Saturday, January 31, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 13 : जानिए हौले हौले हवा चलती है के रचित होने के पीछे की सोच

तो आ गई है वार्षिक संगीतमाला के बीचों बीच की 13 वीं पायदान और यहाँ गीत वो जो पूरे देश को अपने लफ़्जों के बल पर हौले हौले झुमा रहा है। तो किसने लिखा ये गीत? एक समय तो मीडिया में ये खबरें भी आ गईं कि इसे लिखने वाले कोई और हैं और उन सज्जन ने टीवी पर इस गीत से सुसज्जित इक किताब भी दिखा डाली जो उनके हिसाब से कई साल पहले ही छप गई थी। खैर मीडिया की कई कहानियों की तरह वो स्टोरी भी आई गई हो गई। खैर, मैं तो यही मान कर चलूँगा कि ये गीत जयदीप साहनी का ही लिखा है जो इससे पहले चक दे इंडिया के गीतों को लिख कर चर्चा में आ चुके हैं।

वेसे क्या आप बता सकते हैं कि जयदीप और जावेद अख्तर में क्या समानता है? भई इन दोनों ने फिल्म जगत मं अपने कैरियर की शुरुआत बतौर पटकथा लेखक से की। ये अलग बात है कि जावेद साहब अब गीतों की रचना में ही वक़्त लगाते हैं जबकि जयदीप अभी भी पटकथा लेखक के तौर पर ज्यादा जाने जाते हैं।

जयदीप के बारे में आपको कुछ और बताएँगे आगे की पायदानों में पर अभी तो ये जानिए कि क्या कहना है गीतकार जयदीप साहनी का इस गीत के बारे में..
संध्या अय्यर को हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में जयदीप ने बताया कि "...ये गीत फिल्म के मुख्य पात्र सूरी की मनोदशा कहने का प्रयास करता है कि दिल से जुड़े मसलों के बारे में वो कैसे सोचता है। मेरा ये गीत एक ऐसे चरित्र की बात करता है जो खुद को विश्वास दिलाना चाहता है कि सब्र करने से काम अंत में जाकर बनता है। पर ये काम सूरी के लिए आसान नहीं क्योंकि उसी के दिल के दूसरे हिस्से की सोच बिल्कुल अलग है। यानि एक ओर सब्र तो दूसरी ओर लक्ष्य पाने की जल्दी। अब ना तो सूरी स्टाइलिश है, ना कोई प्रखर वक्ता और ना ही चुम्बकीय व्यक्तित्व का स्वामी। वो तो एक आम आदमी है, विद्युत विभाग का अदना सा कर्मचारी, जो वो जुमले बोल भी नहीं सकता जो भारतीय फिल्मों के नायक अक्सर प्रेम में पड़ने के बाद बोलते हैं। पर सूरी के पास एक खूबी तो है ही और वो है उसकी लगन और सच्चाई और वो अपनी इसी ताकत को खुद को बता रहा है। और इसी सोच पर मैंने इस गीत को रचा है।...."

शायद गीत की यही सच्चाई है जिसने इसे आम जन और समीक्षकों दोनों में इसे लोकप्रिय बनाया है। जयदीप साहनी के बोलों के साथ सलीम सुलेमान का संगीत पूरी तरह न्याय करता है। सुखविंदर सिंह ने हौले हौले चलने वाले नग्मे की खूबसूरत अदाएगी कर ये जतला दिया है कि उनका हुनर सिर्फ ऊँचे सुरों वाले डॉन्स नंबर तक ही सीमित नहीं।
तो आइए पहले चलें रब ने बना दी जोड़ी के इस गीत की शब्द यात्रा पर


हौले-हौले से हवा लगती है,
हौले-हौले से दवा लगती है,
हौले-हौले से दुआ लगती है, हाँ......

हाए ! हौले-हौले चंदा बढ़ता है,
हौले-हौले घूँघट उठता है,
हौले-हौले से नशा चढ़ता है... हाँ.......

तू सब्र तो कर मेरे यार
ज़रा साँस तो ले दिलदार
चल फिक्र नूँ गोली मार
यार है दिन जिंदड़ी दे चार
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया

इश्क ए दी गलियाँ तंग हैं
शरमो शर्मीले बंद हैं
खुद से खुद की कैसी ये जंग है
पल पल ये दिल घबराए
पक पल ये दिल शरमाए
कुछ कहता है और कुछ कर जाए
कैसी ये पहेली मुआ.दिल मर जाना
इश्क़ में जल्दी बड़ा जुर्माना
तू सब्र........हौले.....प्यार

रब दा ही तब कोई होणा, करें कोई यूँ जादू टोणा
मन जाए मन जाए हाए मेरा सोणा
रब दे सहारे चल दे, ना है किनारे चल दे
कोई है ना कहारे चल दे
क्या कह के गया था शायर वो सयाना
आग का दरिया डूब के जाना
तू सब्र........हौले.....प्यार


गीत तो आप ने सुन लिया अब आइए जानते हैंइस रोचक वीडिओ में सलीम सुलेमान, जयदीप, शाहरुख, वैभवी आदि से कि कैसे बना ये गीत! (वैभवी मर्चेंट इस गीत की कोरियोग्राफर हैं।)

Thursday, January 29, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 14 : जब धूप की तरह बदन को छू गई गुलज़ार की मुस्कुराहट

जैसा कि मैंने आपसे कहा था कि 15 से 22 पायदानों तक के गीतों के स्तर में ज्यादा फर्क नहीं था। पर अब शुरु हो रहा है इस संगीतमाला का वो दौर जिसमें आते हैं 14 वीं से छठी पायदान तक के गीत जो मेरी रेटिंग में बेहद आस पास हैं। तो आइए दूसरे दौर का आगाज़ करें गुलज़ार के लिखे युवराज फिल्म के इस गीत से जिसकी धुन बनाई ए.आर. रहमान ने और जिसे आवाज़ दी अलका यागनिक और जावेद अली ने ....

