Sunday, January 31, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 17 - भँवरा भँवरा आया रे, कान में इतर का फाहा रे

वार्षिक संगीतमाला 2009 का एक महिने का सफ़र तय करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 17 वीं पॉयदान पर। पिछली पॉयदान पर आपने देखा की किस तरह पीयूष मिश्रा ने अपने गीत को तत्कालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों को जनता के सामने पेश करने का माध्यम बनाया था। आज का ये युगल गीत राजनीतिक नहीं पर एक सामाजिक संदेश जरूर दे रहा है और वो भी इस अंदाज़ में जिसे सुनने का मन बार बार करता है।

इस युगल गीत के साथ पहली बार इस गीतमाला में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं आज के युग के दो बेमिसाल गायक सुखविंदर सिंह और कैलाश खेर। इन दोनों महारथियों को एक साथ सुनना किसी भी संगीतप्रेमी के लिए सोने पर सुहागा जैसी बात होती है। वैसे तो इन गायकों की खासियत रही हे कि आम से गीत को भी अपनी अदाएगी से खास बना दें पर जब बोल गुलज़ार के हों और धुन विशाल भारद्वाज की तो उनका काम और आसान हो जाता है।


कमीने फिल्म के इस गीत ने जितनी चुनौती गायकों के लिए थी उससे कहीं ज्यादा गीतकार संगीतकार की जोड़ी के लिए। गीत लिखना था एक ऐसी स्थिति पर जिसमें नायक जो एक सामाजिक कार्यकर्ता है , घूम घूम कर रेड लाइट एरिया में कंडोम का वितरण कर रहा है और साथ ही लोगों को एड्स के खतरे के बारे में बता रहा है। किसी भी गीतकार के लिए इस विषय को बिना उपदेशात्मक हुए कविता में बाँधना एक टेढ़ी खीर थी। पर गुलज़ार ने इस काम को बड़े सलीके से अंजाम दिया। वहीं विशाल का संगीत संयोजन और फटाक शब्द का गीत की लय के साथ बेहतरीन इस्तेमाल श्रोताओं का ध्यान सहज ही आकर्षित कर लेता है।

तो आइए सुनें कैलाश और सुखविंदर की आवाज़ में ये नग्मा



कि भँवरा भँवरा आया रे फटाक फटाक
गुन गुन करता आया रे
सुन सुन करता गलियों से
अब तक कोई ना भाया रे


सौदा करे सहेली का
सर पर तेल चमेली का
कान में इतर का फाहा रे
कि भँवरा भँवरा आया रे फटाक फटाक.. ..

गिनती ना करना इसकी यारों में
आवारा घूमे गलियारों में
ये चिपकू हमेशा सताएगा
ये जाएगा फिर लौट आएगा
खून के मैले कतरे हैं
जान के सारे खतरे ...
कि आया रात का जाया रे..फटाक ...

जितना भी झूठ बोले थोड़ा है
कीड़ों की बस्ती का मकौड़ा है
ये रातों का बिच्छू है काटेगा
ये ज़हरीला है ज़हर चाटेगा
दरवाजे में कुन्दे दो
दफ़ा करो ये गुंडे ये शैतान का साया रे फटाक फटाक..

ये इश्क़ नहीं आसान, अजी AIDS का खतरा है
पतवार पहन जाना ये आग का दरिया है

ये नैया डूबे ना ये भँवरा काटे ना
ये नैया डूबे ना ये भँवरा काटे ना ...




और हाँ गीत सुनने के साथ बगल की साइड बार में चल रही वोटिंग में अपनी पसंद का इज़हार जरूर कीजिए।

Friday, January 29, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 18 - पीयूष मिश्रा के व्यंग्यों की मार झेलते 'अंकल सैम'

वाराणसी यात्रा और घर में शादी की व्यस्तताओं की वज़ह से संगीतमाला में लगे इस ब्रेक के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। तो चलिए फिर शुरु करते हैं संगीतमाला की पॉयदानों पर क्रमवार ऊपर बढ़ने का सिलसिला।

वार्षिक संगीतमाला की 18 वीं पॉयदान पर का गीत थोड़ा अलग हट कर है। आज जिस तरह युवा निर्देशक नई-नई थीमों पर फिल्में बना रहे हैं उसी तरह कुछ संगीतकार भी लीक से अलग हटकर चलने को तैयार हैं। वैसे जब फिल्म का गीत और संगीतकार एक ही शख़्स हो और निर्देशक को उसकी काबिलियत पर पूरा विश्वास हो तो नए प्रयोग करने का साहस और बढ़ जाता है। इस लिए तो पीयूष मिश्रा को जब निर्देशक अनुराग कश्यप ने 'गुलाल' फिल्म का गीत संगीत रचने की कमान सौंपी तो इश्क और हुस्न से लबरेज़ फिल्मी मुज़रों की जगह एक पॉलटिकल मुज़रा (Poltical Mujra) ही लिख दिया।


पीयूष ने अपने लिखे इस गीत में देश और विश्व से जुड़े कुछ मसलों पर अपने शब्द बाणों से करारे व्यंग्य कसे हैं।

चाहे वो आतंकवाद के नाम पर अमेरिका की इराक और अफगानिस्तान में घुसपैठ हो..

या फिर देश में शीतल पेय के बाज़ार में अधिक सेंध लगाने वाले लोक लुभावन विज्ञापन हों..

या सबको अपने विचार रखने की आज़ादी देने के लोकतंत्र की बुनियादी उसूल पर आए दिन लगने वाले प्रतिबंधों द्वारा की जा रही आधारभूत चोट हो..

या फिर उच्च वर्ग में अंग्रेजीदाँ संस्कृति का अंधानुकरण करने की होड़ हो..

इस गीत में पीयूष सब पर सफलता पूर्वक निशाना साधते नज़र आए हैं। तो क्या फितर चढ़ा रंगमंच से सालों साल जुड़े इस गीतकार के मन में। अंतरजाल पर सलीमा पूनावाला को दिए गए साक्षात्कार में इस गीत के बारे में बात करते हुए पीयूष कहते हैं...

फिल्म जगत में कोई जल्दी कुछ नया करना नहीं चाहता। सभी इस्तेमाल किए हुए सफल फार्मूलों का दोहराव करने को आतुर हैं। मैंने 'राणाजी' इसलिए लिखा क्योंकि मैं एक 'Political Mujra' लिखना चाहता था। फिर अन्य गीतों की अपेक्षा फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से इस गीत में कुछ नया करने का अवसर ज्यादा था। वैसे भी जो कुछ हमारे अगल बगल हो रहा है, जो भी घटनाएँ घट रही हैं क्या ये जरूरी नहीं कि उन्हें सुनने वालों तक गीत के माध्यम से पहुँचाया जाए। मैं चाहता था कि जब आने वाली पीढ़ियाँ इस गीत को सुने तो उन्हें आज की वास्तविकता को जानने का मौका मिले।
ये तो हुई इस गीत के पीछे उपजे विचारों की बात। पीयूष ने इस मुज़रे में राजस्थानी लोक संगीत का जो रंग भरा है वो रेखा भारद्वाज की आवाज़ में और निखर के सामने आया है। ताल वाद्यों की अद्भुत जुगलबंदी के साथ जब रेखा जी का आलाप उभरता है जो सहज ही श्रोता को गीत के मूड से एकाकार कर देता है। गायिकी के लिहाज़ से ये साल रेखा जी के लिए बेहतरीन सालों में से एक रहा है। उनकी गायिकी के बारे में बाते आगे भी होंगी फिलहाल तो इस गीत का आनंद लीजिए





राणाजी म्हारे, गुस्से में आए, ऐसो बल खाए, अगिया बरसाए, घबराए म्हारो चैन
जैसे दूर देस के,
जैसे दूर देस के, टावर में घुस जाए रे एरोप्लेन
राणाजी म्हारे ...

