Monday, September 06, 2010

अविभाजित पंजाब की ग्रामीण संस्कृति का दर्पण : ज़िंदगीनामा / कृष्णा सोबती

आंचलिक भाषा में लिखे उपन्यासों की अपनी एक अलग ही मिठास होती है। ऐसे उपन्यासों को पढ़कर आप उन अंचलों की तहज़ीब, रिवायतों से अपने आप को करीब पाते हैं। आंचलिक उपन्यासों का ध्यान आते ही मन में फणीश्वरनाथ रेणू की कृतियाँ याद आती हैं जो हमें बिहार के उत्तर पूर्वी जिले पूर्णिया के ग्रामीण जीवन के पास ले जाती थी। कुछ साल पहले कुमाँउनी भाषा और संस्कृति को करीब से जानने समझने का मौका मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास 'कसप' को पढ़ने के बाद मिला था। इसलिए पिछले हफ़्ते जब कृष्णा सोबती का उपन्यास ज़िंदगीनामा हाथ लगा तो उसके कुछ पन्ने पलटकर ये लगा कि इस उपन्यास के माध्यम से पूर्व और पश्चिमी पंजाब के ग्रामीण परिवेश से रूबरू होने का मौका मिलेगा। पर क्या सचमुच ऐसा हो सका? हुआ पर कुछ हद तक ही...
(चित्र सौजन्य : विकीपीडिया)

मैंने कृष्णा सोबती जी को पहले नहीं पढ़ा था। इसलिए पुस्तक पुस्तकालय से लेने के पहले कहानी का सार जानने के लिए वहीं प्रस्तावना पढ़ डाली। उसमें सोबती जी की साहित्यिक कृतियों और हिंदी साहित्य में उनके योगदान की बाबत तो कई जानकारियाँ मिलीं पर उपन्यास की विषय वस्तु का जिक्र वहाँ ना होकर पुस्तक के पिछले आवरण पर था। उसे पढ़ कर मन थोड़ा भ्रमित भी हुआ और रोमांचित भी। वहाँ लिखा था

ज़िंदगीनामा जिसमें ना कोई नायक। न कोई खलनायक। सिर्फ लोग और लोग और लोग। जिंदादिल। जाँबाज। लोग जो हिंदुस्तान की ड्योढ़ी पंचनद पर जमे, सदियों गाजी मरदों के लश्करों से भिड़ते रहे। फिर भी फसलें उगाते रहे। जी लेने की सोंधी ललक पर जिंदगियाँ लुटाते रहे।
और किताब पढ़ने के बाद पुस्तक का ये संक्षिप्त परिचय बिल्कुल सही मालूम होता है। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के एकीकृत पंजाब के ग्रामीण जीवन को कृष्णा सोबती जी ने अपनी पुस्तक की कथावस्तु चुना है। पूरी पुस्तक में लेखिका ने उन किसानों के दर्द को बार बार उभारा है जो जमीन पर हर साल मेहनत मशक्कत कर फसलें तो उगाते हैं पर उसके मालिक वो नहीं है। सूद के कुचक्र में फँसकर उनकी ज़मीनें साहूकारों के हाथों में है। दरअसल पंजाब में विभाजन पूर्व तक जमीन पर हिंदू साहूकारों का कब्ज़ा रहा जबकि खेतों पर मेहनतकरने वाले अधिकांश किसान सिख या मुस्लिम थे। लेखिका ने इस सामाजिक संघर्ष के ताने बाने में उस वक़्त देश में घटती घटनाओं को भी अपने किरदारों के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखने की कोशिश की है। ऐसा उन्होंने क्यों किया है ये उनकी इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है। लेखिका का मानना है..

