, अमरीका हो या रूस, या फिर मलेशिया। कहीं कोई फर्क नहीं है, सारे मतलबी हैं। सबकी कोई ना कोई शर्त है। कोई मेरा समय चाहता है तो कोई मेरे रूप पर मोहित है। किसी को वफादारी का वादा चाहिए। पर मेरी कमियाँ... वो तो कोई नहीं लेना चाहता....सिवाय तेरे। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि तुम मेरे लिए जिंदगी की इस कड़ी धूप में एक ठंडी छाँह की तरह हो।

    जीवैं रुकिया, सी तुन ज़रा, नहीं ओ भूलणा मैं सारी उमर
    जीवें अखियाँ सी अख्याँ चुरा, रोवेंगा सानू याद कर
    हँस्या सी मैं हँसा अज़ीब, पर तू नहीं सी हँस्या
    दिल विच तेरा जो राज सी, मैंनू तू क्यूँ नहीं दस्या
    तेरे बिन, सानू एह राज, किसे होर नहींऽओ दसना
    तेरे बिन, पीड़ दा इलाज, किस बैद कोलों लभना
    तेरे बिन, सन सोणिया...

    मैं जीवन भर भूल नहीं सकता वो दिन..जिस तरह तुम हौले से रुकी थी और मुझसे आँखे चुराते हुए कहा था कि मेरी याद तुम्हें रुलाएगी। इक अज़ीब सी हँसी हंसा था मैं पर तुम तो नहीं हँसी थी। तुमने क्यूँ नहीं कहा कि तुम्हारे दिल मे वो प्यारा सा राज नज़रबंद है। भला बताओ तो तुम्हारे आलावा ये राज मुझे कौन बता सकता है? तुम्हारे बिना वो कौन सा वैद्य है जो मेरे दिल का इलाज कर सकता है?

    मिलिआँ सी अज्ज मैनू तेरा इक पत्रां
    लिखिआ सी जिस तै, तुन शेर वारे शाह दा
    पढ़ के सी ओस्नूँ, हांन्जू इक दुलिया
    आँखांच बंद सी, सेह राज अज्ज खुलिया
    कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू, किसे होर नहींऽओ चुमना
    कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू मिट्टी विच रुंदणा

    मुझे आज ही तेरा लिखा वो ख़त मिला जिसमें तूने वारिस शाह का वो शेर लिखा था। उसे पढ़कर अनायास ही आँसू का एक कतरा नीचे ढलक पड़ा.... वो राज खोलता हुआ जो मेरी आँखों मे अर्से से बंद था.। अब मेरे इन आँसुओं को तुम्हारे सिवा कोई और नहीं चूमेगा। सच तो ये है कि तुम्हारे बिना मेरे लिए इन आँसुओं को मिट्टी की गर्द फाँकना ही बेहतर है।

    तेरे बिन, सन सोणिया
    कोई होर नहींऽओ लभना
    जो देवे, रुह नूँ सकून
    चुक्के जो नखरा मेरा

    इस गीत को दिल्ली हाइट्स में जिमी शेरगिल और नेहा धूपिया पर फिल्माया गया है। साथ-साथ रब्बी तो हैं ही..



    Sunday, February 17, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ६ - तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दे ना सकूँ...

    बॉलीवुड में अक्सर ऍसा होता रहा है कि जब कोई फिल्म विराट स्तर पर प्रदर्शित नहीं होती या फिर ज्यादा दिन नहीं चलती तो उसके गीत लोगों तक पहुँच ही नहीं पाते और गीतकार संगीतकार की सारी मेहनत पानी में चली जाती है। अब मुझे पूरा यक़ीन है कि आप में से बहुतों ने 'मनोरमा सिक्स फीट अंडर' के बारे में ज्यादा चर्चा नहीं सुनी होगी। समीक्षकों द्वारा अच्छा करारे जाने पर भी ये फिल्म सिनेमाघरों की शोभा ज्यादा दिनों तक नहीं बढ़ा पाई।

