Monday, February 28, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 7: सुरीली अँखियों वाले, सुना है तेरी अँखियों से बहती हैं नींदें...और नींदों में सपने

अँखियाँ भी क्या सुरीली हो सकती हैं? सच कहूँ तो कभी आँखों के सुरीलेपन को जाँचने की कोशिश की ही कहाँ मैंने? शायद उसके लिए गुलज़ार जैसी शायराना तबियत की जरूरत थी। हाँ ये जरूर है कि जब से गुलज़ार ने आँखों के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल अपने लिखे इस गीत में कर दिया है तबसे मैं भी एक जोड़ी सुरीले नयनों की तलाश में हूँ। देखूँ ढूँढ पाता हूँ या नहीं :)!

शायरों की यही तो खासियत है कि ऐसे ऐसे रूपकों को इस्तेमाल करते हैं जिन्हें सुन कर सुनने वाला पहले तो ये सोचता है कि ये ख़्याल उसके मन में पहले क्यूँ नहीं आया और फिर लिपटता चला जाता है शायर द्वारा बिछाए गए कल्पनाओं के जाल में। वार्षिक संगीतमाला की सातवीं पॉयदान पर फिल्म वीर का ये गीत हृदय में कुछ ऐसा ही अहसास दे कर चला जाता है।


साज़िद वाज़िद वैसे तो बतौर संगीतकार पिछले बारह सालों से फिल्म उद्योग से जुड़े हैं। पर उनके द्वारा रचे गए पहले के संगीत में ऍसी कोई बात दिखती नहीं थी कि उन्हें संगीतकारों की भीड़ से अलग दृष्टि से देखा जाए। इस लिए जब निर्देशक अनिल शर्मा को अंग्रेजी राज के ज़माने की इस ऍतिहासिक प्रेम कथा के संगीत रचने के लिए साज़िद वाज़िद का नाम सलमान खाँ द्वारा सुझाया गया तो वो मन से इसके लिए तैयार नहीं थे। पर साज़िद वाज़िद की जोड़ी ने अपने बारे में उनकी सोच को बदलने पर मज़बूर कर दिया। गीतकार गुलज़ार जिन्होंने पहली बार साज़िद वाज़िद के साथ इस फिल्म में काम किया ने पिछले साल स्क्रीन पत्रिका में दिये गए एक साक्षात्कार में कहा था कि

साज़िद वाज़िद बेहद प्रतिभाशाली हैं। इन्हें इनके हुनर के लिए जो सम्मान मिलना चाहिए वो अब तक उन्हें नहीं मिला। शायद इस फिल्म के बाद लोगों में वो अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हों। पहली मुलाकात में ही इन्होंने मुझे प्रभावित कर दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के ब्रिटिश राज में उपजी इस प्रेम कहानी को पाश्चात्य और लोक धुनों के जिस सम्मिश्रण की आवश्यकता थी वो इन दोनों ने भली भांति पूरी की है।

खुद भाइयों की ये संगीतकार जोड़ी मानती हैं कि ये फिल्म उन्हें सही समय पर मिली। अगर कैरियर की शुरुआत में ऐसी फिल्म मिलती तो उसके साथ वे पूरा न्याय नहीं कर पाते। इस फिल्म को करते हुए उन्होंने अपने एक दशक से ज्यादा के अनुभव का इस्तेमाल किया। संगीत के हर टुकड़ों को रचने के लिए पूरा वक्त लिया और सही असर पैदा करने के लिए गीत की 'लाइव' रिकार्डिंग भी की।

गिटार और पियानो की पार्श्व धुन से शुरु होते इस गीत को जब गुलजार के बहते शब्दों और राहत की सधी हुई गायिकी का साथ मिलता है तो मूड रोमांटिक हो ही जाता है। गीत के पीछे के संगीत संयोजन में कम से कम वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल हुआ है पर उसकी मधुरता और बहाव गीत की भावनाओं के अनुरूप है। फिल्म के पश्चिमी परिवेश की वजह से गीत का एक अंतरा अंग्रेजी में लिखा गया है जिसे सूजन डिमेलो ने अपनी आवाज़ से सँवारा है।

तो आइए डूबते हैं गुलज़ार के शब्दों के साथ राहत जी के द्वारा गाए हुए इस बेमिसाल गीत में..