इतिहास वो नहीं जो हुक़ूमतों की तख्तगाहों में प्रमाणों और सबूतों के साथ ऍतिहासिक खातों में दर्ज कर सुरक्षित कर दिया जाता है, बल्कि वह है जो लोकमानस की भागीरथी के साथ साथ बहता है..पनपता और फैलता है और जनसामान्य के सांस्कृतिक पुख़्तापन में ज़िंदा रहता है।
इसीलिए उपन्यास में इस इलाके का इतिहास गाँव के साहूकार शाह जी की बैठकों से छन छन कर निकलता हुआ पाठकों तक पहुँचता रहता है। गाँव में हो रही घटनाओं की जानकारी इस मज़लिस के आलावा शाहनी की जमाई महफिलों से भी मिलती है। सोबती जी ने ग्रामीण जीवन के सभी रंगों को इस पुस्तक में जगह दी है। किसानों का असंतोष, ज़मीनी विवाद, सामाजिक जश्नों में जमकर खान पान, सास बहू के झगड़े, सौतनों के रगड़े, मदरसों की तालीम, मुज़रेवालियों के ज़लवे, चोर डकैतों की कारगुजारियाँ सब तो है इस कथाचक्र में। पर ये कथाचक्र कहीं रुकता नहीं और ना ही सामान्य तरीके से आगे बढ़ता है। दरअसल कई बार किसी घटना का विवरण देने या उल्लेख करने के बाद उपन्यास में आगे लेखिका उसका जिक्र ना कर सब कुछ पाठकों के मन पर छोड़ देती हैं। वैसे भी लेखिका का उद्देश्य किसी एक किरदार की ज़िंदगी में उतरने का ना हो के आम जन के जीवन को झाँकते हुए आगे चलते रहने का है। पर इसका नतीजा ये होता है कि कथा टूटी और बिखरी बिखरी लगती है। उपन्यास के समापन में भी सोबती कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़तीं और वो भी अनायास हो गया लगता है।

पर उपन्यास में कुछ तत्व ऐसे हैं जो कथानक में रह रह कर जान फूँकते हैं। पंजाब का सूफ़ी व लोक संगीत पुस्तक के पन्नों में रह रह कर बहता है। कहीं बुल्लेशाह,कहीं हीर तो कहीं सोहणी महीवाल के गीत आपको पंजाब की समृद्ध सांगीतिक विरासत से परिचय कराते ही रहते हैं। मुझे इस पुस्तक सा सबसे अच्छा पहलू ये लगा कि पुस्तक लोकगीतों , कवित्त और पंजाबी लोकोक्तियों और तुकबंदियों का अद्भुत खज़ाना है। कुछ मिसाल देना चाहूँगा

नौजवानों ने पनघट पर सजीली युवतियों की अल्हड़ता देखी तो हीर के स्वर उठ गए
"तेरा हुस्न गुलज़ार बहार बनवा
अज हार सब भाँवदा दी
अज ध्यान तेरा आसमान ऊपर
तुझे आदमी नज़र न आँवदा री.."

प्रेम पर सूफ़ियत का रंग चढ़ा तो बुल्लेशाह दिल से होठों पर आ गए
"मैं सूरज अगन जलाऊँगी
मैं प्यारा यार मनाऊँगी
सात समुन्दर दिल के अंदर
मैं दिल से लहर उठाऊँगी..."

मौलवी मदरसे में पढ़ाते है तो देखिए उसकी भी एक लय बन जाती है...
पक्षियों में सैयद : कबूतर
पेड़ों में सरदार : सीरस
पहला हल जोतना : न सोमवार ना शनिवार
गाय भैंस बेचनी : न शनीचर ना इतवार
दूध की पहली पाँच धारें : धरती को
नूरपुर शहान का मेला : बैसाख की तीसरी जुम्मेरात को

और बच्चों की शैतानियाँ वो भी तुकबंदी में
लायक से बढ़िया फायक
अगड़म से बढ़िया बगड़म
हाज़ी से बड़ी हज़्जन
मूत्र से बड़ा हग्गन

या फिर
शमाल में कोह हिमाला
जुनूब में तेरा लाला
मशरिक में मुल्क ब्रह्मा
मग़रिब में तेरी अम्मा :)

कृष्णा सोबती द्वारा लोकभाषा और बोलियों का धाराप्रवाह इस्तेमाल इस उपन्यास का सशक्त और कमजोर पहलू दोनों है। कमजोर इसलिए कि जिन पंजाबी ठेठ शब्दों या पंजाबी लोकगीतों का इस्तेमाल पुस्तक में किया गया है उनका अर्थ गैर पंजाबी पाठकों तक पहुँचाने की आवश्यकता लेखिका या प्रकाशक ने नहीं समझी है। इन बोलियों का प्रयोग उपन्यास को वास्तविकता के धरातल पर तो खड़ा करता है पर साथ ही कथ्य गैर पंजाबी पाठकों को किरदारों की भावनाओं और मस्तमौला पंजाबी संस्कृति के बहते रस का पूर्ण माधुर्य लेने से वंचित रखता है।

करीब 400 पृष्ठों का ये उपन्यास साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुका है। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास की कीमत डेढ़ सौ रुपये है। इंटरनेट पर इस पुस्तक को आप यहाँ से खरीद सकते हैं

इस चिट्ठे पर अन्य पुस्तकों पर की गई चर्चा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
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25 comments:

राजेश उत्‍साही on September 06, 2010 said...