    इसी फिल्म का एक गीत जो इसके प्रोमो को सुनते समय मन में अटक गया था आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस गीत को गाया रूप कुमार राठौड़ और महालक्ष्मी ऐयर ने और इसके बोल लिखे मनोज तापड़िया ने। इस गीत की धुन बनाई जयेश गाँधी ने जो बतौर गायक तो कई फिल्मों में अपना स्वर दे चुके हैं पर संगीतकार की हैसियत से शायद उनकी ये पहली फिल्म है।

    आतिफ असलम, मुस्तफ़ा ज़ाहिद सरीखे पाकिस्तानी गायकों के ऊँचे सुरों को पूरे कौशल से लगा सकने की महारत को जो लोकप्रियता भारत में मिली है उससे प्रभावित होकर संगीतकार यहाँ के गायकों को भी वैसे गीत दे रहे हैं। ज़ुबीन गर्ग हों , कृष्णा हों या फिर मिथुन शर्मा इन सबने इस genre के गीतों में कमाल किया है। इसलिए जब रूप कुमार राठौड़ को ऊँचे सुरों में मैंने गाते सुना
    आँखों के, आलों में, चाहत की लौ जलने दो...

    तो विस्मय के साथ साथ मन मुग्ध हो गया।

    शब्दों की बात करें तो मनोज तापड़िया के बोल प्रेमियों की आपसी कशमकश को व्यक्त करते दिखते हैं। जिंदगी में अपने करीबी से कई बार आप कुछ नहीं कह कर भी बहुत कुछ कह जाते हैं। रिश्तों के उलझे धागों में से कई सवाल बाहर निकल कर ऐसे आते हैं जिनके जवाब आँखें , होठों से ज्यादा बेहतर तरीकें से दे पाती हैं...


    तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ
    पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
    आँखों के, आलों में, चाहत की लौ जलने दो
    तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ


    कह रही है जो नज़र तुझे है खबर की नहीं
    कह रही है तेरी नज़र तू बेखबर तो नहीं
    तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना
    पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
    आँखों के आलों में चाहत की लौ जलने दो


    तुम कहो तो मैं रोक लूँ, जो तुम कहो तो नहीं
    सीने में है ये कैसी खलिश, तेरी कशिश तो नहीं
    तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना
    पिघले से अरमां हैं, दो पल के मेहमां हैं
    आँखों के आलों में चाहत की लौ जलने दो

    तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना दें ना सकूँ
    तेरे बिना जिंदगी है अधूरी, तेरे बिना क्या है जीना


    तो आइए सुनते हैं छठी पायदान के इस गीत को

    इस संगीतमाला के पिछले गीत

    Saturday, February 16, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान ७ - मैं जहाँ रहूँ, मैं कहीं भी हूँ, तेरी याद साथ है

    वार्षिक गीतमाला की ७वीं पायदान पर गीत वो जिसमें पहली बार गीतकार जावेद अख्तर ने काम किया है संगीत निर्देशक हीमेश रेशमिया के साथ है। मैंने इस चिट्ठे पर कई बार कहा है कि मुझे हीमेश की गायन शैली कभी पसंद नहीं रही, पर बतौर संगीत निर्दैशक मुझे कई फिल्मों में उनका काम पसंद आया है।

    अब इसी गीत को लें, नमस्ते लंदन के इस गीत में जावेद साहब के खूबसूरत बोलों पर कमाल की धुन बनाई है हीमेश रेशमिया ने। जैसे ही गीत की मधुर धुन के साथ राहत का स्वर गीत के मुखड़े में आता है, आपको लग जाता है कि इस गीत में कुछ खास बात है। इस गीत से मेरी पहली मुलाकात कोलकाता में टैक्सी यात्रा के दौरान व्यस्त ट्राफिक के बीच बगल की गाड़ी में बजते एफ एम चैनल से हुई और तभी से ये मेरा चहेता बन गया।


    राहत फतेह अली खाँ की गायिकी का अंदाज मुझे हमेशा ही भाता रहा है। चाहे 'पाप' में गाया उनका गीत लगन लागी तुझसे मन की लगन.... हो या 'कलयुग ' के लिए गाया गीत जिया धड़क धड़क जाए... या पिछले साल 'ओंकारा ' में गाया उनका गीत नैना डस लेंगे, वो हर साल एक ना एक गीत ऍसा अवश्य देते हैं जो दिल के आर पार हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि वो अपनी गायिकी से अपने चाचा नुसरत फतेह अली खान का नाम रोशन कर रहे हैं। इस गीत में उनका साथ दिया है कृष्णा ने जो ऊँचे सुरों को बड़े कौशल से निभा जाते हैं।

