Tuesday, December 29, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2009 का आगाज़ और एक नज़र पिछली संगीतमालाओं पर....

वार्षिक संगीतमाला 2009 में आप सबका स्वागत है। जैसा कि मैं पहले भी इस चिट्ठे पर कह चुका हूँ कि वार्षिक संगीतमालाएँ मेरे लिए नए संगीत में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उसको आप तक संजों लाने की कोशिश मात्र है। बचपन से रेडिओ सीलोन की अमीन सयानी की बिनाका और फिर विविधभारती पर नाम बदल कर आने वाली सिबाका गीतमाला सुनता रहा। उसका असर इतना था कि जब 2005 के आरंभ में अपने रोमन हिंदी ब्लॉग की शुरुआत की तो मन में एक ख्वाहिश थी कि अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के गीतों को पेश करूँ।

तो आइए एक नज़र डालें पिछले चार साल की संगीतमालाओं की तरफ। मैंने अपनी पहली संगीतमाला की शुरुआत 2004 के दस बेहतरीन गानों से की जिसे 2005 में 25 गानों तक कर दिया। 2006 में जब खालिस हिंदी ब्लागिंग में उतरा तो ये सिलसिला इस ब्लॉग पर भी चालू किया जो कि आज अपने चौथे साल में है।

वार्षिक संगीतमाला 2004 में मेरी गीतमाला के सरताज गीत का सेहरा मिला था फिर मिलेंगे में प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध गीत "खुल के मुस्कुरा ले तू" को जबकि दूसरे स्थान पर भी इसी फिल्म का गीत रहा था कुछ खशबुएँ यादों के जंगल से बह चलीं। ये वही साल था जब कल हो ना हो, रोग, हम तुम, मीनाक्षी और पाप जैसी फिल्मों से कुछ अच्छे गीत सुनने को मिले थे।

वार्षिक संगीतमाला 2005 में बाजी मारी स्वानंद किरकिरे और शान्तनु मोइत्रा की जोड़ी ने जब परिणिता फिल्म का गीत 'रात हमारी तो चाँद की सहेली' है और हजारों ख्वाहिशें ऍसी के गीत 'बावरा मन देखने चला एक सपना' क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान पर रहे थे।

वार्षिक संगीतमाला 2006 में ओंकारा और गुरु के गीत छाए रहे पर बाजी मारी 'उमराव जान' के संवेदनशील गीत 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' ने। इस गीत और दूसरे नंबर के गीत 'मितवा ' को लिखा था जावेद अख्तर साहब ने

वार्षिक संगीतमाला 2007 में एक बार फिर प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध, 'तारे जमीं पर' के गीतों के बीच ही प्रथम और द्वितीय स्थानों की जद्दोजहद होती रही। पर माँ...जैसे नग्मे की बराबरी भला कौन गीत कर सकता था


वार्षिक संगीतमाला 2008 का सरताज गीत बना आमिर फिल्म का संवेदनशील नग्मा इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला ने।

इसकी मुख्य वज़ह थी इस गीत में संगीत, बोल और गायिकी का अद्भुत समनव्यन। ये कमाल था संगीतकार अमित त्रिवेदी, गायिका शिल्पा राव और गीतकार अमिताभ की बेमिसाल तिकड़ी का।


आमिर फिल्म के जबरदस्त संगीत की बदौलत गर अमित त्रिवेदी ने विजेता का आसन सँभाला तो रनर्स अप गीत कहने को जश्न-ऐ-बहारा है की मदद से संगीतकार ए आर रहमान ने पिछले साल की संगीतमाला पर अपनी बादशाहत कायम रखी।

जोधा अकबर, युवराज, जाने तू या जाने ना, गज़नी की बदौलत २००८ की वार्षिक संगीतमाला में उनके गीत दस बार बजे। रहमान के आलावा इस साल के अन्य सफल संगीतकारों में विशाल शेखर, सलीम सुलेमान और अमित त्रिवेदी का नाम लिया जा सकता है।

वार्षिक संगीतमाला 2008 में अमिताभ वर्मा, जयदीप साहनी, अशोक मिश्रा, इरफ़ान सिद्दकी, मयूर सूरी, कौसर मुनीर,अब्बास टॉयरवाला और अन्विता दत्त गुप्तन जैसे नए गीतकारों ने पहली बार अपनी जगह बनाई। इतने सारे प्रतिभाशाली गीतकारों का उभरना फिल्म संगीत के लिए शुभ संकेत है। वहीं गायक गायिकाओं में विजय प्रकाश, जावेद अली, राशिद अली, श्रीनिवास और शिल्पा राव जैसे नामों ने पहली बार संगीत प्रेमी जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

इस साल हिंदी फिल्म संगीत में पिछले साल की अपेक्षा फीके पकवान ही परोसे गए हैं। फिर भी मेरी कोशिश रहेगी कि इस शोर के बीच उन सुरीले गीतों को आपके सामने लाऊँ जो शायद आपकी नज़रों से गुजरे बिना निकल गए हों। हमेशा मित्र ये प्रश्न करते रहे हैं कि गीतमाला में कोई गीत मैंने इतनी ऊपर या नीचे क्यूँ रखा?

अब ये स्पष्ट कर दूँ कि इस गीतमाला का सीधे सीधे पॉपुलरटी से लेना देना नहीं है। गायिकी, संगीत, बोल और इनके सम्मिलित प्रभाव इन सभी आधारों को बराबर वज़न दे कर मैं अपनी पसंद के गीतों का क्रम तैयार करता हूँ। कई बार ये स्कोर्स लगभग बराबर होते हैं और तब गीतों को ऊपर नीचे करना बड़ा दुरुह होता है। हाँ, गीत से जुड़ी पोस्ट में मेरी पसंद के कारणों का जिक्र आप हमेशा की तरह पढ़ेंगे। प्रस्तुत गीत के बारे में पाठकों की राय भिन्न हो सकती है और उस बारे में आप अपना मंतव्य बेहिचक दें।

सवाल ये है कि वर्ष 2009 की इस संगीतमाला में क्या कोई नया सितारा सामने आएगा या फिर पुराने दिग्गज ही छाए रहेंगे? ये तो आप तभी जान पाएँगे जब आप अगले 2 महिनों तक संगीत के इस सफ़र में मेरे साथ होंगे। संगीतमाला में आप गीत तो सुनेंगे ही। साथ ही हर साल की तरह मेरी कोशिश रहेगी उन नए उभरते कलाकारों से आपको रूबरू कराने की जो इस साल के संगीत पटल पर तेजी से उभरे हैं। तो तैयार है ना आप हिंदी ब्लागिंग की सबसे पुरानी गीतमाला की उलटी गिनती यानि 25 वीं सीढ़ी से लेकर पहली सीढ़ी तक चढ़ने के लिए...

Thursday, December 24, 2009

रेत में सर किए यूँ ही बैठा रहा, सोचा मुश्किल मेरी ऐसे टल जाएगी...

जिंदगी में बहुत कुछ अपने आस पास के हालात में, अपने समाज में, अपने देश में हम बदलते देखना चाहते हैं। पर सब कुछ वैसा ही रहने पर सारा दोष तत्कालीन व्यवस्था यानि सिस्टम पर मढ़ देते हैं।
  • राजनीति गंदी है कोई नैतिक स्तर तो आजकल रह ही न हीं गया है... ऐसे जुमले रोज़ उछाला करेंगे। पर मतदान का दिन आएगा तो उसे छुट्टी का आम दिन बनाकर बैठ जाएँगे।
  • भ्रष्टाचार चरम पर है इस पर कार्यालय और घर में लंबी चौड़ी बहस करेंगे पर अपना कोई काम फँस गया हो कहीं तो चपरासी से लेकर क्लर्क तक को छोटी मोटी रिश्वत देने से नहीं कतराएँगे।
  • अपने घर को साफ सुथरा रखेंगे पर घर से बाहर निकलेंगे तो फिर जहाँ जाएँगे कूड़ेदान की तलाश बिना किए चीजों को इधर उधर फेकेंगे। फिर ये भी टिप्पणी करने से नहीं चूकेंगे कि ये जगह कितनी गंदी है। सरकार कुछ भी नहीं करती।


ऐसे कितने ही और उदहारण दिए जा सकते हैं। मुद्दा ये है कि हमारा ध्यान इस बात पर ज्यादा है कि बाकी लोग क्या नहीं कर रहे हैं। ये विचार करने की बात है कि आखिर हमने समाज और अपने आसपास के हालातों को बदलने के लिए कितना कुछ किया है या फिर सब कुछ दूसरों के लिए छोड़ रखा है।

आज जबकि इस साल का अंत करीब आ रहा है आप सब को ऍसे ही विचारों से ओतप्रोत एक गीत सुनवाना चाहता हूँ जो हमें अपने समाज के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही ये गीत इस बात की भी आशा दिलाता है कि ऍसा करने से शायद आपको अपनी जिंदगी के नए माएने भी दिख जाएँ।

सरल शब्दो का भी अगर सही ढ़ंग से मेल करवाया जाए तो उससे उपजी भावनाएँ भी मन पर गहरा असर डालती हैं। जब ऐसे गीतों को पूरी भावना से गायक या गायिका अपना स्वर देता है तो फिर गीत के साथ संगीत का रहना बेमानी सा हो जाता है। नवोदित गायिका शिल्पा राव के गाए इस गीत में भी वही बात है। तो आइए पहले इस गीत के बोलों से परिचित हो लें और फिर सुनें इस गीत को..






रेत में सर किए यूँ ही बैठा रहा
सोचा मुश्किल मेरी ऐसे टल जाएगी
और मेरी तरह सब ही बैठे रहे
हाथ से अब ये दुनिया निकल जाएगी
दिल से अब काम लो
दौड़ कर थाम लो
जिंदगी जो बची है फिसल जाएगी

थोड़ी सी धूप है आसमानों में अब
आँखें खोलों नहीं तो ये ढ़ल जाएगी
आँखें मूँदे हैं ये छू लो इसको ज़रा
नब्ज़ फिर जिंदगी की ये चल जाएगी

दिल से अब काम लो
दौड़ कर थाम लो
जिंदगी जो बची है फिसल जाएगी


क्या आपको नहीं लगता कि ये वक्त अपनी अपनी जिंदगियों में झाँकने का है ? साथ ही कहीं कोई फिसलन दिखे तो विचारने का है कि इसे हम किस तरह बदल सकते हैं।

वैसे ये बता दूँ कि ये गीत पिछले साल मुंबई पर हुए हमलों के मद्देनज़र लिखा गया था। इसे यू ट्यूब पर आप यहाँ देख सकते हैं।




चलते चलते 'एक शाम मेरे नाम' के सभी पाठकों को क्रिसमिस की हार्दिक शुभकामनाएँ। अब इस चिट्ठे के सालाना आयोजन वार्षिक संगीतमाला २००९ के आगाज़ के साथ आप से फिर मुलाकात होगी। तो तब तक के लिए आज्ञा..