नए पाठकों के लिए यह जानकारी उपयोगी है।

डॉ .अनुराग on September 06, 2010 said...

बहुत ही लोकप्रिय किताब है .ओर कृष्ण सोबती का भी एक बड़ा पाठक वर्ग है

PN Subramanian on September 06, 2010 said...

बड़ी ही सुन्दर समीक्षा. गैर पंजाबी पाठकों को स्थानीयता का रसास्वादन .करा पाना वह भी किसी अन्य भाषा में, बड़ा ही कठिन कार्य होता है.

सुशील कुमार छौक्कर on September 06, 2010 said...

जब पढने का मन हुआ तो नहीं मिली लाईब्रेरी में। काफी सुना है इस किताब के बारें। काफी अच्छी किताब बताई जाती है। आपने फिर से जिज्ञासा पैदा कर दी है

रंजना [रंजू भाटिया] on September 06, 2010 said...

पढ़ी थी कुछ समय पहले ..आपकी समीक्षा ने एक बार फिर से पढने की इच्छा जगा दी ...बहुत सही लिखी है आपने समीक्षा

suparna said...

i think some authors like to make their readers work harder, which is quite fair ;) and as another reader said in a comment above, a lot of metaphor may be lost in translation. of course, the reader feels helpless in this case, but for me it becomes a bit of an enjoyable exercise to ask around and try and get at the words.

i had the chance to read Mitro Marjani in the Hindi original and quite liked it, though the end had left me a little perturbed at that time.. i'd like to read a lot more of Sobti, especially Ai Ladki, which is much talked about.

thanks for writing about her :)

Manish Kumar on September 06, 2010 said...

यहाँ अनुवाद करने की बात नहीं हो रही हे सुपर्णा। उससे तो किताब का फ्लेवर ही जाता रहेगा। सिर्फ ठेठ शब्दों को चिन्हित कर नीचे अर्थ देने की प्रक्रिया बहुतेरे प्रकाशक अपनाते हैं और वो यहाँ भी अपनाई जा सकती थी।

पाठकों को मेहनत बहुत लेखक अपने विचारों की गहराइयों से कराते हैं। मसलन सलमान रुशदी की मिडनाइट चिलरेन याद आती है जिसमें मुझे कई कई बार वापस जा कर फिर से पिछले अंश पढ़ने पढ़ते थे। पर जब बात समझ में आती थी तब लेखक की वाह वाही करने को ही दिल करता था।

पर यहाँ तो मसला विचारों का ना हो के भाषा का है। ये कुछ उसी तरह की बात है कि अगर तुम्हें उर्दू का ज्ञान ना हो और उर्दू का शब्दकोष भी तुम्हारे पास ना हो तो खालिस उर्दू से सजी शेर ओ शायरी का कितना लुत्फ़ कोई उठा पाएगा?

ZEAL on September 07, 2010 said...

Very informative post. Thanks and regards,

Udan Tashtari on September 07, 2010 said...

मेरी पढ़ी हुई है.अच्छी जानकारी दी आपने.

राजभाषा हिंदी on September 07, 2010 said...

बहुत अच्छी जानकारी दी आपने।

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

Manisha Dubey said...

krishna ji ki apni shelly hai likne ki, iss navel me shahni ki mahfilo me orton ki nouk-zook, unka charkha chalana or mattiya banane wale prasang majedar lagte hain.JINDGINAAMA ke log jindadily se bharpur hain

Manisha Rameshkumar Upadhyay. on September 07, 2010 said...

krishnaji aapke shabd sare patro ko aankho ke samne lakar khada kar dete hai ,aisa lagta hai kii hum unhe jinda dekh rahe ai .apratim .

नीरज गोस्वामी on September 07, 2010 said...

ज़िन्दगी नामा पढ़े अरसा हो गया...अब उसकी धुंधली सी ही याद है...आप कभी उनकी लिखी 'मित्रो मरजानी' पढ़ें...आनंद आ जायेगा...हाँ पूरा मज़ा लेने के लिए,पंजाबी का आंशिक ज्ञान होना तो जरूरी है...
नीरज

shaffkat on September 07, 2010 said...

