Monday, December 26, 2011

आइए झूम लें साल 2011 के दस मस्ती भरे नाचने नचाने वाले गीतों के साथ !

'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमाला 2011 करीब आने वाली है। पर वार्षिक संगीतमाला शुरु होने के ठीक पहले मैं आपको हर साल वैसे गीतों से भी रूबरू कराता रहा हूँ जिन्होंने  पूरे देश को झुमाया है। वैसे भी साल के इस हफ्ते में जब माहौल में मस्ती की तरंग बह रही हो तो मुझे भी तो आपके थिरकने का बंदोबस्त करना पड़ेगा। तो चलिए चलते हैं बॉलीवुड की धूम धड़ाके वाली दुनिया में।

मुंबई नगरी में आजकल डान्स नंबर बक़ायदा आइटम नंबर के रूप में पेश किये जाते हैं। एक ज़माना था जब ये काम सिर्फ हेलेन, कल्पना अय्यर, प्रेमा नारायण जैसी अदाकारा सँभाला करती थीं। वक्त बदला तो चलन बदला। आजकल तो अगर आपके नाम के आगे कोई आइटम नंबर ना हो तो फिर आपकी हॉट अभिनेत्रियों की श्रेणी से छुट्टी कर दी जाएगी।

पर पिछले साल रिलीज़ हुई सौ से ज्यादा फिल्मों बहुत सारे आइटम नंबर बर्बाद धुनों की बलि चढ़ गए। वैसे ये गानें सिर्फ धुनों के सहारे चलते हों ऐसा भी नहीं है। अगर गत वर्ष के तथाकथित डान्स नंबरों पर नज़र डालें तो सफलता के तीन आयाम आपको इनमें से जरूर झाँकते नज़र आएँगे.. म्यूजिक मस्त, पोशाकें चुस्त और साथ में एक अदद गाली हो तो सोने पे सुहागा। जितनी भद्दी गाली गाना उतना ही हिट। हालांकि अपवाद हर जगह हैं और आप पाएँगे कि इनके बिना भी कुछ गीतों ने इस साल शोहरत पाई है। तो तैयार हैं ना आप मेरे साथ आज की इस महफिल में  थिरकने के लिए..

पर रुकिए ज़रा इतनी जल्दी भी क्या है। भाई डॉन अपने नए अवतार डॉन 2 में एक बार फिर लौट आए हैं। वैसे तो हमारे कुछ फेसबुकिया मित्रों का मानना है कि डॉन 2 को झेल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। पर घबराइए नहीं विशाल शेखर ने डॉन 2 का ये गीत इतना अझेल नहीं बनाया है। तो दिल को थाम कर रखिए और देखिए शाहरुख के जलवों को इस गीत में

#10 : ज़रा दिल को थाम लो


अब शाहरुख की बात हो गई तो सल्लू को कैसे छोड़ दें। बेचारे नाराज़ हैं कि करते तो सब वही हैं पर कैरेक्टर उनका ही ढीला बताया जाता है। फिर अगर गुस्से में 'साला' निकल जाए तो उनकी क्या गलती है। तो आइए सुने फिल्म रेडी में सलमान की शिकायत
#9 : कैरेक्टर ढीला है...


पिछले साल एक फिल्म आई थी फालतू 2011। मैंने सोचा निर्देशक ने कुछ सोच समझ कर ही नाम रखा होगा सो देखने की ज़हमत नहीं उठाई। पर इसका एक हिंगलिश गीत युवाओं में खूब लोकप्रिय हुआ। होता क्यूँ ना आज कल की नाइट पार्टीज का इतना जीवंत वर्णन आपको कहाँ मिलेगा ? ज़रा इस गीत के पहले अंतरे पर गौर करें

आज है फ्राइडे नाइट मैं चलूँ अपने फ्रेंड्स के साथ
रैंडम स्पिनिंग व्हील्स मेरी बूम बूम कार
लगा के सीडी प्लेयर हम चलने को हैं तैयार
हैलो मिस्टर डीजे मेरा गाना प्लीज प्ले
बा बा बा बूजिंग डान्सिंग एंड वि क्रूजिंग
बाउंसर पंगा लेता है तो गोट्टा कीप इट मूविंग
चार बज गए लेकिन पार्टी अभी बाकी है
तारे घिर गए लेकिन पार्टी अभी बाकी है
डैडी हैं नाराज लेकिन पार्टी अभी बाकी है

मुझे नहीं लगता अब कुछ और कहने की जरूरत है :)
#8 : चार बज गए मगर पार्टी अभी बाकी है...


और अब आ गई छम्मक छल्लो। ये शब्द एक ज़माने में मनचले आशिकों के शब्दकोश का अभिन्न अंग हुआ करता था अब विशाल शेखर की बदौलत सारे देश के युवाओं के शब्दकोश का है। किसी ने मुझसे पूछा कि इस गीत में 'छम्मक छल्लो' के आलावा गायक और क्या बोलता है? मैंने कहा ये तो संगीतकार विशाल शेखर से पूछिए जिन्होंने सेनेगल मूल के अमेरिकी गायक एकोन से ये गीत गवाया है। बाकी आप छम्मक छल्लो के साथ हाथ को बस गोल गोल घुमाइए और ठुमके लगाइए  गीत के बोलों पर इतना भेजा फ्राइ क्यूँ करते हैं?

#7 : छम्मक छल्लो..



हीमेश रेशमिया बरसों बाद जागे हैं। सुना है विवादों से दूर नई धुनें तैयार करने में लगे थे। पर गए अकेले थे और लौटे हैं मुई इस नयी नवेली उमराव जान के साथ। अरे भाई दूर से ही देखिए,छूने के लिए आपके हाथ काहे फड़फड़ा रहे हैं। जानते हैं ना हीमेश का गुस्सा..वैसे मजाक नहीं करेंगे गीत की शुरुआती धुन तो मटकने के लिए हमें भी मजबूर किए देती है
#6 : No Touching No Touching Only Seeing Only Seeing..


अब सारे आइटम नंबर हीरोइन ही करेंगी तो हमरे हीरोवन सबके लिए का बचेगा? हीरो लोगों को ऐसा आफर जवान लड़के देंगे नहीं। पर बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं। चले गए रणबीर कपूर के पास कि हमारी फिल्म के लिए टपोरी वाला एक आइटम नंबर कर दो। और अमित त्रिवेदी के संगीत निर्देशन में क्या झकास आइटम नंबर किया रणबीर ने कि सबकी टाँय टाँय फिस्स हो गई आप भी देखिए...

#5 : टाँय टाँय फिस्स..


अगर शादी का माहौल हो तो नाच गाने का मजा ही कुछ और है। और अगर शादी पंजाबी हो तो क्या कहने। लेहम्बर हुसैनपुरी का ये पंजाबी लोक गीत जो  फिल्म तनु वेड्स मनु में जस का तस लिया गया है मेरे साल के चहेते गीतों में से एक है। आपने ना सुना हो तो जरूर सुनें मस्ती का माहौल ख़ुद बा ख़ुद आपके चारों ओर बन जाएगा।

#3 : कभी सड्डी गली ...आया करो




एक अलग सी सहज आकर्षित करती धुन , अच्छी आवाज़ पर बेमतलब से बोल जिनके उच्चारण का तरीका ही उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत है.... यही तो है 'कोलावेरी डी' की लोकप्रियता का राज। पर इससे एक इशारा हमारे संगीतकारों पर भी जाता है जिन्होंने अच्छी धुनों का इस साल एक ऍसा अकाल पैदा कर दिया है कि एक कोलावेरी डी को आकर उस शून्यता को भरना पड़ता है। जावेद अख्तर साहब ने इस गीत की धुन को बेकार ठहराया पर कुछ दिनों बाद सोनू निगम के बेटे द्वारा गाए इसके दूसरे वर्जन की तारीफ कर दी। ख़ैर जावेद जी की तो वो ही जाने ख़ुद गीत के रचयिता धनुष भी इसे गंभीरता से नहीं लेते पर कुछ तो जादू है इस धुन का कि पूरा देश इसका आनंद उठा रहा है..

#2 : Why this Why this 'Kolaveri D'


अस्सी के दशक में बप्पी लाहिड़ी ने इन्दीवर के साथ मिलकर जीतेंद्र - श्रीदेवी - जयाप्रदा की तिकड़ी पर अपने कई हिट गीत दिए थे। उई अम्मा उई अम्मा और झोपड़ी में..उस ज़माने के हिसाब से  निहायत घटिया किस्म के गीत थे। वो ज़माना गया तो बप्पी दा भी गए पर विशाल शेखर ने ये काम खूब किया उस पीरियड की फिल्म का संगीत दिया तो बप्पी दा की आवाज़ वापस ले आए। अब फिल्म ही 'डर्टी' है तो गीत थोड़ा डर्टी होगा ही पर यही उस समय की वास्तविकता थी जिसे श्रेया ने इस गीत में पूरी मस्ती के साथ बखूबी उभारा है..

 #1 : ऊ ला ला....


इस गीत के बनने के बाद कितने ही डी के बोसों ने अपना सर पीट लिया होगा उसका अनुमान लगाना कठिन है। इस गीत का इतना असर तो होगा कि ये नाम आगे की पीढी में 'प्राण' की तरह ही विलुप्त होता चला जाएगा। मेरा मानना है कि वास्तविकता दिखाने के नाम पर 'डी के बोस' और 'आँधी' शब्द के बिना भी इस गीत में इतना दम था कि ये लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता पर आज का ज़माना शार्ट कर्ट का है। विवादित होना मतलब लोकप्रिय होना है और निर्देशक गीतकार ने वो रास्ता चुना। बहरहाल इस गीत को अंत में दिखाने के पीछे पीयूष नारायण का बनाए ये वीडिओ है। यह वीडिओ इस गीत को चित्रों के माध्यम से बड़े मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करता है।
 #4: डी के बोस....


उम्मीद करता हूँ कि झूमते झुमाते गीतों का ये सिलसिला आपको पसंद आया होगा। वैसे वार्षिक संगीतमाला 2011 अगले हफ्ते शुरु हो रही है जिसमें मैं बाते करूँगा साल के पच्चीस बेहतरीन गीतों के बारे में। आशा है आप उस सफ़र में मेरे साथ होंगे..

Tuesday, December 20, 2011

अदम गोंडवी (1947-2011) : एक जनकवि की दुखद विदाई !

अदम गोंडवी उर्फ रामनाथ सिंह नहीं रहे। गत रविवार को लीवरसिरोसिस से पीड़ित इस ग़ज़लकार ने दुनिया से विदा ली। उनके पैतृक जिले गोंडा मे पिछले कुछ दिनों से उनका इलाज चल रहा था। आर्थिक तंगी की वज़ह से वो पहले लखनऊ नहीं आ पा रहे थे और जब आए तब तक उनकी हालत शायद काफी बिगड़ चुकी थी। अदम गोंडवी को हिंदी ग़ज़ल में लोग दुष्यन्त कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला लेखक मानते हैं।1998 में उन्हें मध्यप्रदेश सरकार ने दुष्यन्त सम्मान से नवाज़ा था। उनके लिखे गजल संग्रह 'धरती की सतह पर'मुक्ति प्रकाशन व 'समय से मुठभेड़' के नाम से वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुए।

हमेशा अपने देशी परिधान धोती कुर्ते में देखे जाने वाले अदम का जीवन सादा और ग्रामीण जीवन से जुड़ा रहा। गाँव से उनके लगाव को उनके इन अशआरों से समझा जा सकता है

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

न इन में वो कशिश होगी , न बू होगी , न रआनाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी कतारों में

उन्होंने लोगों की कठिनाइयों को करीब से समझा और उननी लेखनी इस वर्ग में पलते आक्रोश की जुबान बनी

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है

दुष्यन्त की तरह ही उनकी लेखनी समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता और भ्रष्टाचार पर खूब चली। सहज भाषा में भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था पर अपनी ग़ज़लों के माध्यम से किए कटाक्षों ने अदम को आम जनता के बीच खासी लोकप्रियता दी। मिसाल के तौर पर इन अशआरों में उनकी लेखनी का कमाल देखें..

