Wednesday, April 28, 2010

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं,चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं...

याद है ना गर्मी के दिनों की वो रातें जो आपने छत पर अकेले किसी का इंतज़ार करते हुई बिताई थीं। पर ये इंतज़ार किसका ? सबसे अज़ीब बात तो यही होती थी कि हमें ख़ुद पता नहीं होता था कि हम आख़िर हैं किसकी प्रतीक्षा में ? पर उस इंतज़ार की कैफ़ियत दिल में तारी रहती थी। बस बुनते रहते थे मन में हम उस अनजाने अज़नबी की शख्सियत। चाँद तारों में खोजा करते थे उस चेहरे का अक्स। चारों ओर फैली शून्यता में भी सुनाई देती थीं उनकी सदाएँ।

पर ये तो उन बीते लमहों की बाते हैं। ये सब मैं आज आपसे क्यूँ कह रहा हूँ? क्या करूँ कैफ़ भोपाली का लिखा ये नग्मा उन अहसासों की याद ताजा़ जो कर रहा है। भोपाल के अज़ीम शायर कैफ़ भोपाली का ये गीत फिल्म शंकर हुसैन का है जो 1977 में आई थी। संगीत रचना थी ख़य्याम की।


कैफ़ साहब ने इस गीत के लिए जो बोल लिखे वो अपने आप में कमाल थे। अब इन पंक्तियों को देखिए कितना मखमली अहसास जगाती हैं दिल में

एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी


या फिर इसे सुन कर कौन संवेदनशील हृदय रससिक्त ना हो उठेगा

जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है


संगीतकार ख़य्याम ने गीतकार के लफ्ज़ों की इसी गहराई को ध्यान में रखकर नाममात्र का संगीत दिया। नतीजा ये कि गीत सुनते वक़्त आपका ध्यान बोलों से हट ही नहीं सकता। और अगर आपको भटकने की बीमारी भी हो तो कोकिलकंठी लता की भावपूर्ण स्वरलहरी आपको भटकने नहीं देगी। दरअसल सितार की आरंभिक धुन के बाद लता जी की आवाज़ कानों तक छन छन कर कैफ़ भोपाली के शब्दों को इस तरह पहुँचाती है कि मन गीत की भावनाओं के साथ हिचकोले लेने लगता है। ये गीत इस बात का सबूत है कि अगर गीत के बोलों और गायिकी में दम हों तो संगीत का किरदार गौण हो जाता है।

तो आइए सुनते हैं लता जी के गाए इस गीत को

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..

एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी
बिन किसी की याद आए, दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियाँ खनकती हैं
अपने आप.. अपने आप..

कोई पहले दिन जैसे घर किसी-के जाता हो
जैसे खुद मुसाफ़िर को रास्‍ता बुलाता हो
पाँव जाने किस जानिब, बे-उठाए उठते हैं
और छम-छमा-छम‍छम पायलें झनकती हैं
अपने आप.. अपने आप रातों में

जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसकी बाहों से बिजलियाँ लपकती हैं
अपने आप . ..

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..


वैसे तो पाकीज़ा और रजिया सुल्तान के अपने लोकप्रिय गीतों के आलावा कैफ़ भोपाली साहब ने कई ग़ज़लें भी कहीं। उनमें से कुछ को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ में गाकर आम जन तक पहुँचाया । पर उन ग़ज़लों की बात कभी और कर लेंगे। अभी तो इस गीत को सुनने से बने मूड में कुछ और सुनवाकर आपका मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहता।

Saturday, April 24, 2010

लखनऊ डॉयरी : रेल का उलटफेर, ब्लॉगरों की साजिश और एक छोटी सी मुलाकात...

बात फरवरी की है। लखनऊ में एक रिश्तेदार की शादी में जाना था। शादी का दिन चूंकि बहुत पहले से तय था लिहाज़ा मैंने दो महिने पूर्व ही रिजर्वेशन करवा रखा था। पर चाहे कितनी भी तैयारी आप क्यूँ ना कर लें जब तक ऊपरवाले के यहाँ से अर्जी पास ना हो, हम जैसे तुच्छ मानवों द्वारा बनाई गई योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं। ज्योंही फरवरी का दूसरा हफ्ता शुरु हुआ झारखंड में नक्सलियों ने बहत्तर घंटे के बंद का ऐलान कर दिया। अक्सर ऐसे अवसरों पर सबसे पहले रद्द होने वाली ट्रेन वही होती है जिसमें मैंने आरक्षण करवाया था। तीन दिन पहले से ही राम का सुमिरन करते रहे कि भगवन इतने पहले से बनाए कार्यक्रम का यूँ ना बंटाढ़ार करो। पर भगवन का दिल ना पसीजना था, ना पसीजा।

यात्रा के एक दिन पहले तक बंद के बावज़ूद बाकी की ट्रेने दूसरे मार्ग से चलती रहीं। 8 फरवरी की शाम को मुझे प्रस्थान करना था। आठ की सुबह बिस्तर से चिपके पड़े ही थे कि एक सहकर्मी का फोन आ गया। उधर से सूचना दी गई कि भई सुबह के अखबार में मेरी ट्रेन के रद्द होने की खबर है। नींद तो ये सुनते ही काफ़ूर हो गई। भागते दौड़ते स्टेशन पहुँचे। शीघ्रता से टिकट रद्द कराया। संयोग से नक्सलियों के बंद की वज़ह से दूसरी ट्रेन में जगह मिल गई और मेरा लखनऊ जाने का कार्यक्रम बर्बाद होते होते बच गया।

राँची में हल्की-हल्की ठंड ज़ारी थी। गर्म कपड़े किस अनुपात में रखे जाएँ इसके लिए लखनऊ में कंचन से फोन पर मौसम का हाल पूछा गया। रिपोर्ट दी गई कि आसमान साफ है। दिन में अपने आप को जवान समझने वाले लोग हॉफ स्वेटर भी नहीं पहन रहे हैं। मैंने मन ही मन विचार किया शादी का मामला है स्वेटर ना भी ले जाएँ पर कोट ले चलना ठीक रहेगा। वैसे भी ब्लॉगरों का क्या भरोसा एक दूसरे को परेशान करने के लिए आए दिन नए नए जुगाड़ सोचते हैं।:) और देखिए मेरी शंका निर्मूल साबित नहीं हुई। सुबह गाड़ी से जैसे ही कानपुर स्टेशन पहुँचा साफ आसमान और सुनहरी धूप के बजाए बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। बारिश से बचते बचाते स्टेशन के शेड में पहुँच कर फोन घुमाया तो उधर से स्पष्टीकरण आया कि आपसे फोन पर बात होने के बाद ही बादलों ने अपना रंग बदल लिया !

