Friday, July 31, 2009

आँखे लड़ाने से परहेज़ तो नहीं तो सुनिए ना : ऐ हुस्न - ए- लालाफ़ाम ज़रा आँख तो मिला !

पिछली पोस्ट में मैंने जिक्र छेड़ा था एक ऍसी ग़ज़ल का जिसे मेरे लिए यादगार बनाने का श्रेय गुलाम अली से ज्यादा अभिजीत सावंत को जाता है। पर आज की ये बेहद रूमानी ग़ज़ल, गुलाम अली की गाई मेरी पसंदीदा ग़ज़लों में से एक है। जब भी इसे सुनता हूँ मूड में रंगीनियत खुद-ब-खुद समा जाती है।

सबसे पहले इस ग़ज़ल को सुनने का मौका १९९६ में मिला था जब मैं रुड़की विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहा करता था। शीघ्र ही मैंने इसे एक ब्लैंक कैसेट में रिकार्ड कर सुरक्षित कर लिया था। कुछ सालों तक तो ये ग़ज़ल बारहा सुनी गई और फिर सीडी युग आते ही बाकी कैसटों की तरह कहीं कोने में दुबक गई। करीब दो साल पहले जब IIT Mumbai का अपना चक्कर लगा तो विकास ने मुलाक़ात के दौरान बताया कि अगर आपको किसी खास ग़ज़ल की तलाश हो तो वो IIT Mumbai के LAN (Local Area Network) पर आसानी से मिल जाएगी और तब मैंने इस ग़ज़ल की गुहार लगाई और थोड़ी ही देर की सर्च के बाद विकास ने ये ग़ज़ल सामने हाज़िर कर दी।

तो चलें अब इस ग़ज़ल के सुनें गुलाम अली की आवाज़ में। गुलाम अली साहब मतले की शुरुआत कुछ यूँ करते हैं..




ऐ हुस्न ए लालाफ़ाम ज़रा आँख तो मिला
खाली पड़े हैं जाम ज़रा आँख तो मिला

वैसे तो सच बताऊँ जनाब तो 'जाम' से अपना रिश्ता दूर-दूर तक का नहीं है पर अगर चेहरे पर प्यारी सी लाली लिए कोई सुंदरी अपने नयनों से नयन लड़ाए तो कुछ मदहोशी तो दिल पर छाएगी ना! वैसे भी शायर की चले तो आँखें लड़ाना भी भक्ति का एक रूप हो जाए। अब यही शेर देखिए...

कहते हैं आँख आँख से मिलना है बंदगी
दुनिया के छोड़ काम ज़रा आँख तो मिला

बिल्कुल जी हम तो तैयार हैं बस बॉस को बगल की केबिन से हटवा दीजिए और एक बाला सामने की टेबुल पर विराजमान करवा दीजिए फिर देखिए हमारा भक्ति भाव :)

क्या वो ना आज आएँगे तारों के साथ साथ
तनहाइयों की शाम ज़रा आँख तो मिला

हम्म गर वो चाँद जैसे होंगे तो जरूर आएँगे तारों के साथ वर्ना तो ऍसी परियों के साथ अक्सर उनके अमावसी मित्र ही होते हैं जो आशिकों को अपनी शाम, ग़म और तनहाई में बिताने पे मज़बूर कर देते हैं!

साकी मुझे भी चाहिए इक जाम ए आरज़ू
कितने लगेंगे दाम ज़रा आँख तो मिला


उफ्फ ये तो जुलुम है भाई आँखों पर...आँखों से मन की आरज़ू तो पढ़ने की तो बात सुनी थी पर शायर सागर तो आँखों से ही भावनाओं का मोल पूछना चाहते हैं !

है राह ए कहकशाँ में अज़ल से खड़े हुए
सागर तेरे गुलाम ज़रा आँख तो मिला


बताइए सागर साहब ने तो जिंदगी भर की प्रतीक्षा कर ली इस आकाशगंगा को निहारते निहारते और वो हैं कि इतनी गुलामी के बाद भी नैनों का इक़रारनामा नहीं दे रहीं। पुराने ज़माने के लोगों की बात ही अलग थी। ग़ज़ब का धैर्य था लोगों के पास और आज...!

गुलाम अली अपनी गायिकी और बोलों की बदौलता माहौल में रूमानियत तो लाते ही हैं, साथ ही संगीत संयोजन भी मन को आकर्षित करता है। ग़ज़ल, तबले की थाप और बांसुरी की तान के बीच से निकलती हुई निखरती चली जाती है इस तरह कि मन खुद गुनगुनाने को करने लगता है..




ये ग़ज़ल गुलाम अली के एलबम Immortal Ghazals का हिस्सा है और नेट पर यहाँ और यहाँ उपलब्ध है।

Monday, July 27, 2009

रुक गया आँख से बहता हुआ दरिया कैसे : एक ग़ज़ल दो आवाज़ें..दूसरी आवाज़ थी अभिजीत सावंत की !

