Monday, December 07, 2009

एक मतदानकर्मी की डॉयरी : बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ, ये लोकतंत्र देखने लायक़ तो है मगर हसीन नहीं

किसी भी चुनाव के आते ही सरकारी कार्यालयों, बैंकों, सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों में हलचल सी मच जाती है। इस हलचल को राजनीतिक सरगर्मी से जोड़ कर देखने की भूल मत कीजिएगा। दरअसल ये बेचैनी आती है चुनावी ड्यूटी में नाम आने की दहशत की वज़ह से। पर इस दहशत की वज़ह क्या है? आखिर ये वर्ग तो समाज का वो हिस्सा है जो पढ़ा लिखा है, जिसे रोज़गार के साधन उपलब्ध हैं। क्या लोकतंत्र के इस पुनीत पर्व में ये वर्ग अपने दायित्वों का वहन नहीं करना चाहता?

कुछ लोग तो बिल्कुल इस वज़ह से नहीं जाना चाहते कि चुनावी दिन मज़े से घर बैठने वाला छुट्टी का दिन लगता है। पर अधिकांश इस लिए नहीं जाना चाहते कि उन्हें अपनी जिंदगी खतरे में नज़र आती है। आज भी देश के कई प्रदेशों में चुनाव करवाना एक ऐसी क़वायद है जिसमें हमारे सैनिकों और नागरिकों की जिंदगी दाँव पर लग जाती है। दुर्भाग्य से झारखंड ऍसे प्रदेशों की सूची में प्रथम स्थान पर आता है। पर ये भी सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान करवाने का अनुभव एक ऐसा अनुभव है जो शहरों और कस्बों में रहने वाले मध्यमवर्गीय वर्ग को अपने देश की तथाकथित जम्हूरियत और उनके मनसबदारों के बारे में अपनी आस्थाओं और सोच पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर देता है। पिछले हफ्ते प्रथम चरण का चुनाव करा कर लौटे अपने कार्यालय के दो युवा मतदानकर्मियों की जब मैंने आपबीती सुनी तो लगा कि हम जिन परिस्थितियों में रहते हैं उससे बाहर की दुनिया कितनी पृथक है।

स्थान : मांडर

राँची शहर से मांडर प्रखंड की दूरी मात्र २५ किमी होगी। पूरे प्रखंड में ६९ गाँव हैं। हमारा काफ़िला बस में सवार हो कर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा है। मांडर अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाका है इसलिए पैट्रोलिंग पार्टी में राज्य की पुलिस का ही सशस्त्र बल है। पर सिर के गिरते बालों, कमर के ऊपर बढ़ती गोलाई और चेहरे की भावशून्यता शायद ही ये अहसास दिलाती है कि मैं किसी फोर्स के साथ चल रहा हूँ।

राँची से मांडर तक का रास्ता तो घंटे भर में खत्म हो जाता है। पर आगे तो गाड़ी जाने का रास्ता नहीं पगडंडी है तो पैदल ही जाना होगा। हमारा बूथ यहाँ से तीन किमी दूर है। गाँवों और खेत खलिहानों से होकर आधे पौन घंटे में हम सभी उस गाँव में जा पहुँचते हैं जहाँ हमारा मतदान केंद्र है। कच्चे मकानों के बीच पूरे गाँव में एक ही पक्की इमारत दिख रही है जो यहाँ का स्कूल है। मेरी भूमिका मतदान में मैक्रो आबसरवर की है। मतदान के पूर्व की तैयारी शुरु नहीं हो पाई है क्यूँकि EVM और बाकी सामग्री नहीं पहुँची। शाम के साथ ही पूरे गाँव में अँधेरा छा गया है। बाइक से एक व्यक्ति मशीन तो ले आया है पर रौशनी ना होने से कुछ काम आगे बढ़ नहीं रहा। स्कूल के एक कमरे में हम कुछ मोमबत्तियाँ जलाकर काम को किसी तरह निबटाना पड़ा है।

