Monday, October 26, 2009

दुष्यन्त कुमार की एक प्रेरणादायक ग़ज़ल : रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख ..

वीर रस की कविताएँ तो बचपन से ही पढ़ते सुनते आए हैं। दिनकर व सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कवि कवयित्रियों की रचनाएँ छुटपन से ही हमारी शिराओं में रक़्त प्रवाह को तेज कर देती थीं।

पर ये बताइए कि कितनी ग़ज़लों को पढ़ने के बाद भी वैसे ही अहसासात से आप रूबरू हुए हैं। निश्चय ही अपेक्षाकृत ये संख्या कम रही होगी। ग़ज़लें अपने स्वाभाव से ही कोमल भावनाओं को समाहित करती चलती हैं पर जैसा हम सभी जानते हैं कि कई ग़ज़लकारों ने बदलते वक़्त और माहौल के साथ इनमें अलग अलग रंग भरने की कोशिश की है। फ़ैज की कई नज़्में इसी श्रेणी की रही हैं पर जब ग़ज़लों के बारे में सोचता हूँ तो मेरे ज़हन में दुष्यन्त कुमार जी की कई ग़ज़लें एक साथ उभर कर सामने आती हैं।

भारत में हिंदी ग़ज़लों के जनक कहे जाने वाले दुष्यन्त कुमार की ऍसी ही एक ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ। ये ग़ज़ल हमें उत्प्रेरित करती है इस बात के लिए कि किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए, दूसरों की तरफ़ आशा भरी नज़रों से देखने के बजाए ख़ुद कुछ करने की ललक होनी चाहिए। दुष्यन्त जी ने इस ग़ज़ल के हर शेर में विभिन्न रूपकों की मदद से इस बात को पुरज़ोर ढंग से रखा है।

दुष्यन्त जी को कभी सुनने का अवसर नहीं मिला इस बात का मुझे हमेशा अफ़सोस रहा है। इस महान शायर की लिखी ये प्रेरणादायक पंक्तियाँ मेरे दिल पर क्या असर डालती हैं इसे व्यक्त करने का सबसे अच्छा ज़रिया यही है कि इसे मैं पढ़कर आप तक पहुँचाऊँ। तो ये रहा मेरा प्रयास..



आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख।

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख।

दिल को बहला ले, इजाज़त है, मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख।

ये धुँधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है
रोग़नों को देख, दीवारों में दीवारें न देख।

राख, कितनी राख है, चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख।


आशा है इसे सुनने के बाद ऍसी ही कुछ भावनाओं का संचार आपके दिल में भी हुआ होगा..

Wednesday, October 21, 2009

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए: फ़ैज़ के क़लाम पर रूना लैला का खनकता स्वर

दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसकी गहमागहमी में ब्लॉग की ओर भी रुख करने को जी नहीं चाहता। साल के इन दिनों में पुरानी स्मृतियों से गुजरना अच्छा लगता है। आप कहेंगे दीपावली से पुरानी स्मृतियों का क्या लेना देना? दरअसल जब भी घर की साफ सफाई में अपने आप को लगाता हूँ, कुछ पुराने ख़तों, तसवीरों,काग़ज़ातों और उनसे जुड़ी यादों से अपने आप को घिरा पाता हूँ। दीप से लेकर पटाखे जलाने तक में अपने बच्चे के साथ खुद भी बच्चा बनने की ख़्वाहिश रहती है मेरी। फिर भला एक बार नेट से दूर जाने पर ब्लॉग की बात भी क्यूँ याद आए?

पर अब तो दीपावली भी खत्म हो गई है। और शुक्र की बात है कि इस बार की दीपावली बिना किसी मानव निर्मित हादसे के बिना ही गुजर गई। पर मन अभी भी अनमना सा है। क्यूँ है ये अनमनापन पता नहीं। शायद छुट्टियों से लौट कर फिर दैनिक दिनचर्या से बँधने की खीज़ है या मन में अटका कोई बिना बात का फ़ितूर। दीपावली के पहले फ़ैज़ के एक क़लाम को ढूँढ कर रखा था तबियत से सुनने के लिए और आज वही कर भी रहा हूँ ...


