Sunday, August 31, 2008

तू तरुण देश से पूछ अरे गूँजा कैसा यह ध्वंस राग ? : हिमालय - रामधारी सिंह ' दिनकर '

पिछले हफ़्ते हमारे दफ़्तर में रामधारी सिंह 'दिनकर' के जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं का पाठ करने के लिए एक संध्या चुनी गई थी। दिनकर राष्टकवि तो थे ही, हमारी पीढ़ी को उन्होंने किशोरावस्था में अपनी ओजपूर्ण कविताओं से कलम की ताकत का अंदाजा करवाया। और यही कारण था कि उस शाम, हॉल को भरने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा। हम सबके सामने, हमारे एक साहित्यानुरागी सहयोगी ने दिनकर के काव्य जीवन का एक बेहद संवेदनशील जीवन वृत खींचा।


मैंने इस अवसर पर उनकी कविता 'हिमालय' का पाठ किया। ये कविता मेरी नवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक में थी। मुझे याद है कि स्कूल में जब भी इस कविता को दोहराते थे, कविता का अंत आते-आते धमनियों में रक्त प्रवाह की तीव्रता अपने चरम पर पहुँच जाती थी।

आज जब इस कविता को दोबारा पढ़ता हूँ तो लगता है फिर इस सोए हुए देश को तंद्रा से उठाने की जरूरत है। बाहरी शक्तियों की बात करें तो कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक जगह जगह दुश्मन हमारे इस प्रहरी कौ अपने पैरो तले रौंदकर इसका अपमान करते फिर रहे हैं । तो वहीं दूसरी ओर इससे जन्मी नदियाँ जो उत्तर के मैदानों को सिंचित और उर्वर बनाती थीं आज अपने प्रलय से जनमानस को लील रही हैं फिर भी ये यती चुप है,शांत है...

चाहे वो जम्मू में जनता का महिनों से उबलता आक्रोश हो, या उड़ीसा की कानूनविहीनता, या फिर तेरह दिनों से कोशी में आई प्रलयकारी बाढ़ में आम जनता के रोते बिलखते चेहरे.... भारत में राजनैतिक और प्रशासनिक अकर्मण्यता का जो दृश्य दिखाई दे रहा है वो वास्तव में बेहद भयावह है। इस दृष्टि से दिनकर की ये पंक्तियाँ और भी प्रासंगिक हो गई हैं।

उस पुण्यभूमि पर आज तपी !
रे आन पड़ा संकट कराल
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डँस रहे चतुर्दिक विविध व्याल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !


आइए पढ़ें राष्ट्र कवि दिनकर की ये कविता ...और शपथ लें कि देश के एक सुधी नागरिक की हैसियत से हम इन अकर्मण्य नेताओं और प्रशासकों पर एकजुट होकर दबाव बनाएँ ताकि वे अपने कर्तव्यों से विमुख ना हों और साथ ही सहयोग दें उनके प्रयासों को सफल बनाने में..

मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

साकार दिव्य गौरव विराट,
पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम करीट !
मेरे भारत के दिव्य भाल !
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

युग युग अजेय, निर्बन्ध मुक्त
युग युग गर्वोन्नत, नित महान
निस्सीम व्योम में तान रहा
युग से किस महिमा का वितान
कैसी अखंड ये चिर समाधि ?
यतिवर! कैसा ये अमर ध्यान ?

तू महाशून्य में खोज रहा
किस जटिल समस्या का निदान ?
उलझन का कैसा विषमजाल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

औ मौन तपस्या लीन यती
पल भर को तो कर दृगन्मेष
रे ज्वालाओं से दग्ध विकल
है तड़प रहा पद पर स्वदेश

सुखसिंधु , पंचनंद, ब्रह्मपुत्र
गंगा यमुना की अमिय धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति ! तू ने की पुकार
'पद दलित इसे करना पीछे
पहले मेरा सिर ले उतार।'


उस पुण्यभूमि पर आज तपी !
रे आन पड़ा संकट कराल
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डँस रहे चतुर्दिक विविध व्याल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !



कितनी मणियाँ लुट गईं ? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान मग्न ही रहा; इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश ।


वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी शान कहाँ ?
ओ री उदास गण्डकी ! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ ?


तू तरुण देश से पूछ अरे
गूँजा कैसा यह ध्वंस राग
अम्बुधि अन्तस्तल बीच छुपी
यह सुलग रही है कौन आग ?

प्राची के प्रांगण बीच देख
जल रहा स्वर्ण युग अग्निज्वाल
तू सिंहनाद कर जाग तपी
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

रे रोक, युधिष्ठिर को ना यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर
पर फेर हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर


कह दे शंकर से आज करें
वे प्रलय नृत्य फिर एक बार
सारे भारत में गूँज उठे
'हर हर बम' का फिर महोच्चार


अगर दिनकर की कविताएँ आपको भी उद्वेलित करती हैं तो इन्हें भी आप पढ़ना पसंद करेंगे

Wednesday, August 27, 2008

अहमद फ़राज़ (1931 - 2008) : इक शायर अलहदा सा जिसकी कलम अमानत थी आम लोगों की...

