Thursday, March 17, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - सरताज गीत पर बह रही है गुलज़ार विशाल व राहत की त्रिवेणी...

तो भाइयों एवम बहनों वार्षिक संगीतमाला के ढाई महिने के सफ़र के बाद वक़्त आ गया है सरताजी बिगुल बजाने का। यहाँ संगीतकार व गीतकार की वही जोड़ी है जिसने पिछले साल भी मिलकर सरताज गीत का खिताब जीता था। वैसे तो पहली पाँच पॉयदानों के गीत अपने आप में कमाल हैं पर पहली पॉयदन का ये गीत हर लिहाज़ में अलहदा है। बाकी पॉयदानों के गीतों को ऊपर नीचे के क्रम में सजाने में मुझे काफी मशक्क़त करनी पड़ी थी। पर पहली सीढ़ी पर विराजमान इश्क़िया फिल्म का ये गीत कभी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। इस गीत के बोलों का असर देखिए कि साल पूरा हुआ नहीं कि गीत के मुखड़े को लेकर एक नई फिल्म रिलीज़ भी हो गई।


जी हाँ इस साल एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला का सरताज बनने का गौरव हासिल किया है गुलज़ार के लिखे, विशाल भारद्वाज द्वारा संगीतबद्ध और राहत फतेह अली खाँ द्वारा गाए गीत दिल तो बच्चा है जी ने..। इस गीत के बारे में नसीर भाई (जिन पर ये गाना फिल्माया गया है)की टिप्पणी दिलचस्प है. नसीर कहते हैं..
"गाने का काम है फिल्म में मूड को क्रिएट करना। जो जज़्बात उस वक़्त हावी हैं फिल्म में, उसको रेखांकित (underline) करना। मुझे नहीं मालूम था कि ये गाना फिल्म में बैकग्राउंड में होगा कि मैं इसे गाऊँगा। एक तरह से ये अच्छा ही हुआ कि मैंने गाया नहीं क्यूँकि इससे उससे उस आदमी (किरदार) के दिल के ख़्यालात और ज़ाहिर हुए।"

गुलज़ार के बारे में नसीर कहते हैं 
"आदमी उतना ही जवान या बूढ़ा होता है जितना आप उसे होने देते हैं और गुलज़ार भाई दिल से नौजवान हैं। बहुत कुछ ऐसा है गुलज़ार में जो आदमी उनसे अपेक्षा नहीं कर सकता और यही एक सच्चे कलाकार की निशानी है।"

सच, कौन नहीं जानता कि प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती। और ये भी कि प्रेम में पड़ जाने के बाद हमारा मस्तिष्क मन का दास हो जाता है। पर उन सर्वविदित अहसासों को गुलज़ार इतनी नफ़ासत से गीत की पंक्तियों में उतारते हैं कि सुनकर मन ठगा सा रह जाता है।

गुलज़ार की कलाकारी इसी बात में निहित हैं कि वो हमारे आस पास घटित होने वाली छोटी से छोटी बात को बड़ी सफाई से पकड़ते हैं । अब इसी गीत में प्रेम के मनोविज्ञान को जिस तरह उन्होंने समझा है उसकी उम्मीद सिर्फ गुलज़ार से ही की जा सकती है। अब गीत की इस पंक्ति को लें

हाए जोर करें, कितना शोर करें
बेवजा बातों पे ऐं वे गौर करें

बताइए इस 'ऐ वे' की अनुभूति तो हम सब ने की है। किसी की बेवजह की बकवास को भी मंत्रमुग्ध होते हुए सुना है। बोल क्या रहा है वो सुन नहीं रहे पर उसकी आवाज़ और अदाएँ ही दिल को लुभा रही हैं और मन खुश.. बहुत खुश.. हुआ जा रहा है। पर क्या कभी सोचा था कि कोई गीतकार प्रेम में होने वाले इन सहज से अहसासों को गीत में ढालेगा?

गुलज़ार की किसी जज़्बे को देखने और महसूस करने की अद्भुत क्षमता तो है ही पर साथ ही उनके बिंब भी बड़े प्रभावशाली होते हैं।मुखड़े में ढलती उम्र का अहसास दिलाने के लिए उनका कहना दाँत से रेशमी डोर कटती.. नहीं...मन को लाजवाब कर देता है।