खैर मैं एक के घंटे के अंदर लखनऊ की ओर निकल लिया। गंगा पुल पर गाड़ियों का जाम लगा था। लिहाज़ा डाइवर ने गाड़ी रोक दी। पर रुकी कार के अंदर भी हिलने डुलने का अहसास हुआ। घर पर रहते हुए तो भूकंप के झटके तो पहले भी महसूस कर चुका हूँ पर यूँ सफ़र में और वो भी पुल पर... ड्राइवर से पूछा कि भई माज़रा क्या है? बताया गया कि ये पुल तो गाड़ियों के वज़न से यूँ ही हिलता डुलता है। खैर ज्यादा देर तक हिलना डुलना नहीं पड़ा और करीब बारह बजे तक मैं लखनऊ पहुँच गया।

कंचन ने बताया था कि अगले दिन यानि दस फरवरी को गौतम राजरिशी साहब भी लखनऊ तशरीफ़ ला रहे हैं। पर उनके साथ मिलने का कार्यक्रम वहाँ पहुँच कर बातचीत के बाद तय होना था। पर लखनऊ की धरती पर पहुँचते ही मेरे मोबाइल की हृदय गति मंद पड़ गई। सिगनल कुछ सेकेंड के लिए आकर घंटों गायब हो जाता। चार बजे दूसरे मोबाइल से कंचन से संपर्क हो पाया। पता चला कि गौतम अगले दिन ग्यारह बजे स्टेशन पर पधार रहे हैं। मेरे पास उनसे मिलने के लिए तीन घंटे का ही समय पास था क्यूँकि अगले दिन तीन बजे लखनऊ से पटना निकलना था।

रात को शादी और अगली सुबह विदाई निपटाकर कर अगली सुबह मैं स्टेशन जाने को तैयार हो गया। कंचन ने कहा कि वो स्टेशन साढ़े दस तक पहुँच जाएँगी। मुझे भी वहाँ ग्यारह बजे तक आने का आदेश मिला। दस पचास पर मैं जब स्टेशन पहुँचा तो देखा ना हमारी 'होस्ट' का पता है और ना ही उस गाड़ी का जो तथाकथित रूप से मात्र दस मिनट में आने वाली थी। पता चला कंचन जी अपने कुनबे के साथ स्टेशन से अभी भी तीन चार किमी की दूरी पर हैं। पूछताछ के कांउटर पर जैसे ही मैंने पूछा कि दिल्ली से आने वाली शताब्दी की प्लेटफार्म एनाउंसमेंट क्यूँ नहीं हो रही, काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने आँखें तरेरते हुए कहा कि भई आप भी अज़ीब बात करते हैं। गाड़ी के आने का समय बारह के बाद है तो अभी से क्या उद्घोषणा करें। करीब पन्द्रह बीस मिनट बाद कंचन जी के दर्शन हुए तो हमने सवाल दागा कि भई ये किस साजिश के तहत मुझे गुमराह किया गया? जवाब मिला कि ये टाइमिंग तो वीर जी ने ही बताई थी। मैंने मन ही मन सोचा ओह तो इस साजिश में 'वीर जी' भी शामिल हैं :)।


अगले डेढ़ घंटे का समय कंचन, अवधेश व विज़ू से बात चीत करते बीता। इन लोगों से मेरी ये दूसरी मुलाकात थी। बीच बीच में गौतम को फोन कर उनकी गाड़ी की स्थिति की जानकारी भी ली जा रही थी। गौतम के बारे में ब्लॉग के आलावा कंचन से ही सुना था। जानने की उत्सुकता थी कि सेना में काम करने का जज़्बा और साथ ही ग़ज़ल कहने का शौक उन्हें एक साथ कैसे हो गया? यह रहस्य उस दिन तो नहीं पर एक हफ्ते बाद खुला। फोन पर पहली बातचीत में यही कहा कि दर्शनार्थियों की भीड़ स्टेशन पर आपका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है जल्द ही ट्रेन को अपने कमांड में लेकर लखनऊ पहुँचे। पर भारतीय रेल पर किसका बस चला है? स्टेशन पर रेल के लगते लगते बारह चालीस हो गए। गौतम को वहाँ से लखनऊ कैंट में अपने मित्र के यहाँ जाना था। अब बस हमारे पास इतना ही समय था कि गाड़ी में साथ साथ कैंट तक जाएँ और फिर वहाँ से विदा ले लें।

किया भी यही। थोड़ी बहुत बातें हुईं। घर जाकर जल्दी जल्दी चाय पी गई, आनन-फानन में फोटो खींचे गए और मैंने कंचन और गौतम से विदा ली। इसी दौरान ये पता चला कि तीन चार दिन बाद गौतम भी पटना आ रहे हैं और वहाँ मुलाकात का फिर से कार्यक्रम बनाया जा सकता है। संयोग से वो कार्यक्रम बना भी और हमने करीब तीन चार घंटे साथ बिताए। क्या किया हमने उन तीन चार घंटों में ये जानिएगा अगली पोस्ट में...




