Saturday, April 03, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 सरताज गीत - क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले, इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले ..

तीन महिनों के इस सफ़र को पूरा करते हुए वक़्त आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला 2009 के सरताजी बिगुल के बजने का। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पाँचों गीत का आपसी फ़ासला बेहद मामूली था। साल के सरताज गीत के आसन पर मैंने उस गीत को बैठाया जो मेरे दिल को अपेक्षाकृत ज्यादा करीब से छू गया।

वैसे ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा कि मेरे सबसे चहेते गीतकार और प्रिय संगीतकार के होते हुए भी, संगीतमाला की पहली पॉयदान पर पिछले छः सालों पर पहली बार इस गीतकार-संगीतकार की जोड़ी का कब्जा हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2006 में इस जोड़ी ने तीसरी पॉयदान तक का सफ़र तय किया था।

तो कौन है वो जोड़ी? गीतकार का नाम तो आप समझ ही गए होंगे जी हाँ वही हरदिलअज़ीज़ गुलज़ार साहब (जिन्हें इस चिट्ठे पर पिछले महिने कराए गए चुनाव में सबसे ज्यादा मत आप लोगों ने दिए हैं) और चोटी पर खड़े इस गीत में उनका साथ दे रहे गायक व संगीतकार विशाल भारद्वाज। फिल्म कमीने का ये गीत जब मैंने पहली बार सुना था तो मैं इसकी गिरफ़्त में आ गया था। पर आखिर क्या बात है इस गीत में?

जीवन में अपने लक्ष्यों को पूरा करने में मिली सफलताओं का श्रेय हम अक्सर अपनी मेहनत और लगन को देते हैं और वहीं जब विफलताएँ हमारा रास्ता काटती हैं तो सारा दोषारोपण अपनी फूटी किस्मत और अपने आसपास के लोगों के मत्थे मढ़ देते हैं।

पर ये धोखा अपने आप को कोई शख़्स कब तक देता रहेगा? फुर्सत के उन एकाकी लमहों में जब हम अपने आत्मावलोकन के लिए मजबूर होते हैं तब हमें लगता हैं कि ख़ुद हमारे चुने रास्ते, हमारी छिछली सोच और हमारे कर्म भी इन हालातों के लिए कम जिम्मेवार नहीं। दरअसल ज़िंदगी के इतने विस्तृत कैनवास में हमारा मन कितनी बार कमीनेपन की इन हदों को पार करता है इसका अंदाज़ा समय रहते हम कई बार नहीं लगा पाते।

हमारे इसी मन का खाका खींचती, साथी चिट्ठाकार विश्व दीपक 'तनहा' की इन पंक्तियों पर ज़रा गौर करें जो उन्होंने हाल फिलहाल में कही हैं..

"....यह जो मेरा अगम-अगोचर-
अलसाया-सा अद्भुत मन है.......

मुझे संवारे, मुझे निखारे
मुझको मेरा सच बतला दे
ऐसा कहाँ कोई दर्पण है..

और क्या कहूँ,
यही बहुत है..
मुझे जानने वाले कहते
कभी राम
तो कभी विभीषण
और कभी मुझमें रावण है..
...."

गुलज़ार साहब ने हर व्यक्ति में अपने मन और कर्मों को टटोलने के लिए चलते इस मौन वार्तालाप को इस गीत में इस संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है कि आप इन शब्दों को सुनकर एकबारगी सोचने पर मजबूर जरूर हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर गीत के मुखड़े पर गौर करें

क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले
इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले
रात दिन गिले...
मेरी आरज़ू कमीनी, मेरे ख्वाब भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने......


क्या ये सच नहीं कि ज़िंदगी से हमारी अपेक्षाएँ अपने कर्मों के प्रतिफल से कहीं आगे चली जाती हैं? एक सफलता मिली नहीं कि दूसरी के पीछे भागना शुरु। इंसान की इसी मनोवृति को गुलज़ार साहब, अपने चिरपरिचित बिंबों के आइने में कुछ यूँ पेश करते हैं...