राणाजी म्हारे, एसो गुर्राए, एसो थर्राए, भर आये म्हारे नैन
जैसे सरे आम ही,
जैसे सरे आम इराक में जाके जम गए अंकल सैम
राणाजी म्हारे...

राणाजी म्हारी सास ननद के ताने, राणाजी म्हारे जेठ ससुर की बानी
राणाजी थापे भूत परेत की छाया, राणाजी थापे इल बिल जिन का साया
सजनी को डियर बोले, ठर्रे को बीयर बोले, माँगे है इंग्लिस बोली, माँगे है इंग्लिस चोली
माँगे है इंग्लिस जयपुर, इंग्लिस बीकानेर
जैसे बिसलेरी की ,
जैसे बिसलेरी की बोतल पी के बन गए इंग्लिस मैन
राणाजी म्हारे...

राणाजी म्हारी सौतन को घर ले आये
पूछे तो बोले फ्रेंड हमारी है हाए
राणाजी ने ठंडा चक्कू यूँ खोला
बोले कि हाए ठंडा माने कोका कोला
राणाजी बोले मोरों की बस्ती में है शोर राणी
क्यों की ये दिल मांगे मोर, मोर रानी, मोर राणी, मोर राणी ..
म्हारी तो बीच बजरिया, हाए बदनामी हो गयी
म्हारी तो लाल चुनरिया, सरम से धानि हो गयी
म्हारो तो धक् धक् होवे, जो जो बीते रैन
जैसे हर इक बात पे ...
जैसे हर इक बात पे डिमोक्रिसी में लगने लग गयो बैन ...

जैसे दूर देस के, टावर में घूस जाए रे एरोप्लेन
जैसे सरे आम इराक में जाके जम गए अंकल सैम
जैसे बिना बात अफगानिस्ताँ का
जैसे बिना बात अफगानिस्ताँ का बज गया भैया बैंड

जैसे दूर देस के, टावर में घुस जाए रे एरोप्लेन
राणाजी म्हारे ...


Saturday, January 23, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 19 - शंकर की मस्ती और प्रसून का जादू मन को अति भावे..

तो हो जाइए थिरकने को तैयार क्यूँकि आ रहा है वार्षिक संगीतमाला की 19 वीं पॉयदान पर एक ऐसा गीत जो ना केवल आपको झूमने पर विवश करेगा बल्कि साथ ही हिंदी के उस रूप की भी आपको याद दिला दे जाएगा जिसे आज के हिंग्लिश माहौल में लगभग आप भूल चुके हैं।


लंदन ड्रीम्स के इस रोमांटिक गीत में परस्थिति ये है कि नायक मस्ती में भावविहृल हो उठे हैं और अपने प्रेम के इस जुनून को शब्दों में व्यक्त करना चाहते हैं। जब फिल्म के निर्देशक गीतकार प्रसून जोशी के पास इस परिस्थिति को ले कर गए तो प्रसून को गीत के स्वरूप को ढालने में तीन चार दिनों का वक़्त लगा। प्रसून को लगा कि हिंदी के आलावा बृज भाषा के लहज़े को भी गीत में आत्मसात किया जाए। ज़ाहिर सी बात है कि प्रसून यह दिखाना चाहते थे कि जब भी हम भावातिरेक में होते हैं तो कुछ वैसे शब्दों का इस्तेमाल जरूर करते हैं जो कि हमारी आंचलिक भाषा से जुड़े हों.

पर आंचलिक शब्दों का सहारा प्रसून ने मुख्यतः मुखड़े में लिया है। गीत के पहले अंतरे से ही वो विशुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग करते हैं। दरअसल ये गीत इस बात को सामने लाता है कि आज के हिंदी गीतकारों ने किस तरह अपने आप को उन्हीं रटे रटाये चंद जुमलों में संकुचित कर लिया है। आज की खिचड़ी भाषाई संस्कृति से जुड़ते युवा वर्ग के लिए प्रसून का ये प्रयोग वाकई काबिल-ए-तारीफ़ है। युवा वर्ग में इस गीत की लोकप्रियता इस बात को साबित करती है कि अगर सलीके से तत्सम शब्दों का प्रयोग किया जाए तो उसका भी एक अलग आनंद होता है। अपने इस गीत के बारे में बनाए गए वीडिओ में प्रसून कहते हैं...

इस गीत को रचते समय मेरे मन में सलमान खाँ का वो रूप आया जिसे मैं पसंद करता हूँ। गीत की भावनाओं में प्रेम का जुनून उन्हीं को ध्यान में रख कर आया है। इस गीत में हिंदी के ऍसे शब्दों का हुज़ूम है जो कि आपको आनंदित कर देगा। मैंने कोशिश की है कि इस गीत में वैसे शब्दों का प्रयोग करूँ जो खड़ी बोली या संस्कृत से आए हैं। ये वैसे शब्द हैं जिन्हें लोगों ने सालों साल नहीं सुना होगा या उन्हें अपनी स्कूल की हिंदी पुस्तकों में पढ़ा होगा।
शंकर अहसान लॉए की तिकड़ी द्वारा संगीतबद्ध लंदन ड्रीम्स के इस गीत की प्रकृति इस एलबम के अन्य गीत जो कि कॉनसर्ट के माहौल में गाए से सर्वथा भिन्न है। इस गीत को गाने में जिस मस्ती और जिस पागलपन की जरूरत थी उसे शंकर महादेवन ने बखूबी पूरा किया है। तो गीत का प्ले बटन दबाने के पहले ज़रा खड़े हो जाइए और गीत के अनुरूप शरीर में ऐसी लोच पैदा कीजिए कि धरती कंपित हो उठे..



मन को अति भावे सैयाँ करे ताता थैया,
मन गाए रे हाए रे हाए रे हाए रे हाए रे
हम प्रियतम हृदय बसैयाँ पागल हो गइयाँ
मन गाए रे हाए रे हाए रे हाए रे हाए रे
जो मारी नैन कंकरिया तो छलकी प्रेम गगरिया
और भीगी सारी नगरिया, सब नृत्य करे संग संग
तोरे बान लगे नस नस में, नहीं प्राण मोरे अब बस में
मन डूबा प्रेम के रस में, हुआ प्रेम मगन कण कण
हो बेबे बेबे सौंपा तुझको तन मन

मन को अति भावे सैयाँ करे ताता थैया,
मन गाए रे हाए रे

क्या उथल पुथल बावरा सा पल, साँसों पे सरगम का त्योहार है
बनके मैं पवन चूम लूँ गगन, हो ॠतुओं पे अब मेरा अधिकार है
संकेत किया प्रियतम ने आदेश दिया धड़कन ने
सब वार दिया फिर हमने, हुआ सफल सफल जीवन
अधरों से वो मुस्काई काया से वो सकुचाई
फिर थोड़ा निकट वो आई था कैसा अद्भुत क्षण
ओ बेबे बेबे मैं हूँ संपूर्ण मगन
मन को अति भावे.... हाए रे...

हो पुष्प आ गए, खिलखिला गए उत्सव मनाता है सारा चमन
चंद्रमा झुका सूर्य भी रुका, दिशाएँ मुझे कर रही हैं नमन
तूने जो थामी बैयाँ सबने ली मेरी बलैयाँ
सुध बुध मेरी खो गइयाँ हुआ रोम रोम उपवन
जब बीच फसल लहराई, धरती ने ली अँगड़ाई
और मिलन बदरिया छाई, कसके बरसा सावन
ओ बेबे बेबे सब हुआ तेरे कारण
मन को अति भावे.... हाए रे...

