Friday, May 29, 2009

हाए गज़ब कहीं तारा टूटा...सुनिए आशा ताई को इस प्यारे गीत में

अगर आप से मैं ये पूछूँ कि गुज़रे ज़माने जब सिनेमा के पर्दे का रंग श्वेत श्याम हुआ करता था तो अभिनय और खूबसूरती दोनों के लिहाज़ से आपकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन थी तो आप में से शायद ज्यादातर लोगों का जवाब मधुबाला ही हो। पर जब मैं अपनी आँखे बंद कर स्मृति पटल पर जोर देता हूँ तो इन दोनों कसौटियों पर मन में बस एक ही अदाकारा की छवि उभरती है..साहब बीवी और गुलाम, कागज़ के फूल, खामोशी और तीसरी कसम वाली प्यारी वहीदा जी। यूँ तो वहीदा जी ने रंगीन फिल्मों में भी काम किया पर श्वेत श्याम रंगों में भिन्न भिन्न फिल्मों में निभाए गए किरदारों और उन पर फिल्माए गए गीतों को मैं हमेशा अपने ज़ेहन के करीब पाता हूँ।



ऐसा ही एक गीत था १९६६ में गीतकार शैलेंद्र द्वारा बनाई गई फिल्म तीसरी कसम का। साठ के दशक में बनी ये फिल्म रेणु की दिल छूती पटकथा, नायक नायिका के जबरदस्त अभिनय और अपने स्वर्णिम गीतों की वज़ह से मेरी सबसे प्रिय फिल्मों में एक रही है। यूँ तो तीसरी कसम के तमाम गीत अव्वल दर्जे के हैं पर उनमें से तीन मुझे खास तौर पर पसंद हैं।

आज जिस गीत को आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ उसे गाया था आशा भोसले ने...पता नहीं इस गीत के मुखड़े में क्या खास बात है कि बस उसे सुनते ही मन चुहल और मस्ती के मूड में आ जाता है। गीतकार शैलेंद्र ने ग्रामीण पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म के बोल भी नौटंकी के माहौल में ध्यान रख कर लिखे हैं।तो आइए सुनें संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को



हाए गज़ब कहीं तारा टूटा
लूटा रे लूटा मेरे सैयाँ ने लूटा
पहला तारा अटरिया पे टूटा
दाँतो तले मैंने दाबा अगूँठा
लूटा रे लूटा सावरियाँ ने लूटा
हाए गज़ब कहीं तारा टूटा ...


हाए गज़ब कहीं तारा टूटा
दूसरा तारा बजरिया में टूटा
देखा है सबने मेरा दामन छूटा
लूटा रे लूटा सिपहिया ने लूटा
हाए गज़ब कहीं तारा टूटा ....


तीसरा तारा फुलबगिया में टूटा
फूलों से पूछे कोई, है कौन झूठा
लूटा रे लूटा दरोगवा ने लूटा
हाए गज़ब कहीं तारा टूटा ....


उस ज़माने में ग्रामीण संस्कृति में मनोरंजन के एकमात्र माध्यम के रूप में नौटंकी का क्या योगदान था ये बात इस गीत को देख कर ही आप महसूस कर सकते हैं। नाचवाली के ठुमके कहीं फूलों की खुशबू से भींगे भावनात्मक प्रेम को जागृत कर रहे हैं तो कहीं रुपये के दंभ में डूबी हवस को।





तीसरी कसम के अपने अन्य पसंदीदा गीतों को आप तक पहुँचाने का क्रम आगे भी ज़ारी रहेगा..

Wednesday, May 20, 2009

यादें राजकुमार रिजवी की : तूने ये फूल जो जुल्फ़ों में सजा रखा है

पुराने दिनों को याद करते हुए मैंने आपको दस पन्द्रह दिन पहले राजेंद्र और नीना मेहता का एक गैर फिल्मी गीत जब आँचल रात का लहराए सुनवाया था। उन्हीं दिनों की याद करते हुए आज बात मेहता युगल के समकालीन कलाकार राजकुमार रिज़वी जी जो गायिकी की दृष्टि से मुझे कहीं ज्यादा मँजे हुए कलाकार लगते हैं।

राजकुमार रिज़वी की आवाज़ से मेरी पहली मुलाकात विविध भारती के रंग तरंग कार्यक्रम में हुई थी। उन दिनों एक ग़ज़ल बेहद चर्चित हुई थी और पहली बार रेडिओ पर जब रिज़वी साहब को इसे गाते हुए सुना तो मेरे किशोर मन पर उस ग़ज़ल का जबरदस्त असर हुआ था। ग़ज़ल के बोल थे