सुरीली अँखियों वाले, सुना है तेरी अँखियों से
बहती हैं नींदें...और नींदों में सपने
कभी तो किनारों पे, उतर मेरे सपनों से
आजा ज़मीन पे और मिल जा कहीं पे
मिल जा कहीं, मिल जा कहीं समय से परे
समय से परे मिल जा कहीं
तू भी अँखियों से कभी मेरी अँखियों की सुन
सुरीली अँखियों वाले, सुना है तेरी अँखियों से...

जाने तू कहाँ है
उड़ती हवा पे तेरे पैरों के निशां देखे
ढूँढा है ज़मीं पे छाना है फ़लक पे
सारे आसमाँ देखे
मिल जा कहीं समय से परे
समय से परे मिल जा कहीं
तू भी अँखियों से कभी मेरी अँखियों की सुन

सुरीली अँखियों वाले सुना दे ज़रा अँखियों से

Everytime I look into your eyes, I see my paradise
The stars are shining right up in the sky, painting words or designs
Can this be real, are you the one for me
You have captured my mind, my heart, my soul on earth
You are the one waiting for
Everytime I look into your eyes, I see my paradise
Stars are shining right up in the sky, painting words or designs

ओट में छुप के देख रहे थे,
चाँद के पीछे, पीछे थे
सारा ज़हाँ देखा, देखा ना आँखों में
पलकों के नीचे थे
आ चल कहीं समय से परे
समय से परे चल दे कहीं
तू भी अँखियों से कभी मेरी अँखियों की सुन



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Sunday, February 27, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 8 : जब 'राहत' करवाते हैं सीधे ऊपरवाले से बात-.तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…

चलिए बढ़ते हें वार्षिक संगीतमाला की आठवीं पॉयदान पर। हम सब के जीवन में एक वक़्त ऐसा भी आता है जब हर बाजी आपके खिलाफ़ पलटती नज़र आती है। संगी साथी सब आपका साथ एक एक कर के छोड़ने लगते हैं। हताशा और अकेलेपन की इस घड़ी में आगे सब कुछ धुँधला ही दिखता है। आठवीं पॉयदान का गीत एक ऐसा गीत है जो ज़िंदगी के ऐसे दौर में विश्वास और आशा का संचार ये कहते हुए करता है मुश्किल के इन पलों में और कोई नहीं तो वो ऊपरवाला तुम्हारे साथ है।

फिल्म 'अनजाना अनजानी' के इस गीत को गाया है राहत फतेह अली खाँ ने और संगीत रचना है विशाल शेखर की। विशाल शेखर को इस गीत को बनाने के पहले निर्देशक ने सिर्फ इतना कहा था कि आपको ऐसा गीत बनाना है जिसमें भगवान ख़ुद इंसान को अपने होने का अहसास दिला रहे हैं। विशाल शेखर की जोड़ी के शेखर रवजियानी ने झटपट मुखड़ा रच डाला तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…। पर इस मुखड़े के बाकी अंतरे विशाल ददलानी ने लिखे हैं।

विशाल शेखर की ज्यादातर संगीतबद्ध धुनें हिंदुस्तानी और वेस्टर्न रॉक के सम्मिश्रण से बनी होती हैं। दरअसल जहाँ शेखर ने विधिवत शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली है वहीं विशाल मुंबई के रॉक बैंड पेंटाग्राम के गायक रहे हैं। इस अलग अलग परिवेश से आने का प्रभाव उनके संगीत पर स्पष्ट दिखता है।