Saturday, December 19, 2009

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे : शहरयार की एक दिलकश ग़ज़ल सुरेश वाडकर के स्वर में

पिछले एक हफ्ते से ब्लॉगों की दुनिया से दूर रहा। सोचा था कि जाने के पहले सुरेश वाडकर की ये सर्वप्रिय ग़ज़ल सिड्यूल कर आपके सुपुर्द करूँगा पर उसके लिए भी वक़्त नहीं मिला। ख़ैर अब अपनी यात्रा से लौट आया हूँ तो ये ग़ज़ल आपके सामने हैं। इसे लिखा था शहरयार यानि कुँवर अखलाक़ मोहम्मद खान साहब ने।

यूँ तो शहरयार ने चंद फिल्मों के लिए ही अपनी ग़ज़लें लिखी हैं पर वे ग़ज़लें हिन्दी फिल्म संगीत के लिए मील का पत्थर साबित हुई हैं। अब चाहे आप उमराव जान की बात करें या गमन की। ये बात गौर करने की है कि इन दोनों फिल्मों के निर्देशक मुजफ़्फर अली थे। दरअसल शहरयार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जब उर्दू विभाग में पढ़ाते थे तब मुजफ्फर भी वहीं के छात्र थे और शहरयार साहब के काव्य संग्रह से वो इतने प्रभावित हुए कि उनकी दो ग़ज़लों को उन्होंने फिल्म गमन में ले लिया।

उनकी शायरी को विस्तार से पढ़ने का मौका तो अभी तक नहीं मिला पर उनकी जितनी भी ग़ज़लें सुनी हैं उनकी भावनाओं से खुद को जोड़ने में कभी दिक्कत महसूस नहीं की। लेखक मोहनलाल, भारतीय साहित्य की इनसाइक्लोपीडिया (Encyclopedia of Indian Literature, Volume 5) में शहरयार साहब की शायरी के बारे में लिखते हैं

शहरयार ने अपनी शायरी में कभी भी संदेश देने या निष्कर्ष निकालने की परवाह नहीं की। वो तो आज के आदमी के मन में चल रहे द्वन्दों और अध्यात्मिक उलझनों को शब्दों में व्यक्त करते रहे। उनकी शायरी एक ऍसे आम आदमी की शायरी है जो बीत रहे समय और आने वाली मृत्यु जैसी जीवन की कड़वी सच्चाइयों के बीच झूलते रहने के बावज़ूद अपनी अभी की जिंदगी को खुल कर जीना चाहता है। शहरयार ऍसे ही व्यक्ति के ग़मों और खुशियों को अपने अशआरों में समेटते चलते हैं।

मेरी सोच यह है कि साहित्य को अपने दौर से अपने समाज से जुड़ा होना चाहिए, मैं साहित्य को मात्र मन की मौज नहीं मानता, मैं समझता हूँ जब तक दूसरे आदमी का दुख दर्द शामिल न हो तो वह आदमी क्यों पढ़ेगा आपकी रचना को। जाहिर है दुख दर्द ऐसे हैं कि वो कॉमन होते हैं। जैसे बेईमानी है, झूठ है, नाइंसाफी है, ये सब चीजें ऐसी हैं कि इनसे हर आदमी प्रभावित होता है। कुछ लोग कहते हैं कि अदब से कुछ नहीं होता है। मैं कहता हूँ कि अदब से कुछ न कुछ होता है।

अब १९७९ में प्रदर्शित गमन फिल्म की इसी ग़ज़ल पर गौर करें मुझे नहीं लगता कि हममें से ऍसा कोई होगा जिसने इन सवालातों को जिंदगी के सफ़र में कभी ना कभी अपने दिल से ना पूछा हो। मुझे यूँ तो इस ग़ज़ल के सारे अशआर पसंद हैं पर दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे.. वाला शेर सुनते ही मन खुद बा खुद इस गीत को गुनगुनाते हुए इसमें डूब जाता है।

दरअसल एक शायर की सफलता इसी बात में है कि वो अपने ज़रिए कितने अनजाने दिलों की बातें कह जाते हैं।

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है?
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है?

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेज़ान सा क्यूँ है?

तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ों
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है?

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है?

ऊपर से जयदेव का कर्णप्रिय सुकून देने वाला संगीत जिसमें सितार , बाँसुरी और कई अन्य भारतीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग मन को सोहता है। तो लीजिए सुनिए इस गीत को सुरेश वाडकर की आवाज़ में 


Monday, December 07, 2009

एक मतदानकर्मी की डॉयरी : बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ, ये लोकतंत्र देखने लायक़ तो है मगर हसीन नहीं

किसी भी चुनाव के आते ही सरकारी कार्यालयों, बैंकों, सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों में हलचल सी मच जाती है। इस हलचल को राजनीतिक सरगर्मी से जोड़ कर देखने की भूल मत कीजिएगा। दरअसल ये बेचैनी आती है चुनावी ड्यूटी में नाम आने की दहशत की वज़ह से। पर इस दहशत की वज़ह क्या है? आखिर ये वर्ग तो समाज का वो हिस्सा है जो पढ़ा लिखा है, जिसे रोज़गार के साधन उपलब्ध हैं। क्या लोकतंत्र के इस पुनीत पर्व में ये वर्ग अपने दायित्वों का वहन नहीं करना चाहता?

कुछ लोग तो बिल्कुल इस वज़ह से नहीं जाना चाहते कि चुनावी दिन मज़े से घर बैठने वाला छुट्टी का दिन लगता है। पर अधिकांश इस लिए नहीं जाना चाहते कि उन्हें अपनी जिंदगी खतरे में नज़र आती है। आज भी देश के कई प्रदेशों में चुनाव करवाना एक ऐसी क़वायद है जिसमें हमारे सैनिकों और नागरिकों की जिंदगी दाँव पर लग जाती है। दुर्भाग्य से झारखंड ऍसे प्रदेशों की सूची में प्रथम स्थान पर आता है। पर ये भी सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान करवाने का अनुभव एक ऐसा अनुभव है जो शहरों और कस्बों में रहने वाले मध्यमवर्गीय वर्ग को अपने देश की तथाकथित जम्हूरियत और उनके मनसबदारों के बारे में अपनी आस्थाओं और सोच पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर देता है। पिछले हफ्ते प्रथम चरण का चुनाव करा कर लौटे अपने कार्यालय के दो युवा मतदानकर्मियों की जब मैंने आपबीती सुनी तो लगा कि हम जिन परिस्थितियों में रहते हैं उससे बाहर की दुनिया कितनी पृथक है।

स्थान : मांडर

राँची शहर से मांडर प्रखंड की दूरी मात्र २५ किमी होगी। पूरे प्रखंड में ६९ गाँव हैं। हमारा काफ़िला बस में सवार हो कर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा है। मांडर अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाका है इसलिए पैट्रोलिंग पार्टी में राज्य की पुलिस का ही सशस्त्र बल है। पर सिर के गिरते बालों, कमर के ऊपर बढ़ती गोलाई और चेहरे की भावशून्यता शायद ही ये अहसास दिलाती है कि मैं किसी फोर्स के साथ चल रहा हूँ।

राँची से मांडर तक का रास्ता तो घंटे भर में खत्म हो जाता है। पर आगे तो गाड़ी जाने का रास्ता नहीं पगडंडी है तो पैदल ही जाना होगा। हमारा बूथ यहाँ से तीन किमी दूर है। गाँवों और खेत खलिहानों से होकर आधे पौन घंटे में हम सभी उस गाँव में जा पहुँचते हैं जहाँ हमारा मतदान केंद्र है। कच्चे मकानों के बीच पूरे गाँव में एक ही पक्की इमारत दिख रही है जो यहाँ का स्कूल है। मेरी भूमिका मतदान में मैक्रो आबसरवर की है। मतदान के पूर्व की तैयारी शुरु नहीं हो पाई है क्यूँकि EVM और बाकी सामग्री नहीं पहुँची। शाम के साथ ही पूरे गाँव में अँधेरा छा गया है। बाइक से एक व्यक्ति मशीन तो ले आया है पर रौशनी ना होने से कुछ काम आगे बढ़ नहीं रहा। स्कूल के एक कमरे में हम कुछ मोमबत्तियाँ जलाकर काम को किसी तरह निबटाना पड़ा है।

खाने और पीने के लिए जो घर से लाया था उसी से काम चलाना है। वैसे बगल में कुआँ है पर उसके मटमैले पानी को पीने की हिम्मत नहीं हो रही। वैसे भी ज्यादा खाना ना ही खाना श्रेयस्कर है क्यूँकि फिर तो जाड़े की इस कड़कड़ाती ठंड में खेतों के चक्कर लगाने के आलावा कोई उपाय ही नहीं बचेगा। मतदान तो प्रारंभ हो गया है पर मेरे मतदान केंद्र में मतदान की गति धीमी है। बाहर से हल्ले की आवाज़ आती है। देखता हूँ कि मतदानकर्मियों में से एक, जिसे सूची से मतदाताओं को चिन्हित करने का काम मिला है, बेहद मंथर गति से अपना काम कर रहा है। रास्ते में उससे परिचय हुआ था, एच ई सी में गार्ड है बेचारा। उसे देखने से तो लगता है कि अब तक सेवानिवृति हो जानी चाहिए थी पर फिर भी उसे भेजा गया है। उसकी कलम लिखते समय हिल रही है। लोगो के हल्ले से अब तो उसके हाथ भी काँपने लगे हैं। इतने में गश्त करने वाले मजिस्ट्रेट आ गए हैं। उन्होंने उसे वहाँ से हटाकर मुझे उस जगह पर बैठने को कहा है।

