Monday, March 30, 2009

' एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए अपने तीन साल !

पिछले हफ्ते एक शाम मेरे नाम के हिंदी संस्करण ने अपने तीन साल पूरे कर लिये। वैसे जब ब्लागिंग के बारे में मुझे आज से चार साल पहले पता चला तब हिंदी का टंकण ज्ञान नहीं था पर ये विधा मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैंने रोमन में ही हिंदी लिखकर अपना पहला ब्लॉग अप्रैल २००५ में बनाया । फिर साथियों द्वारा दिये तकनीकी ज्ञान से मार्च २००६ के आखिर में अपने इस हिंदी चिट्ठे की शुरुआत भी कर दी। हाँ ये जरूर है कि जितना रोमांच इस चिट्ठे की पहली वर्षगाँठ मनाने का था उतना उसके बाद नहीं रहा। शायद पहले के बाद दसवीं वर्षगांठ ही वो रोमांचक अनुभव रहे।



पिछले तीन सालों में जिन विषयों को मैंने अपने लेखन का विषय बनाया था, उनमें से एक सफ़रनामा अब मेरे नए यात्रा चिट्ठे मुसाफ़िर हूँ यारों पर चला गया है। विषय की एकरूपता को ध्यान में रखते हुए अब इस चिट्ठे पर सिर्फ गीत ग़ज़ल, कविताओं, किताबों की बातें ही हुआ करेंगी। अब तक के लेखन में मेरी ये कोशिश रही हे कि जिस विषय पर लिखूँ उसे इस तरह आपके सामने पेश करूँ जिससे उस विषय पर मेरे नज़रिए के आलावा कुछ नई जानकारी आप तक पहुँचे। इस में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ ये तो आप ही बता सकते हैं। वैसे आंकड़ों की बात करूँ तो इस साल नई बात ये हुई कि इस जनवरी में इस चिट्ठे ने एक लाख पेजलोड्स का मुकाम पूरा किया । पिछले तीन सालों में इस चिट्ठे पर ३२० पोस्ट लिखी गई हैं और उन पर अब तक १११७६२ पेज लोड्स यानि प्रति पोस्ट ३५० की औसत से पढ़ी गई है।

ये आँकड़ा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि ये हम चिट्ठाकारों को इंगित करता है कि एग्रीगेटर की नज़रों से गुजरने के बाद विषय वस्तु के आधार पर कितने लोग उस पोस्ट तक पहुँचे। इस चिट्ठे के चौथे साल में इस औसत को बरकरार रख पाया या इसमें वृद्धि कर पाया तो अपना प्रयास सार्थक समझूँगा।

पाठकों की सुविधा के लिए एक जगह लिंक सहित गीतों , ग़जलों, कविताओं की लिंकित सूची तो बना ही दी थी। अब इस क्रम में पुस्तकों, चिट्ठाकारी और अपने अन्य लेखों की सूची बनाने और पुरानी सूचियाँ अपडेट करने का काम चलता रहेगा। इस चिट्ठे को ई-मेल से प्राप्त करने वाले पाठकों मुझे मेल के द्वारा अपने सुझाव या प्रतिक्रियाएँ भेज सकते हैं। आशा है चौथे साल में भी आपका स्नेह और आशीर्वाद इस चिट्ठे के साथ बना रहेगा।

Thursday, March 26, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 सरताज गीत : इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला !

आज उपस्थित हूँ वार्षिक संगीतमाला 2008 के सरताज गीत को लेकर। अपनी वार्षिक संगीतमालाओं में मैंने अक्सर उन्हीं गीतों को सरताज गीत का सेहरा पहनाया है जिन्होंने मुझे बुरी तरह उद्वेलित किया है, जिनके प्रभाव से मैं जल्द मुक्त नहीं हो पाया हूँ। इस गीत की आरंभिक धुन मैंने मुंबई त्रासदी के तुरंत बाद NDTV India पर सुनी थी। शुरुआत की धुन में बजता पियानो का टनटनाता स्वर जहाँ हमारी असहायता पर भारी चोट कर रहा था वहीं बाकी का संगीत आँखों को नम करने के लिए काफी था। इस गीत की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस गीत ने सारे देश के लोगों को NDTV के द्वारा चलाए गई मुहिम से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

पर जब आप इस पूरे गीत को सुनते हैं तो उन तमाम लोगों की तसवीर उभरती है जो वक़्त के क्रूर हाथों अपनी हँसती खेलती जिंदगी को अनायास ही खो कर ऐसे शून्य में विलीन हो गए जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता।


'आमिर' फिल्म में ये गीत निर्दोष आमिर के आतंकवादियों के जाल में फँसने के बाद बम विस्फोट में उसकी असमय मृत्यु के बाद बजता है। आखिर क्या चाहता है एक आम आदमी अपनी जिंदगी से..एक ऍसा समाज जहाँ ना कोई नफ़रत की लकीरे हों और ना ही इंसान को इंसान से बाँटती सरहदें। इसीलिए गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य इन भावनाओं को अपने शब्द देते हुए लिखते हैं...