खाने और पीने के लिए जो घर से लाया था उसी से काम चलाना है। वैसे बगल में कुआँ है पर उसके मटमैले पानी को पीने की हिम्मत नहीं हो रही। वैसे भी ज्यादा खाना ना ही खाना श्रेयस्कर है क्यूँकि फिर तो जाड़े की इस कड़कड़ाती ठंड में खेतों के चक्कर लगाने के आलावा कोई उपाय ही नहीं बचेगा। मतदान तो प्रारंभ हो गया है पर मेरे मतदान केंद्र में मतदान की गति धीमी है। बाहर से हल्ले की आवाज़ आती है। देखता हूँ कि मतदानकर्मियों में से एक, जिसे सूची से मतदाताओं को चिन्हित करने का काम मिला है, बेहद मंथर गति से अपना काम कर रहा है। रास्ते में उससे परिचय हुआ था, एच ई सी में गार्ड है बेचारा। उसे देखने से तो लगता है कि अब तक सेवानिवृति हो जानी चाहिए थी पर फिर भी उसे भेजा गया है। उसकी कलम लिखते समय हिल रही है। लोगो के हल्ले से अब तो उसके हाथ भी काँपने लगे हैं। इतने में गश्त करने वाले मजिस्ट्रेट आ गए हैं। उन्होंने उसे वहाँ से हटाकर मुझे उस जगह पर बैठने को कहा है।

थोड़ी देर में एक मतदाता आकर मतदान करते वक़्त लाल बत्ती ना जलने की शिकायत करता है। अंदर जाकर देखता हूँ कि सचमुच बत्ती पिचक सी गई है। दरअसल कई मतदाता बटन दबाने की बजाए अपना सारा जोर उसके बगल में जलने वाली बत्ती को बटन समझ कर लगा रहे हैं। मतदान रोककर लोगों को समझाने का प्रयास करता हूँ कि उन्हें मतदान कैसे करना है पर मतदान खत्म होने पर देखता हूँ कि सभी प्रमुख उम्मीदवारों के बटन के बगल में जलने वाली बत्ती दबकर टूट चुकी है।

स्थान : तमाड़
तमाड़ राँची से जमशेदपुर जाने वाले सड़क मार्ग ५५ किमी दूरी पर है। तमाड़ प्रखंड के अंदर आने वाले गाँव नक्सल प्रभावित हैं। इसलिए यहाँ के चप्पे चप्पे पर CRPF ने अपनी टुकड़ियाँ लगा रखी हैं। माहौल चुनाव से ज्यादा युद्ध का लग रहा है। जगह-जगह लैंडमाइन का खतरा है। इसलिए मतदान केंद्र से १५ किमी पहले तक ही गाड़ी से जाने की व्यवस्था है। सात किमी का रास्ता पार कर मैं एक गाँव पहुँचता हूँ। इस बार चुनाव सामग्री साथ ही ले जाई जा रही है। गाँव में कुछ देर विश्राम कर आगे का सफ़र शुरु करना है।

पन्द्रह किमी बाद अपने लक्ष्य तक पहुँचने के बाद थकान बहुत हो रही है। सभी लोग थोड़े डरे भी हुए हैं। सुरक्षाकर्मियों ने सख्त ताक़ीद की है कि कोई भी स्कूल परिसर में नहीं सोएगा। सभी सहयोगी दूर एक खेत की ओर चल पड़े हैं। खेतों के बीचोबीच थोड़ी समतल जगह पर चादर बिछाई गई है। चाँद की रोशनी के बीच घुप्प अँधेरा है। सभी किसी तरह इस रात को काटने को बाध्य हैं। जैसे तैसे झपकी लग गई है।

मतदान ज्यादा नहीं हो रहा। ग्रामीण वोट दें तो क्यों दें। यहाँ तो चुनाव के समय भी नेता आने से कतराते हैं तो चुनाव के बाद वो क्या आएँगे। चुनाव की अवधि सुबह सात बजे से लेकर अपराह्न तीन बजे तक है। डेढ़ बजे अचानक ही खबर आती है कि सौ की संख्या में नक्सली हथियारबंद होकर इधर ही आ रहे हैं। हम सबों के चेहरे खौफ़ से ज़र्द पड़ गए हैं। आनन फानन में मतदान रोक कर सामान बाँध लिया जाता है। सुरक्षाकर्मियों की मदद से जल्द से जल्द इलाका छोड़ देना है। टेढ़े मेरे रास्तों में मशीन के साथ भागने में कई मतदानकर्मी औंधे मुंह गिरे हैं। मैं भी तीन बार गिरा हूँ पर अभी हम सभी को अपनी जिंदगी बचानी है। भागते भागते मेरा एक सहयोगी छोटी सी पुलिया पार करते वक़्त गड्ढे में जा गिरा है। साथ में मशीन भी गिरी है। शायद उसमें पानी भी चला गया हो पर जैसे तैसे उसे बाहर खींच कर अपने लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ सबने फिर से शुरु कर दी है। डेढ़ घंटे में हम उस सड़क तक जा पहुँचे हैं जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी। चेहरे पर संतोष चुनाव करवा पाने से ज्यादा बच कर निकलने का है..