थोड़ी देर में एक मतदाता आकर मतदान करते वक़्त लाल बत्ती ना जलने की शिकायत करता है। अंदर जाकर देखता हूँ कि सचमुच बत्ती पिचक सी गई है। दरअसल कई मतदाता बटन दबाने की बजाए अपना सारा जोर उसके बगल में जलने वाली बत्ती को बटन समझ कर लगा रहे हैं। मतदान रोककर लोगों को समझाने का प्रयास करता हूँ कि उन्हें मतदान कैसे करना है पर मतदान खत्म होने पर देखता हूँ कि सभी प्रमुख उम्मीदवारों के बटन के बगल में जलने वाली बत्ती दबकर टूट चुकी है।

स्थान : तमाड़
तमाड़ राँची से जमशेदपुर जाने वाले सड़क मार्ग ५५ किमी दूरी पर है। तमाड़ प्रखंड के अंदर आने वाले गाँव नक्सल प्रभावित हैं। इसलिए यहाँ के चप्पे चप्पे पर CRPF ने अपनी टुकड़ियाँ लगा रखी हैं। माहौल चुनाव से ज्यादा युद्ध का लग रहा है। जगह-जगह लैंडमाइन का खतरा है। इसलिए मतदान केंद्र से १५ किमी पहले तक ही गाड़ी से जाने की व्यवस्था है। सात किमी का रास्ता पार कर मैं एक गाँव पहुँचता हूँ। इस बार चुनाव सामग्री साथ ही ले जाई जा रही है। गाँव में कुछ देर विश्राम कर आगे का सफ़र शुरु करना है।

पन्द्रह किमी बाद अपने लक्ष्य तक पहुँचने के बाद थकान बहुत हो रही है। सभी लोग थोड़े डरे भी हुए हैं। सुरक्षाकर्मियों ने सख्त ताक़ीद की है कि कोई भी स्कूल परिसर में नहीं सोएगा। सभी सहयोगी दूर एक खेत की ओर चल पड़े हैं। खेतों के बीचोबीच थोड़ी समतल जगह पर चादर बिछाई गई है। चाँद की रोशनी के बीच घुप्प अँधेरा है। सभी किसी तरह इस रात को काटने को बाध्य हैं। जैसे तैसे झपकी लग गई है।

मतदान ज्यादा नहीं हो रहा। ग्रामीण वोट दें तो क्यों दें। यहाँ तो चुनाव के समय भी नेता आने से कतराते हैं तो चुनाव के बाद वो क्या आएँगे। चुनाव की अवधि सुबह सात बजे से लेकर अपराह्न तीन बजे तक है। डेढ़ बजे अचानक ही खबर आती है कि सौ की संख्या में नक्सली हथियारबंद होकर इधर ही आ रहे हैं। हम सबों के चेहरे खौफ़ से ज़र्द पड़ गए हैं। आनन फानन में मतदान रोक कर सामान बाँध लिया जाता है। सुरक्षाकर्मियों की मदद से जल्द से जल्द इलाका छोड़ देना है। टेढ़े मेरे रास्तों में मशीन के साथ भागने में कई मतदानकर्मी औंधे मुंह गिरे हैं। मैं भी तीन बार गिरा हूँ पर अभी हम सभी को अपनी जिंदगी बचानी है। भागते भागते मेरा एक सहयोगी छोटी सी पुलिया पार करते वक़्त गड्ढे में जा गिरा है। साथ में मशीन भी गिरी है। शायद उसमें पानी भी चला गया हो पर जैसे तैसे उसे बाहर खींच कर अपने लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ सबने फिर से शुरु कर दी है। डेढ़ घंटे में हम उस सड़क तक जा पहुँचे हैं जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी। चेहरे पर संतोष चुनाव करवा पाने से ज्यादा बच कर निकलने का है..


ये तो बानगी भर है। इससे भी सुदूर इलाकों में हालात इनसे भी कठिन ही होंगे। और इतना सब होने पर भी ये बात गौर करने की है कि पूर्णतः सुरक्षित राँची के मतदाताओं का चुनाव प्रतिशत ३६ फीसदी रहा जबकि किसी भी बुनियादी सुख सुविधाओं से दूर इन इलाकों के ४५ से ५५ फीसदी लोगों ने मतदान किया। तो ये तो है हमारे यहाँ का लोकतंत्र जहाँ कुछ किलोमीटर के फ़ासले जिंदगी जीने का तरीका ही बदल जाते हैं।

ये सब सुनकर मन खिन्न सा है। रह रह कर दुष्यन्त कुमार जी की कही ये ग़ज़ल दिल को कचोट रही है...

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं


ये कचोट तो कुछ दिनों में निकल जाएगी। अपना काम, अपनी जिंदगी, अपने आसपास की दुनिया हमें इन खयालातों तक वापस लौटने नहीं देगी। शायद अगले चुनावों तक.......या उससे पहले ही जब ये अंधकार हमारे ठीक सामने मुँह बाए खड़ा होगा !

Tuesday, December 01, 2009

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना बुनती है रेशम के धागे : 'मीना कुमारी' की शायरी के बारे में गुलज़ार की सोच

कुछ लोग ग़म की दुनिया में जीने के लिए बने होते हैं। मीना कुमारी की शख़्सियत भी कुछ ऍसी ही थी। पर्दे की ट्रेजडी क्वीन ने कब अपनी ज़िदगी में ग़मों से खेलना शुरु कर दिया शायद उन्हें भी पता नहीं चला। महज़बीं के नाम से जन्मी और गरीबी में पली बढ़ी इस अदाकारा ने अपने अभिनय का सिक्का पचास और साठ के दशक में इस तरह चलाया कि किसी भी फिल्म से उनका जुड़ाव ही उसके हिट हो जाने का सबब बन जाता था।


अपने कैरियर की ऊँचाई को छू रही मीना जी के कमाल अमरोही साहब से प्रेम, फिर विवाह और कुछ सालों बाद तलाक की कथा तो हम सभी जानते ही हैं। मीना जी का ठोस व्यक्तित्व, उनकी आज़ादख्याली, अपनी ज़िंदगी के निर्णय खुद लेने की क्षमता और अभिनय के प्रति लगन उन्हें जिस मुक़ाम पर ले गई थी वो शायद कमाल साहब से उनके खट्टे होते रिश्तों की वज़ह भी बनी। रिश्तों को न सँभाल पाने के दर्द और अकेलेपन से निज़ात पाने के लिए मीना कुमारी जी ने अपने आप को शराब में डुबो दिया।

यूँ तो मीना कुमारी अपने दिल में उमड़ते जज़्बों को डॉयरी के पन्नों में हमेशा व्यक्त किया करती थीं पर उनका अकेलापन, उनकी पीड़ा और हमसफ़र की बेवफाई उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में रह रह कर उभरी। मिसाल के तौर पर उनकी इस नज़्म को लें।मीना जी के काव्य से मेरा पहला परिचय उनकी इस दिल को छू लेने वाली नज़्म से हुआ था

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, लो फिर तुमको अब मात मिली
बातें कैसी ? घातें क्या ? चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया,बेचैनी भी साथ मिली

३९ वर्ष की आयु में इस दुनिया से रुखसत होते हुए वो अपनी २५ निजी डॉयरियों के पन्ने गुलज़ार साहब को वसीयत कर गईं। गुलज़ार ने उनकी ग़ज़लों और नज़्मों की किताब हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित कराई है। कल जब राँची के पुस्तक मेले से गुजरा तो उसमें मीना कुमारी की शायरी के आलावा कुछ और भी पढ़ने को मिला और वो भी गुलज़ार की लेखनी से।

गुलज़ार इस किताब में उनके बारे में लिखते हैं ..मीना जी चली गईं। कहती थीं
राह देखा करेगा सदियों तक,
छोड़ जाएँगे यह ज़हाँ तनहा
और जाते हुए सचमुच सारे जहान को तनहा कर गईं; एक दौर का दौर अपने साथ लेकर चली गईं। लगता है, दुआ में थीं। दुआ खत्म हुई, आमीन कहा, उठीं, और चली गईं। जब तक ज़िन्दा थीं, सरापा दिल की तरह ज़िन्दा रहीं। दर्द चुनती रहीं, बटोरती रहीं और दिल में समोती रहीं। समन्दर की तरह गहरा था दिल। वह छलक गया, मर गया और बन्द हो गया, लगता यही कि दर्द लावारिस हो गए, यतीम हो गए, उन्हें अपनानेवाला कोई नहीं रहा। मैंने एक बार उनका पोर्ट्रेट नज़्म करके दिया था उन्हें। लिखा था...
शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।

पढ़कर हँस पड़ीं। कहने लगीं–‘जानते हो न, वे तागे क्या हैं ? उन्हें प्यार कहते हैं। मुझे तो प्यार से प्यार है। प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है। इतना प्यार कोई अपने तन से लिपटाकर मर सके, तो और क्या चाहिए ?’
उन्हीं का एक पन्ना है मेरे सामने खुला हुआ। लिखा है....
प्यार सोचा था, प्यार ढूँढ़ा था
ठंडी-ठंडी-सी हसरतें ढूँढ़ी
सोंधी-सोंधी-सी, रूह की मिट्टी
तपते, नोकीले, नंगे रस्तों पर
नंगे पैरों ने दौड़कर, थमकर,
धूप में सेंकीं छाँव की चोटें
छाँव में देखे धूप के छाले

अपने अन्दर महक रहा था प्यार–
ख़ुद से बाहर तलाश करते थे

अपनी और मीना कुमारी जी की चंद पंक्तियों के द्वारा गुलज़ार साहब ने उनके जटिल व्यक्तित्व को कितनी आसानी से पाठकों के लिए पारदर्शी बना दिया है। अगर गुलज़ार ने मीना जी के कवि मन को टटोलने की कोशिश की है तो संगीतकार खय्याम को मीना जी के दिल की व्यथा को उनकी आवाज़ के माध्यम से निकालने का श्रेय जाता है।

खय्याम द्वारा संगीतबद्ध एलबम I write I recite EMI/HMV में मीना जी ने अपनी दिल की मनोभावनाओं को बड़ी बारीकी से अपने स्वर में ढाला है। इस एलबम से ली गई उनकी ये ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। आशा है आपको भी पसंद आएगी।

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता

जब जुल्फ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हँस हँस के जवाँ दिल के हम क्यूँ न चुने टुकड़े
हर शख़्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता

बहते हुऐ आँसू ने आँखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

Wednesday, November 25, 2009

ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सहर : सुनिए आज के हालातों के मद्देनज़र फैज़ की ये नज़्म नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ में...