कुछ ग़ज़लें खास होती हैं कुछ उन्हें गाने वाले खास बना देते हैं और अक्सर ऐसा जो कलाकार कर पाते हैं उन्हें हम महान गायकों की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं। पर आज जिस ग़ज़ल का जिक्र करना चाहता हूँ उसके बारे में मेरा अनुभव कुछ उल्टा रहा। यानि इस ग़ज़ल को मेरे लिए खास बनाया एक ऐसे कलाकार ने जो ग़ज़ल गायिकी के लिए नहीं जाना जाता।

यूँ तो गुलाम अली की तमाम ग़ज़लें मुझे बेहद पसंद हैं पर जब कृष्ण बिहारी नूर की लिखी ये ग़ज़ल उनकी आवाज़ में सुनी थी तो मुझे ये ग़ज़ल सुनने में कुछ खास मज़ा नहीं आया था। हाँ, नूर साहब का एक शेर जरूर बेहद पसंद आया था

हर घड़ी तेरे ख़यालों में घिरा रहता हूँ
मिलना चाहूँ तो मिलूँ ख़ुद से मैं तनहा कैसे


जो उस वक़्त दिमाग में चढ़ सा गया था। इस बात को बरसों बीत गए और फिर एक दिन टीवी पर एक कार्यक्रम में इसी ग़ज़ल को मैंने एक नवोदित गायक को गाते सुना। उस गायक ने ग़जल का मतला और सामान्य सा लगने वाला एक शेर इस तरह दिल से डूब कर गाया कि मैं इस भूली हुई ग़ज़ल को एक दूसरे ही अंदाज़ से महसूस करने लगा।

बस मलाल इस बात का ही रहा कि बंदे ने उस कार्यक्रम में ये ग़ज़ल पूरी नहीं सुनाई। बाद में बहुत खोजबीन करने पर मुझे उस टीवी रिकार्डिंग के कुछ टुकड़े मिले जिसे मैं जोड़ कर करीब डेढ़ पौने दो मिनट की एक फाइल बना सका। आज भी उदास लमहों में इस ग़ज़ल का ये छोटा सा हिस्सा मैं अक्सर सुना करता हूँ। आज यही हिस्सा आप के साथ भी बाँट रहा हूँ।

तो पहले सुनिए नूर साहब की ये मशहूर ग़ज़ल जनाब गुलाम अली के स्वर में। वैसे कहीं ये भी पढ़ा था की इस ग़ज़ल को उस्ताद असलम खाँ ने भी अपनी आवाज़ दी है।
रुक गया आँख से बहता हुआ दरिया कैसे
ग़म का तूफ़ाँ तो बहुत तेज़ था ठहरा कैसे

मुझको ख़ुद पर भी भरोसा नहीं होने पाता
लोग कर लेते हैं ग़ैरों पे भरोसा कैसे

हर घड़ी तेरे ख़यालों में घिरा रहता हूँ
मिलना चाहूँ तो मिलूँ ख़ुद से मैं तनहा कैसे

और भी अहल-ए-खिरद अहल-ए-जुनूँ थे मौजूद
लुट गये हम ही तेरी बज़्म में तनहा कैसे



और ये है यू ट्यूब पर इसी ग़ज़ल का आडिओ वर्सन...



और अब सुनिए बिना किसी संगीत के इस ग़ज़ल के टुकड़े को। ये कलाकार टीवी पर संगीत के कार्यक्रमों की बदौलत कुछ फिल्मों और एलबमों के लिए गाना गा चुका है। अब आपको ही बताना है इस गायक का नाम। रिकार्डिंग गुणवत्ता अच्छी नहीं है और श्रोताओं का बिना मतलब का शोर भी आपको झेलना पड़ेगा ये पहले ही बता देता हूँ पर फिर भी ये टुकड़ा गायिकी के लिहाज़ से आपको भी आनंदित करेगा ऐसी उम्मीद है।




और ये रहा जवाब !

ये रिकार्डिंग थी पिछले साल १२ जुलाई २००८ को स्टार प्लस पर प्रसारित जो जीता वही सुपरस्टार के मेगा फाइनल की । इस प्रतियोगिता में विभिन्न संगीत कार्यक्रमों सा रे गा मा, इंडियन आइडल और वॉयस आफ इंडिया के पिछले दो सालों के विजेताओं को बुलाया गया था। फाइनल में मुकाबला था अभिजीत सावंत, राहुल वैद्य और हर्षित के बीच में। और उसी कार्यक्रम में ये ग़ज़ल इतनी खूबसूरती से गुनगुनाई थी अभिजीत सावंत ने।



जैसा कि आपको मालूम है अभिजीत का सबसे चर्चित एलबम 'जुनून' रहा था। पहले इंडियन आइडल के विजेता रहे अभिजीत ने हाल ही में बतौर हीरो 'लॉटरी' फिल्म में काम किया था। जो जीता वही सुपरस्टार में अभिजीत राहुल वैद्य से खिताबी मुकाबला हार कर दूसरे नंबर पर रहे थे।

आप लोगों ने कई अनुमान लगाए पर अल्पना वर्मा जी ने दूसरे प्रयास में अभिजीत का नाम लिया। अल्पना जी को सही जवाब देने के लिए बधाई और आप सब को अनुमान लगाने के लिए।

Thursday, July 23, 2009

जान वे जान ले , हाल ए दिल : सुनिए विशाल भारद्वाज, मुन्ना धीमन और राहत की इस अद्भुत रचना को