ये तो बानगी भर है। इससे भी सुदूर इलाकों में हालात इनसे भी कठिन ही होंगे। और इतना सब होने पर भी ये बात गौर करने की है कि पूर्णतः सुरक्षित राँची के मतदाताओं का चुनाव प्रतिशत ३६ फीसदी रहा जबकि किसी भी बुनियादी सुख सुविधाओं से दूर इन इलाकों के ४५ से ५५ फीसदी लोगों ने मतदान किया। तो ये तो है हमारे यहाँ का लोकतंत्र जहाँ कुछ किलोमीटर के फ़ासले जिंदगी जीने का तरीका ही बदल जाते हैं।

ये सब सुनकर मन खिन्न सा है। रह रह कर दुष्यन्त कुमार जी की कही ये ग़ज़ल दिल को कचोट रही है...

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं


ये कचोट तो कुछ दिनों में निकल जाएगी। अपना काम, अपनी जिंदगी, अपने आसपास की दुनिया हमें इन खयालातों तक वापस लौटने नहीं देगी। शायद अगले चुनावों तक.......या उससे पहले ही जब ये अंधकार हमारे ठीक सामने मुँह बाए खड़ा होगा !
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8 comments:

Manish Singh "गमेदिल" on December 07, 2009 said...

aapka lekh pada, pad kar jitna achha laga utna hi dhukh huaa.

achha isley ki aapne hame jagrook banne ki prerana pradaan ki,

dukh is baat ka, ki hum kaha hai, aur hamara desh kish mukaam pe khada hai,

bahut pahle maine ek kavita likhi thi......... do panktiya prastut hain,

"khatra nahi gaire-vatan,
khatra hai gaddare-vatan"


Manish ji, mai aapka bahut bada fan ban chuka hu.............. Iss lekh ke liye "Shukriya"

NUKTAA on December 08, 2009 said...

Manishji,
aapka lekh sachmuch mein aankhein khol dene wala laga, gair prajatantrik tarike din b din is desh ko khokla karne par amaada hain...aur hum sabse bada prajatantra hone ka dam bharte hain...desh ne azaaadi ke baad kahan ke liye safar shuru kiya tha aur hum kahan pahuch gaye hai..

Dhusyant kumar ke lafzo mein
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो पाओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमुइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

हिमांशु । Himanshu on December 08, 2009 said...

"मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं ।"

पूरा आलेख इन पंक्तियों की जुबान बोल रहा है । हकीकत का बयान ! आभार इस महत्वपूर्ण आलेख का ।

गिरिजेश राव on December 08, 2009 said...

लोकतन्त्र में प्रतिनिधि चुनाव का पूरा मॉडल ही धोखा है। जनता के हाथों में थमाया गया झुनझुना है। क़ोफ्त होती है अपने उपर और बाकी जनता पर जो समझते हुए भी कुछ नहीं कर रहे।
जो नजारा आप ने बताया वह तो दूर जगह की माओवादी त्रस्त जगहों का है.. यह नजारा तो आम है - यहाँ तक कि दिल्ली के गाँवों में भी चुनाव सम्पन्न कराते कर्मियों की कम दुर्दशा नहीं होती।

रंजना on December 08, 2009 said...

Bahut bahut sahi kaha aapne...ek ek shabd sahi...sachmuch badi nirash karti hai yah sthiti....

Ise loktantra ka tamaasha hi to kahenge aur kya....

Khaskar jharkhand me yahan ke luteron ko dekhkar janta yah maan baithi hai ki yahan ka bhagy luteron ke haathon hi hai,iska kuchh nahi kiya jaa sakta....yahi udaaseenta 35 aur 40% matdaan ke roop me saamne aa rahi hai...

गौतम राजरिशी on December 08, 2009 said...

सच तो यही है कि ये सारी दुर्दशायें बस हमतक चर्चाओं में, पन्नों तक ही सीमित रह जाती हैं...जहाँ पहुँचना है, वहाँ अगर पहुँचती भी है तो कौन देखता है।

अभिषेक ओझा on December 11, 2009 said...

क्या कहें इस पर !

Manish Kumar on December 19, 2009 said...

मनीष, नुक़्ता, गिरिजेश, हिमांशु, रंजना, गौतम आप सभी की भावनाओं से पूरी तरह सहमति है। दरअसल हमारे आस पास के माहौल से चंद किमी दूर एक दूसरी दुनिया बसती है जिसके बीच की खाई को हमारा लोकतंत्र नहीं पाट पा रहा।

 

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