लंदन ड्रीम्स का ये गीत फिल्म में सलमान और असिन पर फिल्माया गया है।


और हाँ आपकी पसंद जानने के लिए साइड बार में एक वोटिंग भी चालू कर दी गई है। उसमें हिस्सा लें ताकि आप सब की पसंद का पता लग सके।

Thursday, January 21, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 20 - जहाँ शंकर महादेवन और श्रेया साथ हैं मेलोडी के इस सफ़र में

कहते हैं प्यार की शुरुआत आँखों की देखा देखी से शुरु होती है। वो गीत याद है ना आपको नैन लड़ जहिएँ तो मनवा मा कसक होइबे करी....। अब इन आँखों पर शायरों ने एक से एक उम्दा शेर कहे हैं तो भला गीतकार कैसे पीछे रहें। हर साल किसी ना किसी की प्यारी आँखों का जिक्र फिल्मी गीतों में आ ही जाता है । अब 2006 की बात करें गुलज़ार साहब ने नैनों के बारे में ओंकारा में लिखे अपने गीत में बड़ा ही खूबसूरत जुमला रचा था...

नैणों की जुबाँ पे भरोसा नहीं आता, लिखत पढ़त ना रसीद ना खाता !
पिछले साल के गीतों ने भी ये परंपरा बनाए रखी है और उनमें से दो गीत इस संगीतमाला का हिस्सा बन पाए हैं। नैनों के बरसने की बात अगर की जाए तो एकदम से लता दी का गाया नैना बरसे.... याद आ जाता है। पर नवोदित गीतकार रजत अरोड़ा 20 वीं पॉयदान के इस गीत में नैनों के 'बरसने' की जगह उनके 'हँसने' की बात कर रहे हैं।

ये गीत है फिल्म चाँदनी चौक तो चाइना का जो ठीक एक साल पहले पिछली जनवरी में प्रदर्शित हुई थी। वैसे तो इस फिल्म के बाकी गीत कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए थे पर फिल्म का ये रोमांटिक नग्मा जरूर एक अलग तरह की खुशबू से सराबोर कर गया था।

यह गीत अगर इस संगीतमाला में अपना स्थान बना पाया है तो वह अपने बोलों की वजह से नहीं बल्कि अपनी बेहद प्यारी मेलोडी और खूबसूरत गायिकी के लिए। हल्की बीट्स से शुरु होते इस गीत में जैसे शंकर महादेवन गीत का मुखड़ा गुनगुनाते है मन इस गीत से बँध सा जाता है। शंकर की गायिकी के बारे में बाते करने के लिए तो आगे भी काफी मौके मिलेंगे। शंकर का इस गीत में साथ दिया है श्रेया घोषाल ने। श्रेया ने अपनी सामान्य शैली से हटकर गीत में रूमानियत का एक पुट देने की कोशिश की है।

शंकर एहसान लॉए द्वारा संगीतबद्ध इस गीत की लय आपके दिल में काफी सुकून पहुँचाएगी ऐसा मुझे यकीं है... तो सुन कर देखिए ये नग्मा और बताइए ये कैसा लगा आपको ?



तेरे नैना....हँस दिए
बस गए...मेरे दिल में, तेरे नैना....


मेरे दिल में जो अरमाँ हैं, पास आके ज़रा देखो न
दिल के तार में है सरगम ,छेड़े है अब कोई अनजाना


यह प्यार की है बातें, कुछ अनकही मुलाकातें
हो...ऐसे ही मिलते है, मिलके मचलते है दो दिल जवाँ


तेरे नैना.....नैना

हो...अब देखो मिल गए हो तो
फिर से ना कहीं खो जाना
आँखों में ही रहना
बाहों में तुम मेरी सो जाना


हो..मेरे पास तू जो आए
तो ख़ुदा मुझे मिल जाए
हो..होंठो को होंठो से मिलने दे
सिलने दे दूर न जा...


तेरे लिए...चारों ओर ढूँढा मैंने
मिल गई..जो तू मुझे
मिल गया
सारा जहाँ सारा यहाँ, अब चाहूँ मैं क्या

मेरे लिए..सपना था

यह प्यार तेरा
खोली आँखें
सामने था मेरे लिए
यार मेरा प्यार तेरा ,अब चाहूँ मैं क्या

हो..ऐसे न मुझको सदा दे
पास आ ना अब तू सजा दे
हो..सबसे चुरा लूँ मैं
जग से छुपा लूँ मैं
इतने पास आ..

मेरे दिल के जो ... अनजाना
यह प्यार ...... दिल जवाँ

तेरे नैना.....



नैनों की बातें इस संगीतमाला में आगे भी चलती रहेंगी आखिर..
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं
इन आँखों के वाबस्ता अफसाने हजारों हैं

Monday, January 18, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 21 - क्या आपकी जिंदगी से भी कोई शख्स गुमशुदा है?

हिंदी फिल्म संगीत में कई बार ऍसा होता है कि जब आप किसी गीत को सिर्फ सुनते हैं तो वो आप पर जबरदस्त प्रभाव डालता है पर फिल्म को देखते समय वो गीत कहानी में घुलता मिलता नज़र नहीं आता। पर दूसरी ओर परिस्थितिजन्य गीत होते हैं जो कहानी की पटकथा के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं। ऐसे गीत एकबारगी सुनने में तो वो असर नहीं डालते पर फिल्म देखने के बाद धीरे धीरे मन में बैठने लगते हैं। वार्षिक संगीतमाला 2009 की 21 वीं पॉयदान पर एक ऐसा ही गीत विराजमान है। इस गीत की धुन बनाई शान्तनु मोइत्रा ने, इसे लिखा स्वानंद किरकिरे ने और अपनी मखमली आवाज़ से इसमें रंग भरे गायक शान ने।

स्वानंद किरकिरे को फिल्म '3 Idiots' की पटकथा लिखते समय से ही इस परियोजना में शामिल कर लिया गया था। इसलिए इस फिल्म के सारे गीतों के बोल पटकथा की धारा के साथ बहते नज़र आए। All Izz Well की उत्पत्ति के बारे में स्वानंद जी की राय से मैं आपको पहले ही अवगत करा चुका हूँ। आज जानते हैं कि स्वानंद के जोड़ीदार शान्तनु क्या कहते हैं इस गीत के बारे में ।

वैसे शान्तनु मोइत्रा एक ऐसे संगीतकार हैं जो अपनेआप को पूर्णकालिक संगीतकार नहीं मानते। एड जिंगल करते करते फिल्म उद्योग का रास्ता देखने वाले शान्तनु को संगीत से उतना ही प्यार है जितना कि खगोल विज्ञान, घुमक्कड़ी और पर्वतारोहण से। साल में वो चुनिंदा फिल्म करते हैं। हजारों ख्वाहिशें ऐसी और परिणिता के माध्यम से 'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमाला 2004 और 2005 में ऊपर की पॉयदानों पर धूम मचा चुके हैं।

शान्तनु इस गीत के बारे में कहते हैं
हमारा ये गीत ऍसे एक शख़्स की कहानी कहता है जो हमारी जिंदगी में आया,हमें जानने की कोशिश की,जिसने हमारे दिल को छुआ और फिर अपने विचारों से आगे बढ़ने की रोशनी दिखाकर इतनी सहजता से हमारी जिंदगी से अलग हो गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। सालों बाद जब आप उसके बारे में सोचते हैं तो लगता है अरे वो तो कभी स्मृति पटल से दूर गया ही नहीं। और मन अनायास ही उद्विग्न हो उठता है कि आखिर वो गया कहाँ?