धूप के उजाले से ओस के प्याले से
खुशियाँ मिले हमको
ज्यादा माँगा है कहाँ , सरहदें ना हो जहाँ
दुनिया मिले हमको
पर ख़ुदा खैर कऱ उसके अरमां में
क्यूँ बेवज़ह हो कोई कुर्बां
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हां
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला

ये एक ऍसा प्रश्न है जो हर ऍसी त्रासदी के बाद हमारे दिल के जख़्मों को और हरा कर देता है और जब तक घृणा और नफ़रत फैलाने वाले लोगों को हम अपने समाज से बाहर नहीं कर पाएँगे तब तक ये प्रश्न हमारे लिए अनुत्तरित ही बना रहेगा।

जैसा कि आपको पहले भी बता चुका हूँ कि आमिर फिल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी ने और इस गीत को गाया है शिल्पा राव ने। दरअसल आमिर फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए अमित त्रिवेदी के नाम की सिफारिश शिल्पा राव ने ही की थी। इस साल शिल्पा राव का गाया सबसे लोकप्रिय गीत ख़ुदा जाने.. ही रहा है पर इससे पहले उनका गया वो अजनबी..भी चर्चित हुआ था।


शिल्पा राव एक छोटे से शहर से उपजी कलाकार हैं। और अगर मैं ये कहूँ कि वो शहर मेरे राज्य में स्थित है तो शायद ये तथ्य आप में से कइयों को चौका दे। शिल्पा जमशेदपुर से ताल्लुक रखती हैं और संगीत की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने संगीतज्ञ पिता से ली। शुरुआती दौर में वो छोटे मोटे स्टेज शो किया करती थीं। ऍसी ही एक शो में उनकी मुलाकात शंकर महादेवन से हुई। शंकर के प्रोत्साहन से उन्होंने मुंबई का रुख किया और अब अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित कर रही हैं...

तो चलिए सुनते हैं आमिर फिल्म का ये दिलछूता नग्मा....


इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
गर्दिशों में रहती बहती गुजरती
जिंदगियाँ हैं कितनी
इन में से इक है, तेरी मेरी अगली
कोई इक जैसी अपनी
पर ख़ुदा खैर कर, ऍसा अंजाम किसी रुह को ना दे कभी यहाँ
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हाँ
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला

धूप के उजाले से ओस के प्याले से
खुशियाँ मिले हमको
ज्यादा माँगा है कहाँ , सरहदें ना हो जहाँ
दुनिया मिले हमको
पर ख़ुदा खैर कऱ उसके अरमां में
क्यूँ बेवज़ह हो कोई कुर्बां
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हां
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला




वार्षिक संगीतमाला के समापन के साथ उन सभी पाठकों का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जो इस लंबे सफ़र में साथ बने रहे।

Monday, March 23, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 पुनरावलोकन : कौन रहा आपका पिछले साल का सर्वाधिक प्रिय गीत ?

वार्षिक संगीतमाला २००८ में बचा है सिर्फ शिखर पर बैठा सरताज गीत। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा की जाए एक नज़र संगीतमाला के इस संस्करण की बाकी पॉयदानों पर। बतौर संगीतकार ए आर रहमान ने इस साल की संगीतमाला पर अपनी बादशाहत कायम रखी है। जोधा अकबर, युवराज, जाने तू या जाने ना, गज़नी की बदौलत इस संगीतमाला में उनके गीत दस बार बजे। रहमान के आलावा इस साल के अन्य सफल संगीतकारों में विशाल शेखर, सलीम सुलेमान और अमित त्रिवेदी का नाम लिया जा सकता है।

इस साल की संगीतमाला में अमिताभ वर्मा, जयदीप साहनी, अशोक मिश्रा, इरफ़ान सिद्दकी, मयूर सूरी, कौसर मुनीर,अब्बास टॉयरवाला और अन्विता दत्त गुप्तन जैसे नए गीतकारों ने पहली बार अपनी जगह बनाई। इतने सारे प्रतिभाशाली गीतकारों का उभरना फिल्म संगीत के लिए शुभ संकेत है।

वहीं गायक गायिकाओं में विजय प्रकाश, जावेद अली, राशिद अली, श्रीनिवास और शिल्पा राव जैसे नामों ने पहली बार संगीत प्रेमी जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

तो आइए चलें इस साल की वार्षिक संगीतमाला के पुनरावलोकन पर..


