Tuesday, September 22, 2009

जब ग्यारह वर्षीय बालक हेमंत बृजवासी ने भाव विभोर किया आशा ताई को..

नवरात्र शुरु हो गए हैं और कल ईद सोल्लास मनाई जा चुकी है। पर्व त्योहारों के इस मस्ती भरे दौर में ब्लॉग पर भी मस्ती का रंग चढ़ना लाज़िमी है ना। आज जो मूड मन में तारी है उसका पूरा श्रेय जाता है मथुरा के ग्यारह वर्षीय बालक हेमंत बृजवासी को। हफ्ते भर से हेमंत की आवाज़ कानों में गूँज रही है। ग्यारह सितंबर की उस यादगार रात को जी टीवी के लिटिल चैम्पस (Zee TV Little Champs) पर खुद आशा ताई पधारी थीं। पूरे कार्यक्रम में लड़कियों को आशा जी और लड़कों को पंचम के गाने गाने थे। अब पंचम की भारी आवाज़ और उनकी उर्जात्मक शैली को दस बारह साल के बच्चों द्वारा निभा पाना टेढ़ी खीर थी। फिर भी सब प्रतिभागियों ने अच्छा प्रयास किया, पर ज़माने को दिखाना है फिल्म में पंचम द्वारा गाए गीत दिल लेना खेल है दिलदार का, भूले से नाम ना लो प्यार का... की हेमंत द्वारा प्रस्तुति इतनी दमदार थी कि आशा ताई तक को कहना पड़ गया कि "आपने तो बर्मन साहब से भी बेहतर तरीके से इस गीत को निभाया"।

पूरे कार्यक्रम में एक और बात कमाल की थी वो थी गायकों को जबरदस्त सपोर्ट ‍‍देता हुआ मनभावन आरकेस्ट्रा। वैसे भी जी टीवी के संगीत कार्यक्रमों में कई सालों से मँजे हुए साज़कारों को बजाते देखता रहा हूँ और पंचम की धुनों में तो इनकी विशेष भूमिका हमेशा ही रहा करती थी। पंचम के संगीतबद्ध गीतों का पार्श्व संगीत उनकी अनूठी शैली की गवाही देता है। दरअसल तरह तरह की आवाज़ों को पारंपरिक और गैर पारंपरिक वाद्य यंत्रो से निकालने में राहुल देव बर्मन का कोई सानी नहीं था।


तो लौटें अपने इस सुरीले बालक की ओर। हेमंत की दमदार प्रस्तुति यादगार तब बन गई जब उसने गीत के बाद आशा जी को बुल्लेशाह के लिखे सूफ़ियत में रँगे पंजाबी लोकगीत का वो टुकड़ा सुनाया।

चरखा दे मिट्टा दियाँ दूरियाँ...........
हो..मैं कटि जावाँ तेरी होर पिया दूरियाँ
गद सखरी रा गद सखरी रा ...
गद.. सख...रीरा..
गद सखरी रा वरण दिए कुड़िए...........
मैं पैया और सिपहयिए


सच मानिए हेमंत ने उन चंद पंक्तियों में ली गई हरक़तों ने ऐसा समा बाँधा कि हजारों दर्शकों के साथ-साथ आशा जी की भी आँखें गीली हो गईं और वे कह उठीं

हेमंत अगर सबसे बड़ी कला कोई मानी जाती है तो वो कला है संगीत कला। संगीत कला भगवान के नज़दीक होती है। और तुम्हारा जो गाना है वो भगवान के बहुत नज़दीक है।

नौ साल की आयु से अपने पिता और गुरु हुकुमचंद बृजवासी से संगीत सीखना शुरु करने वाले हेमंत को शास्त्रीय और सूफ़ीयाना नग्मे गाने में महारत हासिल है। मात्र दो साल संगीत की शिक्षा लेने के बाद ये बालक गीतों में अपनी और से जोड़ी हुई विविधताओं का इस तरह समावेश करता है मानों गीत से खेल रहा है। हेमंत की आवाज़ और उच्चारण एक शीशे की तरह साफ और स्पष्ट है पर उसके साथ दिक्कत यही है कि वो अपनी शैली के गीतों से अलग तरीके के गीतों में वो कमाल नहीं दिखला पाता। पर शायद आज के युग में इसकी जरूरत भी नहीं है। हर गाने के पहले अपनी जिह्वा को बाँके बिहारी लाल की जयकार से पवित्र कराने वाला ये बालक नुसरत और आशा जी को अपना आदर्श मानता है। गीत संगीत के आलावा क्रिकेट भी खेलता है और मौका मिले तो शाहरुख और करीना की फिल्में देखना भी पसंद करता है।

तो अगर आपने उस दिन इस प्रसारण का आनंद नहीं लिया तो अब ले लीजिए..