हिंदी फिल्म संगीत की त्रासदी यही है कि अगर फिल्म नहीं चली तो कई बार फिल्म का संगीत अच्छा होने के बावजूद आम जनता से दूर रह जाया करता है। पिछले साल ऍसी ही एक फिल्म आई थी हाल-ए-दिल जिसमें कई नामी संगीतकार विशाल भारद्वाज, आनंद राज आनंद, प्रीतम आदि ने फिल्म के विभिन्न गीतों की धुनें तैयार की थीं। अजय देवगन के भाई अनिल देवगन की ये फिल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिटी जिसका खामियाज़ा इसके गीतों को उठाना पड़ा था।


इस फिल्म में विशाल भारद्वाज ने मुन्ना धीमन के लिखें शब्दों पर एक बेहतरीन कम्पोजीशन बनाई थी जो राहत फतेह अली खाँ की गायिकी से और निखर गई थी। विशाल भारद्वाज यूँ तो अक्सर गुलज़ार के बोलों पे अपना हुनर दिखलाते रहे हैं पर मुन्ना धीमन के साथ भी उनकी जुगलबंदी खूब बैठती है। याद है ना २००७ में निशब्द फिल्म के गीत जिसमें पहली बार मुन्ना धीमन की चर्चा इस चिट्ठे पर हुई थी। फिर पिछले साल 'यू मी और हम' में भी ये जोड़ी कुछ हद तक सफल हुई थी पर दिल का हाल कहते हुए इस नग्मे को अपने बोलों, सुंदर संगीत संयोजन और राहत फतेह अली खाँ की बेमिसाल गायिकी की वज़ह से मैं इस जोड़ी द्वारा रची गई अब तक की सबसे नायाब कम्पोसीशन मानता हूँ।



दरअसल मुन्ना इस गीत की रूमानी पंक्तियों में एक ऍसी गहराई लाते हैं जो इस गीत का स्तर एक दूसरे धरातल पर ले जाता है। मिसाल के तौर पर इन पंक्तियों को देखें..

आजा तेरी आँखों से ख्वाब ख्वाब गुजरूँ मैं..
आजा तुझे हाथों पे किस्मतों सा लिख लूँ वे..
आजा तेरे होठों से बात बात निकलूँ मैं..

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ..

और फिर कितना अद्भुत है विशाल भारद्वाज का संगीत संयोजन ! मुखड़े के ठीक पहले ताल वाद्यों की थाप से मन झूम ही रहा होता है कि राहत फतेह अली खाँ का रुहानी स्वर उभरता है और मन गीत में रम सा जाता है। विशाल गीत के पीछे की बीट्स को बिना किसी ज्यादा छेड़ छाड़ के चलते रहने देते हैं। फिर इंटरल्यूड में गिटार का उनका प्रयोग ध्यान खींचता है। वैसे भी राहत का सूफ़ी अंदाज़ हमेशा से दिल को छूता रहा है। तो आइए पहले सुनें राहत को..



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जान वे जान ले , हाल ए दिल
जान वे बोल दे , हाल ए दिल
आजा तेरे सीने में साँस साँस पिघलूँ मैं
आजा तेरे होठों से बात बात निकलूँ मैं
तू मेरी आग से रौशनी छाँट ले
ये जमीं आसमां जो भी है बाँट ले
जान वे जान ले , हाल ए दिल
जान वे बोल दे , हाल ए दिल
आजा माहिया आ जा...आजा माहिया आ जा...
बेबसियाँ आ जा...आजा माहिया आ जा...
दिन जोगी राताँ, सब डसियाँ आ जा
तेरी झोलियाँ पाऊँ घर गलियाँ आ जा
आजा माहिया आ जा...आजा माहिया आ जा...
आजा तेरे माथे पे चाँद बन के उतरूँ मैं
आजा तेरी आँखों से ख्वाब ख्वाब गुजरूँ मैं
रग रग पे हैं तेरे साये वे, रग रग पे हैं तेरे साये
रंग तेरा चढ़ चढ़ आए वे रंग तेरा चढ़ चढ़ आए
जान वे जान ले , हाल ए दिल...

आजा तुझे हाथों पे किस्मतों सा लिख लूँ मैं
आजा तेरे कान्धे पे उम्र भर को टिक लूँ मैं
तेरी अँखियों के दो गहने वे तेरी अँखियों के दो गहने
फिरते हैं पहने पहने वे फिरते हैं पहने पहने
जान वे जान ले , हाल ए दिल...
आजा माहिया आ जा...आजा माहिया आ जा...
आजा तेरे सीने में साँस साँस पिघलूँ मैं....


रेखा भारद्वाज ने भी इस गीत का दूसरा वर्सन गाया है जिसमें अंतरे थोड़ी तब्दीली के साथ गाए गए हैं। मुन्ना धीमन एक बार फिर उसी फार्म में हैं। विशाल की पार्श्व बीट्स यहाँ अपेक्षाकृत तेज हैं। इंटरल्यूड में गिटार की जगह बाँसुरी बजती सुनाई देती है। रेखा जी की गायिकी का अनूठा अंदाज तो हमेशा से मन को सोहता है पर कुल मिलाकर राहत फतेह अली खाँ वाला वर्सन ज्यादा असर छोड़ता है। तो सुनिए रेखा जी को इसी गीत में..