वार्षिक संगीतमाला 2008 पुनरावलोकन:


इस श्रृंखला का समापन होगा अगली पोस्ट में सरताज गीत के साथ। पर मैं अपनी पसंद के उस गीत के बारे में बताने से पहले जानना चाहूँगा कि कौन रहा आपका पिछले साल का सर्वाधिक प्रिय गीत ?

Thursday, March 19, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 रनर्स अप - कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....

वार्षिक संगीतमाला का ये पिछले ढाई महिने का सफ़र तय कर के आ गए हैं हम वर्ष 2008 के दूसरे नंबर के गीत पर। और ये गीत है फिल्म जोधा अकबर से जिसके संगीत को आस चिट्ठे की साइडबार पर कराई गई वोटिंग में साल के सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए सबसे ज्यादा वोट मिले हैं। जावेद अली का गाया, जावेद अख्तर का लिखा और अल्लाह रक्खा रहमान का संगीतबद्ध ये गीत संगीत, बोलों और गायिकी तीनों ही दृष्टिकोणों से ग़ज़ब का प्रभाव डालता है।


वैसे तो जावेद अख्तर साहब को इस साल का फिल्मफेयर एवार्ड इसी फिल्म के एक और खूबसूरत नग्मे इन लमहों के दामन के लिए मिला है पर इस गीत के बोल भी कमाल के हैं। इस गीत में उन्होंने अकबर और जोधा के बीच के प्रेम और शादी की परिस्थितियों से पैदा तनाव को उभारा है वो गीत की हर पंक्ति में सहज ही महसूस किया जा सकता है।

जिंदगी में मनचाहा हमसफ़र अगर साथ हो तो खुशियाँ कभी बेहद नज़दीक सी महसूस होती हैं। पर उन खुशियों को दिल तक पहुँचने के लिए अपने बीच की अहम की दीवार को गिराना पड़ता है। पूर्वाग्रह मुक्त होना पड़ता है। कई बार हम ये सब जानते बूझते भी अपने को इस दायरे से बाहर नहीं निकाल पाते। और फिर मन मायूसी के दौर से गुज़रने लगता है।

देखिए इन भावनाओं से गुँथे जावेद के शब्दों को जावेद अली ने किस खूबसूरती से अदा किया है और पीछे से रहमान का बहता निर्मल संगीत दिल को गीत में रमने में मजबूर कर देता है।

और अगर जावेद अली आपके लिए नए नाम हों तो उनके बारे में इसी साल की संगीतमाला की ये पोस्ट देखिए....



कहने को जश्न-ऐ-बहारा है
इश्क यह देख के हैरां है
फूल से खुशबू ख़फा ख़फा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फ़िज़ा की चिलमन में
सारे सहमे नज़ारें हैं
सोये सोये वक़्त के धारे हैं
और दिल में खोई खोई सी बातें हैं

कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....
कैसे कहें क्या है सितम
सोचते हैं अब यह हम
कोई कैसे कहे वो हैं या नहीं हमारे
करते तो हैं साथ सफर
फासले हैं फिर भी मगर
जैसे मिलते नहीं किसी दरिया के दो किनारे
पास हैं फिर भी पास नहीं
हमको यह गम रास नहीं
शीशे की इक दीवार है जैसे दरमियां
सारे सहमे नज़ारें हैं.....

कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....
हमने जो था नगमा सुना
दिल ने था उसको चुना
यह दास्तान हमें वक़्त ने कैसी सुनाई
हम जो अगर है गमगीन
वो भी उधर खुश तो नहीं
मुलाकातों में है जैसे घुल सी गई तन्हाई

मिल के भी हम मिलते नहीं
खिल के भी गुल खिलते नहीं
आँखों में है बहारें दिल में खिज़ा
सारे सहमे नज़ारे हैं
सोये सोये वक़्त के धारे हैं......


कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....

और

Monday, March 16, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 3 : सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है, अब तो प्रजातंत्र है...

वार्षिक संगीतमाला में अब बची है आखिरी की तीन पॉयदान। तीसरी पॉयदान पर गीत वो जिसे आपके सुनने की संभावना कम ही होगी क्यूंकि इस गीत की चर्चा हिंदी चिट्ठा जगत में अब तक तो नहीं हुई है। नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। अब जब की लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो गई है अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया की नज़र इस गीत पर जाए तो इसका इस चुनावी मौसम में अच्छा इस्तेमाल हो सकता है।

नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। दरअसल इस तरह के गीत हिंदी फिल्मों में बेहद कम नज़र आते हैं जबकि आज के सामाजिक राजनीतिक हालातों में ऍसे कई गीतों की जरूरत है जो साठ सालों से चल रहे इस लोकतंत्र के बावजूद पैदा हुई विसंगतियों को रेखांकित कर सकें। पर ऍसे गीत तभी लिखे जाएँगे जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाई जाएँगी।