शान्तनु ने जो बात कही है उसकी सच्चाई से शायद ही मुझे या आपको संदेह होगा। इसी बात को पुरज़ोर ढंग से रखने में गायक गीतकार और संगीत निर्देशक की जोड़ी कामयाब हुई है। स्वानंद के सहज बोल,शान्तनु का बहता संगीत खासकर मुखड़े के बाद का टुकड़ा और इंटरल्यूड्स मन को बेहद सुकून देते हैं। शान की आवाज़ की मुलायमियत आपको अतीत की यादों की पुरवाई में भटकने को बाध्य करती है।

तो आइए इस गीत के बोलों को पढ़ते हुए सुनें इस गीत को


बहती हवा सा था वो
उड़ती पतंग सा था वो
कहाँ गया उसे ढूँढो...

हम को तो राहें थीं चलाती
वो खुद अपनी राह बनाता
गिरता सँभलता मस्ती में चलता था वो
हम को कल की फिक्र सताती
वो बस आज का जश्न मनाता
हर लमहे को खुल के जीता था वो
कहाँ से आया था वो
छूके हमारे दिल को
कहाँ गया उसे ढूँढो

सुलगती धूप में छाँव के जैसा
रेगिस्तान में गाँव के जैसा
मन के घाव में मरहम जैसा था वो
हम सहमे से रहते कुएँ में
वो नदिया में गोते लगाता
उल्टी धारा चीर के तैरता था वो
बादल आवारा था वो
प्यार हमारा था वो
कहाँ गया उसे ढूँढो

हम को तो राहें थीं चलाती.....
.........कहाँ गया उसे ढूँढो




चलते चलते एक मज़ेदार तथ्य जो इस से गीत से जुड़ा है वो आपसे बाँटता चलूँ। जब इस गीत की रिकार्डिंग पूरी हो चुकी थी तो निर्देशक राजकुमार हिरानी के बुलावे पर आमिर स्टूडिओ आए।

हिरानी ने तब आमिर से कहा जानते हो फिल्म में इस गीत के आलावा कब ये गीत पूरे देश में बजेगा? आमिर असमंजस में थे कि राजकुमार जी ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा ये तुम्हारा Funeral Song होगा ये। मरोगे तब टेलीविजन पर इसी गीत के माध्यम से तुम्हें याद किया जाएगा। ये सुनकर आमिर हँस पड़े।

Saturday, January 16, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 22 - ये जिंदगी भी क्या क्या हमको दिखलाती है..

तो भाइयों और बहनों वार्षिक संगीतमाला की 22 वीं पायदान पर गाना वो जिसे लिखा जावेद अख्तर साहब ने धुन बनाई एक संगीतकार तिकड़ी ने और गीत को गाया एक दूसरे संगीतकार ने। प्रतिस्पर्धा के इस युग में आजकल ये स्वस्थ परंपरा चली है कि संगीतकार कुछ दूसरे संगीतकारों को अपने गानों पर गवा रहे हैं। विशाल ददलानी, सलीम मर्चेंट इसके कुछ उदहारण हैं जिन्हें दूसरे संगीतकारों ने अपनी फिल्मों में गवाया है।


पर आज मैं इन दोनों की नहीं बल्कि विशाल शेखर की जोड़ी वाले शेखर रवजियानी की बात कर रहा हूँ जिन्होंने पहली बार किसी दूसरे संगीत निर्देशक के लिए गाना गाया। वैसे इससे पहले शेखर अपनी आवाज़ का हुनर झंकार बीट्स, ब्लफमॉस्टर, गोलमाल आदि फिल्मों में दिखा झुके हैं। पर ये फिल्में विशाल शेखर की खुद की फिल्में थीं। फिर शंकर अहसॉन लॉय द्वारा संगीत निर्देशित फिल्म लक बाई चांस में उन्होंने माइक्रोफोन कैसे उठा लिया ?

अधिकतर पाश्चात्य रिदम पर संगीत रचने वाले पर साथ ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत शेखर इस बारे में कहते हैं

"मैंने अपने लिए ऐसा कोई नियम नहीं बना रखा था कि दूसरों के लिए ना गाऊँ पर मुझे किसी विशिष्ट गीत का इंतजार था। इसलिए जब शंकर अहसॉन लॉय मेरे पास ये जिंदगी भी.... गाने का प्रस्ताव ले के आए तो मुझे लगा कि इस गीत में वो खास बात है। मुझे इस गीत में एक मुलायमियत दिखी। वैसे भी जावेद साहब जब बोल लिखें तो उनमें कुछ तो अलग होता ही है।"

तो आइए देखें वाकई क्या खास बात है इस गीत में. पहली तो इसकी आरंभिक बीट्स जो गीत के मूड को बना देती है। मुखड़ा तो ठीक ठाक है ही पर मुझे असली आनंद तब आता है जब शेखर जावेद कर इन बोलों को खत्म कर.. ..

जाने हमको क्या पाना है सोचो क्या है अपनी मंजिल
समझाने से कब माना है देखो करता ज़िद है
ये दिल

छूने हैं....तारे इसे चाहिए... सारे इसे .....से अपने सुर को ऊपर उठाते हैं और फिर शंकर अहसान लॉय द्वारा दिया गया इंटरल्यूड मन को प्रसन्न कर देता है। तो मेरी राय ये है कि अगर आपका मन कुछ बुझा बुझा है तो इस गीत की खुराक लीजिए। विश्वास कीजिए आप पहले से अच्छा महसूस करेंगे।

ये जिंदगी भी क्या क्या हमको दिखलाती है सपनों की धुँधली राह में
ये जिंदगी भी हमें कहाँ ले के आ जाती है इक अनजानी सी चाह में
जाने हमको क्या पाना है सोचो क्या है अपनी मंजिल
समझाने से कब माना है देखो करता ज़िद है ये दिल
छूने हैं....तारे इसे चाहिए... सारे इसे

ये जिंदगी भी कितनी बातें कह जाती है इक सीधी साधी बात में
ये जिंदगी भी क्यूँ इतने ख्वाब सजाती है हर सूनी सूनी रात में
ख्वाबों में कोई अरमाँ है पूछो दिल से अरमां क्या है?
मुश्किल है या वो आसाँ है सुन लो ये दिल कहता है
छूने हैं....तारे इसे चाहिए... सारे इसे

जो पलकों के तले है अपने सपने ले के चले ये कह दो वो चले सँभल के
ना करना कोई गिले कहीं जो ठोकर ऍसी लगे कि सपने टूटे आँसू छलके



अगर आपको याद नहीं आ रहा कि फिल्म में ये गीत कब था तो ये बता दूँ कि ये गीत लक बाइ चांस की शुरुआत में प्रयुक्त हुआ है



Thursday, January 14, 2010

जन्मदिन विशेष : कैसे शुरु हुआ इस महान शायर की शायरी का सफ़र ?