आज से करीब २५ साल पहले २० नवंबर १९८४ को लाहौर के मेयो अस्पताल से फ़ैज़ अहमद फैज़ हमें छोड़ कर चले गए। पर फ़ैज़ की ग़ज़लें, उनकी नज़्में रह रह कर दिल में उभरती रहती हैं। आज की सुबह एक ऍसी ही सुबह है जब उनकी इस नज़्म की याद मुझे बारहा आ रही है। क्यूँ आ रही है ये बात बाद में । पहले ये जान लें कि फ़ैज ने इस नज़्म में क्या लिखा था?

फ़ैज़ ने अगस्त १९४७ में पाकिस्तान के तत्कालीन हालातों के मद्देनज़र एक नज़्म लिखी थी सुबह-ए- आज़ादी। कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े फ़ैज़ आज़ादी को एक ऍसे परिवर्तन के रूप में देखना चाहते थे जो अमीरी और गरीबी की खाई को मिटा दे। पर जब ऍसा कुछ नहीं हुआ तो मायूस हो कर उन्होंने लिखा

कैसी दागदार रौशनी के साथ निकली है ये सुबह जिसमें कुछ दिखाई नहीं दे रहा। जब हम अपने इस सफ़र में चले थे तो हमने ऐसी सुबह की तो कल्पना नहीं की थी। हमारी कल्पनाओं की सुबह तो उस मुकाम की तरह थी जैसे कोई आसमान की चादर पर चलते हुए जगमगाते तारों के पास पहुँच जाए या जैसे भटकती हुई समुद्र की धारा को उसका किनारा मिल जाए।

ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल

आखिर कहीं तो ग़म से भरे इस दिल की नैया को किनारा मिलेगा? युवावस्था की रहस्यमय दहलीज़ को पार करते वक़्त इस सफ़र पर चलने से हमें जाने कितने ही हाथों ने रोका। हुस्न की परियाँ हमें आवाज़ देकर अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयास करती रहीं पर फिर भी वो हमें अपने मार्ग से विचलित ना कर सकीं, थका ना सकीं। आखिर क्यूँ ? क्यूँकि दिल में उस सुबह को लाने का एक जोश था, एक उमंग थी। हमारे लिए तो उस बिल्कुल करीब आ गई सुबह के हसीं दामन को छू लेना ही अंतिम मुकाम था।

कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल
जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से
चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन

सुन रहे हैं कि जुल्म के बादल अब छँट चुके हैं और लोग तो ये भी कह रहे हैं कि जिस मंजिल की तलाश में हम चले थे वो हमें मिल भी चुकी है। पर कहाँ है चेहरों पर लक्ष्य मिलने की खुशी? अगर हालात बदले हैं तो उनका असर क्यूँ नहीं दिखाई देता? जिस सुबह की हवा का हमें बेसब्री से इंतज़ार था वो किधर से आई और किधर चली गई? अब देखिए ना सड़क के किनारे जलते इस प्रकाशपुंज को भी उसके जाने का रास्ता नहीं मालूम। रात का भारीपन भी तो कम होता नहीं दिखता। इसीलिए तो मुझे लगता है आँखों और दिल को जिस सुबह की तलाश थी वो अभी नहीं आई। तुमलोग भी आगे का सफ़र करने को तैयार हो जाओ कि मंज़िल तक पहुँचना अभी बाकी है.....

सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ओ-हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई
अभी चराग़-ए-सर-ए-राह को कुछ ख़बर ही नहीं
गिरानि-ए-शब में कमी नहीं आई
निजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

ये तो थी मेरी समझ के हिसाब से इस उर्दू नज़्म का अनुवाद करने की एक कोशिश। संभवतः इसमें कुछ त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। वैसे कुछ दिनों पहले मुझे कुर्तुलीन हैदर की किताब आग का दरिया के अंग्रेजी अनुवाद The River of Fire के एक अंश को पढ़ने का मौका मिला था। उस किताब में फ़ैज की इस नज़्म का संक्षिप्त अनुवाद करते हुए कुर्तुलीन जी ने लिखा था


This blighted dawn , this darkened sun. This is not the morning we waited for.We went forth in the desert of heaven, hoping to reach our destination of stars. We hoped that, somewhere, we would come ashore from the placid river of the night, that the barge of sorrow would end its cruise. Whence came the early morning breeze, where did it go? The wayside lamp does not know. The night's burden has not diminished, the hour of deliverance for eye and heart has not arrived. Face forward! For our destination is not yet
in sight.
तो आइए सुनें जाने माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की धारदार आवाज़ में फ़ैज़ की ये नज़्म

 
 

Thursday, November 19, 2009

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो...

जिंदगी के इस सफ़र में ना जाने कितने लोग हमारे संपर्क में आते हैं। पर बीते समय में झाँक कर देखने पर क्या आपको नहीं लगता कि कुछ ऐसे चेहरे रह गए जिनसे अपने रिश्तों को समय रहते हम वो रूप नहीं दे पाए जो देना चाहते थे।

दिल खुशफहमियाँ पालता रहता है कि काश कभी उनसे एक मुलाकात और तो हो जिसमें हम ऍसे मरासिम बना सके जिन्हें परिभाषित करने में हमारे अंतरमन को कोई दिक्कत ना हो। पर अव्वल तो ऍसी मुलाकातें हो नहीं पाती और होती भी हैं तो माहौल ऐसा नहीं बन पाता कि रिश्तों के अधखुले सिरों को फिर से टटोला जा सके।

ये तो हुई वास्तविक जिंदगी की बात पर फिल्मों में ऐसी मुलाकातें अक्सर हो जाया करती हैं क्यूँकि उनके बिना कहानी आगे बढ़ती नहीं। इसीलिए तो गीतों का ये आशावादी दृष्टिकोण हमारे मन को सुकून देता है। साथ ही उन्हें गुनगुनाकर हम अपने आप को पहले से तरो ताज़ा और उमंगों से भरा महसूस करते हैं।

ऍसा ही एक गीत गाया था रफ़ी साहब ने फिल्म ये रात फिर ना आएगी के लिए और क्या कमाल गाया था। १९६५ में आई ये फिल्म अपने गीतों के लिए बेहद चर्चित रही थी। चाहे आशा जी का गाया 'यही वो जगह है... हो या फिर महेंद्र कपूर का गाया मेरा प्यार वो है..... हो, ओ पी नैयर द्वारा संगीत निर्देशित इस फिल्म के सारे गीत लाज़वाब थे। और इस गीत का तो शमसुल हूदा बिहारी ने, मुखड़ा ही बड़ा जबरदस्त लिखा था ...

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे एक और मुलाकात का वादा कर लो


वैसे बिहारी साहब अपने नाम के अनुरूप सचमुच बिहार के ही थे और पटना के पास स्थित आरा में उनका जन्म हुआ था। संगीतकार ओ पी नैयर के करीबियों का कहना है कि ओ पी नैयर ने बिहारी के मुखड़े को आगे बढ़ाते हुए पहला अंतरा ख़ुद ही रच डाला था। ये अंतरा गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद रहा है इसलिए आज इसे यहाँ लगा दे रहा हूँ



वैसे आप मुझे ना झेलना चाहें तो रफ़ी साहब की गायिकी का आनंद यहाँ ले सकते हैं।




फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे इक और मुलाकात का वादा कर लो

दिल की हर बात अधूरी है अधूरी है अभी
अपनी इक और मुलाकात ज़रूरी है अभी
चंद लमहों के लिये साथ का वादा कर लो
हमसे इक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....

आप क्यूँ दिल का हसीं राज़ मुझे देते हैं
क्यूँ नया नग़मा नया साज़ मुझे देते हैं
मैं तो हूँ डूबी हुई प्यार की तूफ़ानों में
आप साहिल से ही आवाज़ मुझे देते हैं
कल भी होंगे यहीं जज़्बात ये वादा करलो
हमसे इक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....


इस गीत का दूसरा अंतरा आप इस वीडियो में देख सकते हैं जिसे आशा जी ने गाया है। ये गीत पर्दे पर फिल्माया गया था विश्वजीत और शर्मिला टैगोर जी पर

Saturday, November 14, 2009

'बुढ़िया कबड्डी' और बचपन के वे अनमोल दिन .....

तो आज है बच्चों का दिन यानि बाल दिवस ! तो क्यूँ ना इस दिन बचपन की कुछ बातों को साझा किया जाए एक बेहद दिलअज़ीज़ गीत के साथ। समय के साथ कितना बदल गया है तब और आज का बचपन। तब भी मस्तियाँ और शैतानियाँ होती थीं और आज भी। फर्क आया है इनके तौर तरीकों में, तब के और आज के माहौल में। बचपन की स्मृतियों पर नज़र दौड़ाऊँ तो बहुत सारी बातें अनायास ही मन में आती हैं। पेड़ों पर रस्सी लगा कर झूला झूलना, इमली के पेड़ की डरते डरते चढ़ाई करना, टोकरी को तिरछा कर रस्सी के सहारे चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करना, हारने या खेल में ना शामिल किए जाने पर टेसुए बहाना, मन का ना होने पर बार बार घर छोड़ने की धमकी दे डालना और ऐसी ही ना जाने कितनी और बातें। पर आज बात उन खेलों की जिन्हें खेलते हुए बचपन का एक बड़ा हिस्सा बीता।

बचपन में पहला खेल जो हमनें सीखा था वो था बुढ़िया कबड्डी। अगर आप इस खेल से वाकिफ़ ना हों तो ये बताना जरूरी होगा कि इस खेल में अपनी साँस बिना तोड़े बारी बारी से विपक्षी दल के खिलाड़ियों को दौड़ाना और इन्हें छू कर वापस आना होता था। ऍसा इसलिए किया जाता था ताकि एक गोल रेखा के अंदर खड़ी अपने दल की बुढ़िया को भागने का रास्ता मिल जाए। कबड्डी के इस परिवर्तित रूप में गोल रेखा के अंदर खड़े खिलाड़ी को बुढ़िया क्यूँ कहा जाता था ये अभी भी मेरी समझ के बाहर है।

ज़ाहिर है जितनी लंबी साँस होगी उतने ही अधिक खिलाड़ियों को दौड़ाकर आप बुढ़िया का काम आसान कर सकते थे। अब एक साँस को लेने के लिए कई तरीके थे। सबसे प्रचलित होता था

शैल तीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई............. या फिर
कबड्डी के बाड बड्डी बाड बड्डी बाड बड्डी......