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

प्रचार और चमचागिरी हमारी आज की राजनीति के कितने अभिन्न अंग हैं ये अदम कितनी खूबसूरती से बयाँ कर गए इस शेर में..

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

और यहाँ देखिए क्या ख़ाका खींचा था आज की विधायिका का गोंडवी साहब ने...

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

अपनी किताब 'धरती की सतह पर' में एक बड़ी लंबी कविता लिखी थी गोंडवी जी ने। कविता का शीर्षक था मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको..
कविता एक दलित युवती की कहानी कहती है जिसे सवर्णों की वासना का शिकार होने के बावजूद भी हमारा सामाजिक ढाँचा न्याय नहीं दिलवा पाता। क्या ये विडंबना नहीं कि दलितों और गरीबों की बात कहने वाले शायर को वैसे प्रदेश से आर्थिक बदहाली में ही संसार से रुखसत होना पड़ता है जो तथाकथित रूप से इस वर्ग का हितैषी है?

अदम गोंडवी साहब की इस कविता को उनके प्रति विनम्र श्रृद्धांजलि के तौर पर आप तक अपनी आवाज़ में पहुँचा रहा हूँ। आशा है उनके लिखे शब्द युवाओं को इस सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए प्रेरित करेंगे जिसकी झलक ये कविता हमें दिखलाती है।

ख़ुद गोंडवी साहब को इस कविता के कुछ अंश पढ़ते आप यहाँ देख सकते हैं।


Tuesday, November 22, 2011

सैफुद्दिन सैफ़ : जाने क्या क्या ख्याल करता हूँ, जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ..सुने ये नज़्म मेरी आवाज़ में

पिछली पोस्ट में आपसे वादा किया था सैफुद्दिन सैफ़ की एक प्यारी सी नज़्म लेकर हाज़िर होने के लिए। ये तो आपको बता ही चुका हूँ कि सैफ़ साहब की शायरी में बारहा उस शहर का जिक्र आता है जहाँ उनकी प्रेमिका उन्हे छोड़ कर चली गई। सैफ़ मोहब्बत में मिली इस नाकामी से किस हद तक हिल गए थे ये उनके उस वक़्त की शायरी से साफ पता चलता है। 

उनके इस प्रेम प्रसंग के बारे में ये किस्सा मशहूर है कि उन्होंने एक ग़ज़ल लिखी जिसका मतला था क़रार लूटने वाले तू प्यार को तरसे। तब सैफ़ अमृतसर के मेयो कॉलेज में पढ़ते थे। अपनी इस ग़ज़ल को दिखाने के लिए जब वे अपने शिक्षक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के पास गए तो फ़ैज़ ने उनसे मुस्कुराते हुए कहा कि बरख़ुरदार महबूबा को कभी बददुआ नहीं देते। बाद में पाकिस्तानी फिल्म 'सात लाख' में मुनीर हुसैन ने इस ग़ज़ल को जब अपनी आवाज़ दी तो ये काफी लोकप्रिय हुई।

पर हम बात कर रहे थे सैफ़ साहब की प्रेमिका के उस शहर की जिस पर उनकी लेखनी बार बार चली। इस सिलसिले में उन्होंने एक बेहद लंबी नज़्म लिखी। नज़्म का नाम था जब तेरे शहर से गुजरता हूँ...। सैफ़ साहब अमृतसर के मुशायरों में इस नज़्म को हमेशा पढ़ते और श्रोताओं से वाहवाही लूटा करते थे। दरअसल ये नज़्म सैफ़ साहब के विरह में जलते दिल की कशमकश और पीड़ा को पाठकों के सामने ले आती है। फिल्म वादा में इस नज़्म के कुछ टुकड़े प्रयुक्त हुए। बाद में सलमान अल्वी,शाज़िया मंज़ूर और चंदन दास और तमाम अन्य गायकों ने अलग अलग अंदाज़ों में इसे अपनी आवाज़ दी। पर टुकड़ों में इस नज़्म को सुनने से बेहतर है इसे पूरा ख़ुद से पढ़ना। अंतरजाल पर भी ये नज़्म पूरी एक जगह लिखी हुई नहीं मिलती। फिर भी मैंने काफी खोज बीन के बाद इसके सारे हिस्से एक साथ किए हैं। हो सकता है फिर भी कुछ पंक्तियाँ छूटी हों। ऍसा होने पर जरूर इंगित कीजिएगा।

सैफुद्दीन सैफ़ की इस नज़्म को अपनी आवाज़ में पढ़ने और उनमें छिपे भावों में डूबने की कोशिश की है...




किस तरह रोकता हूँ अश्क़ों को
किस तरह दिल पे जब्र* करता हूँ
आज भी कारज़ार- ए -हस्ती ** में
जब तेरे शहर से गुजरता हूँ
*  काबू     ** दुनिया की इस जद्दोजहद


दिल भी करता है याद छुप के तुझे
नाम लेती नहीं ज़ुबाँ तेरा
इस क़दर भी नहीं मालूम मुझे
किस मोहल्ले में है मकाँ तेरा
कौन सी शाख- ए -गुल पे रक़्शां है
रक़्स- ए -फिरदौस* आशयाँ तेरा
जाने किन वादियों में ठहरा है
ग़ैरत- ए -हुस्न कारवाँ तेरा
किस से पूछूँगा मैं ख़बर तेरी
कौन बतलाएगा निशान तेरा
तेरी रुसवाइयों से डरता हूँ
जब तेरे शहर से गुजरता हूँ
*नृत्य करती वाटिका

हाल- ए -दिल भी ना कह सका गर्चे
तू रही मुद्दतों करीब मेरे
कुछ तेरी अज़मतों* का डर भी था
कुछ ख़यालात भी थे अजीब मेरे
आख़िरकार वो घड़ी आ ही गई
यारवर हो गए रक़ीब मेरे
तू मुझे छोड़ कर चली भी गई
ख़ैर किस्मत मेरी, नसीब मेरे
अब मैं क्यूँ तुझ को याद करता हूँ
जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ
* बड़प्पन

वो ज़माना तेरी मोहब्बत का
इक भूली हुई कहानी है
तेरे कूचे में उम्र भर ना गए
सारी दुनिया की ख़ाक छानी है
लज़्जत- ए -वस्ल* हो कि ग़म- ए -फ़िराक़**
जो भी है तेरी मेहरबानी है
किस तमन्ना से तुझको चाहा था
किस मोहब्बत से हार मानी है
अपनी किस्मत पे नाज़ करता हूँ
जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ
* मिलन की खुशी,  ** वियोग का ग़म

कोई पुरसा*- ए -हाल हो तो कहूँ
कैसी आँधी चली है तेरे बाद
दिन गुजारा है किस तरह मैंने
रात कैसे ढली है तेरे बाद
शमा- ए -उम्मीद सरसर- ए -ग़म** में
किस बहाने जली है तेरे बाद
 जिस में कोई मकीं ना रहता हो
दिल वो सूनी गली है तेरे बाद
रोज़ जीता हूँ , रोज़ मरता हूँ
जब तेरे शहर से गुजरता हूँ
* शोकाकुल,  ** ग़म की आँधी

तुझ से कोई गिला नहीं मुझको
मैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहता
तेरा मिलना ख़्वाब- ओ -खयाल हुआ
फिर भी ना आशना नहीं कहता
वो जो कहता था मुझको दीवाना
मैं उस को भी बुरा नहीं कहता
वर्ना इक बे- नवा मोहब्बत में
दिल के लुटने पे क्या नहीं करता
मैं तो मुश्किल से आह भरता हूँ
जब तेरे शहर से गुजरता हूँ
* दरिद्र

अश्क़ पलकों पे आ नहीं सकते
दिल में तेरी आबरू है अब भी
तुझ से है रौशन क़ायनात* मेरी
तेरे जलवे हैं चार सू अब भी
अपने ग़म- ए- खाना तख़य्युल** में
तुझ से होती है गुफ़्तगू अब भी
तुझ को वीराना- ए -तस्सवुर*** में
देख लेता हूँ रूबरू अब भी
अब भी मैं तुझसे प्यार करता हूँ
जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ
* संसार,  ** विचार करना, ***याद करना

आज भी उस मुक़ाम पर हूँ जहाँ
रसनो दार* की बुलंदी है
मेरे अशआर की लताफ़त** में
तेरे क़िरदार की बुलंदी है
तेरी मजबूरियों की अज़मत है
मेरे इसरार ***की बुलंदी है
सब तेरे दर्द की इनायत हैं
सब तेरे प्यार की बुलंदी है
तेरे ग़म से निबाह करता हूँ
जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ..
* सूली का फंदा,  ** उत्तमता, ***हठ,आग्रह
आज भी कारज़ार- ए -हस्ती में
तू अगर इक बार मिल जाए
किसी महफिल में सामना हो जाए
या सर- ए -रहगुज़र मिल जाए
इक नज़र देख ले मोहब्बत से
इक लमहे का प्यार मिल जाए
आरजुओं को चैन आ जाए
हसरतों को क़रार मिल जाए
जाने क्या क्या ख्याल करता हूँ
जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ..

लेकिन..
ऐ साक़िन- ए -खुर्रम ख्याल
याद है वो दौर कैफ़- ओ -कम कि नहीं
क्या तेरे दिल पे भी गुजरा है
मेरी महरूमियों का ग़म कि नहीं
और इस कारज़ार ए हस्ती में
फिर कभी मिल सकेंगे कि नहीं
डरते डरते सवाल करता हूँ
जब तेरे शहर से गुजरता हूँ

पता नहीं मेरी आवाज़ में ये नज़्म आपके दिल के जज़्बों को झकझोर पायी या नहीं पर आप इस नज़्म को विभिन्न कलाकारों द्वारा गाए वीडिओ की लिंक आप इस ब्लॉग के फेसबुक पेज पर सुन सकते हैं। और हाँ ये बताना तो भूल ही गया था कि पोस्ट में इस्तेमाल हुए चित्र के चित्रकार हैं लिओनिद अफ्रेमोव...

Friday, November 18, 2011

सैफुद्दीन सैफ़, रूना लैला : गरचे सौ बार ग़म ए हिज्र से जां गुज़री है...