अच्छा लगता है जब ये पता लगता है कि आप अपना जन्मदिन किसी ऐसी विभूति के साथ शेयर करते हों जिसे आप दिल से पसंद करते हों और फिर वो व्यक्ति एक बेहतरीन शायर हो तो बात ही क्या! पिछले साल जब वो महान शायर इस दुनिया से चला गया तो उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि देने के लिए एक पोस्ट लिखी थी। इस बात का इल्म भी तभी हुआ और उसी वक़्त मैंने ये सोचा था कि अपने जन्म दिवस पर उन्हें जरूर याद करूँगा।

जी हाँ वो शायर हैं सैयद अहमद शाह वल्द अहमद 'फ़राज़' जिनका आज जन्मदिन है।:)

इश्क़िया शायरी के बेताज बादशाह रहे फ़राज़ को शेर ओ शायरी से इश्क़ कैसे हुआ, ये भी एक मज़ेदार किस्सा है। इस किस्से का पता मुझे डा. साजिद अहमद के 'अहा जिंदगी' में लिखे गए लेख से हुआ। इस प्रसंग का उल्लेख डा. साजिद कुछ यूँ करते हैं


वह लड़की बहुत देर से उसकी ओर देख रही थी, "मैंने तुमसे कुछ पूछा था। इतनी देर हो गई तुम कुछ बोलते क्यूँ नहीं।"

"बोल तो रहा हूँ किताब के बहुत से शेर याद हैं।"

गजब ख़ुदा का। अभी बोले हो। इससे पहले कब बताया कि तुम्हें शेर आते हैं? उस लड़की ने चहकते हुए कहा,"एक तो मुसीबत ये है कि तुम बोलते बहुत कम हो। बिल्कुल लड़कियों की तरह शर्माते हो। खुद से बातें करते हो और समझते हो, दूसरों से बोल रहे हो।"

"मुझे शेर क्यूँ नहीं आते होंगे। मेरे वालिद तो खुद शायर हैं। उनके पास कई शायर आते हैं। एक दूसरे को शेर भी सुनाते हैं।"

"अच्छा मान लिया कि तुम्हें शेर आते हैं अब ये बताओ बैतबाजी जानते हो? " "मैं तु्म्हें बताती हूँ, वह एकदम उसकी उस्तादनी बन गई। देखो एक शेर पढ़ा जाता है। यह शेर जिस लफ्ज़ पर खत्म होता है, उस लफ्ज़ के आखिरी हर्फ से जवाब देना होता है यानि दूसरा शेर उसी हर्फ से शुरु होना चाहिए। उस लड़की ने उसे विभिन्न उदाहरणों से समझाया और वो प्रकटतः समझ गया कि बैतबाजी क्या होती है। बल्कि ये खेल तो उसे बेहद आसान लगा।

"आओ उधर चलकर बैठते हैं। मैं तुम्हें इस खेल के कुछ और उसूल सिखाती हूँ।" वह अब उसकी विद्वता से प्रभावित हो चुका था। चुपचाप उठा और उसके साथ चलता हुआ कमरे से दूर,बरामदों में आकर बैठ गया। उस लड़की ने एक शेर पढ़ा, जो 'न' पर खत्म हो रहा था। अब लड़के को एक ऐसा ही शेर पढ़ना था जो 'न' से शुरु हो रहा था। उसने कुछ देर सोचा, और एक शेर तलाश कर लिया। यह शेर 'ब' पर खत्म होता था। लड़की ने फोरन 'ब' से शुरु होने वाला शेर पढ़ दिया। यह सिलसिला चार पाँच शेरों तक चला ही था कि लड़के को शिकस्त माननी पड़ी। उसे स्वीकार करना पड़ा कि शेर याद होना एक बात है और मौके पर उसका याद आ जाना दूसरी बात है। लड़की विजय की हँसी हँस रही थी और लड़के की मर्दाना गैरत पेंचो ताब खा रही थी

यह लड़का सैयद अहमद शाह था और लड़की उसके वालिद के दोस्त की बेटी। उस रोज़ वो लड़की रुखसत हुई, तो अहमद शाह कुछ बुझा बुझा सा दिखाई दे रहा था। उसे शिद्दत से अहसास हो रहा था कि वह बैतबाज़ी में उस लड़की से मात खा गया है। वह एक दृढ़ता से उठा और घर में रखी हुई पिता की किताबों का जायज़ा लेने लगा। अहमद शाह ने कभी उन्हें हाथ नहीं लगाया था, लेकिन आज उसे उसकी मासूम जरूरत उसे उस दस्तरख्वान तक ले आई थी। उसने हाथ बढ़ाया. पहले एक फूल तोड़ा फिर दूसरा.....


ये तो थी अहमद 'फ़राज़' की शेर-ओ-शायरी में आरंभिक दिलचस्पी की वज़ह। पर इतनी तैयारी के बावजूद फ़राज़ अगली बार उसी लड़की से बैतबाजी में फिर मात खा बैठे। नतीज़ा ये हुआ कि वो दिलो जान से शेरो-शायरी के पन्ने पढ़ते और कंठस्थ करते गए। रदीफ, काफ़िया और ग़ज़ल के व्याकरण के तमाम नियम उनके अवचेतन मन में समाते चले गए और एक दिन वो आया कि बैतबाजी खेलते समय जब वो अँटके तो उन्होंने अपना ही एक शेर बना डाला और आखिरकार उस दिन बड़ी मुश्किलों के बाद उन्हें बैतबाजी में पहली फतह मिली। बैतबाजी में अपने शेर रचने का ये सिलसिला जो शुरु हुआ वो फिर कभी नहीं थमा। अब वो रोजमर्रा के अनुभवों को शेर की शक्ल में ढालने लगे। अहमद फ़राज़ ने अपनी शायरी को आगे जिस मुकाम तक पहुँचाया वो तो उर्दू शायरी में रुचि रखने वाले भली भांति जानते हैं।


तो ये थी अहमद फ़राज़ के शेर ओ शायरी से इश्क़ के पीछे की कहानी। चलते चलते फ़राज़ के चंद पसंदीदा शेर आपसे बाँटना चाहूँगा जो शायद पहले आपने ना पढ़े हों

मेरी खुशी के लमहे मुख़्तसर हैं इस क़दर फ़राज़
गुजर जाते हैं मेरे मुस्कुराने के पहले


बहुत अज़ीब हैं मोहब्बत की बंदिशें फ़राज़
ना उस ने क़ैद में रखा ना हम फ़रार हुए

अब मिलेंगे उसे तो खूब रुलाएँगे फ़राज़
सुना है उन्हें रोते हुए लिपट जाने की आदत है


तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ

तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ

अहमद फ़राज़ भले ही हमारे बीच आज नहीं हों पर यही उम्मीद है कि उनकी शायरी हमारे और आने वाली पीढ़ियों के ज़ेहन से कभी नहीं दूर हो पाएगी।

Sunday, January 10, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 23 - रातों रात तारा कोई,चाँद या सितारा कोई, गिरे तो उठा लेना

वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं पॉयदान पर एक नई तिकड़ी विराजमान है। यहाँ संगीतकार प्रीतम हैं पर गायक नीरज श्रीधर नहीं, गुलज़ार हैं पर विशाल भारद्वाज नहीं और तो और अभिजीत का साथ देने के लिए अलका यागनिक भी नहीं मौज़ूद। निर्देशक प्रियदर्शन ने गुलज़ार और प्रीतम को ये सोच कर अनुबंधित किया कि फिल्म के गीत ऐसे हों जो जिनमें आज के संगीत की झलक तो हो पर साथ में भावनाएँ भी हो जो दिल को छू सके। वैसे इस तिकड़ी ने इस गीत में प्रियदर्शन को निराश नहीं किया इसीलिए वे कहते हैं कि ये गीत उनकी बनाई फिल्मों का ये सबसे बेहतरीन गीत है। प्रीतम,गुलज़ार और अभिजीत दा ने मिलकर एक ऐसे गीत की रचना की है जिसमें रुमानियत तो है ही, साथ है बेहतरीन मेलोडी ।



गीत गिटार की मधुर तान से शुरु होता है। फिर आता है लड़कियों का कोरस और उसमें से उभरता अभिजीत दा का मखमली स्वर। ये तो नहीं कहूँगा कि गुलज़ार ने अपने शब्दों में कुछ नए बिंबों का इस्तेमाल किया है फिर भी उनका करिश्मा इतना जरूर है कि गीत को सुनकर इसके मुखड़े को गुनगुनाते रह जाएँ।

तो आखिर ये गीत कौन सा है। ये गीत है साल के शुरु में सुर्खियाँ बटोरने वाली फिल्म बिल्लू का और अगर अब तक आपने इसे नहीं सुना तो मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि खुदाया खैर :)...