कल दिन में याहू के मेल बॉक्स में जब कई स्पैम्स के बीच ये मेसज दिखाई दी कि फ़राज़ नही रहे तो दिल धक से रह गया। एकबारगी तो लगा कि हो सकता है कि ये खबर गलत हो। पर गूगल सर्च में जब पाकिस्तानी अखबार 'जंग' की जानिब से इस खबर की पुष्टि हुई तो मन अनमना सा हो गया। बरबस उनकी ये पंक्तियाँ याद आ गईं

अपने सिवा हमारे न होने का ग़म किसे
अपनी तलाश में तो हम ही हम हैं दोस्तों

कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा
कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तों


फ़राज़ कई बीमारियों से लगातार जूझ रहे थे और उनकी हालत जुलाई के पहले हफ्ते में अमरीका जाने पर और बिगड़ गई थी और सोमवार की रात, इस्लामाबाद में बिताई उनकी आखिरी रात साबित हुई।

फ़राज़ की शायरी से मेरा परिचय पहले पहल मेहदी हसन और गुलाम अली की ग़ज़लों से ही हुआ था। पर अहमद फ़राज में मेरी दिलचस्पी तब और बढ़ी जब नब्बे के दशक में उनके दिल्ली आगमन पर टाइम्स आफ इंडिया (The Times of India) में उनका एक इंटरव्यू पढ़ा। उस इंटरव्यू में फ़राज से पूछा गया कि
क्या शायरी बिना खुद के अनुभवों कर लिखी जा सकती है?

फ़राज ने उत्तर दिया नहीं, सच्ची शायरी तभी निकलती है जब दिल की हदों से कोई बात महसूस की जा सके। उन्होंने उसी साक्षात्कार में बताया था कि रंजिश ही सही... उन्होंने एक मोहतरमा के लिए लिखी थी। पर जिसके लिए ये लिखी गई थी उसके बाद उनसे उनका मिलना नहीं हो सका। सालों बाद अपने एक कॉमन फ्रेंड से जब उनकी मुलाकात हुई तो उसने उन्हें बताया कि वो तो फक्र से कहती फिरती है कि फराज़ ने ये ग़ज़ल मेरे लिए लिखी है।

फ़राज के सहपाठी और पत्रकार इफ्तिखार अली का कहना है कि कॉलेज के ज़माने से फ़राज एक आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे। शुरु से उनका झुकाव कविता की ओर था। वे अक्सर छात्रों को अपने इर्द-गिर्द जमा कर लेते और अपनी रूमानी कविताएँ सुनाया करते। पेशावर में उस वक़्त लड़के और लड़कियों को कॉलेज में मिलने जुलने की रिवायत नहीं थी। पर फ़राज की कविताएँ जाने कैसे छात्राओं तक पहुँच ही गईं। फिर तो दर्जनों की शक्ल में चाहने वालियों के हस्तलिखित पत्र उन्हें मिलने लगे। अमीर घरों की लड़कियाँ अपने नौकरों के हाथों ख़त भिजवाया करतीं तो बाकी खुद बस स्टॉप पर ही ख़तों की डिलिवरी कर देतीं।

प्रेम को जिस शिद्दत से उन्होंने अपनी शायरी का विषय बनाया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। जिस खूबसूरती से वो शब्दों को अशआरों में वो मोतियों की तरह पिरोते थे वो उनके इन अशआरों पर गौर करने से आप खुद ही समझ जाएँगे
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दुख फ़साना नहीं के तुझसे कहें
दिल भी माना नहीं के तुझसे कहें

आज तक अपनी बेकली का सबब
ख़ुद भी जाना नहीं के तुझसे कहें

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क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
दिल वो बेमेहर कि रोने के बहाने माँगे

अपना ये हाल के जी हार चुके लुट भी चुके
और मोहब्बत वही अन्दाज़ पुराने माँगे

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बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

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मशहूर पत्रकार खालिद हसन उनके बारे में लिखते हैं कि फ़राज़ हमेशा से तानाशाहों के विरुद्ध और लोकतंत्र के हिमायती रहे। जनरल जिया का विरोध करने की वज़ह से उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा और कुछ सालों के लिए वे निर्वासित भी हुए। इस बात को जानकर आपको हैरानी जरूर होगी पर फ़राज किशोरावस्था में कश्मीर के १९४७ -१९४८ के युद्ध में स्वेच्छा से सम्मिलित हुए थे। पाकिस्तानी शासकों से उनकी कभी बनी नहीं और उन्होंने हमेशा वही किया और लिखा जिसकी उनके दिल ने गवाही दी। शायद ही इस ज़माने में भारतीय उप महाद्वीप में उनके जितनी शोहरत किसी और शायर को मिली। उन्हें बड़े चाव से पढ़ा जाता रहा और सुना जाता रहा। जनरल जिया की हुकूमत के खिलाफ उनकी नज़्म महसूर (Mahasara) (चारों ओर से घिरा हुआ ) काफी लोकप्रिय हुई थी। सुनिए उन्हीं की आवाज़ में ये नज़्म





फ़राज़ की ये पंक्तियाँ उनकी कलम, उनके आदर्श, उनकी शख्सियत की कहानी कहती हैं

मेरा कलम नहीं तजवीज़1 उस मुबल्लिस की
जो बन्दिगी का भी हरदम हिसाब रखता है
मेरा कलम नहीं मीज़ान2 ऍसे आदिल3 की

जो अपने चेहरे पर दोहरा नकाब रखता है
मेरा कलम तो अमानत है मेरे लोगों की
मेरा कलम तो अदालत मेरे ज़मीर की है
इसीलिए तो जो लिखा शफा-ए-जां से लिखा

ज़बीं4 तो लोच कमान का जुबां तीर की है
मैं कट गिरूँ कि सलामत रहूँ यक़ीन है मुझे
कि ये हिसार5-ए-सितम कोई तो गिराएगा

1. सम्मति, राय, 2.तराजू, 3.न्याय करने वाला, 4. मस्तक, 5. गढ़, किला

और चलते-चलते अहमद फ़राज़ की लिखी चंद पंक्तियाँ अपनी श्रृद्धांजलि के तौर पर इस महान शायर के लिए अर्पित करना चाहूँगा

वो गया था साथ ही ले गया, सभी रंग उतार के शहर का
कोई शख्स था मेरे शहर में किसी दूर पार के शहर का


चलो कोई दिल तो उदास था, चलो कोई आँख तो नम रही
चलो कोई दर तो खुला रहा शबे इंतजार के शहर का


किसी और देश की ओर को सुना है फराज़ चला गया
सभी दुख समेत के शहर के सभी कर्ज उतार के शहर का
...

