Monday, July 05, 2010

जगजीत सिंह की गाई ग़ज़लों का सफ़र भाग 3 : कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?

पिछली पोस्ट में बात हुई जगजीत जी के एलबम विजन के पहले भाग की। विज़न का दूसरा भाग मुझे पहले से भी ज्यादा प्रिय है। इस हिस्से की एक ग़ज़ल 'आप आए जनाब बरसों में' की बात मैं पहले ही कर चुका हूँ। जगजीत जी की सफलता का राज ग़ज़लों को चुनने की उनकी प्रक्रिया थी। अपने साक्षात्कारों में वो अक्सर कहा करते कि उन्होंने इस बात पर उतना ध्यान नहीं दिया कि कोई ग़ज़ल किस शायर ने लिखी है। उनका सारा ध्यान ग़ज़लों के भावों, उसमें प्रयुक्त शब्दों की सरलता पर रहता था। उन्हें इस बात पर हमेशा विश्वास रहा कि अगर ऐसी ग़ज़लों को एक अच्छी मेलोडी के साथ श्रोताओं तक पहुँचाया जाए तो वो निश्चय ही बेहद लोकप्रिय होंगी।

इसीलिए उनकी गाई ग़ज़लों में कुछ ऐसे शायरों के नाम आए जिनकी शायरी के बारे में लोगों ने पहले ज्यादा नहीं सुना था। वाज़िदा तबस्सुम, राणा सहरी, रुस्तम सहगल वफ़ा, ज़ाहिद, ख़ालिद कुवैतवी जैसे ग़ज़लकार इसी श्रेणी में थे जिनकी ग़ज़लों को जगजीत ने विज़न के इस भाग में समाहित किया और इनमें से कई काफी लोकप्रिय भी हुईं।

इन्हीं ग़ज़लकारों में एक नाम था जनाब अज़ीज़ क़ैसी साहब का। हैदराबाद के फलक़नुमा में जन्मे अज़ीज़ मोहम्मद खाँ यानि अज़ीज़ क़ैसी, मुंबईया फिल्म उद्योग में एक शायर से ज्यादा पटकथा लेखक के रूप में जाने गए। पर फिल्म उद्योग में आने के पहले साहित्यिक जगत में वे एक कहानीकार और शायर के रूप में मुकाम बना चुके थे। जगजीत सिंह ने इस एलबम में उनकी लिखी जिस रूमानी ग़ज़ल का प्रयोग किया उसका मतला जल्द जुबाँ चढ़ने वाला तो था ही

आपको देखकर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

उसके बाद का ये शेर तो मन को लाजवाब कर जाता था

उनकी आँखो से कैसे छलकने लगा
मेरे होठों पे जो माज़रा रह गया

वैसे यहाँ ये बताना उपयुक्त होगा कि अज़ीज़ क़ैसी साहब की प्रतिनिधि शायरी आदमी और उसके चारों ओर तेजी से बदलती दुनिया के संघर्ष को व्यक्त करने के लिए जानी जाती है।उनकी ये ग़ज़ल जो साहित्यिक हलके में बेहद मशहूर हुई थी के चंद अशआरों पर गौर फरमाएँ.. महानगरीय ज़िदगी की हक़ीकत बयाँ करते हुए अज़ीज़ साहब कहते हैं

हर शाम जलते जिस्मों का गाढा धुआँ है शहर
मरघट कहाँ है कोई बताओ कहाँ है शहर

फुटपाथ पर जो लाश पड़ी है उसी की है
जिस गाँव को यकीं था कि रोज़ी राशन है शहर

अज़ीज़ साहब की ग़ज़ल से आगे बढ़ते ही आप रूबरू होते हैं राणा सहरी की लिखी ग़ज़ल से। ग़ज़ल के लफ़्ज़ों से कहीं ज्यादा यहाँ जगजीत की गायिकी का अंदाज़ मन को छू जाता है। शब्दों में छुपा दर्द एकदम से बाहर आता दिखता है

कोई दोस्त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है

वो जो इश्क था वो जुनून था
ये जो हिज्र है ये नसीब है

राणा सहरी के बाद श्रोताओं को सुनने को मिलती है वाज़िदा तबस्सुम की ये ग़ज़ल
कुछ ना कुछ तो जरूर होना है,
सामना आज उनसे होना है।

तोडो फेंको रखो, करो कुछ भी,
दिल हमारा है क्या खिलौना है?