वैसे इस सूफ़ी लोकगीत को पूरा सुनने की इच्छा आप के मन में भी हो रही होगी। दरअसल इस लोकगीत को सबसे पहले लोकप्रिय बनाया था सूफ़ी के बादशाह नुसरत फतेह अली खाँ साहब ने और फिर इस गीत को नई बुलंदियों पर ले गए थे जालंधर के पंजाबी पुत्तर सलीम शाहजादा। बादशाह और शहज़ादे द्वारा इस लोकगीत की प्रस्तुति को आप तक पहुँचाने की शीघ्र ही कोशिश करूँगा।

Friday, September 18, 2009

भले दिनों की बात है, भली सी एक शक्ल थी... प्रेम के बदलते स्वरूप को उभारती फ़राज़ की एक नज़्म

अहमद फ़राज़ साहब पाकिस्तान के मशहूर शायर थे। भारत में भी हमेशा से ही उन्हें बड़े चाव से पढ़ा जाता रहा है और जाता रहेगा। भला इनकी लिखी गजल रंजिश ही सही.. किस गजल प्रेमी ने नहीं सुनी होगी। आज उनकी ही एक नज्म पेशे खिदमत है जो कुछ साल पहले सरहद पार के एक मित्र के सौजन्य से पढ़ने को मिली थी।

प्रेम का शाश्वत स्वरूप हमेशा से बहस का विषय रहा है। पर फिर भी इस पर विश्वास करने वाले तो यही कहते रहेंगे कि सच्चा प्रेम अजर अमर होता है।मिसाल के तौर पर प्रसिद्ध अमरीकी कवयित्री एमिली डिकिन्सन (Emily Dickinson) इस सूक्ति पर गौर करें..


पर इतना सहज भी नहीं है समझना प्रेम के इस डायनमिक्स को। आज के इस युग में जब रिश्ते पल में बनते और बिगड़ते हैं तो उससे क्या ये नतीज़ा निकाल लेना चाहिए कि इन रिश्तों में प्रेम हरगिज़ नहीं है। या इसकी वज़ह है कि प्रेम का बीज प्रस्फुटित होने के बाद भी आज की भागमभाग, ऊपर की सीढ़ियाँ तक जल्दी पहुँचने की बेसब्री और इन सब के पीछे हम सब में बढ़ता अहम, इसे फलते फूलते पौधे के रूप में तब्दील होने से पहले ही रोक देता है।

दरअसल बड़ा मुश्किल है ये फैसला कर पाना कि प्रेम को निजी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक बेड़ी की तरह समझा जाए या नहीं? पर एक बात तो पक्की है ये हम सबको पता होता है कि इन बेड़ियों को तोड़ देने के बाद हम जितना पाते गए हैं अंदर ही अंदर दिल में एक खोखलापन भी भरता गया है।

अहमद फ़राज़ ने अपनी इस नज़्म में इस सवाल का उत्तर तो नहीं दिया पर ये जरूर है कि ज़िंदगी के किसी मुकाम तक एक शख़्स से मिलने और बिछुड़ने की इस सीधी‍- सच्ची दास्तान को किस्सागोई के अंदाज़ में वो इस तरह कह गए हैं कि नज़्म पढ़ते पढ़ते दिल में उतरती सी चली जाती है।


भले दिनों की बात है,
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी

ना ये कि वो चले तो
कहकशां सी रहगुजर लगे
मगर वो साथ हो तो फिर
भला भला सफर लगे

कहकशां - आकाश-गंगा

कोई भी रुत हो उसकी छाब
फज़ां का रंगो रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी

छाब-छवि

ना ऍसी खुश लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बेतक़ल्लुफ़ी
कि आईना हया करे

ना मुद्दतों जुदा रहे
ना साथ सुबह-ओ-शाम हो
ना रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
ना ये कि इज़्न-आम हो

ना आशिकी जुनून की
कि जिंदगी अज़ाब हो
न इस कदर कठोरपन
कि दोस्ती खराब हो
अजाब - कष्टप्रद

सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जां फिज़ा तो क्या
फिराक़-ए-जां गुसल की भी

मुआमलात - मामला, विसाल - मिलन, फिराक़ - वियोग

सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गयी
मैं इश्क को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिढ़ गयी

मैं इश्क का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
बदतरज़ हवस कहे
असीर - बन्दी, कफस - पिंजड़ा

शज़र, हजर नहीं के हम
हमेशा पा-बे-गुल रहें
ना डोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तकिल रहें

शजर - टहनी, पेड़, हजर - पत्थर, पा - पैर
गुल - फूल, मुस्तकिल -मजबूती से डाला हुआ


मैं कोई पेटिंग नहीं
कि एक फ्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं इस मिज़ाज़ की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं

ना उस को मुझ पे मान था
ना मुझ को उस पे जाम ही
जो अहद ही कोई ना हो
तो क्या ग़म-ए-शिक़स्तगी
अहद - प्रतिज्ञा, शिक़स्त- हार

सो अपना अपना रास्ता
हँसी खुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया

भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं मगर कभी-कभी...


ये कभी-कभी वाली बात इस बात को पुरजोर अंदाज में रखती है कि यादें दब सकती हैं, स्याह पड़ सकती हैं पर मरती नहीं ।

Monday, September 14, 2009

दौरान ए तफ़तीश भाग 3 : बॉस की वहशत, चलते रहो प्यारे और भारत माता के तीन कपूत!

