Wednesday, August 05, 2009

आँखों को नम करता पंजाबी लोकगीत 'छल्ला' रब्बी की रुहानी आवाज़ में..

कुछ गीत ऍसे होते हैं जिनकी भावनाएँ भाषा की दीवारों को लाँघती किस तरह हमारे ज़हन में समा जाती हैं ये हमें पता ही नहीं लगता। बात पिछले दिसंबर की है मैं हर साल की तरह ही अपनी वार्षिक संगीतमालाओं के लिए साल के श्रेष्ठ २५ गीतों का चुनाव कर रहा था और तभी मैंने इस पंजाबी लोकगीत को पहली बार सुना और बिना शब्द के अर्थ जाने ही इसे सुन कर मन भारी हो गया। आखिर रब्बी शेरगिल जब गाते हैं तो उनकी आवाज़ और हमारे दिल के बीच शब्दों का ये पुल ना भी रहे तो भी फर्क नहीं पड़ता।
मैंने इस गीत को अपने प्रथम पाँच गीतों में डाल भी दिया पर बाद में इसे अपनी सूची से इसलिए हटाना पड़ा क्योंकि इस गीत के बोल और अर्थ मुझे तब उपलब्ध नहीं हो पाए थे। फिर कुछ दिन पहले सावन के इस मौसम ने 'छल्ले ' की याद फिर से दिला दी। तो फिर मैं चल पड़ा अपनी उसी तलाश में और फिर इस छल्ले की गुत्थी सुलझती गई...

इससे पहले हम रब्बी शेरगिल के एलबम अवेंगी जा नहीं (Avengi Ja Nahin) यानि 'आओगी या नहीं' के इस गीत की चर्चा करें ये समझना जरूरी है कि पंजाबी लोकगीत का ये लोकप्रिय रूप 'छल्ला' कब गाया जाता है?

जैसा नाम से स्पष्ट है 'छल्ला लोकगीत' के केंद्र में वो अगूँठी होती है जो प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिली होती है। पर जब उसका प्रेमी दूर देश चला जाता है तो वो अपने दिल का हाल किससे बताए ? हाँ जी आपने सही पहचाना ! और किससे ? उसी छल्ले से जो उसके साजन की दी गई एकमात्र निशानी है। यानि 'छल्ला लोकगीत' छल्ले से कही जाने वाली एक विरहणी की आपबीती है। छल्ले को कई पंजाबी गायकों ने समय समय पर पंजाबी फिल्मों और एलबमों में गाया गया है। इस तरह के जितने भी गीत हैं उनमें रेशमा, इनायत अली, गुरुदास मान और शौकत अली के वर्सन काफी मशहूर हुए। पर मुझे तो रब्बी का गाया हुआ ये छल्ला लोकगीत सबसे ज्यादा पसंद है। तो आइए देखें क्या कह रहे हैं रब्बी अपने इस 'छल्ले' में..


ये अगूँठी अब मेरे वश में नहीं रही ! देखिए ना ये मेरी बात ही नहीं सुनती है। अब तो लगता है ये मुझसे ज्यादा मेरी माँ की सुनने लगी है। पता नहीं इस पर किसने जादू टोना कर दिया है।

छल्ला वस नहीं ओ मेरे हे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे हे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे
छल्ला वस मेरी माँ दे
घल्ले गीताँ जाँगे
वे गल सुन छलया
हाए कीताँ किस इस ते टूना

मुझे तो ये छल्ला नलकूप से निकलती हुई उस धार की तरह लगता है जो ना जाने किस ओर बह जाए। वैसे मेरा प्यार भी तो तेरी कोई खबर ना आने की वज़ह से इस धारा समान ही हो गया है जिसकी दशा और दिशा का अब तो मुझे भी ज्ञान नहीं।
ओ मेरे प्रेम के प्रतीक छल्ले मेरी बात सुन ! क्या तू नहीं जानता कि अब इस प्यार से भरे मेरे कोमल हृदय में इक काँटा उग गया है जो रह रह कर मुझे टीस रहा है।

ओए छल्ला बंबी दा पाणी हीं
छल्ला बंबी दा पाणी हीं
छल्ला बंबी दा पाणी
कित्थे बह जे ना जाणी
असन ख़बर को ना जाणी
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया
तेरी बेरी इक उगया ऍ कंडा

आज अपने इस गुँथी लंबी चोटी को देखा तो इसी में मुझे तू नज़र आया और उसी स्वप्निल सी अवस्था में मैंने तुझे चूम लिया। मैं जानती हूँ कि मेरी चाहतें अंधी हो गई हैं पर मैंने वही किया जो मेरे हृदय ने मुझे करने को कहा। क्या मैंने कुछ गलत किया ? अगर ऍसा है तो छल्ले तू मुझे जो सजा देना चाहता है दे ले।

छल्ला गुत इक लम्मी हीं
छल्ला गुत इक लम्मी हीं
छल्ला गुत इक लम्मी
असाँ सुपने सी चुम्मी
होइ नीयत सी अन्नी
असाँ दिल दी सी मन्नी
वे गल सुन छलया
हूँ दे लै जेहड़ी देनी ऐ सज़ा
कभी कभी तो लगता है कि छल्ले तू उस अकेले खड़े पीपल के पेड़ की तरह है जिसके ऊपर तो भगवान का वास है और जो नीचे इस विशाल धरती को भी सँभाले हुए है। तू सोच रहा होगा ये कैसी समानता है? है ना छल्ले ! उस पीपल के पेड़ की तरह तू भी तो नहीं जानता कि इस धरती रूपी मेरे दिल में प्यार की जड़े कितनी गहराई तक समाई हुई हैं।

