Tuesday, November 10, 2009

तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे : अनूप जलोटा के साथ सुनिए जनाब क़ैसर उल ज़ाफरी को !

जब भी पुरानी ग़ज़लों की बात सोचता हूँ मुझे अस्सी का दशक रह रह कर याद आता है। अब अगर कोई ये कहे कि मियाँ तुम क्या देर से जगे हो ग़ज़लें तो हमारे बाप दादा के ज़माने से चलती आ रही हैं तो वो बात भी सही है। अस्सी के दशक से पुरानी कई ग़ज़लें सच पूछिए तो पिछले एक दशक में ही सुन पाया हूँ। पर अब करें क्या ग़ज़ल की भावनाओं को समझने की उम्र भी तो 1985 के बाद ही आई।

वैसे भी जिस संगीत को आप सुनते हुए बड़े होते हैं वो आपकी वास्तविक ज़िंदगी का हिस्सा हो जाता है। जब भी ऐसी ही कोई ग़ज़ल या गीत बरबस याद आता है तो अपने साथ उस समय की बहुत सी यादों को समेटता हुआ आता है।

आज एक ऐसी ही ग़ज़ल आपके सामने पेश है जिसे अस्सी के दशक में ख़ासी लोकप्रियता हासिल हुई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा साहब ने। ये ग़ज़ल 1984 में रिलीज़ हुए उनके एलबम फरमाइश का अहम हिस्सा थी। पहली बार जब इसे सुना था तो मुझे जलोटा साहब का ग़ज़ल शुरु करने के पहले कहा गया शेर असमंजस में डाल गया था।

ग़ज़ल में बंदिशो अल्फाज़ ही नहीं काफी
जिगर का ख़ून भी चाहिए असर के लिए


इस 'जिगर के ख़ून' का मर्म समझने में मुझे तीन चार साल और लगे। फिर तो इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को सुनना मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। इसकी एक वज़ह ये भी थी कि क़ैसर उल ज़ाफरी साहब ने एक ऍसी रूमानी ग़ज़ल लिखी थी जो आसानी से एक हिंदी भाषी को भी समझ आ जाए। वैसे भी किशोरावस्था की दहलीज़ पर ऍसी भावनाएँ कुछ ज्यादा ही असर करती थीं।

वैसे अनूप जी ने भी बड़ी तबियत से इसका हर शेर गाया है। मतले में मौसम को छः बार कहने का उनका अंदाज़ निराला है। खूबसूरत वाद्य संयोजन के साथ साथ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अनूप भाई वाह वाही बटोरने वाला शास्त्रीय आलाप लेना भी नहीं भूले हैं।

अनूप जलोटा एक ऐसे गायक हैं जो उस ज़माने से लेकर आज तक सुने जाते रहे हैं। वे बारहा देश विदेशों में कनसर्ट देते रहते हैं। भक्ति संगीत के सैकड़ों एलबम में अपनी आवाज़ देने के बाद आजकल वो अपना समय भावी गायकों को सिखाने में लगाते हैं। उन्होंने गजल गायिकी बिल्कुल बंद तो नहीं की पर ग़ज़लों के अब उनके इक्का दुक्का एलबम ही आते हैं। तो देर किस बात की..बात शुरु की जाए उनके प्यारे शहर की


तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे
मै एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता ना लगे


तुम्हारे बस मे अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भुलाने मे शायद हमें ज़माना लगे

न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बेवफ़ा ना लगे


हमारे प्यार से जलने लगी है इक दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे

अनूप जलोटा की इस ग़ज़ल में जनाब क़ैसर-उल-जाफ़री के ये अशआर नहीं हैं..
कुछ इस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा ना लगे

वो फूल जो मेरे दामन से हो गया मंसूब,
ख़ुदा करे उसे बाज़ार की हवा ना लगे

तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'क़ैसर',
कि एक घूँट मे शायद ये बदमज़ा ना लगे

क़ैसर-उल-जाफ़री एक ऍसे शायर हैं जिन्होंने मुशायरों की शोभा तो बढ़ाई ही है कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। इतना ही नहीं क़ैसर साहब एक बुलंद आवाज़ के मालिक भी हैं। बड़ा आनंद आता है जब भी क़ैसर साहब की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनता हूँ। तो क्यूँ ना चलते चलते आप सब को भी उनकी आवाज़ से रूबरू कराता चलूँ !



चाँदनी था, कि ग़ज़ल था, कि सबा था क्या था
मैंने इक बार तेरा नाम सुना था क्या था

ख़ुदकुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैंने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था

तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फ़ा है क़ैसर
डूबते वक़्त इक हाथ बढ़ा था क्या था
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20 comments:

राज भाटिय़ा on November 10, 2009 said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने. धन्यवाद

Priyank on November 10, 2009 said...

gazal,waise to maine suni hain par kam hi samajh aayi,jaisa ki aapne kaha ye gazal hindi bhashiyoon ko bhi samjhi,fir mujhe kyun nahi
khair hamesha ki tarah aapki behtreen post ke liye bahut-bahut dhanyawaad,iske saath hi aapse nivedan hai ki aap suffi kalaamoon par bhi ek post likh kar anugrahit kare.Pun: dhanyawaad

Manish Kumar on November 10, 2009 said...