और जब फैज़ की ग़ज़ल के कुछ अशआरों को रूना लैला की खनकती आवाज़ का सहारा हो तो ग़जल की तासीर ही कुछ और हो जाती है




आए कुछ अब्र1 कुछ शराब आए
उसके बाद आए जो अज़ाब2 आए

1-बादल, 2-मुसीबत

बाम-ए-मीना3 से महताब4 उतरे
दस्त-ए-साकी5 में आफ़ताब6 आए

3 - स्वर्ग की छत, 4- चाँदनी, 5 - साकी के हाथों में, 6 - सूर्य किरणें

हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो
सामने फिर वो बेनक़ाब आए


कर रहा था ग़म-ए-ज़हाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए


ना गई तेरे ग़म की सरदारी7
दिल में यूं रोज इनकिलाब आए

7 - तांडव, आतंक

इस तरह अपनी खामोशी गूँजी
गोया हर सिमत8 से जवाब आए

8 - तरफ़

फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए


ऐसी आवाज़..ऍसी कम्पोजीशन को सुने अब अर्सा बीत गया। वैसे पिछले महिने रूना जी म्यूजिक टुडे के विभिन्न अवसरों में गाए जाने वाले पंजाबी गीतों के इस एलबम के लिए दस साल बाद भारत की यात्रा पर आईं थीं। रूना जी ने उस दौरान दिए गए एक साक्षात्कार में बताया

मैंने जब गाना शुरु किया तो मैं बारह साल की भी नहीं थी। उस ज़माने की फिल्में परिवारोन्मुख सामाजिक परिवेश से जुड़ी होती थीं। ऍसा नहीं कि आज की फिल्में ऍसी नहीं हैं पर आजकल ध्यान स्टंट और सुंदर स्थलों पर की जाने वाली शूटिंग पर कहीं ज़्यादा है। उस ज़माने की बात करूँ तो संगीत बेहद अहम हिस्सा हुआ करता था फिल्मों का। उस वक़्त लोग संगीत सुनने के लिए फिल्म देखते थे। संगीत रिकार्डिंग एक सामाजिक उत्सव लगता था जहाँ सब अपने किरदारों को बिना थोड़ी सी गलती के निभाना अपना कर्तव्य समझते थे।
आज तो स्टूडिओ में आए पूछा गाना क्या है, अलग अलग पंक्तियाँ या कभी कभी तो शब्द गा दिए और हो गया जी गीत तैयार। ये बेहद आसान है पर मुझे लगता है कि ऍसा करते वक़्त उन भावनाओं को खो देते हैं जो पूरे गीत को एक साथ गाने में आती हैं।
बिल्कुल वाज़िब फर्माया रूना लैला जी ने ! वैसे मुझे तो लगता है कि आज भी लोग अच्छे संगीत की वज़ह से सिनेमा देखने जाना चाहते हैं। पर वैसा संगीत देने के लिए जिस मेहनत की जरूरत है उस मापदंड को साल में चार पाँच फिल्में ही पूरी तरह पैदा कर पाती हैं। अगर हमारे रूना लैला जैसे शैदाइयों की खुशकिस्मती रही तो हिंदी फिल्म जगत में भी रूना की आवाज़ को सुनने का मौका एक बार फिर मिल पाएगा।

Wednesday, October 14, 2009

'शादीशुदा मगर उपलब्ध' ....यानि 'Married But Available' !