पर इन दोनों तरीकों में साँस में हेर फेर यानि चीटिंग करने की गुंजाइश काफी कम होती थी तो हम लोग इनका इस्तेमाल कम ही करते थे। सबसे मज़ेदार रहता

शैल दल्ले छू दल्ले छू...

बोलना क्यूँकि ये इतनी धीमी गति से बोला जाता कि साँस ले लेने का पता ही न चलता। अगर विपक्षी खिलाड़ी शिकायत करते तो हम अपने दूसरे सहारे प्रकाश लाल की शरण में चले जाते। अब ये न पूछिएगा कि ये प्रकाश लाल कौन था क्यूंकि हम तो उसे जाने बगैर ही उसका मर्सिया पढ़ देते थे यानि

शैल कबड्डी आस लाल मर गया प्रकाश लाल मेरा....लाल लाल लाल लाल...

बुढ़िया कबड्डी का शुमार तो अब लुप्तप्राय खेलों में कर लेना चाहिए। पर गिल्ली डंडा, रस्सी और लट्टू, कंचों पिट्टो, कोनों की अदला बदली और रुमाल ले कर भागने वाले खेल तो कस्बों और गाँवों में जरूर खेले जाते होंगे। आज तो बाजार में हर आयु वर्ग के लिए तरह तरह के आकर्षक खेल हैं खासकर तब जब आपकी जेब में इनके लिए पर्याप्त पैसे हों। वैसे भी आज के बच्चों के हाथ, मोबाइल और कम्प्यूटर के कीबोर्ड में गेम खेलने को इतने सिद्धस्त हो जाते हैं कि उन्हें गिल्ली और डंडे को पकड़ने की जरूरत ही क्या है। पर जो बच्चे इन सुविधाओं से अभी भी दूर हैं उनके लिए तो ये खेल आज भी मौज मस्ती की तरंग जरूर लाते होंगे।

तो आइए आज आपको वो गीत सुनाऊँ जो मुझे अपने बचपन की इन्हीं यादों के बहुत करीब ले जाता है। सुजाता फिल्म के इस गीत के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था सचिन देव बर्मन साहब ने। गीता दत्त और आशा जी ने जो चुनिंदा युगल गीत गाए हैं उनमें से ये एक था। गायिकी, संगीत और बोल तीनों के लिहाज़ से ये गीत मुझे पसंद हैं ..



बचपन के दिन बचपन के दिन
बचपन के दिन भी क्या दिन थे हाय हाय
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन....

वहाँ फिरते थे हम फूलों में पड़े
यहाँ ढूँढते सब हमें छोटे बड़े
थक जाते थे हम कलियाँ चुनते
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन.....

कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय रे हाय हाय हाय हाय रे हाय
कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन ...


और चलते चलते आज के बचपन को अपने क़ैमरे में क़ैद करने की मेरी कोशिश


तो क्या आपको ये प्रविष्टि आपके बचपन तक खींच कर ले जा सकी ?

Tuesday, November 10, 2009

तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे : अनूप जलोटा के साथ सुनिए जनाब क़ैसर उल ज़ाफरी को !

जब भी पुरानी ग़ज़लों की बात सोचता हूँ मुझे अस्सी का दशक रह रह कर याद आता है। अब अगर कोई ये कहे कि मियाँ तुम क्या देर से जगे हो ग़ज़लें तो हमारे बाप दादा के ज़माने से चलती आ रही हैं तो वो बात भी सही है। अस्सी के दशक से पुरानी कई ग़ज़लें सच पूछिए तो पिछले एक दशक में ही सुन पाया हूँ। पर अब करें क्या ग़ज़ल की भावनाओं को समझने की उम्र भी तो 1985 के बाद ही आई।

वैसे भी जिस संगीत को आप सुनते हुए बड़े होते हैं वो आपकी वास्तविक ज़िंदगी का हिस्सा हो जाता है। जब भी ऐसी ही कोई ग़ज़ल या गीत बरबस याद आता है तो अपने साथ उस समय की बहुत सी यादों को समेटता हुआ आता है।

आज एक ऐसी ही ग़ज़ल आपके सामने पेश है जिसे अस्सी के दशक में ख़ासी लोकप्रियता हासिल हुई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा साहब ने। ये ग़ज़ल 1984 में रिलीज़ हुए उनके एलबम फरमाइश का अहम हिस्सा थी। पहली बार जब इसे सुना था तो मुझे जलोटा साहब का ग़ज़ल शुरु करने के पहले कहा गया शेर असमंजस में डाल गया था।

ग़ज़ल में बंदिशो अल्फाज़ ही नहीं काफी
जिगर का ख़ून भी चाहिए असर के लिए


इस 'जिगर के ख़ून' का मर्म समझने में मुझे तीन चार साल और लगे। फिर तो इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को सुनना मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। इसकी एक वज़ह ये भी थी कि क़ैसर उल ज़ाफरी साहब ने एक ऍसी रूमानी ग़ज़ल लिखी थी जो आसानी से एक हिंदी भाषी को भी समझ आ जाए। वैसे भी किशोरावस्था की दहलीज़ पर ऍसी भावनाएँ कुछ ज्यादा ही असर करती थीं।

वैसे अनूप जी ने भी बड़ी तबियत से इसका हर शेर गाया है। मतले में मौसम को छः बार कहने का उनका अंदाज़ निराला है। खूबसूरत वाद्य संयोजन के साथ साथ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अनूप भाई वाह वाही बटोरने वाला शास्त्रीय आलाप लेना भी नहीं भूले हैं।

अनूप जलोटा एक ऐसे गायक हैं जो उस ज़माने से लेकर आज तक सुने जाते रहे हैं। वे बारहा देश विदेशों में कनसर्ट देते रहते हैं। भक्ति संगीत के सैकड़ों एलबम में अपनी आवाज़ देने के बाद आजकल वो अपना समय भावी गायकों को सिखाने में लगाते हैं। उन्होंने गजल गायिकी बिल्कुल बंद तो नहीं की पर ग़ज़लों के अब उनके इक्का दुक्का एलबम ही आते हैं। तो देर किस बात की..बात शुरु की जाए उनके प्यारे शहर की


तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे
मै एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता ना लगे


तुम्हारे बस मे अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भुलाने मे शायद हमें ज़माना लगे

न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बेवफ़ा ना लगे


हमारे प्यार से जलने लगी है इक दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे

अनूप जलोटा की इस ग़ज़ल में जनाब क़ैसर-उल-जाफ़री के ये अशआर नहीं हैं..
कुछ इस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा ना लगे

वो फूल जो मेरे दामन से हो गया मंसूब,
ख़ुदा करे उसे बाज़ार की हवा ना लगे

तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'क़ैसर',
कि एक घूँट मे शायद ये बदमज़ा ना लगे

क़ैसर-उल-जाफ़री एक ऍसे शायर हैं जिन्होंने मुशायरों की शोभा तो बढ़ाई ही है कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। इतना ही नहीं क़ैसर साहब एक बुलंद आवाज़ के मालिक भी हैं। बड़ा आनंद आता है जब भी क़ैसर साहब की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनता हूँ। तो क्यूँ ना चलते चलते आप सब को भी उनकी आवाज़ से रूबरू कराता चलूँ !



चाँदनी था, कि ग़ज़ल था, कि सबा था क्या था
मैंने इक बार तेरा नाम सुना था क्या था

ख़ुदकुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैंने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था

तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फ़ा है क़ैसर
डूबते वक़्त इक हाथ बढ़ा था क्या था

Friday, November 06, 2009

मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था, मुझे आप किसलिए मिल गए...

आदमी की फ़ितरत अज़ीब सी है। चाहता कुछ और है और कहता कुछ और। अब भला जिंदगी की राहों में कोई हसीन हमसफ़र मिल जाए तो इसमें दिक्कत कहाँ हैं जनाब ! पर देखिए अब कोई मिल गया तो इतरा रहे हैं ये कहते हुए कि मैं तो अकेले ही बड़े आराम से था। अब भइया एक अदद दिल की तलाश में मारे मारे फिरोगे और एक के साथ एक फ्री वाली स्कीम में दर्द लाज़िमी तौर पर मिलेगा तो क्या कलपने लगोगे :)?

पर ये तो हमारे आपके दिखाने की बात है। अंदर ही अंदर तो हम दर्द-ए-दिल को भी शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं। फ़राज़ ऍसे तो नहीं कह गए

पहले पहल का इश्क़ अभी याद है फ़राज़
दिल खुद से चाहता है कि रुसवाइयाँ भी हों


पर जहाँ ये बात सही है, वहाँ इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जब हमारी समझ से अपने स्तर से बहुत अच्छा हमें अपना लेता है तो एक ओर तो हमें बड़ी खुशी मिलती है पर दूसरी ओर रह रह कर अंदर की हीन ग्रंथि हमें अपनी तुच्छता का अहसास भी दिलाती रहती है।

तो आज ऍसे ही भावनाओं से ओतप्रोत इस गीत की बात करना चाहता हूँ। इसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी चित्रगुप्त ने। मजरूह ने ये गीत शायद ऍसे ही किसी क़िरदार के लिए लिखा होगा। शायद इसलिए कि जिस फिल्म का ये गीत है वो मैंने देखी नहीं। फिल्म का नाम था 'आकाशदीप' जो १९६५ में प्रदर्शित हुई थी। वैसे यू ट्यूब के वीडिओ से ये स्पष्ट है कि इसे फिल्माया गया था धर्मेन्द और नंदा जी पर।

ये गीत रफ़ी साहब के गाए मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है तो सुनिए रफ़ी की गायिकी का कमाल ..