Monday, August 25, 2008

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है .सुनिए सुरेश वाडकर की आवाज़ में

बात १९८९ सितंबर की है। BIT MESRA में इंजीनियरिंग का वो प्रथम वर्ष था। स्पोर्ट्स और NSS लेने वालों को सप्ताह में दो दिन, काँलेज के स्पोर्ट्स ग्राउंड में भरी दोपहरी में कॉलेज के दो चक्कर लगाने होते थे। मैदान की स्थिति कुछ ऍसी थी कि ठीक उसके एक सिरे से कुछ दूरी पर कॉलेज का हॉस्टल नंबर सात के सामने का हिस्सा पड़ता था जहाँ हमारे इमीडियट सीनियर रहा करते थे।

ये वही साल था जब यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म चाँदनी रिलीज हुई थी और उसके सारे गीत खासकर उसका टाइटल ट्रेक बेहद मशहूर हुआ था। तो जैसे ही हमारे बैच के स्पोर्ट्स और NSS लेने वाले लड़के लड़कियों की दौड़ शुरु होती एक अलग तरह का ड्रामा शुरु हो जाता। जब कन्याओं का दस्ता हॉस्टल नंबर सात वाले सिरे के पास पहुँचता, वहाँ के लड़के अपनी खिड़कियों की पैरापेट पर चढ़ कर समवेत स्वर में अपना गायन शुरु कर देते...चाँदनी ओ मेरी चाँदनी..... । लड़कियाँ झेंपती, मुस्कुरातीं और आगे बढ जातीं।वहीं हमारे बैच के लड़के अंदर ही अंदर कुपित होते..सोचते कि इन्हें देख कर हमें इस गीत को गाने की इच्छा होती है पर मुए ये गा रहे हैं। पर मेरी आज की ये पोस्ट इसी फिल्म के दूसरे गीत से जुड़ी हुई है..

जैसा कि आप को पता ही होगा कि चाँदनी का संगीत दिया था शिव- हरि ने यानि महान संगीतज्ञ संतूर वादक शिव कुमार शर्मा और बाँसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया की जोड़ी ने। शिव-हरि की ये जोड़ी एक ज़माने में यश चोपड़ा की हर फिल्म में नज़र आती थी। चाँदनी के आलावा सिलसिला, लमहे ओर डर में उनके दिए संगीत को आज भी लोग उतने ही चाव से सुनते हैं। इस फिल्म का एक गीत था जिसे सुरेश वाडकर ने गाया था लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है... जो मुझे अस्सी के बाद के सावन के गीतों में सबसे दिल के करीब लगता है।

गीत की शुरुआत, संतूर की मधुर धुन से होती है और फिर मुखड़े और पहले अंतरे के बीच के इंटरल्यूड में अन्य वाद्य यंत्रों के साथ जिस खूबसूरती से इसका प्रयोग हुआ उसमें शिव कुमार शर्मा की छाप स्पष्ट दिखती है। वहीं अंतरे के बीच में अनुपमा देशपांडे के आलाप का भी बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। सुरेश वाडकर के सनी, लेकिन, सदमा में गाए गीतों की श्रेणी में मुझे ये गीत भी लगता है।

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है
लगी आज सावन की ...

कुछ ऐसे ही दिन थे वो जब हम मिले थे
चमन में नहीं फूल दिल में खिले थे
वही तो है मौसम मगर रुत नहीं वो
मेरे साथ बरसात भी रो पड़ी है
लगी आज सावन की ...

कोई काश दिल पे ज़रा हाथ रख दे
मेरे दिल के टुकड़ों को एक साथ रख दे
मगर यह है ख्वाबों ख्यालों की बातें
कभी टूट कर चीज़ कोई जुड़ी है
लगी आज सावन की....

आनंद बख्शी का लिखे इस गीत के शब्द कुछ ऍसे हैं कि इसे सुनते ही दिल में मायूसी के बादल घुमड़ने लगते हैं और आखें खुद-ब-खुद नम हो जाती हैं। तो आइए सुनें हृदय को छूते इस गीत को


'एक शाम मेरे नाम' पर संगीत के सावनी रंगों में रंगिए इन प्रविष्टियों के साथ

Saturday, August 16, 2008

मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई भाग ४ - सुनिए बरसात की भीगी रातों में फिर कोई सुहानी याद आई Barsaat ki bheegi raton mein

इससे पहले कि क़तील के गीतों और गीतनुमा ग़ज़लों का जिक्र किया जाए, आज की शाम का आग़ाज क़तील की इस लोकप्रिय ग़ज़ल के चंद अशआरों से करते है्