कहते हैं कि "मुस्कुराहट हुस्न का जेवर है" और गुलज़ार जब इस मुस्कुराहट को अपने बिंबों में ढालते हैं तो इस गीत से कविता सरीखे स्वर फूट पड़ते हैं अब इन लफ्ज़ों पर गौर करें
तू मुस्करा जहाँ भी है तू मुस्कुरा
तू धूप की तरह बदन को छू जरा
शरीर* सी ये मुस्कुराहटें तेरी
बदन में सुनती हूँ मैं आहटें तेरी
* नटखट
गीत का इतना हिस्सा सुनते ही आप गुलज़ार के शब्द जाल में बँध जाते हैं और गीत की रूमानियत के साथ बहते चले जाते हैं। इसमें मदद करता है रहमान का बेहतरीन संगीत संयोजन। चार मिनट तक अलका की मीठी आवाज़ सुनने के बाद ज़ावेद का स्वर गीत में प्रेम के अहसास को पूर्णता देता प्रतीत होता है। उसके बाद की शास्त्रीय बंदिश और पार्श्व से आता अलका जी का आलाप मन को मोह लेता है। खुद गुलज़ार, युवराज में रहमान के दिए गए संगीत को उनके सबसे अच्छे काम में से एक मानते हैं।
अब हमारी छोड़िए खुद ही महसूस कीजिए मोहब्बत की चाशनी में डूबे इस गीत को रहमान की मधुर धुन के साथ...


तू मुस्करा जहाँ भी है तू मुस्कुरा
तू धूप की तरह बदन को छू जरा
शरीर सी ये मुस्कुराहटें तेरी
बदन में सुनती हूँ मैं आहटें तेरी
लबों से आ के छू दे अपने लब जरा
शरीर सी.................आहटें तेरी

ऍसा होता है खयालों में अक्सर
तुझको सोचूँ तो महक जाती हूँ
मेरी रुह में बसी है तेरी खुशबू
तुझको छू लूँ तो बहक जाती हूँ

तेरी आँखों में, तेरी आँखों में
कोई तो जादू है तू मुस्करा
जहाँ भी है तू मुस्कुरा......
तू मुस्करा.......आहटें तेरी

तेज चलती है हवाओं की साँसें
मुझको बाहों में लपेट के छुपा ले
तेरी आँखों की हसीं नूरियों में
मैं बदन को बिछाऊँ तू सुला ले
तेरी आँखों में, तेरी आँखों में
कोई तो नशा है तू मुस्कुरा
तू मुस्करा.......आहटें तेरी





वार्षिक संगीतमाला 2008 में अब तक :

Tuesday, January 27, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 15 : दिल हारा रे..सुखविंदर सिंह की उर्जात्मक प्रस्तुति !

वार्षिक संगीतमाला २००८ में अब बचे हैं चोटी के पन्द्रह गीत। अब तक पेश निचली पायदानों के दस गीतों में पाँच ए. आर रहमान और तीन विशाल शेखर के द्वारा संगीत निर्देशित रहे हैं। १४ वीं पायदान का ये गीत एक बार फिर विशाल शेखर की झोली में है। टशन फिल्म के इस गीत को गाया आजकल के बहुचर्चित गायक सुखविंदर सिंह ने, गीत के बोल लिखे बहुमुखी प्रतिभा के धनी पीयूष मिश्रा ने।

वैसे तो ये गीत इस संगीतमाला के तीन झूमने झुमाने वाले गीतों में से एक है। इस कोटि का एक गीत आप २५ वीं पायदान पर सुन चुके हैं और इसी तरह की मस्ती और उर्जा से भरपूर एक गीत आपको पहली पाँच पायदानों के अंदर सुनने को मिलेगा। तो जब तक आप सोचे विचारें वो गीत कौन सा हो सकता है , तब तक इस गीत के बारे में कुछ बात कर ली जाए

१४ वीं पायदान का गीत उनके लिए है जो जीवन को बेफिक्री के साथ मस्तमौला अंदाज़ में जीते हैं। जिनके सिर पर ना तो बीते कल का बोझ है और ना ही आने वाले कल की चिंता। जो ना सामने आने वाले खतरों की परवाह करते हैं और ना ही याद रखते हैं अपने अतीत को। पर जिंदगी की इस दौड़ में अगर ये हारे हैं तो बस अपने दिल से...
भारतीय नाट्य संस्थान से स्नातक, अभिनेता और गीतकार पीयूष मिश्रा ने गीत में इन भावों को तो खूबसूरती से पिरोया है। विशाल शेखर का संगीत गीत के साथ थिरकने पर मजबूर करता है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ इस तरह के उर्जात्मक गीतों के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। इसलिए तो गीत सुनते ही श्रोताओं के मुँह से ये सहज निकलता है कि इन्होंने तो समा ही बाँध दिया..

तो आइए डालें इस गीत के बोलों पर इक नज़र


कैसे भागे रे, पागल मनवा
ताबड़ तोड़ नाच लूँ , नाच लूँ, नाच लूँ, नाच लूँ, रे
हो हो छप्पन तारे तोड़ नाच लूँ
सूरज चंदा मोड़ नाच लूँ
अब तो ताबड़ तोड़ नाच लूँ
मैं तो बंजारा रे

बन के आवारा मैं किस मेले में पहुँच गया हूँ
कोई तो रोको खो जाऊँ रे
मस्ती का मारा, ये क्या बोलूँ मैं, किसे कहूँ मैं
दिल का मैं हारा हो जाऊँ रे
दिल हारा रे.....
दिल हारा हारा, दिल हारा हारा, मैं हारा
ओ यारा रे...दिल हारा हारा, दिल हारा हारा, मैं हारा दिल हारा रे....

आज अकेले हर हालात से आगे
जुबानी बात से आगे चला आया
हर तारे की आँख में आँखें डाले
चाँदनी रात से आगे चला आया
किसको बोलूँ मैं, कैसे बोलूँ मैं
कोई मुझको बता के जाए, कोई तो बता जाए
दिल हारा रे.........

हो..रस्ता बोला, रे कि थक जाएगा
बीच में रुक जाएगा, अभी रुक जा
अरे आगे जा के, गरज के आँधी होगी
गरज के तूफाँ होगा, अभी रुक जा
मैं तो दीवाना, बोला आ जाना
दोनों संग में चलेंगे हाँ
आ भी जा तू आ जा रे
दिल हारा रे.........