शाख से टूट के गिरने की सज़ा दो मुझको
इक पत्ता ही तो हूँ क्यूँ ना हवा दो मुझको

शायद ही मेरी आयु वर्ग के किसी ग़ज़ल प्रेमी ने ये ग़ज़ल उस ज़माने में नहीं सुनी या सराही होगी। फिलहाल ये ग़ज़ल मेरी कैसेट में है और जब भी ये अच्छी गुणवत्ता के साथ मुझे मिलेगी आपको एक शाम मेरे नाम पर सुनवाउँगा। पर फिर भी इसकी याद दिलाने के लिए इन दो पंक्तियों को गुनगुनाना देना ही शायद आपके लिए काफी रहेगा

इससे पहले आज की ये रूमानियत भरी ग़ज़ल आपके सामने परोसूँ, राजकुमार रिज़वी के बारे में आपको कुछ बताना चाहूँगा। रिज़वी साहब राजस्थान में गीत संगीत से जुड़े परिवार में पैदा हुए। संगीत की शुरुआती शिक्षा इन्होंने अपने पिता नूर मोहम्मद से ली जिनका ताल्लुक कलावंत घराने से था। फिर इन्होंने सितार भी सीखा पर इनके दिल में गायिकी के प्रति विशेष प्रेम था। अपनी इसी इच्छा को फलीभूत करने के लिए राजकुमार रिज़वी जनाब महदी हसन साहब के प्रथम शिष्य बने। यही वजह है कि इनकी गायिकी में अपने उस्ताद का असर स्पष्ट दिखता है। अपने उस्ताद के बारे में राजकुमार रिज़वी साहब ने एक साक्षात्कार में कहा था
मुझे महदी हसन का शास्त्रीय रागों से अनुराग और लिखे हुए अलफाज़ों के प्रति उनकी संवेदनशीलता ने खासा प्रभावित किया। वे हमेशा कविता की रूमानियत के हिसाब से ही शास्त्रीय रागों का चुनाव करते थे। इसी तरह जब ग़ज़ल के अशआर गंभीरता का पुट लिए होते वो उसके लिए उसी किस्म का संगीत तैयार करते।

दरअसल अगर महदी हसन साहब की ग़ज़ल गायिकी के तरीके को आज के समय तक लाने की बात हो तो राजकुमार रिज़वी का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए।

आजकल रिज़वी साहब का ज्यादा समय देश विदेश में आमंत्रित श्रोताओं के बीच महफिल जमाने में होता है। बीच बीच में उनके कुछ एलबम भी निकलते रहे हैं। फर्क इतना जरूर आया है कि पहले वो अपनी पत्नी और गायिका इन्द्राणी रिज़वी के साथ इन महफिलों में शरीक होते थे और आज उनकी गायिका पुत्री रूना रिज़वी साथ होती हैं । खैर तो लौटते हैं क़तील शिफ़ाई की इस ग़ज़ल की तरफ। पिछले साल मैंने क़तील शिफ़ाई के बारे में इस चिट्ठे पर एक लंबी श्रृंखला की थी । क़तील को लोग मोहब्बतों के शायर के नाम से जानते हैं। सहज शब्दों की चाशनी में रूमानियत का तड़का लगाना उन्हें बखूबी आता है इसलिए जब वो कहते हैं कि

जीत ले जाए कोई मुझको नसीबों वाला
जिंदगी ने मुझे दावों पे लगा रखा है।

इम्तिहान और मेरे ज़ब्त का तुम क्या लोगे
मैंने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है।

तो मन बस वाह वाह कर उठता है।

रिज़वी साहब ने इस ग़ज़ल को इतने सलीके से गाया है कि घंटों इस ग़ज़ल का खुमार दिल में छाया रहता है। तो लीजिए आप भी सुनिए...

तूने ये फूल जो जुल्फ़ों में सजा रखा है
इक दीया है जो अँधेरों में जला रखा है

जीत ले जाए कोई मुझको नसीबों वाला
जिंदगी ने मुझे दावों पे लगा रखा है।
जाने कब आए कोई दिल में झांकने वाला
इस लिए मैंने गरेबान खुला रखा है।

इम्तिहान और मेरे ज़ब्त का तुम क्या लोगे
मैंने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है।

यू ट्यूब वाला वर्सन भी आडियो वर्सन ही है इस लिए ज्यादा बफरिंग में वक़्त जाया नहीं होगा ऐसी उम्मीद है...
वैसे एक शेर और है इस ग़ज़ल में जिसे गाया नहीं गया है

दिल था एक शोला मगर बीत गए दिन वो क़तील
मत कुरेदो इसे अब राख में क्या रखा है..


