Monday, August 09, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़ल गायिकी का सफ़र भाग 7 : उनकी दस बेशकीमती नज़्मों के साथ !

जगजीत सिंह पर आधारित इस श्रृंखला में बात हो रही थी उनकी गाई दस सबसे बेहतरीन नज़्मों की। पिछली पोस्ट में मैंने इनमें से पाँच नज़्मों के बारे में आपसे बात की। आज बारी है बाकी की नज़्मों की। पिछली बार की नज़्मों में जहाँ एक आशिक का दर्द रह रह कर बाहर आ रहा था वहीं आज की नज़्मों में इसके आलावा आपको एक फिलासफिकल सोच भी मिलेगी। इन नज़्मों ने मुझे और निसंदेह आपको भी बारहा अपनी अब तक की गुजारी हुई जिंदगी के बारे में सोचने पर मज़बूर किया होगा। तो आज की इस कड़ी की शुरुआत करते हैं निदा फ़ाज़ली की लिखी इस नज़्म से


आपको याद होगा अस्सी की शुरुआत में एक कंपनी कलर टीवी के उत्पाद को ला कर बाजार में तेजी से उभरी थी। ये कंपनी थी 'वेस्टन'। इसी कंपनी ने 1994 में जगजीत का एक एलबम निकाला था जिसका नाम था 'Insight'। इस एलबम की खासियत थी कि इसमें सिर्फ निदा साहब की कृतियों को शामिल किया गया था। दोहों व ग़ज़लो से सजे इस एलबम में निदा जी की दो एक नज़्में भी थीं। उन्ही नज़्मों में से एक में जिंदगी के निचोड़ को चंद शब्दों मे जिस सलीके से निदा ज़ी ने बाँधा था कि एक बार सुनकर ही मन विचलित सा हो गया था।

जगजीत का संगीत संयोजन भी अच्छा था। नज़्म की शुरुआत गिटार (वादक : अरशद अहमद) और साथ में वॉयलिन (वादक : दीपक पंडित) की सम्मिलित धुन से होती है। जैसे जैसे ये नज़्म आगे बढ़ती है जगजीत नज़्म की भावनाओं के साथ नज़्म का टेंपो बदलते हैं और जब जगजीत नज़्म के आखिर में नहीं दुबारा ये खेल होगा... तीन बार दोहराते हैं तो शायर की बात आपके मस्तिष्क से होती हुई दिल में अच्छी तरह से समा चुकी होती है। तो गौर कीजिए निदा फ़ाज़ली के शब्दों और जगजीत जी की गायिकी की सम्मिलित जादूगरी पर...



ये ज़िन्दगी..

ये ज़िन्दगी..
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है

ये ज़िन्दगी.. ये ज़िन्दगी ..
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें, बदल रही है
ये ज़िन्दगी.. ये ज़िन्दगी ..

बदलती शक्लों, बदलते जिस्मों
चलता-फिरता ये इक शरारा

जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा


जहाँ निदा फाज़ली ने जीवन को अपनी दार्शनिकता भरी नज़्म में बाँधा वही मज़ाज लखनवी ने अपनी जिंदगी की हताशा और निराशा को अपनी मशहूर नज़्म 'आवारा' में ज्यों का त्यों चित्रित किया है और फिर जगजीत ने मजाज़ के उसी दर्द को बखूबी कहकशाँ में गाई अपनी इस नज़्म में क़ैद किया है। इस नज़्म की ताकत का अंदाज़ा इसि बात से लगता है कि मन इसे सुनकर ही नहीं पर इसे पढ़ने से ही गमगीन हो जाता है...

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ

गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ?

ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?


रास्ते में रुक के दम ले लूँ, मेरी आदत नहीं

लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं

और कोई हमनवाँ मिल जाये, ये किस्मत नहीं

ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?