    पर अगर शब्दों में जोर नहीं रहता तो ये गायक भी क्या कर पाते। जावेद साहब ने अपने सहज बोलों से हम सभी के मन को छुआ है।
    अब आप ही बताएं भला यादें किस मनुष्य का पीछा नहीं करतीं ? तनहाई का कौन शिकार नहीं होता?
    वो शेर याद है ना आपको निदा फाज़ली साहब का

    हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
    फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

    जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
    आखिरी साँस तक बेकरार आदमी

    तो जनाब ये बेकरारी और तनहाई आप के दिल में एक नासूर की तरह चुभ रही है तो ये गीत आपके लिए ही है..शायद आपको दिल की आवाज़ प्रतिध्वनित होकर सुनने को मिले

    मैं जहाँ रहूँ, मैं कहीं भी हूँ
    तेरी याद साथ है
    किसी से कहूँ, के नहीं कहूँ
    ये जो दिल की बात है
    कहने को साथ अपने इक दुनिया चलती है
    पर छुपके इस दिल में तनहाई पलती है
    बस याद साथ है
    तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...
    मैं जहाँ रहूँ.....साथ है

    कहीं तो दिल में यादों की इक सूली गड़ जाती है
    कहीं हर इक तसवीर बहुत ही धुंधली पड़ जाती है
    कोई नई दुनिया के रंगों में खुश रहता है
    कोई सब कुछ पा के भी, ये मन ही मन कहता है
    कहने को साथ अपने इक दुनिया चलती है
    पर छुपके इस दिल में तनहाई पलती है
    बस याद साथ है
    तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...

    कहीं तो बीते दिल की जड़ें दिल में ही उतर जाती हैं
    कहीं जो धागे टूटे तो मालाएँ बिखर जाती हैं
    कोई दिल में जगह नई, बातों के लिए रखता है
    कोई अपनी पलकों पर, यादों के दीये रखता है
    .कहने को साथ अपने इक दुनिया चलती है
    पर छुपके इस दिल में तनहाई पलती है
    बस याद साथ है
    तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...तेरी याद साथ है...




    इस संगीतमाला के पिछले गीत

    Thursday, February 14, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान ८ - वैलेंटाइन डे स्पेशल !

    आज वैलेंटाइन डे है। पहली बार जब वैलेंटाइन डे के चर्चे सुने थे तो मन ही मन एक मुस्कुराहट जरूर दौड़ गई थी कि चलो भाई हमारी ना सही, अब आज की पीढ़ी को इज़हार-ए-दिल करने के लिए कोई तो दिन मिला। वर्ना एक ज़माने वो भी था कि लोग बाग अपनी उन तक पहुँचने के लिए घर, कॉलेज और कोचिंग तक रिक्शे का पीछा करते थे। मामला घर के बगल का हुआ तो प्रेम पत्र पत्थर से छत पर फेंका जाता था, या सिर्फ खिड़कियों से हाथ हिलाने से ही रात की नींदे हराम हो जाया करती थीं। और अगर दिल की अंदरुनी हालत काबू के बाहर हो जाए तो वो अनायास ही उनके सामने जा कर आई लव यू बोल देने की हिम्मत भी कुछ वीर बांकुड़े दिखा ही जाते थे। जो कुछ ज्यादा दूरदर्शी होता वो फेल सेफ कंडीशन लॉजिक का प्रयोग कर जेब में एक डोरी भी रखता कि मामला कुछ उलटा पड़ा तो उनके थप्पड़ के पहले अपनी भूल का अहसास करने वाले भाई का हाथ आगे होगा।:)