इस गीत को लिखा है अशोक मिश्रा ने। अशोक मिश्रा को इस तरह के गीत की रचना करने का मौका दिया निर्देशक श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर में ! गीतकार ने गीत के दोनों अंतरे में जो बातें कहीं है वो आज के राजनीतिक हालातों का सच्चा आईना हैं। चाहे वो सत्ता की कभी ना मरने वाली भूख हो या फिर नोटों के बल पर वोटों की ताकत को प्रभावशून्य करने की बात।

संगीतकार शान्तनु मोइत्रा ने लोक धुन का स्वरूप अपनाते हुए इस समूह गान के मुख्य स्वर में कैलाश खेर को चुना जो कि शत प्रतिशत सही और प्रभावी चुनाव रहा। कुल मिलाकर कैलाश की गूंजती आवाज़, प्रभावी बोल और गीत के अनुरूप बनाई गई प्यारी धुन ने इस गीत को वार्षिक संगीतमाला की पहली तीन पॉयदानों में ला खड़ा किया है। तो आइए इस गीत के माध्यम से याद करें प्रजातंत्र के मूल तत्त्वों को और अपने वोट की अहमियत को पहचानते हुए मतदान का संकल्प लें।


आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है

जन के लिए, जन के द्वारा जनता का राज है
प्रजातंत्र सबसे बड़ा, हम सबको नाज़ है
वोट छोटा सा मगर शक्ति में अनंत है
अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

खिल रही थी कली कली, महके थी हर गली
आप कभी साँप हुए, हम हो गए छिपकली
सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

अरे जिसकी लाठी उसकी भैंस आपने बना दिया
हे नोट की खन खन सुना के वोट को गूँगा किया
पार्टी फंड, यज्ञ कुंड घोटाला मंत्र है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है

Friday, March 13, 2009

दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल : दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है

पिछले साल दिसंबर के पुस्तक मेले में दुष्यंत कुमार जी के बेहद प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह साये में धूप खरीदने का मौका मिला था। अब पुस्तक तो ले ली पर जैसा कि प्रायः होता है पढ़ने का वक़्त नहीं मिला। होली के पूर्व जब अचानक राउरकेला जाना पड़ा तो रास्ते में दुष्यंत जी कई ग़ज़लें पढ़ीं। वैसे तो पूरी पुस्तक ही नायाब ग़ज़लों से अटी पड़ी है पर आज आप सब के साथ उनकी व्यंग्यात्मक लहजे में लिखी गई ये ग़ज़ल बाँटना चाहता हूँ जो हिंदी में ग़ज़ल लेखन का एक उत्कृष्ट नमूना है।

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है


इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है


पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है


दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है


निश्चय ही ये ग़ज़ल हमारे और आपके आसपास के सामाजिक और राजनीतिक हालातों की प्रतिध्वनि करती दिखती है। कितने सहज शब्द और सच्चाई की ओट से चलते ऍसे तीखे व्यंग्य बाण कि मन बस वाह वाह कर उठता है।
इस चिट्ठे पर प्रस्तुत कविताओं की सूची आप यहाँ देख सकते हैं।

Monday, March 09, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 4 : अमित त्रिवेदी के साथ कीजिए डींग डाँग डाँग, डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग

भाइयों और बहनों होली की इस पूर्व संध्या भी एक ऍसे सुखद संयोग पर आई है जब मेरी इस संगीतमाला का सबसे मस्तमौला गीत आपको झूमने झुमाने या यों कहिए कि आपको घुमाने के लिए तैयार है। दरअसल इस साल मेरे घर पर जब-जब आमिर फिल्म का ये गीत बजा है मेरे पाँव खुद बा खुद थिरक गए हैं जबकि मुझे नाचना बिल्कुल नहीं आता :)। अगर मैं ये कहूँ कि इस साल के सारे गीतों में सबसे ज्यादा जिस गीत पर मेरे परिवार के सारे सदस्य आनंदित हुए हैं तो ये वही गीत है।

गीतकार अमिताभ ने गीत में लफ्ज़ों का यूँ चुनाव किया है कि उसमें लोकगीतों का सा ठेठपन बरकरार रहे। दरअसल फिल्म की कहानी में ये गीत बैकग्राउंड में आता है जब नायक की जिंदगी की गाड़ी अचानक पटरी से उतर जाती है और वो इस चक्रव्यूह के दलदल में धँसता चला जाता है। अब देखिए अमिताभ का कमाल.. इस परिस्थिति को गली मोहल्ले की भाषा में कैसे व्यक्त करते हैं

अरे चलते चलते हाए हाए
हल्लू हल्लू दाएँ बाएँ हो
अरे देखो आएँ बाएँ साएँ
जिंदगी की झाँए झाँए हो
अरे निकले थे कहाँ को
और किधर को आए
कि चक्कर घुमिओ..