वैसे जगजीत ने मज़ाज साहब की इस नज़्म के कुछ ही हिस्से गाए हैं पर पूरी नज़्म और इसके पीछे मज़ाज़ की जिंदगी की कहानी आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।


मेरे इस संकलन की तीसरी नज़्म है एलबम 'फेस टू फेस (Face to Face)' की जिसकी कैसेट मैंने 1993 में खरीदी थी। इस एलबम में एक नज़्म थी सबीर दत्त साहब की। यह वही दत्त साहब हैं जिनकी रचना 'इक बरहामन ने कहा है कि ये साल अच्छा है........' उन दिनों बेहद मशहूर हुई थी। हाल ही में मुझे इस चिट्ठे की एक पाठिका ने मेल कर ये सवाल पूछा कि ये नज़्म क्या एक ईसाई गीत है?
सच कहूँ तो इस प्रश्न को पढ़ने के पहले तक ये ख्याल कभी मेरे ज़ेहन में नहीं उभरा था कि इस नज़्म को ऐसा कहा जा सकता है।

इसमें कोई शक़ नहीं हरियाणा के नामी शायर सबीर दत्त साहब ने इस नज़्म में भगवन जीसस की ज़िंदगी की घटनाओं को लिया है पर वो यहाँ सिर्फ एक प्रतीक, एक बिंब के रूप में इस्तेमाल हुआ है। दरअसल सबीर जी की ये नज़्म आज के दौर के इस बेईमान और भ्रष्ट समाज का आईना है। भगवन जीसस के रूपक का इस्तेमाल करते हुए वे ये बताना चाहते हैं कि जीवन में सत्य और ईमानदारी की राह पर चलने वालों को हर तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नज़्म के अंत में हमारे समाज पर बतौर कटाक्ष करते हुए सबीर लोगों को सच ना बोलने की सलाह दे डालते हैं। जगजीत जी की इस नज़्म का संगीत संयोजन भी अपनी तरह का है। इस नज़्म में समूह स्वर का इस्तेमाल भी बेहद प्रभावी ढंग से किया गया है।


सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढाया

मुझ को ज़हर का जाम पिलाया

फिर भी उन को चैन न आया

सच्ची बात कही थी मैंने


ले के जहाँ भी, वक्त गया है

ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म सहा है

सच का ये इनाम मिला है

सच्ची बात कही थी मैंने


सब से बेहतर कभी न बनना

जग के रहबर कभी न बनना

पीर पयाम्बर कभी न बनना


चुप रह कर ही वक्त गुजारो

सच कहने पे जान मत वारो

कुछ तो सीखो मुझ से यारो

सच्ची बात कही थी मैंने...


और अगर इन सब नज़्मों को सुनने के बाद आपका मन कुछ भारी हो गया हो तो क्यूँ ना बचपन की यादों को ताज़ा कर आपके मूड को बदला जाए। सुदर्शन फ़ाक़िर साहब ने क्या उम्दा नज़्म लिखी थी हम सबके मासूम बचपन को केंद्र में रखकर। जब भी इस नज़्म को सुनता हूँ उनकी लेखनी को सलाम करने को जी चाहता है।

जगजीत साहब जब भी कान्सर्ट्स में चिर परिचित धुन के साथ इस नज़्म का आगाज़ करते थे पूरा माहौल तालियों से गूँज उठता था। वैसे तो बाद के एलबमों में इस नज़्म का संगीत थोड़ा बदल गया व चित्रा जी की आवाज़ की जगह सिर्फ जगजीत का सोलो ही सुनने को मिलता रहा पर आज यहाँ मैं उसी पुराने वर्सन को आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूँगा


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी


सच सुदर्शन जी उस ज़िंदगी का भी अपना ही एक मजा था..