ये ग़जल HMV के पाँच भागों में निकाली हुई ग़ज़लों का सफर (Year: 2001) RPG/Saregama ~ ISBN: CDNF15206367 ADD) का एक हिस्सा है।

Sunday, May 17, 2009

ये शामें, सब की सब शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं धर्मवीर भारती / उदित नारायण

मनुष्य का मन बड़ा विचित्र है। कभी उत्साह से लबरेज़ तो कभी निराशा के भँवरों में अंदर तक धँसा हुआ। पर गनीमत यही की कोई भी मूड, कैफ़ियत हमेशा हमेशा के लिए नहीं रहती। इसलिए व्यक्ति कभी अपने चारों ओर हो रही अच्छी बुरी घटनाओं को निराशा और अवसाद के क्षणों में बिल्कुल ही बेमानी मान लेता है तो कभी जब उसका मन धनात्मक भावनाओं से ओत प्रोत रहता है तो अपने दुख अपनी पीड़ा भी उसे किसी बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भगवान द्वारा ली जा रही परीक्षा मान कर खुशी-खुशी वहन करता जाता है।

अपनी जिंदगी के अब तक के अनुभवों को देखता हूँ तो यही पाता हूँ कि जिन अंतरालों में वक़्त के थपेड़ों ने मुझे हताश किया है, असफलता और अस्वीकृति से सामना हुआ है, उस समय की पीड़ा और दुख भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में मेरे लिए सहायक रहे हैं। धर्मवीर भारती की ये कविता मुझे कुछ ऐसी ही शामों के बारे में सोचने को मज़बूर करती है। और जब उन बीती शामों की पीड़ा और अकेलेपन का जिक्र करने के बाद भारती जी ये कहते हैं

ये शामें, सब की सब शामें ...
जाने क्यों कोई मुझसे कहता
मन में कुछ ऐसा भी रहता
जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं


तो लगता है उनकी लेखनी से मेरे दिल की बात निकल रही है। तो आइए भारती जी के साथ ढूँढते हैं उन बोझिल उदास शामों के मायने..


ये शामें, सब की शामें ...
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में
ये शामें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

वे लमहे
वे सूनेपन के लमहे
जब मैनें अपनी परछाई से बातें की
दुख से वे सारी वीणाएँ फेकीं
जिनमें अब कोई भी स्वर न रहे
वे लमहे
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

वे घड़ियाँ, वे बेहद भारी-भारी घड़ियाँ
जब मुझको फिर एहसास हुआ
अर्पित होने के अतिरिक्त कोई राह नहीं
जब मैंने झुककर फिर माथे से पंथ छुआ
फिर बीनी गत-पाग-नूपुर की मणियाँ
वे घड़ियाँ
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

ये घड़ियां, ये शामें, ये लमहे
जो मन पर कोहरे से जमे रहे
निर्मित होने के क्रम में
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

ये शामें, सब की सब शामें ...
जाने क्यों कोई मुझसे कहता
मन में कुछ ऐसा भी रहता
जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं
अर्पित है पूजा के फूलों-सा जिसका मन
अनजाने दुख कर जाता उसका परिमार्जन
अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को
नत-मस्तक होकर वह कर लेता सहज ग्रहण
वे सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियाँ
यह पीड़ा, यह कुण्ठा, ये शामें, ये घड़ियाँ

इनमें से क्या है
जिनका कोई अर्थ नहीं !
कुछ भी तो व्यर्थ नहीं !


धर्मवीर भारती जी की कविताओं को मैंने ज्यादा नहीं पढ़ा और इस कविता पर मेरी नज़र तब गई जब पिछली पोस्ट की पुस्तक चर्चा में सूरज का सातवाँ घोड़ा के बारे में लिख रहा था। जैसा कि आप सब को पता है इस किताब पर श्याम बेनेगल साहब ने एक फिल्म बनाई है। और नेट पर फिल्म की जानकारी ढूँढते हुए मुझे इस फिल्म के एक गीत की तारीफ सुनने को मिली और इस गीत की खोज में ये कविता पहले नज़र आई. बाद में जब गीत सुनने को मिला तो देखा कि ये गीत तो इस कविता से ही प्रेरित है।

इस गीत का संगीत दिया है वनराज भाटिया ने जो कुछ दिन पहले तक श्याम बेनेगल की फिल्मों के स्थायी संगीतकार रहे हैं। गीत के भावों के आलावा इस गीत में सबसे ज्यादा असरदार मुझे उदित नारायण के आवाज़ की मधुरता और उनका स्पष्ट उच्चारण लगता है। इस गीत में उनका साथ दिया है कविता कृष्णामूर्ति ने। राग यमन पर आधारित ये गीत कुछ और लंबा होता तो इसका आनंद और बढ़ जाता। पिछली पोस्ट में किताब के बारे में चर्चा करते हुए मैंने आपको बताया था इस उपन्यास के किरदारों के बारे में । ये गीत फिल्माया गया है माणिक मुल्ला (रजत कपूर) और उनकी प्रेमिका लिली (पल्लवी जोशी) के ऊपर।