Priyank aapko Anuup ji ke gaye wale hisse mein kaun sa sher nahin samajh aaya agar tafseel se batayein to main kuch koshish karoonga aap tak shayar ki baat pahuchane kee. Jab bhi koyi sufi geet pasand aayega use aap tak juroor pahuchaoonga. Waise Blog par Rahat, Nusrat aur anya sufi kalakaron se judi se judi se kayi post likhi hain maine .

कंचन सिंह चौहान on November 11, 2009 said...

गज़ल में बंदिश ओ अल्फाज़ ही नही काफी
जिगर का खून भी कुछ चाहिये असर के लिये


बहुत सच

जो डूबना ह तो इतने सुकूँ से डूबो,
कि आस पास की लहरों को भी पता ना लगे


हम्म्म्म

ना जाने क्या है किसी की उदास आँखों में,
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बुरा ना लगे


बहुत खूब

दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे

वाह वाह ...हर शेर खुबसूरत...!

"अर्श" on November 11, 2009 said...

kya baat hai manish ji ...... kal se bas sune jaa rahaa hun,.. sochaa aakhir me tippani kar hi dun... magar kal ye kaisar sahib ka she'r nahi sun paya tha isliye ab tippani kar rahaa hun , kahan se ye motiyaan aap dhundh ke laate hain,... bahut bahut shukriya janaab...

fir se sunane me mashgool hun... fir aata hun


arsh

दिलीप कवठेकर on November 11, 2009 said...

मनीष जी, ये गीत और इस एलबम के अन्य गीत उन दिनों के साथी हैं , जब रात को देर तक जगजीत सिंग, मेहंदी हसन,गुलाम अली , और अनूप जलोटा को सुनकर किसी वर्च्युअल प्रेमप्रसंग का तसव्वूर कर ग़म के आशआर सुरों के आंसूंओं में भिगो कर जुगाली किया करते थे.

फ़िर वही शम ,वही ग़म, वही तनहाई है. शुक्रिया मेरे दोस्त!

रंजना on November 12, 2009 said...

Waah manish ji waah aanand aa gaya...

bahut bahut aabhar aapka itna sundar sangeet sunwane aur shayri padhwane ke liye...

aditya vikram on November 16, 2009 said...

sir ji pranam
aap ka blog dekha is waqt mai type kar raha hu ye waqt dekh kar aap ko meri iske prati jo diwangi hai wo samajh me pta chal jayegi...mai sahitya ka chhatr hu aur gazal premi..aap k is blog par dono ka adbhut samanway mila..aap ko bahut bahut dhanywad.aap se hamesa juda rahunga........

aditya vikram on November 16, 2009 said...

sir ji
mai faraj aur qateel ka bda prasansak hu..aur thodha nasir bhi acche lagte hai,,,aap k blog me nasir ka jikra nahi hai ya sayad maine dekha nahi,,aap kahe to mai unki kuch ghazale post kar du....
aditya

Manish Kumar on November 16, 2009 said...

Sahi Kaha Aditya aapne ! Maine Nasir ko utna nahin padha jitna Faraz, Faiz, Qateel ko padha hai. Aap Nasir ki pasandeeda ghazalein juroor post karein ya bhejein.

aditya vikram on November 18, 2009 said...

sir ji
reply k liye thanks...mai nasir ki achhi gazale post karta hu

aditya vikram on November 18, 2009 said...

रचनाकार: नासिर काज़मी


अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ



ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ



तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ



मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ



मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ



तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ



अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ



आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोंका हूँ

aditya vikram on November 18, 2009 said...

रचनाकार: नासिर काज़मी


दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया

aditya vikram on November 18, 2009 said...

रचनाकार: नासिर काज़मी


दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी



शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी



कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी



भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी



तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी



याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी



शहर की बेचराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी



सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी



तुम तो यारो अभी से उठ बैठे

शहर में रात जागती है अभी



वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी

Manish Kumar on November 18, 2009 said...

नासिर साहब की ये ग़ज़लें खासकर दूसरी और तीसरी वाली तो बेहद मशहूर हैं। दिल धड़कने का सबब मुझे गुनगुनाना बेहद पसंद है और दिल में इक लहर सी उठी है को तो गुलाम अली साहब की गायिकी ने अमर बना ही दिया है।

आभार आपका इनकी याद दिलाने के लिए।

aditya vikram on November 19, 2009 said...

sir ji
thanks
agar aap ki ijajat ho to kuch gazale jo mujhe behad pasand hai kya mai is par post kar sakta hu..
aditya

Manish Kumar on November 19, 2009 said...

Aditya
Apni pasandeeda ghazlein aapko yahan par nahin balki apne blog Sahitya Jeevan Ka par post karni chahiye . Sath hi apne blog par ye bhi likhein ki ye ghazlein aapko kyun pasand hain?

Sunil Kalyani said...

lovely post , very thought provoking
pl keep up the goodwork
thanx

shangrila on December 21, 2009 said...

bahut hi khoobsurat ghazal hai thanku assi ke dashak mein le jaane ke liye

Manish Kumar on December 22, 2009 said...

Sunil ji aur Shangrila ye ghazal aapko pasand aayi jaankar khushi huyi.

 

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