कभी ज़िंदगी से माँगा
पिंजरे में चाँद ला दो
कभी लालटेन ले के
कहा आसमाँ पे टाँगो

जीने के सब करीने
थे हमेशा से कमीने
कमीने...कमीने..कमीने
मेरी दास्तां कमीनी

मेरे रास्ते कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने

और चूँकि हम ऐसे हैं तो अपने दोस्तों और अपने समाज से क्या उम्मीद रखें...

जिसका भी चेहरा छीला
अन्दर से और निकला
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने





विशाल भारद्वाज ने गीत के कैफ़ियत के हिसाब से संगीत रचना तो की ही है, साथ ही फिल्म के इस सबसे बेहतरीन गीत को गाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए हैं। पर कुल मिलाकर मुझे लगता है कि आज के इस युग में हम, आप यानि कि हम सभी इस गीत को अपनी अपनी ज़िंदगी से जोड़ के देख सकते हैं। ये गीत हमें अपने अंदर झाँकने और अपना मूल्यांकन करने पर मजबूर करता है।

इस गीत से ना मुझे बेहद प्यार है बल्कि गुलज़ार स्वयम् इसे कमीने की बेहतरीन रचना मानते हैं। गीत में 'कमीने' शब्द के प्रयोग के बारे में गुलज़ार कहते हैं

हम अपने जीवन में कमीने शब्द का प्रयोग बतौर गाली के कम और एक अपनत्व से दी हुई झिड़की के तौर पर ज्यादा करते हैं। मुझे तो ओम पुरी की बात याद पड़ती है जिसने मेरे यहाँ अपना पसंदीदा नाश्ता करने के बाद ये कहा कि आपने मुझे आज एक बार भी 'कमीना' नही कहा। मेरी समझ से तो कमीना कहना किसी के कंधे पर आत्मीयता से थपथपाने या फिर हल्की सा मूक चपत लगाने जैसा है जो ये इंगित करता है कि ये चपत भी इसलिए है कि मुझे अभी भी तुम्हारी फिक्र है।
गुलज़ार, विशाल के संगीत में वही चमक पाते हैं जो एक ज़माने में उन्होंने पंचम के साथ काम करते हुए महसूस की थी। खुशी तो तब हुई जब इस गीत के बारे में मेरी भावनाएँ गुलज़ार के एक साक्षात्कार में प्रतिध्वनित हुई। अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में गुलज़ार ने कहा

जब भी मैं विशाल के साथ काम करता हूँ हम दोनों मिल कर हिंदी फिल्म संगीत के नए आयामों को तलाशने की कोशिश करते हैं। कमीने में भी मैंने कुछ नया लिखने की कोशिश की है। इतना स्पष्ट कर दूँ की 'धन ता नान' मेरा इस फिल्म का पसंदीदा गीत नहीं है। ये अलग बात है कि आजकल तेज रिदम पर आधारित गीत ही ज्यादा चलते हैं। मुझे तो विशाल का गाया हुआ फिल्म का शीर्षक गीत ही सबसे प्यारा लगता है क्यूँकि वहाँ मैंने जिन शब्दों का चयन किया है उन्हें सुनकर श्रोताओं के मन में एक सोच तो पैदा होगी ही। पर ये भी है कि आजकल शब्दों को ध्यान से सुनता कौन है?
दिल की बात कह दी गुलज़ार साहब ने...