Monday, January 26, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 16 : मर जावाँ... भीगे भीगे सपनों का जैसे खत है

आज बारी है इस संगीतमाला के गीत नम्बर सोलह की और इस पायदान पर गीत वो जिसकी, गायिका, संगीतकार और यहाँ तक की गीतकार भी इस साल पहली बार अपनी जगह बना रहे हैं। ये गीत मैंने तब सुना जब मैं इस संगीतमाला की सारी २५ पायदानें की सूची तैयार कर चुका था। पर इस साल की सा रे गा मा पा की विजेता वैशाली म्हाणे को जब मैंने ये गीत गाते सुना तो मुझे लगा कि इस गीत के लिए तो जगह बनानी पड़ेगी। पहली बार इस गीत को सुनते ही गायिका श्रुति पाठक की पीठ थपथपाने की इच्छा होती है। इस गीत में नीचे के सुरों को जिस तरह उन्होंने निभाया है वो निसंदेह तारीफ के काबिल है।

पर इस प्रशंसा की हक़दार सिर्फ श्रुति नहीं हैं। अगर श्रुति की गहरी आवाज़ का जादू आप पर होता है तो वो इरफ़ान सिद्दकी के बोलों की वज़ह से। प्रेम में डूबी एक लड़की की भावनाओं को जब वो इरफ़ान के इन शब्दों में हम तक पहुँचाती हैं तो मन बस गुलजारिश हो जाता है।

सोचे दिल कि ऍसा काश हो
तुझको इक नज़र मेरी तालाश हो
जैसे ख्वाब है आँखों में बसे मेरी
वैसे नीदों पे सिलवटें पड़े तेरी
भीगे भीगे अरमानों की राहत है
हाए गीली गीली ख्वाहिश भी तो बेहद है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......
इरफान सिद्दकी एक युवा गीतकार हैं और गुलज़ार से खासे प्रभावित भी। वे कहते हैं कि गुलज़ार हल्के फुल्के शब्दो के साथ गहरे शब्दों के मिश्रण की कला जानते हैं। इरफ़ान वैसे तो गीत के बोल सहज रखने पर विश्वास रखते हैं पर वो ये भी महसूस करते हैं कि उर्दू शब्दों का प्रयोग करने से गीत का असर और बढ़ जाता है। जैसे इसी गीत की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि उन्होंने नीचे की पंक्तियों में 'खत' और 'लत' का इस्तेमाल इसी लिहाज़ से किया
भीगे भीगे सपनों का जैसे ख़त है
हाए! गीली गीली चाहत की जैसे लत है
इसी गीत के साथ पहली बार बतौर संगीतकार सलीम सुलेमान ने इस साल की संगीतमाला में प्रवेश कर लिया है। सलीम सुलेमान इससे पहले पिछले साल डोर और चक दे इंडिया के गीतों के साथ वार्षिक संगीतमालाओं का हिस्सा बन चुके हैं। इस गीत में सलीम मर्चेंट ने अंतरे के बीच अरबी बोलों का समावेश किया है जो कुछ सुनने में इस तरह लगते हैं

रादी क्राह दी क्रावा, वल हवा वसाबाह
वादी क्राह हितावह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह
लातेह्वाल फलाहवह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह
वादी क्राह हितावह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह

अब इस की लिखनें में भूलें तो अवश्य हुई होंगी पर चूंकि अरबी का जानकार नहीं हूँ इसलिए इसे नज़रअंदाज कर दीजिएगा। अंतरजाल पर इसके अनुवाद से इन लफ्ज़ों के भावों का अंदाज़ लगता है जो कुछ इस तरह से है...."भगवान साक्षी है कि तेरी याद में तरसने और अपना गुनाह कुबूल करने के बावजूद तुमने अपना वादा नहीं निभाया"

खैर सलीम का ये तरीका गाने में एक नयापन लाता है पर मुझे लगता है कि अरबी बोलों के बिना भी और हल्के संगीत संयोजन से भी गीत की प्रभाविकता बनी रहती। तो आइए सुने और देखें फैशन फिल्म का ये गीत

मर जावाँ मर जावाँ
तेरे इश्क़ पे मर जावाँ
भीगे भीगे सपनों का जैसे खत है
हाए गीली गीली चाहत की जैसे लत है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......

सोचे दिल कि ऍसा काश हो
तुझको इक नज़र मेरी तालाश हो
जैसे ख्वाब है आँखों में बसे मेरी
वैसे नीदों पे सिलवटें पड़े तेरी
भीगे भीगे अरमानों की राहत है
हाए गीली गीली ख्वाहिश भी तो बेहद है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......


Friday, January 23, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 17 : इन लमहों के दामन में पाकीज़ा से रिश्ते हैं

वार्षिक संगीतमाला की १७ वीं पायदान पर पहली बार इस साल अवतरित हुए हैं सोनू निगम और जावेद अख्तर साहब और साथ में हैं ए.आर. रहमान। भारतीय वाद्य यंत्रों और उर्दू की मिठास के साथ फिल्म जोधा अकबर के इस गीत का आग़ाज होता है। जावेद साहब ने इस गीत की शुरुआत में इतने प्यारे बोल लिखे हैं कि मन वाह वाह कर उठता है। सोनू निगम ने इस साल बेहद चुनिंदा नग्मे ही गाए हैं और इस गीत के हिसाब से उन्होंने इसकी अदाएगी में एक मुलायमियत घोली है जो मन को छू जाती है।

इन लमहों के दामन में
पाकीज़ा से रिश्ते हैं
कोई कलमा मोहब्बत का
दोहराते फरिश्ते हैं

ए. आर. रहमान द्वारा संगीत निर्देशित इस गीत के तीन स्पष्ट हिस्से हैं। एक में शहंशाह अकबर के दिल की इल्तिजा है तो दूसरे में महारानी जोधा की प्रेम की स्वीकारोक्ति। रहमान ने गीत के इन दोनों के बीच एक कोरस डाला है जो इन दो हस्तियों की इस प्रेम कथा में प्रजा के स्वर जैसा लगता है। पर मुखड़े के बाद का कोरस, गीत के पूरे मूड से थोड़ा लाउड लगता है।

इन लमहों के दामन में
पाकीज़ा से रिश्ते हैं
कोई कलमा मोहब्बत का
दोहराते फरिश्ते हैं

खामोश सी है ज़मीन हैरान सा फलक़ है
इक नूर ही नूर सा अब आसमान तलक है
नग्मे ही नग्मे हैं जागती सोती फिज़ाओं में
हुस्न है सारी अदाओं में
इश्क़ है जैसे हवाओं में

कैसा ये इश्क़ है
कैसा ये ख्वाब है
कैसे जज़्बात का उमड़ा सैलाब है
दिन बदले रातें बदलीं, बातें बदलीं
जीने के अंदाज़ ही बदले हैं
इन लमहों के दामन में .....

पर फिर मधुश्री की मीठी आवाज़ गीत को वापस उसी धरातल पर पहुँचा देती है जहाँ से ये शुरु हुआ था और मन में वही सुकून तारी हो जाता है जिसका अहसास गीत के प्रारंभ से होना शुरु हुआ था...