ये शामें, सब की सब शामें ...
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?
घबरा के तुम्हें जब याद किया
क्या उन शामों का अर्थ नहीं
क्या उन शामों का अर्थ नहीं

सूनेपन के इन लमहों में
अपनी छाया से बातें की
जिनमें कोई भी स्वर न रहे
दुख से वे वीणाएं फेकीं
ये भीगे पंक्षी से लमहे
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?
ये शामें, सब की सब शामें ...

Tuesday, May 12, 2009

माणिक मुल्ला और 'सूरज का सातवाँ घोड़ा'

आप सोच रहे होंगे जब इतने प्रसिद्ध लघु उपन्यास के लेखक धर्मवीर भारती हैं तो फिर शीर्षक में माणिक मुल्ला कहाँ से आ टपके? दरअसल भारती जी ने बड़ी चतुराई से इस लघु उपन्यास के शीर्षक और कही गई कहानियों का जिम्मा माणिक मुल्ला पर डाला है जो उन सात दोपहरों में लेखक और उनकी मित्र मंडली को ना केवल कहानियाँ सुनाते हैं , पर साथ ही साथ उन कहानियों से निकलते निष्कर्ष की व्याख्या भी करते हैं।

पर इससे पहले की माणिक मुल्ला की कहानियों की तह में जाएँ, कथा लेखन के बारे में उनके फलसफ़े पर भी जरा गौर फ़रमा लें ...

कुछ पात्र लो, और एक निष्कर्ष पहले से सोच लो, फिर अपने पात्रों पर इतना अधिकार रखो, इतना शासन रखो कि वे अपने आप प्रेम के चक्र में उलझ जाएँ और अंत में वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचे जो तुमने पहले से तय कर रखा है।
प्रेम को अपनी कथावस्तु का केंद्र बनाने के पीछे माणिक मुल्ला टैगोर की उक्ति आमार माझारे जे आछे से गो कोनो विरहणी नारी (अर्थात मेरे मन के अंदर जो बसा है वह कोई विरहणी नारी है) पर ध्यान देने को कहते हैं। उनकी मानें तो ये विरहणी नारी हर लेखक के दिल में व्याप्त है और वो बार बार तरह तरह से अपनी कथा कहा करती है ।‍
माणिक मुल्ला की कहानियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और सूत्रधार होने के आलावा वे खुद कई कहानियों के नायक बन बैठे हैं यद्यपि उनके चरित्र में नायक होने के गुण छटाँक भर भी नहीं हैं। माणिक, लिली से अपने प्रेम को कोरी भावनाओं के धरातल से उठाकर किसी मूर्त रूप में ला पाने में असमर्थ हैं और जब सती पूर्ण विश्वास के साथ उनके साथ जिंदगी व्यतीत करने का प्रस्ताव रखती है तो वे कायरों की तरह पहले तो भाग खड़े होते हैं और बाद में पश्चाताप का बिगुल बजाते फिरते हैं।