वार्षिक संगीतमालाओं के माध्यम से आज के संगीत में जो कुछ सुनने और चर्चा करने योग्य हो रहा है उसे आप तक पहुँचाने की कोशिश करता रहा हूँ। वर्ष 2004 से लेकर आज 2009 तक वार्षिक संगीतमालाओं के छः अंक हो चुके हैं। मुझे विश्वास है कि वार्षिक संगीतमाला 2009 में पिछले तीन महिनों में प्रस्तुत गीतों ने संगीत, गायिकी और बोलों की दृष्टि से आपका मन जीता होगा। यक़ीन मानिए साल के ये शुरु के तीन महिने ब्लागिंग की दृष्टि से मेरे लिए बेहद श्रमसाध्य होते हैं। तीन महिनों के इस लंबे सफ़र को कायम रखने के लिए आपका प्रेम एक उत्प्रेरक के रूप में काम करता रहा है। शुरु से आखिर तक प्रस्तुत गीतों पर अपनी राय देने के लिए मैं रंजना जी, हिमांशु, प्रियंक जैन, सुशील, समीर जी, गौतम, अभिषेक, कंचन, अपूर्व, सागर, राज भाटिया व अन्य साथियों का हार्दिक आभारी हूँ ! इन्हीं शब्दों के साथ संगीतमाला की इस लंबी श्रृंखला का समापन करने की इज़ाजत दीजिए।

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18 comments:

अफ़लातून on April 03, 2010 said...

मनीष,
इस साल की गीतमाला की प्रस्तुति के लिए आभार। साल भर आपने कितना सुना होगा तब इतना चुन कर पेश किया । इस बार तो जो गीतमाला में आते आते रह गये उनका भी हवाला दिया। डिवशेयर पर पेश करने के लिए भी आभार कि कई गीत डाउनलोड कर सका ।

सुशील कुमार छौक्कर on April 03, 2010 said...

मनीष जी इस गाने के लिए हम भी बहुत छटपटाए थे और जिस दिन इसकी सीडी मिली थी बस घर वाले तंग हो गए थे। कुछ गीत होते ही ऐसे है। जो आपकी आत्मा तक पहुँच जाते है। और आदमी कितना सुखद महसूस करता है। खैर आपकी ही बदोलत ही हम कई गाने सुन पाए जिन्हें पहले नही सुना था और कई गाने अपनी पोटली में संजो कर रख पाए। बस यूँ ही आते रहिए और गुनगुनाते रहिए। और हाँ सच बातों को दौर उस दिन ज्यादा नही चला इसका हमें भी अफसोस है खैर अगली बार जब आऐगे तो खूब ........................

Vinay Jain on April 03, 2010 said...

Thanks for doing this series, Manish. I may not have commented in the past but I have read almost all of your articles. And I really enjoy your writing. Thanks and Kudos!
about an hour ago

Anjule Maurya on April 03, 2010 said...

mere ander bhi ak kamina chupa hai..jaldi hi iska pata chala usse ubarne ki koshish kar raha hun........

राज भाटिय़ा on April 03, 2010 said...

बहुत सुंदर, चलिये अब सुनते है इस गीत को भी

Udan Tashtari on April 03, 2010 said...

बेहतरीन रही गीतमाला...आनन्द आया पूरे सफर का. सभी चयन उत्कृष्ट रहे.

बहुत बहुत आभार इस श्रृंखला को लाने के लिए.

जितेन्द़ भगत on April 03, 2010 said...

काफी मेहनत से संजोया है आपने इस पोस्‍ट को।
आभार।

yunus on April 03, 2010 said...

मनीष ये श्रृंखला लगभग लगातार पढ़ी है । कुछ लेख छूटे होंगे तो उन्‍हें इस हफ्ते सुलटा लिया जाएगा । ये वाकई एक रेफरेन्‍स-मटेरियल बन गया है बहुत लोगों के लिए । तुम्‍हारी मेहनत बहुत सारी तारीफ और शाबाशियों की हक़दार है । लगे रहो....।

अपूर्व on April 03, 2010 said...

श्रंखला के पूरे सफ़र के दौरान की मेहनत और समर्पण नजर आता रहा है..और समापन पर आप दिल से शुक्रिया के हकदार हैं..गुलज़ार का यह ऐसा गीत है जिसके बोलों को तेज म्यूजिक तले दबाया नही गया है..बाकी यह गीत विशाल की गायन प्रतिभा को भी सामने लाता है..जिसकी तस्दीक उनके साथी कलाकारों, संगीतकारों ने भी की है..उम्मीद है कि आगे इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार की आवाज का जादू और मुक्त हो कर बिखरेगा..
विश्व दीपक जी के लिखे कुछ गीतों को जब-तब पढ़ने का मौका मिला है..और मुझे उम्मीद है कि वो एक गीतकार के तौर पर अपना मुकाम बनाने मे कामयाब रहेंगे..