पर जहाँ पिछले गीत में इरशाद क़ामिल के बोलों को मैंने गीत की जान माना था यहाँ वो श्रेय पूरी तरह से राहत फतेह अली खाँ को जाता है। उन्होंने पूरे गीत को इतना डूब कर गाया है कि श्रोता गीत की भावनाओं से अपने आपको एकाकार पाता है। मुखड़े की उनकी अदाएगी इतनी जबरदस्त है कि उनकी आवाज़ की प्रबलता आपको भावविभोर कर देती है और मन अपने आप से गुनगुनाने लगता है तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…। विशाल शेखर के गिटार के इंटरल्यूड्स मन को सुकून देते हैं। राहत से हर संगीतकार कोई सरगम कोई आलाप अपने गीतों में गवाता ही है। राहत यहाँ भी अपनी उसी महारत का बखूबी प्रदर्शन करते हैं।

तो आइए सुनें इस गीत को




धुँधला जाएँ जो मंज़िलें, इक पल को तू नज़र झुका
झुक जाये सर जहाँ वहीं, मिलता है रब का रास्ता
तेरी किस्मत तू बदल दे, रख हिम्मत, बस चल दे
तेरे साथ ही मेरे कदमों के हैं निशां

तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…
ख़ुद पे डाल तू नज़र, हालातों से हार कर कहाँ चला रे
हाथ की लकीर को मोड़ता मरोड़ता है, हौसला रे
तो ख़ुद तेरे ख्वाबों के रंग में तू अपने ज़हां को भी रंग दे
कि चलता हूं मैं तेरे संग में, हो शाम भी तो क्या
जब होगा अंधेरा, तब पाएगा दर मेरा
उस दर पे फिर होगी तेरी सुबह
तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…

मिट जाते हैं सब के निशां, बस एक वो मिटता नहीं, हाय
मान ले जो हर मुश्किल को मर्ज़ी मेरी, हाय
हो हमसफ़र ना तेरा जब कोई, तू हो जहाँ रहूँगा मैं वहीं
तुझसे कभी ना एक पल भी मैं जुदा
तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…तू ना जाने आस पास है ख़ुदा…

फिल्म में ये गीत रणवीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा पर फिल्माया गया है।



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Thursday, February 24, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 9 : मन के 'मत' पे मत चलिओ, ये जीते जी मरवा देगा

वार्षिक संगीतमाला की नवीं पॉयदान पर एक बार फिर आ रहे हैं जनाब राहत फतेह अली खाँ । राहत इधर कुछ गलत कारणों से समाचार पत्रों में सुर्खियाँ बटोर रहे थे। अपनी रूहानी आवाज़ से जो शख़्स मन को शांत और मुदित कर देता है उससे इस तरह के आचरण की उम्मीद कम से कम हम और आप जैसे प्रशंसक तो नहीं ही कर सकते। आशा है राहत इस घटना से सबक लेंगे और भविष्य में जब भी उनकी चर्चा हो तो सिर्फ उनकी गायिकी के लिए...

जब राहत का पिछला गीत सोलहवीं पॉयदान पर बजा था तो मेंने आपसे कहा था कि इस साल की वार्षिक संगीतमाला में राहत ने अपने गीतों से जो धूम मचाई है उसकी मिसाल पहले की किसी भी संगीतमाला में देखने को नहीं मिली। राहत की गायिकी के दबदबे का अंदाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इस साल के प्रथम दस गीतों में से पाँच उनके द्वारा गाए नग्मे हैं।

तो अब बात करें नवीं पॉयदान के इस गीत की जो लिया गया है फिल्म 'आक्रोश' से। अनुपम अमोद की आवाज़ में इस फिल्म का एक और प्यारा गीत सौदा उड़ानों का है या आसमानों का है, ले ले उड़ानें मेरी.. आप पहले ही संगीतमाला में सुन चुके हैं। आक्रोश का संगीत दिया है प्रीतम ने और लिखा है इरशाद क़ामिल ने। दरअसल राहत की गायिकी तो अपनी जगह है ही पर इस गीत की जान है इरशाद क़ामिल के बोल। रूमानियत भरे गीतों में इरशाद कमाल करते हैं वो तो आप पिछले सालों में जब वी मेट, लव आज कल, अजब प्रेम की गजब कहानी और इस साल Once Upon A Time In Mumbai सरीखी फिल्मों में पहले ही देख चुके हैं। पर आक्रोश के इस गीत में इरशाद गीत के बोलों में एक दार्शनिक चिंतन का भी सूत्रपात करते हैं। वैसे तो गीत के हर अंतरे में इरशाद अपनी लेखनी से चमत्कृत करते हैं पर खास तौर पर उनकी लिखी ये पंक्तियाँ मन को लाजवाब सा कर देती हैं।

"..मन से थोडी अनबन रखना,
मन के आगे दर्पण रखना
मनवा शकल छुपा लेगा.."