सौ पृष्ठों का ये लघु उपन्यास माणिक मुल्ला की प्रेम कहानियों के अतिरिक्त उनकी जिंदगी में आई तीन स्त्रिओं जमुना, लिली और सती के इर्द गिर्द भी घूमता है। ये तीनों नायिकाएँ समाज के अलग अलग वर्गों (मध्यम, कुलीन और निम्न ) का प्रतिनिधित्व करती हैं। उपन्यास की नायिकाएँ अपने आस पास के हालातों से किस तरह जूझती हैं ये जानना भी दिलचस्प है। जहाँ जमुना का अनपढ़ भोलापन सहानुभूति बटोरता है वहीं उसकी समझौतावादी प्रवृति पाठक के चित्त से उसे दूर ले जाती है। लिली में भावुकता और विद्वता है तो अहंकार भी है। एक सती ही है जो बौद्धिक रूप से निम्नतर होते हुए भी एक ठोस, ईमानदार व्यक्तित्व की स्वामिनी है। सच पूछें तो सती को छोड़कर लेखक का बनाया कोई किरदार आदर्श नहीं है। दरअसल लेखक मध्यम वर्ग की भेड़ चाल वाली सोच, समझौता और पलायनवादी प्रवृति से आहत हैं। अपनी इसी यंत्रणा को शब्द देते हुए लेखक अपने सूत्रधार के माध्यम से लिखते हैं..
हम जैसे लोग जो न उच्च वर्ग के हें और न निम्नवर्ग के, उनके यहाँ रुढ़ियाँ, परम्पराएँ, मर्यादाएँ भी ऍसी पुरानी और विषाक्त हैं कि कुल मिलाकर हम सभी पर ऍसा प्रभाव पड़ता है कि हम यंत्र मात्र रह जाते हैं. हमारे अंदर उदार और ऊँचे सपने खत्म हो जाते हैं और एक अज़ब सी जड़ मूर्छना हम पर छा जाती है। .....एक व्यक्ति की ईमानदारी इसी में है कि वह एक व्यवस्था द्वारा लादी गयी सारी नैतिक विकृति को भी अस्वीकार करे और उसके द्वारा आरोपित सारी झूठी मर्यादाओं को भी, क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। लेकिन हम विद्रोह नहीं कर पाते और समझौतावादी हो जाते हैं।
पर बात यहीं तक खत्म नहीं हो जाती। तथाकथित बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं कि सिर्फ नैतिक विकृति से अपने आप को अलग रख कर ही भले ही हम अपने आप को समाज में सज्जन घोषित करवा लें पर तमाम व्यवस्था के विरुद्ध ना लड़ने वाली प्रवृति परिष्कृत कायरता ही होगी।

ये लघु उपन्यास छः किरदारों की कथा पर आधारित है और हर एक भाग में कथा एक किरदार विशेष के नज़रिए से बढ़ती है। हर कथा के बाद का विश्लेषण अनध्याय के रूप में होता है जहाँ भारती की व्यंग्यात्मक टिप्पणिया दिल को बेंध जाती है। इसीलिए इस उपन्यास की भूमिका में महान साहित्यकार अज्ञेय लिखते हैं

सूरज का सातवाँ घोड़ा’ एक कहानी में अनेक कहानियाँ नहीं अनेक कहानियों में एक कहानी है। एक पूरे समाज का चित्र और आलोचन है; और जैसे उस समाज की अनन्त शक्तियाँ परस्पर-सम्बद्ध, परस्पर आश्रित और परस्पर सम्भूत हैं, वैसे ही उसकी कहानियाँ भी। वह चित्र सुन्दर, प्रीतिकर या सुखद नहीं है; क्योंकि उस समाज का जीवन वैसा नहीं है और भारती ने चित्र को यथाशक्य सच्चा उतारना चाहा है। पर वह असुन्दर या अप्रीतिकर भी नहीं, क्योंकि वह मृत नहीं है, न मृत्युपूजक ही है।

और अंत में बात इस पुस्तक के प्रतीतात्मक शीर्षक की। कथा के सूत्रधार को ये विश्वास है कि भले ही सूर्य के छः घोड़े जो मध्यम वर्ग में व्याप्त नैतिक पतन, अनाचार, आर्थिक संघर्ष, निराशा, कटुता के पथ पर चलकर अपने राह से भटक गए हैं पर सूर्य के रथ का सातवाँ घोड़ा अभी भी मौजूद है जो पथभ्रष्ट समाज को सही रास्ते पर ला सकता है। इसीलिए वो लिखते हैं


".....पर कोई न कोई चीज़ ऐसी है जिसने हमेशा अँधेरे को चीरकर आगे बढ़ने, समाज-व्यवस्था को बदलने और मानवता के सहज मूल्यों को पुनः स्थापित करने की ताकत और प्रेरणा दी है। चाहे उसे आत्मा कह लो, चाहे कुछ और। और विश्वास, साहस, सत्य के प्रति निष्ठा, उस प्रकाशवाही आत्मा को उसी तरह आगे ले चलते हैं जैसे सात घोड़े सूर्य को आगे बढ़ा ले चलते हैं।....वास्तव में जीवन के प्रति यह अडिग आस्था ही सूरज का सातवाँ घोड़ा है, ‘‘जो हमारी पलकों में भविष्य के सपने और वर्तमान के नवीन आकलन भेजता है ताकि हम वह रास्ता बना सकें जिस पर होकर भविष्य का घोड़ा आयेगा।.....’’