    तो ना हम ऊपर की किसी कवायद का हिस्सा बन पाए ना ही वैलेंटाइन डे से अपने आप को जोड़ सके। पर ये स्पष्ट करना चाहूँगा कि प्रेम को महिमामंडित करते हुई कोई पर्व मनाने में मेरी पूरी आस्था है । भले ही हम, "है प्रीत जहाँ की रीत वहाँ..... जैसे गीत गाते रहें फिर भी इस बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि ये देश वैसे लोगों का भी है जो भाषा, धर्म, जाति के आधार पर नफ़रत के बादल सदा फैलाते आए हैं और रहेंगे। प्रेम में वो शक्ति है जो इन व्यर्थ की दीवारों को तोड़ने के लिए हमें प्रेरित करती है।

    और हम साल दर साल इसी बात को एक पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी के सामने रखें तो इसमें बुराई क्या है? हाँ ये जरूर है कि अगर ये पर्व, वसंतोत्सव या अपनी संस्कृति से जुड़े किसी अन्य रूप में मनाया जाए तो समाज का हर वर्ग इसे अपने से जोड़ कर देख सकता है।

    ये सुखद संयोग है कि इस गीतमाला की आठवीं पायदान का गीत प्रेम के रस से पूरी तरह सराबोर है। इसे गाया शान ने, बोल लिखे समीर ने और इस गीत की धुन बनाई मोन्टी शर्मा ने। मोन्टी शर्मा संगीतकार प्यारेलाल के भतीजे और अपने दादा पंडित राम प्रसाद शर्मा के शिष्य हैं। मोन्टी खुद एक कीबोर्डप्लेयर हैं और इससे पहले उन्होंने फिल्म ब्लैक का बैकग्राउंड स्कोर दिया था। इस गीत की खूबसूरती है इसकी मधुर लय और संगीत में, जिसे शान ने अपनी आवाज़ के जादू से और उभारा है

    मेरे मित्रों और एक शाम मेरे नाम के पाठकों को इस दिन की हार्दिक बधाई। मेरी मनोकामना है कि आप सब प्रेम के अभूतपूर्व अनुभव से अपने जीवन में आज नहीं तो कल जरूर गुजरें।

    तो आइए प्रेम का ये पर्व मनाएँ सांवरिया से लिखे इस प्यारे से गीत के साथ....
    जब से तेरे नैना..., मेरे नैनों से, लागे रे
    तबसे दीवाना हुआ, सबसे बेगाना हुआ
    रब भी दीवाना लागे रे..........




    पुनःश्च (१५.२.२००८)
    कल रात अपने ६ वर्षीय बेटे से बात हो रही थी की वेलेंटाइन डे के दिन लोग एक दूसरे को फूल भेंट करते हैं और वो भी खास गुलाब के। बेटे ने झट से कहा गुलाब...मुझे तो वो ज़रा भी पसंद नहीं।
    तो फिर आप क्या लोगे किसी से?
    तपाक से उत्तर मिला बस "एक केला दे दे तो कितना अच्छा लगेगा।"

    बेटे के इस उत्तर को सुन कर हमारा हँसते हँसते बुरा हाल हो गया। सोचा आप सब से बाँटता चलूँ। :)

    Tuesday, February 12, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ :पायदान ९ - क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?

    तो नवें नंबर पर है वो गीत जिसे गाया विशाल-शेखर की जोड़ी वाले विशाल ददलानी ने। ये एक ऍसा गीत है जो आपको ये सोचने पर विवश कर देता है कि क्यूँ सब जानते समझते भी हम अपने बच्चों को गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अपनी आंकाक्षाओं के बोझ तले दबा डालते हैं ? ज्यादातर बच्चे समाज और माता पिता की इच्छा अनुसार इस सिस्टम में अपने आप को ढ़ाल लेते हैं।

    पर क्या सारे बच्चे ऍसा कर पाते हैं?