भारतीय पुलिस के आला अधिकारी रह चुके सतीश चंद्र पांडे की किताब दौरान ए तफ़तीश की चर्चा की इस आखिरी कड़ी में कुछ बातें पंजाब पुलिस और सीआरपीएफ से जुड़े लेखक के अनुभवों की। पर इससे पहले गंभीर मसलों पर लेखक के उठाए बिंदुओं का उल्लेख किया जाए, एक ऍसे चरित्र की बात करना चाहूँगा जिससे हर नौकरीपेशा व्यक्ति आक्रान्त रहता है। जी बिल्कुल सही समझा आपने वो शख़्स है हमारी कार्यालयी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनने वाले हमारे बॉस।


ज़ाहिर है लेखक ने अपनी सर्विस लाइफ में तरह तरह के वरीय सहकर्मियों को झेला। इनमें से कई उनके प्रेरणा स्रोत बने तो कई ऐसे, जिनकी उपहासजनक वृतियों को लेखक कभी भुला नहीं पाए। ऍसे कई किस्से आपको पूरी पुस्तक में मिलेंगे, पर सबसे मज़ेदार संस्मरण मुझे एक ऍसे कमिश्नर साहब का लगा जिनकी सख़्त ताक़ीद रहती थी कि जब भी वो किसी जिले के मुआयने में जाएँ तो कलक्टर, एस पी और ज़िला जज के आवास पर उनकी दावत निश्चित करने से पहले उनसे पूछने की जरूरत ना समझी जाए। कमिश्नर साहब के साथ दिक्कत ये थी कि वो ज़िले के साथ अपने मेज़बान के घर का मुआयना भी बड़ी तबियत से किया करते थे। तो इस मुआयने की एक झांकी पांडे जी की कलम से

'अच्छा तो ये आपका लॉन है?' 'ये आपका बेडरूम है?'

ज़ाहिर है कि इन प्रश्नों का उत्तर जी हाँ जी के आलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। लेकिन उनकी इस तरह की भूमिका का शिखर बिंदु तब आया जब उन्होंने अपने पर गृह भ्रमण के दौरान कलेक्टर की पत्नी को भीतर आँगन में बैठे देखा (उनका वहाँ जाना कलक्टर अपनी तमाम कोशिशों के बावज़ूद रोक नहीं पाए थे) और अपना सर्वाधिक मार्मिक प्रश्न पूछा 'अच्छा तो ये आपकी वाइफ हैं?'कलक्टर ने किसी तरह अपने को जी नहीं, ये आपकी अम्मा हैं कहने से रोक कर 'जी हाँ, ये मेरी वाइफ़ हैं। आप इनसे मिल चुके हैं।'कहकर टालने की कोशिश की। लेकिन हमारे बॉस की ज्ञान पिपासा तो अदम्य थी और उनका अगला प्रश्न था 'अच्छा वे अपने बाल सुखा रही हैं?' बात सही थी। कलेक्टर की पत्नी नहाने के बाद धूप में बैठी अपने बाल सुखा रही थीं और अपने आँगन में उस स्थिति में कमिश्नर साहब का स्वागत करने में उन्होंने कोई विशेष रुचि नहीं ली।


पांडे जी को अपने दीर्घसेवा काल में यूपी पुलिस के आलावा बीएसएफ, विशेष सेवा, पंजाब पुलिस और सीआरपीएफ के साथ काम करने का अवसर मिला। पंजाब में लेखक का दायित्व आतंकवाद के साये में विधानसभा चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से संपादित कराने का था। पंजाब पुलिस के बारे में लेखक को वहाँ जाकर जो सुनने को मिला,उससे उन्हें अपने कार्य की दुरुहता का आभास हुआ। फिर भी उन्होंने दुत्कारने और सुधारने की बजाए अपनी फोर्स पर आस्था और प्रशिक्षण को अपनी कार्यशैली का मुख्य बिंदु बनाया और अपने प्रयास में सफल भी हुए।

डीजी, सीआरपीएफ के पद पर आसीन होते ही उन्होंने सीआरपीएफ (CERPF) यानि सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स की दुखती रग को समझ लिया। दरअसल फोर्स के अंदर सीआरपी का मतलब 'चलते रहो प्यारे' है। चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत से पांडे जी को उज्र नहीं है। पर उनका मानना है कि बिना किसी स्पष्ट प्रयोजन के एक सीमा से ज्यादा इस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण स्वास्थ और ताज़गी के बजाए थकावट और क्लांति देने लगता है और सीआरपी के चलते रहने में ऍसा ही कुछ हुआ है। सीआरपी आज देश के आतंकियों, दंगाइयों और नक्सलियों से विषम परिस्थितियों में लड़ने भिड़ने में जुटी है। ऐसे हालातों में पांडे जी की ये सोच हमारे गृह मंत्रालय के नीति निर्माताओं के लिए बेहद माएने रखती है

जिस तरह फोर्स की कंपनियों को साल दर साल, दिन रात इधर से उधर भेजा जा रहा है उससे जवानों की थकावट और अन्य असुविधाओं के आलावा, उनकी ट्रेनिंग बिल्कुल चौपट हो चुकी है। इससे उनकी अपने हथियारों के प्रयोग की दक्षता पर ही नहीं, उनके अनुशासन और मनोबल पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है। इस फ़ोर्स का मूल 'सेंट्रल रिजर्व' वाला स्वरूप लगभग समाप्त हो चुका है और यह एक कुशल कारगर सुप्रशिक्षित फोर्स के बजाए एक अकुशल, अर्धप्रशिक्षित 'भीड़' सा बनता जा रहा है।

पांडे जी को अपने कार्यकाल में इन प्रयासों के बावज़ूद कुछ खास सफलता मिली हो ऍसा नहीं लगता। क्यूँकि लेखक की सेवानिवृति के दो दशक बाद आज भी कश्मीर से लेकर काँधमाल और छत्तिसगढ़ से झारखंड तक में, सीआरपी अपनी इन समस्याओं से जूझती लग रही है।