दस नज़्मों के इस संकलन का समापन मैं जावेद अख्तर की लिखी इस नज़्म से करना चाहूँगा जिसे जगजीत जी ने अपने एलबम सिलसिले का हिस्सा बनाया था। ये एलबम 1998 में आई थी पर जावेद साहब ने इस नज़्म में उन अहसासात को अपने शब्द दे दिए हैं जिनसे यक़ीनन हम सभी कभी ना कभी जरूर गुजर चुके हैं या गुजरेंगे। इस माएने में ये नज़्म समय की सीमाओं से परे है और इसी वज़ह से आज की इन पाँच नज़्मों में सबसे ज्यादा प्रिय है। जगजीत साहब ने अपने रुहानी स्वर से इसे हमेशा हमेशा के लिए अज़र अमर कर दिया है।

मैं भूल जाऊँ तुम्हें मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भूलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं


यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

कमबख़्त

भुला सका न ये वो सिलसिला जो था ही नहीं

वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त

जो हम में कभी रहा ही नहीं

मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए

तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ

कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं...




तो जनाब जगजीत की गाई मेरी दस पसंदीदा नज़्में तो ये थीं
  • बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी..
  • बहुत दिनों की बात है...
  • तेरे खुशबू मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे..
  • कोई ये कैसे बताए, कि वो तनहा क्यों है..
  • अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?
  • ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूँ ही शक्लें, बदल रही है...
  • सच्ची बात कही थी मैंने..
  • ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
  • ऐ गमे दिल क्या करूँ ऐ वहशते दिल क्या करूँ...
  • तुझे भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
जानना चाहूँगा कि इनमें से या इनके इतर जगजीत की गाई किस नज़्म को आपने अपने दिल में बसाया है?
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18 comments:

Anonymous said...

"wo ek rabt jo hum me kabhi raha hi nahi, muze hai yaad wo sub jo kabhi hua hi nahi"
kya baat hai, such me kuch dil se hokar guzar gaya!!!!!

राजभाषा हिंदी on August 09, 2010 said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

राज भाटिय़ा on August 09, 2010 said...

आप का धन्यवाद इन सुंदर गजलो को सुनाने के लिये जगजीत जी की मधुर आवाज मै, वेसे तो मैरे पास इन सभी गजलो का खजाना है, लेकिन अचानक यू ही कभी कभार कही सुनने को मिल जाये तो बहुत अच्छा लगता है.

रंजना on August 10, 2010 said...

बस मिजाज लखनवी साहब वाली ग़ज़ल नहीं सुनी थी मैंने...
ये नज़्म हैं ही ऐसे कि कोई भी संवेदनशील ह्रदय इनका मुरीद हुए बिना न रह पायेगा...
आनंद रस में हमें गोता लगवाने के लिए कोटि कोटि आभार...

Vinay Jain on August 10, 2010 said...

बढिया लिस्ट है. सब तो हो गईं इनमें. एक और पसंद की नज़्म याद आ रही है, फ़िल्म साथ-साथ से, जावेद अख़्तर की लिखी हुई - 'प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी'
चूँकि धुन उनकी नहीं है, उनकी बाक़ी नज़्मों से इसका फ्लेवर थोड़ा अलहदा है.

गौतम राजरिशी on August 10, 2010 said...

मनीष जी को प्रणाम...अभी जगजीत की गायी नज़्मों की यात्रा में शामिल हुआ। दोनों पोस्ट पढ़े। "बात निकलेगी" वाली नज़्म तो वाकई शब्दों से परे वाली नज़्म है।

बेहतरीन प्रस्तुति, किंतु तनिक उदास हुआ अपनी दो प्रिय नज़्मों को इस फ़ेहरिश्त में न देखकर:-
एक तो "मेरे दरवाजे से चाँद को रुखसत कर दो" वाला और दूजा "प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी" वाला...

Mired Mirage on August 11, 2010 said...

इतने अच्छे गीत सुनवाने के लिए आभार।
घुघूती बासूती

Manisha Dubey said...

wese toh aapki list me sabhi behtrin hain, lekin apni pasand ki baat hai to muze yaad aa rahi hai......
''UMRA JALWON ME BASAR HO YE ZARURI TO NAHI, UNKE AAGOSH ME SAR HO YE ZARURI TO NAHI, BEKHUDI AATHON PAHAR HO YE ZARURI TO NAHI.......''

