Tuesday, January 11, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 22 : गीत में ढ़लते लफ़्ज़ों में.ताल पे चलती नब्जों में...

वार्षिक संगीतमाला की बाइसवीं पॉयदान पर आप सबका स्वागत है। गीतमाला की इस सीढ़ी पर आज गीत वो जिसे गुनगुनाते ही मन एक नई उमंग से भर उठता है। ये गीत है अनुराग कश्यप द्वारा सहनिर्मित फिल्म 'उड़ान' का । उड़ान बतौर एक फिल्म तो सराही ही गई थी। साथ ही साथ इसका संगीत भी युवाओं और समीक्षकों द्वारा हाथों हाथ लिया गया था। अनुराग कश्यप एक ऐसे निर्माता निर्देशक हैं जो अपने गीतकार व संगीतकारों को कुछ नया रचने की पूरी स्वतंत्रता देते हैं। आपको याद होगा कि पिछले साल अनुराग निर्देशित फिल्म गुलाल के संगीत में पीयूष मिश्रा ने कुछ अभिनव प्रयोग किए थे। उड़ान आज के युवाओं द्वारा अपनी राह खुद तलाशने की कहानी है। शायद इसीलिए अनुराग ने उभरते हुए युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी को अपनी इस फिल्म के लिए चुना। जब संगीतकार अमित हों तो नब्बे फीसदी मामलों में आपको गीतकार का नाम पर जोर डालने की जरूरत नहीं होती। उड़ान के गीतकार हैं अमित के अभिन्न मित्र और सहयोगी अमिताभ भट्टाचार्य

अमित और अमिताभ की जोड़ी सबसे पहले एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में वर्ष 2008 में आमिर के संगीत की वज़ह से आई थी। Dev D में इमोशनल अत्याचार ने इस जोड़ी को आम जनता में पहचान दिलाई और यहाँ तक कि अमित त्रिवेदी को इस फिल्म के लिए राष्टीय पुरस्कार भी मिला। दो साल पहले जिस अनजान सितारे के गीत को इस चिट्ठे पर सरताज गीत के तमगे से नवाज़ा गया था वो आज मुख्य धाराओं के निर्माताओं द्वारा अनदेखा नहीं किया जा पा रहा है (फिल्म आयशा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है) इससे बड़ी खुशी की बात मेरे और हिंदी फिल्म संगीत के लिए नहीं की जा सकती।

तो बात हो रही थी अमित और अमिताभ की जोड़ी की जो ना इस जोशीले गाने के गीत संगीत के रचयिता हैं पर इन्होंने इसे मिलकर गाया भी है। उड़ान का मुख्य चरित्र ज़िंदगी में एक कवि बनने की तमन्ना रखता है। लिहाज़ा उसके द्वारा गाए गीतों में एक तरह की काव्यात्मकता होनी जरूरी थी। अमिताभ ने उड़ान फिल्म के गीत लिखते वक़्त इस जिम्मेवारी को बखूबी निभाया है। उड़ान के काव्यात्मक गीतों और उसे लिखने वाले अमिताभ की चर्चा तो इस गीतमाला में आगे भी होती रहेगी।

पहले ये देखिए कि कितनी खूबसूरती से एक युवा मन के भीतर की उमंग,कुछ नया करने के उत्साह और बाहर निकलने को छटपटाती ऊर्जा शक्ति को शब्दों में बाँधा है अमिताभ ने.. कुछ पंक्तियाँ तो वाकई लाजवाब हैं जैसे लमहा ये माँगा नहीं, इसे हमने छीना है.. या फिर जेबों में हम, रातें लिए, घूमा करे


पिछले गीत की तरह यहाँ भी मुखड़े में संगीत संयोजन पियानो से शुरु होता है और गिटार की धुन से आगे बढ़ता हुआ रॉक बीट्स लिए गीत में तब्दील हो जाता है। तो आइए इस गीत को सुनें इसके बोलों के साथ..


गीत में ढ़लते लफ़्ज़ों में
ताल पे चलती नब्जों में
नया कुछ नया तो ज़रूर है
शाम से ले के सहरों में
धूप जड़ी दोपहरों में
नया कुछ नया...