समय ने ये क्या किया
बदल दी है काया
तुम्हें मैने पा लिया
मुझे तुमने पाया
मिले देखो ऍसे हैं हम
कि दो सुर हो जैसे मद्धम
कोई ज्यादा ना कोई कम
किसी आग में.. कि प्रेम आग में
जलते दोनो ही थे
तन भी है मन भी
मन भी है तन भी

मेरे ख्वाबों के इस गुलिस्ताँ में
तुमसे ही तो बहार छाई है
फूलों में रंग मेरे थे लेकिन
इनमें खुशबू तुम्हीं से आई है

क्यूँ है ये आरज़ू
क्यूँ है ये जुस्तज़ू
क्यूँ दिल बेचैन है
क्यूँ दिल बेताब है

दिन बदले रातें बदलीं, बातें बदलीं
जीने के अंदाज़ ही बदले हैं

इन लमहों के दामन में ....

नग्मे ही नग्मे हैं जागती सोती फिज़ाओं में...
इश्क़ है जैसे हवाओं में

तो आइए सुनें और देखें जोधा अकबर का ये प्यारा सा नग्मा....




Tuesday, January 20, 2009

'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए एक लाख (100000) पेजलोड्स : आभार सभी पाठकों का !

पिछले हफ्ते एक शाम मेरे नाम ने अपने एक लाख (100000) पेज लोड्स पूरे किये। इस ब्लॉग के रोमन हिंदी संस्करण ने दिसंबर २००७ में जब ये मुकाम हासिल किया था तब मैंने रोमन हिंदी ब्लागिंग में अपने तजुर्बे को अपनी इस पोस्ट में आप सब के साथ बाँटा था। जब हिंदी ब्लागिंग शुरु की थी तो स्टैटकाउंटर (Statcounter) कॉनफिगर करते समय नहीं सोचा था कि कभी इसकी डिजिट संख्या को पाँच से छः करने की जरूरत पड़ सकती है। पर आज जब मैं ये होता देख रहा हूँ तो मन में एक संतोष का अनुभव हो रहा है।


अप्रैल 2006 में जब हिंदी ब्लागिंग शुरु की थी तब पहले नौ महिनों में ये संख्या ५००० के करीब थी में थी जैसा कि आप नीचे के ग्राफ से देख सकते हैं। विगत दो वर्षों में ये संख्या उत्तरोत्तर बढ़ी है और ऍसा संभव हुआ है हिंदी ब्लागिंग के विस्तार और सर्च इंजनों की उपलब्धता की वज़ह से।


जहाँ हिंदी चिट्ठे की पाठक संख्या में वृद्धि हुई है वहीं मेरा रोमन हिंदी चिट्ठा में पिछले दो सालों के आँकड़ों में कोई खास फर्क नहीं आया है। पर आज भी रोमन हिंदी संस्करण Ek Shaam Mere Naam को पढ़ने वालों की संख्या (१८६००० पेज लोड्स और १२५००० यूनिक विजिटर) इस चिट्ठे से कहीं ज्यादा है और वो भी तब जब कि इसके अधिकांश पाठक सर्च इंजन से ही वहाँ पहुँचते हैं। ये बात जरूर है कि दोनों चिट्ठों की पेजलोड्स संख्या के अंतर में निरंतर कमी आ रही है। इसकी वज़ह ये है कि अब लोग हिंदी के सर्च इंजनों का भी इस्तेमाल करने लगे हैं।

पर एक बात में हिंदी संस्करण अपने रोमन हिंदी संस्करण से आगे निकला है तो वो है सब्सक्राइबर संख्या। गौर करने की बात है कि मैंने हिंदी ब्लॉग पर ये सुविधा रोमन हिंदी संस्करण से काफी बाद में शुरु की थी। आज के दिन में हिंदी और रोमन संस्करण को मिलाकर करीब ४५० सब्सक्राइबर हैं जो कि एक एकल हिंदी चिट्ठे के लिए आपार हर्ष की बात है। पिछले साल मैंने इस चिट्ठे पर विषयों की एकरूपता बनाए रखने के लिए अपने यात्रा वृत्तांतों को मुसाफ़िर हूँ यारों पर प्रस्तुत करना शुरु कर दिया है जो आप में से कईयों के लिए सुविधाजनक रहा होगा।


पिछले तीन चार सालों से ब्लागिंग से जुड़ी मेरी प्रतिबद्धता इसीलिए रही है क्यूँकि इसने ना केवल मुझे अपनी रुचियों से जुड़े रहने का मौका दिया है बल्कि उन्हें अपने पाठको से (जिनका एक बड़ा हिस्सा ब्लागिंग जगत के बाहर से आता है) बाँटकर मैंने उनका स्नेह भी अर्जित किया है । आशा है कि आने वाले वर्षों में भी आप सभी ये स्नेह बनाए रखेंगे ताकि संगीत और साहित्य जो इस चिट्ठे के दो मजबूत आधार स्तंभ हैं के माध्यम से आपसे विचारों का आदान प्रदान चलता रहे।

Saturday, January 17, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 पायदान संख्या 18 : कहीं तो होगी वो..दुनिया जहाँ तू मेरे साथ है.

तो हुजूर वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला के थोड़ा रूमानी होने का और इसीलिए यहाँ गाना वो जो पिछले महिने बनाए गए मेरे क्रम से पाँच छलाँगे ऊपर मार कर आ पहुँचा है पायदान संख्या 18 पर। जाने तू या जाने ना के इस गीत की धुन बनाई है अल्लाह रक्खा रहमान यानि वही अपने चहेते ए. आर. रहमान ने और सच कहूँ तो गीत शुरु होने के प्रथम 35 सेकेंड्स में ही आप उनकी दी हुई धुन से इस गीत के मूड को समझ जाते हैं कि ये एक प्यारा सा रोमांटिक नग्मा होगा।

मुझे ये धुन कमाल की लगती है..और धुन का असर गहरा हो ही रहा होता है कि नेपथ्य से आती है राशिद अली की आवाज और गूँजते हैं ये स्वर...
कहीं तो ..कहीं तो
होगी वो
दुनिया जहाँ तू मेरे साथ है
जहाँ मैं, जहाँ तू
और जहाँ बस तेरे मेरे जज़्बात हैं