Manish Kumar on August 12, 2010 said...

Manisha ,darasal baat Jagjit ki dus behtareen nazmon ki ho rahi thi, ghazalon ka silsila to abhi jari hai aur aapne jis ghazal ka jikra kiya hai wo meri bhi priya hai.

Anurag Arya on August 14, 2010 said...

although to select one is difficult ....but अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो.is all time fav...

Anonymous said...

Nice post and this mail helped me alot in my college assignement. Say thank you you seeking your information.

Manish Kumar on August 16, 2010 said...

विनय व गौतम प्यार मुझसे जो किया.. व एक और नज़्म मैं और मेरी तनहाई हमेशा से अच्छी लगती रही है पर दस की फेरहिस्त पहले से ही पूरी हो चुकी थी इस लिए यहाँ शामिल नहीं की गई।

रचना दीक्षित on August 17, 2010 said...

अच्छे गीत सुनवाने के लिए आभार।

झारखंडी आदमी on August 23, 2010 said...

pichle 65-70 dino se yayawari chal rahi hai mustmolla zindagi subah yahan to raat kisi aur kone par abhi ramta jogi hoon bahut dino ke baad sangank ki doniya main lauta hoon kaal raat acharya chatursen shastri ke upnyaas ki nagri(VAISHALI) main apni pasand ki gazal soon raha tha litti khate khatee. ajj apki post padh raha hoon
sadabhar peshkash!!!!!!!!!!!!

हिमांशु । Himanshu on August 24, 2010 said...

हर नज़्म दिल में बसी है ! किसी एक को भी छाँट नहीं सकता ! पर ’अब मेरे पास तुम आई हो..’ और ’ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ’ बहुत पसन्द हैं मुझे !

क्या खूबसूरत प्रविष्टियाँ पढ़ने को मिल गयीं मुझे !
एक साथ पढ़ डाला मैंने...इकट्ठा पढ़ने का सुख भी होता है कुछ.. !
आभार ।

Manish Kumar on August 25, 2010 said...

हिमांशु जी अभी अभी आपकी सारी टिप्पणियाँ एक साथ पढ़ीं। बस यही सोच रहा हूँ कि मैं आप , राजीव और हमारे जैसे जगजीत भक़्त एक साथ बैठें तो फिर वो शाम यूँ गुजर जाए कि पता ही ना चले। वैसे जगजीत की ग़ज़लों की इस यात्रा के कई सोपान अभी बाकी हैं। कुछ दिनों का ठहराव लिया है ताकि विविधता बनी रहे। एक बार फिर से शुक्रगुजार हूँ आपका कि आपने पूरे दिल से अपने आप को अभिव्यक्त किया।

vagi999 on August 28, 2010 said...

dosto aap logo ne jagjit ji ki yea gazal to kai baar suni hogi....."wo kagaz ki kashti......" magar ek baar is link ko sunkar dekhna aap log khud tay kar lena wo insaan kya sirf ek singer hai YA ????????......is video se ghalib ki yaad aa gayi.....jab ghalib mushaayera mein jaate thay to shaath ke shayaro se unke sher nahi "UTH-THAYE" jaate thay..... shayad us waqt jagjit ji ke saath bhi yahi huwa tha.....khair mere hisaab se aisa singer shayad koi nahi hai.....shayad lata ji bhi nahi......suna usay jaaye jo tasalli de, sukoon de.....http://www.embedstock.com/video/6422/Ye-Daulat-Bhi-Le-Lo-Live

dosto jab yea para aata hai ..."kabhi rait ke unche teelo pe jaana...." par aap log apne kaan khol kar rakhna.....plz plz plz.

Sonal on September 05, 2010 said...

bahut hi badiya..

 

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