दूसरी ओर संगीतकार अमित त्रिवेदी ने राजस्थानी लोक धुन के साथ ताल वाद्यों का इतना बेहतरीन संयोजन किया है कि हर इंटरल्यूड में खुद झूमने के साथ औरों को भी झुमाने का मन करता है। अमित ने खुद इस गीत को अपनी आवाज़ दी है। आमिर फिल्म के इस गीत में अमित और अमिताभ की इस जोड़ी की प्रयोगधर्मिता की जितनी तारीफ की जाए कम होगी।

पर ये जोड़ी क्या अचानक ही हिंदी फिल्म संगीत के पर्दे पर उभर कर आ गई? नहीं ये अमित के दस वर्षों के कठिन संघर्ष का फल है जिसने फिल्म आमिर और अब डेव डी के माध्यम से उन्हें अपनी पहचान बनाने का मौका दिया है।

यूँ तो १५ वर्ष की उम्र से ही अमित को संगीत के प्रति रुचि बढ़ गई थी, पर उनका ये प्रेम तब मूर्त रूप ले सका जब कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने ओम नामक संगीत बैंड बनाया। १९‍ - २० साल की उम्र से ही अमित ने टीवी सीरियल, नाटकों आदि के लिए पार्श्व संगीत देने से लेकर विज्ञापन की धुनें बनाई और यहाँ तक कि डांडिया शो के आर्केस्ट्रा में भी काम किया। टाइम्स म्यूजिक ने इस समूह की प्रतिभा को पहचाना और अमित त्रिवेदी का पहला एलबम बाजार में आया। पर ठीक से प्रचार और प्रमोशन ना होने की वज़हों से उनलका ये प्रयास लोगों की नज़रों में नहीं आ पाया। खैर इनकी मित्र और नवोदित गायिका शिल्पा राव की सिफारिश से इन्हें अनुराग कश्यप ने डेव डी के लि॓ए अनुबंधित किया पर उसका काम बीच में ही रुक गया पर अनुराग ने तब इन्हें आमिर दिलवा दी और इस पहली फिल्म में ही उन्होंने अपनी हुनर का लोहा सनसे मनवा लिया।

अब होली के इस माहौल में इस गीत से आपकी दूरी और नहीं बढ़ाऊँगा। बस प्लेयर आन कीजिए, अपनी चिंताओं को दूर झटकिए और बस घूमिए और झूमिए।


डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग
डींग डाँग डाँग
डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग
डींग डाँग डाँग

अरे चलते चलते हाए हाए
हल्लू हल्लू दाएँ बाएँ हो
अरे देखो आएँ बाएँ साएँ
जिंदगी की झाँए झाँए हो
अरे निकले थे कहाँ को
और किधर को आए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना
कोई समझाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
अरे घुमियो रे, हाए घुमियो, रे घुमियो चक्कर घुमियो
हाए हाए घुमियो रे घुमियो घुमियो रे घुमियो चक्कर घुमियो

ले कूटी किस्मत की फूटी मटकी

रे फूटी....
दौड़न लागी तो चिटकी
खेल कबड्डी लागा
खेल कबड्डी लागा
भूल के दुनियादारी यारा खेल कबड्डी लागा
नींद खुली तो जागा
नींद खुली जो हाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना
कोई समझाए कि चक्कर घुमियो
अरे घुमियो रे हाए घुमियो, रे घुमियो चक्कर घुमियो
हाए हाए घुमियो घुमियो घुमियो घुमियो चक्कर घुमियो
डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग

चिकोटी वक़्त ने काटी ऐसी चिकोटी
खुन्नस में तेरी सटकी
छींक मारे लागा, छींक मारे लागा
झाड़ा सच को धूल उड़ी तो
छींक मारे लागा
नींद खुली तो जागा
नींद खुली जो हाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना...............




आशा है होली की मस्ती के साथ इस गीत ने भी आप सबको आनंदित किया होगा। एक शाम मेरे नाम के तमाम पाठकों को होली की ढ़े सारी शुकानाएँ !

Friday, March 06, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 5 - विजय प्रकाश की मन मोहती शास्त्रीय प्रस्तुति लट उलझी सुलझा जा बालम...