प्रीतम ने इस गीत के बनने की बातों को याद करते हुए कहते हैं

मैंने इस गीत की शुरुआत ओ रब्बा हो ओओ ओओ..से करने की सोची थी पर गुलज़ार ने उसे ख़ुदाया खैएएएर कर गीत का प्रभाव ही बढ़ा दिया। मैं अपने गीतों का कोई हिस्सा खाली नहीं छोड़ता, यानि मेरे गीतों में आर्केस्ट्राइसेशन खूब होता है। पर इस गीत में मैंने अपने बहुत सारे वाद्य यंत्र हटा किये to make it simple.
दरअसल प्रीतम की ये 'imposed simplicity' हमारे जैसे सुनने वालों के कानों को सुकून देने वाली हो गई। तो आइए सुनें पहले अभिजीत दा की आवाज़ में इस गीत को



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इसी गीत के दूसरे वर्जन को गाया है सोहम चक्रवर्ती,आकृति कक्कड़ और मोनाली ने। पर मुझे दूसरे वर्सन से कहीं ज्यादा अभिजीत का सोलो प्रभावित करता है।

रातों रात तारा कोई, चाँद या सितारा कोई
गिरे तो उठा लेना
ओ सुनियों रे
तारा चमकीला होगा,चाँद शर्मीला होगा
नथ में लगा लेना

जरा सी साँवरी है वो
ज़रा सी बावरी है वो
वो सुरमे की तरह मेरी
आँखों में ही रहती है

सुबह के ख्वाब से उड़ाई है
पलकों के नीचे छुपाई है
मानो ना मानो तुम
सोते सोते ख्वाबों में भी ख्वाब दिखाती है
मानो ना मानो तुम
परी है वो परी की कहानियाँ सुनाती है

खुदाया खैर, खुदाया खैर, खुदाया खैर, खुदाया खैर

रातों रात तारा कोई...नथ में लगा लेना

तू हवा मैं ज़मी, तू जहाँ मैं वहीँ
जब उडे मुझे ले के क्यूँ उड़ती नही
तू घटा मैं ज़मी,तू कहीं मैं कहीं
क्यों कभी मुझे लेके बरसती नही

जरा सी साँवरी है वो... रहती है
सुबह के ख्वाब....खुदाया खैर

जब दाँत में ऊँगली दबाये
या ऊँगली पे लट लिपटाये
बादल ये चढ़ता जाए, हो...

कुछ कर के वो बात को टाले
जब माथे पे वो बल डाले
अम्बर यह सिकुड़ता जाए हो........

वो जब नाखून कुतरती है,तो चंदा घटने लगता है
वो पानी पर कदम रखे, सागर भी हट जाता है

सुबह के ख्वाब....
खुदाया खैर,खुदाया खैर,खुदाया खैर,खुदाया खैर


Friday, January 08, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - पायदान संख्या 24 - कहाँ से आई ये मसककली ?

वार्षिक संगीत माला की 24 वीं पायदान पर स्वागत कीजिए मोहित चौहान, ए आर रहमान और प्रसून जोशी की तिकड़ी का। इस तिकड़ी का ही कमाल है कि मसककली के माध्यम से इन्होंने कबूतर जैसे पालतू पक्षी की ओर हम सबका ध्यान फिर से आकर्षित कर दिया।:)

वैसे पुरानी दिल्ली की छतों पर तो नहीं पर कानपुर के अपने ननिहाल वाले घर में कबूतरों को पालने और पड़ोसियों के कबूतर को अपनी मंडली में तरह तरह की आवाज़े निकालकर आकर्षित करने के जुगाड़ को करीब से देखा है। इतना ही नहीं शाम के वक़्त उन्हीं आवाजों के सहारे झरोखों से मसककलियों को भी निकलते देख बचपन में मैं हैरान रह जाता और सोचता क्या ये गुर मामा हमें भी सिखाएँगे।

आप भी सोच रहे होंगे कि गीत के बारे में कुछ बातें ना कर ये मैं क्या कबूतरों की कहानी ले कर बैठ गया। अब क्या करें पहली बार जब टीवी के पर्दे पर मसकली को सलोनी सोनम कपूर के ऊपर फुदकते देखा तो मन कबूतर कबूतरी की जोड़ी पर अटक गया और गीत के बोल उनके पीछे भटक गए। गीत सुनते समय मुझे ये लगा था कि पहले अंतरे में मनमानी मनमानी कहते कहते मोहित की आवाज़ वैसे ही अटक गई है जैसे पुराने रिकार्ड प्लेयरों की अटकती थी।

वो तो भला हो कलर्स (Colors) वालों का जिन्होंने दिसंबर के महिने में जब ये फिल्म दिखाई तो फिर इस गीत को गौर से सुनने का मौका मिला। ये भी समझ आया कि प्रसून कबूतर के साथ कम और नायिका रूपी कबूतरी से ज्यादा बातें कर रहे हैं इस गीत के माध्यम से। प्रसून की विशेषता है कि उनका हिन्दी भाषा ज्ञान आज के गीतकारों से कहीं ज्यादा समृद्ध है। इसलिए वो जब प्यारे किंतु सहज हिंदी शब्दों का चयन अपने गीतों में करते हैं तो गीत निखर उठता है। पर कहीं कहीं मीटर से बाहर जाने की वज़ह से गीत को निभाने में जो कठिनाई आई है उसे मोहित चौहान ने चुनौती के रूप में लेकर एक बेहतरीन प्रयास किया है।

वैसे आप ये जरूर जानने को उत्सुक होंगे कि ये मसककली शब्द आया कहाँ से । इस गीत की उत्पत्ति के बारे में प्रसून ने 'मिड डे' को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया था

'मसककली' शब्द का निर्माण तो अनायास ही हो गया। रहमान अपनी एक धुन कंप्यूटर पर बजा रहे थे कि उनके मुँह से ये शब्द निकला। मैंने पूछा ये क्या है तो वो मुस्कुरा दिए। पर वो शब्द मेरे दिमाग में इस तरह रच बस गया कि मैंने उसे अपने गीत में इस्तेमाल करने की सोची और इसीलिए कबूतर का नाम भी मसककली रखा गया़।

और तो और एक मजेदार तथ्य ये भी है कि प्रसून के इस गीत ने लका प्रजाति के कबूतरों के दाम दिल्ली के बाजारों में आठ गुना तक बढ़ा दिए और लोग विदेशी कबूतरों से ज्यादा इसे ही लेने के पीछे पड़े रहे।

तो मोहित चाहौन की गायिकी और रहमान की धुन की बदौलत से ये गीत जा पहुँचा है मेरी इस गीतमाला की 24 वीं पायदान पर। तो इस गीत को सुनिए देखिए कहीं मसककली की तरह आपका मन हिलोरें हिलोरें लेते लेते फुर्र फुर्र करने के लिए मचल ना उठे।




ऐ मसककली मसककली, थोड़ा मटककली मटककली
ऐ मसकली मसा मसा कली, थोड़ा मटककली मटककली

ज़रा पंख झटक गई धूल अटक
और लचक मचक के दूर भटक
उड़ डगर डगर कस्बे कूचे नुक्कड़ बस्ती
तड़ी से मुड़ अदा से उड़
कर ले पूरी दिल की तमन्ना, हवा से जुड़ अदा से उड़
पुर्र भुर्र भुर्र फुर्र, तू है हीरा पन्ना रे
मसककली मसककली, थोड़ा मटककली मटककली