    अगर ऍसा हो पाता तो अवसाद, अलगाव और यहाँ तक की अपने जीवन को समाप्त करने की निरंतर होती घटनाओं को अपने सामने घटते हुए हम नहीं देख रहे होते।

    गीत के पहले हिस्से में जहाँ लायक कहलाने वाले बच्चों की जीवनशैली का चित्रण है तो दूसरे में ठीक इससे पलट वैसे बच्चों का जो अपनी ही दुनिया में जीने की तमन्ना रखते हैं पर ये शिक्षा प्रणाली और ऊपर उठने की ये दौड़ उन्हें वैसा करने नहीं देती। शंकर-अहसॉन-लॉए ने अपने संगीत को गीत के मूड के हिसाब से बदलते रखा है।


    ये गीत मुझे अगर इतना पसंद है तो वो इस वज़ह से कि बच्चों के इस दर्द को इतनी सहजता से ऊपर लाते हुए ये दिल पर सीधी चोट करता है। ये अहसास दिलाता है कि समाज के एक हिस्से के रूप में चाहे माता-पिता या अध्यापक की हैसियत से, इस तंत्र को फलने फूलने में हमारा भी कुछ दोष बनता है।

    तो पहले पढ़ें प्रसून जोशी के उठाए गए इन मासूम से सवालों को..
    कस के जूता कस के बेल्ट
    खोंस के अंदर अपनी शर्ट
    मंजिल को चली सवारी
    कंधों पे जिम्मेदारी

    हाथ में फाइल मन में दम
    मीलों मील चलेंगे हम
    हर मुश्किल से टकराएँगे
    टस से मस ना होंगे हम

    दुनिया का नारा जमे रहो
    मंजिल का इशारा जमे रहो
    दुनिया का नारा जमे रहो
    मंजिल का इशारा जमे रहो

    ये सोते भी हैं अटेन्शन
    आगे रहने की हैं टेंशन
    मेहनत इनको प्यारी है
    एकदम आज्ञाकारी हैं

    ये आमलेट पर ही जीते हैं
    ये टॉनिक सारे पीते हैं
    वक़्त पे सोते वक़्त पे खाते
    तान के सीना बढ़ते जाते

    दुनिया का नारा जमे रहो
    मंजिल का इशारा जमे रहो...

    ***********************************************************
    यहाँ अलग अंदाज़ है
    जैसे छिड़ता कोई साज़ है
    हर काम को टाला करते हैं
    ये सपने पाला करते हैं

    ये हरदम सोचा करते हैं
    ये खुद से पूछा करते हैं
    क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?
    क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो ?


    ये वक़्त के कभी गुलाम नहीं
    इन्हें किसी बात का ध्यान नहीं
    तितली से मिलने जाते हैं
    ये पेड़ों से बतियाते हैं

    ये हवा बटोरा करते हैं
    बारिश की बूंदे पढ़ते हैं
    और आसमान के कैनवस पे
    ये कलाकारियाँ करते हैं

    क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो ?
    क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो ?


    शायद आपके पास इन प्रश्नों का कोई सीधा सादा हल ना हो पर ये गहन चिंतन का विषय है इस बात से आप इनकार नहीं कर सकेंगे।



    और हाँ एक बात और, तारे जमीं पर फिल्म के इस गीत को देखते हुए सबको अपने घर के सुबह वाली भागमभाग के दृश्य जरूर याद आएँगे।


    इस संगीतमाला के पिछले गीत

    Sunday, February 10, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ : १० वीं पायदान - मेरे ढोलना सुन, मेरे प्यार की धुन...

    तो देवियों और सज्जनों हफ्ते भर की गैरमौज़ूदगी के बाद फिर उपस्थित हूँ अपनी गीतमाला के प्रथम दस गीतों में से १० वीं पायदान के गीत के साथ। ये गीत लाया है अपने साथ शास्त्रीय संगीत की मधुरता। सुर और ताल का अद्भुत संगम है ये गीत। इसे गाया है कोकिल कंठी श्रेया घोषाल ने और आलाप में उनका साथ दिया है एम. जी. श्रीकुमार ने। भूलभुलैया फिल्म के इस गीत के बोल लिखे समीर ने और इसकी धुन बनाई प्रीतम ने।

    श्रेया घोषाल की मधुर आवाज मुझे 'जिस्म' और 'देवदास' के समय से अच्छी लगती रही है। इस गीत में भी उनकी गायिकी कमाल की है।
    प्रीतम ने भी इस गीत के माध्यम से ये सिद्ध किया है कि सिर्फ फ्यूजन ही नहीं बल्कि विशुद्ध भारतीय संगीत पर आधारित सुंदर धुनें भी, वो बना सकते हैं।