इस साल की संगीतमाला अब अपने अंतिम चरण में पहुँच गई है। आखिरी पाँच पायदानों पर विराजमान गीतों में काफी विविधता है । कहीं मेलोडी की बहार है तो कहीं दिल को झकझोर देने वाले शब्द। कहीं नुक्कड़ गीतों की झलक है तो कही लोक संगीत और आज के संगीत का अद्भुत मिश्रण है।

पर पाँचवी पॉयदान का गीत तो इन सबसे अलग है। राग भीमपलास पर आधारित इस गीत को संगीतकार ए आर रहमान ने सिंथिसाइजर की पार्श्व धुन के साथ मिश्रित किया है। इस गीत की धुन और गायक विजय प्रकाश का उत्कृष्ट शास्त्रीय गायन आपको गीत के साथ बहा ले जाता है। गीत की एकमात्र कमज़ोरी इसकी लंबाई है जो केवल 3 मिनट ग्यारह सेकेंड की है। जैसे ही इस गीत से अपने को आत्मसात पाता हूँ ये गीत खत्म हो जाता है। काश! रहमान गुलज़ार के लिखे इस गीत में एक अंतरा और बढ़वा लेते तो सोने पर सुहागा होता।

पर इससे पहले कि आप युवराज फिल्म के इस गीत को सुनें कुछ बातें गायक विजय प्रकाश के बारे में। विजय प्रकाश कर्नाटक से आते हैं और जी टीवी पर आने वाले कार्यक्रम सा रे गा मा की उपज है। १९९९ में सा रे गा मा प्रतियोगिता में ये फाइनल तक पहुँचे थे। अपनी आवाज़ की गुणवत्ता के हिसाब से विजय को उतने गीत नहीं मिले जितने मिलने चाहिए थे पर इस गीत की सफलता के बाद शायद हिंदी फिल्म जगत में उनका सितारा और बुलंद हो। वैसे एक बात बतानी यहाँ लाजिमी होगी की स्लमडॉग मिलयनियर के गीत के लिए रहमान ने जिन चार गायकों को अनुबंधित किया था उनमें विजय प्रकाश एक थे। हालांकि अंत में सुखविंदर ने इस गीत को गाया पर गीत में हाई पिच पर जय हो का उद्घोष विजय ने किया है।

गीत तूम तनना... के आकर्षित करने वाले लूप से शुरु होता है और फिर विजय अपनी शास्त्रीय गायन का हुनर बखूबी दिखाते हैं। ऍसे गीतों में बोल सुरों के उतार चढ़ाव के लिए सिर्फ सेतु का काम करते हैं...

लट उलझी सुलझा जा बालम
माथे की बिंदिया
बिखर गई है
अपने हाथ सजा जा बालम
लट उलझी
मनमोहिनी
मनमोहिनी मोरे मन भाए..
मनमोहिनी मन भाए..

विजय प्रकाश की शास्त्रीय गायिकी का और आनंद उठाना चाहते हों तो १९९९ का ये वीडियो देखिए जिसमें सा रे गा मा में वो राग भोपाली पर आधारित बंदिश प्रस्तुत कर रहे हैं।




वार्षिक संगीतमाला 2008 में अब तक :

Tuesday, March 03, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 6 - कुछ कम रौशन है रोशनी..कुछ कम गीली हैं बारिशें

वार्षिक संगीतमाला 2008 में लग गया था बेक्र जिस वज़ह से मेरी ये गाड़ी पॉयदान संख्या 7 पर रुकी हुई थी। और इसी बीच हिंदी फिल्म संगीत ने वो मुकाम तय किया जो अब तक हमें कभी नहीं मिला था। तो सबसे पहले ए आर रहमान और गुलज़ार की जोड़ी को आस्कर एवार्ड मिलने के लिए एक बड़ा सा जय हो ! ये इस बात को पुख्ता करता है कि भले ही हम अपने फिल्म संगीत के स्वर्णिम अतीत को पीछे छोड़ आए हों पर नया संगीत भी असीम संभावनाओं से भरा है और इससे बिलकुल नाउम्मीदी सही नहीं है।

तो चलें इस संगीतमाला की आखिर की छः सीढ़ियों का सफ़र तय करें कुछ अद्भुत गीतों के साथ। छठी पायदान पर एक ऐसे कलाकार हैं जो एक नामी संगीतकार जोड़ी का अहम हिस्सा तो हैं ही, वे गाते भी हैं और अपनी चमकदार चाँद के साथ दिखते भी बड़े खूब हैं। पर हुजूर अभी इनकी खूबियाँ खत्म नहीं हुई हैं। छठी पायदान के इस गीत को लिखा भी इन्होंने ही है। जी हाँ ये हैं विशाल ददलानी और मेरी संगीतमाला की छठी पायदान पर गीत वो जिसे फिल्म दोस्ताना में आवाज़ दी है शान ने...