वैसे यू ट्यूब के वीडिओ में इस गीत के तीनों अंतरे सुनने को मिलेंगे।


मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था
मुझे आप किसलिए मिल गए
मैं अकेला यूँ ही मजे में था
मुझे आप किसलिए मिल गए....

यूँ ही अपने अपने सफ़र में गुम
कही दूर मैं, कही दूर तुम
चले जा रहे थे जुदा, जुदा
मुझे आप किसलिए मिल गए....

मैं गरीब हाथ बढ़ा तो दूँ
तुम्हें पा सकूँ कि ना पा सकूँ
मेरी जाँ बहुत हैं ये फ़ासला
मुझे आप किसलिए मिल गए....

ना मैं चाँद हूँ, किसी शाम का
ना च़राग हूँ, किसी बाम का
मैं तो रास्ते का हूँ एक दीया
मुझे आप किसलिए मिल गए....


वैसे चलते चलते कुछ बाते संगीतकार चित्रगुप्त यानि चित्रगुप्त श्रीवास्तव के बारे में। यूँ तो चित्रगुप्त भोजपुरी फिल्मों के मूर्धन्य संगीतकार माने जाते हैं, पर हिंदी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ नायाब नग्मे दिए। चित्रगुप्त का ताल्लुक बिहार से था और रोचक तथ्य ये है कि मुंबई की मायानगरी में संगीतकार बनने के पहले वो कॉलेज में लेक्चरर थे। वैसे क्या आपको पता है कि चित्रगुप्त की सांगीतिक विरासत को किसने आगे बढ़ाया ? वही 'क़यामत से क़यामत तक ' की संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने, जो चित्रगुप्त के सुपुत्र हैं।

Tuesday, November 03, 2009

क्या होगा जब श्रेया घोषाल और सुखविंदर दिखलाएँ आपको जीवन की डगर ?

पिछले साल जब वार्षिक संगीतमाला के अपने पसंदीदा गीतों का चयन कर चुका था, तब ये गीत मुझे सुनने को मिला। लिहाज़ा ये मेरी वार्षिक संगीतमाला 2008 का हिस्सा नहीं बन पाया था। ये गीत था फिल्म ब्लैक एंड व्हॉइट (Black and White) का। अगर आपको इस फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा तो इसमें आपका कोई क़सूर नहीं। फिल्म सिनेमाघर के पर्दे की शोभा ज्यादा दिनों तक नहीं बढ़ा सकी थी। वैसे विशुद्ध व्यवसायिक फिल्म बनाने वाले सुभाष घई ने इस फिल्म के ज़रिए वास्तविक ज़िंदगी के करीब आने की कोशिश की थी। पर सुभाष घई जैसी भी फिल्में बनाएँ अपनी फिल्मों के संगीत के चयन के प्रति बेहद सजग रहे हैं। इस हट के बनाई गई फिल्म के संगीतकार के तौर पर उन्होंने चुना था लोकप्रिय गायक सुखविंदर सिंह को। और आज जिस गीत की बात मैं आपसे कर रहा हूँ उसमें सुखविंदर जी के हुनर का क़माल साफ दिखाई देता है...


चिड़ियों की चहचहाट, गायिका का मधुर आलाप, चलती रेल की आवाज़ के साथ सम्मोहित करती आरंभिक धुन के साथ इस गीत से आप रूबरू होते हैं। जब तक आप इस आरंभिक सम्मोहन से निकलें श्रेया घोषाल की खनकती आवाज़ और इब्राहिम अश्क़ के बोल ज़िदगी की राहों में साथ साथ चलने पर मज़बूर कर देते हैं। शुरुआती धुन को इंटरल्यूड्स में बरक़रार रख कर सुखविंदर इस गीत का मज़ा दूना कर देते हैं। तो आइए पहले सुनें कोकिल कंठी श्रेया घोषाल के स्वर में ये गीत..



मैं चली मैं चली
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

हँसती हैं तितलियाँ, मुस्कुराए ज़मीं
बादलों की हँसी गुनगुनाए कहीं
दिल की धड़कन चले, वक़्त की छाँव में
दर्द की मस्तियाँ नाचती पाँव में..

इस गली उस गली
इस डगर उस डगर, ऍ मेरे हमसफ़र
मैं चली मैं चली
सारी दुनिया से मैं हो गई बेख़बर
साथ मेरे चले जिंदगी का सफ़र...


मेरी पायल में हैं बोल सब प्यार के
चूड़ियों में भी हैं लफ़्ज़ इक़रार के
मेरे होठों पे हैं गीत इज़हार के
ख़्वाब आँखों में है तेरे दीदार के
है यही तो मेरे प्यार की रहगुज़र
मैं चली मैं चली..मैं चली मैं चली


वैसे इस गीत का एक और वर्सन है जिसे सुखविंदर ने अपनी आवाज़ से सँवारा है। श्रेया वाले वर्सन में गीत का मूड जहाँ रोमांटिक हैं वहीं सुखविंदर के इस वर्सन में गीतकार फिलासफिकल नज़रिए से जिंदगी के बदलते रास्तों से हमें ले जाते हैं। इस बार अंतरे में पिआनो की धुन भी कर्णप्रिय लगती है। तो सुखविंदर जी के गाए इस गीत को सुनिए ..



मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ
अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ.......
सात रंगों की है तेरी दुनिया हसीं
है उजाला कहीं तो है अँधेरा कहीं
है कहीं शाम तो क्यूँ कहीं है सहर
मैं चला मैं चला...

कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े ये कैसे जज़्बात हैं
कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े हुए कैसे जज़्बात हैं.......
है धुआँ ही धुआँ रास्तों के निशां
हर क़दम पर मेरे हौसले है जवाँ
मेरी मंजिल मुझे आ रही है नज़र

मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

Monday, October 26, 2009

दुष्यन्त कुमार की एक प्रेरणादायक ग़ज़ल : रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख ..

वीर रस की कविताएँ तो बचपन से ही पढ़ते सुनते आए हैं। दिनकर व सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कवि कवयित्रियों की रचनाएँ छुटपन से ही हमारी शिराओं में रक़्त प्रवाह को तेज कर देती थीं।

पर ये बताइए कि कितनी ग़ज़लों को पढ़ने के बाद भी वैसे ही अहसासात से आप रूबरू हुए हैं। निश्चय ही अपेक्षाकृत ये संख्या कम रही होगी। ग़ज़लें अपने स्वाभाव से ही कोमल भावनाओं को समाहित करती चलती हैं पर जैसा हम सभी जानते हैं कि कई ग़ज़लकारों ने बदलते वक़्त और माहौल के साथ इनमें अलग अलग रंग भरने की कोशिश की है। फ़ैज की कई नज़्में इसी श्रेणी की रही हैं पर जब ग़ज़लों के बारे में सोचता हूँ तो मेरे ज़हन में दुष्यन्त कुमार जी की कई ग़ज़लें एक साथ उभर कर सामने आती हैं।

भारत में हिंदी ग़ज़लों के जनक कहे जाने वाले दुष्यन्त कुमार की ऍसी ही एक ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ। ये ग़ज़ल हमें उत्प्रेरित करती है इस बात के लिए कि किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए, दूसरों की तरफ़ आशा भरी नज़रों से देखने के बजाए ख़ुद कुछ करने की ललक होनी चाहिए। दुष्यन्त जी ने इस ग़ज़ल के हर शेर में विभिन्न रूपकों की मदद से इस बात को पुरज़ोर ढंग से रखा है।

दुष्यन्त जी को कभी सुनने का अवसर नहीं मिला इस बात का मुझे हमेशा अफ़सोस रहा है। इस महान शायर की लिखी ये प्रेरणादायक पंक्तियाँ मेरे दिल पर क्या असर डालती हैं इसे व्यक्त करने का सबसे अच्छा ज़रिया यही है कि इसे मैं पढ़कर आप तक पहुँचाऊँ। तो ये रहा मेरा प्रयास..



आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख।

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख।

दिल को बहला ले, इजाज़त है, मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख।

ये धुँधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है
रोग़नों को देख, दीवारों में दीवारें न देख।

राख, कितनी राख है, चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख।


आशा है इसे सुनने के बाद ऍसी ही कुछ भावनाओं का संचार आपके दिल में भी हुआ होगा..

Wednesday, October 21, 2009

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए: फ़ैज़ के क़लाम पर रूना लैला का खनकता स्वर

दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसकी गहमागहमी में ब्लॉग की ओर भी रुख करने को जी नहीं चाहता। साल के इन दिनों में पुरानी स्मृतियों से गुजरना अच्छा लगता है। आप कहेंगे दीपावली से पुरानी स्मृतियों का क्या लेना देना? दरअसल जब भी घर की साफ सफाई में अपने आप को लगाता हूँ, कुछ पुराने ख़तों, तसवीरों,काग़ज़ातों और उनसे जुड़ी यादों से अपने आप को घिरा पाता हूँ। दीप से लेकर पटाखे जलाने तक में अपने बच्चे के साथ खुद भी बच्चा बनने की ख़्वाहिश रहती है मेरी। फिर भला एक बार नेट से दूर जाने पर ब्लॉग की बात भी क्यूँ याद आए?

पर अब तो दीपावली भी खत्म हो गई है। और शुक्र की बात है कि इस बार की दीपावली बिना किसी मानव निर्मित हादसे के बिना ही गुजर गई। पर मन अभी भी अनमना सा है। क्यूँ है ये अनमनापन पता नहीं। शायद छुट्टियों से लौट कर फिर दैनिक दिनचर्या से बँधने की खीज़ है या मन में अटका कोई बिना बात का फ़ितूर। दीपावली के पहले फ़ैज़ के एक क़लाम को ढूँढ कर रखा था तबियत से सुनने के लिए और आज वही कर भी रहा हूँ ...