रूना लैला की आवाज़ और ग़ज़ल गायिकी का मैं शुरु से मुरीद रहा हूँ। बहुत दिनों से रूना लैला की आवाज़ ज़ेहन की वादियों में कौंध रही थी। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा सुनने का जी चाह रहा था जो बहुत दिनों से ना सुना हो। कुछ दिन पहले एक मित्र की बदौलत जब उनकी ये पुरानी ग़ज़ल सुनने को मिली तब जाकर दिल की ये इच्छा पूर्ण हुई। ग़जल का मतला था

गरचे सौ बार ग़म- ए -हिज्र से जां गुज़री है
फिर भी जो दिल पे गुज़रनी थी, कहाँ गुज़री है


और दूसरा शेर तो मन को लाजवाब कर गया था

आप ठहरे हैं तो ठहरा है निज़ाम ए आलम
आप गुज़रे हैं तो इक मौज- ए -रवां गुज़री है


आगे की ग़ज़ल कुछ यूँ थी
होश में आए तो बतलाए तेरा दीवाना
दिन गुज़ारा है कहाँ रात कहाँ गुज़री है

हश्र के बाद भी दीवाने तेरे पूछते हैं
वह क़यामत जो गुज़रनी थी, कहाँ गुज़री है





पर रूना जी की गाई ग़ज़ल में मकता ना होने से शायर का नाम नहीं मिल रहा था। बहरहाल खोजबीन के बाद पता चला कि ये सैफुद्दीन सैफ़ साहब की रचना है। सोचा आज इस ग़ज़ल के बहाने सैफ़ साहब और उनकी शायरी से मुलाकात कराता चलूँ।

सन 1922 में अमृतसर में जन्मे सैफ़ पंजाब के लोकप्रिय शायर थे और विभाजन के बाद सरहद पार चले गए।  पचास और साठ के दशक में वे पाकिस्तानी फिल्म उद्योग से बतौर गीतकार और पटकथा लेखक जुड़े रहे। इस दौर में उनके लिखे गीतों को इतने दशकों बाद भी लोग बड़े चाव से गाते हैं। सैफ़ साहब की शायरी मूलतः इश्क़िया शायरी ही रही। मिसाल के तौर पर उनकी एक चर्चित ग़ज़ल राह आसान हो गई होगी के इन अशआरों को देखें..

फिर पलट निगाह नहीं आई
तुझ पे कुरबान हो गई होगी


तेरी जुल्फ़ों को छेड़ती है सबा
खुद परेशान हो गई होगी


सैफ़ साहब की इस ग़ज़ल के चंद शेरों को पढ़कर आप उनके रूमानियत भरे हृदय को समझ सकते हैं
अभी ना जाओ कि तारों का दिल धड़कता है
तमाम रात पड़ी है ज़रा ठहर जाओ

फिर इसके बाद ना हम तुमको रोकेंगे
लबों पे साँस अड़ी है जरा ठहर जाओ


सैफ़ की शायरी जहाँ मोहब्बत से ओतप्रोत थी वहीं उसमें विरह वेदना के स्वर भी थे। जब वे अपनी दर्द में डूबी इन ग़ज़लों को पूरी तरन्नुम के साथ पढ़ते थे तो लोग झूम उठते थे। कॉलेज के दिनों से ही युवाओं में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। शायर शौकत रिज़वी का कहना है कि सैफ़ की ग़ज़लों का ये दर्द उनकी नाकाम मोहब्बत के चलते पैदा हुआ। अपने दिल की तड़प को शब्दों में वे अक्सर बाँधते रहे.. वे अपने पहले प्रेम को कभी भुला ना सके और इसीलिए उन्होंने लिखा

तुम्हारे बाद ख़ुदा जाने क्या हुआ दिल को
किसी से रब्त बढ़ाने का हौसला ना हुआ

फिल्म जगत से जुड़े रहने के साथ साथ वो अपनी कविताएँ लिखते रहे। पचास के दशक के आरंभ में उनकी ग़ज़लें और नज़्में उनके संग्रह ख़ाम - ए- काकुल में प्रकाशित हुईं। वैसे ये बता दूँ कि  ख़ाम ए काकुल का अर्थ होता है प्रियतमा की जुल्फों के खूबसूरत घेरे या लटें। किताब अपने समय में खूब बिकी। इसी संग्रह में उनकी एक नज़्म है जिसे महदी हसन साहब ने अपनी आवाज़ दी है। नज़्म की चंद पंक्तियाँ शायर के दिल के हालात को कुछ यूँ बयां कर देती हैं..

रात की बेसकूँ खामोशी में
रो रहा हूँ कि सो नहीं सकता
राहतों के महल बनाता है
दिल जो आबाद हो नहीं सकता..


सैफ़ साहब की महबूबा उनसे अलग हुई पर उसकी यादें उन्हें उसके नए शहर के बारे में सोचने और लिखने को मज़बूर करती रहीं। काव्य समीक्षक डा. अफ़जल मिर्ज़ा का मानना है कि जिस तरह सैफुद्दीन सैफ़ ने अपनी प्रेमिका के शहर को आधार बनाकर अपने हृदय की पीड़ा इज़हार किया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। सैफ़ अपनी एक नज़्म मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा में लिखते हैं

इस से पहले कि तेरी चश्म - ए - करम मज़ारत की निगाह बन जाए
प्यार ढल जाए मेरे अश्क़ों में, आरज़ू इक आह बन जाए
मुझ पर आ जाए इश्क़ का इलज़ाम  और तू बेगुनाह बन जाए
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा......

इस से पहले कि सादगी तेरी लब - ए - खामोश को गिला कह दे
तेरी मजबूरियाँ ना देख सके और दिल तुझको बेवफ़ा कह दे
जाने मैं बेरुखी में क्या पूछूँ, जाने तू बेरुखी से क्या कह दे
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा..


वैसे इस नज़्म को पढ़कर साफ लगता है आनंद बख्शी का फिल्म नज़राना का लिखा गीत इसी नज़्म से प्रेरित था। वैसे सैफ़ साहब की एक और नज़्म है प्यारी सी जिसमें    शहर का जिक्र है। पर वो नज़्म सुनाऊँगा आपको अगली पोस्ट में !

Tuesday, November 08, 2011

शान्तनु, स्वानंद, जेब , हानीया के इस गीत पर बताएँ तो क्या ख़्याल है ?

विगत कुछ दिनों से टीवी पर निजी चैनलों ने बॉलीवुड गीतों से परे भारतीय संगीत में झाँकने की कोशिश की है। ऐसे कलाकारों को बढ़ावा दिया है जो लीक से हटकर कुछ करना चाहते हैं। जो संगीत को अपने जीवन की साधना मानते हैं और अपनी कला को बाजार के अनुरूप ढालने की बजाए अपने मूल्यों पर संगीत की रचना करते हैं। संगीत चैनल के नाम पर संगीत के आलावा सब कुछ परोसने वाला MTV पिछले कुछ महिनों में MTV Unplugged, MTV Roots और Coke Studio at MTV जैसे अलहदा कार्यक्रम ले के आया है। कुछ दिनों पहले इसी सिलसिले में मैंने आपको MTV Roots पर शंकर टकर और निराली कार्तिक की प्रस्तुतियों से रूबरू कराया था। इधर कुछ दिनों से Star World पर हर रविवार एक नए कार्यक्रम की शुरुआत हुई है। कार्यक्रम का नाम है The Dewarists । ये ऐसे संगीतज्ञों का साझा प्रयास है जिनके लिए संगीत एक जुनून है जो संगीत के माध्यम से नए ध्वन्यात्मक प्रयोगों से घबराते नहीं, जिन्हें एक नए गीत की खोज में  सरहदों की दीवार तोड़ कर एक नई जगह में साथ साथ विचरने से भी परहेज़ नहीं।

अमूमन मैं Star World नहीं देखता। पर जब मुझे पता चला कि इस कार्यक्रम में स्वानंद शान्तनु की जोड़ी के साथ पाकिस्तान की जेब हानिया (जएब, हानीया ) का गठजोड़ हो रहा है तो मन में खुशी का ठिकाना नहीं रहा। स्वानंद को बतौर गीतकार और गायक मैं बहुत पसंद करता हूँ। शान्तनु मोइत्रा के साथ गाए उनके गीत मेरी वार्षिक संगीतमालाओं की ऊपरी पॉयदानोँ पर हमेशा बजते रहे हैं। वहीं जएब का अफ़गानी गीत पैमोना.. सुनने के बाद मैं उनकी आवाज़ का कायल हो चुका हूँ. पर ऐसा मेरे साथ हुआ हो ऐसा भी नहीं है। शान्तनु  बताते हैं कि पैमोना सुनते ही मुझे लगा कि काश हम जएब हानिया के साथ कोई गीत बनाते, इसीलिए जब The Dewarists ने हमें ऐसा करने का मौका दिया तो हमने दोनों हाथ से लपक लिया। पर एक दूसरे के संगीत के प्रति ये सम्मान एकतरफा नहीं है। जएबहानीया भी बावरा मन देखने चला एक सपना की उतनी बड़ी प्रशंसक हैं जितना की मैं और आप।
 


स्वानंद और शान्तनु के सांगीतिक सफ़र के बारे में तो पहले भी बता चुका हूँ। जएब व हानिया पेशावर के संगीत से जुड़े परिवार से ताल्लुक रखती हैं। जएब बताती हैं कि उनके बचपन के समय पाकिस्तान में जिया उल हक़ की सरकार थी। जिया ने सार्वजनिक संगीत समारोह पर रोक लगा दी थी इसलिए तब महफ़िलें एक दूसरे के घरों या पारिवारिक जलसों में जमती थीं। इसलिए इन दोनों बहनों को महदी हसन, आबिदा परवीन, इकबाल बानो जैसे कलाकारों को घर में ही सुनना नसीब हो गया था। जएब फक्र से कहती हैं कि सात साल की उम्र में ही उन्हें साबरी ब्रदर्स के साथ गाने का मौका मिला। आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका गईं तो अपना हारमोनियम और गिटार लेकर। वहाँ पढ़ाई के साथ संगीत भी चलता रहा। फिर इंटरनेट पर अपलोड एक गीत पहले अमेरिका में लोकप्रिय हुआ और फिर पूरे पाकिस्तान में। आगे की कहानी तो यहाँ है ही



The Dewarists की एक ख़ासियत ये भी है कि ये कार्यक्रम दर्शकों को एक गीत बनने से पहले जो मिल जुल कर मेहनत होती है उसकी एक झलक भी दिखलाता है। अब इस गीत की बात करें तो शान्तनु अपने दिमाग में बैठी एक धुन बार बार गुनगुनाते हैं। जएब उस धुन को पकड़ कर सत्तर के दशक में महदी हसन के गाए एक दर्री गीत की कुछ पंक्तियाँ सुनाती हैं।

दी शब के तू अज़ मेह्र बाबाम
मेह्र बाबाम आमदाबूदी..आमदाबूदी
मतलब आप आज चाँद की तरह आसमान पर आए हैं इस बात की हमें बहुत खुशी हैं।

शान्तनु सुनकर उत्साहित हो उठते हैं। कहते हैं इसे शुरुआत में रखकर हम गाने का मूड बनाएँगे। स्वानंद को भी ये गीत के मूल भाव के लिए लाजवाब लगता है। आख़िर सरहद पार से आए मेहमानों के आने से सभी का मन हर्षित है ही। आगे की पंक्तियों के लिए सब स्वानंद की ओर आस लगाए हैं। स्वानंद हँसते हुए कहते हैं घबराएँ नहीं आगे के बोल मिल जाएँगे..आख़िर इसी की तो दुकान है अपनी। ये कहते हुए वो बाथरूम की ओर चल पड़ते हैं। अब चौंकने की बारी जएब व हानिया की है कि माज़रा क्या है। शान्तनु हँसते हुए कहते हैं कि ये स्वानंद की पुरानी आदत है। गीत के बोल उन्हें टॉयलेट में ही सूझते हैं। कुछ देर बाद स्वानंद इन पंक्तियों के साथ हाज़िर हो जाते हैं

धड़कनों की ताल बाजे साँसों का इकतारा

आँगन में सजाए बैठे सूरज चंदा तारा
चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

सबके मुँह से एक साथ वाह वाही निकलती है। उधर हानिया भी रात भर बैठ कर एक धुन बनाती रही हैं और आज उसके लिए उन्हें शब्द भी मिल गए हैं जो गीत के मुखड़े से खूब जम रहे हैं..