पुस्तक के अंत में लेखक आज की स्थिति की जिम्मेवारी भारत माता के तीन कपूतों को देते हैं। कपूतों की सूची में पहला नाम राजनीतिज्ञों का है। पांडे जी का मानना है कि भ्रष्ट और नकारे शासन का मुख्य निर्माता यही वर्ग है। उनकी सूची में दूसरे नंबर पर आते हैं नौकरशाह जिनमें पुलिस भी शामिल है। लेखक का तर्क है कि राजनीतिक दबाव में ना आकर सही कार्य करने के बजाए इस वर्ग के अधिकांश सदस्य राजनीतिज्ञों के साथ की बंदरबाँट में बराबर के सहभागी हैं। कपूत नंबर तीन के बारे में लेखक की टिप्पणी सबसे दिलचस्प है। लेखक के अनुसार ये कपूत नंबर तीन और कोई नहीं 'हम भारत के लोग और हमारे गिरते हुए इथोस' हैं। लेखक अपनी दमदार शैली में लिखते हैं

राजनेताओं और राजकर्मियों के भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले अपने बैंक के लॉकरों में रखे काले धन को भुलाए रहते हैं। जो दादी अपने होनहार पोते की तनख्वाह के आलावा उसकी ऊपरी आमदनी के बारे में अधिक उत्सुक होती है वह पूरे देशव्यापी भ्रष्टाचार के लिए उतनी ही दोषी है जितने पैसा लेकर संसद में पूछने वाले नेता जी, और झूठे एनकांउटर में बेगुनाह लोगों को मारने वाले पुलिसकर्मियों को पालने पोसने वाला, परिवार का वह बूढ़ा है जो अपने कप्तान भतीजे से मोहल्ले के कुछ बदमाशों को मुँह में मुतवाने को कहता है।
पांडे जी इस पूरी स्थिति में भी आशा की किरण देखते हैं। उनके अनुसार जनमानस गिरता है तो उसे उठाया भी जा सकता है। और यह तब तक नहीं होगा जब तक कि राजनीतिज्ञों और नौकरशाह इस बाबत स्वयम एक उदहारण नहीं पेश करेंगे।

पांडे जी की ये किताब हर पुलिसवाले के आलावा भारत के हर उस नागरिक को पढ़नी चाहिए जो देश को सही अर्थों में ऊपर उठता हुआ देखना चाहता है। पांडे जी ने अपने इन संस्मरणों के माध्यम से ना केवल सटीक ढंग से पुलिस की कठिनाइयों और उनसे निकलने के उपायों को रेखांकित किया है बल्कि साथ ही समाज में आए विकारों से लड़ने के लिए हमारे जैसे आम नागरिकों को प्रेरित करने में सफल रहे हैं। लेखक की किस्सागोई भी क़ाबिले तारीफ़ है और एक विशिष्ट सेवा से जुड़ी इस किताब को नीरस नहीं होने देती। कुल मिलाकर ये पुस्तक आपको चिंतन मनन करने पर भी मज़बूर करती है और कुछ पल हँसने खिलखिलाने के भी देती है।

पुस्तक के बारे में
दौरान ए तफ़तीश
वर्ष २००६ में पेंगुइन इंडिया से प्रकाशित ISBN 0 -14-310029-7
पृष्ठ संख्या २७६, मूल्य १७५ रु


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


Wednesday, September 09, 2009

दौरान ए तफ़तीश भाग 2 : रिश्वतखोरी, कुछ ना करने की कला, क़ायदे कानून व कागज़ी आदेशों पर पुलसिया सोच !

दौरान-ए-तफ़तीश पर छिड़ी चर्चा में पिछली पोस्ट में हमने बातें कीं 'काम के समय सख्ती', 'झूठी गवाही', 'थर्ड डिग्री' और कुछ मज़ेदार किस्सों की। आज की चर्चा शुरु करते हैं रिश्वतखोरी की समस्या से जो पुलिस ही क्या सारे भारतीय समाज में संक्रामक रूप से फैल चुकी है। पर इससे पहले कि इस गंभीर समस्या के कारणों और सुधार के उपायों की पड़ताल की जाए शुरुआत एक किस्से से।

नौकरी की आरंभिक दिनों में पांडे जी के पास एक चार्ज आया कि उनके थाने के हैड कांसटेबिल ने किसी मुलज़िम की जामा तालाशी में निकले उसके सौ रुपये मार दिए और जब बाद में उसने चिल्ल पौं मचाई तो उसे वो धन वापस कर दिया। छुट्टी के दिन वो हेड कांसटेबिल, पांडे जी के घर पहुँचा और अपनी सफ़ाई पेश करते हुए बोला

हुज़ूर मुझ पर इल्ज़ाम लगाया गया है कि मैंने मुलज़िम का सौ रुपये का नोट ले लिया और फिर उसे वापस कर दिया। मैं तो हुज़ूर आज़ादी के पहले पंजाब पुलिस में सब इंस्पेक्टर रह चुका हूँ। ऍसी बेअक़्ली का काम मैं भला कैसे कर सकता था? यानि कहने का मतलब ये कि पंजाब पुलिस में एक बार पैसा लेकर वापस करने का रिवाज़ ही नहीं था।:)

ये तो थी किस्से की बात पर लेखक इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि आज के सिस्टम में सिर्फ बेईमान ही लोग पनप सकते हैं या कि ईमानदार होने का मतलब है बेवकूफ होना। पांडे जी की इस राय से मैं शत प्रतिशत इत्तिफाक रहता हूँ इसलिए उनके इस कथन ने मुझे खासा प्रभावित किया...