BAHUT PEHLE SOBTI JI KI PUSTAK MITRO MARJAI PADHI THEE.KAFI KHULE VICHAR THEE.JO US DAUR KE LEKHAN MEIN KAM HI DEKHE JATE THEE.ZINDAGI NAMA NAHI PADHA HAI MAGAR JIS TERHA APNE LIKHA HAI ZAROOR ACCHI KITAB HOGI.
ITIHAS KE BARE MEIN LIKHI GAYE TIPPNI SE MERA VICHAR THODA HATKAR HAI. MANA LOK JIWAN KA MAHTV HOTA HAI PER SANSON KE CHALNE TAK AUR TIYE KI BAITHAK KE BAAD KHEL KHATM.ADHIKANSH LOGON KO TEESRI PEDHI BHI YAAD NAHI.ITIHAS SADA TAKATWAR KA RAHA HAI AUR RAHEGA.

suparna said...

true enough, the footnotes thing didnt strike me at first thought. was thinking more along the lines of the famous R.D.Burman quip to Gulzar sa'ab .. "maane! log pooch lenge" ;)

Manish Kumar on September 07, 2010 said...

मनीषा जी (दोनों :)) सही कहा आपने। मुझे इस पुस्तक सा सबसे अच्छा पहलू ये लगा कि पुस्तक लोकगीतों , कवित्त और देशी लोकोक्तियों और तुकबंदियों का अद्भुत खज़ाना है। कुछ मिसाल अब पोस्ट में ही डाल दे रहा हूँ । आशा है जिन्होंने पढ़ा है उन्हें भी वो प्रसंग याद आ जाएँगे।

Manish Kumar on September 07, 2010 said...

नीरज भाई, शफ़कत व सुपर्णा आप सब मित्रो मरजाणी की इत्ती तारीफ़ कर रहे हैं तो उसे मुझे शीघ्र ही पढ़ना पड़ेगा। ज़िदगीनामा में निश्चय ही लेखिका ने कथा शिल्प को अपने बाकी उपन्यासों से भिन्न शैली में प्रस्तुत किया है ऐसा मुझे लगता है।

Archana Singh on September 08, 2010 said...

मुझे 'जिंदगीनामा ' कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाया. माना कि इसमें रूमानियत है ,आंचलिक मिठास है पर सूत्र नहीं है.एक बिखराव सा महसूस होता है

Manish Kumar on September 08, 2010 said...

बिल्कुल 'दी' एक कथा की दृष्टि से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ। अपने लेख में मैंने इस बिखराव का जिक्र किया है।

Raki Garg said...

aapne bhut khoobsurti se kuch shobdoo mein kitab ke bare mein bahut kuch likha hai per maine abhi tak ye kitab puri padhi nahi hai jab bhi padhne ki kosish ki kathin punjabi shabd ka arth samajh nahi aata aur book band kar deti jabki ye kitab mare paas pichle 13 years se hai--aapki ye post padhkar maine phir se padhne ki koshish shuru ki hai shayad safalta mil jaye..tab kuch bolna adhik theek rahega---

रंजना on September 10, 2010 said...

बात तो सही कही आपने...भाषा के तेथ शब्दों से यदि परिचय न हो तो पाठक कृति का पूरा रस नहीं ले पाता..
बहुत बढियां समाक्षा की है आपने...

क्षितिजा .... on September 11, 2010 said...

shukriya manish ji ... i m new to writin as wel blogging ... aapse sarahana pa kar achha laga...

PRAN CHADHA on March 16, 2013 said...

काफी जानकारी मिली..पंजाब की संस्कृति समृद्ध मानी जाती रही है,यहाँ देश के लिए क़ुरबानी का जज्बा है तो प्रेम का दरिया भी बहता है.

Jaishree on November 04, 2017 said...

A book tastes different to every reader. What enthralled me was that it was not just one story which writer wanted to convey and used other support characters.It was actually life as it happens in those small places. Maybe it appealed to my heart because I lived many a summers at my Nani's house that was in a village. There was a marked difference in a village society, a new urban society.
Language only added the aroma and flavor to the elaborate menu.

Jaishree Khamesra on November 05, 2017 said...

हिंदी के मेरी प्रिय पुस्तकों में एक- भाषा का मिश्रण,जीवन की गाथा और फलसफा और इससे भी बढ़कर किरदार और उनके कथक। ..

 

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