आप से दो बातें करने

यादों को जेबों में भरने
आए हैं हम कुछ दिनों के बाद
यारों की सोहबत में आ के
धीरे से कुछ गुनगुना के
यूँ ही कट जाते हैं दिन और रात

शान्तनु के गीतों में कभी शोर नहीं होता। गीत के अंतरों के बीच की ताली और सितार जैसा बजता गिटार मन को थपकियाँ सा देता प्रतीत होता है और उसपर जएब और स्वानंद की दमदार आवाज़ें। शान्तनु कहते हैं..मेरी लिए जएब और स्वानंद की आवाज़ें ही सबसे बड़े वाद्ययंत्र हैं।

शान्तनु ने अगले दो अंतरों की भी रचना कर ली है जिसकी काव्यात्मकता देखते ही बनती हैं। आख़िर यूँ ही स्वानंद हमारे प्रिय गीतकार नहीं ! पूरा गीत बनकर तैयार हो गया है। संगीत से एक दूसरे के करीब रहे ये कलाकार अब मन से भी एक दूसरे के करीब आ गए हैं। संगीत भला क्या सरहदों में बँटा रह सकता है?

दीशब के तू अज़ मेह्र बा बाम
मेह्र बा बाम आमदाबूदी..आमदाबूदी

धड़कनों की ताल बाजे साँसों का इकतारा
आँगन में सजाए बैठे सूरज चंदा तारा
चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

इक ज़हाँ छोटा सा अपना
इक ज़हाँ तुम्हारा
मुस्कान चाहें मीठी हो
या आँसू एक खारा
चलो बाँट लें ग़म और खुशी
थोड़ी गुफ़्तगू कर लें
कहो क्या ख्याल है
आप से दो बातें करने
यादों को जेबों में भरने
आए हैं हम कुछ दिनों के बाद
यारों की सोहबत में आ के
धीरे से कुछ गुनगुना के
यूँ ही कट जाते हैं दिन और रात

मुट्ठी में तुम भींच लाना सावन हरा
इक धनक तुम भी तोड़ लाना फ़लक़ से ज़रा
खट्टी बट्टी बाँट लेंगे किरणों का कतरा
इक सिक्का धूप हम से लेना गर कम लगा
बेतुक ही बेमलब हँस लें हम
क्यूँ ना ही इस लमहे में हाँ जी लें हम

चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

आप से दो बातें करने...
दीशब के तू अज़ मेह्र बा बाम
मेह्र बा बाम आमदाबूदी..आमदाबूदी



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Tuesday, November 01, 2011

तुम्हारे लिए : नैनीताल की ज़मीं पर पनपी तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा !

'तुम्हारे लिए', हिमांशु जोशी की लिखी ये किताब आज से चौदह साल पहले मेरे पास आई थी। मैंने खरीदी या उपहारस्वरूप मुझे मिली, अब ये याद नहीं रहा। किताब की प्रस्तावना में लिखा गया था...
यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं। वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ समय का सच प्रस्तुत करता है। मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्यों है? जीवन की सार्थकता किसमें है? किसलिए? बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रुप हैं, अनेक रंग।

पर पता नहीं कुछ पृष्ठों को पढ़ कर किशोरवय की इस प्रेम कथा में मन रमा नहीं था। फिर साल दर साल बीतते रहे ये किताब हर दीवाली में झाड़ पोंछ कर वापस उसी जगह रख दी जाती रही। पिछले महिने कुमाऊँ की यात्रा पर था। नैनीताल गया तो वहाँ मल्लीताल, तल्लीताल का नाम सुनकर सोचने लगा कि इन नामों को पहले कहाँ पढ़ा सुना है और अनायास ही इस पुस्तक की याद आ गई। नैनीताल देख आने के बाद इस पुस्तक के प्रति उत्सुकता ऐसी बढ़ी कि जो किताब सालों साल आलमारी में धूल फाँकती रही वो दीपावली की छुट्टियों में महज
चार घंटों में १८० पन्नों की पुस्तक पढ़ ली गई। 

मुझे लगता है कि जब भी कोई लेखक अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों से किसी कथा का ताना बाना बुनता है उसके कथन की ईमानदारी आपके हृदय को झकझोरने में समर्थ रहती है भले ही उसके गढ़े हुए चरित्रों का सामांजस्य आप आज के इस बदले हुए युग से ना बिठा सकें। आज जबकि ये उपन्यास अपने चौदहवें संस्करण को पार कर चुका है, लेखक हिमांशु जोशी से पाठक सबसे अधिक यही प्रश्न करते हैं कि क्या विराग का चरित्र उन्होंने अपने पर ही लिखा है? हिमांशु जी इस प्रश्न का सीधे सीध जवाब ना देकर अपनी पुरानी यादों में खो जाते हैं...
" लगता है, मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही घटित हुआ था। नैनीताल एक पराया अजनबी शहर, कब मेरे लिए अपना शहर बन गया, कब मेरे सपनों का शहर, याद नहीं। हाँ, याद आ रहा है- शायद वह वर्ष था 1948 ! महीना जुलाई ! तारीख पाँच, यानी अब से ठीक 54 साल पहले ! हल्द्वानी से रोडवेज की बस से, दोपहर ढले ‘लेक-ब्रिज’ पर उतरा तो सामने एक नया संसार दिखलाई दिया। धीमी-धीमी बारिश की फुहारें ! काले काले बादल, फटे रेशमी कंबल की तरह आसमान में बिखरे हुए, ‘चीना-पीक’ और ‘टिफिन टाप’ की चोटियों से हौले-हौले नीचे उतर रहे थे, झील की तरफ। उन धुँधलाए पैवंदों से अकस्मात् कभी छिपा हुआ पीला सूरज झाँकता तो सुनहरा ठंडा प्रकाश आँखों के आगे कौंधने सा लगता। धूप, बारिश और बादलों की यह आँखमिचौली-एक नए जादुई संसार की सृष्टि कर रही थी। दो दिन बाद आरंभिक परीक्षा के पश्चात् कॉलेज में दाखिला मिल गया तो लगा कि एक बहुत बड़ी मंजिल तय कर ली है...! साठ-सत्तर मील दूर, अपने नन्हे-से पर्वतीय गाँवनुमा कस्बे से आया था, बड़ी उम्मीदों से। इसी पर मेरे भविष्य का दारोमदार टिका था। मैं पढ़ना चाहता था, कुछ करना। अनेक सुनहरे सपने मैंने यों ही सँजो लिए थे, पर सामने चुनौतियों के पहाड़ थे, अंतहीन। अनगिनत। उन्हें लाँघ पाना आसान तो नहीं था ! इसी स्वप्न-संसार में बीते थे मेरे जीवन के पाँच साल। पाँच वसंत पतझड़ तब आता भी होगा तो कभी दिखा नहीं। ‘गुरखा लाइंस’ का छात्रावास, ‘क्रेगलैंड’ की चढ़ाई, चील-चक्कर, लड़ियाकाँटा, तल्लीताल, मल्लीताल, पाइंस, माल रोड, ठंडी सड़क, क्रास्थवेट हॉस्पिटल-ये सब कहीं उसी रंगीन-रंगहीन मानसिक मानचित्र के अभिन्न अंग बन गए थे। वर्षों बाद जब मैं ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में धारावाहिक प्रकाशन के लिए तुम्हारे लिए लिख रहा था, तो यह सारा का सारा शहर, इसमें दबी सारी सोई स्मृतियाँ जागकर फिर से सहसा साकार हो उठी थीं। "

उपन्यास का नायक विराग, लेखक से मिलता जुलता एक ऐसा ही चरित्र है जो पहाड़ के निम्न मध्यम वर्गीय घर की आशाओं का भार मन में लिए हुए नैनीताल पढ़ने के लिए आता है। पढ़ाई का आर्थिक बोझ अपने पिता पर कम करने के लिए ट्यूशन करना शुरु करता है और यहीं मिल जाती है उसे 'अनुमेहा..'। बचपन से रोपे गए संस्कार उसे प्रकट रूप में इस नए आकर्षण की ओर उन्मुख नहीं होने देते पर हृदय, अनुमेहा की अनुपस्थिति में  एक चक्रवात सा पैदा कर देता जिससे जूझते हुए ना पढ़ाई में मन लगता और ना ही मेहा को अपने चित्त से हटाने में सफलता मिलती।

विराग के बारे में पढ़ते हुए कई बार 'गुनाहों का देवता' का नायक चंदर याद आने लगता है। चंदर और विराग दोनों ही एक सी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं और 'चंदर' की तरह विराग भी मानसिक अंतरद्वंद का शिकार होकर बुरी तरह कुंठित हो जाता है। यहाँ तक कि अपने भाई को पढ़ाते पुरोहित पिता को ये कहते हुए भी वो जरा सी ग्लानि नहीं महसूस करता
"इसे आप आखिर क्या बनाना चाहते है? इस ग्रंथ को रटाकर जिंदगी में बिचारे को क्या मिल पाएगा। जो संस्कार आदमी को ऊपर नहीं उठने देते उन्हें तिलांजलि दे देनी चाहिए। इतना कुछ रटाकर आपने मुझे क्या दिया। आपका ये अधूरा अध्यात्म अधूरा ज्ञान किसी को किसी भी मंजिल तक नहीं ले जाएगा। जीवन भर इस राह पर चलने पर भी आदमी अधूरा ही रहेगा। आत्म प्रवंचना से बड़ा भी कोई पाप होता है....!"
पर विराग की 'अनुमेहा' चंदर की सुधा सरीखी नहीं है। उसका भोला किशोर मन अपने शिक्षक के प्रति श्रृद्धा और आसक्ति से पूर्ण तो है पर जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों को पाने के लिए वो सामाजिक बंधनों को तोड़ने का साहस रखती है। और जब विराग से उसे अपनी भावनाओं पर उचित प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो उसका मन आत्मसंशय से उलझता चला जाता है। विराग के सहपाठी सुहास से उसकी मित्रता ,इसी उलझन से निकलने का प्रयास है जिसे विराग अन्यथा ले लेता है। सुहास जहाँ इस सानिध्य को पा कर व्यक्तित्व की नई ऊँचाइयों को छूता है वही विराग का जीवन मेधा से अलग होकर अंधकारमय हो जाता है। हिमांशु जी ने पूरा उपन्यास फ्लैशबैक में लिखा है और सारा कथानक विराग के सहारे वर्णित होता है। इस वज़ह से अनुमेहा के मन में चल रही उधेड़बुन से पाठक कभी कभी अछूता रह जाता है।