और जब फैज़ की ग़ज़ल के कुछ अशआरों को रूना लैला की खनकती आवाज़ का सहारा हो तो ग़जल की तासीर ही कुछ और हो जाती है




आए कुछ अब्र1 कुछ शराब आए
उसके बाद आए जो अज़ाब2 आए

1-बादल, 2-मुसीबत

बाम-ए-मीना3 से महताब4 उतरे
दस्त-ए-साकी5 में आफ़ताब6 आए

3 - स्वर्ग की छत, 4- चाँदनी, 5 - साकी के हाथों में, 6 - सूर्य किरणें

हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो
सामने फिर वो बेनक़ाब आए


कर रहा था ग़म-ए-ज़हाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए


ना गई तेरे ग़म की सरदारी7
दिल में यूं रोज इनकिलाब आए

7 - तांडव, आतंक

इस तरह अपनी खामोशी गूँजी
गोया हर सिमत8 से जवाब आए

8 - तरफ़

फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए


ऐसी आवाज़..ऍसी कम्पोजीशन को सुने अब अर्सा बीत गया। वैसे पिछले महिने रूना जी म्यूजिक टुडे के विभिन्न अवसरों में गाए जाने वाले पंजाबी गीतों के इस एलबम के लिए दस साल बाद भारत की यात्रा पर आईं थीं। रूना जी ने उस दौरान दिए गए एक साक्षात्कार में बताया

मैंने जब गाना शुरु किया तो मैं बारह साल की भी नहीं थी। उस ज़माने की फिल्में परिवारोन्मुख सामाजिक परिवेश से जुड़ी होती थीं। ऍसा नहीं कि आज की फिल्में ऍसी नहीं हैं पर आजकल ध्यान स्टंट और सुंदर स्थलों पर की जाने वाली शूटिंग पर कहीं ज़्यादा है। उस ज़माने की बात करूँ तो संगीत बेहद अहम हिस्सा हुआ करता था फिल्मों का। उस वक़्त लोग संगीत सुनने के लिए फिल्म देखते थे। संगीत रिकार्डिंग एक सामाजिक उत्सव लगता था जहाँ सब अपने किरदारों को बिना थोड़ी सी गलती के निभाना अपना कर्तव्य समझते थे।
आज तो स्टूडिओ में आए पूछा गाना क्या है, अलग अलग पंक्तियाँ या कभी कभी तो शब्द गा दिए और हो गया जी गीत तैयार। ये बेहद आसान है पर मुझे लगता है कि ऍसा करते वक़्त उन भावनाओं को खो देते हैं जो पूरे गीत को एक साथ गाने में आती हैं।
बिल्कुल वाज़िब फर्माया रूना लैला जी ने ! वैसे मुझे तो लगता है कि आज भी लोग अच्छे संगीत की वज़ह से सिनेमा देखने जाना चाहते हैं। पर वैसा संगीत देने के लिए जिस मेहनत की जरूरत है उस मापदंड को साल में चार पाँच फिल्में ही पूरी तरह पैदा कर पाती हैं। अगर हमारे रूना लैला जैसे शैदाइयों की खुशकिस्मती रही तो हिंदी फिल्म जगत में भी रूना की आवाज़ को सुनने का मौका एक बार फिर मिल पाएगा।

Wednesday, October 14, 2009

'शादीशुदा मगर उपलब्ध' ....यानि 'Married But Available' !

शीर्षक पढ़ कर कहीं आपको ऍसा तो नहीं लगा कि आप खुद ही इस श्रेणी में आते हैं। वैसे कहीं आपको इस शीर्षक ने भ्रमित कर दिया हो तो बता दूँ कि ये अंग्रेजी की एक किताब का नाम है जिसे अभिजीत भादुरी (Abhijit Bhaduri) ने लिखा है। जबसे चेतन भगत की 'Five Point Someone' हिट हो गई है तब से एक नया ट्रेंड चल पड़ा है अपनी कॉलेज लॉइफ को पुस्तक के माध्यम से परोसने का।

किसी भी रेलवे प्लेटफार्म पर आपको इस तरह कि किताबें धड़्ल्ले से बिकती मिलेंगी। शीर्षक भी एक से एक मसालेदार ! मिसाल के तौर पर 'Offcourse I love you till I found someone better' या फिर 'Anything for You Maam' या ऐसा ही बहुत कुछ। ज्यादातर किताबों के आगे बेस्ट सेलर का टैग भी झाँकता मिलेगा। सफ़र में जब और कुछ करने को नहीं हो तो सौ से दो सौ रुपये तक मूल्य वाली ये किताबें समय का सदुपयोग ही लगती हैं।

किशोरों और युवाओं को ऍसी किताबें खासी आकर्षित कर रही हैं और उसके पीछे कई कारण हैं। पहली तो ये कि नए नवेले लेखक अपनी कहानी कहने के लिए ज्यादा कठिन भाषा या क्लिष्ट शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। कथानक में घटनाएँ तेजी से घटित होती रहती हैं और बीच बीच में आते घुमाव और तड़के में आपका समय सहजता से बीत जाता है। दूसरी ये कि कहीं ना कहीं इन किताबों में आपको वो बात नज़र आ जाती है जो आपने अपने कॉलेज के दिनों में खुद अनुभव की हो। Five Point Someone की सफलता का यही राज था।

अभिजीत भदुरी की पहली किताब Mediocre But Arrogant भी इसी श्रेणी की पुस्तक थी और काफी चर्चित भी हुई। फर्क सिर्फ इतना था कि किताब का परिदृश्य IIT Delhi की बजाए देश के नामी प्रबंधन संस्थान XLRI Jamshedpur का था।


वैसे तो भदुरी साहब ने अपनी स्नात्क की पढ़ाई दिल्ली के श्री राम कॉलेज आफ कामर्स से की पर मानव संसाधन में पीजी की डिग्री XLRI Jamshedpur से ली। अपनी पहली किताब में भदुरी ने XLRI Jamshedpur में दो साल की पढ़ाई से मूख्य पात्र अभय की जिंदगी और रिश्तों के स्वरूप में आए परिवर्तन को पुस्तक केंद्र बिंदु बनाया। उनकी दूसरी किताब पहली किताब की कहानी को आगे बढ़ाती है। यानि एक sequel के तौर पर इस बार उन्होंने कॉलेज की जिंदगी से निकल कर एक MBA के नौकरी के प्रथम दस सालों को अपनी पुस्तक की कथा वस्तु बनाया है।
हार्पर कालिंस द्वारा प्रकाशित, २८० पृष्ठों की ये किताब अभय (written as Abbey) की नौकरी, परिवार, प्रेमिका और पत्नी के बीच घूमती रहती है। पर इस उपन्यास की कहानी का शीर्षक से कोई लेना देना नहीं है। यानि ये किताब वैसे लोगों के बारे में हरगिज़ नहीं है जो शादी के बाद भी नए रिश्तों की तलाश में भटकते रहते हैं। पुस्तक की भूमिका में इसके नाम लिए हल्के फुल्के लहज़े में एक तर्क भी ढूँढा गया है। Mediocre But Arrogant (MBA) इसीलिए Married But Available (MBA)। पर सिर्फ MBA acronym को बरक़रार रखने के लिए ऍसे नामाकरण की बात गले नहीं उतरती। ये लेखक और प्रकाशक का पाठकों को आकर्षित करने का स्टंट भर है।

उपन्यास की बात करें तो अभिजीत ने अभय की कहानी ईमानदारी से कही है।
ये बात इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्यूँकि इस तरह की किताबों में मुख्य किरदार के चरित्र को बहुत कुछ पाठकों द्वारा लेखक की निजी जिंदगी से से जोड़ कर देखा जाता है। उपन्यास के प्रमुख पुरुष और स्त्री किरदारों में अहम की लड़ाई में किसी का पक्ष लेने से बचने में लेखक सफल रहे हैं। तेजी से ऊपर बढ़ने की चाह किस तरह रिश्तों के बीच के नेतिक मूल्यों को गर्त में ढकेल देती है इसे भदुरी सही तरीके से उभार पाए हैं। मानव संसाधन प्रबंधक के तौर पर कार्य करने में किस तरह की कार्यकुशलता चाहिए इस का भी अंदाज इस किताब को पढ़ने से लगता है।

पर कुल मिलाकर उनकी ये किताब बहुत कुछ उनकी पहली किताब के शीर्षक से मिलती जुलती नज़र आती है यानि Mediocre। इसलिए अगर आपका मानव संसाधन यानि Human Resources से दूर का भी नाता ना हो तो इस किताब से आप सहज दूरी बनाए रख सकते हैं।

आशा करता हूँ कि आप सबके लिए दीपावली का पर्व अपने परिवार के साथ सोल्लास बीतेगा और आप इस दौरान और आगे भी 'Married But Unavailable' रहेंगे। :)

Sunday, October 11, 2009

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया...अथर नफ़ीस के शब्द, फरीदा खानम की आवाज़ और उस्ताद नफ़ीस खान का सितार वादन !

पिछली पोस्ट में हम बात कर रहे थे शिक़वे और शिकायतों की जो रिश्तों की चमक बनाए रहते हैं। पर यही शिकायतें इस हद तक बढ़ जाएँ कि मामला प्रेम से विरह का रूप ले ले, तब कितने कठिन दौर से गुजरता है ये तनहा दिल! सच पूछिए तो जिंदगी बदमज़ा हो जाती है। कोई हँसी ठिठोली हमें बर्दाश्त नहीं होती। हम दूसरों से तो दूर भागते ही हैं अपनी यादों से भी पीछा छुड़ाने की कोशिश में लगे रहते हैं। पर कमबख़्त यादें नहीं जातीं। वो रहती हैं हमारे आस पास.... हमारे एकाकीपन के अहसास को और पुख्ता करने के लिए।

पाकिस्तानी शायर अथर नफ़ीस की मशहूर ग़ज़ल वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, में कुछ ऍसी ही भावनाओं की झलक मिलती है। अथर साहब ने शायद ज्यादा लिखा नहीं। उनकी निजी जिंदगी के बारे में तो पता नहीं पर अपनी डॉयरी में उनके लिखे कुछ अशआर हमेशा से दिल को छूते रहे हैं। मसलन ये शेर मुलाहज़ा फ़रमाइए
जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का है जिसमें अब जिंदा हूँ मैं

या फिर इसे ही देखिए
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं

और उनकी लिखी ये पंक्तियाँ भी मुझे पसंद हैं
टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझ में
डूब जाता है कभी मुझ में समंदर मेरा

तो आइए लौटते हैं अथर साहब की ग़ज़ल पर..