बस मूड एकदम से बदल जाता है। मुझे इस गीत की ये पंक्तियाँ सुनकर अपनी किशोरावस्था के दिन याद आ जाते हैं जब हम ऍसी ही कितनी कल्पनात्मक उड़ानों में डूबते उतराते रहते थे। अब्बास टॉयरवाला की तारीफ करनी होगी की बेहद सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए भी अपनी बात को हम तक पहुँचा पाते हैं। कभी कभी इस भागदौड़ भरी जिंदगी में कोरी भावुकता की भी जरूरत महसूस होती है और तब ऍसे गीत मन को बड़े भले लगते हैं।

राशिद अली के बारे में तो हम पिछली पोस्ट में विस्तार से बात कर चुके हैं इस गीत में राशिद का एक अंतरे में साथ दिया है मानसून वेडिंग में नायिका की भूमिका निभाने वाली वसुंधरा दास ने। बस इस गीत की एक ही बात नहीं जमती और वो है अंत में कोरस को लाने के लिए गीत के स्केल में लाया गया बदलाव। इसलिए चार मिनट दस सेकेंड बीतते ही मैं गीत की पुनरावृति कर लेता हूँ। तो लीजिए पहले पढ़िए इस गीत के बोल.....
कहीं तो ..कहीं तो
होगी वो
दुनिया जहाँ तू मेरे साथ है
जहाँ मैं, जहाँ तू
और जहाँ बस तेरे मेरे जज़्बात हैं
होगी जहाँ सुबह तेरी
पलकों की किरणों में
लोरी जहाँ चाँद की
सुने तेरी बाहों में

जाने ना कहाँ वो दुनिया है
जाने ना वो है भी या नहीं
जहाँ मेरी जिंदगी मुझसे
इतनी ख़फा नहीं

साँसें खो गई है किसकी आहों में
मैं खो गई हूँ जाने किसकी बाहों में
मंजिलों से राहें ढूँढती चली
खो गई है मंजिल कहीं राहों में

कहीं तो कहीं तो
है नशा
तेरी मेरी हर मुलाक़ात में
होठों से, होठों को चूमते
ओ रहते हैं हम हर बात पे
कहती है फिज़ा जहाँ
तेरी जमीं आसमान
जहाँ है तू मेरी हँसी
मेरी खुशी मेरी जाँ
जाने ना कहाँ वो दुनिया है
जाने ना वो है भी या नहीं
जहाँ मेरी जिंदगी मुझसे
इतनी ख़फा नहीं...

तो अब सुनिए रहमान, अब्बास और राशिद खाँ की इस बेहद रोमांटिक पेशकश को...


Thursday, January 15, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 पायदान संख्या 19 : खुदा जाने कि मैं फ़िदा हूँ...

जहाँ तक संगीत निर्देशकों की बात है वार्षिक संगीतमाला २००८ में अब तक ए. आर. रहमान का दबदबा कायम है। पर अब तक हम कई नए गीतकारों क़ौसर मुनीर, शब्बीर अहमद और अब्बास टॉयरवाला को सुन चुके हैं। आज बारी है अन्विता दत्त गुप्तन की जिन्होंने लिखा है वार्षिक संगीतमाला की 19 वीं पायदान का ये गीत जिसे खूबसूरती से फिल्माया गया है दीपिका रणवीर की जोड़ी पर।


वैसे आप जरूर जानना चाहते होंगे कि ये अन्विता दत्त गुप्तन हैं कौन ? अन्विता के गीतकार बनने का सफ़र दिलचस्प है और कुछ हद तक प्रसून जोशी से मिलता है। अन्विता जब २४ साल की थीं तब अपनी बॉस के साथ 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएँगे ' देखने गईं और तभी उनके दिल में फिल्म जगत से जुड़ने का ख्वाब पलने लगा। तब तक अन्विता प्रसून की तरह विज्ञापन जगत का हिस्सा बन चुकीं थीं और अपने चौदह सालों के कैरियर में विभिन्न विज्ञापन एजेंसियों में बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर के पद पर कार्य कर चुकी हैं।

प्रसून से उलट, करीब दो साल पहले उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और बतौर गीतकार अपने सपने को पूरा करने की सोची। अन्विता ने अब तक अपने गीतों में प्रसून जैसी काव्यत्मकता का परिचय तो नहीं दिया पर सहज शब्दों से आम संगीतप्रेमी जन का ध्यान खींचने में वो सफल रही हैं।

रहमान के बाद इस साल सबसे ज्यादा लोकप्रियता अगर किसी ने बटोरी है तो वो है विशाल शेखर की जोड़ी ने। इस संगीतमाला में उनका संगीत निर्देशित ये तीसरा गीत है। इस गीत को अपनी मधुर आवाज़ से सँवारा है केके और शिल्पा राव ने। इस गीत में केके यानि कृष्ण कुमार मेनन ने जिस खुले गले से सुर लगाए हैं वो दिल को खुश कर देते हैं और मन इस गीत को गुनगुनाने का करने लगता है। झारखंड के जमशेदपुर से ताल्लुक रखने वाली शिल्पा को इस साल की उदीयमान गायिका या खोज कह सकते हैं। अपनी गहरी आवाज़ में वो केके का अच्छा साथ निभाती नज़र आई हैं।
तो आइए सुनें बचना ऍ हसीनों फिल्म का ये नग्मा



सजदे में यूँ ही झुकता हूँ, तुम पे ही आ के रुकता हूँ
क्या ये सबको होता है,
हमको क्या लेना है सब से
तुम से ही सब बातें अब से, बन गए हो तुम मेरी दुआ

सजदे में यूँ ही झुकता हूँ, तुम पे ही आ के रुकता हूँ....
खुदा जाने कि मैं फ़िदा हूँ
खुदा जाने मैं मिट गया
खुदा जाने ये क्यूँ हुआ है
कि बन गए हो तुम मेरे खुदा

तू कहे तो तेरे ही कदम के मैं निशानों पे
चलूँ रुकूँ इशारे पे
तू कहे तो ख्वाब का बना के मैं बहाना सा
मिला करुँ सिरहाने पे
तुमसे दिल की बातें सीखीं
तुमसे ही ये राहें सीखीं
तुम पे मर के मैं तो जी गया

खुदा जाने कि मैं फ़िदा हूँ............

दिल कहे कि आज तो छुपा लो तुम पनाहों में
कि डर है तुमको खो दूँगा
दिल कहे संभल ज़रा खुशी को ना नज़र लगा
कि डर है मैं तो रो दूँगा
करती हूँ सौगातें तुमसे
बाँधे दिल के धागे तुमसे, ये तुम्हें ना जाने क्या हुआ
खुदा जाने कि मैं फ़िदा हूँ............