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं

रब्ता बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं


क़तील ने एक शायर के रूप में तो प्रसिद्धि पाई ही, साथ ही साथ तमाम पाकिस्तानी और हिंदी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। जनवरी 1947 में क़तील को लाहौर के एक फिल्‍म प्रोड्यूसर ने गाने लिखने की दावत दी, उन्‍होंने जिस पहली फिल्‍म में गाने लिखे उसका नाम था ‘तेरी याद’ । वैसे तो हिंदी फिल्मों में 'गुमनाम' और फिर 'तेरी कहानी याद आई' में लिखे उनके गीत बेहद कर्णप्रिय हैं पर क़तील के लिखे गीतों में जो सबसे अधिक चर्चित हुआ वो था "मोहे आई न जग से लाज ....के घुँघरू टूट गए।" हम लोगों ने तो पहली बार इसे अनूप जलोटा के स्वर में सुना था पर बाद में पता चला कि इसे तो कितने ही गायकों ने अपनी आवाज़ से संवारा है। क़तील मज़ाहिया लहजे में कहते थे कि "जब तक भारत और पाकिस्तान का कोई भी गायक इस गीत को नहीं गा लेता वो गवैया नहीं कहलाता"।

अक्सर फिल्मों के गीत लिखने और साथ साथ शायर करने वालों को ठेठ साहित्यिक वर्ग हेय दृष्टि से देखता है। क़तील को भी इस वज़ह से अपने आलोचकों का सामना करना पड़ा। इसलिए इस गीत को मुशायरे में पढ़ते वक़्त क़तील ने इस बात पर जोर दिया कि उनके गीत सिर्फ फिल्मी नहीं बल्कि इल्मी भी होते हैं। देखिए इस मुशायरे में वो ये गीत किस अदा से पढ़ रहे हैं।






मोहे आई न जग से लाज
मैं इतना ज़ोर से नाची आज
के घुंघरू टूट गए
कुछ मुझ पे नया जोबन भी था
कुछ प्यार का पागलपन भी था
हर पलक मेरी तीर बनी
और ज़ुल्फ़ मेरी ज़ंजीर बनी
लिया दिल साजन का जीत
वो छेड़े पायलिया ने गीत
के घुंघरू टूट गए

धरती पे न मेरे पैर लगे
बिन पिया मुझे सब ग़ैर लगे
मुझे अंग मिले अरमानों के
मुझे पंख मिले परवानों के
जब मिला पिया का गाँव
तो ऐसा लचका मेरा पाँव
के घुंघरू टूट गए


मेहंदी हसन साहब का गाया हुआ "जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ..." जैसा अजर अमर गीत भी क़तील शिफ़ाई ने ही लिखा था।

तलत अज़ीज ने भी क़तील की कई गीतनुमा ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी है। उम्मीद है कि बरसात के इस मौसम में इस ग़ज़ल को सुनकर तलत अज़ीज की आवाज़ आपको अपनी कुछ पुरानी यादों तक पहुँचने में मदद करेगी। वैसे भी इस ग़ज़ल के मक़ते में जिसे तलत अज़ीज ने गाया नहीं है क़तील खुद भी कहते हैं

हम चाक - ए-गिरेबाँ आप भी थे, क्या कहते क़तील जमाने से
छेड़ा जो पराया अफ़साना, अपनी भी कहानी याद आई






बरसात की भीगी रातों में फिर कोई सुहानी याद आई
कुछ अपना ज़माना याद आया, कुछ उनकी जवानी याद आई

हम भूल चुके थे, किस ने हमें, दुनिया में अकेला छोड़ दिया
जब गौर किया तो इक सूरत जानी पहचानी याद आई

कुछ पाँव के छाले, कुछ आँसू, कुछ गर्द-ए-सफ़र, कुछ तनहाई
उस बिछड़े हुए हमराही की एक-एक निशानी याद आई

फिर सब्र का दामन छूट गया, शीशे की तरह दिल टूट गया
तनहाई के लमहों में शायद फिर कोई पुरानी याद आई


क़तील शिफाई पर इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी में पेश करूँगा क़तील शिफ़ाई की लिखी और तलत अजीज की गाई एक और ग़ज़ल जिसे गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है...

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई : भाग:१, भाग: २, भाग: ३, भाग: ४, भाग: ५

अगर आपकों कलम के इन सिपाहियों के बारे में पढ़ना पसंद है तो आपको इन प्रविष्टियों को पढ़ना भी रुचिकर लगेगा
  1. क़तील शिफ़ाई भाग:१, भाग: २, भाग: ३
  2. मज़ाज लखनवी भाग:१, भाग: २
  3. फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३
  4. परवीन शाकिर भाग:१, भाग: २
  5. सुदर्शन फ़ाकिर

Monday, August 11, 2008

'मोहब्बतों का शायर' क़तील शिफ़ाई भाग -३ : ना कोई खाब हमारे हैं ना ताबीरे हैं, हम तो पानी पे बनाई हुई तसवीरें हैं...