आज तो नैनीताल एक बेहद भीड़ भाड़ वाला शहर हो गया है पर जब हिमांशु जी इस प्रणय गाथा के पार्श्व में नैनीताल की उस समय की सुंदरता का खाका खींचते हैं तो अभी का नैनीताल भी आँखों के सामने एकदम से सजीव हो उठता है... अब चाँदनी रात में तरुण द्वय द्वारा नैनी झील में किए गए नौका विहार के वर्णन में उनकी लेखनी का कमाल देखिए
"पूर्णिमा की उजली उजली रात थी। सागर की तरह ही इस नन्ही झील में नन्हा ज्वार उतर आया था। हिम श्वेत लहरें ऊपर तक उठ रहीं थीं। हिचकोलों में डोलती नाव ऐसी लग रही थी, जैसे पारे के सागर में सूखा नन्हा पत्ता काँप रहा हो। पिघले चाँदी की झील ! चाँदी की लहरें ! आसमान से अमृत बरसाता भरा भरा चाँद ! पेड़ पहाड़ मकान सब चाँदनी में नहाकर कितने उजले हो गए थे ! झील में डूबी प्रशांत नगरी कितनी मोहक हो गई थी ‌- स्वप्नमयी ।
पानी पर जहाँ जहाँ चाँद का प्रतिबिंब पड़ता है वहाँ एक साथ कितने तारे झिलमिलाने लगते हैं ! तुमने छोटी बच्ची की तरह चहकते हुए कहा था - मुग्ध दृष्टि से देखते हुए।
मैं केवल तुम्हारी तरफ़ देख रहा था...
तुम्हारे सफ़ेद कपड़े इस समय कितने सफ़ेद लग रहे थे। सुनहरे बाल चाँदी के रेशों की तरह हवा में उड़ रहे थे। चाँद तुम्हारे चेहरे पर चमक रहा था, लगता था तुम्हारी आकृति से किरणें फूट रही हों।"
ये उपन्यास हमारी और हमसे पहले की पीढ़ी के पाठकों को किशोरावस्था के उन दिनों की ओर ले जाता है जब हम सभी प्रेम की वैतरणी में पहला पाँव डालने के लिए आतुर हो रहे थे। आज के शहरी किशोर शायद ही इस कथा से अपने आप को जोड़ पाएँ क्यूँकि आज का समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा खुल चुका है। वैसे अगर आपने जिंदगी के आरंभिक साल नैनीताल में बिताए हों तो इस पुस्तक  को अवश्य पढ़ें। आपके मन में उमड़ती घुमड़ती यादों शायद उपन्यास के पन्नों में प्रतिबिंबित हो उठें।

हिमांशु जोशी का ये उपन्यास किताबघर से प्रकाशित हुआ है। पुस्तक का ISBN No.81-7016-030-8 है। नेट पर ये पुस्तक यहाँ पर उपलब्ध है।

इस चिट्ठे पर अन्य पुस्तकों पर की गई चर्चा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Friday, October 21, 2011

चोरी चोरी सोलह श्रृंगार करूँगी : पंचम और आशा की युगल जोड़ी द्वारा रचित एक नायाब नग्मा...

आशा जी और पंचम.... दो ऐसे नाम जिन्होंने हिंदी फिल्म संगीत को कई ऐसे बेशुमार नग्मे दिए जिनका ख्याल आते ही मन उस गीत की धुन को सुनते ही गुनगुनाने लगता है। ऐसा ही एक गीत है फिल्म मनोरंजन का जो  1974 में रुपहले पर्दे पर आई थी। बतौर निर्देशक ये शम्मी कपूर की पहली फिल्म थी। साठ के दशक में शम्मी जी ने अंग्रेजी फिल्म देखी थी ' Irma La Douce.' ।  इसे देखने के बाद ही उन्होंने इस फिल्म को हिंदी में बनाने का सपना पाल लिया था जो 1974 में जा कर फलीभूत हो सका। शम्मी खुद फिल्म के हीरो का रोल अदा करना चाहते थे। पर जब फिल्म बननी शुरु हुई तो वो इतने मोटे हो चुके थे कि हीरो का किरदार उन्होंने संजीव कुमार को थमा दिया।


फिल्म बहुत खास नहीं थी पर इतनी बुरी भी नहीं जितना कि बॉक्स आफिस पर इसका हश्र हुआ। कारण साफ था। वेश्यावृति को बिना किसी नैतिक आवरण में ढक कर उसे मात्र मनोरंजन का एक माध्यम मानने का का विचार उस युग क्या आज के समय के लिए भी बोल्ड ही कहा जाएगा। इस फिल्म के दो गीत आज भी लोग उतनी ही शिद्दत से याद करते हैं। एक तो मौज मस्ती वाला गोया कि चुनान्चे और दूसरा प्रेम के रस में डूबा चोरी चोरी सोलह श्रृंगार करूँगी...। 'तीसरी मंजिल' में पहली बार अनिच्छा के साथ पंचम को मौका देने वाले शम्मी उनकी लोक संगीत के साथ पश्चिमी वाद्य यंत्रों की अद्भुत संयोजन प्रतिभा देखकर चकित रह गए थे। इसीलिए जब वो अपनी फिल्म बनाने लगे तो फिल्म के संगीतकार के रूप में उन्होंने पंचम को चुनने में जरा भी देर नहीं की।

इस फिल्म का पहला गाना जो रिकार्ड हुआ था वो था चोरी चोरी सोलह श्रृंगार करूँगी.. शम्मी कपूर ने अपने एक साक्षात्कार में इस गीत को याद करते हुए कहा था मुझे याद है कि इस गीत की मेलोडी इसकी दोहरी रिदम संगीत संयोजन सब बेहद सुंदरता से गुथे हुए थे। इस गीत के ज़रिए पंचम ने दिखा दिया था कि वो अच्छा संगीत रचने के लिए जरूरी हर हुनर में माहिर है।

आशा जी ने गाया भी इसे पूरी मिठास से है। अगर आप गीत के मुखड़े और अंतरों पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि दोनों की रिदम अलग अलग है। हर अंतरे के अंत में जब आशा जी ना जी ना..हाँ जी हाँ कहते हुए जिस तरह मुखड़े पर लौटती हैं वो मन को गुदगुदाता हुआ निकल जाता है। फिल्म का ये गीत लिखा था आनंद  बख्शी ने। आनंद  बख्शी साहब के बोलों का सबसे असरदार हिस्सा मुझे गीत का मुखड़ा लगता है जिसे पंचम के संगीत के साथ  सुनना एक ऐसा अनुभव है जिससे बार बार गुजरने को जी चाहता है।

तो आइए सुनते हैं इस गीत को ..गीत के पहले शम्मी कपूर साहब आपको ये भी बताएँगे कि पंचम के संगीत में उन्हें क्या खास लगता था।


चोरी चोरी सोलह सिंगार (श्रृंगार ) करूँगी
आज सारी रात इंतज़ार करूँगी
सोए हैं मेरे पीहरवा... सोए हैं मेरे पीहरवा

लिपटे बदन से, शोले अगन के 
तेरी लगन के, खेलो ना मन से मेरे..
कह दूँगी मैं ये सजन से....
ना जी ना...हाँ..हाँ जी हाँ
एक ये गिला सौ बार करूँगी
आज सारी रात इंतज़ार करूँगी
सोए हैं मेरे पीहरवा... सोए हैं मेरे पीहरवा

नैनौं के रस्ते चुपके से आ के
सपनों में जा के
पायल बजा के छम से....
रख दूँगी उनको जगा के
ना जी ना...हाँ..हाँ जी हाँ
प्यार किया है मैंने प्यार करूँगी
आज सारी रात इंतज़ार करूँगी
सोए हैं मेरे पीहरवा... सोए हैं मेरे पीहरवा


आशा जी की आवाज़ पर पर्दे पर अपने पिया को रिझाने का काम किया था जीनत अमान ने..

चलते चलते ये बता दूँ कि आशा जी की बेमिसाल गायिकी की वज़ह से ये गीत फिल्मफेयर एवार्ड के लिए भी नामांकित हुआ था।

Friday, October 14, 2011

जगजीत सिंह : क्या उनके जाने के बाद ग़जलों का दौर वापस आएगा ?

दस अक्टूबर को दिल्ली में महरौली की ओर जा रहा था कि ख़बर मिली ... जगजीत सिंह नहीं रहे। ख़बर अप्रत्याशित नहीं थी। हफ़्ते दस दिन पहले ही उनके नजदीकियों से ये सूचना मिल रही थी कि मीडिया द्वारा प्रसारित उनकी "सो कॉल्ड स्टैबिलिटी" में कुछ खास सच्चाई नहीं है और वे वेंटिलेटर पर हैं और यदा कदा ही उनका शरीर हरक़त में आता है। इतना कुछ सुनने के बाद भी कहीं कोई उम्मीद की किरण जरूर थी कि कोई चमत्कार हो जाए। ग़ज़लों को भारत के आम मानस पटल पर जिलाने वाला शख़्स  शायद एक बार फिर लाखों करोड़ों ग़ज़ल प्रेमियों की दुआ से जी उठे।

पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था। जगजीत चले गए। जगजीत की जिंदगी और उनसे अपने जुड़ाव के बारे में पहले भी इतना लिख चुका हूँ कि अब उन बातों की पुनरावृति आवश्यक नहीं। इतना जरूर कहूँगा कि जगजीत के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलू भी थे। भले ही दुनिया ज़हान का दर्द उनकी आवाज़ से टपकता था पर अपनी निजी ज़िदगी के सदमों के बारे में वे अपने करीबियों से भी बात नहीं करते थे। बेटे की असमय मौत, चित्रा जी का गिरता स्वास्थ, बेटी द्वारा आत्महत्या.... मानसिक वेदना देने वाले इन झटकों के बावजूद उनका सांगीतिक सफ़र चलता रहा। नए एलबमों की आवृति में भले कमी आ गई हो पर महिने में दो कान्सर्ट वो कर ही लेते थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ, उस दिन भी वो गुलाम अली के साथ एक कार्यक्रम मुंबई में करने वाले थे। आशा जी कहती हैं कि ये अपने में घुलते रहना ही शायद उनकी गिरती तबियत की वज़ह बना।

जगजीत की एक और खासियत थी कि वो बिना किसी लाग लपेट के अपने दिल की बात कहने में यकीन रखते थे। भारत में पाकिस्तानी कलाकारों के कार्यक्रमों पर उन्हें इस लिए ऐतराज रहा क्यूँकि भारतीय कलाकारों को पाकिस्तान में कार्यक्रम करने में हमेशा दिक्कतों का सामना करना पड़ता रहा। अक्सर जगजीत से उनके साक्षात्कारों में ये प्रश्न किया जाता रहा कि हिंदी संगीत जगत में क्या ग़जल अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को वापस ला पाएगी? इस बारे में आशान्वित रहते। वे कहा करते थे कि

" ग़ज़लों का दौर फिर आएगा। आज जिस तरह के गीत बन रहे हैं उनमें कविता कम और टपोरीपन ज्यादा है। लोग उन्हीं शब्दों से खेलते है। गीत की जान उसके शब्द ना होकर 'डान्स रिदम' हो गयी हैं जिस पर वे आधारित हैं। आम संगीतप्रेमी का मन इनसे उब रहा है। वे ऐसा कुछ सुनना चाहते हैं जो सार्थक हो और मन को सुकून दे।"

ग़ज़लों की घटती लोकप्रियता के पीछे मीडिया की भूमिका से जगजीत बेहद आहत थे। जगजीत का मानना था कि लोग आज कल संगीत सुनने नहीं बल्कि देखने लगे हैं।

"कैसा भी गायक हो निर्माता पैसे लगाकर एक आकर्षक वीडिओ लगा देते हैं और संगीत चैनल उसे मुफ्त में दिखा देते हैं। इससे गैर फिल्मी ग़ज़लों का टीवी के पर्दे तक पहुँचना मुश्किल हो गया है। रेडिओ की भी वही हालत है। प्राइवेट एफ एम चैनलों के मालिकों और उद्घोषकों को ग़जलों में ना कोई रुचि है ना उसको समझने का कोई तजुर्बा है। मैं तो कई बार ऐसे चैनल के साथ साक्षात्कार करने से साफ़ मना कर देता हूँ क्यूँकि वे ग़ज़लों को अपने कार्यक्रमों मे शामिल नही करते।"

 दो साल पहले जगजीत का दिया ये वक्तव्य मुझे सौ फीसदी सही लगता है। मुझे याद है कि जब हमारे घर पर कैसेट खरीद कर ग़ज़लें सुनने का चलन नहीं था तब भी हम विविध भारती के 'रंग तरंग 'कार्यक्रम की बदौलत ढेर सारी ग़ज़लों से रूबरू होते रहते थे। सरकारी चैनलों को छोड़ दे तो निजी चैनल ग़ज़लों के लिए आज भी वही रवैया इख्तियार किए हुए हैं। ऍसी हालत में नई पीढ़ी संगीत की इस विधा से अगर अपरिचित है तो उसमें उनका क्या दोष ?