मैं दोनों हाथ उठाकर पुरज़ोर आवाज़ में कहना चाहता हूँ कि कार्यकुशलता और व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा में कोई बुनियादी विरोध नहीं है। उल्टे एक बुनियादी सामांजस्य है। और उससे भी पुरज़ोर आवाज़ में यह कहना चाहता हूँ कि जो भी 'धीर' पुरुष मेहनत और कौशल से अपना काम करते हुए अपनी नीयत को पाक साफ़ रखने के लिए दृढप्रतिज्ञ होता है, उसे किसी ना किसी रूप में सूक्ष्म या स्थूल, प्रत्यक्ष या अप्रयत्क्ष पर्याप्त बाहरी या 'ऊपरी' सहायता मिलती है।

रिश्वतखोरी की समस्या को लेखक सिर्फ पुलिस विभाग के नज़रिए से नहीं देखते वरन पूरे भारतीय समाज के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं। उन्हें भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के पीछे दो मुख्य कारण नज़र आते हैं। पहला तो हमारा अपना आंतरिक विष, अपनी निजी मुक्ति की चाह जिसने हमारे समाज को स्वार्थपरक बना दिया है। दूसरा बाहर से आया संक्रमण भोगवाद जिसने धन लोलुपता को हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बना दिया है। पांडे जी इस समस्या से लड़ने के लिए प्रशिक्षण संस्था की विशेष भूमिका देखते हैं। उनका कहना है कि प्रशिक्षार्थियों को हर कदम पर इस बारे में सजग और सचेत किया जाना आवश्यक है। पर सही मार्ग को पहचानना और उस पर चलना तो आखिर प्रशिक्षार्थी का काम है।

पांडे जी ने अपनी इस किताब में एक पुलिस अफसर की सर्विस लाइफ में आने वाले तकरीबन हर मसले को छुआ है। सीनियर अफसरों में व्यावसायिक प्रवीणता के आभाव, स्टाफ वर्क में कोताही, आई ए एस और आई पी एस कैडर के बीच का मन मुटाव, स्थानीय दादाओं के राजनैतिक संरक्षण, वी आई पी सुरक्षा, पुलिसिया इनकांउटर ऐसे कई मुद्दों को उन्होंने अपनी पुस्तक में विस्तार दिया है। वे ये बताना भी नहीं भूले हैं कि किन परिस्थितियों में कुछ ना करने का कमाल दिखलाना चाहिए।

मिसाल के तौर पर उन्होंने रेलवे एम्बैंकमेंट से एक गाँव के किसानों की फ़सल के डूबने का उदाहरण दिया है। रेलवे से सरकार तक सभी एम्बैंकमेंट तोड़ कर वहाँ पानी के सही बहाव के लिए पुलिया बनाने के पक्ष में थे पर फाइलों में काम सालों साल रुका था। बाद में क्षेत्र के नौजवान नेता की अगुआई में लोगों द्वारा एम्बैंकमेंट काट डाला गया ‌और साथ ही कलेक्टर और स्टेशन पर सूचना भिजवाई गई। ऊपर ऊपर कलक्टर और एस पी ने इस घटना पर वहाँ के थानेदार को खूब हड़काया पर अंदर अंदर ये भी बता दिया गया कि इस मसले पर ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है आखिर इस तथ्य को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है कि जो पुलिया वहाँ वर्षों पहले बन जानी चाहिए वो इस कृत्य की वज़ह से आनन फानन में बन गई ।

सीनियर अफ़सरों और राज्य के राजनीतिक आकाओं के गलत मौखिक आदेशों की अवहेलना किस तरह टैक्ट दिखा कर की जाए इसके बारे में भी लेखक ने कुछ रोचक उदाहरण अपनी इस किताब में बताए हैं। यानि 'बेहतर है जनाब' या 'जैसा आप कहते हैं वही होगा' जैसे ज़ुमले उछाल कर भी करिए वही जिसके लिए आपका दिल गवाही दे सके। पांडे जी आज़ादी के बाद फोर्स पर लागू पुरातन नियम व कानून में सुधार की मंथर गति से बेहद क्षुब्ध हैं और ये मानते हैं कि उसके वर्तमान स्वरूप से विकास की नई आकांक्षांओं को पर्याप्त संबल नहीं मिलता। पर आज के अफसरों को सिनिकल होने के बजाए शेक्सपीयर की भाषा में हिम्मत बँधाते हुए लेखक कहते हैं

प्यारे ब्रूटस, दोष क़ायदों का नहीं है हमारा है कि हम उनके पिट्ठू बने रहते हैं। वैसे हमारे सीनियर्स ने ठीक ही तो कहा है कि कोई क़ायदा ऍसा नहीं जिसे तोड़ा ना जा सके।