क़तील की शायरी को जितना पढ़ेंगे आप ये महसूस करेंगे कि प्रेम, वियोग, बेवफाई की भावना को जिस शिद्दत से उन्होंने अपनी लेखनी का विषय बनाया है, वैसा गिने चुने शायरों की शायरी में ही नज़र आता है। आज के इस भाग में आपको सुनवाएँगे क़तील की आवाज में उनकी एक खूबसूरत क़ता और ग़ज़ल, उनकी शक्ल-ओ-सूरत के बारे में प्रकाश पंडित की चुटकियाँ और आखिर में प्रेम के वियोग में डूबी उनकी एक ग़ज़ल जिसे अपनी आवाज़ में मैंने आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

क्या आप मानते हैं कि प्रेम में डूबकर कोई चमत्कार संभव है? क्या आपने ऍसा महसूस नहीं किया कि प्रेम आपकी सोच को उस मुहाने तक ले जाता है जहाँ दिमाग रूपी नदी में उठती लहरें शिथिल पड़ जाती हैं। शायद ऍसे ही किसी मूड में क़तील कह उठते हैं



बशर1 के रूप में इक दिलरुबा तिलिस्म बने
शफक़2 में धूप मिलाएँ तो उसका जिस्म बने
वो मोजज़ा3 की हद तक पहुँच गया है क़तील
रूप कोई भी लिखूँ उसी का इस्म4 बनें

1.मनुष्य, 2.प्रातः काल या संध्या के समय में आकाश में छाई लाली, 3. चमत्कार, 4.छवि, नाम

अपनी इस रिकार्डिंग में क़तील एक अलहदा अंदाज में जब अपना ये फिलासफिकल शेर पढ़ते हैं तो मन बाग-बाग हो जाता है

ना कोई खाब हमारे हैं ना ताबीरे हैं
हम तो पानी पे बनाई हुई तसवीरें हैं

और जब इस शेर का जिक्र आया है तो इस ग़ज़ल का मकता भी आपसे बाँटता चलूँ

हो ना हो ये कोई सच बोलने वाला है क़तील
जिसके हाथों में कलम पावों में जंजीरे हैं

तो चलिए अब ले चलते हैं आपको एक मुशायरे में जहाँ क़तील अपनी बुलंद आवाज़ ये ग़ज़ल पढ़ रहे हैं और अपने साथियों की वाहा वाही लूट रहे हैं।


ये मोज़जा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे
कि संग तुझ पे गिरे और जख़्म आए मुझे

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे ज़हाँ को है मालूम
दगा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे

वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूं नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे
मैं अपनी जात में नीलाम हो रहा हूँ क़तील
गम-ए-हयात1 से कह दो खरीद लाए मुझे
1. जीवन
इस ग़ज़ल में चंद शेर और हैं जो मुझे बेहद प्यारे हैं। अब यहाँ गौर फरमाइए कितने तरीके से बात रखी है अपनी शायर ने..

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही, दोपहर ना भाये मुझे

और मेरे मित्र ध्यान रखें :)

वही तो सबसे ज्यादा है नुक़्ताचीं मेरा
जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे

ये मुशायरा तो संभवतः नब्बे के दशक के उत्तरार्ध का है। क़तील के बारे में इतना पढ़ने के बाद म पाठकों में सहज उत्सुकता जाग उठी होगी कि 'मोहब्बतों का ये शायर ' अपनी जवानी में कैसा दिखता होगा ? मेरे पास युवा क़तील की कोई तसवीर तो नहीं पर प्रकाश पंडित का ये शब्द चित्र, जरूर उनकी शक्ल-ओ-सूरत का खाका आपके ज़ेहन में खींचने में सफल होगा, ऍसा मुझे यकीं है। प्रकाश पंडित साहब बड़े ही मज़ाहिया लहजे में युवा क़तील के बारे में लिखते हैं...

".....क़तील’ शिफ़ाई जाति का पठान है और एक समय तक गेंद-बल्ले, रैकट, लुंगियाँ और कुल्ले बेचता रहा है, चुँगीख़ाने में मुहर्रिरी और बस-कम्पनियों में बुकिंग-क्लर्की करता रहा है तो उसके शे’रों के लोच-लचक को देखकर आप अवश्य कुछ देर के लिए सोचने पर विवश हो जाएँगे। इस पर यदि कभी आपको उसे देखने का अवसर मिल जाए और आपको पहले से मालूम न हो कि वह ‘क़तील’ शिफ़ाई है, तो आज भी आपको वह शायर की अपेक्षा एक ऐसा क्लर्क नज़र आएगा जिसकी सौ सवा सौ की तनख्वाह के पीछे आधे दर्जन बच्चे जीने का सहारा ढूँढ़ रहे हों। उसका क़द मौज़ूँ है, नैन-नक़्श मौज़ूँ हैं। बाल काले और घुँघराले हैं। गोल चेहरे पर तीखी मूँछें और चमकीली आँखें हैं और वह हमेशा ‘टाई’ या ‘बो’ लगाने का आदी। फिर भी न जाने क्यों पहली नज़र में वह ऐसा ठेठ पंजाबी नज़र आता है जो अभी-अभी लस्सी के कुहनी-भर लम्बे दो गिलास पीकर डकार लेने के बारे में सोच रहा हो।
पहली नज़र में वह जो भी नज़र आता हो, दो-चार नज़रों या मुलाक़ातों के बाद बड़ी सुन्दर वास्तविकता खुलती है-कि वह डकार लेने के बारे में नहीं, अपनी किसी प्रेमिका के बारे में सोच रहा होता है-उस प्रेमिका के बारे में जो उसे विरह की आग में जलता छोड़ गई, या उस प्रेमिका के बारे में जिसे इन दिनों वह पूजा की सीमा तक प्रेम करता है। ......."