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Wednesday, April 21, 2010

मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी? - प्रकृति से हमारे रिश्तों की पड़ताल करते गुलज़ार

अप्रैल का मौसम कभी इतनी कड़ी धूप का तलबदार ना था। खासकर उस प्रदेश में जिसका नामाकरण ही जंगल और झाड़ियों के नाम पर किया गया हो। पहले देश का सर्वाधिक तापमान देखने के लिए राजस्थान के शहरों के तापमान पर नज़र दौड़ानी होती थी पर अब तो इतनी मशक्क़त करने की ज़रा सी भी जरूरत नहीं। बोकारो धनबाद से लेकर देवघर और जमशेदपुर तक पूरा झारखंड अप्रैल के महिने में ही 45 से 47 डिग्री की चिलचिलाती धूप में झुलस रहा है।

वैसे तो कमोबेश पूरे भारत की यही स्थिति होगी पर प्राकृतिक संपदा से परिपूरित इस प्रदेश का ये हाल चौंकाने वाला जरूर है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है कि कहीं ना कहीं हम सभी अपने आस पास की प्रकृति को नष्ट होते देख के भी संवेदनहीन हुए जा रहे हैं।

आर्थिक विकास की इस दौड़ में कंक्रीट के जंगलों के बीच वो पुरानी आबो हवा कहीं खो सी गई है। क्या हम भूल गए उन पेड़ों को, जिनकी छाँव ने हर गर्मी में तपते सूरज की इन झुलसाती किरणों का रास्ता रोका। जिनकी विशालकाय मोटी शाखें बचपन में हमारे झूलों का अवलंब बनीं। जिनके तनों पर चढ़ उतर कर हमने ना जाने कितनी मस्तियाँ की।


घर के आँगन या अहाते में पलते बढ़ते ये वृक्ष भी हमारे साथ ही बढ़ते गए और साथ ही उनके सीने में समाती गईं वे आनंददायक स्मृतियाँ। बचपन बीता, ठिकाने बदलते रहे और वो पेड़.... वो तो अब आस पास रहे ही नहीं। सो उनसे जुड़ी यादें तो क्षीण होनी ही थीं। पर जब जब हम अपने पुराने आशियाने में वापस लौटे, उन पेड़ पौधों को देख वो यादें इस तीव्रता से वापस आ गयीं जेसे कभी गई ही ना हों। आखिर क्यूँ हुआ ऐसा !

दरअसल हमें एहसास हो ना हो अनजाने में ही हम अपनी आस-पास की प्रकृति से एक रिश्ता बना लेते हैं। एक ऐसा मज़बूत रिश्ता जिसकी गिरहें कटने से हमें वैसी ही पीड़ा होती है जैसे किसी इंसानी रिश्ते के टूटने पर होती है।

गुलज़ार साहब की लिखी एक कविता याद आ रही है जो ऐसे ही एक रिश्ते की कहानी कहती है। गुलज़ार ने जिस खूबी से अपने जिंदगी के सबसे हसीन लमहों को गली के किनारे खड़े उस पेड़ से जोड़ा है, वो आप इस कविता को पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं। इस कविता को बोलते हुए पढ़ना एक पूरे अनुभव से गुजरने जैसा है। तो आइए मेरे साथ पढ़िए इस कविता को...



मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी?
मेरा वाक़िफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कंधे पर चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख़ से जा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाख़ें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामिला थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ कैरियां फेंकी थीं इसी ने

वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूँ, जब मोड़ गुजरते में कभी
खाँसकर कहता है, 'क्यों सर के सभी बाल गए?'

सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको...


क्या आपको नहीं लगता कि जिस प्रकृति के बीच हम पले बढ़े हैं, उसके साथ बने रिश्तों ने हमारे जीवन में जैसे अनमोल पल दिए हैं वैसा ही कुछ अपने बच्चों को भी हम उपलब्ध कराएँ?

Friday, April 16, 2010

आइए भ्रमण करें संवेदना के संसार में : एक मुलाकात रंजना जी के साथ!

बात पिछली चौदह जनवरी यानि तीन महिने पहले की है। दोपहर का समय रहा होगा कि अचानक ही मोबाइल की घंटी घनघना उठी। नंबर जाना हुआ ना था सो मैंने सोचा जरूर किसी साथी चिट्ठाकार का ही फोन होगा जिसने जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए फोन किया हो। फोन कनेक्ट हुआ तो उधर से एक महिला स्वर उभरा कि मनीष जी कैसे हैं?

अक्सर ऐसी कॉल्स में (जहाँ आप जानते हों कि सामनेवाला है तो जान पहचान का पर पकड़ में नहीं आ रहा) बातों का रुख ऐसा रखना पड़ता है हाँ ठीक हूँ, आप कैसी हैं और कैसा चल रहा है सब कुछ वैगेरह वैगेरह। बातों के इन आवरण में आवाज़ के लहज़े पर ध्यान देते हुए याददाश्त की गाड़ी फुल स्पीड पर दौड़ानी होती है ताकि जब तक बंदा हमारा हाल भाँपते हुए पूछे कि पहचान रहे हो या यूँ ही गपिया रहे हो तब तक हम सही जवाब के साथ तैयार हो जाएँ। पहचानने में पहली दिक्कत ये थी कि सामने वाला हमें बर्थडे विश भी नहीं कर रहा था। दूसरी विकट समस्या ये थी कि गर कहीं गलती से अंतरजालीय जान पहचान वाली दूसरी मित्रों का नाम मुँह से निकला तो सामनेवाले से खिंचाई की पूरी गारंटी है

पर एक मिनट की बात के पहले ही मैं समझ चुका था कि हो ना हो ये संवेदना संसार वाली रंजना जी हैं। दरअसल वो अपने बिजनेस के सिलसिले में राँची और वो भी हमारे कार्यालय के समीप आने वाली थीं और इसी की सूचना देने के लिए उन्होंने मुझे फोन किया था। इससे पहले रंजना जी से मेरी मुलाकात राँची ब्लॉगर मीट के दौरान हुई थी। मीट के बाद सारे पत्रकार तो चले गये थे पर बाकी सारे लोगों ने कॉवेरी में साथ बैठकर चाय पी थी। उस मीट में तो नहीं पर उसके बाद मुझे पता चला कि मेरे एक सहकर्मी रंजना जी को पारिवारिक रूप से जानते हैं और उनकी कंपनी सेल के राँची स्थित कुछ उपक्रमों का कम्प्यूटर मेंटेनेंस का काम देखती है।

उस दिन फोन पे बात के कुछ ही दिनों बाद मेरे कार्यालय में उनका अपने व्यवसाय के सिलसिले में आना हुआ। दो ढाई घंटे चली उस मुलाकात में बहुत सारी बातें हुईं। दरअसल अगर आप संवेदना संसार में रंजना जी को पढ़ेंगे तो आपके सामने उनकी परिमार्जित हिंदी लेखन शैली और अद्भुत तर्कशीलता देख कर टीचर प्रोफेसर टाइप वाली छवि उभरेगी। पर इसके विपरीत प्रकट में वो काफी मिलनसार और हँसमुख प्रवृति की महिला हैं।