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आ जा रख ले
उड़ तक ले आजा रख ले
मन वे.. हाए.. कुछ कह दे
कुछ सुन ले जान वे
जान वे जान ले , हाल ए दिल...
आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ
तेरे भेष तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ
रग रग पे हैं तेरे साये वे, रग रग पे हैं तेरे साये
रंग तेरा चढ़ चढ़ आए वे रंग तेरा चढ़ चढ़ आए
जान वे जान ले , हाल ए दिल...
तू ही मेरी नींदों में जागता है सोता है
तू ही मेरे आँखों के पानियों में होता है
तेरी अँखियों के दो गहने वे तेरी अँखियों के दो गहने
फिरते हैं पहने पहने वे फिरते हैं पहने पहने

Monday, July 20, 2009

बेचारा दिल क्या करे... और घर जायेगी तर जायेगी.. .खुशबू फिल्म में आशा जी के गाए दो बेहतरीन नग्मे

गुलजार, पंचम और किशोर की तिकड़ी ने सत्तर के दशक में तो कई बेमिसाल नग्मे दिए जो भुलाए नहीं भूलते। पर आज मुझे याद आ रही है १९७५ में प्रदर्शित फिल्म खुशबू की जिसमें ओ माझी रे जैसे.... किशोर के सदाबहार नग्मे तो थे ही पर आशा जी के गाए कुछ नग्मे भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। आज इसी फिल्म के उन दो गीतों की बात जिसमें गुलज़ार और पंचम के आलावा, जादूगरी थी आशा जी की बेहतरीन गायिकी की।

पहला तो बेचारा दिल क्या करे... जिसे सुनने और गुनगुनाने भर से ही मन मस्ती की एक नई तरंग में डूब जाता है। इस गीत की प्रकृति हिंदी फिल्म जगत में इन अर्थों में भिन्न है कि यहाँ अपने दिल की बात नायिका खुद नहीं कह रही है बल्कि उसके मन के हालातों को उसकी मित्र अपना स्वर दे रही है। वैसे जीवन में ये तो आप सब ने महसूस किया होगा कि जब हमारे मन में चलती भावनाओं को हमारा करीबी मित्र पढ़ लेता है तो हमें मन ही मन खुशी ही होती है। इसलिए गीत में इस खुशी की तरंग सर्वत्र व्याप्त है।

इस गीत का फिल्मांकन फरीदा जलाल पर हुआ था। नायिका थीं हेमा मालिनी और नायक थे जीतेंद्र जिन्होंने इस फिल्म गाँव के डॉक्टर की भूमिका अदा की थी। अगर फिल्म ना भी देखी हो तो गीत क बोलों से आप काफी कुछ समझ गए होंगे।


वैसे गुलज़ार ने पंचम के एक एलबम में गीतों का जिक्र किया तो ये भी बात बाँटी कि आशा जी बेहद सफाईपसंद हैं। और जब भी वो सामने दिखती पंचम ये कहना नहीं चूकते कि लो अब ये मुझसे काम कराएँगी। पंचम ने तो आशा की इस सफाई पसंदी को ध्यान में रखकर उन्हें जन्मदिन के अवसर पर चाँदी के वर्क में लपेट कर एक झाड़ू भी दिया था और जवाब में आशा जी के होठों पर यही गीत था


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बेचारा दिल क्या करे, सावन जले भादो जले
दो पल की राह नहीं, इक पल रुके इक पल चले

गाँव गाँव में, घूमे रे जोगी, रोगी चंगे करे,
मेरे ही मन का, ताप ना जाने, हाथ ना धरे
बेचारा दिल क्या करे, सावन जले भादो जले..

तेरे वास्ते, लाखों रास्ते, तू जहाँ भी चले,
मेरे लिये हैं, तेरी ही राहें, तू जो साथ ले
बेचारा दिल क्या करे, सावन जले भादो जले..



इसी फिल्म के लिए गुलज़ार साहब ने एक और बेहतरीन गीत रचा था जो कि पहले गीत की तरह ही मुझे बेहद प्रिय है।

अब आप ही भला बताइए यौवन की दहलीज़ पर कदम रखती किस लड़की को दुल्हन बनने की इच्छा नहीं होती? और सजना सँवरना तो उनके स्वाभाविक चरित्र का अहम हिस्सा है। पर इस उमंग के साथ एक तरह की बेचैनी भी तो रहती है। एक अनजान से घर में जाने का डर और नए जीवनसाथी के बारे में उठती तरह तरह की हजारों कल्पनाएँ ! इन भावनाओं को गुलज़ार बड़े ही प्यारे अंदाज में समेटा है इस गीत में। और आशा जी की मीठी आवाज़ में इस गीत को सुनने का अपना अलग ही आनंद है।

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घर जायेगी तर जायेगी हो डोलियां चढ़ जायेगी
हो ओ ओ ओ मेहेंदी लगायके रे काजल सजायके रे
दुल्हनिया मर जायेगी
ओ ओ ओ दुल्हनिया मर जायेगी

धीरे धीरे ले के चलना आँगन से निकलना
कोई देखे ना दुल्हन को गली में
हो अँखियां झुकाये हुए घुंघटा गिराये हुए
मुखड़ा छुपाये हुए चली मैं
जायेगी घर जायेगी तर जायेगी
हो घर जायेगी ...