शीर्षक पढ़ कर कहीं आपको ऍसा तो नहीं लगा कि आप खुद ही इस श्रेणी में आते हैं। वैसे कहीं आपको इस शीर्षक ने भ्रमित कर दिया हो तो बता दूँ कि ये अंग्रेजी की एक किताब का नाम है जिसे अभिजीत भादुरी (Abhijit Bhaduri) ने लिखा है। जबसे चेतन भगत की 'Five Point Someone' हिट हो गई है तब से एक नया ट्रेंड चल पड़ा है अपनी कॉलेज लॉइफ को पुस्तक के माध्यम से परोसने का।

किसी भी रेलवे प्लेटफार्म पर आपको इस तरह कि किताबें धड़्ल्ले से बिकती मिलेंगी। शीर्षक भी एक से एक मसालेदार ! मिसाल के तौर पर 'Offcourse I love you till I found someone better' या फिर 'Anything for You Maam' या ऐसा ही बहुत कुछ। ज्यादातर किताबों के आगे बेस्ट सेलर का टैग भी झाँकता मिलेगा। सफ़र में जब और कुछ करने को नहीं हो तो सौ से दो सौ रुपये तक मूल्य वाली ये किताबें समय का सदुपयोग ही लगती हैं।

किशोरों और युवाओं को ऍसी किताबें खासी आकर्षित कर रही हैं और उसके पीछे कई कारण हैं। पहली तो ये कि नए नवेले लेखक अपनी कहानी कहने के लिए ज्यादा कठिन भाषा या क्लिष्ट शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। कथानक में घटनाएँ तेजी से घटित होती रहती हैं और बीच बीच में आते घुमाव और तड़के में आपका समय सहजता से बीत जाता है। दूसरी ये कि कहीं ना कहीं इन किताबों में आपको वो बात नज़र आ जाती है जो आपने अपने कॉलेज के दिनों में खुद अनुभव की हो। Five Point Someone की सफलता का यही राज था।

अभिजीत भदुरी की पहली किताब Mediocre But Arrogant भी इसी श्रेणी की पुस्तक थी और काफी चर्चित भी हुई। फर्क सिर्फ इतना था कि किताब का परिदृश्य IIT Delhi की बजाए देश के नामी प्रबंधन संस्थान XLRI Jamshedpur का था।


वैसे तो भदुरी साहब ने अपनी स्नात्क की पढ़ाई दिल्ली के श्री राम कॉलेज आफ कामर्स से की पर मानव संसाधन में पीजी की डिग्री XLRI Jamshedpur से ली। अपनी पहली किताब में भदुरी ने XLRI Jamshedpur में दो साल की पढ़ाई से मूख्य पात्र अभय की जिंदगी और रिश्तों के स्वरूप में आए परिवर्तन को पुस्तक केंद्र बिंदु बनाया। उनकी दूसरी किताब पहली किताब की कहानी को आगे बढ़ाती है। यानि एक sequel के तौर पर इस बार उन्होंने कॉलेज की जिंदगी से निकल कर एक MBA के नौकरी के प्रथम दस सालों को अपनी पुस्तक की कथा वस्तु बनाया है।
हार्पर कालिंस द्वारा प्रकाशित, २८० पृष्ठों की ये किताब अभय (written as Abbey) की नौकरी, परिवार, प्रेमिका और पत्नी के बीच घूमती रहती है। पर इस उपन्यास की कहानी का शीर्षक से कोई लेना देना नहीं है। यानि ये किताब वैसे लोगों के बारे में हरगिज़ नहीं है जो शादी के बाद भी नए रिश्तों की तलाश में भटकते रहते हैं। पुस्तक की भूमिका में इसके नाम लिए हल्के फुल्के लहज़े में एक तर्क भी ढूँढा गया है। Mediocre But Arrogant (MBA) इसीलिए Married But Available (MBA)। पर सिर्फ MBA acronym को बरक़रार रखने के लिए ऍसे नामाकरण की बात गले नहीं उतरती। ये लेखक और प्रकाशक का पाठकों को आकर्षित करने का स्टंट भर है।

उपन्यास की बात करें तो अभिजीत ने अभय की कहानी ईमानदारी से कही है।
ये बात इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्यूँकि इस तरह की किताबों में मुख्य किरदार के चरित्र को बहुत कुछ पाठकों द्वारा लेखक की निजी जिंदगी से से जोड़ कर देखा जाता है। उपन्यास के प्रमुख पुरुष और स्त्री किरदारों में अहम की लड़ाई में किसी का पक्ष लेने से बचने में लेखक सफल रहे हैं। तेजी से ऊपर बढ़ने की चाह किस तरह रिश्तों के बीच के नेतिक मूल्यों को गर्त में ढकेल देती है इसे भदुरी सही तरीके से उभार पाए हैं। मानव संसाधन प्रबंधक के तौर पर कार्य करने में किस तरह की कार्यकुशलता चाहिए इस का भी अंदाज इस किताब को पढ़ने से लगता है।