बातचीत की शुरुआत हमने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमियों के आदान प्रदान से की। रंजना जी ने बताया कि पिताजी की नौकरी ऐसी थी कि बचपन दूर दराज़ के इलाकों में बीता। धीरे धीरे पढ़ने लिखने में रुचि जगी। जो विषय उन्हें पसंद आता उसमें गहराई तक जाने में ही उन्हें संतोष मिलता। पर इसका नतीजा ये होता की परीक्षा में मन लायक प्रश्न आ जाता तो उसके उत्तर में रंजना जी इतनी कापियाँ भरती चली जातीं कि कई बार बाकी प्रश्नों के उत्तर छूट जाते। पर जितने प्रश्न भी उन्होंने किए होते उसी में परीक्षक इतना प्रसन्न हो जाता कि उन्हें कुल मिलाकर अच्छे मार्क्स ही मिलते।

पढ़ने लिखने के साथ रंजना जी को संगीत में भी काफी रुचि है और उन्होंने कई दिनों तक संगीत सीखा भी। मैंने भी अपने संगीत प्रेम से जुड़ी कई बातें साझा कीं। रंजना जी ने बताया कि लिखने पढ़ने के सिलसिले को बीच में जो विराम लगा वो अब ब्लॉगिंग की दुनिया में आने के बाद से फिर चालू हुआ है। उनसे बातें कर के मुझे लगा ब्लॉगिंग के बारे में मेरी और उनकी सोच एक सी है। बाद में मैंने उनके ब्लॉग पर भी इस सोच को प्रतिध्वनित पाया। ब्लागिंग में हुए अपने अनुभवों और इस माध्यम से अपनी अपेक्षाओं को रंजना जी समय समय पर अपने लेखों में शब्द देती रही हैं। अपनी ब्लागिंग के शुरुआती दौर में उन्होंने लिखा

यदि हम समकालीन हिन्दी ब्लोगिंग को देखेंगे तो परिणाम काफ़ी उत्साहजनक हैं.अब प्रतिक्रिया सांख्यिकी पर न जायें,अधिकांश लोग हैं जो केवल पढने में अभिरुचि रखते हैं,टिप्पणियां देने में नही.इस से रचना या रचनाकार विशेष का महत्व कम नही हो जाता.और पाठक बेवकूफ भी नही होता उसे ठीक पता है कि रचना और रचनाकार का बौद्धिक/साहित्यिक स्तर क्या है.और उसी अनुसार अपना पाठ्य चयन कर लेता है.कुछ ब्लाग/विषय सनसनीखेज सामग्रियां परोस उबलते पानी के बुलबुले से क्षणिक प्रसिद्धि भले पा जायें पर इससे सम्मानजनक स्तर नही पा सकते. दीर्घजीवी नही हो सकते......... मेरा मत है कि लेखन को सर्वोच्च दायित्व मानकर व्यक्ति समाज देश और दुनिया के लिए जो लिखेगा या लिखा जाता है,लेखन निसंदेह नैसर्गिक साहित्य ही है और रचनाकार साहित्यकार.बिना विवाद में फंसे अपने धर्म का सतत पालन ही हमारा कर्तव्य होना चाहिए,तभी हम आंशिक रूप से अपनी मातृभाषा के क़र्ज़ का एकांश मोल चुका पाएंगे.
वहीं फरवरी 2009 में हुई राँची ब्लॉगर मीट के अनुभव के बाद उन्होंने लिखा

आज ब्लाग अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत डायरी के परिष्कृति परिवर्धित रूप में देखा जा रहा है, परन्तु यह डायरी के उस रूप में नही रह जाना चाहिए जिसमे सोने उठने खाने पीने या ऐसे ही महत्वहीन बातों को लिखा जाय और महत्वहीन बातों को जो पाठकों के लिए भी कूड़े कचड़े से अधिक न हो प्रकाशित किया जाय. इस अनुपम बहुमूल्य तकनीकी माध्यम का उपयोग यदि हम सृजनात्मक /रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए करें तो इसकी गरिमा निःसंदेह बनी रहेगी और कालांतर में गरिमामय महत्वपूर्ण स्थान पाकर ही रहेगी. केवल अपने पाठन हेतु निजी डायरी में हम चाहे जो भी लिख सकते हैं,परन्तु जब हम सामग्री को सार्वजानिक स्थल पर सर्वसुलभ कराते हैं, तो हमारा परम कर्तव्य बनता है कि वैयक्तिकता से बहुत ऊपर उठकर हम उन्ही बातों को प्रकाशित करें जिसमे सर्वजन हिताय या कम से कम अन्य को रुचने योग्य कुछ तो गंभीर भी हो.

रंजना जी के ईमानदार सरोकार आज की हिंदी ब्लॉगिंग के परिपेक्ष्य में कितने प्रासंगिक है ये सिर्फ ब्लॉगवाणी की सबसे ज्यादा पसंदीदा या पढ़े जाने वाली पोस्ट की फेरहिस्त को पढ़कर ही लगाया जा सकता है। आजकल लिखी जा रही सामग्री को देखकर उन्हें इस बात का अफ़सोस होता है उनके अपने शहर में उससे कही ज्यादा प्रतिभावान लेखक कंप्यूटर ना जानने की वज़ह से इस माध्यम तक नहीं आ पा रहे हैं। रंजना जी ऐसे लोगों के निःशुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण के बारे में गंभीरता से विचार कर रही हैं।

अपने चिट्ठे पर रंजना जी कहानियाँ भी लिखती हैं और कभी कभी कविताएँ भी। पौराणिक कथाओं से आध्यात्मिक चिंतन, गंभीर लेखन से नुकीले व्यंग्य बाण तक इनकी लेखनी से निकलते रहते है। मैंने उनसे उनकी शुद्ध पर थोड़ी क्लिष्ट हिंदी की शैली के बारे में पूछा तो रंजना जी का जवाब था कि हिंदी के इस रूप को आगे तक की पीढ़ियों तक पहुँचाने की जिम्मेवारी भी किसी को तो लेनी चाहिए और मैं वही करने का प्रयास कर रही हूँ।

रंजना जी के दो प्यारे बच्चे हैं। उनकी बेटी से हम सभी ब्लॉगर मीट के दौरान मिल चुके हैं। बेटे की तस्वीर तो उनके ब्लॉग पर मौजूद है ही। रही बात पतिदेव की तो उनके बारे में मेरे कुछ कहने से अच्छा ये रहेगा कि आप उनके बारे में उन्हीं की लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ लें...