ऊपर की बातों को समझने के लिए मुझे कुछ और कहने की जरूरत नहीं बस इस ग़जल को एक बार पढ़ लें,

मेरी जिंदगी, तू फिराक़ है ,वो अज़ल से दिल में मकीं सही
वो निगाह-ए-शौक से दूर हैं ,रग-ए-जां1 से लाख क़रीं सही

1शरीर की मुख्य रक्तवाहिनी

हमें जान देनी है एक दिन, वो किसी तरह वो कहीं सही
हमें आप खींचिए वार पर, जो नहीं कोई तो हमीं सही


सर-ए-तूर सार-ए-हश्र हो, हमें इंतज़ार क़बूल है
वो कभी मिलें वो कहीं मिलें, वो कभी सही, वो कहीं सही


ना हो उन पे मेरा बस नहीं, कि ये आशिकी है हवस नहीं
मैं उन्हीं का था, मैं उन्हीं का हूँ, वो मेरे नहीं, तो नहीं सही


मुझे बैठने की जगह मिले, मेरी आरजू का भरम रहे
तेरी अंजुमन में अगर नहीं , तेरी अंजुमन के करीं सही

तेरा दर तो हमको ना मिल सका, तेरी रहगुजर की जमीं सही
हमें सज़दा करने से काम है जो वहाँ नहीं तो यहीं सही

उसे देखने की जो लौ लगी तो क़तील देख ही लेंगे हम
वो हज़ार आँख से दूर हो, वो हज़ार पर्दानशीं सही

मैंने क़तील साहब की आवाज़ में ये ग़ज़ल खोजने की कोशिश की पर नहीं मिली तो अपनी आवाज़ में इसे पढ़ने की कोशिश की है। इस ग़ज़ल को पढ़ते वक़्त मुझे एक अलग तरह का प्रवाह और जुनूं का एहसास हुआ इसलिए ये अंदाजा लगा सकता हूँ कि इसे लिखने वाला अपनी मोहब्बत में किस क़दर जुनूनी रहा होगा।

तो जनाब इस ग़ज़ल में आपको डूबता छोड़ इस भाग का यहीं समापन करता हूँ। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में क़तील की ग़जलों के आलावा पहली बार सुनेंगे उनकी आवाज़ में उनका लिखा एक बहुचर्चित गीत....

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ
मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई : भाग:१, भाग: २, भाग: ३, भाग: ४, भाग: ५


अगर आपकों कलम के इन सिपाहियों के बारे में पढ़ना पसंद है तो आपको इन प्रविष्टियों को पढ़ना भी रुचिकर लगेगा
  1. क़तील शिफ़ाई भाग:१, भाग: २, भाग: ३
  2. मज़ाज लखनवी भाग:१, भाग: २
  3. फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३
  4. परवीन शाकिर भाग:१, भाग: २
  5. सुदर्शन फ़ाकिर

Friday, August 08, 2008

मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई भाग २ : इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम, तोहमतें बँटती नहीं खैरात में

यूँ तो जगजीत जी ने कतील शिफ़ाई की बहुत सारी ग़ज़लें गाई हैं पर मुझे उनमें से तीन मेरी आल टाइम फेवरट ग़जलें हैं। तो चलिए आज की शाम की महफिल सजाते हैं जगजीत जी की गाई इन तीनों ग़जलों से । और पिछली पोस्ट की तरह महफिल का अंत क़तील की आवाज़ में पढ़ी गई उनकी एक खूबसूरत ग़ज़ल से....

जिंदगी में कभी आप जब अपने प्यारे हमसफ़र के साथ बैठे हों और मन अपने साथी के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने को मचल रहा हो तो किस तरह अपनी भावनाओं को शब्द देंगे आप? क्या कहेंगे आप उससे ? आपका उत्तर तो मुझे नहीं मालूम पर मैं तो क़तील की इस ग़ज़ल का ही सहारा लूँगा। इसका हर एक शेर कमाल है। कॉलेज के जमाने में इस ग़ज़ल को जब पहली बार सुना था तो महिनों अपने आप को इस ग़ज़ल के प्रभाव से मुक्त नहीं कर पाया था। दरअसल सीधे सादे शब्दों से एक गहरी भावना को निकाल पाना सबके बूते की बात नहीं है। पर क़तील को इस फ़न में कमाल हासिल था। मतले पर गौर करें क्या आगाज़ है इस ग़ज़ल का



अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ


और फिर ये शेर..सुभानअल्लाह !

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ


छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी को घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

क़तील की जिंदगी में कई प्रेमिकाएँ आईं जिनके बारे में प्रकाश पंडित जी ने लिखा है

"प्रेम और पूजा की सीमा तक प्रेम उसने अपनी हर प्रेमिका से किया है और उसकी हर प्रेमिका ने वरदान-स्वरूप उसकी शायरी में निखार और माधुर्य पैदा किया है, जैसे ‘चन्द्रकान्ता’ नाम की एक फिल्म ऐक्ट्रेस ने किया है जिससे उसका प्रेम केवल डेढ़ वर्ष तक चल सका और जिसका अन्त बिलकुल नाटकीय और शायर के लिए अत्यन्त दुखदायी सिद्ध हुआ। लेकिन ‘क़तील’ के कथनानुसार : "यदि यह घटना न घटी होती तो शायद अब तक मैं वही परम्परागत गज़लें लिख रहा होता, जिनमें यथार्थ की अपेक्षा बनावट और फैशन होता है। इस घटना ने मुझे यथार्थवाद के मार्ग पर डाल दिया और मैंने व्यक्तिगत घटना को सांसारिक रंग में ढालने का प्रयत्न किया। अतएव उसके बाद जो कुछ भी मैंने लिखा है वह कल्पित कम और वास्तविक अधिक है।".

प्रकाश शायर की जिंदगी में प्रेरणा के महत्त्व के बारे में अपने लेख में आगे लिखते हैं.....