धर्मवीर भारती की भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित किताब नेट पर यहाँ उपलब्ध है। भारत में इसका मूल्य सिर्फ ३५ रुपया है और ये दो से तीन घंटे की सिटिंग में आराम से पढ़ी जा सकती है। श्याम बेनेगल ने इस लघु उपन्यास पर आधारित एक फिल्म भी बनाई थी जो नब्बे के दशक में काफी सराही गई थी। मैंने वो फिल्म नहीं देखी पर इस पटकथा पर बेनेगल के निर्देशन में बनी फिल्म पुस्तक से भी असरदार होगी ऍसा मेरा विश्वास है।

Thursday, May 07, 2009

तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना : राजेंद्र और नीना मेहता / प्रेम वरबाटोनी Jab aanchal raat ka .. Rajendra Mehta

एक महिने पहले अप्रैल में जब पटना जाना हुआ था तो मन ही मन इस बार यात्रा का एक लक्ष्य ये भी रखा था कि घर पर पुरानी रिकार्डिंग वाली कैसेट्स की छानबीन की जाए और ये देखा जाए कि मैंने और मेरी बड़ी दीदी ने मिलकर किसी ज़माने में जो ग़ज़लें गैर फिल्मी गीत रेडिओ से रिकार्ड की थीं वो अब सुरक्षित हैं भी या नहीं। अपनी इस मुहिम के दौरान पुरानी कुछ ग़ज़लें मिलीं पर आज के mp3 की गुणवत्ता के सामने वो कहीं नहीं ठहरती थीं। पर खोज बीन का फायदा ये हुआ कि कुछ प्रिय गीत ग़ज़ल जो ज़ेहन में कहीं दब से गए थे वो एक बार फिर से उभर कर आ गए। उन्हीं मे से एक था राजेंद्र और नीना मेहता का गाया ये नग्मा जो ताजमहल की पृष्ठभूमि में लिखा गया एक अद्भुत प्रेम गीत है।


इस गीत को अपनी बड़ी दी की बदौलत पहली बार मैंने अस्सी के दशक में सुना था। ये वो वक़्त था जब ग़ज़ल गायिकी में एक नई प्रथा विकसित हुई थी युगल जोड़ियों के साथ साथ गाने की। मेहता युगल के आलावा राजकुमार रिज़वी / इन्द्राणी रिज़वी और जगजीत सिंह / चित्रा सिंह की जोड़ी ग़ज़ल गायिकी को एक नया आयाम दे रही थीं। बाद में इस ट्रेंड को अनूप और सोनाली जलोटा (जो अब सोनाली राठौड़ हो गईं हैं और रूप कुमार राठौड़ के साथ कान्सर्ट में नज़र आती हैं) और भूपेंद्र और मीताली मुखर्जी ने खूबसरती से आगे बढ़ाया।
चित्र साभार : हमारा फोरम

एक साथ पुरुष और नारी स्वर को सुनना भाता तो बहुत था पर कुछ एक जोड़ियों को छोड़ दें तो पुरुष स्वर की आवाज़ गुणवत्ता के सामने जोड़ीदार महिला स्वर उस कोटि का नहीं हो पाता था। नब्बे के दशक में फिल्म संगीत जब फिर से उभरने लगा और परिणामस्वरूप ग़ज़ल गायिकी में खासकर युगल जोड़ियों के एलबम की संख्या में तेजी से कमी आई। और अब तो ये देख रहा हूँ कि पिछले दशक में कोई नई जोड़ी ग़ज़ल गायिकी के क्षेत्र में उभर कर सामने नहीं आई।

आज जिस गैर फिल्मी गीत को आपके सामने पेश कर रहा हूँ वो मेहता युगल के आलावा कई अन्य फ़नकारों ने भी गाया है पर मुझे यही वर्सन सबसे ज्यादा पसंद आता है। उस ज़माने में गीत ग़ज़लों का ये गुलदस्ता कैसेट और सीडी के रूप में ना आकर हमसफ़र नाम के LP के रूप में रिकार्ड किया गया था़। नीचे और ऊपर के चित्रों में आप इस LP की आवरण तसवीरें देख सकते हैं

इस गीत को लिखा था प्रेम वरबाटोनी साहब ने। व्यक्तिगत रूप से उनके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है पर उनका नाम उन शायरों में अक्सर आता रहा जिनके क़लामों को जगजीत ने अपने एलबम में जगह दी। इतना तो स्पष्ट हे कि अपने नाम के अनुरूप प्रेम साहब ने बेहतरीन रोमांटिक ग़ज़ले और नज़्में कहीं। मिसाल के तौर पर ये नज़्म याद है ना आपको

जवानी के हीले हया के बहाने
ये माना कि तुम मुझ से पर्दा करोगी
ये दुनिया मगर तुझ सी भोली नहीं है
छुपाकर मोहब्बत को रुसवा करोगी

या फिर उनकी ग़ज़ल के इन अशआरों को देखिए
कभी तो खुल के बरस अब्र ए मेहरबाँ की तरह
मेरा वज़ूद है जलते हुए मकाँ की तरह
सुक़ूत ए दिल तो जज़ीरा है बर्फ का लेकिन
तेरा ख़ुलूस है सूरज के सायबाँ की तरह