मीडिया खासकर संगीत के चैनलों चाहे वो निजी रेडिओ या टीवी के हों की इसमें अहम भूमिका है। पिछले कुछ सालों में जब भी टीवी के अलग अलग चैनलौं पर लोक संगीत, सूफ़ी संगीत, शास्त्रीय व पाश्चात्य के फ्यूजन से जुड़े कार्यक्रम आए लोगों ने उसे सराहा। पर ग़ज़लों और नज़्मों को पसंद करने वालों के लिए अभी भी अपने श्रोताओं तक पहुँचने में इलेक्ट्रानिक मीडिआ की तरफ से कोई पहल नहीं हुई है।

जगजीत ने ग़ज़लों के साथ ग़ज़ल गायकों को भी हमेशा बढ़ावा दिया। पिछले साल 'सा रे गा मा पा' में जब रंजीत रजवाड़ा ने जब अपनी ग़ज़ल गायिकी से पूरे भारत को सम्मोहित किया तो गुलाम अली के साथ जगजीत भी उन्हें शाबासी देने पहुँचे। जगजीत ने वहाँ ये भी कहा कि जल्द ही ग़ज़ल गायकों के लिए एक अलग से संगीत कार्यक्रम होगा। पर उनके जीवन में उनका ये सपना साकार रूप नहीं ले सका।


आज जगजीत हमारे बीच नहीं है। उनकी आवाज़ तो हमेशा हमारे साथ रहेगी पर जगजीत सिंह को संगीतप्रेमियों की सच्ची श्रृद्धांजलि यही होगी कि हम सब मिलकर अपने अपने स्तर से संगीत की इस खूबसूरत विधा को हर संभव बढ़ावा दें ताकि नए ग़ज़ल गायक व गायिका जगजीत सिंह के जाने से उपजे शून्य को भर सकें और नई पीढ़ी इन्हें सुनने और समझने के आनंद से वंचित ना रहे।

एक शाम मेरे नाम पर जब जब गूँजी जगजीत की आवाज़
  1. धुन पहेली : पहचानिए जगजीत की गाई मशहूर ग़ज़लों के पहले की इन  धुनों को !
  2. क्या रहा जगजीत की गाई ग़ज़लों में 'ज़िंदगी' का फलसफ़ा ?
  3. जगजीत सिंह : वो याद आए जनाब बरसों में...
  4. Visions (विज़न्स) भाग I : एक कमी थी ताज महल में, हमने तेरी तस्वीर लगा दी !
  5. Visions (विज़न्स) भाग II :कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?
  6. Forget Me Not (फॉरगेट मी नॉट) : जगजीत और जनाब कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' की शायरी
  7. जगजीत का आरंभिक दौर, The Unforgettable (दि अनफॉरगेटेबल्स) और अमीर मीनाई की वो यादगार ग़ज़ल ...
  8. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 1
  9. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 2
  10. अस्सी के दशक के आरंभिक एलबम्स..बातें Ecstasies , A Sound Affair, A Milestone और The Latest की
  11. अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ...क़तील शिफ़ाई,
  12. आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है...सुदर्शन फ़ाकिर
  13. ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ? ... मज़ाज लखनवी
  14. क्या बतायें कि जां गई कैसे ? ...गुलज़ार
  15. ख़ुमार-ए-गम है महकती फिज़ा में जीते हैं...गुलज़ार
  16. 'चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी...सुदर्शन फ़ाकिर,
  17. परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ...क़तील शिफ़ाई,
  18. फूलों की तरह लब खोल कभी..गुलज़ार 
  19. बहुत दिनों की बात है शबाब पर बहार थी..., सलाम 'मछलीशेहरी',
  20. रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम... हसरत मोहानी
  21. शायद मैं ज़िन्दगी की सहर ले के आ गया...सुदर्शन फ़ाकिर
  22. सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं...क़तील शिफ़ाई, 
  23. हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद...राही मासूम रज़ा 
  24. फूल खिला दे शाखों पर पेड़ों को फल दे मौला
  25. जाग के काटी सारी रैना, गुलज़ार
  26. समझते थे मगर फिर भी ना रखी दूरियाँ हमने...वाली असी

Monday, September 26, 2011

जा जा रे अपने मंदिरवा जा....शंकर टकर और निराली कार्तिक की बेहतरीन जुगलबंदी !

पिछले हफ्ते आपसे बातें हुई शंकर टकर और उनके एलबम 'दि श्रुति बॉक्स 'में शामिल क्लारिनेट पर बजाई उनकी अद्भुत धुनों पर। अगर आपनें ये धुनें नहीं सुनी तो यहाँ पर जरूर सुन लीजिएगा  इससे पहले कि आज मैं  इस एलबम में शामिल निराली कार्तिक की गाई एक बंदिश का जिक्र करूँ अपने वादे के मुताबिक ये बताना जरूरी होगा कि इस अमेरिकी कलाकार का नाम 'शंकर' कैसे पड़ा ?

दरअसल शंकर का परिवार अम्मा यानि माँ अमृतानंदमयी का भक्त है। अम्मा जब जब अमेरिका की यात्रा पर होती हैं शंकर के माता पिता उनसे अवश्य मिलते हैं। ऐसी ही एक मुलाकात में अम्मा ने टकर परिवार को उनके छोटे से बेटे के लिए शंकर का नाम सुझाया था। तो ये था शंकर टकर के 'शंकर' का रहस्य !


शंकर की तरह ही अहमदाबाद में जन्मी और मेवात घराने से ताल्लुक रखने वाली शास्त्रीय गायिका निराली कार्तिक की अध्यात्मिक गुरु भी अम्मा हैं। निराली की माता ख़ुद एक गायिका हैं जबकि उनके भाई तबला वादक हैं। निराली नौ साल की आयु से ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। शायद अम्मा के सानिध्य ने इन दो कलाकारों को साथ काम करने की प्रेरणा दी और देखिए कितनी प्यारी बंदिश तैयार हुई जो कि मूलतः राग भीम पलासी पर आधारित है। बंदिश के बोल हैं

जा जा रे अपने मंदिरवा जा
सुन पावेगी सास ननदिया
जा जा रे अपने मंदिरवा जा...



एक ओर निराली का आलाप चलता है और साथ ही थिरकती हैं क्लारिनेट पर शंकर की उँगलियाँ। ट्रैक में 75 सेकेंड के बाद की जुगलबंदी सुनने वाले के आनंद को दूना कर देती है।

शंकर, अमेरिका में अम्मा के दौरे में हमेशा साथ रहते हैं और उनके भजनों के कार्यक्रमों में अपने वाद्य के साथ शिरकत भी करते हैं। इस एलबम में भी उन्होंने तमिल का एक भजन शामिल किया है जिसे गाया है अमेरिका में रहने वाली अय्यर बहनों विद्या और वंदना ने। राग दरबारी कानड़ा पर आधारित इस भजन में महालक्ष्मी की स्तुति की गई है।



अब तमिल तो मुझे आती नहीं पर इस ब्लॉग पर अंग्रेजी में दिए हुई व्याख्या के आधार पर संक्षेप में भजन  का अर्थ ये है कि जो तुमने  एक बार सोच लिया तो वो होकर ही रहना है। मनुष्य के जीवन में सुख और दुख दोनों का ही कारण तुम हो। अगर हमें अपने जीवन में सफलताएँ मिलें भी तो बिना तुम्हारे आशीष के क्या हम उन्हें अपने पास रख पाएँगे? अय्यर बहनों का ये भजन यू ट्यूब पर काफी लोकप्रियता हासिल कर रहा है।

वैसे शंकर टकर फिल्मों में भी काम कर रहे हैं। ए आर रहमान के साथ किया गया उनका काम सराहा भी गया है। अगर वो इसी तरह भारतीय संगीत में अपने हुनर को तराशते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हम उनके कुछ और एलबमों को बाजार में उतरता देखेंगे। अगर शंकर टकर के बारे में कुछ और जानना चाहते हों तो उनकी वेब साइट ये रही।

Monday, September 19, 2011

शंकर टकर और क्लारिनेट : पश्चिमी वाद्य यंत्र पर बहती हिदुस्तानी सुर गंगा...

शंकर 'टकर' ये नाम सुन कर  कुछ अज़ीब नहीं लगता आपको ? जब आप इस अमेरिकी वादक को क्लारिनेट पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ संगत करते देखेंगे तो आपका ये विस्मय और भी बढ़ जाएगा। कुछ ही दिनों पहले मैंने शंकर को टीवी के एक संगीत चैनल पर अपनी कला का प्रदर्शन करते देखा और एक बार में ही क्लारिनेट पर उनकी कलाकारी देख कर मंत्रमुग्ध हो गया। तो चलिए आज आपसे बातें करते हैं इस अद्भुत युवा अमेरिकी वादक के बारे में, उनकी संगीतबद्ध कुछ मधुर धुनों के साथ..