लेखक की एक और जायज़ चिंता है और वो है राजनेताओं द्वारा पुलिस को साफ और स्पष्ट आदेश देने से बचने की मानसिकता। इस सिलसिले में पांडे जी द्वारा लिखित इस प्रसंग का उल्लेख करना वाज़िब रहेगा। आज़ादी के बाद देश में पुलसिया फायरिंग को कम करने की मुहिम चली। सचिवालय में उन सारे हालातों को चिन्हित किया गया जिनमें गोली चलाना अंतिम हल माना गया। पूरा मसौदा मुख्यमंत्री के अनुमोदन के लिए भेजा गया। पांडे जी लिखते हैं
मसौदे में ऍसा कुछ लिखा था कि पुलिस 'जब ज़रूरी हो गोली चला सकती है'। मुख्यमंत्री ने बस एक शब्द बदल कर उस मसौदे की काया पलट दी। अब उसमें हिदायत थी कि पुलिस 'अगर ज़रूरी हो गोली चला सकती है'। तो ये हुआ साहब लिखा पढ़ी का, मुंशी-गिरि का कमाल। यानि ऊपर की हिदायतें ऍसीं गठी हुईं हों कि सारी जिम्मेवारी उन्हें देने वाले की नहीं, उनका पालन करने वालों की हो। इतना ही नहीं देने वाली सत्ता अपनी सुविधानुसार उनकी जैसी चाहे वैसी व्याख्या भी कर सके।

ऐसे आदेशों का ज़मीनी परिस्थितियों पर असर शून्य ही होता है। बहुत कुछ अकबर इलाहाबादी के इस मज़मूं की तरह

मेरी उम्मीद तरक्क़ी की हुईं सब पाएमाल *
बीज मगरिब** ने जो बोया वह उगा और फल गया
बूट डासन ने बनाया हमने एक मजमूं लिखा
मुल्क में मज़मूं ना फैला उल्टे जूता चल गया।

* चकनाचूर , **पश्चिमी

सतीश चंद्र पांडे की इस किताब की चर्चा के आखिरी भाग में फिर उपस्थित हूँगा पुलिस, सी.आर.पी.एफ.(CRPF) से संबंधित कुछ और मसलों और किस्सों को लेकर..


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


Saturday, September 05, 2009

दौरान ए तफ़तीश : भाग 1 - पुलिसिया तंत्र के बारे में लिखा एक पुलिसवाले का ईमानदार संस्मरण

पुलिसिया जिंदगी को कभी नज़दीक से देखने का अवसर नहीं मिला। बचपन में अपने हमउम्रों की तरह चोर सिपाही जैसे खेल खेले। कागज़ के टुकड़ों को अच्छी तरह चौकोर लपेट कर घर के बाकी सदस्यों के साथ राजा मंत्री चोर सिपाही भी बहुत खेला। खेल के दौरान राजा या मंत्री आता तो बेहद खुशी होती पर सिपाही आता तो बस इतना भर सुकून होता कि चोर आने से बच गया। यानि राजा मंत्री एक तरफ़ और चोर और उससे थोड़ा बेहतर सिपाही एक तरफ़। आज सोचता हूँ खेल खेल में आने वाले वे भाव आज आम समाज में एक पुलिसवाले की छवि से कितने मेल खाते हैं। क्या हमारी सोच ये नहीं रहती कि जहाँ तक हो सके पुलिस के चक्कर से बचा रहा जाए? अपनी रक्षा के लिए उनके पास पहुँचने के लिए क्या पहले ये नहीं सोचना पड़ता कि दान दक्षिणा कितनी देनी होंगी ?

पर ये भी सही हे किसी सिस्टम की निंदा करना या उसकी कमजोरियों को गिनाना ज़्यादा आसान है वनिस्पत कि उसकी तह में घुसकर उसके उद्धार के उपायों के बारे में सोचना। अब हम और आप जैसे लोग ये आकलन करना भी चाहें तो मुश्किल है क्यूँकि बिना उस सिस्टम से गुज़रे उसकी ख़ामियाँ को सही सही समझना सरल नहीं है।




इसलिए जब पुलिस की नौकरी के बारे में एक पुलिस वाले की किताब दिखी तो उसे पढ़ने की सहज उत्सुकता मन में जागी। ये किताब थी सतीश चंद्र पांडे की लिखी दौरान -ए- तफ़तीश। तो इससे पहले इस पुस्तक की विस्तार से चर्चा करूँ, पहले कुछ बातें सतीश चंद्र पांडे जी के बारे में। पांडे जी 1953 में आई पी एस में चुने गए और उत्तर प्रदेश काडर में नियुक्त हुए। छह जि़लों में पुलिस का बुनियादी काम करने के आलावा वे 1985 के विख्यात विधानसभा चुनावों के समय पंजाब के डीजीपी और फिर सीआरपीएफ के डीजी बनाए गए।

पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित पांडे जी ने 276 पृष्ठों की इस किताब के 24 अध्यायों में पुलिसिया नौकरी से जुड़े विविध पहलुओं और उनसे जुड़े अपने संस्मरणों को बाँटा है। यूँ तो पांडे जी ने जिन मसलों को उठाया है उनमें से सब की चर्चा कर पाना यहाँ संभव नहीं होगा पर उनकी लिखी जिन बातों और किस्सों ने मुझे प्रभावित किया उसका जिक्र जरूर करना चाहूँगा। अपनी शुरुआती दौर में उस्तादों द्वारा दी जाने वाली कड़ी ट्रेनिंग को वो सही ठहराते हैं। उनका मानना है कि वो सख्ती भले उस समय किसी भी नवांगुतक के लिए नागवार गुजरती हो पर बाद में वही बेहद फायदेमंद महसूस होती है। पर जब वो आज के हालात देखते हैं तो पाते हैं कि ना केवल पुलिस में बल्कि सारे सहकारी महक़मे में इस कड़ाई में कमी आती दिख रही है। इसीलिए वे लिखते हैं
काम के वक्त सख्ती वाले उसूल का लगता है आजादी के बाद निरंतर ह्रास होता जा रहा है। किसी भी सरकारी दफ़्तर में जाइए, वी आई पी की तरह नहीं बल्कि भारत के नागरिक की तरह तो वहाँ के वातावरण को देखकर यह नहीं लगेगा कि आप ऍसी जगह आए हैं जिसे सार्वजनिक सेवा के लिए क़ायम रखने में मेहनत करने और टैक्स देने वाले नागरिकों का अमूल्य धन , लाखों करोड़ों, खर्च होता है। उल्टे ऐसा महसूस होगा कि आप किसी पिकनिक स्थल पर आ गए हैं जहाँ लोग खुशगप्पियाँ कर रहे हैं। एक दूसरे की बीमारी, शादी ब्याह, नाती पोतों की बातें हो रही हैं...
अपनी नौकरी की शुरुआत में ही पांडे जी को पुलिस विभाग की पहली कुप्रथा से रूबरू होना पड़ा वो थी 'झूठी गवाही' जिसकी तुलना उन्होंने विषैली घास की जड़ से की है। पांडे जी बताते हैं कि झूठे केसों की बात छोड़ दें तो हालत ये है कि सच्चे केस भी बिना झूठे गवाहों के जीते नहीं जा पाते। साथ ही ये प्रथा एक ऍसे कुचक्र को जन्म देती है जिससे किसी भी पुलिस तंत्र को अपने से अलग करना मुश्किल होता है। लेखक इसकी विवेचना करते हुए लिखते हैं
झूठी गवाही के लिए पुलिस को दलाल पालने पड़ते हैं। दलाल लोग ये काम प्यार मोहब्बत के लिए तो करेंगे नहीं। उन्हें या तो पैसा दीजिए या पैसा पैदा करने की छूट दीजिए। दूसरा वाला तरीका ज़ाहिर है सुविधाजनक है। इसलिए वही अपनाया जाता है। नतीज़ा जुर्मों की तफत़ीश की प्रक्रिया के लिए जुर्मों को बढ़ावा देना।
इस भयंकर कुचक्र को तोड़ने के लिए पुलिस और न्यायपालिका दोनों में ही जिस व्यक्तिगत निर्भीकता और उच्चतर प्रशासनिक स्तर पर नीतिपरक ईमानदारी और साहस की जरूरत है वो लेखक को मौज़ूदा पद्धति में नज़र नहीं आती। पांडे जी ने झूठी गवाही के बाद पुलिसिया डंडे और थर्ड डिग्री में अपनाए जाने वाले तौर तरीक़ो का जिक्र किया है। पांडे जी का इस बाबत पुलिसिया मनोविज्ञान पर निष्कर्ष ये है कि
थर्ड डिग्री के इस्तेमाल के लिए पुलिस का भीतरी और बाहरी निहित स्वार्थ होता है। भीतरी स्वार्थ अपनी मेहनत बचाने, अपनी जेब गर्म करने और अर्ध सत्य वाली लाइन, पर अपनी भड़ास निकालने पर आधारित होते हैं और बाहरी वाले राजनीतिक, सामाजिक और विभागीय दख़लंदाजी पर। इन दोनों ही स्वार्थों के प्रभावों से अपने को ना बचा पाने का अवश्यंभावी परिणाम है भागलपुर या उससे भी गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण, पंजाब।
पुलसिया नौकरी पर लिखी ये किताब का एक अहम हिस्सा कार्यालयी जिंदगी के मज़ेदार किस्से हैं जिसमें अधिकतर को पांडे जी ने अपने हर प्रमुख बिंदु को रेखांकित करने के पहले सुनाया है पर कुछ किस्से यूँ ही उनके संस्मरणों मे से निकल कर आए हैं जिन्हें पढ़कर आप हँसते हँसते लोटपोट हो जाएँगे ।

ये पुस्तक चर्चा तो कई भागों में चलेगी पर आज चलते चलते पांडे जी की यादों से निकले अंग्रेजों के ज़माने के इस खुर्राट तहसीलदार का किस्सा सुनते जाइए जो हर स्थिति में कठिन से कठिन सवाल का जवाब गोल मोल तरीके से देने के लिए मशहूर थे। तो हुआ यूँ कि ...

एक बार एक नए अंग्रेज कलेक्टर साहब उन्हें पड़ताल के लिए घोड़े पर ले गए। थकान से चूर तहसीलदार साहब अपने इलाके की जो थोड़ी बहुत जानकारी रखते थे वो भी भूल गए। आपके यहाँ गेहूँ की पैदावार कितनी होती है, कलेक्टर ने पूछा तो उन्होंने कहा कि हुज़ूर हो जाती है अच्छी ख़ासी, कोई अकाल तो पड़ता नहीं । लेकिन ये भी नहीं कि दोआबा की तरह बढ़िया फ़सल हो। फिर पूछा गया कि बारिश कितनी होती है आपकी तहसील में तो जवाब मिला कि ऍसा तो नहीं है कि चेरापूँजी की तरह पानी बरसता हो। लेकिन ऍसा भी नहीं कि राजस्थान के माफ़िक सूखा पड़े। ऍसे ही करते करते आखिर कलेक्टर ने उनसे ये पूछा कि जो एक दो नदियाँ हैं वे किस दिशा से किस दिशा में बहती हैं? तहसीलदार को मालूम हो तो बताएँ। ऍसा है हुजूर, उन्होंने थोड़ा सोचकर कहा कहीं तो पूरब से पश्चिम को बहती है तो कहीं उत्तर से दक्खन को। असलियत ये है कि कमबख्त खुल कर नहीं बहती...