चन्द्रकान्ता से प्रेम और विछोह से पहले ‘क़तील’ शिफ़ाई आर्तनाद क़िस्म की परम्परागत शायरी करते थे और ‘शिफ़ा’ कानपुरी नाम के एक शायर से अपने कलाम पर सलाह लेते थे। फिर 'अहमद नदीम क़ासमी' साहब से भी उन्होंने मैत्रीपूर्ण परामर्श लिये। लेकिन किसी की इस्लाह या परामर्श तब तक किसी शायर के लिए हितकर सिद्ध नहीं हो सकते जब तक कि स्वयं शायर के जीवन में कोई प्रेरक वस्तु न हो। लगन और क्षमता का अपना अलग स्थान है, लेकिन इस दिशा की समस्त क्षमताएँ मौलिक रूप से उस प्रेरणा ही के वशीभूत होती हैं,जिसे ‘मनोवृत्तान्त’ का नाम दिया जा सकता है।
अगर ऊपर की ग़ज़ल में आपको प्रेम का सैलाब उमड़ता दिख रहा है तो इस ग़ज़ल पर निगाह डालिए। बेवफाई से छलनी हृदय की वेदना नज़र आएगी आपको इसमें। दरअसल किसी शायर या कवि की लेखनी उसके व्यक्तित्व का आईना है बशर्त्ते उसे पढ़ और समझ पाने का हुनर आप में मौजूद हो। इस ग़ज़ल को मैंने पहली बार आकाशवाणी पटना से सुना था और पहली बार सुन कर मन में एक उदासीनता का भाव व्याप्त हो गया था। मेरे एक मित्र ने बताया था कि जगजीत जी अपनी कानसर्ट में ये ग़ज़ल जल्दी नहीं गाते और गाते हैं तो मतले और उसके बाद का शेर उन्हें अपने बेटे की याद दिलाकर भावुक कर देता है। जगजीत जी ने इस ग़ज़ल में क़तील के साहब के उन चार शेरों को चुना है जो इस ग़ज़ल की जान हैं...




सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं

बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफ़िलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं


मैं ख़ुदकशी के जुर्म का करता हूँ ऐतराफ़
अपने बदन की क़ब्र में कब से गड़ा हूँ मैं


किस-किसका नाम लाऊँ ज़बाँ पर कि तेरे साथ
हर रोज़ एक शख़्स नया देखता हूँ मैं

ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं


ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रक़ीब
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं

जागा हुआ ज़मीर वो आईना है "क़तील"
सोने से पहले रोज़ जिसे देखता हूँ मैं


जिंदगी की कितनी सुनसान रातें आसमान के इन चाँद तारों से मूक संवाद करते हुए बिताई हैं उसका कोई हिसाब फिलहाल मेरे पास नहीं। आज भी जब कभी अभी अपने घर जाता हूँ तो रात में छत पर चहलकदमी करते हुए सितारों से क़तील की जुबां में गुफ़्तगू करना बहुत भाता है..



परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हँसो और हँसते-हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ

तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ

कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जा

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे
अभी कुछ बेक़रारी है सितारों तुम तो सो जाओ


इस ग़ज़ल को पाकिस्तानी फिल्म इश्क़ ए लैला में भी शामिल किया गया था जहाँ इसे आवाज़ दी थी इकबाल बानो ने। पिछली पोस्ट में यूनुस भाई ने क़तील के मुशायरे का वीडिओ देने का अनुरोध किया था। तो आज सुनने के साथ क़तील साहब को देखिए उनकी मशहूर ग़ज़ल हाथ दिया उसने मेरे हाथ में....
हाथ दिया उसने मेरे हाथ में
मैं तो वली बन गया इक रात में

इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बँटती नहीं खैरात में

इश्क़ बुरी शै सही पर दोस्तों
दखल ना दो तुम मेरी हर बात में

मुझ पे तवोज्जह है सब *आफ़ाक़ के (*संसार)
कोई कशिश तो है मेरी जात में

रब्त बढ़ाया ना 'क़तील' इसलिए
फर्क़ था दोनों के ख़यालात में



आज तो बस इतना ही अगले भाग में फिर मिलेंगे उनकी कुछ और ग़ज़लों के साथ...

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  4. सुदर्शन फ़ाकिर

Wednesday, August 06, 2008

'मोहब्बतों का शायर' क़तील शिफ़ाई भाग १ : गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे सुनिए क़तील की आवाज़ में...

क़तील शिफ़ाई की शायरी से मेरा परिचय जगजीत सिंह जी की वज़ह हुआ। जगजीत जी अपने अलग अलग एलबमों में उनकी कई ग़ज़लें गाई हैं जिसमें ज्यादातर ग़जलें इश्क़ मोहब्बत के अहसासों से भरपूर है। दरअसल प्रेम क़तील की अधिकांश ग़ज़लों और नज्मों का मुख्य विषय रहा है इसलिए उन्हें 'मोहब्बतों का शायर' भी कहा जाता है। बाद में विभिन्न शायरी मंचों में क़तील की कई और ग़ज़लें और नज़्में पढ़ने को मिलीं। आज से शुरु होने वाली इस श्रृंखला में मैं आपसे बाटूँगा क़तील साहब की जिंदगी से जुड़ी बातों के साथ उनकी चंद ग़ज़लें और नज़्में जो मुझे बेहद पसंद हैं।