घर तेरा सलोनी, बादल की कॉलोनी
दिखा दे ठेंगा इन सबको जो उड़ना ना जाने
उड़ियो ना डरियो कर मनमानी मनमानी मनमानी
बढ़ियो ना मुड़ियो कर नादानी
अब ठान ले , मुस्कान ले, कह सन ननननन हवा
बस ठान ले तू जान ले,कह सन ननननन हवा

ऐ मसककली मसककली, थोड़ा मटककली मटककली
ऐ मसकली मसा मसा कली, थोड़ा मटककली मटककली

तुझे क्या गम तेरा रिश्ता, गगन की बाँसुरी से है
पवन की गुफ़्तगू से है, सूरज की रोशनी से है

उड़ियो ना डरियो कर मनमानी मनमानी मनमानी
बढ़ियो ना मुड़ियो कर नादानी

ऐ मसकली मसकली, उड़ मटककली मटककली
ऐ मसकली मसा मसा कली, उड़ मटकली मटकली
अब ठान ले , मुस्कान ले, कह सन ननननन हवा
बस ठान ले तू जान ले,कह सन ननननन हवा


Tuesday, January 05, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - पायदान संख्या 25 : आज के युवा छात्रों की जिंदगी में झाँकते स्वानंद किरकिरे

थ्री इडियट्स के गाने मैंने करीब तीन हफ्ते पहले सुने थे और एक बारगी सुन कर मन उतना प्रसन्न भी नहीं हुआ था। कारण थे स्वानंद किरकिरे। हजारों ख्वाहिशें ऍसी में उनका पहला गीत बावरा मन देखने चला एक सपना हो या परिणिता का रात हमारी चाँद की सहेली है या फिर और उसके बाद खोया खोया चाँद में उनके गीतों की काव्यात्मकता हो या फिर लागा चुनरी में दाग में दो बहनों की अल्हड़ चंचलता को उभारता उनका प्यारा गीत हो, वो हमेशा मन में अपने गीतों से अलग सा अहसास जगाते थे।

सो मैंने फेसबुक पर जाकर उनसे अपनी निराशा प्रकट कर दी पर फिल्म में उनके गीतों का सफ़र देख इतना जरूर लग गया था कि काव्यात्मकता से हिंगलिश गानों का सफ़र उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए ही तय किया होगा। और जब मैंने फिल्म देखी तो वहीं गीत जो बस ठीक-ठाक लग रहे थे फिल्मांकन के बाद बेहतरीन लगने लगे।

खुद स्वानंद साहब ने दैनिक हिंदुस्तान में दिए अपने साक्षात्कार में इस बारे में कहा

दरअसल गाने फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से लिखे जाते हैं। जैसे ‘खोया-खोया चाँद’ 1950 के आस-पास की फिल्म थी तो अल्फ़ाज़ भी वैसे ही ज़हीन थे।
परिणिता’ में बंगाल से जुड़ी कहानी थी तो गानों में भी काव्यात्मक्ता वैसी ही थी। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ टपोरी और भाईगीरी पर थी, तो गाने भी वैसे ही टपोरीनुमा थे। एक एक्टर जैसे फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह मेकअप बदलता है तो वैसे ही एक गीतकार भी फिल्म की थीम की तरह ही अपना रूप बदलता है। ‘थ्री-इडियट्स’ जींस और टी-शर्ट पहनने वाले आज के स्टूडेंट्स की कहानी है तो लफ़्ज़ भी जींस-टी शर्ट वाले होने चाहिए।

तो वार्षिक संगीतमाला की 25 वीं पॉयदान पर इसी फिल्म का एक लोकप्रिय गीत जो आजकल अपने सर्वप्रिय जुमले 'आल इज्ज वेल' के लिए घर घर में चर्चित है। मुर्गे की बाँग से शुरु होता ये गीत सोनू निगम अपने अटपटे बोलों की वजह से आपका ध्यान पहले खींचता है, फिर गीत की मस्ती आपको झूमने पर विवश कर देती है। पर झूमने के साथ स्वानंद हँसी हंसी में आज के छात्र वर्ग की मानसिक स्थिति का भी बेहतरीन आकलन करते हैं। मुर्गी और अंडे के रूपक को विद्यार्थियों के लिए प्रयोग करने की बात पर उनका कहना है कि

मैंने इंटरनेट पर एक कार्टून देखा था, जिसमें मुर्गी का एक बच्चा हाफ-फ्राई देख रहा है और पूछ रहा है- ‘ब्रदर इज़ दैट यू’ (भाई क्या ये तुम हो)। तो यही इस गाने की फिलॉसफी भी रही कि मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा, लाइफ़ मिलेगी या तवे पे फ्राई होगा...’, ये बात एक स्टूडेंट के भविष्य के लिए भी फिट बैठती है कि ‘कोई ना जाने अपना फ्यूचर क्या होगा...होंठ घुमाओ, सीटी बजाओ..सीटी बजाके बोल भइया...ऑल इज़ वेल..’।

शान्तनु मोइत्रा के मस्त संगीत पर बने इस गीत को सोनू निगम ने स्वानंद किरकिरे और शान के साथ मिलकर पूरे मन से गाया है जिसे सुन कर आप महसूस कर सकते हैं..



जब लाइफ हो आउट आफ कंट्रोल
होठों को कर के गोल
होठों को कर के गोल
सीटी बजा के बोल

आल इज्ज वेल
मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा
लाइफ मिलेगी या तवे पे फ्राइ होगा
कोई ना जाने अपना फ्यूचर क्या होगा

होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल
अरे भइया आल इज्ज वेल
अरे चाचू आल इज्ज वेल

कनफ्यूजन ही कनफ्यूजन है
साल्यूशन कुछ पता नहीं
साल्यूशन जो मिला जो साला
क्वेश्चन क्या था पता नहीं
दिल जो तेरा बात बात पे घबराए
दिल पे रख के हाथ उसे तू फुसला ले
दिल ईडीयट है प्यार से उसको समझा ले
होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल
अरे भइया आल इज्ज वेल
अरे चाचू आल इज्ज वेल

स्कॉलरशिप की पी गया दारू
ग़म तो फिर भी मिटा नहीं
अगरबत्तियाँ राख हो गईं
गॉड तो आखिर मिला नहीं
बकरा क्या जाने उसकी माँ का क्या होगा
सींक घुसेगी या साला कीमा होगा

होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल


हँसी की फुहारों के साथ ये गीत इंजीनियरिंग कॉलेज के उन पुराने दिनों की याद दिला देता है जिसमें ये इडियोटिक लमहे भी अपने से लगने लगते हैं। यू ट्यूब पर इस गीत की झलक आप यहाँ देख सकते हैं


Friday, January 01, 2010

चेतन भगत पर की गई अशोभनीय टिप्पणी पर आमिर खान को खुला ख़त !