पुलसिया नौकरी से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं की चर्चा करेंगे इस पुस्तक चर्चा के दूसरे भाग में...



इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


Tuesday, September 01, 2009

तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक : गुलज़ार की नज्म नाना पाटेकर के स्वर में..

दो साल पहले एक दौरे पर दुर्गापुर गया था। साथ में कोई सहकर्मी ना होने के कारण दफ़्तर से वापस आकर शामें गुजारना काफी मुश्किल हो रहा था। ऐसी ही एक खाली शाम को कोई और विकल्प ना रहने की वज़ह से एक फिल्म देखनी पड़ी थी 'दस कहानियाँ'

दुर्गापुर के नए मल्टीप्लेक्स में हॉल में उस रात मेरे साथ मात्र सात आठ दर्शक रहे होंगे। दस अलग अलग कहानियों को एक ही साथ प्रस्तुत करने के इस अनूठे प्रयोग के लिए कहानियों के चुनाव में निर्देशक को जो सतर्कता बरतनी चाहिए थी, वो नहीं की गई।

सो दस कहानियों में तीन चार को छोड़कर बाकी किसी गत की नहीं थी। खैर अब नब्बे रुपये खर्च किए थे तो मैं फिल्म को झेलने के लिए मज़बूर था, पर कमाल की बात ये देखी कि मेरी पंक्ति में एक सज्जन आए और पहली कहानी को आधा देखने के बाद ऍसा सोए कि सीधे फिल्म खत्म होने के बाद चुपचाप उठे और चल दिये। मैंने मन ही मन सोचा कि जरूर ये बंदा अपनी घरवाली से त्रस्त होगा वर्ना एक मीठी नींद के लिए इतना खर्चा करने की क्या जरूरत थी।

खैर फिल्म में गीत भी दमदार नहीं थे। बाद में एक दिन नेट पर विचरण कर रहा था तो ये पता लगा कि गुलज़ार साहब ने इसकी दस कहानियों की स्क्रिप्ट पढ़कर हर कहानी पर एक नज़्म तैयार की है जिसे फिल्म के अलग अलग कलाकारों ने अपनी आवाज़ में पढ़ा है।

दस कहानियों के गीतों के साथ ही निकला एलबम तो मुझे जल्द ही मिल गया पर मुझे अचरज इस बात का हुआ कि फिल्म में इन बेहतरीन नज़्मों को किसलिए इस्तेमाल नहीं किया गया। शायद समय की कमी एक वज़ह रही हो। इस चिट्ठे पर इस एलबम की अपनी चार पसंदीदा नज़्मों में से तीन तो आपको सुना चुका हूँ। तो आइए करें कुछ बातें 'गुब्बारे' कहानी पर केंद्रित गुलज़ार की इस चौथी नज़्म के बारे में जिसे अपना स्वर दिया है नाना पाटेकर ने ।



पुराने दिन, पुरानी यादें किसी भी कवि मन की महत्त्वपूर्ण खुराक़ होती है। बीते हुए लमहों में हुई हर इक छोटी बड़ी बात को याद रखना तो शायद हम में से कइयों का प्रिय शगल होगा। पर उन बातों को शब्दों के कैनवास पर बखूबी उतार पाना कि वो सीधे दिल को बिंधती चली जाए गुलज़ार के ही बस की बात है। नाना जब अपनी गहरी आवाज़ में बस इतना सा कहते हैं

तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी


तो हमारी अपनी पुरानी यादों के कुछ बंद दरवाजे तो अनायास खुल ही जाते हैं। गुलज़ार का ये अंदाज़ भी दिल को करीब से छू जाता है

गिलहरियों को बुलाकर खिलाता हूँ बिस्कुट
गिलहरियाँ मुझे शक़ की नज़रों से देखती हैं
वो तेरे हाथों का मस्स जानती होंगी...


तो सुनें नाना पाटेकर की आवाज़ में ये नज़्म



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दरअसल नज़्मों को पढ़ना भी एक कला से कम नहीं है गुलज़ार को जितना पढ़ना पसंद आता है उतना ही उन्हें सुनना। यही खासियत अमिताभ जी में भी है। वैसे कुछ शब्दों के उच्चारण को अगर नज़रअंदाज कर दें तो नाना पाटेकर ने भी नज़्म की भावनाओं को आत्मसात कर इसे पढ़ा है।
तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी

इलायची के बहुत पास रखे पत्थर पर
ज़रा सी जल्दी सरक आया करती है छाँव
ज़रा सा और घना हो गया है वो पौधा
मैं थोड़ा थोड़ा वो गमला हटाता रहता हूँ
फकीरा अब भी वहीं मेरी कॉफी देता है
गिलहरियों को बुलाकर खिलाता हूँ बिस्कुट
गिलहरियाँ मुझे शक़ की नज़रों से देखती हैं
वो तेरे हाथों का मस्स जानती होंगी...

कभी कभी जब उतरती हैं चील शाम की छत से
थकी थकी सी ज़रा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी
मसुंदे के पौधों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा पिघलता जाए विहस्की में
मैं स्कार्फ ..... गले से उतार देता हूँ
तेरे उतारे हुए दिन पहन कर अब भी मैं तेरी महक में कई रोज़ काट देता हूँ

तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी....


इस एलबम की अन्य पसंदीदा नज़्में..

 

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