मेहंदी मेहंदी खेली थी मैं तेरी ही सहेली थी मैं
तूने तो कुसुम को चुना था
हो तूने मेरा नाम कभी आँखों से बुलाया नहीं
मैंने जाने कैसे सुना था
जायेगी घर जायेगी ला ला ला
हो घर जायेगी ...


Sunday, July 12, 2009

काहे तरसाए जियरा... राग कलावती पर आधारित एक सम्मोहक युगल गीत !

कुछ दिनों पहले संगीतकार रौशन और साहिर की जोड़ी द्वारा रचित दिल जो ना कह सका के बारे में बाते हुईं थीं। आज से चार दिन बाद यानि १४ जुलाई को संगीतकार रौशन का जन्म दिन है तो मेंने सोचा कि क्यूँ ना साहिर के बोलों पर उनके संगीतबद्ध इस शास्त्रीय नग्मे को आपके सामने प्रस्तुत कर उनकी याद दिलाई जाए। लता जी के साथ तो रौशन साहब ने तो कई अद्भुत गीत दिए हैं पर आज का ये गीत लता जी का नहीं बल्कि आशा भोंसले और उषा मंगेशकर का गाया युगल गीत है।



अगर हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय युगल गीतों की बात करें तो उनमें १९६४ में आई फिल्म चित्रलेखा के इस गीत का जिक्र नहीं होना आश्चर्य की बात होगी। ये गीत राग कलावती पर आधारित है जो कि मध्यरात्रि के पूर्व गाया जाने वाला राग है। खैर मैं तो मंगेशकर बहनों की इस शास्त्रीय जुगलबंदी को किसी भी वक़्त सुनता हूँ, मन मुदित हो जाया करता है। संगीतकार रौशन की खासियत यही थी को वो अपनी धुनों में लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के बीच ऍसा सामंजस्य स्थापित करते थे कि हृदय उनकी जादूगरी पर वाह वाह कर उठे। बेमिसाल गायिकी और संगीत के आलावा एक और बात इस गीत को अनोखा बनाती हैं वो हैं इसके बोल..

साहिर एक मक़बूल शायर तो थे ही फिल्मों के लिए उनकी लिखी हुई ग़ज़लें भी उतनी ही मशहूर हुईं। पर वही शख्स शुद्ध हिंदी में भी उसी माहिरी के साथ गीत रचना कर सकता है ये बात इस गीत के शब्दों पर गौर करने से पता चल जाती है।

चलिए अब इस गीत का मूड टटोलते हैं। सावन का महिना प्रारंभ हो चुका है। ऍसे में अगर पिया जी परदेश में हों और लौटने का नाम नहीं ले रहे और ऊपर से बारिश की ये कल्की हल्की फुहारें तन मन में और आग लगा दें तो जियरा तो तरसेगा ही !

तो आइए सुनते हैं आशा और उषा जी की इस अद्भुत जुगलबंदी को



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काहे तरसाए जियरा
काहे तरसाए जियरा, जियरा...
यवन ऋतु सजन जाके न आ...ए..
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत जागे ना
नित नीत जा.. जागे ना, नित नीत जा.. जागे ना,
नित नीत जागे ना
सोया सिंगा...र, सोया सिंगा.......र
झनन झन झनन, नित ना बुला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत आए ना
नित नीत आ.. आए ना, नित नीत आ.. आए ना,
नित नीत आए ना
तन पे निखा...र, तन पे निखा......र
पवन मन सुमन नित ना खिला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा


नित नीत बरसे ना
नित नीत बर. बरसे ना, नित नीत बर.. बरसे ना
नित नीत बरसे ना
रस की फुहार, रस की फुहा...र
सपन बन गगन, नित ना लुटा..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा
जियरा...

चूँकि ये गीत पुराना है इसलिए ये नेट पर अच्छी रिकार्डिंग क्वालिटी में उपलब्ध नहीं है। पर नेट पर मैंने इस गीत को देबोलीना और विद्यु की आवाज़ में सुना और इस कठिन गीत को गाने का उनका बेहतरीन प्रयास मन को आनंदित कर गया। एक बार इसे सुन कर देखें ..इन युवा कलाकारों की मेहनत आपको जरूर प्रभावित करेगी



और चित्रलेखा फिल्म के इस गीत को देखना चाहते हों तो यहाँ देख सकते हैं

Saturday, July 11, 2009

क़तील शिफ़ाई समापन किश्त : हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते, इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में

"..............इस प्रकार हम देखते हैं कि दूसरे महायुद्ध के बाद नई पीढ़ी के जो शायर बड़ी तेजी से उभरे और जिन्होंने उर्दू की ‘रोती-बिसूरती’ शायरी के सिर में अन्तिम कील ठोंकने, विश्व की प्रत्येक वस्तु को सामाजिक पृष्ठभूमि में देखने और उर्दू शायरी की नई डगर को अधिक-से-अधिक साफ, सुन्दर, प्रकाशमान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उनमें ‘क़तील’ शिफ़ाई का विशेष स्थान है। बल्कि संगीतधर्मी छंदों के चुनाव, चुस्त सम्मिश्रण और गुनगुनाते शब्दों के प्रयोग के कारण उसे शायरों के दल में से तुरन्त पहचाना जा सकता है।