संगीतकार विशाल भारद्वाज ने इस गीत का संगीत एक रेट्रो की फील देता है। ऐसा लगता है कि आप साठ के दशक का गाना सुन रहे हैं। वाद्य यंत्रों के नाम पर कहीं हल्का सा गिटार तो कहीं ताली को संगत देता हुआ हारमोनियम सुनाई दे जाता है। राहत फतेह अली खाँ को अक्सर संगीतकार वैसे गीत देते हैं जिसमें सूफ़ियत के साथ ऊँचे सुरों के साथ खेलने की राहत की महारत इस्तेमाल हो। पर वहीं विशाल ने इससे ठीक उलट सी परिस्थिति वाले (झिझकते शर्माते फुसफुसाते से गीत में) में राहत का इस्तेमाल किया और क्या खूब किया। तो आइए पहले सुनें और गुनें ये गीत



ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं...
दाँत से रेशमी डोर कटती.. नहीं...
उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं


वर्ना यह धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है तन्हा सोने में जी

दिल तो बच्चा है जी...थोड़ा कच्चा है जी

किसको पता था पहलु में रखा
दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा हाजी ही होगा

हाय जोर करें, कितना शोर करें
बेवजा बातों पे ऐं वे गौर करें

दिल सा कोई कमीना नहीं..

कोई तो रोके , कोई तो टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोखे
डर लगता है इश्क़ करने में जी


दिल तो बच्चा है जी
ऐसी उदासी बैठी है दिल पे
हँसने से घबरा रहे हैं
सारी जवानी कतरा के काटी
बीड़ी में टकरा गए हैं

दिल धड़कता है तो ऐसे लगता है वोह
आ रहा है यहीं देखता ही ना हो
प्रेम कि मारें कटार रे

तौबा ये लम्हे कटते नहीं क्यूँ
आँखें से मेरी हटते नहीं क्यूँ
डर लगता है तुझसे कहने में जी

दिल तो बच्चा है जी,थोड़ा कच्चा है जी

पर गीत को पूरी तरह महसूस करना है इस गीत का वीडिओ भी देखिए। गीत का फिल्मांकन बड़ी खूबसूरती से किया गया है। नसीर मुँह से कुछ नहीं बोलते पर उनकी आँखें और चेहरे के भाव ही सब कुछ कह जाते हैं..




इसी के साथ वार्षिक संगीतमाला का ये सालाना आयोजन यहीं समाप्त होता है। जो साथी इस सफ़र में साथ बने रहे उनका बहुत आभार।  

आप सब की होली रंगारंग बीते इन्हीं शुभकामनाओं के साथ..
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9 comments:

रंजना on March 17, 2011 said...

हूँ.....तो यह है आपका नंबर वन गीत....

लेकिन सच है...लाजवाब है यह गीत...जितनी खूबियाँ आपने गिनाई, हर शब्द में अपने शब्द मिलाती हूँ...
बेजोड़ गीत है यह ...इसमें कोई दो मत नहीं...

कंचन सिंह चौहान on March 17, 2011 said...

बाप रे ऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ ये गाना पहली पायदान पर ???? विश्वासही नही हो रहा..मतलब खुशी के मारे यक़ीन नही हो रहा। अभी पिछला बहुत सारा सुनना है।

मगर इसको तो इतना इतना सुना है, गुना है....!

मजा आ गया...!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

यादें on March 18, 2011 said...

हर लिहाज़ से खुबसूरत ..........लफ्ज नही .
बहुत बधाई !

खुश रहें !
अशोक सलूजा !

मीनाक्षी on March 18, 2011 said...

होली के मौके पर यह गीत.... दिन रंगीन हो गया... रंग मुबारक...!

Priyank Jain on March 20, 2011 said...

hum to aapka saath na de paye par is pravishti ke liye shubhkamnain evam holi ki ranbhari badhai

डॉ .अनुराग on March 22, 2011 said...

"ऐ -वे" गुलज़ार के फेवरेट टूल में से एक है ....अगरचे ...टप्पा ...जैसे लफ्जों को उन्होंने एक मायने दिए है ..अंग्रेजी के कुछ शब्दों को भी वे जिस तरह से फिलर की तरह इस्तेमाल करते है .नज़्म को किसी भी किस्म के रिती रिवाजों से .आज़ाद करते है.....विशाल चूंकि खुद नज़्म को समझते है इसलिए गुलज़ार को शायद औरो से ज्यादा बेहतरी से समझते है ..ओर राहत इसे एक मुकम्मल शक्ल देते है

Archana Singh on March 23, 2011 said...

Ek dum sahi gana chuna hai. Aapki varshik sangeetmala ke purn hone per aapko dher sari badhaiyan. Vaah vaah.

Sneha on March 26, 2011 said...

aapney sahi keha ganey key bol, uska sangit or awaz tino ka sangam hee ganey ki sundarta ko badhata hain.:)

Abhishek Ojha on March 28, 2011 said...

definitely the best song of the year !

 

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