पर कुल मिलाकर उनकी ये किताब बहुत कुछ उनकी पहली किताब के शीर्षक से मिलती जुलती नज़र आती है यानि Mediocre। इसलिए अगर आपका मानव संसाधन यानि Human Resources से दूर का भी नाता ना हो तो इस किताब से आप सहज दूरी बनाए रख सकते हैं।

आशा करता हूँ कि आप सबके लिए दीपावली का पर्व अपने परिवार के साथ सोल्लास बीतेगा और आप इस दौरान और आगे भी 'Married But Unavailable' रहेंगे। :)

Sunday, October 11, 2009

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया...अथर नफ़ीस के शब्द, फरीदा खानम की आवाज़ और उस्ताद नफ़ीस खान का सितार वादन !

पिछली पोस्ट में हम बात कर रहे थे शिक़वे और शिकायतों की जो रिश्तों की चमक बनाए रहते हैं। पर यही शिकायतें इस हद तक बढ़ जाएँ कि मामला प्रेम से विरह का रूप ले ले, तब कितने कठिन दौर से गुजरता है ये तनहा दिल! सच पूछिए तो जिंदगी बदमज़ा हो जाती है। कोई हँसी ठिठोली हमें बर्दाश्त नहीं होती। हम दूसरों से तो दूर भागते ही हैं अपनी यादों से भी पीछा छुड़ाने की कोशिश में लगे रहते हैं। पर कमबख़्त यादें नहीं जातीं। वो रहती हैं हमारे आस पास.... हमारे एकाकीपन के अहसास को और पुख्ता करने के लिए।

पाकिस्तानी शायर अथर नफ़ीस की मशहूर ग़ज़ल वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, में कुछ ऍसी ही भावनाओं की झलक मिलती है। अथर साहब ने शायद ज्यादा लिखा नहीं। उनकी निजी जिंदगी के बारे में तो पता नहीं पर अपनी डॉयरी में उनके लिखे कुछ अशआर हमेशा से दिल को छूते रहे हैं। मसलन ये शेर मुलाहज़ा फ़रमाइए
जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का है जिसमें अब जिंदा हूँ मैं

या फिर इसे ही देखिए
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं

और उनकी लिखी ये पंक्तियाँ भी मुझे पसंद हैं
टूट जाते हैं कभी मेरे किनारे मुझ में
डूब जाता है कभी मुझ में समंदर मेरा

तो आइए लौटते हैं अथर साहब की ग़ज़ल पर..

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई क़हर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या
क़हर - विपत्ति

जो मेरी प्रेरणा, मेरी भावनाओं की स्रोत थी जब वो ही मुझसे रूठ कर चली गई फिर उसके बारे में बातें करने से क्या फ़ायदा। उसके जाने से ज्यादा बड़ी आफ़त कौन सी आ गई जो इस बुझे दिल में सच्चे अशआरों की रवानी भर दे! मुझे अपने वियोग के साथ कुछ पल तो एकांत में जीने दीजिए। एक बार जिस ग़म को पी लिया उसे सब के सामने दोहरा कर बेमतलब तूल देना मेरे दिल को गवारा नहीं है।

एक हिज़्र जो हमको लाहक़ है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या
हिज्र -वियोग, लाहक़- मिला हुआ, नाज़ - नखरे