Tuesday, January 13, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 पायदान संख्या 20 : कभी कभी अदिति जिंदगी में..

आज हम प्रवेश कर रहे हैं वार्षिक संगीतमाला २००८ के प्रथम बीस गीतों की फेरहिस्त में। पिछली पोस्ट में आप रूबरू हुए थे गायक जावेद अली से और आज २० वीं पायदान पर जो गीत है उसे आवाज़ दी है नए कलाकार राशिद अली ने !


जाने तू या जाने का के सबसे लोकप्रिय गीत को गाने वाले राशिद को ए. आर. रहमान की खोज कहा जा सकता है। राशिद के परिवार का ताल्लुक यूँ तो उत्तर प्रदेश से है पर वे लंदन में ही पले बढ़े। माँ ग़ज़ल गायिका थी इसलिए ब्रिटेन के जाने माने कलाकारों के पाश्चात्य संगीत के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से भी उनका परिचय साथ साथ हुआ। स्कूल में जॉज (Jazz) संगीत की ओर उन्मुख हुए। फिर जब वाइलिन और गिटार के बीच अपना पसंदीदा वाद्य यंत्र को चुनने की बारी आई तो उन्होंने गिटार को चुना।

२००२ में पहली बार रहमान से एक कान्सर्ट के दौरान उनकी मुलाकात हुई और फिर २००३ में वे बतौर गिटारिस्ट उनके क़ाफिले के सदस्य बन गए। और जाने तू या जाने ना में कभी कभी अदिति में ना केवल उन्होंने अपनी प्यार अदाएगी से सबका मन मोहा बल्कि अपनी ओर से गिटार के कुछ बीट्स जोड़े। राशिद कहते हैं कि मैंने बॉलीवुड में प्रवेश के बारे में इस तरह नहीं सोचा था। हाँ इतनी तमन्ना जरूर थी कि जब स्टेज पर जाऊँ तो लोग मुझे अपनी आवाज़, अपने गिटार वादन के लिए पहचाने।

और अब जबकि रूठे हुए को मनाता ये गीत सबकी जुबाँ पर है राशिद खुशी महसूस कर सकते हैं कि बहुत जल्द ही वो अपना सपना पूरा कर पाए हैं। तो आइए एक बार फिर सुनते हैं ये गीत राशिद अली की आवाज़ में.....

कभी कभी अदिति जिंदगी में यूँ ही कोई अपना लगता है
कभी कभी अदिति वो बिछड़ जाये तो इक सपना लगता है
ऐसे में कोई कैसे अपने आँसुओ को बहने से रोके
और कैसे कोई सोच ले everything’s gonna be okay

कभी कभी तो लगे जिंदगी में रही ना खुशी और ना मज़ा
कभी कभी तो लगे हर दिन मुश्किल और हर पल एक सज़ा
ऐसे में कोई कैसे मुस्कुराये कैसे हँस दे खुश होके
और कैसे कोई सोच दे everything gonna be okay

सोच ज़रा जाने जाँ तुझको हम कितना चाहते हैं
रोते है हम भी अगर तेरी आँखों में आँसू आते हैं
गान तो आता नहीं है मगर फिर भी हम गाते हैं
के अदिति माना कभी कभी सारे जहाँ में अँधेरा होता है
लेकिन रात के बाद ही तो सवेरा होता है

कभी कभी अदिति जिंदगी में यूँ ही कोई अपना लगता है
कभी कभी अदिति वो बिछड़ जाए तो एक सपना लगता है
हे अदिति हँस दे हँस दे हँस दे हँस दे हँस दे हँस दे तू ज़रा
नहीं तो बस थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा मुस्कुरा

तू खुश है तो लगे के जहाँ में छाई है खुशी
सूरज निकले बादलों से और बाटें जिंदगी
सुन तो ज़रा मदहोश हवा तुझसे कहने लगी
के अदिति वो जो बिछड़ते है एक न एक दिन फिर मिल जाते हैं
अदिति जाने तू या जाने न फूल फिर खिल जाते हैं

कभी कभी अदिति .................थोड़ा मुस्कुरा

मुझे लगता है कि ये साल का सबसे खुशनुमा गीत है जो किसी के भी उदास मन को प्रफुल्लित कर दे। आप क्या सोचते हैं इस गीत के बारे में

Friday, January 09, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 21 - आँखों से ख्वाब रूठ कर..

वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं पायदान पर इस बार फैला है उदासी का रंग ! इस गीत के गायक गायिका की जोड़ी को आप ने फिल्मी गीतों की बजाए गैर फिल्मी एलबमों में ज्यादा सुना होगा। पिया बसंती में चित्रा के साथी गायक और गुलज़ार के सूफी एलबम इश्का इश्का के पीछे की वो सुरीली आवाज़ याद है ना आपको।


जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध सारंगी वादक और गायक उस्ताद सुलतान खाँ और सब के तन मन में फिल्म ओंकारा में नमकीनियत घोलती रेखा भारद्वाज की। जब दो इतने प्रतिभावान कलाकार एक गीत को अपनी आवाज़ दें कुछ तो नई बात पैदा होगी ना। और ये मौका आया शामिर टंडन द्वारा संगीत निर्देशित फिल्म सुपरस्टार में

मुझे रेखा भारद्वाज की आवाज़ में एक अलग तरह की कशिश नज़र आती है। पहली बार जब उनका सूफी गीत तेरे इश्क़ में सुना था तो उनकी आवाज़ का शैदाई हो गया। बाद में उनके संगीतकार पति विशाल, जो कॉलेज में उनके जूनियर थे के निर्देशन में ओंकारा के गीत 'नमक इस्क का ' ने उनकी प्रतिभा को व्यवसायिक सफलता भी मिली। पर दुर्भाग्यवश अभी भी विशाल के आलावा अन्य संगीतकार उनकी प्रतिभा का फायदा नहीं उठा पाए हैं।

अब लौटें इस गीत पर तो ये वैसा नग्मा नहीं है एक ही बार में आपके दिलो दिमाग पर चढ़ जाए। शब्बीर अहमद का लिखा ये गीत, बीते हुए कल में बिखरे कुछ ख्वाबों और खुशनुमा एहसासों की बात करता है जो वक़्त के थपेड़ों से ऐसे चिटके की उनमें पड़ी दरारों को पाटने की आस, आस ही रह गई। और गीत के साथ ये भावनाएँ धीरे-धीरे मन में उतरती हैं। इस गीत को मेरे लिए विशिष्ट बनाने का सारा श्रेय मैं गीत के बोलों और उस्ताद साहब व रेखा जी की गायिकी को देना चाहूँगा। शामिर टंडन का संगीत मुझे कुछ हिस्सों में अच्छा लगा।

तो आइए पहले गौर करें गीत के बोलो पर


आँखों से ख्वाब रूठ कर
पलकों से अश्क टूट कर
जाने कहाँ बिखर गए
साहिल से मौज़ें फूटकर
अरमान दिल से छूट कर
जाने कहाँ, जाने कहाँ, बिखर गए...