    श्रीकुमार केरल के वरिष्ठ गायकों में एक हैं। शास्त्रीय संगीत की गायन प्रतिभा श्रीकुमार को अपने पिता गोपालन नायर से विरासत में मिली है। अब तक मलयालम, तमिल , तेलगु और हिंदी फिल्मों में ३००० से ज्यादा गीत गाने वाले श्रीकुमार का सपना है कि आने वाली पीढ़ी उन्हें ऐसे गायक के रूप में याद रखे जिसने शास्त्रीय संगीत को अपने गायन से समृद्ध किया। १९९० में वे संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए गए।

    इस गीत के बोलों का टंकण एक दुसाध्य काम था पर मुझे लगा कि बिना शास्त्रीय आलापों के ये गीत अधूरा-अधूरा सा लगता. सो जहाँ तक हो सका मैंने बोलों में उनका समावेश किया है।

    मेरे ढोलना सुन, मेरे प्यार की धुन
    मेरे ढोलना सुन
    मेरी चाहतें तो फ़िजा में बहेंगी
    जिंदा रहेंगी हो के फ़ना
    ताना ना ना तुम...ताना ना ना तुम..ताना ना ना तुम..ताना ना ना तुम
    ता ना धी रे, ता ना धी रे, धी रे ना
    मेरे ढोलना सुन..

    साथी रे साथी रे मर के भी तुझको चाहेगा दिल
    तुझे ही बेचैनियों में पाएगा दिल
    मेरे गेसुओं के साये में, तेरी राहतों की खुशबू है
    तेरे बगैर क्या जीना, मेरे रोम रोम में तू है
    मेरी चूड़ियों की खन खन से, तेरी सदाएँ आती हैं
    ये दूरियाँ हमेशा ही नजदीक कहाँ बुलाती हैं
    ओ पिया.....

    सा नि ध, नि ध मा
    मा ग स नि ध नि स ग मा
    मा ग स नि ध नि स ग
    मा ग स नि ध नि स ग
    मा ग मा ग
    सा नि ध ग प ध नि
    सा नि ध ग प ध नि
    सा नि ध नि
    ध नि सा, ध नि सा, ध नि सा, ध नि सा
    म ध नि, म ध नि, म ध नि, म ध नि,
    ध नि सा, ध नि सा, ध नि सा
    म ध नि, म ध नि, म ध नि
    म ध नि सा, म ध नि सा, म ध नि सा, म ध नि सा,
    सा नि ध मा, सा नि ध मा, सा नि ध मा, सा नि ध मा

    मा मा ग ग सा सा नि नि
    सा सा नि नि धा धा नि नि
    सा सा नि नि धा धा मा मा
    सा सा नि नि धा धा ग ग
    नि नि सा सा सा
    नि धा सा सा सा
    म ग सा सा सा
    मेरे ढोलना सुन..

    साँसों में साँसों में, तेरी सरगमें हैं, अब रात दिन
    जिंदगी मेरी तो कुछ ना, अब तेरे बिन
    तेरी धड़कनों की सरगोशी, मेरी धड़कनों में बजती है
    मेरी जागती निगाहों में, ख्वाहिश तेरी ही सजती है
    मेरे खयाल में हर पल तेरे खयाल शामिल हैं
    लमहे जुदाईयों वाले, मुश्किल बड़े ही मुश्किल हैं
    ओ पिया...

    नि सा, नि सा, नि सा, नि सा
    ध नि, ध नि, ध नि, ध नि
    प ध, प ध, प ध, प ध,
    ग म प ध, नि रे स
    ग म प ध. नि रे स
    पा नि नि स, पा नि नि स, पा नि नि स, पा नि नि स

    गा म प ध, नि ध प ध, नि ध प ध, नि सा
    गा म प ध, नि ध प ध, प म ग म, ग रे सा नि. ध नि सा गा, मा गा सा गा, मा पा धा पा, धा नि सा
    नि सा, नि सा, नि सा, नि सा, नि सा
    ध नि, ध नि, ध नि, ध नि, ध नि......................