इन तीनों ग़ज़लों के कुछ टुकड़ों को जगजीत की मखमली आवाज़ में मैंने एक साथ पिरोया है इस फाइल में जिसे मैं अक़सर सुना करता हूँ। ये झलकी जरूर आपको इस एलबम के जादू में खोने पर विवश करेगी।

विज़न के इस भाग में लोकप्रिय शायर बशीर बद्र का कलाम भी है। हालांकि उनकी ये ग़ज़ल मुझे सुनने से ज्यादा पढ़ने में लुत्फ़ देती है

सर झुकाएगो तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

पर बशीर बद्र की जिस ग़ज़ल से विजन के इस भाग का आग़ाज़ होता है वो इस पूरे एलबम की मुझे सबसे बेहतरीन ग़ज़ल लगती है। जगजीत की गायिकी ने बद्र साहब की इस ग़ज़ल में चार चाँद लगा दिए हैं। तो आइए सुनिए इस एलबम की मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल




कौन आया रास्ते आईनाख़ाने हो गए
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए

क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो
सैकड़ों बेघर परिंदों के ठिकाने हो गए

ये भी मुमकिन है कि मैंने उसको पहचाना न हो
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए

जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फेंक दो
वो अगर ये कह रहें हैं हम पुराने हो गए

मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन हैं
उसकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए

और जनाब आज जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ तो बाहर मौसम का नज़ारा देखने लायक है। मानसून ने मेरे शहर में दस्तक तो दे ही दी है, आपको भी ये भिंगो ही रहा होगा ऐसी उम्मीद है। तो क्यूँ ना ज़ाहिद की लिखी और एलबम में शामिल इस नज़्म की इन पंक्तियों से इस पोस्ट का समापन किया जाए।

फिर से मौसम बहारों का आने को है
फिर से रंगी ज़माना बदल जाएगा
अबकि बज़्मे चरागां सजा लेंगे हम
ये भी अरमां दिल का निकल जाएगा

आप करदे जो मुझपे निगाहे करम
मेरी उलफत का रह जाएगा भरम
यूँ फ़साना तो मेरा रहेगा वही
सिर्फ उन्वान उसका बदल जाएगा (उन्वान : शीर्षक)

अगर आपने ये एलबम नहीं सुना तो जरूर सुनें। इसे आप यहाँ से भी खरीद सकते हैं।
जगजीत सिंह खी ग़ज़लों का ये सफ़र आगे भी चलता रहेगा। आशा है आप साथ बने रहेंगे।
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5 comments:

Priyank Jain on July 05, 2010 said...

saath bane na rahne ka sawaal hi nahin....
AABHAR

Priyank Jain on July 06, 2010 said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Debeshi Maitra said...

Jagjitji ke hum bhi bade fan hain. Bachpan se sunte aye hain unki ghazalen. Mujhe unki awaaz bahut anokhi lagti hai. Isliye, woh jo bhi geet/sher gaate hain, bahut sunder gaate hain.

दिलीप कवठेकर on July 07, 2010 said...

बहुत ही आनंद आ गया .... शाम का आलम और गहरा हो गया!!!

हिमांशु । Himanshu on August 24, 2010 said...

"हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा."

रूमाल के किनारे पर लिखकर रखता था यह शेर बहुत दिनों ! मन में बँधी थी जगजीत की गायकी की गाँठ ! अजीब-सा सम्मोहन था ! हर किरदार जगजीत सिंह की गाई हुई गज़लों के किरदार लगते थे, हर घटना उनकी गज़लों में सुनाई हुई महसूस हुआ करती थी !

बार-बार दुहराऊँगा...गहरा सम्मोहन !
कभी निवृत्त नहीं हुआ इससे !

 

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