"नयनों में पलते स्वप्न तुम्ही,तुमसे ही आदि अंत मेरा.
जीवन पथ के संरक्षक तुम,निष्कंटक करते पंथ सदा .
तुमने जो ओज भरा मुझमे, दुष्कर ही नही कोई कर्म बचा.
जितने भी नेह के नाते हैं,तुममे हर रूप को है पाया.
आरम्भ तुम्ही अवसान भी तुम,प्रिय तुमसे है सौभाग्य मेरा..
"

तो ये था लेखा जोखा रंजना जी से मेरी मुलाकात का... अगली पोस्ट में लें चलेंगे आपको लखनऊ ये बताने के लिए किस तरह आपके इस नाचीज़ को दो साथी चिट्ठाकारों की आपसी मिलीभगत से परेशान किया गया !



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Monday, April 12, 2010

अमौसा का मेला : सुनिए एक मेले की कहानी स्व. कवि कैलाश गौतम की जुबानी !

भारत की ग्रामीण और कस्बाई संस्कृति में मेलों का एक प्रमुख स्थान है। और अगर वो मेला कुंभ जैसे मेले सा वृहद हो तो फिर उसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फिलहाल हरिद्वार की पवित्र नगरी में कुंभ मेला चल रहा है और परसों यानि 14 अप्रैल को मेष संक्रांति के अवसर पर लाखों की संख्या में आम जन प्रमुख शाही स्नान में हिस्सा लेंगे। लाखों लोगों का इस धार्मिक महोत्सव में अपने गाँव, कस्बों और शहरों से पलायन करना और फिर एक जगह इकठ्ठा होना अपने आप में एक बड़ी सामाजिक सांस्कृतिक घटना है।
साहित्यकार और गीतकार इन मेलों को अपनी लेखनी का विषय बनाते रहे हैं। पर कुंभ मेले पर बनारस के समीप स्थित चँदौली में जन्मे कवि कैलाश गौतम की इस आंचलिक रचना का मेरे हृदय में एक विशेष स्थान है।

इसकी वज़ह ये है कि जिस माहौल, जिन घटनाओं को कैलाश जी ने अपनी इस कविता में उतारा है वो इतनी आस पास की, इतनी सजीव दिखती हैं कि कवि की इन छोटी छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से पकड़ने की क्षमता पर दिल बाग बाग हो उठता है।
अब मेले में कंधे पर चलने वाली गठरी मुठरी के अंदर के अनिवार्य सामानों की चर्चा हो चाहे नई नवेली दुल्हन के चाल ढाल की, दो सहेलियों की आत्मीय बातचीत के झगड़े में बदलने की दास्तान हो या अटैची के ताले के मोलाने या ड्रामा देख कर भौजी के उछलने की बात हो..हर जगह अपने सूक्ष्म अवलोकन, आंचलिक बोली के ठेठ शब्दों के प्रयोग व प्रवाहपूर्ण शैली से कैलाश गौतम पाठकों को सम्मोहित करते चलते हैं।

कवि सम्मेलन की एक रिकार्डिंग में कैलाश गौतम खुद इस कविता के बारे में कहते हैं
विश्व का सबसे बड़ा मेला इलाहाबाद में सम्पन्न होता है कभी कुंभ के रूप में कभी अर्ध कुंभ के रूप में। हर साल माघ मेले के नाम से ये ढाई महिने का मेला लगता है। मैंने बचपन में अपने अपने दादा दादी को, अपने माता पिता को इस मेले में आने की तैयारी करते हुए देखा है। रेडिओ में होने के नाते, इलाहाबाद में होने के नाते लगभग 38 वर्षों तक उस मेले का एक हिस्सा होता रहा। सन 1989 के कुंभ में ये कविता लिखी गई थी। चूंकि अमावस्या के स्नान पर्व पर सर्वाधिक भीड़ होती हे इसलिए इस कविता का नाम ही मैंने 'अमौसा का मेला' रखा।
हर बड़े मेले में भीड़ का चेहरा एक सा ही होता है। कभी कभी इस भीड़ के चलते बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। दो तीन घटनाओं में मैं खुद शामिल रहा हूँ चाहे वो हरिद्वार का कुंभ हो या नासिक का कुंभ रहा हो। 1954 के कुंभ में भी कई हजार लोग मरे। पर मैंने इस कविता में बड़ी छोटी छोटी घटनाओं को पकड़ा, जहाँ जिंदगी है मौत नहीं है जहाँ हँसी है दुख नहीं है...
इस रचना की भाषा यूँ तो भोजपुरी है पर ये वो भोजपुरी नहीं जो भोजपुर इलाके (आरा बलिया छपरा के सटे इलाके) में बोली जाती है। दरअसल बनारस से इलाहाबाद की ओर बढ़ने से भोजपुरी बोलने के तरीके और कुछ शब्दों में बदलाव आ जाता है पर जो भोजपुरी की मिठास है वो वैसे ही बनी रहती है। तो आइए इस मिठास को महसूस करें कैलाश जी की आवाज़ में इस हँसाती गुदगुदाती कविता में



कि भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा
धरम में करम में सनल गाँव देखा
अगल में बगल में सगल गाँव देखा
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा
अ कमरी में केहू, रजाई में केहू
अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू
कि आजी रंगावत हईं गोड़ देखा
हँसत ह‍उवैं बब्बा तनी जोड़ देखा
घुँघुटवै से पूछै पतोहिया कि अ‍इया
गठरिया में अब का रखाई बत‍इहा
एहर ह‍उवै लुग्गा ओहर ह‍उवै पूड़ी
रमायन के लग्गे हौ मड़ुआ के ढूँढ़ी
ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी
अ नयका चपलवा अचारे के ओरी

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

मचल ह‍उवै हल्ला चढ़ावा उतारा
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गुर्रा ओहर लोली-लोला
अ बिच्चे में ह‍उवै सराफत से बोला
चपायल है केहू, दबायल है केहू
अ घंटन से उप्पर टँगायल है केहू
केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर
केहू फनफनात ह‍उवै कीरा के नीयर
अ बप्पा रे बप्पा, अ द‍इया रे द‍इया