यूँ तो शंकर पिछले चौदह सालों से क्लारिनेट बजा रहे हैं पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की तरफ उनका रुझान हाई स्कूल के बाद हुआ। बोस्टन में उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई 'आर्केस्ट्रा में क्लारिनेट के प्रयोगों पर की। क्लारिनेट हवा की फूँक से बजने वाले वाद्यों में एक प्रमुख वाद्य है जिसका अविष्कार अठारहवीं शताब्दी में  जर्मनी में हुआ था। कॉलेज में पढ़ते वक़्त शंकर के मन में क्लारिनेट पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से ताल मेल बिठाने की इच्छा इस तरह घर कर गई थी कि स्नातक की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने सितार वादक पीटर रो से शास्त्रीय रागों और तालों की शिक्षा ली। पीटर की मदद से ना केवल शंकर को भारत में संगीत की शिक्षा ग्रहण करने के लिए वज़ीफा मिला बल्कि साथ ही मशहूर बाँसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया जैसा गुरु भी।

शंकर ने कुछ ही महिने पहले यू ट्यूब पर अपना एक नया एलबम जारी किया दि श्रुति बॉक्स (The Shruti Box)। उनके इस एलबम में ग्यारह ट्रैक्स हैं  जिनमें छः शुद्ध धुनें और बाकी पाँच विभिन्न गायकों द्वारा गाए गीत व भजन हैं। शंकर द्वारा हर ट्रैक में बजाए क्लारिनेट में कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है जो कि आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। पूरा एलबम सुनने के बाद मैं पिछले कुछ दिनों में उनके बजाए कई ट्रैक बारहा सुनता रहा हूँ। और मन में एक ऐसा सुकून तारी हुआ है जिसे लफ़्जों से बयाँ करना मुश्किल है।

बारिश का मौसम हमारी तरफ़ बदस्तूर ज़ारी हैं तो क्यूँ ना शुरुआत करें आज की इस महफ़िल का एक ऍसी धुन के साथ जो कि प्रेरित है राग मेघ मल्हार और मुंबई की बरसात से। शंकर ने इसका नाम दिया है 'नाइट मानसून' (Night Monsoon)। क्लारिनेट पर बजती इस मधुर धुन का सम्मोहन और भी बढ़ जाता है अमित मिश्रा द्वारा की गई तबले की संगत से।





शंकर आजकल मुंबई में रहते हैं। अमेरिका से भारत में बसने  की वज़ह से ज़िदगी में आए बदलाव से अभ्यस्त होने की कोशिश कर रहे हैं। पर संगीतिक रूप से वो मानते हैं कि भारत आने से जिंदगी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया है। आज संगीत रचना करते समय वेस्टर्न नोटेशन्स को भूल कर वो भारतीय तालों के बारे में सोचने लगे हैं। उनकी ये सोच उनकी धुनों में स्पष्ट दिखती हैं जब हिंदुस्तानी शास्त्रीयता पश्चिमी वाद्य यंत्र के साथ बिना किसी मुश्किल के घुलती मिलती नज़र आती है। मिसाल के तौर पर इसी धुन को लीजिए जिसे शंकर ने लेमनग्रास (Lemongrass) का नाम दिया है।



क्लारिनेट जैसे वाद्य यंत्र को भारतीय संगीत के अनुरूप ढालना शंकर के लिए सहज नहीं था । कई बार सही सुर उत्पन्न करने की तकनीकी बाधाओं ने शंकर को हताश कर दिया। पर वो क्लारिनेट के आलावा कोई दूसरा वाद्य अपनाना नहीं चाहते थे। इसकी दो वज़हें थीं। एक तो क्लारिनेट से उनका प्रेम और दूसरे उसपर किए गया उनका वर्षों का अभ्यास जो दूसरे साज को अपनाने से बेकार चला जाता।

शंकर के एलबम श्रुति बॉक्स की मेरी सबसे पसंदीदा धुन है 'सोनू'। इस धुन को जब भी सुनता हूँ तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई पुराना हिंदी गीत सुन रहा हूँ। इस धुन का नाम 'सोनू' क्यूँ है वो आप इसका वीडिओ देखकर जरूर समझ जाएँगे।




इंटरनेट पर शंकर टकर की इन धुनों की लोकप्रियता का ये आलम है कि कुछ ही महिनों में इनकी ये रचनाएँ यू ट्यूब पर श्रोताओं द्वारा लाखों बार बज चुकी हैं। शंकर, कुछ फिल्मों में ए आर रहमान और दक्षिण के अग्रणी शास्त्रीय गायकों के साथ काम कर चुके हैं। उनके एलबम की पसंदीदा धुनों की बात तो मैंने कर ली पर एलबम में उनके वाद्य की संगत में गाई गयी कुछ बंदिशों की चर्चा करेंगे अगली पोस्ट में। साथ ही ये जानना भी आपके लिए दिलचस्प रहेगा कि भारतीय मूल का ना होते हुए भी उनका नाम शंकर क्यूँ पड़ा?

Sunday, September 11, 2011

शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी : कैसे तय किया इन महान कलाकारों ने सुरीले संगीत का साझा सफ़र - भाग 2

इस कड़ी के पिछले भाग में आपने जाना कि किस तरह रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की सफल जोड़ी की शुरुआत हुई। दिन बीतते गए और इन दोनों कलाकारों के बीच की समझ बढ़ती चली गई।


1967 में शम्मी साहब की एक फिल्म आई 'An Evening in Paris'. फिल्म के संगीतकार थे एक बार फिर शम्मी के चहेते शंकर जयकिशन । पर संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जब निर्माता निर्देशक शंकर सामंत इस फिल्म के गीत की रिकार्डिंग करवा रहे थे तब शम्मी कपूर को भारत से बाहर जाना पड़ गया। इधर शम्मी गए उधर फिल्म के एक गीत 'आसमान से आया फरिश्ता...' की रिकार्डिंग भी हो गई। शम्मी साहब जब वापस आए तो ये जानकर बिल्कुल आगबबूला हो उठे और शक्ति दा और जयकिशन से उलझ पड़े। बाद में समझाने पर वो गीत सुनने को तैयार हुए और सुनकर दंग रह गए कि रफ़ी ने बिना उनसे बात किए गीत में वो सब किया जिसकी वो उम्मीद रखते थे। शम्मी जी रफ़ी साहब के पास गए और पूछा ये सब कैसे हुआ? रफ़ी साहब का जवाब था...
"ओ पापा मैंने पूछ्या ये गाना कौन गा रहा है ये गाना जो आपने बताया आसमान से आया फरिश्ता... और ओ जानेमन... कौन गाएगा ऐसा गाना। मुझसे कहा गया कि शम्मी कपूर साहब गा रहे हैं ये गाना। ओए होए शम्मी कपूर गाना गा रहा है तो आसमान से आया फरिश्ता पर वो एक हाथ इधर फैलाएगा और जानेमन के लिए तो वो हाथ भी फैलाएगा और टाँगे भी। तो मैंने वैसा ही सोचकर गा दिया।"
वैसे An Evening in Paris के बाकी गानों में भी रफ़ी साहब ने शम्मी जी की अदाएगी को ध्यान में रखकर अपनी आवाज़ में उतार चढ़ाव किए। अकेले अकेले... की शुरुआत जिन ऊँचे सुरों से होती है और फिर रफ़ी शम्मी के मस्तमौला अंदाज़ में गीत को जिस तरह नीचे लाते हैं उसका आनंद हर सुननेवाला बयाँ कर सकता है।

अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो
हमें साथ ले लो जहाँ जा रहे हो
कोई मिट रहा है तुम्हें कुछ पता है
तुम्हारा हुआ हैं तुम्हें कुछ पता है
ये क्या माज़रा है तुम्हें कुछ पता है,  अकेले....
 


फिल्म के शीर्षक गीत आओ तुमको दिखलाता हुँ पेरिस की इक रंगीं शाम.. हो या शैलेंद्र के शब्दों की मधुरता से मन को सहलाता ये नग्मा...
रात के हमसफ़र थक के घर को चले
झूमती आ रही है सुबह प्यार की

रफ़ी ने अपनी गायिकी से शम्मी कपूर की इस फिल्म को हिट करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

रफ़ी ,शम्मी कपूर और शंकर जयकिशन की तिकड़ी ने साठ के दशक में इतने गुनगुनाने लायक नग्मे दिए कि उनमें कुछ को छाँटना बेहद मुश्किल है पर An Evening in Paris के आलावा फिल्म 'प्रिंस' का ये गीत जिसमें शम्मी का पर्दे पर साथ वैजयंतीमाला ने दिया था दिल को बहुत लुभाता है। जैसे ही आप रफ़ी को
बदन पे सितारे लपेटे हुए
ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो
जरा पास आओ तो चैन आ जाए
गाते हुए सुनते हैं मन शम्मी की अदाओं के साथ थिरकने लगता है।





रफ़ी साहब को जिस गीत के लिए पुरस्कृत किया गया वो था अपनी प्रियतमा से बिछड़ने के दर्द को समाहित किए हुए शैलेंद्र का लिखा ये रूमानी नग्मा..

दिल के झरोखे में तुझको बिठा कर
यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर
रखूँगा मैं दिल के पास
मत हो मेरी जाँ उदास


द्रुत लय में बना क्या कमाल का गीत था ये, शैलेंद्र का लिखा हर अंतरा लाजवाब और शंकर जयकिशन का बेमिसाल आर्केस्ट्रा,बाकी कसर शम्मी रफ़ी की युगल जोड़ी ने पूरी कर दी थी।



शम्मी कपूर को लोग डान्सिंग स्टार की पदवी भी देते हैं। उनकी इस छवि को हमारे दिलो दिमाग में बसाने का श्रेय बहुत हद तक 1966 में आई उनकी फिल्म तीसरी मंजिल को दिया जाना चाहिए। ॠषि कपूर ने अपने एक साक्षात्कार में शम्मी कपूर की नृत्य प्रतिभा के बारे में बड़े पते की बात की थी। अगर आप शम्मी कपूर के गीतों को ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि शायद ही कैमरे का फोकस उनके पैरों पर हो। यानि शम्मी नृत्य में पैरों का इस्तेमाल करते ही नहीं थे पर अपनी इस कमी को वो अपने चेहरे, आँखों और हाथों के हाव भावो और शरीर की लचक से पूरा कर लेते थे। उस ज़माने में उनकी ये स्टाइल इस कदर लोकप्रिय हो गई थी कि उनके सहकलाकारों ने हू-ब-हू वही करना सीख लिया था। आशा पारिख के साथ अभिनीत तीसरी मंजिल का उनका वो नग्मा कौन भूल सकता है जिसमें शम्मी जैसी अदाएँ आशा जी ने भी दिखलाई थीं।



तीसरी मंजिल भी रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की संयुक्त सफलता का एक नया अध्याय जोड़ गई। तुमने मुझे देखा, दीवाना हुआ बादल जैसे रोमांटिक और ओ हसीना जुल्फोंवाली तथा आ जा आ जा मैं हूँ प्यार तेरा जैसे झूमते झुमाते गीत आम जनमानस के दिल में बस गए। पर इस सफलता के पीछे नाम था एक नए संगीतकार पंचम का। पंचम के अनुसार उनका नाम, इस फिल्म के लिए मजरूह ने सुझाया था पर शम्मी जयकिशन को ही रखना चाहते थे। बाद में जयकिशन के कहने पर उन्होंने पंचम द्वारा संगीतबद्ध सभी गीतों को सुना और फिर कहा तुम पास हो गए.. आगे से तुम्हीं मेरी फिल्मों के लिए संगीत निर्देशित करोगे। 

दुर्भाग्यवश ऐसे मौके ज्यादा नहीं आए। तीसरी मंजिल के निर्माण के दौरान ही शम्मी कपूर की पत्नी गीता बाली का स्माल पॉक्स की वजह से असामयिक निधन हो गया। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना के फिल्म जगत में पदार्पण के साथ ही इन दोनों कलाकारों का सबसे अच्छा समय बीत गया। शम्मी का वजन इतना बढ़ गया कि वे हीरो के किरदार के काबिल नहीं रहे। वहीं रफ़ी की चमक भी किशोर दा की बढ़ती लोकप्रियता की वज़ह से फीकी पड़ गई।

मोहम्मद रफ़ी ने यूँ तो हर किस्म के गाने गाए पर शम्मी कपूर की वज़ह से उन्हें अपनी गायिकी का वो पक्ष उभारने में मदद मिली जो उनके शर्मीले स्वाभाव के बिल्कुल विपरीत थी। जुलाई 1980 की उस सुबह को शम्मी वृंदावन में थे जब उन्हें किसी राहगीर ने बताया कि उनकी आवाज़ चली गई। पहले तो शम्मी कपूर को समझ नहीं आया कि ये बंदा क्या कह रहा है पर जब उन्हें पता चला कि उनकी आवाज़ से उसका इशारा रफ़ी साहब की ओर है तो वो ग़मज़दा हो गए। उन्हें इस बात का बेहद मलाल रहा कि वो रफ़ी साहब की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पाए।  मुझे नहीं लगता कि आज कल के अभिनेता संगीतकार व गायक के साथ इतना वक़्त बिताते हों जितना शम्मी कपूर ने बिताया।  