गर जिंदगी की जद्दोज़हद में अगर आप उबे हुए हों तो निश्चय ही ये गीत आपके लिए मरहम का काम करेंगा। पियानों के प्यारे से आरंभिक नोट्स , शान की मखमली आवाज़ और गिरती मनःस्थिति में मन को सहलाते विशाल के शब्द इस गीत के मेरे दिल में जगह बनाने की मुख्य वज़हें रहीं हैं। तो आइए सुनें ये गीत जो एक शाम मेरे नाम पर प्रस्तुत किया जाने वाला १०० वाँ गीत भी है

कुछ कम रौशन है रोशनी
कुछ कम गीली हैं बारिशें
थम सा गया है ये वक्त ऍसे
तेरे लिए ही ठहरा हो जैसे

कुछ कम रौशन है रोशनी....
क्यूँ मेरी साँस भी कुछ भींगी सी है
दूरियों से हुई नज़दीकी सी है
जाने क्या ये बात है हर सुबह अब रात है
कुछ कम रौशन है रोशनी.....

फूल महके नहीं कुछ गुमसुम से हैं
जैसे रूठे हुए, कुछ ये तुमसे हैं
खुशबुएँ ढल गईं, साथ तुम अब जो नहीं
कुछ कम रौशन है रोशनी........






और इससे पहले कि आगे बढ़ें एक नज़र उन गीतों पर जो इस साल की संगीतमाला की शोभा बढ़ा चुके हैं।



वार्षिक संगीतमाला 2008 में अब तक :


Sunday, March 01, 2009

जब सेल (SAIL) ने मिलाया दो चिट्ठाकारों को : एक मुलाकात ' पारुल ' के साथ भाग - २

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कैसे नेट पर पारुल जी से मेरा परिचय हुआ और सेल परिवार का सदस्य होना किस तरह हमारी मुलाकात का सबब बना। अब आगे पढ़ें...

...खाने के साथ बातें ब्लागिंग की ओर मुड़ गईं । कुमार साहब ने शायद मेरे आने से पहले मुसाफ़िर हूँ यारों की मेरी हाल की पोस्ट पढ़ी थी इसलिए पूछ बैठे कि क्या मेरा घर सासाराम में है? मैंने कहा नहीं वो तो बचपन में वहाँ कुछ दिन रहना हुआ था इसलिए वहाँ से जुड़ी यादों के बारे में लिखा था। पारुल जी ने इसी बीच मुझे सूचना दी कि प्रत्यक्षा जी से उनकी बात हुई है और उन्होंने मुझे 'हैलो' कहा है। प्रत्यक्षा जी के उत्कृष्ट लेखन की बात चली। हाल ही में उनकी एक कहानी 'आहा जिंदगी' में नज़र आई तो काफी अच्छा लगा। मुझे झारखंड की मिट्टी से जुड़े उनके सजीव शब्दचित्र याद आ गए जिसमें यहाँ की बोली और संस्कृति को उन्होंने बखूबी उतारा था।
बात लेखकों की हो रही थी तो ये प्रश्न आया कि बतौर पाठक हम किसी लेखक की कृति में उसके जीवन को क्यूँ ढूँढते हैं ? क्या ये सही नहीं कि किसी लेखक की सबसे अच्छी कृतियाँ कहीं ना कहीं उसके अपने अनुभवों से निकली होती हैं। इस संदर्भ में मैंने अहमद फराज़ की ग़ज़ल रंजिश ही सही.. का हवाला दिया और उसके पीछे फ़राज़ की प्रेरणा की कथा सुनाई।

फिर बातें गुलज़ार, मुक्त छंद की कविताओं और हिंदी किताबों से होती हुईं गाँधीजी पर लिखी गई हाल की प्रविष्टियों तक जा पहुँची। कुमार साहब खुद तो ब्लागिंग के लिए समय नहीं निकाल पाते पर ब्लॉग्स नियमित रूप से पढ़ते हैं। भगवान ऐसी पुण्यात्माओं की संख्या में सतत वृद्धि करे! :)
गाँधीजी के बारे में हम दोनों के विचारों में एकरूपता थी। उनके व्यक्तित्व में अच्छाइयों के साथ कमियाँ भी थीं पर देश के लिए उनके निजी जीवन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उनका सामाजिक और राजनीतिक जीवन रहा। इस संबंध में Freedom at Midnight का जिक्र हुआ जो कुमार साहब और मेरी बेहद प्रिय पुस्तक रही है और जिसने गाँधी के बारे में हमारी धारणाओं को एक नई दिशा दी है।