तनी हम्मैं आगे बढ़ै दे त भ‍इया

मगर केहू दर से टसकले न टसकै
टसकले न टसकै, मसकले न मसकै
छिड़ल हौ हिताई नताई के चरचा
पढ़ाई लिखाई कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू
अ लग्गी से पानी पियावत हौ केहू


अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

जेहर देखा ओहरैं बढ़त ह‍उवै मेला
अ सरगे के सीढ़ी चढ़त ह‍उवै मेला
बड़ी ह‍उवै साँसत न कहले कहाला
मूड़ैमूड़ सगरों न गिनले गिनाला
एही भीड़ में संत गिरहस्त देखा
सबै अपने अपने में हौ ब्यस्त देखा
अ टाई में केहू, टोपी में केहू
अ झूँसी में केहू, अलोपी में केहू
अखाड़न के संगत अ रंगत ई देखा
बिछल हौ हजारन के पंगत ई देखा
कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ
कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ
केहू बुढ़िया माई के कोरा उठावै
अ तिरबेनी म‍इया में गोता लगावै
कलपबास में घर क चिन्ता लगल हौ
कटल धान खरिहाने व‍इसै परल हौ

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

गुलब्बन के दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव ज‍इसे नदी तीरे-तीरे

सजल देह ज‍इसे हो गौने का डोली
हँसी हौ बताशा शहद ह‍उवै बोली
अ देखेलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का

फुटेहरा नियर मुस्किया-मुस्किया के
निहारे लैं मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलैंलीं
अ नरियर पे नरियर चढ़ावत चलैलीं
किनारे से देखैं इशारे से बोलैं
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं
बड़े मन से मन्दिर में दरसन करैलीं
अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं
चढ़ावैं चढ़ावा अ गोठैं शिवाला
छुवल चाहे पिन्डी लटक नाहीं जाला

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

एही में चम्पा चमेली भेट‍इलीं
अ बचपन के दूनो सहेली भेंट‍इलीं
ई आपन सुनावैं ऊ आपन सुनावैं
दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं
असो का बनवलू असो का गढ़वलू
तू जीजा के फोटो न अब तक पठवलू
न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं
हमैं अपनी सासू के पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी के पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की
चलत ह‍उवै टेम्पो चलत ह‍उवै चक्की
मनैमन जरै अ गड़ै लगलीं दूनों
भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगली दूनों
अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै
अ हलुवाई ज‍इसे कराही छोड़ावैं

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

कलौता के माई का झोरा हेरायल
अ बुद्धू का बड़का कटोरा हेरायल
टिकुलिया को माई टिकुलिया के जो है
बिजुलिया को माई बिजुलिया के जो है
मचल ह‍उवै मेला में सगरो ढुंढाई
चमेला का बाबू चमेला का माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले
अ छोटकी बिटिउवा के मारत चलैले
बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले

गोबरधन के सरहज किनारे भेंट‍इलीं
गोबरधन के संगे प‍उँड़ के नह‍इलीं
घरे चल ता पाहुन दही-गुड़ खियाइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं फेंक गठरी पर‍इलैं गोबरधन
न फिर-फिर देख‍इलैं धर‍इलैं गोबरधन

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै
केहू बस अटैची के ताला मोलावै
केहू चायदानी पियाला मोलावै
सोठ‍उरा के केहू मसाला मोलावै
नुमाइस में जातैं बदल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया से आगे निकल ग‍इलीं भ‍उजी
आयल हिंडोला मचल ग‍इलीं भ‍उजी
अ देखतै डरामा उछल ग‍इलीं भ‍उजी

अ भ‍इया बेचारू जोड़त ह‍उवैं खरचा
भुल‍इले न भूलै पकौड़ी के मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी के चिन्ता
बहिनिया का गौना मसहरी का चिन्ता
फटल ह‍उवै कुरता फटल ह‍उवै जूता
खलित्ता में खाली केराया के बूता
तबौ पीछे-पीछे चलत जात ह‍उवन
गदेरी में सुरती मलत जात ह‍उवन

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...


(गैर भोजपुरी पाठकों की सुविधा के लिए शब्दार्थ : झोरा - झोला, कपार - सिर, गोड़ - पैर, चपायल - किसी के ऊपर पैर रखना, कीरा - कीड़ा, नीयर - की तरह, फनफनाना -बिलबिलाना, चपलवा - चप्पल, लुग्गा - साड़ी, चाउर - चावल, चिउरा - चूड़ा, पीयर - पीला, टसकना - हिलना, परबचन - प्रवचन, तिरबेनी - त्रिवेणी, नरियर - नारियल, पक्की - पक्का मकान, हेरायल - गुम हो जाना, सगरो - हर तरफ, मोलाना -दाम पूछना, मसहरी - मच्छरदानी)

 कैलाश गौतम को जी को खुद सस्वर इस कविता का पाठ करते देखना चाहें तो ये रहा वीडिओ




और चलते चलते मेरे दो पाठक मित्रों का नाम लेना चाहूँगा जिनकी वज़ह से ये कविता आप तक पहुँच सकी। एक तो मंजुल जी जिन्होंने 2008 अक्टूबर में गाँधी जी पर लिखी कैलाश गौतम की कविता पर मेरी प्रस्तुति के जवाब में इस कविता के बारे में मुझे पहली बार बताया और दूसरे राधा चमोली जिन्होंने इस कविता की रिकार्डिंग मेरे साथ शेयर कर इस कविता के बारे में पुनः स्मरण कराया।

Wednesday, April 07, 2010

'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए अपने चार साल और दो लाख पेजलोड्स !