    (इसके आगे बड़ी कोशिश के बाद भी लिख नहीं पाया )
    तो आएँ इस गीत के बोलों को पढ़ते हुए इस गीत का आनंद उठाएँ..



    हाल ही में स्टार टीवी के 'छोटे उस्ताद' कार्यक्रम की एक प्रतिभागी अन्वेषा दत्ता ने भी इस गीत को गाने के लिए चुना। आप उनकी कोशिश यहाँ देख सकते हैं।

    Sunday, February 03, 2008

    वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान ११ - धागे तोड़ लाओ चाँदनी से नूर के...

    पिछले १५ बीस दिनों में, मैं सिर्फ पाँच दिन ही घर पर रह पाया हूँ और दौरों का सिलसिला बदस्तूर ज़ारी है। अब इससे पहले कि मैं अगले हफ्ते गायब हो जाऊँ अपनी गीतमाला को थोड़ा आगे बढ़ाता हूँ। ग्यारहवीं पायदान के इस गीत को गाया है राहत फतेह अली खाँ और महालक्ष्मी अय्यर ने। इन दोनों सुरीले गायकों की इस २००७ की गीतमाला में गाया हुआ ये पहला गीत हैं। पर ये गायक प्रथम दस गीतों में आपको आगे भी नज़र आएँगे।

    अगर ये गीत मुझे इतना पसंद है तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय जाता है शंकर अहसान लॉय के अद्भुत संगीत को। जैसे ही घड़े की थाप से गीत का मुखड़ा शुरु आता है आप इस गीत से बँध जाते हैं। भारतीय वाद्य यंत्रों का पश्चिमी वाद्य यंत्रों के साथ ये तिकड़ी जितनी खूबसूरती से सम्मिश्रण करती है, उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है। बाँसुरी के साथ गिटार की बंदिश हो या बीच में राहत का सम्मोहित कर देने वाला आलाप.. पूरे संगीत संयोजन को दाद देने को जी चाहता है।

    और फिर गुलज़ार तो हैं ही अपनी चिरपरिचित शैली में। पर ये बता दूँ कि मेरे प्रिय गीतकार गुलज़ार का इस संगीतमाला में आने वाला आखिरी गीत है। ये पहली बार हुआ है कि गुलज़ार का लिखा कोई भी गीत मेरे प्रथम दस में नहीं है। मेरी समझ से इस साल गुलज़ार की सबसे बेहतरीन रचना दस कहानियों के लिए लिखी उनकी नज़्में थीं जिन्हें फिल्म में शामिल नहीं किया गया। खैर उम्मीद है कि गुलज़ार इस साल ओंकारा या साथिया के अपने बेहतरीन गीतों जैसा कुछ दिल को छू जाने वाला लिखेंगे ।

    धागे तोड़ लाओ चाँदनी से नूर के
    घूँघट ही बना लो रोशनी से नूर के
    शाम आ गई तो, आगोश में लो
    हो साँसों में उलझी रहे मेरी साँसें

    बोल ना हलके हलके... बोल ना हलके हलके...

    होठ से हलके हलके..बोल ना हलके हलके

    आ नींद का सौदा करें, इक ख्वाब दें, इक ख्वाब लें
    इक ख्वाब तो आँखों में है, इक चाँद के तकिए तले
    कितने दिनों से ये आसमां भी
    सोया नहीं है इसको सुला दें
    बोल ना हलके हलके...
    बोल ना हलके हलके...
    मा पा नी धा गा मा रे सा गा मा रे पा नि स ध ग मा ग प

    उम्र लगी कहते हुए दो लफ्ज़ थे इक बात थी
    वो इक दिन सौ साल का, सौ साल की वो रात थी
    कैसा लगे जो, चुपचाप दोनों..

    हो पल पल में पूरी सदियाँ बिता दें

    बोल ना हलके हलके...
    बोल ना हलके हलके...
    होठ से हलके हलके..बोल ना हलके हलके


    तो आइए सुनें झूम बराबर झूम से लिए गए इस गीत को




    इस संगीतमाला के पिछले गीत



     

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    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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