AlokTheLight on April 04, 2010 said...

Really a kamina song.. which makes you to introspect.. Kudos.. :P
One of my favourite too.. :)

Am sorry couldn't comment on your other posts dis year.. but still am following your thoughts Sir.. Believe me.. :)

U P Singh on April 04, 2010 said...

Hats off to u for taking so much pains to bring the best songs of the year to us thanx.

गौतम राजरिशी on April 04, 2010 said...

uffff...finally!

i knew it.this song has to be at this place.jab pure geetmaalaa me kahi iska jikr nahi aaya tha tavi se lag rahaa tha.

aapki mehant, har geet ke shabdo ke detail me jaanaa, kuchh durlabh tasweere....hats off sir jee!

कंचन सिंह चौहान on April 04, 2010 said...

ये भी अच्छा संयोग था कि कई बार रिकमेंडेशन मिली इस गीत को सुनने की शब्द भी बताये गये, तो लगा कि गीत तो अच्छा है। मगर कभी बैठ कर सुना नही। शायद आज सुनना था इस गीत को।

एक बार फिर गुलज़ार साहब को नमन... क्या विचार आते हैं उनके ज़ेहन में और कैसे आ जाते हैं पता नही....!!

बार बार सुन रही हूँ...

हर शब्द बेहतरीन और प्रथम पायदान के लिये हर तरह योग्य....!

मेहनत भरे इस सफर को अंजाम तक लाने की बधाई।

Priyank Jain on April 04, 2010 said...

'Javed sahab' ne kamine ka geet sunkar kahin kaha tha ki aise shabd mere zehan me kyun nahi aate.

khair Gulzar sahab ki mahima ka kya kehna

"beh rahi thi dhara jo aviral
gantavy ko pahonchi wo durlabh

baith kar uske kinare jo bahe
aaj hain wo tript,bhar gai gaagar

tripti me chip abhilash ka swar
mil raha, ban raha nisseem sagar"

aapki mehnat ke liye hriday se dhanyawaad evam sangeetmala ke is sartaaj ank ke liye dher sari badhai.

रंजना on April 05, 2010 said...

आप जिस ढंग से विवेचना प्रस्तुत करते हैं,मेरे लिए वह अप्रतिम है....
सच कहूँ तो एक अनुपन नजरिया आप दे देते हैं,गीत संगीत को देखने सुनने गुनने का ....

चूँकि इतने सारे इंस्ट्रूमेंट के साथ लगभग शोर बन चुके संगीत के गीत को सुनने का धर्य अधिकांशतः नहीं रह पाता , तो बहुत कुछ नायब ऐसे ही बिना सुने गुजर जाता है....आभार है आपका, जो आपके कारण फिर से मन में यह धारणा बनने लगी है कि ,नहीं आज भी अच्छे गीत लिखे जाते हैं ,बस थोडा ध्यान देकर सुनना पड़ेगा...

गीत का साउंड फ़ाइल नहीं खुला...कृपया इसे मेल में भेज दीजिये न

अभिषेक ओझा on April 05, 2010 said...

No surprise... this song deserves the sartaj title !

हिमांशु । Himanshu on April 08, 2010 said...

जानता था सरताज गीत ऐसा ही कोई गीत होगा ! पूरी श्रृंखला के साथ-साथ चलना बेहतरीन अनुभव रहा ! सबसे बड़ी उपलब्धि आपका विश्लेषण है..जिसकी प्रतीक्षा रहती थी ! कई जानकारियाँ भी बढ़ती गईं साथ-साथ !
आभार !

Manish Kumar on April 09, 2010 said...

बहुत बहुत शुक्रिया आप सब के उद्गारों का। उम्मीद करूँगा कि आप सब अगले साल की शुरुआत मे भी साथ होंगे वार्षिक संगीतमाला २०१० के आगाज़ पर..

 

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