लगभग दस दिन पहले यानि २६ मार्च को एक शाम मेरे नाम के हिंदी संस्करण ने अपने चार साल पूरे कर लिये। साथ ही पिछले हफ्ते ही इस चिट्ठे के दो लाख पेजलोड्स भी पूरे हो गए।



अगर आप स्टैटकांउटर द्वारा दिए गए आंकड़ों पर ध्यान देंगे तो पाएँगे कि प्रथम दो सालों तक ब्लॉग पर हिट्स मिलने का सिलसिला बड़ी मंथर गति से हुआ था पर उत्तरोत्तर ये बढ़ता गया।


पिछले साल औसतन महिनावार हिट्स (Average Monthly Hits) 6500 रहीं यानि पिछले साल प्रतिदिन औसतन दो सौ से ज्यादा हिट्स इस ब्लॉग को मिलती रहीं। इस आँकड़े को आप नीचे के चार्ट में देख सकते हैं।


अब तक इस चिट्ठे पर चार सौ दस (410) पोस्ट लिखी गई हैं यानि प्रति पोस्ट 490 की औसत से पढ़ी गई हैं। पिछले साल ये आँकड़ा 350 पेजलोड्स प्रति पोस्ट था। इस ब्लॉग के हिंदी और रोमन हिंदी संस्करणों की सब्सक्राइबर संख्या में भी इज़ाफा हुआ है और ये संख्या पिछले साल के 450 से बढ़कर 825 तक जा पहुँची है।


वहीं रोमन हिंदी ब्लॉग Ek Shaam Mere Naam पर हिट्स की संख्या लगभग पहले जैसी ही है।

अपने अनुभवों से इतना कह सकता हूँ कि जैसे जैसे आप अपने विषय वस्तु यानि कान्टेंट में विस्तार करते जाते हैं, कुल पाठकों की संख्या में तो वृद्धि होती है पर उसमें एग्रगेटर से आनेवाले पाठकों का हिस्सा कम होता जाता है। इसलिए सनसनी या बिना मतलब के पचड़ों में पड़ने के बजाए अपने मन की बात कहें और पूरी मेहनत के साथ कहें। इस बात का भी अंदाजा लगाएँ कि पाठकों को हमारे लेखन का कौन सा अंदाज़ ज्यादा भाता है। इससे आपको अपने मजबूत पक्ष और कमियों का अंदाज़ा मिलेगा। सच पूछिए तो खुद एक परिपक्व ब्लॉग लेखक को इस बात की सबसे ज्यादा समझ होती है कि उसके द्वारा परोसी सामग्री कितनी बेहतर या बेकार है।

पिछले एक साल में पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 'एक शाम मेरे नाम' के स्वरूप में मैंने काफी बदलाव किए थे। ऊपर मेनू बार की जगह को गज़ल, मनभावन गीत, वार्षिक संगीतमाला, कविता, पुस्तक चर्चा, ब्लागिंग और अपनी बात के अलग अलग खंडों में बाँटना उसी का एक हिस्सा था। ग़जलों और मनभावन गीत मेन टैब क्लिक करने से आप सीधे उन पृष्ठों पर पहुँचते हैं जहाँ इस ब्लॉग पर पेश गीतों और ग़ज़लों की लिंकित सूची दी हुई है। हाँ, लाइफलॉगर के बंद हो जाने से पुराने पृष्ठों में कई जगह आडिओ फाइल गायब हो गई हैं। पिछले कुछ दिनों में मैंने ऐसी कई पोस्टों को दुरुस्त किया है, पर इस कार्य को पूर्ण होने में अभी और समय लगेगा। वेसे पाठकों से गुजारिश है कि जब भी ऐसी कोई पोस्ट सामने आए, उसकी तरफ मेरा ध्यान दिलाएँ।

हिंदी फिल्म संगीत से जुड़े अपने खास पसंदीदा कलाकार या शायर से जुड़े लेखों तक पहुँचने के लिए ग़जल और गीत के मुख्य मेनू बार में सब मेनू दिए गए हैं। मसलन अगर आप सिर्फ गुलज़ार से जुड़ी पोस्ट देखना चाहते हैं तो टैग क्लाउड में ढूँढने के बजाए सीधे मनभावन गीत -- गीतकार -- गुलज़ार पर क्लिक कर सकते हैं।

कभी कभी 'मुसाफ़िर हूँ यारों' और 'एक शाम मेरे नाम' पर एक साथ निरंतरता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है पर फिर आपका स्नेह व साथ मुझे बीच बीच में होती थकान से उबारता है। ब्लागिंग के इस नए साल में मेरा ये प्रयास होगा कि कुछ अच्छा आपके सामने लिख और परोस सकूँ। एक बार फिर इस चिट्ठे को इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए आप सभी जाने अनजाने पाठकों का हार्दिक आभार!

Saturday, April 03, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 सरताज गीत - क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले, इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले ..

तीन महिनों के इस सफ़र को पूरा करते हुए वक़्त आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला 2009 के सरताजी बिगुल के बजने का। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पाँचों गीत का आपसी फ़ासला बेहद मामूली था। साल के सरताज गीत के आसन पर मैंने उस गीत को बैठाया जो मेरे दिल को अपेक्षाकृत ज्यादा करीब से छू गया।

वैसे ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा कि मेरे सबसे चहेते गीतकार और प्रिय संगीतकार के होते हुए भी, संगीतमाला की पहली पॉयदान पर पिछले छः सालों पर पहली बार इस गीतकार-संगीतकार की जोड़ी का कब्जा हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2006 में इस जोड़ी ने तीसरी पॉयदान तक का सफ़र तय किया था।

तो कौन है वो जोड़ी? गीतकार का नाम तो आप समझ ही गए होंगे जी हाँ वही हरदिलअज़ीज़ गुलज़ार साहब (जिन्हें इस चिट्ठे पर पिछले महिने कराए गए चुनाव में सबसे ज्यादा मत आप लोगों ने दिए हैं) और चोटी पर खड़े इस गीत में उनका साथ दे रहे गायक व संगीतकार विशाल भारद्वाज। फिल्म कमीने का ये गीत जब मैंने पहली बार सुना था तो मैं इसकी गिरफ़्त में आ गया था। पर आखिर क्या बात है इस गीत में?

जीवन में अपने लक्ष्यों को पूरा करने में मिली सफलताओं का श्रेय हम अक्सर अपनी मेहनत और लगन को देते हैं और वहीं जब विफलताएँ हमारा रास्ता काटती हैं तो सारा दोषारोपण अपनी फूटी किस्मत और अपने आसपास के लोगों के मत्थे मढ़ देते हैं।

पर ये धोखा अपने आप को कोई शख़्स कब तक देता रहेगा? फुर्सत के उन एकाकी लमहों में जब हम अपने आत्मावलोकन के लिए मजबूर होते हैं तब हमें लगता हैं कि ख़ुद हमारे चुने रास्ते, हमारी छिछली सोच और हमारे कर्म भी इन हालातों के लिए कम जिम्मेवार नहीं। दरअसल ज़िंदगी के इतने विस्तृत कैनवास में हमारा मन कितनी बार कमीनेपन की इन हदों को पार करता है इसका अंदाज़ा समय रहते हम कई बार नहीं लगा पाते।

हमारे इसी मन का खाका खींचती, साथी चिट्ठाकार विश्व दीपक 'तनहा' की इन पंक्तियों पर ज़रा गौर करें जो उन्होंने हाल फिलहाल में कही हैं..