बात चिट्ठाकारों की होने लगीं। अफ़लातून की बोकारा यात्रा की बात हुई और कुमार साहब ने उन्हें अपनी राजनीतिक विचारधारा के प्रति समर्पित पाया। मैंने भी उन्हें बताया कि कैसे सपरिवार बनारस में उनके घर पर धावा बोला था। दरअसल चिट्ठाकारों की आभासी दुनिया कई बार वास्तविक जिंदगी से मिल जाती है और हाल ही में इससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा हाथ लगा जो मैंने वहाँ शेयर किया। सोचा इस प्रकरण से पैदा हुए हल्के फुल्के क्षणों को आपसे भी बाँटता चलूँ :)
अब कुछ दिन पहले शुकुल जी नैनीताल ट्रेनिंग पर गए थे। उनके ट्रेनिंग प्रोग्राम के एक फैकलटी जो कविता शायरी में दिलचस्पी रखते हैं को मेरे किसी लेख की लिंक मिली। उन्हें उत्सुकता हुई कि ये कौन सी विधा है जिसमें लोग अपने आप को इस तरह व्यक्त कर रहे हैं। उन्हें बताया गया कि ये ब्लागिंग है श्रीमान। तुरंत उनका माथा ठनका बोले अरे तब तो ये बड़ी खतरनाक चीज है भाई हमारी क्लास में भी एक 'अनूप शुक्ल' था। दिन में कक्षा में उँघता था और सुना है रात में यही ब्लागिंग वागिंग किया करता था।:)

पारुल जी ने कहा कि उनके रिजर्व रहने वाले स्वाभाव को ब्लॉगिंग ने बहुत हद तक बदला है। उनका मानना है कि अब वो पहले से अधिक बात करने लगीं हैं। पारुल ने बात आगे बढ़ाई तो फौलोवर्स की प्रकृति, टिप्पणी के प्रकार, चिट्ठाकारों का वर्गीकरण, तथाकथित आत्ममुग्ध लोगों की जमात, ई-मेल में आते अनचाहे संदेशों की परेशानी, मूल पोस्ट से बिलकुल मेल ना खाती टिप्पणियाँ तरह तरह के मुद्दे गपशप का हिस्सा बनते गए। हम दोनों इस बात पर एक मत थे कि विवादों से दूर रहकर अगर हम अपनी रचनात्मकता को बनाए रखने में पूरा ध्यान लगाएँ, तो वही सही मायने में व्यक्तिगत तौर पर और सारे हिंदी चिट्ठाजगत के लिए बेहतर रहेगा। कुमार साहब इस दौरान शांति से हमारी बातचीत सुनते रहे।

बात फिर संगीत की ओर बढ़ी तो उन्होंने बताया कि डा.मृदुल कीर्ति के लिए हाल ही में जाकर उन्होंने कानपुर में पतांजलियोग के काव्यानुवाद की रिकार्डिंग की है। सुन कर बड़ी खुशी हुई। आशा है डा.कीर्ति जल्द ही इसे बड़े पैमाने पर रिलीज भी करेंगी। वैसे पारुल जी की अद्भुत गायन प्रतिभा से तो हम सभी शुरुआत से ही क़ायल हैं और अगर इस पोस्ट को पढ़ने वालो् में से कोई उनकी आवाज़ से अपरिचित है तो उनके लिए राँची की ब्लागर मीट में गाया एक छोटा सा टुकड़ा पेश है।


अगर आप ये समझ बैठे हों कि पारुल के पूरे परिवार की गीत संगीत से रुचि है तो आपने विल्कुल सही समझा है :) कुमार साहब भी गाने में अभिरुचि रखते हैं और बच्चे भी गाना सुनने में अभी से रुचि लेने लगे हैं। कहते हैं कि अगर लंबी ड्राइव पर जाना हो और ये युगल जोड़ी पीछे बैठी हो तो फिर म्यूजिक सिस्टम की जरूरत नहीं। पूरे रास्ते ये नान स्टॉप अपने गायन से आपका मनोरंजन करते रहेंगे। अब उस रात तो गपशप में ही इतना समय निकल गया कि मैं इस जोड़ी से कोई गीत नहीं सुन सका। वैसे भी रात के बारह बज चुके थे। कुमार जी को रात दो बजे अपने संयंत्र का एक चक्कर लगाना था और बीच बीच में वो फोन लगाकर कार्यस्थल में हो रही गतिविधियों की जानकारी ले रहे थे। सो मध्य रात्रि के आस पास मैं वापस अपने गेस्ट हाउस की ओर रवाना हो गया।

जब मैं रात सवा बारह बजे बोकारो निवास पहुँचा तो सारे गेट बंद हो चुके थे। ड्यूटी पर तैनात पहरेदार हमारे भद्र पुरुष होने पर शंका प्रकट करने लगा। अब हम कैसे बताते कि सेल के कर्मचारी होने के साथ हम ब्लॉगर भी हैं और अभी अपने दायित्वों का निर्वाह कर लौटे हैं। अंततः कुमार साहब की सिफारिश के बाद मुझे अंदर घुसने की इज़ाजत मिली और फिर मुलाकात का वादा ले कर हम विदा हुए ।



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