ओए छल्ला बोड़िक कल्ला हा
छल्ला बोड़िक कल्ला हा
छल्ला बोड़िक कल्ला
उँदे फड़ जाए पल्ला
थल्ले धरत उते अल्लाह
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया
अरे जाँदी अ किन्नी दुंघियाँ जड़ाँ
इस गल दा ओस खुद नूँ नहीं पता

छल्ले मेरा दिल भटक रहा है। मन में शंकाएँ उत्पन्न हो रही हैं। मुझे तो तू आजकल वैसी अमिया के जैसा लगने लगा है जो कभी नहीं पकीं। लगता है मुझे साधु संतों के पास जाना पड़ेगा जो मेरा ये उन्मत चित्त शांत कर सकें। अब तो दिल को सुकूं देने का एक ही रास्ता बचा है उन बीते लमहों को याद करने का जो तूने और मैंने एक साथ बिताए थे...

छल्ला वस नहीं मेरे
छल्ला वस मेरी माँ दे
छल्ला वस मेरी .... दे
छल्ला अम्बियाँ कचियाँ
मत्ता दे कोई सचियाँ
लै ये लेखे जो बचियाँ
वो तैरी मेरियाँ घड़ियाँ
वे गल सुन छलया

छल्ला बोड़िक कल्ला
उँदे फड़ जाए पल्ला
थल्ले धरत उते अल्लाह
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया,
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया...

(मेरा पंजाबी का ज्ञान सीमित है। पंजाबी शब्दों के अर्थ ढूँढ कर इस लोकगीत में छुपी भावनाओं को अपनी सोच के हिसाब से समझने की कोशिश की है। अगर लफ्जों को लिखने में त्रुटि रह गई हो तो कृपया इंगित करें।)


रब्बी की गायिकी हमेशा की तरह बेमिसाल है। उनके इस गीत में वाद्य यंत्रों का प्रयोग सीमित किंतु मारक है। शुरु के दो अंतरे के बाद जिस तरह से उन्होंने गीत का स्केल बदला है वो सुनने लायक है। ऊँचे सुरों के माध्यम से वो प्रेमिका की उदासी, बेकली और अकेलेपन को उस ऊँचाई पर ले जाते हैं कि श्रोता की आँखें अश्रुसिक्त हुए बिना नहीं रह पातीं। कम से कम मेरा तो यही अनुभव रहा है बाकी आप खुद इसे सुन कर देखें...



एक शाम मेरे नाम पर रब्बी शेरगिल
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10 comments:

Science Bloggers Association on August 04, 2009 said...

Sirf itna kaha ja sakta hai- SHUKRIYA.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डॉ .अनुराग on August 04, 2009 said...

मुझे लगा आज किशोर दा के दिन शायद आज उन पर कोई लेख पढने को मिलेगा....रब्बी का बुल्ला की जाना .ओर तेरे बिन .ही मुझे पसंद है पर आपने आज बहुत विस्तार से समझाया है ...तसल्ली से इस गीत को सुनुगा .....

सुशील कुमार छौक्कर on August 04, 2009 said...

विस्तार से समझा कर हम जैसे पंजाबी में अनपढो को और ज्यादा आनंद आ गया इस गीत का। सच्ची मैं भी बुल्ला वाले पर बहुत फिदा हो गया था। वैसे उस अल्बम के सभी गीत अच्छे थे। हमेशा की तरह आज की पोस्ट भी प्यारी है।

अभिषेक ओझा on August 05, 2009 said...

हम तो किशोर दा वाला ही पढ़ के खुश हो लिए. किशोर दा की तो बात ही कुछ और है. ये पोस्ट भी अच्छी लगी. पर किशोर दा वाली पोस्ट पढ़ के इसे भूल गया :)

Ranju Bhatia said...

mujhe yah bahut pasnad hai shukriya

Anita Das said...

Bahut hi sundarlikha hai. padh ke achha laga.

Anonymous said...

WHILE SAYING CHALLA HE IS POINTING TO DIFFERENT PERSONS AT DIFFERENT TIMES.
CHALLA GUTT IK LAMMI -GIRLFRIEND
CHALL BOHAR IK KALLA - FATHER
CHALLA BAMBI DA PANI --HUSBAND ETC

Dale Sundstrom on September 29, 2009 said...

Chhalla with English and Punjabi (Roman) captions:
http://www.babelsongs.com/2009/06/chhalla-by-rabbi-shergill.html

lori ali on August 01, 2013 said...

"Chhalla Kilabda phire ..." ka anuvaad kaha hai?? waise bahut pyaaraa lekh hai, magr "Jab Tak Hain Jaan" wala chhalla hota to aur b pyara ho jata..
shukriya is lekh k liye.

Manish Kumar on August 04, 2013 said...

लोरी व्यक्तिगत तौर पर मुझे जब तक है जान के छल्ले की तुलना में रबचबी शेरगिल का ये छल्ला कहीं ज्यादा पसंद है। आपने जिस गीत छल्ला कि लभदा फिरे ...का जिक्र किया है उसके मुखड़े का भाव कुछ यूँ है।

छल्ला आख़िर पागलों की तरह किसे खोज रहा है? शायद उसे अपने घर की तलाश है। कभी वो हँसता है तो कभी रोने लगता है। उसके तो सभी प्रिय पर उसे अपना प्रिय कहने वाला इस दुनिया में कौन है। अपनी इस खोज में वो गली गली मारा मारा फिर रहा है ।

 

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