समय, अनुभव और साहित्य की प्रगतिशील धारा से सम्बन्धित होने के बाद जिस परिणाम पर वह पहुँचा, उसकी आज की शायरी उसी की प्रतीक है। उसकी आज की शायरी समय के साज़ पर एक सुरीला राग है- वह राग, जिसमें प्रेम-पीड़ा, वंचना की कसक और क्रान्ति की पुकार, सभी कुछ विद्यमान है। उसकी आज की शायरी समाज, धर्म और राज्य के सुनहले कलशों पर मानवीय-बन्धुत्व के गायक का व्यंग्य है।......"

प्रकाश पंडित द्वारा क़तील शिफ़ाई के लिए कहे गए ये शब्द सही माएने में उनकी शायरी को सारगर्भित करते हैं।

आज क़तील शिफ़ाई की पुण्यतिथि है। आज से आठ साल पहले ये महान शायर इस दुनिया से कूच कर गया था। इसलिए इस अवसर पर ये प्रविष्टि पुनः प्रकाशित की गई है।

मोहब्बतों के इस शायर ने अपने लेखन में प्रेम के आलावा भी अन्य विषयों का समावेश किया। मिसाल के तौर पर उनकी इस ग़ज़ल पर गौर करें..

रक़्स1 करने का मिला हुक्म जो दरयाओं में
हम ने खुश हो के भँवर बाँध लिए पाँवों में

1. नृत्य

देखिए क्या खूब व्यंग्य किया है क़तील ने...
उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश
बूँद तक बो ना सके जो कभी सहराओं में


ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थके-हारे हो
धूप की तुम तो मिलावट ना करो छाँव में

पाकिस्तान में निरंतर बदलती राजनीतिक सत्ता परिवर्तन पर व्यंग्य करते हुए इस ग़ज़ल के अगले शेर में वो कहते हैं ...

जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज
बँट ना जाए तेरा बीमार मसीहाओं में


अब अगला जो शेर है वो आप तभी समझ पाएँगे जब आपको इस्लाम धर्म से जुड़ी इस कथा के बारे में आपको पता हो। मुझे ये जानकारी एक पुस्तक से मिली उसे ज्यों का त्यों आप तक पहुँचा रहा हूँ। तो जनाब यूसुफ़ हजरत याकूब के पुत्र थे जो परम सुंदर थे और जिन्हें उनके भाइयों ने ईर्ष्यावश बेच दिया था। आगे चल कर इन पर मिश्र की रानी जुलैख़ा आसक्त हो गईं थीं और वे मिश्र के राजा बन गए। उनकी और जुलैखा की कहानी को आम जिंदगी में मँहगाई की समस्या के साथ किस तरह पिरोया है क़तील ने ये देखें आप इस शेर में...

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का
अब तो मँहगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में


और जब टीवी चैनल से लेकर पत्र पत्रिकाएँ सब आपके भाग्य की खुशहाली बयाँ कर रही हों और आपके दिन नागवार गुजर रहे हों तो ये शेर क्या आप नहीं कहना चाहेंगे..

जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में


वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में


भारत और पाक के लोगों के बीच में दीवार खड़ी करने वाले शासक वर्ग के बारे में वो कहते हैं...

हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में


और फिर वापस अपने रंग में लौटते हुए ये याद दिलाना भी नहीं भूलते :)..

मुझसे करते हैं "क़तील" इस लिये कुछ लोग हसद
क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल हसीनाओं में


क्यूँ ना इस बेहतरीन ग़ज़ल को खुद क़तील की आवाज़ में सुना जाए...





११ जुलाई २००१ को क़तील इस दुनिया से कूच कर गए। अपने ८१ वर्षों के इस जीवन के सफ़र में उनके करीब बीस काव्य संग्रह छपे और करीब २५०० गीत हिंदी और पाकिस्तानी फिल्मों का हिस्सा बने। मोहब्बत के एहसास को पुरज़ोर ढंग से अपने काव्य में ढालने वाले इस शायर को हम सब कभी नहीं भुला पाएँगे। खुद क़तील ने कहा था..

‘क़तील’ अपनी ज़बाँ का़बू में रखना
सुख़न से आदमी पहचाना जाए


आज इस श्रृंखला के समापन पर क़तील शिफाई की एक गीतनुमा ग़ज़ल याद आ रही है जिसे गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद है। दरअसल जिंदगी में पहली बार इंटरनेट का प्रयोग मैंने इसी ग़ज़ल को खोजने के लिए किया था। इसका मतला बेहद खूबसूरत है

प्यार तुम्हारा भूल तो जाऊँ, लेकिन प्यार तुम्हारा है
ये इक मीठा ज़हर सही, ये ज़हर भी आज गवारा है


यूँ तो इस ग़ज़ल को तलत अज़ीज साहब ने गाया है पर आज इसके कुछ अशआरों को झेलिए मेरी आवाज़ में :) !



आशा है क़तील शिफ़ाई के बारे में पाँच किश्तों की ये पेशकश आपको पसंद आई होगी...