रस्ते वही गलियाँ वही, लेकिन वो बात अब हैं कहाँ
जिसमें कभी थी जिंदगी, सूना पड़ा है अब वो मकान
सूना पड़ा है अब वो मकान
कुछ लमहे जान बूझ कर
खुशियाँ तमाम लूट कर
जाने कहाँ बिखर गए

यादों से रूठी थक के मैं, लौटी तो ये पता चला
पैरों में थे छाले पड़े, मुश्किल था कितना फ़ासला
जज्बात मेरे ऊबकर, गम के भँवर में डूबकर
जाने कहाँ बिखर गए

आँखों से ख्वाब रूठ कर...


और हाँ फुर्सत के लमहों के बीच ही सुनिएगा इस गीत को..




और इस गीत के वीडिओ को देखना चाहते हों तो ये रहा यू ट्यूब का लिंक


Tuesday, January 06, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 22 - फ़लक तक चल साथ मेरे..

तो आज बारी है वार्षिक संगीतमाला की 22 वीं पायदान की। वैसे इस नग्मे और अगले आठ दस नग्मों में सब कमोबेश एक ही स्तर के हैं इसलिए इस गीत की रैंकिंग पर ज्यादा मत जाइएगा।




इस रोमांटिक नग्मे को इतना खूबसूरत बनाने में संगीतकार विशाल शेखर, गायक उदित नारायण और गीतकार क़ौसर मुनीर की बराबर की सहभागिता है। कौसर मुनीर पहली बार मेरी किसी गीतमाला का हिस्सा बनी हैं और मुझे उम्मीद है कि इनके लिखे कई और अच्छे नग्मे हमें आगे भी सुनने को मिलेंगे।

कौसर ने प्राकृतिक बिंबों का इस्तेमाल करते हुए इस गीत में प्यारी मुलायमियत भरी है जो दिल को छू जाती है। उदित भाई की आवाज इतनी स्पष्ट और सधी हुई है कि उसकी खनक देर तक गीत सुनने के बाद भी दिमाग में ताज़ी रहती है। महालक्ष्मी अय्यर ने उदित का बखूबी साथ दिया है।

पर टशन फिल्म के इस गीत में विशाल शेखर के संगीत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। २४ वीं पायदान पर आपने देखा कि उन्होंने एक हिंगलिश गीत के लिए पाश्चात्य संगीत संयोजन का सहारा लिया जो कि गीत के मूड के साथ घुल मिल गया पर इस रूमानी नग्मे में भारतीय वाद्य यंत्रों का भी खूबसूरत इस्तेमाल किया है जो दिल को सुकून पहुँचाता है। गीत की काव्यात्मकता तो बेहतर है ही पर विशाल शेखर ने गीत में मस्ती का रंग भी संगीत के ज़रिए जोड़ दिया है

तो पहलें पढ़ें क़ौसर साहिबा का लिखा ये दिलकश गीत

फ़लक तक चल साथ मेरे, फ़लक तक चल साथ चल
ये बादल की चादर
ये तारों के आँचल
में छुप जाएँ हम, पल दो पल
फ़लक तक चल....

देखो कहाँ आ गए हम सनम साथ चलके
जहाँ दिन की बाहों में रातों के साये हैं ढलते
चल वो चौबारे ढूँढें जिन में चाहत की बूंदें
सच कर दे सपनों को सभी
आँखों को मीचे मीचे मैं तेरे पीछे पीछे
चल दूँ जो कह दे तू अभी
बहारों की छत हो, दुआओं के खत हो
पढ़ते रहें ये ग़ज़ल
फ़लक तक चल....

देखा नहीं मैंने पहले कभी ये नज़ारा
बदला हुआ सा लगे मुझको आलम ये सारा
सूरज को हुई है राहत रातों को करे शरारत
बैठा है खिड़की पर तेरी
हाँ..इस बात पर चाँद भी बिगड़ा, कतरा कतरा वो पिघला
भर आया आँखों में मेरी
तो सूरज बुझा दूँ , तुझे मैं सजा दूँ
सवेरा हो तुझ से ही कल
फ़लक तक चल साथ मेरे


और अब चलें उदित और महालक्ष्मी के साथ आसमान यानि फ़लक तक के सफ़र में



Monday, January 05, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 23 - सुनिए एक गुजारिश.. और मिलिए जावेद अली से

पिछली वार्षिक संगीतमाला में जैसा कि आप को याद हो, तारे जमीं पर के चार गीत शामिल हुए थे जिनमें से एक 'सरताज गीत' भी था। आमिर खाँ की इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे प्रसून जोशी ने, जो मेरे प्रिय गीतकार रहे हैं। पर 23 वीं सीढ़ी पर जो गीत है वो इस संगीतमाला में प्रसून जोशी का लिखा पहला और आखिरी गीत है। आखिरी इसलिए कि इस साल जोशी साहब ने ज्यादा फिल्मों के लिए गीत नहीं लिखे। वैसे भी वो गीत तभी लिख पाते हैं जब McCann-Erickson (विज्ञापन कंपनी) में वो अपने दायित्वों से फारिग हो पाएँ जो कि अक्सर वो नहीं होते


प्रसून जोशी ने हाल ही में हिंदुस्तान टाइम्स को दिए साक्षात्कार में कहा था कि गजनी जैसी थ्रिलर (Thriller) के गीतों को लिखना उनके लिए एक चुनौती से कम नहीं था। खैर प्रसून जोशी के इस गीत का प्लस प्वाइंट इसका मुखड़ा और रहमान द्वारा बनाई इसकी आरंभिक धुन है जो एक बार ही में आपको अपने साथ बाँध लेती है। पर जोशी और रहमान जैसे दिग्गजों के बीच इस गीत से जो नया नाम जुड़ा है वो है गायक जावेद अली का