आज ये दोनों महान हस्तियाँ हमारे बीच नहीं है। पर गीत संगीत की जो अनुपम भेंट हमें शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी विरासत में दे गए हैं, को क्या हम उसे कभी भुला पाएँगे ? शायद कभी नहीं।


आज इस प्रविष्टि के साथ एक शाम मेरे नाम के छठवें साल के इस सफ़र में 500 पोस्ट्स का सफ़र पूरा हुआ । आशा है आपका साथ यूँ ही बना रहेगा।

Monday, September 05, 2011

शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी : कैसे तय किया इन महान कलाकारों ने सुरीले संगीत का साझा सफ़र - भाग 1

शम्मी कपूर को गुजरे तीन हफ्ते हो चुके हैं। शम्मी कपूर व मोहम्मद रफ़ी ने मिलकर हिंदी फिल्म संगीत का जो अद्भुत अध्याय रचा है उस पर लिखने की बहुत दिनों से इच्छा थी। पर पहले अन्ना के आंदोलन को लेकर ये इच्छा जाती रही और फिर कार्यालय की व्यस्तताओं ने कंप्यूटर के कुंजीपटल के सामने बैठने नहीं दिया। दरअसल मैं जब भी शम्मी कपूर के बारे में सोचता हूँ तो मुझे सत्तर और अस्सी के दशक का श्वेत श्याम और बाद का रंगीन दूरदर्शन याद आ जाता है। साठ के दशक में जब शम्मी कपूर या शमशेर राज कपूर रुपहले पर्दे पर अपनी फिल्मों की सफलताओं के झंडे गाड़ रहे थे तब तक तो मेरा इस दुनिया में पदार्पण ही नहीं हुआ था। शम्मी कपूर की फिल्मी दुनिया व उनके गीतों से मेरा पहला परिचय दूरदर्शन की मार्फत ही हुआ था।

वो दूरदर्शन ही था जो हम सब को गुरुवार और रविवार को बारहा शम्मी कपूर की फिल्में दिखाया करता था। सच कहूँ तो शुरु शुरु में हम तीनों भाई बहनों को शम्मी जी के नैन मटक्के और उनकी थरथराती अदाएँ बिल्कुल नागवार गुजरती थीं। पर जैसे जैसे वक़्त गुजरा हमें उनके तौर तरीके पसंद आने लगे। शायद इसकी वज़ह ये रही कि हमने उनकी फिल्मों को एक दूसरे नज़रिए से देखना शुरु किया। गीतों में उनकी तरफ़ से डाली गई उर्जा इनके समर्पण को देख सुन हो कर अपने मन को भी तरंगित होता पाया। उनकी फिल्मों के गीत हम बड़े चाव से सुनने लगे। आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं उनके द्वारा अभिनीत गीतों के साथ उन्हें ये श्रृद्धांजलि देना चाहता हूँ।
शम्मी कपूर के गीतों की लोकप्रियता में रफ़ी साहब का कितना बड़ा योगदान था ये किसी से छुपा नहीं है। रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की इस बेमिसाल जोड़ी का सफ़र कैसे शुरु हुआ और फिर परवान चढ़ा इसी बात पर चर्चा करेंगे आज की इस पोस्ट में। साथ ही होंगे रफ़ी साहब के गाए और शम्मी कपूर पर फिल्माए मेरे दस पसंदीदा नग्मे। शम्मी कपूर ने सबसे पहले रफ़ी साहब को जबलपुर में एक संगीत के कार्यक्रम में देखा। शम्मी उस वक़्त कॉलेज में थे और वहाँ अपने एक रिश्तेदार से मिलने गए थे। पचास के दशक में शम्मी कपूर की आरंभिक फिल्मों रेल का डिब्बा, लैला मजनूँ, शमा परवाना, हम सब चोर हैं में शम्मी के गाए अधिकांश गीत रफ़ी साहब की ही आवाज़ में थे। पर ये फिल्में ज्यादा सफल नहीं हुईं और उनके संगीत ने भी कोई खास धूम नहीं मचाई। शम्मी कपूर अक्सर अपने गीतों की रिकार्डिंग देखने जाया करते थे। 1957 में नासिर हुसैन की फिल्म तुमसा नहीं देखा के गीतों की रिकार्डिंग चल रही थी। गीत था सर पे टोपी लाल.. ओ तेरा क्या कहना...। शम्मी कपूर ने अपने एक साक्षात्कार में इस गीत के बारे में कहा था

"मैं रफ़ी साहब के पास रिकार्डिंग रूम  में गया और उनसे कहा कि ये गीत मैं गाने वाला हूँ। मेरे कुछ सुझाव हैं कि गीत के इन इन हिस्सों को आप यूँ गाइए तो मुझे उस पर अभिनय करने में सहूलियत होगी। रफ़ी साहब ने कहा ठीक है आपने जैसा कहा वैसी ही कोशिश कर के देखता हूँ। आप विश्वास नहीं करेंगे कि रफ़ी ने जिस तरह से मेरे सुझावों से भी बढ़कर उस गीत के लहजे को ढाला कि वो एक अलग ऊँचाई पर चला गया। यहीं से रफ़ी साहब के साथ मेरी एक जोड़ी की शुरुआत हो गई ।"
रफ़ी साहब और शम्मी की इस जुगलबंदी में मैंने पहला गीत जो लिया है वो है 1959 में आई फिल्म 'दिल दे के देखो से' । इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी उषा खन्ना ने। इस गीत की खास बात ये है कि ये उषा जी की पहली संगीत निर्देशित फिल्म थी वहीं बतौर नायिका आशा पारिख जी की भी ये पहली फिल्म थी। ये याद दिलाना जरूरी होगा कि रफ़ी की संगत के साथ सह नायिका के रूप में आशा पारिख का साथ भी शम्मी कपूर के लिए बेहद सफल रहा।

कहना होगा कि जिस सुकून जिस तबियत से रफ़ी साहब ने उषा जी की इस बेहतरीन कम्पोजीशन को अपनी आवाज़ दी है कि क्या कहने। मजरूह के बोल भी कम असरदार नहीं। मिसाल देखिए

हम और तुम और ये समां
क्या नशा नशा सा है
बोलिए ना बोलिए
सब कुछ सुना सुना सा है  





रफ़ी साहब की शांत धीर गंभीर आवाज़ शम्मी कपूर के लिए शोख और चंचल हो उठी। उन्होंने अपनी गायिकी में शम्मी के हाव भावों को इस तरह उतारा की ये भिन्न करना मुश्किल हो गया कि इस गीत को शम्मी कपूर गा रहे हैं या रफ़ी साहब। साठ के दशक में ही रिलीज हुई फिल्म 'बदतमीज' का ये गाना याद आ रहा है जिसमें रफी साहब गाते हैं...

बदतमीज कहो या कहो जानवर
मेरा दिल तेरे दिल पे फिदा हो गया
बचा लो कोई,सँभालो कोई,
ओ मेरी जाने जाँ मैं तबाह हो गया
होलल्ला होलल्ला होलल्ला होलल्ला




द्रुत गति से गाए इस गीत में रफ़ी साहब जब अपने दिल को बमुश्किल सँभालते हुए होल्ल्ला होलल्ला की लय पकड़ते हैं तो शम्मी कपूर की अदाओं की मस्ती गीत के बोलों में सहज ही समा जाती है। साधना के साथ गाए इस गीत में जो चंचलता थी वो तो आपने महसूस की होगी पर फिल्म राजकुमार में जहाँ एक बार फिर शम्मी कपूर और साधना की जोड़ी थी रफ़ी शम्मी कपूर के लिए एक अलग से संजीदा अंदाज़ में नज़र आए



शम्मी कपूर और रफ़ी की इस जोड़ी ने नैयर साहब के साथ सफलता का एक और सोपान हासिल किया है 1964 में आई फिल्म 'कश्मीर की कली' में। इस फिल्म का एक गीत था तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुझे बनाया। शम्मी कपूर चाहते थे अपनी प्रेमिका के प्रति अपने जज़्बे को उभारने के लिए इस जुमले तारीफ़ करूँ क्या उसकी ....को तरह तरह से दोहराएँ। पर ओ पी नैयर अड़ गए कि उससे गाना लंबा और उबाऊ हो जाएगा। शम्मी दुखी होकर रफ़ी साहब के पास गए। रफ़ी ने उनकी परेशानी सुनी और कहा कि मैं  नैयर को समझाता हूँ। नैयर ने उनसे भी वही कहा पर रफ़ी ने उन्हें ये कहकर मना लिया कि अगर वो ऐसा चाहता है तो एक बार कर के देखते हैं अगर तुम्हें पसंद नहीं आया तो हटा देना। जब गीत पूरा बना तो सब को अच्छा लगा और  शम्मी कपूर को नैयर और रफ़ी साहब दोनों ने सराहा ।

ये घटना दिखाती है कि शम्मी कपूर और रफ़ी साहब की जोड़ी इतनी सफ़ल क्यूँ हुई। मैं आपको ये गीत तो नहीं पर इसी फिल्म के दो और गीत सुनाना चाहूँगा जो मेरे बहुत प्रिय हैं। एक तो ये रोमांटिक गीत..'दीवाना हुआ बादल .....बहार आई...ये देख के दिल झूमा ...ली प्यार ने अँगड़ाई 'जिसे एक बार गुनगुनाकर ही मन हल्का हो जाता है





और दूसरा एस. एच. बिहारी का लिखा ये शानदार नग्मा जिसमें मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन ने एक ना छू सकने वाली बुलंदियों तक पहुँचाया है। क्या संगीत, क्या शब्द और क्या गायिकी ...बेमिसाल शब्द भी छोटा जान पड़ता है इस गीत के लिए... सच ऐसी मेलोडी बार बार जन्म नहीं लेती

है दुनिया उसी की ज़माना उसी का,
मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का...
लुटा जो मुसाफ़िर दिल के सफ़र में
है जन्नत यह दुनिया उसकी नज़र में
उसी ने है लूटा मज़ा ज़िंदगी का
मोहब्बत में ...
 
है सज़दे के काबिल हर वो दीवाना
के जो बन गया हो तसवीर-ए-जानाँ   
करो एह्तराम उस की दीवानगी का
मोहब्बत में ...

बर्बाद होना जिसकी अदा हो
दर्द-ए-मोहब्बत जिसकी दवा हो
सताएगा क्या ग़म उसे ज़िंदगी का
मोहब्बत में ...




शम्मी कपूर एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने अपनी फिल्मों के संगीत को जबरदस्त अहमियत दी। वे खुशकिस्मत रहे कि उनकी इस मुहिम में रफ़ी साहब जैसे गायक और शंकर जयकिशन व ओ पी  नैयर जैसे संगीतकारों का साथ मिला। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में उपस्थित हूँगा रफ़ी और शम्मी साहब के इस जोड़ी के पाँच अन्य चुनिंदा गीतों और उनसे जुड़ी बातों को लेकर...
 

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स्पष्टीकरण

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