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

मोहब्बतों का शायर क़तील शिफ़ाई : भाग:१, भाग: २, भाग: ३, भाग: ४, भाग: ५

Sunday, July 05, 2009

सुरमयी शाम, साँस लेते साए और जागती परछाइयाँ : सुनिए हृदयनाथ मंगेशकर और गुलज़ार की इस अद्भुत जुगलबंदी को !


कभी कभी ब्लॉग पर जब हम पोस्ट डालते हैं तो बहुधा कई विचार जिन्हें हम पोस्ट करते करते रुक जाते हैं वो टिप्पणियों के माध्यम से फिर से उभर कर आ जाते हैं। माया मेमसाब के गीत मेरे सराहने जलाओ सपने के बारे में लिख रहा था तो साथ ही इस फिल्म में हृदयनाथ मंगेशकर की गाई एक बेहतरीन बंदिश भी सुनवाने की इच्छा थी और इसके सबसे लोकप्रिय गीत इक हसीं निगाह.. की भी बात करनी थी। पर लगा की भिन्न भिन्न मूडों के इन गीतों को एक पोस्ट में बाँधना सहज नहीं होगा तो उनसे जुड़ा अनुच्छेद हटा दिया और देखिए नीरज जी, यूनुस और अनुराग ने अपनी टिप्पणियों में उन्हीं गीतों की चर्चा भी की।

तो आइए आज बात करते हैं हृदयनाथ मंगेशकर के संगीतबद्ध दो गीतों की, जिनमें से एक को उन्होंने अपनी आवाज़ भी दी है। यूँ तो हृदयनाथ मंगेशकर गैर फिल्मी एलबमों (मीरा बाई के भजन और ग़ालिब की ग़जलों पर) के आलावा कई हिंदी फिल्मों हरिश्चंद्र तारामती, चक्र धनवान, सुबह, मशाल, लाल सलाम जैसी फिल्मों का संगीत दे चुके हैं पर मुझे नब्बे के दशक में आई फिल्म लेकिन और माया मेमसॉब में उनके द्वारा दिया गया संगीत सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

माया मेमसॉब का कैसेट १९९३ में स्ट्रलिंग कंपनी (Sterling) ने ज़ारी किया था। इस फिल्म का सबसे प्रचलित गीत था इक हसीन निगाह का दिल पे साया है, जादू है जुनून है कैसी माया है ये माया है...जिसे कुमार शानू और लता जी ने अलग अलग गाया था। कुमार शानू की आवाज़ में इस गीत की कुछ पंक्तियाँ सुन कर ही इस कैसेट को खरीद लिया गया था। पर बाद में जब गीत सुन लिए गए तो ये चर्चा भी खूब चली थी कि देखिए कुमार शानू इक हसीं निगाह को कुछ इक हसिन निगाह जैसा उच्चारित करते हैं। पर इस बात को नज़रअंदाज कर दें तो ये गीत उनकी आवाज़ पर फबा भी खूब था और शायद यही वज़ह थी कि एक अलग हटके बनी इस फिल्म का गीत होते हुए भी सिबाका गीत माला की भिन्न पॉयदानों पर कई हफ्तों तक ये गीत अपनी शोभा बढ़ाता रहा था। ये भी सही है कि गुलज़ार की चिरपरिचित छाप से परिपूर्ण इस कैसेट के बाकी गीत उतने नहीं बजे..

कुछ वैसा ही हाल १९९१ में प्रदर्शित फिल्म लेकिन का रहा जहाँ एक बार फिर गुलज़ार और हृदयनाथ मंगेशकर की जोड़ी थी। यारा सिली सिली और कुछ हद तक केसरिया बालमा तो लोकप्रिय हुए पर बाकी गीत पर लोगों की निगाह कम ही गई। मेरी आज की प्रविष्टि आपको इन फिल्मों के ऍसे ही एक-एक गीत की याद दिलाने की एक कोशिश है।

इन दोनों गीतों की विषयवस्तु में एक साम्यता है ये दोनों परछाइयों की बातें करते हैं। वैसे सायों की दुनिया से गुलज़ार का रिश्ता पुराना है। याद है ना आपको सितारा फिल्म में आशा जी का गाया वो नग्मा

ये साए हैं..
ये दुनिया है , परछाइयों की
भरी भीड़ में खाली तनहाइयों की
ये साए हैं..

जब इंसान अपना अक़्स ही खो दे तो उसमें और उसकी परछाईं में ज्यादा फर्क नहीं रह जाता। पर यहाँ तो कल्पना ही दूसरी है। छाया में उमंग है, उल्लास है, चाहत है एक नई प्यारी सी काया को पाने की, सजने सँवरने की, मायावी दुनिया में कदम रखने की...।