तो आपने देखा कि प्रेम साहब की शायरी किस क़दर रूमानी ख़यालातों से भरपूर है। अपने इसी हुनर का जादू बिखेरा है उन्होंने इस गीत में। ताजमहल को मोहब्बत का मक़बरा मानने वालों के लिए उनकी ये पंक्तियाँ तो सीधे दिल में उतर जाती हैं

ये ताजमहल जो चाहत की आँखों का सुनहरा मोती है
हर रात जहाँ दो रुहों की खामोशी जिंदा होती है

खैर अब आप सुनिए ये पूरा गीत और बताइए मुझे कि इसे सुनकर उन पुराने दिनों के बारे में आपको क्या याद आया....

जब आँचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना
जब आँचल रात का लहराए.....

ये ताजमहल जो चाहत की आँखों का सुनहरा मोती है
हर रात जहाँ दो रुहों की खामोशी जिंदा होती है
इस ताज के साये में आकर तुम गीत वफ़ा का दोहराना
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना
जब आँचल रात का लहराए.....

तनहाई है जागी जागी सी, माहौल है सोया सोया हुआ
जैसे के तुम्हारे ख़्वाबों में खुद ताजमहल हो खोया हुआ
हो ताजमहल का ख़्वाब तुम्हीं ये राज ना मैंने पहचाना
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना
जब आँचल रात का लहराए.....

जो मौत मोहब्बत में आए वो जान से बढ़कर प्यारी है
दो प्यार भरे दिल रौशन हैं गो रात बहुत अँधियारी है
तुम रात के इस अँधियारे में बस एक झलक दिखला जाना
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना
जब आँचल रात का लहराए.....


Monday, May 04, 2009

तन पे लगती काँच की बूँदें मन पे लगें तो जाने...

पिछली पोस्ट में बातें गर्मी की बेतहाशा तपिश की हो ही रही थीं कि इन्द्रदेव ने दया कर कुछ घंटों के लिए अपने द्वार खोल दिए। तपती धरा पहली बारिश की बूँदों को पाकर अपनी सोंधी सोंधी खुशबू बिखेरने लगी। वैसे बारिश की ये बूँदे हमारे तन को तो ठंडक दे गईं पर अगर मन अब भी दहकता रहे तो ? ना ना ये प्रश्न मेरी जानिब से नहीं बल्कि खुद गुलज़ार साहब कर रहे हैं इस गीत में जिसे आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ।

१९९७ में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में एक फिल्म आई थी। नाम था आस्था..In the prision of spring फिल्म तो मुझे कुछ खास जमी नहीं थी पर इसके कुछ गीतों ने खासा प्रभावित किया था। फिल्म के संगीतकार थे शारंग देव।


संगीतकार के रूप में शारंग देव बहुत ज्यादा सुना हुआ नाम नहीं है। हो भी कैसे अपने मूल्यों से समझौता ना करने वाले कलाकारों को फिल्म इंडस्ट्री ज्यादा तरज़ीह नहीं देती। वैसे आपको अगर नहीं पता तो बता दूँ की शारंग देव, महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के पुत्र हैं। शारंग देव आजकल टेलीविजन के प्रोड्यूसर बन गए हैं और अपने बनाए सीरिएल्स में खुद संगीत देते हैं। एक साक्षात्कार में शारंग ने कहा था कि आस्था के गीतों की सफलता के बाद भी वो फिल्म निर्माताओं द्वारा हाथों हाथ नहीं लिए गए। शायद उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और कलात्मकता के प्रति ज्यादा रुझान एक आम मुंबईया निर्माता को पसंद नहीं आई। गायिका श्रीराधा बनर्जी भी इस फिल्म में गाए गीतों के बाद नाममात्र ही सुनाईं पड़ीं।

इसी फिल्म का एक गीत था तन पे लगती काँच की बूँदें .. कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके पीछे के भावों की गहराई में जाने के पहले ही, अपनी गायिकी और संगीत की वज़ह से वो दिल में समा जाते हैं। इस गीत के मामले में मेरे साथ भी कुछ ऍसा ही हुआ। गुलज़ार के बोलों से पूर्णतः उलझने के पहले ही श्रीराधा बनर्जी की आवाज की टीस और शारंग देव के बेहतरीन संगीत ने मुझे इस गीत के प्रति आकर्षित कर दिया। जब फिल्म देखी तो गुलज़ार के शब्दों के पीछे की निहित भावनाओं को समझने में सहूलियत हुई।