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई क़हर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या
क़हर - विपत्ति

जो मेरी प्रेरणा, मेरी भावनाओं की स्रोत थी जब वो ही मुझसे रूठ कर चली गई फिर उसके बारे में बातें करने से क्या फ़ायदा। उसके जाने से ज्यादा बड़ी आफ़त कौन सी आ गई जो इस बुझे दिल में सच्चे अशआरों की रवानी भर दे! मुझे अपने वियोग के साथ कुछ पल तो एकांत में जीने दीजिए। एक बार जिस ग़म को पी लिया उसे सब के सामने दोहरा कर बेमतलब तूल देना मेरे दिल को गवारा नहीं है।

एक हिज़्र जो हमको लाहक़ है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या
हिज्र -वियोग, लाहक़- मिला हुआ, नाज़ - नखरे

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या

आप कहते हैं सँभालो अपने दिल को? सवाल तो ये है कि किस किस को सँभाले ? अब तो इस जिस्म का कोई भी हिस्सा उसकी तड़प से अछूता नहीं रह गया है। ठीक है दोस्त कि हमने भी जिंदगी में चंद हसीन ख़्वाब देखे हैं..इस महफिल में कुछ ग़ज़लें गाई हैं पर वो तब की बात थी। आज इस उदासी, इस तन्हाई के आलम में मुझसे कुछ सुनने की उम्मीद आप कैसे रख सकते हैं। इस व्यथित हृदय में तो अब सपनों के लिए भी कोई जगह नहीं बची।

हम नग़्मासरा कुछ गज़लों कें, हम सूरतगर कुछ ख्वाबों के,
बेजज़्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख़्वाब न हों तो बताएँ क्या
नग़्मासरा - गायक

इस ग़ज़ल को इतनी मक़बूलियत दिलाने में जितना अथर नफ़ीस का हाथ है उतना ही श्रेय पाकिस्तान की मशहूर ग़ज़ल गायिका फरीदा खानम को भी मिलना चाहिए। फरीदा जी की गायिकी से तो आप सब वाकिफ़ ही हैं। फ़रीदा जी की आवाज, का लुत्फ उठाइए और फिर...




और फिर होठों पर वही ग़ज़ल गुनगुनाइए सितार पर इसकी धुन के साथ जिसे बजाया है उस्ताद नफ़ीस अहमद खाँ ने। नफ़ीस प्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद फतेह अली खाँ के सुपुत्र हैं। हो गया ना मज़ा दोगुना...


Wednesday, October 07, 2009

कोई शिक़वा भी नहीं.... और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं

प्यार भी एक अजीब सी फ़ितरत है। पहले तो किसी का दिल जीतने के लिए मशक्क़त कीजिए । और अगर वो मिल गया तो भी चैन कहाँ है जनाब ! उसे खोने का डर भी तो साथ चला आता है। और तो और परिस्थितियाँ बदलती रहें तो भी हमारे साथी की हमसे उम्मीद रहती है कि प्यार की तपिश बनी रहे। और गर आप साथी के खयालतों की सुध लेने से चूके तो फिर ये उलाहना मिलते देर नहीं कि तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं !

पर ये भी है कि बिना शिक़वे, शिकायतों और मनुहारों जैसे टॉनिकों के प्रेम का रंग फीका रह जाता है। इसलिए रिश्तों की खामोशी भी मन में शक़ और बेचैनी पैदा कर देती है । ऐसी ही कुछ शिकायतें लिए एक प्यारा सा नग्मा आया था १९६६ में प्रदर्शित फिल्म 'नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे' में। रूमानियत में डूबे इस गीत को लिखा था राजेंद्र कृष्ण साहब ने और इस गीत की धुन बनाई थी मदन मोहन ने। गीतकार राजेंद्र के बोलों में वो कशिश थी कि कितने भी नाराज़ हमराही की मुस्कान को वापस लौटा लाए। बस जरूरत थी एक मधुर धुन और माधुर्य भरी आवाज़ की। और इस जरूरत को भली भांति पूरा किया मदनमोहन और आशा ताई की जोड़ी ने..

ये गीत वैसे गीतों में शुमार होता है जो बिना किसी वाद्य यंत्र के भी सुने जाएँ तो भी दिल को छूते से जाते हैं.. तो अगर आप भी शिकायती मूड में हैं तो बस अपने मीत के पास जाकर यही गीत गुनगुना दीजिए ना..



कोई शिक़वा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

ये खामोशी, ये निगाहों में उदासी क्यूँ है?
पा के सब कुछ भी मोहब्बत अभी प्यासी क्यूँ है?
राज- ए- दिल हम भी सुनें इतनी इनायत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

प्यार के वादे वफ़ा होने के दिन आए हैं
ये ना समझाओ खफ़ा होने के दिन आए हैं
रूठ जाओगे तो कुछ दूर क़यामत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

हम वही अपनी वफ़ा अपनी मोहब्बत है वही
तुम जहाँ बैठ गए अपनी तो जन्नत है वही
और दुनिया में किसी चीज की चाहत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....


Tuesday, September 22, 2009

जब ग्यारह वर्षीय बालक हेमंत बृजवासी ने भाव विभोर किया आशा ताई को..

नवरात्र शुरु हो गए हैं और कल ईद सोल्लास मनाई जा चुकी है। पर्व त्योहारों के इस मस्ती भरे दौर में ब्लॉग पर भी मस्ती का रंग चढ़ना लाज़िमी है ना। आज जो मूड मन में तारी है उसका पूरा श्रेय जाता है मथुरा के ग्यारह वर्षीय बालक हेमंत बृजवासी को। हफ्ते भर से हेमंत की आवाज़ कानों में गूँज रही है। ग्यारह सितंबर की उस यादगार रात को जी टीवी के लिटिल चैम्पस (Zee TV Little Champs) पर खुद आशा ताई पधारी थीं। पूरे कार्यक्रम में लड़कियों को आशा जी और लड़कों को पंचम के गाने गाने थे। अब पंचम की भारी आवाज़ और उनकी उर्जात्मक शैली को दस बारह साल के बच्चों द्वारा निभा पाना टेढ़ी खीर थी। फिर भी सब प्रतिभागियों ने अच्छा प्रयास किया, पर ज़माने को दिखाना है फिल्म में पंचम द्वारा गाए गीत दिल लेना खेल है दिलदार का, भूले से नाम ना लो प्यार का... की हेमंत द्वारा प्रस्तुति इतनी दमदार थी कि आशा ताई तक को कहना पड़ गया कि "आपने तो बर्मन साहब से भी बेहतर तरीके से इस गीत को निभाया"।

पूरे कार्यक्रम में एक और बात कमाल की थी वो थी गायकों को जबरदस्त सपोर्ट ‍‍देता हुआ मनभावन आरकेस्ट्रा। वैसे भी जी टीवी के संगीत कार्यक्रमों में कई सालों से मँजे हुए साज़कारों को बजाते देखता रहा हूँ और पंचम की धुनों में तो इनकी विशेष भूमिका हमेशा ही रहा करती थी। पंचम के संगीतबद्ध गीतों का पार्श्व संगीत उनकी अनूठी शैली की गवाही देता है। दरअसल तरह तरह की आवाज़ों को पारंपरिक और गैर पारंपरिक वाद्य यंत्रो से निकालने में राहुल देव बर्मन का कोई सानी नहीं था।


तो लौटें अपने इस सुरीले बालक की ओर। हेमंत की दमदार प्रस्तुति यादगार तब बन गई जब उसने गीत के बाद आशा जी को बुल्लेशाह के लिखे सूफ़ियत में रँगे पंजाबी लोकगीत का वो टुकड़ा सुनाया।

चरखा दे मिट्टा दियाँ दूरियाँ...........
हो..मैं कटि जावाँ तेरी होर पिया दूरियाँ
गद सखरी रा गद सखरी रा ...
गद.. सख...रीरा..
गद सखरी रा वरण दिए कुड़िए...........
मैं पैया और सिपहयिए


सच मानिए हेमंत ने उन चंद पंक्तियों में ली गई हरक़तों ने ऐसा समा बाँधा कि हजारों दर्शकों के साथ-साथ आशा जी की भी आँखें गीली हो गईं और वे कह उठीं

हेमंत अगर सबसे बड़ी कला कोई मानी जाती है तो वो कला है संगीत कला। संगीत कला भगवान के नज़दीक होती है। और तुम्हारा जो गाना है वो भगवान के बहुत नज़दीक है।

नौ साल की आयु से अपने पिता और गुरु हुकुमचंद बृजवासी से संगीत सीखना शुरु करने वाले हेमंत को शास्त्रीय और सूफ़ीयाना नग्मे गाने में महारत हासिल है। मात्र दो साल संगीत की शिक्षा लेने के बाद ये बालक गीतों में अपनी और से जोड़ी हुई विविधताओं का इस तरह समावेश करता है मानों गीत से खेल रहा है। हेमंत की आवाज़ और उच्चारण एक शीशे की तरह साफ और स्पष्ट है पर उसके साथ दिक्कत यही है कि वो अपनी शैली के गीतों से अलग तरीके के गीतों में वो कमाल नहीं दिखला पाता। पर शायद आज के युग में इसकी जरूरत भी नहीं है। हर गाने के पहले अपनी जिह्वा को बाँके बिहारी लाल की जयकार से पवित्र कराने वाला ये बालक नुसरत और आशा जी को अपना आदर्श मानता है। गीत संगीत के आलावा क्रिकेट भी खेलता है और मौका मिले तो शाहरुख और करीना की फिल्में देखना भी पसंद करता है।

तो अगर आपने उस दिन इस प्रसारण का आनंद नहीं लिया तो अब ले लीजिए..






वैसे इस सूफ़ी लोकगीत को पूरा सुनने की इच्छा आप के मन में भी हो रही होगी। दरअसल इस लोकगीत को सबसे पहले लोकप्रिय बनाया था सूफ़ी के बादशाह नुसरत फतेह अली खाँ साहब ने और फिर इस गीत को नई बुलंदियों पर ले गए थे जालंधर के पंजाबी पुत्तर सलीम शाहजादा। बादशाह और शहज़ादे द्वारा इस लोकगीत की प्रस्तुति को आप तक पहुँचाने की शीघ्र ही कोशिश करूँगा।

 

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