"....यह जो मेरा अगम-अगोचर-
अलसाया-सा अद्भुत मन है.......

मुझे संवारे, मुझे निखारे
मुझको मेरा सच बतला दे
ऐसा कहाँ कोई दर्पण है..

और क्या कहूँ,
यही बहुत है..
मुझे जानने वाले कहते
कभी राम
तो कभी विभीषण
और कभी मुझमें रावण है..
...."

गुलज़ार साहब ने हर व्यक्ति में अपने मन और कर्मों को टटोलने के लिए चलते इस मौन वार्तालाप को इस गीत में इस संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है कि आप इन शब्दों को सुनकर एकबारगी सोचने पर मजबूर जरूर हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर गीत के मुखड़े पर गौर करें

क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले
इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले
रात दिन गिले...
मेरी आरज़ू कमीनी, मेरे ख्वाब भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने......


क्या ये सच नहीं कि ज़िंदगी से हमारी अपेक्षाएँ अपने कर्मों के प्रतिफल से कहीं आगे चली जाती हैं? एक सफलता मिली नहीं कि दूसरी के पीछे भागना शुरु। इंसान की इसी मनोवृति को गुलज़ार साहब, अपने चिरपरिचित बिंबों के आइने में कुछ यूँ पेश करते हैं...

कभी ज़िंदगी से माँगा
पिंजरे में चाँद ला दो
कभी लालटेन ले के
कहा आसमाँ पे टाँगो

जीने के सब करीने
थे हमेशा से कमीने
कमीने...कमीने..कमीने
मेरी दास्तां कमीनी

मेरे रास्ते कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने

और चूँकि हम ऐसे हैं तो अपने दोस्तों और अपने समाज से क्या उम्मीद रखें...

जिसका भी चेहरा छीला
अन्दर से और निकला
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने





विशाल भारद्वाज ने गीत के कैफ़ियत के हिसाब से संगीत रचना तो की ही है, साथ ही फिल्म के इस सबसे बेहतरीन गीत को गाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए हैं। पर कुल मिलाकर मुझे लगता है कि आज के इस युग में हम, आप यानि कि हम सभी इस गीत को अपनी अपनी ज़िंदगी से जोड़ के देख सकते हैं। ये गीत हमें अपने अंदर झाँकने और अपना मूल्यांकन करने पर मजबूर करता है।

इस गीत से ना मुझे बेहद प्यार है बल्कि गुलज़ार स्वयम् इसे कमीने की बेहतरीन रचना मानते हैं। गीत में 'कमीने' शब्द के प्रयोग के बारे में गुलज़ार कहते हैं

हम अपने जीवन में कमीने शब्द का प्रयोग बतौर गाली के कम और एक अपनत्व से दी हुई झिड़की के तौर पर ज्यादा करते हैं। मुझे तो ओम पुरी की बात याद पड़ती है जिसने मेरे यहाँ अपना पसंदीदा नाश्ता करने के बाद ये कहा कि आपने मुझे आज एक बार भी 'कमीना' नही कहा। मेरी समझ से तो कमीना कहना किसी के कंधे पर आत्मीयता से थपथपाने या फिर हल्की सा मूक चपत लगाने जैसा है जो ये इंगित करता है कि ये चपत भी इसलिए है कि मुझे अभी भी तुम्हारी फिक्र है।
गुलज़ार, विशाल के संगीत में वही चमक पाते हैं जो एक ज़माने में उन्होंने पंचम के साथ काम करते हुए महसूस की थी। खुशी तो तब हुई जब इस गीत के बारे में मेरी भावनाएँ गुलज़ार के एक साक्षात्कार में प्रतिध्वनित हुई। अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में गुलज़ार ने कहा

जब भी मैं विशाल के साथ काम करता हूँ हम दोनों मिल कर हिंदी फिल्म संगीत के नए आयामों को तलाशने की कोशिश करते हैं। कमीने में भी मैंने कुछ नया लिखने की कोशिश की है। इतना स्पष्ट कर दूँ की 'धन ता नान' मेरा इस फिल्म का पसंदीदा गीत नहीं है। ये अलग बात है कि आजकल तेज रिदम पर आधारित गीत ही ज्यादा चलते हैं। मुझे तो विशाल का गाया हुआ फिल्म का शीर्षक गीत ही सबसे प्यारा लगता है क्यूँकि वहाँ मैंने जिन शब्दों का चयन किया है उन्हें सुनकर श्रोताओं के मन में एक सोच तो पैदा होगी ही। पर ये भी है कि आजकल शब्दों को ध्यान से सुनता कौन है?
दिल की बात कह दी गुलज़ार साहब ने...

वार्षिक संगीतमालाओं के माध्यम से आज के संगीत में जो कुछ सुनने और चर्चा करने योग्य हो रहा है उसे आप तक पहुँचाने की कोशिश करता रहा हूँ। वर्ष 2004 से लेकर आज 2009 तक वार्षिक संगीतमालाओं के छः अंक हो चुके हैं। मुझे विश्वास है कि वार्षिक संगीतमाला 2009 में पिछले तीन महिनों में प्रस्तुत गीतों ने संगीत, गायिकी और बोलों की दृष्टि से आपका मन जीता होगा। यक़ीन मानिए साल के ये शुरु के तीन महिने ब्लागिंग की दृष्टि से मेरे लिए बेहद श्रमसाध्य होते हैं। तीन महिनों के इस लंबे सफ़र को कायम रखने के लिए आपका प्रेम एक उत्प्रेरक के रूप में काम करता रहा है। शुरु से आखिर तक प्रस्तुत गीतों पर अपनी राय देने के लिए मैं रंजना जी, हिमांशु, प्रियंक जैन, सुशील, समीर जी, गौतम, अभिषेक, कंचन, अपूर्व, सागर, राज भाटिया व अन्य साथियों का हार्दिक आभारी हूँ ! इन्हीं शब्दों के साथ संगीतमाला की इस लंबी श्रृंखला का समापन करने की इज़ाजत दीजिए।

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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