क़तील का जन्म पश्चिमी पंजाब के हरीपुर, ज़िला हज़ारा (पाकिस्तान) में हुआ। क़तील उनका तख़ल्‍लुस था, क़तील यानी वो जिसका क़त्‍ल हो चुका हैअपने उस्‍ताद हकीम मुहम्‍मद शिफ़ा के सम्‍मान में क़तील ने अपने नाम के साथ शिफ़ाई शब्‍द जोड़ लिया था । क़तील अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इस्लामिया मिडिल स्कूल, रावलपिंडी में प्राप्त करने के बाद गवर्नमेंट हाई स्कूल में दाखिल हुए, लेकिन पिता के देहान्त और कोई अभिभावक न होने के कारण शिक्षा जारी न रह सकी और पिता की छोड़ी हुई पूँजी समाप्त होते ही उन्हें तरह-तरह के व्यापार और नौकरियाँ करनी पड़ीं। साहित्य की ओर इनका ध्यान इस तरह हुआ कि क्लासिकल साहित्य में पिता की बहुत रुचि थी और ‘क़तील’ के कथनानुसार, ‘‘उन्होंने शुरू में मुझे कुछ पुस्तकें लाकर दीं जिनमें ‘क़िस्सा चहार दरवेश’ ‘क़िस्सा हातिमताई’ आदि भी थीं। वे अक्सर उन्हें पढ़ते थे जिससे उन्हें लिखने का शौक़ हुआ।

क़तील शिफाई के बारे में मैंने तफ़सील से जाना, जनाब प्रकाश पंडित संपादित किताब 'क़तील शिफाई और उनकी शायरी' को पढ़ने के बाद। सच में क़तील की शख्सियत का अंदाजा आप उनकी शायरी से नहीं लगा सकते।

प्रकाश इस किताब के परिचय में क़तील के बारे बड़े रोचक में अंदाज में लिखते हैं
किसी शायर के शेर लिखने के ढंग आपने बहुत सुने होंगे। उदाहरणतः ‘इकबाल’ के बारे में सुना होगा कि वे फ़र्शी हुक़्क़ा भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शे’र डिक्टेट कराना शुरू कर देते थे। ‘जोश’ मलीहाबादी सुबह-सबेरे लम्बी सैर को निकल जाते हैं और यों प्राकृतिक दृश्यों से लिखने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। लिखते समय बेतहाशा सिगरेट फूँकने चाय की केतली गर्म रखने और लिखने के साथ-साथ चाय की चुस्कियाँ लेने के बाद (यहाँ तक कि कुछ शायरों के सम्बन्ध में यह भी सुना होगा कि उनके दिमाग़ की गिरहें शराब के कई पैग पीने के बाद) खुलनी शुरू होती हैं। लेकिन यह अन्दाज़ शायद ही आपने सुना हो कि शायर शेर लिखने का मूड लाने के लिए सुबह चार बजे उठकर बदन पर तेल की मालिश करता हो और फिर ताबड़तोड़ डंड पेलने के बाद लिखने की मेज पर बैठता हो। यदि आपने नहीं सुना तो सूचनार्थ निवेदन है कि यह शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई है।क़तील’ शिफ़ाई के शे’र लिखने के इस अन्दाज़ को और उसके लिखे शे’रों को देखकर आश्चर्य होता है कि इस तरह लंगर-लँगोट कसकर लिखे गये शे’रों में कैसे झरनों का-सा संगीत फूलों की-सी महक और उर्दू की परम्परागत शायरी के महबूब की कमर-जैसी लचक मिलती है। अर्थात् ऐसे वक़्त में जबकि उसके कमरे से ख़म ठोकने और पैंतरें बदलने की आवाज़ आनी चाहिए, वहाँ के वातावरण में कुछ ऐसी गुनगुनाहट बसी होती है।

क़तील की शायरी की खास बात ये है कि वो बशीर बद्र साहब की तरह ही बड़े सादे लफ्ज़ों का प्रयोग कर भी कमाल कर जाते हैं। मिसाल के तौर पर उनकी इस ग़ज़ल के चंद अशआर देखिए

प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं


बेरुखी इस से बड़ी और भला क्या होगी
इक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं

सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं

तुम तो शायर हो क़तील और वो इक आम सा शख़्स
उस ने चाहा भी तुझे जताया भी नहीं


कितनी सहजता से कहे गए शेर जिसको पढ़ कर दिल अपने आप पुलकित हो जाता है। अगर मेरी बात पर अब तक यकीन नहीं आ रहा तो क़तील के इस अंदाजे बयाँ के बारे में आपका क्या खयाल है ?


गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे


मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे


जब तशनगी की आखिरी हद पर मिले कोई
आँख उसकी जाम बदन महक़दा लगे

मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मुझको रक़ीब की न कहीं बददुआ लगे


वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आशना लगे

एक ऍसी खुशजमाल परी अपनी सोच है
जो सबके साथ रह के भी सब से जुदा लगे

देखा ये रंग बैठ के बहुरूपियों के बीच
अपने सिवा हर एक मुझे पारसां लगे

तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे

और खुद अगर क़तील शिफ़ाई आपको ये ग़ज़ल अपनी आवाज़ में सुनाएँ तो कैसा रहे ? तो लीजिए हजरात सुनिए ये ग़ज़ल क़तील की अपनी आवाज़ में...


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई : भाग:1, भाग: 2, भाग: 3, भाग: 4, भाग: 5


अगर आपकों कलम के इन सिपाहियों के बारे में पढ़ना पसंद है तो आपको इन प्रविष्टियों को पढ़ना भी रुचिकर लगेगा

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