हृदयनाथ जी ने अपनी सधी गायिकी से इस छोटी सी बंदिश में जो जादू उत्पन्न किया है, उसका अनुभव इसे सुनकर ही किया जा सकता है। अपनी स्वरलहरियों के उतार चढ़ाव से मात्र कुछ शब्दों से कितना जबरदस्त प्रभाव पैदा किया जा सकता है ये गीत इस की जीती जागती मिसाल है। वैसे इस गीत में हृदयनाथ मंगेशकर के साथ पार्श्व में जो आवाज़ उभरती है वो लता की नहीं है जैसा कई जगहों पर उल्लेख है, बल्कि आशा जी की है। रोचक तथ्य ये है कि इस गीत को एकल गीत के रूप में ही रचा गया था। हुआ ये कि रिकार्डिंग के समय अपने भाई के साथ आशा जी भी चली आईं और फिर लगा कि अगर पार्श्व से नारी स्वर रहे तो गीत और प्रभावी बन सकता है और इस तरह आशा जी भी अपनी हमिंग के साथ गीत का हिस्सा बन गई़।

तो सुनिए हृदयनाथ मंगेशकर का दिव्य स्वर इस गीत में



छाया जागी...
छाया जागी...
छाया जागी जागी
छाया जागी जागी
छाया जागी जागी
छाया जागी...........छाया जागी
चंचल चंचल कोमल चंचल चंचल
चंचल कोमल कोमल चंचल चंचल
काया माँगी.........काया माँगी
काया माँ...........गी काया माँगी काया माँगी


सज के सोलह सिंगार
चली सपनों के सपनों के पार
सज के सोलह सिंगार
चली सपनों के सपनों के पार
माया लागी ....
माया लागी माया लागी माया लागी माया लागी
माया लागी लागी
माया लागी लागी


सायों से जुड़े दूसरे गीत को गाया है सुरेश वाडकर जी ने। सुरेश वाडकर इस गीत को याद करते हुए कहते हैं

ये गीत पहले मराठी में रिकार्ड हुआ था । बाद में जब हिंदी में इसे इस फिल्म के लिए रिकार्ड किया जाना था तो रिकार्डिंग वाले दिन लता दी भी स्टूडिओ में मौजूद थीं। उन्हें अपने सामने देखकर मुझे ऐसा लग रहा था कि इनके सामने मेरी आवाज़ क्या निकलेगी। फिर भी मेंने वो गीत गाया। गाने के बाद लता जी आयीं और कहा सुरेश बहुत अच्छा गया बस "साँस लेते हैं जिस तरह साए में..." साँस को एक अलग लहज़े में गाओ और फिर उन्होंने वो कर के भी दिखाया।
 ये गीत उन गीतों में से है जिसकी गायिकी और संगीत ने मुझमें ऍसी कैफ़ियत भर दी कि इसके शब्दों की गहराइयों में पहुँचने के पहले ही ये मेरे मन में रच बस गया था। और जब इस गीत के लिए लिखे गुलज़ार के खूबसूरत लफ़्जों को जिंदगी की कई शामों में करीब से गुजरने का मौका मिला तो ये गीत दिल के और करीब होता चला गया। दरअसल ये गीत उन गीतों में हैं जहाँ शब्द, संगीत और गायिकी तीनों मिलकर ऍसा पुरज़ोर असर पैदा करते हैं कि आप इस गीत में डूबते चले जाते हैं।

वैसे क्या आपको नहीं लगता कि इन सायों की दुनिया भी कुछ अजीब सी है। ऍसे तो साये हमारे साथ हमेशा रहते हैं पर दिवस के अवसान के साथ इनका विस्तार बढ़ता चला जाता है। फिर क्यूँ ना अपनी असली रंगत तक पहुँचने के लिए ये शाम का इंतज़ार करें।

सुरमई शाम इस तरह आए
साँस लेते हैं जिस तरह साए

पर नायक को तो इस शाम का इंतज़ार किसी दूसरी वज़ह से है। शायद ये शाम भी वही मंज़र दुहरा दे.. जिसमें वो तो नहीं दिखी थी पर उसके साये की खुशबू ज़ेहन में उतर सी गई थी।
कोई आहट नहीं बदन की कोई
फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं
वक़्त जाता सुनाई देता है
तेरा साया दिखाई देता है
जैसे खुशबू नज़र से छू जाए
साँस लेते हैं जिस तरह साए


आज वो आस पास नहीं पर दिन के घंटे ज्यों ज्यों गुजरते हैं दिल पर के ऊपर का बोझ हल्का होता जाता है। वो शाम और तेरा वो साया खयालों के ज़रिए दिल के पास जो आ जाता है

दिन का जो भी पहर गुजरता है
इक अहसान सा उतरता है
वक़्त के पाँव देखता हूँ मैं
रोज़ ये छाँव देखता हूँ मैं
आए जैसे कोई खयाल आए
साँस लेते हैं जिस तरह साए
सुरमयी शाम इस तरह आए..

तो आइए महसूस करें गुलज़ार के शब्दों को इस गीत के ज़रिए




और जैसा कि यूनुस ने इस गीत के संगीत के बारे में इंगित किया था कि अगर आपने इस गीत को ध्यान से सुना हो तो इस बात पर गौर किया होगा कि इस गीत के आंरंभ और इंटरल्यूड में पाश्चात्य वाद्य यंत्रों का प्रयोग है और अंतरे में मुख्यतः तबला सुनाई देता है। है ना सुंदर मिश्रण !

इस गीत को विनोद खन्ना और डिंपल पर फिल्माया गया है। वीडिओ आप यू ट्यूब पर यहाँ देख सकते हैं।

 

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