आमिर जी,
आपके जीवन मूल्यों, आपकी अदाकारी, एक इंसान के रूप से आपकी सोच का हमेशा से क़ायल रहा हूँ। पर आज चेतन भगत के वक्तव्य को 'पब्लिसिटी स्टंट' कह आपने अपनी छवि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग में धूमिल की है। आप लोगों ने इतनी मेहनत से एक लाजवाब फिल्म बनाई। सच मानिए फिल्म देखने के बाद हम सब बहुत खुश थे पर एक बात सभी सोच रहे थे कि यूँ तो स्क्रिप्ट में काफी बदलाव किया गया है फिर भी इसका प्रेरणा स्रोत फाइव प्वाइंट समवन (Five Point Someone) ही है। हम लोग तो ये समझ रहे थे कि चेतन को विश्वास में लेकर ही आप लोगों ने ही ये फिल्म प्रदर्शित की होगी। पर आज मीडिया चैनलों में इस विषय पर खबरें देखीं तो दिल उद्वेलित हो उठा।

मैंने किताब भी पढ़ी है और आपकी फिल्म भी देखी है। ये मेरा मानना है कि अगर फाइव प्वायंट समवन (Five Point Someone) नहीं लिखी गई होती तो थ्री इडियट्स (Three Idiots) की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। चेतन की किताब की मूल भावना और विषय को लेकर ही ये फिल्म लिखी गई। यहाँ तक कि इसके किरदारों का स्वभाव और चरित्र और कुछ प्रसंग भी फिल्म में लिए गए। इसमें कोई शक नहीं कि इसकी स्क्रिप्ट में यथासंभव बदलाव कर फिल्मी जामा पहनाने का काम पटकथा लेखक ने किया है। उनकी ओर से डाले हुए इनपुट ने फिल्म को और सशक्त बनाने में खासा योगदान दिया है। पर इसका मतलब ये नहीं कि चेतन भगत के योगदान का फिल्म में कोई जिक्र ही ना हो। अगर फिल्म के निर्माता निर्देशक फिल्म के शुरु होने पर चेतन की किताब का जिक्र क्रेडिट के साथ कर देते तो उससे पटकथा लेखकों का कद छोटा नहीं हो जाता।

एक मेकेनिकल इंजीनियर होने के नाते जिसने हॉस्टल लाइफ और कॉलेज में पढ़ाई के तरीकों को करीब से देखा है हम चेतन भगत के आभारी रहे हैं जिन्होंने इस विषय को सबसे पहले चुन कर इतने सलीके से एक उपन्यास की शक्ल दी। आज भारत के लाखों लोग ये किताब पढ़ चुके और इससे उतना ही आनंद उठा चुके हैं जितना आपकी फिल्म से। ये किताब भारत के युवाओं में खासी लोकप्रिय है। और आप कहते हैं कि चेतन ने इस विषय में अपनी आवाज़ पब्लिसिटी स्टंट के लिए उठाई।

जैसा कि आपके पूर्व के साक्षात्कारों से जान चुका हूँ कि आपने ये किताब नहीं पढ़ी। फिर बिना किताब पढ़े और चेतन के आरोप की विश्वसनीयता को जाँचे परखे आपने ऐसा वक्तव्य कैसे दे दिया? आप जैसे विनम्र और तार्किक सोच रखने वाले व्यक्ति को ये शोभा नहीं देता। आपके इस कृत्य से मेरे दिल को गहरी ठेस पहुँची है इसलिए अपना विरोध यहाँ दर्ज कर रहा हूँ। आशा है आप अपने एक प्रशंसक की भावनाओं को समझेंगे और इस मुद्दे पर ठंडे दिमाग से विचार कर वो करेंगे जिसके लिए आपका दिल गवाही दे सके।

मनीष कुमार
सेल, राँची

वार्षिक संगीतमाला 2009 : नए साल के अवसर पर पेश है साल की सात, मस्ती में सराबोर करने वाली धुनें

देखते देखते नया साल आ ही गया और नए साल का पहला दिन यानि पूरी मौज मस्ती का माहौल। इसलिए माहौल को बनाए रखने के लिए वार्षिक संगीतमाला 2009 की शुरुआत की जा रही है वैसे गीतों से जिनकी धुनों पूरे साल हमें थिरकने पर मजबूर कर दिया और इनमें से कुछ पर तो शायद आप कल रात के जश्न में भी थिरके होंगे। आज की इस पोस्ट में मैंने ऐसे ही सात गीतों के मुखड़ों को चुना है जिनकी रिदम मन और तन दोनों को हिला जाती है।

तो शुरुआत विशुद्ध मुंबईया फिल्मी तड़के से जिसमें रह रह कर छौंक लगा रहे हैं खुद सलमान खाँ। "एक बार जो मैंने कमिटमेंट कर दी तो मैं खुद की भी नहीं सुनता.." पहचान गए ना जी हाँ ये है फिल्म वांटेड का थीम गीत




सलमान के फंडे तो आपने सुन लिए तो अब गुलज़ार के साथ रात में मटकी तो फोड़ लीजिए। हो सकता है आपका भी कोई गुड लक बाहर निकल आए। पर हुजूर इसके लिए घर बैठने से काम नहीं चलेगा। आ जाइए सड़कों पर ठैन ठैन कर लीजिए।




वैधानिक चेतावनी : इस गीत का ओवरडोज आपके सिर में ठैन ठेन पैदा कर सकता है।:)

वैसे गुलज़ार साहब ने ठैन ठना ठन के आलावा इसी साल रहमान के साथ पूरे विश्व में हिंदी फिल्म संगीत की जयजयकार करवा दी। गुलज़ार ने तो इससे सैकड़ों बेहतरीन गीत लिखे होंगे पर जूरी मेम्बरान पर रहमान के झुमा देने वाले संगीत और 'जय हो' जुमले का लगता है जबरदस्त असर हुआ। इस गीत ने विश्व में क्या धूम मचाई है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाएँ कि हाल में मेरे एक रिश्तेदार ने फिलीपींस की लड़की से शादी की मनीला में और वहाँ हुए स्वागत समारोह में लड़की के घरवालों ने भारतीय मेहमानों का स्वागत इस गीत पर नृत्य कर के किया।




पर ए आर रहमान और विशाल भारद्वाज से कहीं ज्यादा मस्ती भरा संगीत दिया प्रीतम दादा ने। चाहे अजब प्रेम की गजब कहानी में प्यार की बलखाती नैया हो या लव आज कल की ट्विस्ट... या फिर इसी फिल्म की चोर बाजारी... प्रीतम की धुनें मन मोहने वाली रहीं। प्रीतम ने एक अच्छा काम ये किया कि इन तीनों गीतों को नीरज श्रीधर से गवाया जो कि मस्ती भरे गीतों को गाने में माहिर हैं। तो इनमें से कौन सी धुन सुनना पसंद करेंगे आप। चलिए बारी बारी से तीनों ही सुनवा देते हैं। सबसे पहले सुनिए सर्पीली धुन ट्विस्ट




और फिर चोरबाजारी दो नैनों की ..



और राम के भरोसे ही सही प्रेम की नैया को कैसे भूल पाइएगा..



ये तो हो गए छः गीत तो सातवाँ गीत कौन सा है। जी नही ये गीत नहीं बस एक धुन है और क्या शानदार धुन है। इस धुन को बनाया इल्लैयाराजा ने और फिल्म तो आप समझ ही गए होंगे पा पा पपपा पा पा पपपा पा पा पपपा .....



बिग बॉस देखते देखते अमित जी ने इसके सारे डान्सिंग स्टेप्स हमें याद करा दिए वैसे आपको न याद हो तो यू ट्यूब के इस वीडिओ में देख लीजिए


ये तो रहे मेरी पसंद के साल में सबसे ज्यादा झुमाने वाले गीत। वैसे आपको इस साल किस गीत ने सबसे ज्यादा थिरकाया ? अगली पोस्ट में जानेंगे कौन सा गीत है इस साल की संगीतमाला की २५ वीं पायदान पर...

चलते चलते 'एक शाम मेरे नाम' के पाठकों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएँ ! आशा है नए साल में भी आप सब का स्नेह इस चिट्ठे के लिए पूर्ववत बना रहेगा।
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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