क्या बात है, जो बात है, ताज़ा लगे
ज़िन्दगी की, नयी-नयी फ़ज़ा लगे
हाँ ये उमंगो से फूला हुआ सीना है
लमहा ये माँगा नहीं, इसे हमने छीना है
यूँ ही जीना है

धूल जमी थी आँखों में
ख़्वाब खिले अब लाखों में
नया कुछ नया...
दर्द की बातें कल की हैं
आज में खुशियाँ छलकी हैं
नया कुछ नया...
जेबों में हम, रातें लिए, घूमा करे
फुर्सत के ये, मौके सभी, झूमा करे
हाँ ये उमंगो...

हथेली में है, नयी गर्मियां
जुनूँ सख्त है, गयी नर्मियाँ
है दिलचस्प ये हादसे
मिटेंगे नहीं याद से
गीत में ढ़लते...

वैसे क्या आप अमित और अमिताभ की इस युगल जोड़ी को ये गीत अपने सामने गाते नहीं देखना चाहेंगे। चलिए आपकी ये ख़्वाहिश भी पूरी किए देते हैं...


वार्षिक संगीतमाला 2010 से जुड़ी प्रविष्टियो को अब आप फेसबुक पर बनाए गए एक शाम मेरे नाम के पेज पर यहाँ भी देख सकते हैं।
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8 comments:

Stone on January 12, 2011 said...

Udaan is directed by Vikram Motwani not by Anurag Kashyap, though it is produced by Anurag Kashyap and others.

Sorry for nitpicking :-)

Manish Kumar on January 12, 2011 said...

Thx Stone for pointing it out. Anurag always takes keen interest in the development of music with the film he is associated with and at the same time his music directors enjoy ample creative freedom.

Priyank Jain on January 12, 2011 said...

Not particularly, I could remember, but that dialogue was 'Kantilal ke angoor', literally the movie was rocking and yet too in our hostel it gains the title of most downloaded. Songs as have been described with intricacies, are all good.

Regards
Priyank Jain

Manish Kumar on January 12, 2011 said...

प्रियंक मैंने ये फिल्म नहीं देखी पर इस फिल्म के सारे गीत कुछ नयापन लिए हुए हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट में जिन कविताओं का इस्तेमाल हुआ है वे भी सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं।

mrityunjay kumar rai on January 13, 2011 said...

manish jee
Namaskaar

aaj fir ek badhiyaa gaanaa sunvaayaa aapne. hamne ye gaanaa pahle nahee sunaa thaa , pahlee baar sunaa majaa aa gayaa
waiting for the next
thax

rachana on January 13, 2011 said...

नमस्कार!

आमिर के उस उम्दा गीत से भी मेरा परिचय आपके ब्लॊग पर ही हुआ था और इस गीत से भी! अमिताभ अच्छे गीत लिख रहे हैं :)

रंजना on January 19, 2011 said...

पता है,ख़ास तौर पर यह फिल्म देखने मैं कलकत्ते गयी थी,क्योंकि शहर में फिल्म कब लगी और कब उतरी पता ही नहीं चला...और पिछले बीस वर्षों में कभी कोई फिल्म देखते समय इतनी बच्ची नहीं बनी थी जितनी इसे देखते समय बनी..हर दृश्य में दिखाए जा रहे स्थानो को देख चिहुंक पड़ती,उछल पड़ती क्योंकि सारे तो अपने घर के आस पास के ही थे..

बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी कि फिल्म उस स्थान पर फिल्माई गयी थी,जो हमारा शहर है,बल्कि इसकी कथा ,गीत सब इतने लाजवाब हैं कि सहज इसे भुलाया नहीं जा सकता..

बहुत बहुत आभार आपका इस नायाब पोस्ट के लिए...

अपूर्व on January 31, 2011 said...

गीतमाला से संबंधित आपकी मेहनत यकीनन काबिलेतारीफ़ है..कुछ वक्त के बाद आ पाया था आज इधर.मगर येह सारी पोस्ट्स फ़ुरसत से और बार-बार पढ़े जाना..और सुने जाना दरकार करती हैं..गाना बेशक हमारा भी पसंदीदा है..मगर लिरिक्स ध्यान से आज यहीं पढ़े..अमित मे मुझे लगता है कि अगले जमाने के रहमान बनने की संभावनाएं हैं..पूरी फ़िल्म के संगीत और बोलों की खासियत है कि पटकथा के संग ऐसे घुल जाते हैं..जैसे पानी मे बर्फ़..

 

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