इरशाद क़ामिल आज हिंदी फिल्म संगीत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाते जा रहे हैं। पर अगर उनके पिता की चलती तो वो आज इंजीनियरों की जमात में खड़े होते। रासायन शास्त्र के प्रोफेसर के पुत्र होने के नाते उन्हें कॉलेज में गणित और विज्ञान विषयों को जबरन चुनना पड़ा। अरुचिकर विषयों का साथ और उसके साथ चार चार ट्यूशन करने की बाध्यता इरशाद को नागवार गुज़री। कॉलेज की उस व्यस्त दिनचर्या में क़ामिल कुछ सुकून की तलाश में रंगमंच में रुचि लेने लगे। साल के अंत में जब नतीजे निकले तो वो गणित और भौतिकी में फेल हो गए थे। क़ामिल के पिता के लिए वो निराशा का दिन था पर क़ामिल इसे अपनी जिंदगी की सबसे अच्छी असफलताओं में गिनते हैं क्यूँकि इस असफलता ने ही उन्हें जीवन की नई दिशा प्रदान की।

वैसे तो मानव मन की विचित्रताओं पर पहले भी गीत लिखे जा चुके हैं और इरशाद साहब का ये गीत उसी कड़ी में एक उल्लेखनीय प्रयास है। प्रीतम संगीत के साथ यहाँ ज्यादा प्रयोग नहीं करते और गीत के फक़ीराना मूड को अपनी धुन से बरक़रार रखते हैं।

वैसे मन के भटकाव के बारे में सब जानते समझते भी क्या हम इसकी इच्छाओं के आगे घुटने नहीं टेक देते, इसके दास नहीं बन जाते। खासकर तब जब हमारे हृदय में किसी के प्रति प्रेम की वैतरणी बहने लगती है। तो आइए सुनते हैं इस अर्थपूर्ण गीत को राहत जी के स्वर में..



इस गीत को आप यहाँ भी सुन सकते हैं

इश्क मुश्क पें जोर ना कोई
मनसे बढकर चोर ना कोई
बिन आग बदन सुलगा देगा
ये रग रग रोग लगा देगा


मन के 'मत' पे मत चलिओ, ये जीते जी मरवा देगा
मन के 'मत' पे मत चलिओ, ये जीते जी मरवा देगा
माशूक़ मोहल्ले में जाके बेसब्रा रोज दगा देगा
हो. मन की मंडी, मन व्यापारी, मन ही मन का मोल करे
हा हा हा...
भूल भाल के नफ़ा मुनाफा, नैन तराजू तोल करे
नैन तराजू तोल करे
खुद ही मोल बढा दे मनवा, खुद ही माल छुपा दे मनवा
खुद ही भाव गिरा देगा


मन के मत पे मत चलिओ, ये जीते जी मरवा देगा


मन बहकाए, मन भटकाए, मन बतलाए सौ रस्ते
मन की मत में प्यार हैं मँहगा, प्राण पखेरू हैं सस्ते
प्राण पखेरू हैं सस्ते
मन से थोडी अनबन रखना, मन के आगे दर्पण रखना
मनवा शकल छुपा लेगा
मन के मत पे चलिओ..

चलते चलते इरशाद क़ामिल की लिखी इन पंक्तियों के साथ आपको छोड़ना चाहूँगा

जो सामने है सवाल बनके…
कभी मिला था ख़याल बनके…
देगी उसे क्या मिसाल दुनिया …
जो जी रहा हो मिसाल बनके

इरशाद बतौर गीतकार एक मिसाल बन कर उभरें, मेरी उनके लिए यही शुभकामनाएँ हैं..

