Friday, November 18, 2011

सैफुद्दीन सैफ़, रूना लैला : गरचे सौ बार ग़म ए हिज्र से जां गुज़री है...

रूना लैला की आवाज़ और ग़ज़ल गायिकी का मैं शुरु से मुरीद रहा हूँ। बहुत दिनों से रूना लैला की आवाज़ ज़ेहन की वादियों में कौंध रही थी। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा सुनने का जी चाह रहा था जो बहुत दिनों से ना सुना हो। कुछ दिन पहले एक मित्र की बदौलत जब उनकी ये पुरानी ग़ज़ल सुनने को मिली तब जाकर दिल की ये इच्छा पूर्ण हुई। ग़जल का मतला था

गरचे सौ बार ग़म- ए -हिज्र से जां गुज़री है
फिर भी जो दिल पे गुज़रनी थी, कहाँ गुज़री है


और दूसरा शेर तो मन को लाजवाब कर गया था

आप ठहरे हैं तो ठहरा है निज़ाम ए आलम
आप गुज़रे हैं तो इक मौज- ए -रवां गुज़री है


आगे की ग़ज़ल कुछ यूँ थी
होश में आए तो बतलाए तेरा दीवाना
दिन गुज़ारा है कहाँ रात कहाँ गुज़री है

हश्र के बाद भी दीवाने तेरे पूछते हैं
वह क़यामत जो गुज़रनी थी, कहाँ गुज़री है





पर रूना जी की गाई ग़ज़ल में मकता ना होने से शायर का नाम नहीं मिल रहा था। बहरहाल खोजबीन के बाद पता चला कि ये सैफुद्दीन सैफ़ साहब की रचना है। सोचा आज इस ग़ज़ल के बहाने सैफ़ साहब और उनकी शायरी से मुलाकात कराता चलूँ।

सन 1922 में अमृतसर में जन्मे सैफ़ पंजाब के लोकप्रिय शायर थे और विभाजन के बाद सरहद पार चले गए।  पचास और साठ के दशक में वे पाकिस्तानी फिल्म उद्योग से बतौर गीतकार और पटकथा लेखक जुड़े रहे। इस दौर में उनके लिखे गीतों को इतने दशकों बाद भी लोग बड़े चाव से गाते हैं। सैफ़ साहब की शायरी मूलतः इश्क़िया शायरी ही रही। मिसाल के तौर पर उनकी एक चर्चित ग़ज़ल राह आसान हो गई होगी के इन अशआरों को देखें..

फिर पलट निगाह नहीं आई
तुझ पे कुरबान हो गई होगी


तेरी जुल्फ़ों को छेड़ती है सबा
खुद परेशान हो गई होगी


सैफ़ साहब की इस ग़ज़ल के चंद शेरों को पढ़कर आप उनके रूमानियत भरे हृदय को समझ सकते हैं
अभी ना जाओ कि तारों का दिल धड़कता है
तमाम रात पड़ी है ज़रा ठहर जाओ

फिर इसके बाद ना हम तुमको रोकेंगे
लबों पे साँस अड़ी है जरा ठहर जाओ


सैफ़ की शायरी जहाँ मोहब्बत से ओतप्रोत थी वहीं उसमें विरह वेदना के स्वर भी थे। जब वे अपनी दर्द में डूबी इन ग़ज़लों को पूरी तरन्नुम के साथ पढ़ते थे तो लोग झूम उठते थे। कॉलेज के दिनों से ही युवाओं में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। शायर शौकत रिज़वी का कहना है कि सैफ़ की ग़ज़लों का ये दर्द उनकी नाकाम मोहब्बत के चलते पैदा हुआ। अपने दिल की तड़प को शब्दों में वे अक्सर बाँधते रहे.. वे अपने पहले प्रेम को कभी भुला ना सके और इसीलिए उन्होंने लिखा

तुम्हारे बाद ख़ुदा जाने क्या हुआ दिल को
किसी से रब्त बढ़ाने का हौसला ना हुआ

फिल्म जगत से जुड़े रहने के साथ साथ वो अपनी कविताएँ लिखते रहे। पचास के दशक के आरंभ में उनकी ग़ज़लें और नज़्में उनके संग्रह ख़ाम - ए- काकुल में प्रकाशित हुईं। वैसे ये बता दूँ कि  ख़ाम ए काकुल का अर्थ होता है प्रियतमा की जुल्फों के खूबसूरत घेरे या लटें। किताब अपने समय में खूब बिकी। इसी संग्रह में उनकी एक नज़्म है जिसे महदी हसन साहब ने अपनी आवाज़ दी है। नज़्म की चंद पंक्तियाँ शायर के दिल के हालात को कुछ यूँ बयां कर देती हैं..

रात की बेसकूँ खामोशी में
रो रहा हूँ कि सो नहीं सकता
राहतों के महल बनाता है
दिल जो आबाद हो नहीं सकता..