वैसे सही अर्थों में जावेद फिल्म जगत के लिए नए नहीं है। दिल्ली में जन्मे जावेद हुसैन के पिता कव्वाली गायक हैं। मल्लू एवम् माजिद खाँ से शास्त्रीय संगीत सीखने के बाद उन्होंने अपना कुछ समय गज़लों के बादशाह गुलाम अली की शागिर्दी में बिताया। बाद में अपने गुरु के सम्मान में उन्होंने अपना नाम जावेद अली रख लिया। जावेद ने वर्ष २००० में एक गुमनाम सी फिल्म बेटी न. १ के लिए गीत रिकार्ड किया पर ऍसी फिल्मों के गीत कौन देख पाता है सो उनकी आवाज़ अनसुनी ही रह गई। फिर नील और निक्की, क्यूँ हो गया ना, गोलमाल, चमेली आदि फिल्मों के कुछ गीत उनकी झोली में आए। पर उनका सितारा पिछले साल चमका जब वी मेट में गाए नग्मे नगाड़ा बजा से।

इस साल जावेद के किस्मत के सितारे तब और बुलंद हुए जब ए. आर. रहमान ने अपनी सभी फिल्मों में जावेद को गाने का मौका दिया। जावेद की आवाज़ की खासियत उसका अलग तरह का होना है। २९ वर्षीय जावेद ने फिल्म उद्योग में संघर्ष करते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की है जिसमें अब जाकर उन्हें सफलता मिल रही है। जावेद की गायिकी में विविधता की झलक आप तब देखेंगे जब दो अन्य गीतों जो कि ऊपर की पायदानों पर हैं, में उन्हें सुनने का मौका मिलेगा।

और हाँ अगर आप ये सोच रहे हों कि इस गीत की क्रेडिट्स में सोनू निगम का भी नाम है तो वो इसलिए कि आरंभिक धुन के ठीक पहले की गुनगुनाहट सोनू की आवाज़ में रिकार्ड की गई है। तो सुनिए जावेद की आवाज़ में इस विकल प्रेमी की गुजारिश


तू मेरी अधूरी प्यास प्यास
तू आ गई मन को रास रास
अब तो तू आ जा पास पास...
है गुजारिश...

है हाल तो दिल का तंग तंग
तू रंग जा मेरे रंग रंग
बस चलना मेरे संग संग
है गुजारिश...

कह दे तू हाँ तो ज़िन्दगी
चैनों से छूट के हँसेगी
मोती होंगे मोती राहों में
ये येह येह ...तू मेरी अधूरी ...

शीशे के ख्वाब ले के
रातों में चल रहा हूँ
टकरा ना जाऊँ कहीं

आशा की लौ हैं रोशन
फिर भी तूफां का डर है
लौ बुझ न जाए कहीं

बस एक हाँ की गुजारिश...
फिर होगी खुशियों की बारिश

तू मेरी अधूरी ...

चंदा है आसमां है
और बादल भी घने हैं
यह चंदा छुप जाए ना

तन्हाई डस रही है
और धड़कन बढ़ रही है
एक पल भी चैन आए न

कैसी अजब दास्तान है
बेचैनियाँ बस यहाँ हैं

तू मेरी अधूरी ...

और यू ट्यूब पर देख सकते हैं इस गीत का प्रमोशनल वीडिओ

Friday, January 02, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 24 - जाने क्यूँ दिल जानता है...

तो चलिए आज आपको ले चलते हैं वार्षिक संगीतमाला की एक चौबीसवीं सीढ़ी पर जहाँ गाना वो जिसे लिखा अन्विता दत्त गुप्तन ने, तर्ज बनाई विशाल शेखर की जोड़ी ने और जिसे आवाज़ दी इसी संगीतकार जोड़ी के सदस्य विशाल ददलानी ने। ये भी नहीं है कि इस गीत के बोल कुछ खास गहराई लिए हों। पर जब आप इस गीत को सुनते हैं तो गीत में कही गई बात सीधे दिल पर असर करती है। विशाल शेखर ने अंग्रेजी जुमलों को हिंदी के साथ इस तरह संगीतबद्ध किया है कि दोनों भाषाएँ एक दूसरे में घुलती मिलती सी दिखती हैं।



लौटते हैं गीत की भावनाओं की ओर। हम सभी की जिंदगी में कोई तो कोई तो होता ही है ना जिसके आस पास होने से हम अपने आप को निश्चिंत सा महसूस करते हैं। उसकी एक नज़र मन को तसल्ली देती है, उसकी एक मुस्कुराहट दिन को खुशगवार बना देती है। अभी हाल ही में साथी चिट्ठाकार कंचन चौहान ने लिखा था

जिंदगी
कुछ नही......! बस ये अहसास .....!
कि तुम हो मेरे गिर्द....!"


अन्विता दत्त गुप्तान भी यही बात अपने इस हिंगलिश गीत से कहने की कोशिश की है और सच मे जब भी इस गीत को सुनता हूँ तो बरबस मुखड़ा गुनगुनाने से अपने आप को रोक नहीं पाता जाने क्यूँ दिल जानता है तू है तो I'll be allright


तू है तो टेढ़ी मेढ़ी राहें
उलटी पुलटी बातें, सीधी लगती हैं
तू है तो झूठे मूठे वादे
दुश्मन के इरादे सच्चे लगते हैं
जो दिल में तारे वारे दे जगा, वो तू ही है, तू ही है
जो रोते रोते दे हँसा, तू ही है वही
जाने क्यूँ दिल जानता है तू है तो I'll be allright
I'll be allright I'll be allright

सारी दुनिया इक तरफ है, इक तरफ हैं हम
हर खुशी तो दूर भागे, मिल रहे हैं गम
But When U Smile For Me, World Seems All Right

ये मेरी जिंदगी, पल में ही खिल जाए जाने क्यूँ
जाने क्यूँ दिल जानता है तू है तो I'll be allright

छोटे छोटे कुछ पलों का ये दोस्ताना ये
जाने क्यूँ अब लग रहा है ये जाना माना ये
Cos When Smile For Me, World Seems All Right
ये सारे पल यहीं, यूँही थम से जाएँ जाने क्यूँ.
जाने क्यूँ दिल जानता है तू है तो I'll be allright

तो विशाल ददलानी की आवाज़ में सुनिए ये प्यारा सा हल्का फुलका नग्मा




 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie