Saturday, September 05, 2009

दौरान ए तफ़तीश : भाग 1 - पुलिसिया तंत्र के बारे में लिखा एक पुलिसवाले का ईमानदार संस्मरण

पुलिसिया जिंदगी को कभी नज़दीक से देखने का अवसर नहीं मिला। बचपन में अपने हमउम्रों की तरह चोर सिपाही जैसे खेल खेले। कागज़ के टुकड़ों को अच्छी तरह चौकोर लपेट कर घर के बाकी सदस्यों के साथ राजा मंत्री चोर सिपाही भी बहुत खेला। खेल के दौरान राजा या मंत्री आता तो बेहद खुशी होती पर सिपाही आता तो बस इतना भर सुकून होता कि चोर आने से बच गया। यानि राजा मंत्री एक तरफ़ और चोर और उससे थोड़ा बेहतर सिपाही एक तरफ़। आज सोचता हूँ खेल खेल में आने वाले वे भाव आज आम समाज में एक पुलिसवाले की छवि से कितने मेल खाते हैं। क्या हमारी सोच ये नहीं रहती कि जहाँ तक हो सके पुलिस के चक्कर से बचा रहा जाए? अपनी रक्षा के लिए उनके पास पहुँचने के लिए क्या पहले ये नहीं सोचना पड़ता कि दान दक्षिणा कितनी देनी होंगी ?

पर ये भी सही हे किसी सिस्टम की निंदा करना या उसकी कमजोरियों को गिनाना ज़्यादा आसान है वनिस्पत कि उसकी तह में घुसकर उसके उद्धार के उपायों के बारे में सोचना। अब हम और आप जैसे लोग ये आकलन करना भी चाहें तो मुश्किल है क्यूँकि बिना उस सिस्टम से गुज़रे उसकी ख़ामियाँ को सही सही समझना सरल नहीं है।




इसलिए जब पुलिस की नौकरी के बारे में एक पुलिस वाले की किताब दिखी तो उसे पढ़ने की सहज उत्सुकता मन में जागी। ये किताब थी सतीश चंद्र पांडे की लिखी दौरान -ए- तफ़तीश। तो इससे पहले इस पुस्तक की विस्तार से चर्चा करूँ, पहले कुछ बातें सतीश चंद्र पांडे जी के बारे में। पांडे जी 1953 में आई पी एस में चुने गए और उत्तर प्रदेश काडर में नियुक्त हुए। छह जि़लों में पुलिस का बुनियादी काम करने के आलावा वे 1985 के विख्यात विधानसभा चुनावों के समय पंजाब के डीजीपी और फिर सीआरपीएफ के डीजी बनाए गए।

पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित पांडे जी ने 276 पृष्ठों की इस किताब के 24 अध्यायों में पुलिसिया नौकरी से जुड़े विविध पहलुओं और उनसे जुड़े अपने संस्मरणों को बाँटा है। यूँ तो पांडे जी ने जिन मसलों को उठाया है उनमें से सब की चर्चा कर पाना यहाँ संभव नहीं होगा पर उनकी लिखी जिन बातों और किस्सों ने मुझे प्रभावित किया उसका जिक्र जरूर करना चाहूँगा। अपनी शुरुआती दौर में उस्तादों द्वारा दी जाने वाली कड़ी ट्रेनिंग को वो सही ठहराते हैं। उनका मानना है कि वो सख्ती भले उस समय किसी भी नवांगुतक के लिए नागवार गुजरती हो पर बाद में वही बेहद फायदेमंद महसूस होती है। पर जब वो आज के हालात देखते हैं तो पाते हैं कि ना केवल पुलिस में बल्कि सारे सहकारी महक़मे में इस कड़ाई में कमी आती दिख रही है। इसीलिए वे लिखते हैं
काम के वक्त सख्ती वाले उसूल का लगता है आजादी के बाद निरंतर ह्रास होता जा रहा है। किसी भी सरकारी दफ़्तर में जाइए, वी आई पी की तरह नहीं बल्कि भारत के नागरिक की तरह तो वहाँ के वातावरण को देखकर यह नहीं लगेगा कि आप ऍसी जगह आए हैं जिसे सार्वजनिक सेवा के लिए क़ायम रखने में मेहनत करने और टैक्स देने वाले नागरिकों का अमूल्य धन , लाखों करोड़ों, खर्च होता है। उल्टे ऐसा महसूस होगा कि आप किसी पिकनिक स्थल पर आ गए हैं जहाँ लोग खुशगप्पियाँ कर रहे हैं। एक दूसरे की बीमारी, शादी ब्याह, नाती पोतों की बातें हो रही हैं...
अपनी नौकरी की शुरुआत में ही पांडे जी को पुलिस विभाग की पहली कुप्रथा से रूबरू होना पड़ा वो थी 'झूठी गवाही' जिसकी तुलना उन्होंने विषैली घास की जड़ से की है। पांडे जी बताते हैं कि झूठे केसों की बात छोड़ दें तो हालत ये है कि सच्चे केस भी बिना झूठे गवाहों के जीते नहीं जा पाते। साथ ही ये प्रथा एक ऍसे कुचक्र को जन्म देती है जिससे किसी भी पुलिस तंत्र को अपने से अलग करना मुश्किल होता है। लेखक इसकी विवेचना करते हुए लिखते हैं
झूठी गवाही के लिए पुलिस को दलाल पालने पड़ते हैं। दलाल लोग ये काम प्यार मोहब्बत के लिए तो करेंगे नहीं। उन्हें या तो पैसा दीजिए या पैसा पैदा करने की छूट दीजिए। दूसरा वाला तरीका ज़ाहिर है सुविधाजनक है। इसलिए वही अपनाया जाता है। नतीज़ा जुर्मों की तफत़ीश की प्रक्रिया के लिए जुर्मों को बढ़ावा देना।
इस भयंकर कुचक्र को तोड़ने के लिए पुलिस और न्यायपालिका दोनों में ही जिस व्यक्तिगत निर्भीकता और उच्चतर प्रशासनिक स्तर पर नीतिपरक ईमानदारी और साहस की जरूरत है वो लेखक को मौज़ूदा पद्धति में नज़र नहीं आती। पांडे जी ने झूठी गवाही के बाद पुलिसिया डंडे और थर्ड डिग्री में अपनाए जाने वाले तौर तरीक़ो का जिक्र किया है। पांडे जी का इस बाबत पुलिसिया मनोविज्ञान पर निष्कर्ष ये है कि
थर्ड डिग्री के इस्तेमाल के लिए पुलिस का भीतरी और बाहरी निहित स्वार्थ होता है। भीतरी स्वार्थ अपनी मेहनत बचाने, अपनी जेब गर्म करने और अर्ध सत्य वाली लाइन, पर अपनी भड़ास निकालने पर आधारित होते हैं और बाहरी वाले राजनीतिक, सामाजिक और विभागीय दख़लंदाजी पर। इन दोनों ही स्वार्थों के प्रभावों से अपने को ना बचा पाने का अवश्यंभावी परिणाम है भागलपुर या उससे भी गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण, पंजाब।
पुलसिया नौकरी पर लिखी ये किताब का एक अहम हिस्सा कार्यालयी जिंदगी के मज़ेदार किस्से हैं जिसमें अधिकतर को पांडे जी ने अपने हर प्रमुख बिंदु को रेखांकित करने के पहले सुनाया है पर कुछ किस्से यूँ ही उनके संस्मरणों मे से निकल कर आए हैं जिन्हें पढ़कर आप हँसते हँसते लोटपोट हो जाएँगे ।

ये पुस्तक चर्चा तो कई भागों में चलेगी पर आज चलते चलते पांडे जी की यादों से निकले अंग्रेजों के ज़माने के इस खुर्राट तहसीलदार का किस्सा सुनते जाइए जो हर स्थिति में कठिन से कठिन सवाल का जवाब गोल मोल तरीके से देने के लिए मशहूर थे। तो हुआ यूँ कि ...

एक बार एक नए अंग्रेज कलेक्टर साहब उन्हें पड़ताल के लिए घोड़े पर ले गए। थकान से चूर तहसीलदार साहब अपने इलाके की जो थोड़ी बहुत जानकारी रखते थे वो भी भूल गए। आपके यहाँ गेहूँ की पैदावार कितनी होती है, कलेक्टर ने पूछा तो उन्होंने कहा कि हुज़ूर हो जाती है अच्छी ख़ासी, कोई अकाल तो पड़ता नहीं । लेकिन ये भी नहीं कि दोआबा की तरह बढ़िया फ़सल हो। फिर पूछा गया कि बारिश कितनी होती है आपकी तहसील में तो जवाब मिला कि ऍसा तो नहीं है कि चेरापूँजी की तरह पानी बरसता हो। लेकिन ऍसा भी नहीं कि राजस्थान के माफ़िक सूखा पड़े। ऍसे ही करते करते आखिर कलेक्टर ने उनसे ये पूछा कि जो एक दो नदियाँ हैं वे किस दिशा से किस दिशा में बहती हैं? तहसीलदार को मालूम हो तो बताएँ। ऍसा है हुजूर, उन्होंने थोड़ा सोचकर कहा कहीं तो पूरब से पश्चिम को बहती है तो कहीं उत्तर से दक्खन को। असलियत ये है कि कमबख्त खुल कर नहीं बहती...

पुलसिया नौकरी से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं की चर्चा करेंगे इस पुस्तक चर्चा के दूसरे भाग में...



इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


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13 comments:

नीरज गोस्वामी on September 05, 2009 said...

एक अछूते विषय पर रोचक किताब की जानकारी देने पर बहुत धन्यवाद आप का...अगली कड़ियों का इंतज़ार रहेगा...
नीरज

डॉ .अनुराग on September 05, 2009 said...

जबर दस्त !!गौरव सोलंकी की कविता के बाद .फिर नंदनी के ब्लॉग पे त्रिलोचन की कविता के बाद तीसरा तुम्हारे ब्लॉग पे एक खजाना मिला है .....फ़ौरन इसके प्रकाशन का नाम बताये .पढने की दिलचस्पी जाग उठी है

Aflatoon on September 05, 2009 said...

किताब मिले न मिले एक अच्छा पढ़कर लिखने वाले को पढ़ लिया करेंगे। एक जगह शायद १९५३ छप गया है १९८३ के बदले ?

रंजना on September 05, 2009 said...

वाह बहुत ही रोचक....कृपया शीघ्रातिशीघ्र अगली कडियाँ प्रेषित करें....

सच कहा ,आज पुलिश विभाग जिस मानसिक दवाब में काम करता है,कमजोर पर लाठी भांजना , उसी का प्रतिफलन है...यहाँ इमानदारी से काम करना ठीक वैसे ही है जैसे वेश्यालय में रहकर साध्वी बने रहना...

राज भाटिय़ा on September 05, 2009 said...

वाह पुलिस वाला,आप ने इसे भी नही छोडा..बहुत सुंदर ढंग से आप ने खुलासा किया

अभिषेक ओझा on September 05, 2009 said...

किताब तो बिना संशय रोचक लग रही है. आखिरी किस्सा भी मजेदार था :)

Manish Kumar on September 05, 2009 said...

अफलू भाई पांडे जी ने १९५३ में नौकरी शुरु की थी। अस्सी के दशक की आखिर में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली ।

अनुराग शायद आपकी नज़र नहीं गई प्रकाशक का नाम मैंने लिखा है पोस्ट में पेंग्विन में छपी है ये पुस्तक..

Manisha Dubey said...

manishji, wartman me jab ''jinnah aur jaswant singh'' ke baare me padh-padhkar hum pak chuke hain,aise me aapka aalekh ek thandi bayar ki tareh hai.
pandeji ka naam toh news paper me bahut padha hai, lekin unki pustak ke baare me aapse hi jankari mili hai.''jallad ki dayeri'' ke bahut dino baad ek naya vishay rochak rahega, last wala kissa majedar laga.next post ka intzar rahega

Udan Tashtari on September 06, 2009 said...

आभार इस अलग से विषय पर किताब बताने के लिए..प्रयास कर जरुर इस रोचक किताब को पढ़ा जायेगा.

Pacifier Returns on September 07, 2009 said...

Very nice blog you have
I wanted to say one thing

Things can be changed if people/politicians want them to change. Change need some more tough people at top positions. More salary and more respect for policemens.

Smiles :)
Prashant

Priyank on September 07, 2009 said...

pahli bar aapki post par comment likh raha hoon,iska ek khaas maksad bhi hai kyoonki aaj hi mujhe traffic hawaldaar ne rokna chaha aur mai bhaag nikla(license aur gadi ke sabhi kagaz hone ke baad bhi),Pandeji ne jo likha hai wo to bhadiya hai hi,aapka use hum tak pahoonchana aur bhi badhiya hai jiske liye dhanyawaad,aur har peshe ki apni khamiyan aur khoobiyaan hain

कंचन सिंह चौहान on September 08, 2009 said...

विभिन्न पेशे से जुड़े लोगों की विभिन्न परिस्थितियाँ और मजबूँरियाँ होती है, जीने के तरीके और पश ओ पेश के कई क्षण होते हैं, ऐसे लोगो के द्वारा लिखी गई ईमानदार इबारत ही इनके सच को सामने ला सकती है। पुलिस वालो के भी जीवन की वही कहानियाँ होती होंगी...! पता नही कहाँ दोष है, जो बहुत से किस्से खिलाफ भी मिलते हैं। मगर व्यक्तिगत रूप से उनसे मिलो तो अनुभव अलग होते हैं।

आपने एक जल्लाद की पर लिखी गई जिस पुस्तक का जिक्र किया था, वो भी पढ़ने का बहुत मन है और ये भी....!

शरद कोकास on September 09, 2009 said...

पुलिसिया जीवन मे भी कई मजेदार किस्से होते है ।कई पुलिस वाले साहित्यकार भी है

 

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