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या

आप कहते हैं सँभालो अपने दिल को? सवाल तो ये है कि किस किस को सँभाले ? अब तो इस जिस्म का कोई भी हिस्सा उसकी तड़प से अछूता नहीं रह गया है। ठीक है दोस्त कि हमने भी जिंदगी में चंद हसीन ख़्वाब देखे हैं..इस महफिल में कुछ ग़ज़लें गाई हैं पर वो तब की बात थी। आज इस उदासी, इस तन्हाई के आलम में मुझसे कुछ सुनने की उम्मीद आप कैसे रख सकते हैं। इस व्यथित हृदय में तो अब सपनों के लिए भी कोई जगह नहीं बची।

हम नग़्मासरा कुछ गज़लों कें, हम सूरतगर कुछ ख्वाबों के,
बेजज़्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख़्वाब न हों तो बताएँ क्या
नग़्मासरा - गायक

इस ग़ज़ल को इतनी मक़बूलियत दिलाने में जितना अथर नफ़ीस का हाथ है उतना ही श्रेय पाकिस्तान की मशहूर ग़ज़ल गायिका फरीदा खानम को भी मिलना चाहिए। फरीदा जी की गायिकी से तो आप सब वाकिफ़ ही हैं। फ़रीदा जी की आवाज, का लुत्फ उठाइए और फिर...




और फिर होठों पर वही ग़ज़ल गुनगुनाइए सितार पर इसकी धुन के साथ जिसे बजाया है उस्ताद नफ़ीस अहमद खाँ ने। नफ़ीस प्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद फतेह अली खाँ के सुपुत्र हैं। हो गया ना मज़ा दोगुना...


Wednesday, October 07, 2009

कोई शिक़वा भी नहीं.... और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं

प्यार भी एक अजीब सी फ़ितरत है। पहले तो किसी का दिल जीतने के लिए मशक्क़त कीजिए । और अगर वो मिल गया तो भी चैन कहाँ है जनाब ! उसे खोने का डर भी तो साथ चला आता है। और तो और परिस्थितियाँ बदलती रहें तो भी हमारे साथी की हमसे उम्मीद रहती है कि प्यार की तपिश बनी रहे। और गर आप साथी के खयालतों की सुध लेने से चूके तो फिर ये उलाहना मिलते देर नहीं कि तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं !

पर ये भी है कि बिना शिक़वे, शिकायतों और मनुहारों जैसे टॉनिकों के प्रेम का रंग फीका रह जाता है। इसलिए रिश्तों की खामोशी भी मन में शक़ और बेचैनी पैदा कर देती है । ऐसी ही कुछ शिकायतें लिए एक प्यारा सा नग्मा आया था १९६६ में प्रदर्शित फिल्म 'नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे' में। रूमानियत में डूबे इस गीत को लिखा था राजेंद्र कृष्ण साहब ने और इस गीत की धुन बनाई थी मदन मोहन ने। गीतकार राजेंद्र के बोलों में वो कशिश थी कि कितने भी नाराज़ हमराही की मुस्कान को वापस लौटा लाए। बस जरूरत थी एक मधुर धुन और माधुर्य भरी आवाज़ की। और इस जरूरत को भली भांति पूरा किया मदनमोहन और आशा ताई की जोड़ी ने..

ये गीत वैसे गीतों में शुमार होता है जो बिना किसी वाद्य यंत्र के भी सुने जाएँ तो भी दिल को छूते से जाते हैं.. तो अगर आप भी शिकायती मूड में हैं तो बस अपने मीत के पास जाकर यही गीत गुनगुना दीजिए ना..



कोई शिक़वा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

ये खामोशी, ये निगाहों में उदासी क्यूँ है?
पा के सब कुछ भी मोहब्बत अभी प्यासी क्यूँ है?
राज- ए- दिल हम भी सुनें इतनी इनायत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

प्यार के वादे वफ़ा होने के दिन आए हैं
ये ना समझाओ खफ़ा होने के दिन आए हैं
रूठ जाओगे तो कुछ दूर क़यामत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....

हम वही अपनी वफ़ा अपनी मोहब्बत है वही
तुम जहाँ बैठ गए अपनी तो जन्नत है वही
और दुनिया में किसी चीज की चाहत भी नहीं
और तुम्हें हम से वो पहली सी मोहब्बत भी नहीं
कोई शिक़वा भी नहीं....


 

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