अब अकेलापन हो, हृदय में उथल पु्थल मची हो और एकमात्र सहचरी प्रकृति हो तो फिर उसे ही अपने मन का राजदार बनाएँगे ना आप। और फिर गुलज़ार और उनके बिम्ब.. गीत के पहली की अपनी कमेंट्री में ही वो कमाल कर जाते हैं

जिसे तुम भटकना कहती हो ना मानसी
मैं उसे और जानने की तलाश कहता हूँ
एक दूसरे को जानने की तलाश
मैं इस ज़मीं पर भटकता हूँ इतनी सदियों से
गिरा है वक़्त से हटके लमहा उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ ढूँढता रहा बरसों
तुम्हारी रुह में , जिस्म में भटकता हूँ
तुम्हीं से जन्मूँ तो शायद मुझे पनाह मिले


तो आइए सुनें ये संवेदनशील नग्मा



तन पे लगती काँच की बूँदें
मन पे लगें तो जाने
बर्फ से ठंडी आग की बूँदें
दर्द चुगे तो जाने
तन पे लगती काँच की बूँदें .....

लाल सुनहरी चिंगारी सी
बेलें झूलती रहती हैं
बाहर गुलमोहर की लपटें
दिल में उगे तो जानें
तन पे लगती काँच की बूँदें .....

बारिश लंबे लंबे हाथों
से जब आ कर छूती है
ये लोबान* सी सासें हैं जो
ये लोबान सी सासें थोड़ी
देर रुकें तो जाने
तन पे लगती काँच की बूँदें .....

* A type of incense

Friday, May 01, 2009

कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में..हर शख़्स जिंदा लाश है इस तेज धूप में

चुनावों के चरण दर चरण खत्म होते जा रहे हैं। पर नक्सलियों के आतंक से ज्यादा सूर्य देवता ही अपना रौद्र रूप दिखलाकर मतदाताओं को बाहर निकलने से रोक रहे हैं। मई महिना शुरु होने के पहले ही गर्मी ये रंग दिखाएगी इसकी शायद चुनाव आयोग ने भी कल्पना नहीं की होगी। अपनी कहूँ तो इस जलती तपती गर्मी में घर या आफिस के अंदर दुबके रहने की इच्छा होती है। फिर भी खाने के समय स्कूटर पर बिताए वो दस मिनट ही आग सदृश बहती लपटों से सामना करा देते हैं।


ऍसे में अगर और भी गर्म इलाकों का दौरा करना पड़े तो इससे बदकिस्मती क्या होगी। पर पिछले हफ्ते कार्यालय के काम से छत्तिसगढ़, झारखंड और उड़ीसा के गर्मी से बुरी तरह झुलसते इलाकों से होकर गुजरना पड़ा। रास्ते भर खिड़की की शीशे से सुनसान खेतों और सड़कों का नज़ारा दिखता रहा।

पानी की तलाश में सुबह से ही मटकियाँ भर कर ले जाती औरते हों या गाँव की कच्ची सड़कों पर साइकिल से स्कूल जाते बच्चे सब के सब मौसम की इस मार से त्रस्त दिखे। कम से कम हम लोगों को तो कार्यालय का वातानुकूलित वातावरण गर्मी से राहत दिला देता है, पर जिन्हें दो वक्त की रोटी जुगाड़ने और रोज़मर्रा के कामों के लिए बाहर निकलना ही है उनके लिए इस धूप को झेलने के आलावा और चारा ही क्या है।

मुझे याद आती है गोपाल दास 'नीरज' जी एक एक हिंदी ग़ज़ल जो गर्मी की इस तीव्र धूप से झुलसते हुए एक दिन के हालातों को बखूबी अपनी पंक्तियों में समेटती है। आप भी पढ़े ये ग़ज़ल जिसमें नीरज गर्मी से बदहवास शहर की व्यथा चित्रित करते करते अपने समाज की आर्थिक विषमता को भी रेखांकित कर गए हैं...

कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में
हर शख़्स जिंदा लाश है इस तेज धूप में


हारे थके मुसाफ़िरों आवाज़ दो उन्हें
जल की जिन्हें तलाश है इस तेज़ धूप में


दुनिया के अमनो चैन के दुश्मन हैं वही तो
अब छाँव जिनके पास है इस तेज़ धूप में


नंगी हरेक शाख हरेक फूल है यतीम
फिर भी सुखी पलाश है इस तेज़ धूप में


पानी सब अपना पी गई खुद हर कोई नदी
कैसी अज़ीब प्यास है इस तेज़ धूप में


बीतेगी हाँ बीतेगी दुख की घड़ी जरूर
नीरज तू क्या उदास है इस तेज़ धूप में..


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