सैफ़ साहब की महबूबा उनसे अलग हुई पर उसकी यादें उन्हें उसके नए शहर के बारे में सोचने और लिखने को मज़बूर करती रहीं। काव्य समीक्षक डा. अफ़जल मिर्ज़ा का मानना है कि जिस तरह सैफुद्दीन सैफ़ ने अपनी प्रेमिका के शहर को आधार बनाकर अपने हृदय की पीड़ा इज़हार किया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। सैफ़ अपनी एक नज़्म मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा में लिखते हैं

इस से पहले कि तेरी चश्म - ए - करम मज़ारत की निगाह बन जाए
प्यार ढल जाए मेरे अश्क़ों में, आरज़ू इक आह बन जाए
मुझ पर आ जाए इश्क़ का इलज़ाम  और तू बेगुनाह बन जाए
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा......

इस से पहले कि सादगी तेरी लब - ए - खामोश को गिला कह दे
तेरी मजबूरियाँ ना देख सके और दिल तुझको बेवफ़ा कह दे
जाने मैं बेरुखी में क्या पूछूँ, जाने तू बेरुखी से क्या कह दे
मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा..


वैसे इस नज़्म को पढ़कर साफ लगता है आनंद बख्शी का फिल्म नज़राना का लिखा गीत इसी नज़्म से प्रेरित था। वैसे सैफ़ साहब की एक और नज़्म है प्यारी सी जिसमें    शहर का जिक्र है। पर वो नज़्म सुनाऊँगा आपको अगली पोस्ट में !
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11 comments:

नीरज गोस्वामी on November 18, 2011 said...

सैफ साहब को यदा कदा कहीं कहीं पढ़ा है लेकिन आज आपके माध्यम से उनकी शायरी के बारे में विस्तार से जाना भी...शुक्रिया आपका.

नीरज

suparna said...

aha :)

i discovered the wonder'full'ness of runa laila's voice by chance many years ago when i randomly picked up this audio cassette (thus proved - many years ago:). the ghazals, including other beautiful ones like baat karni mujhe mushkil live within me since then..

http://www.musichouseltd.co.uk/shop/product_info.php?products_id=3919

in fact most people are puzzled at how i can be more partial to runa's version of gulon mein rang bhare more than mehdi hasan's - but my reason is that those beautiful words came to me in her voice before anyone else's ...

suparna said...

oh, thank you for the info on saifuddin saif!

प्रवीण पाण्डेय on November 18, 2011 said...

वाह, कयामत गुजर जाती है,
वो पूछें, कहाँ से आती है।

Deepak Shukla said...

Hi Manish,
Is it possible to get mp3 file of Runa's ghazal you have posted on your blog. I live in USA and, suffice to say, it is difficult to get these gems. I follow your blog and like your appreciation of music.

Regards,
Deepak

Manish Kumar on November 19, 2011 said...

Thx for liking the blog Deepak ! The ghazal is from the album Sur ki Koi seema Nahin by Runa Laila and is available on the net.

http://www.musichouseltd.co.uk/shop/product_info.php?products_id=3919

The whole album is worth listening if u r a fan of her melodious voice.

Manish Kumar on November 21, 2011 said...

नीरज जी सैफ़ साहब ने पाकिस्तान जाने के बाद अपना ज्यादा समय बतौर गीतकार दिया। इनकी किताब अभी भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है इसलिए भारतीय पाठक इनकी बहुत सी ग़ज़लों और नज़्मों से वाकिफ़ नहीं है।

प्रवीण :)

Manish Kumar on November 21, 2011 said...

सुपर्णा..बचपन में जब घरौंदा देखी थी तभी पहली बार ही उनकी आवाज़ में गाया उनका नग्मा बहुत पसंद आया था। फिर घर में ओ पी नैयर के साथ किया उनका गैर फिल्मी एलबम खूब बजा करता था। रेडिओ पर कभी कभार उनकी कुछ ग़ज़लें सुनने को मिल जाया करती थीं। अब नेट पर वो सब और साथ में कुछ और नया भी सुनने को मिल जा रहा है। उनकी आवाज़ कुछ ऐसी हैं कि उनकी ग़ज़लें दिल पर सीधा असर करती हैं। फ़ैज़ की ग़ज़ल आए कुछ अब्र कुछ..उनकी आवाज़ में सुनना एक दिव्य अनुभव की तरह था।

महदी हसन अपनी आवाज़ के साथ अपनी गाई ग़ज़लों में शास्त्रीयता का रंग भी भरते हैं। रंजिश ही सही सबसे पहले मैंने उनकी आवाज़ में सुनी और उसके बाद वो किसी की आवाज़ में अच्छी नहीं लगी। वहीं मुझें गुलों में रंग भरे रूना जी का वर्सन ज्यादा पसंद है। ख़ैर दोनों महान कलाकार हैं अपनी अपनी जगह पर।

रंजना on November 22, 2011 said...

बेहतरीन !!!!

आनंद आ गया...अपार ज्ञानवर्धन हुआ...

सर्वथा अनभिज्ञ थी....

आपका बहुत बहुत बहुत ही धन्यवाद...

Krishna Kumar Mishra on October 08, 2012 said...

बहुत ही सुन्दर प्रयास..आज तमाम बातों से मुखातिब हो सका आप के ब्लाग से...

anjani on March 19, 2013 said...

So nice of you ....

 

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