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Tuesday, February 22, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 10 : रूसा भात, माटी धान हमारी जान है..मँहगाई डायन खायत जात है...

वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला के अंतिम दस में प्रवेश करने का और यहाँ वो गीत है जो इस साल का सबसे प्रासंगिक गीत साबित हुआ है। जी हाँ सही पहचाना आपने ये गीत या यूं कहें कि ये लोकगीत है सखी सैयाँ तो खूबई कमात हैं, मँहगाई डायन खायत जात है..। मँहगाई तो साल दर साल सत्ताधारी दलों की सरकारों का नासूर बनती रही है। पर जब ये बुंदेलखंडी लोकगीत पीपली लाइव के लिए रिकार्ड किया गया तो पेट्रोल से ले के खाद्यान्नों की कीमतें निरंतर बढ़ती जा रही थीं।

गीत के मूल लेखक गया प्रसाद प्रजापति व गीतकार स्वानंद किरकिरे की तारीफ़ करनी होगी की चंद पंक्तियों में उन्होंने मँहगाई के चलते देश के आम नागरिकों और विशेषकर किसानों को हो रही परेशानियों को इस तरह छुआ कि ये गीत पूरे देश की आवाज़ बन गया। गीत के पहले अंतरे में जहाँ वो बढ़ती मँहगाई से हो रही गरीबों की दुर्दशा का चित्रण करते हैं

हर महिना उछले पेट्रोल
डीजल का उछला है रोल
शक्कर भाई के का बोल
रूसा भात, माटी धान हमारी जान है
मँहगाई डायन खायत जात है.

वहीं दूसरे अंतरे में वे अप्रत्याशित बदलते मौसमों की वज़हों से हो रही फसलों की तबाही और किसानों पर आए संकट को भी बखूबी व्यक्त करते हैं...

सोयाबीन का हाल बेहाल
गरमी से पिचके हैं गाल
गिर गए पत्ते, पक गए बाल
और मक्का जी भी खाए गए मात हैं
मँहगाई डायन खायत जात है.

संगीतकार राम संपत ने इस गीत में बस ये ध्यान रखा कि गाँव की चौपालों या कीर्तन मंडलियों के साथ जिस तरह का संगीत बजता है उससे तनिक भी छेड़ छाड़ ना की जाए। इसलिए आपको गीत के साथ सिर्फ ढोलक, झाल, मजीरे और हारमोनियम का स्वर सुनाई देता है। बिलकुल वैसा ही जैसा आपने अपने गली मोहल्ले में सुना होगा।

पर मुझे गीत के असली हीरो लगते हैं चरित्र अभिनेता रघुवीर यादव। रघुबीर यादव ने जिस अंदाज़ में इस गीत को अपनी आवाज़ दी है उससे लोगों को यही लगेगा कि कोई मँजा हुआ लोकगायक गा रहा है। वैसे दिलचस्प बात ये कि इस गीत को रात में खुले आसमान के नीचे रिकार्ड किया गया था। गीत में कुछ विविधताएँ रघुवीर जी ने खुद जोड़ी थीं और गीत बिना किसी रीटेक के ही ओके कर लिया गया था।

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फिल्म मैसी साब और टीवी धारावाहिक मुँगेरी लाल के हसीन सपने से अपने कैरियर के आरंभिक दिनों में चर्चा में आया ये शख़्स वास्तव में जबलपुर के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखता है। और तो और पन्द्रह साल की उम्र में जब रघुवीर अपने गाँव को छोड़कर निकले थे तो अभिनेता बनने नहीं बल्कि एक गायक के रूप में अपना कैरियर बनाने के लिए।

पर भाग्य को कछ और मंजूर था। रोज़ी रोटी के जुगाड़ में पहले उन्होंने एक पारसी थिएटर कंपनी में छः सालों तक काम किया। फिर तीन साल नेशनल स्कूल और ड्रामा में और अध्ययन करने के बाद वो एक दशक तक वहाँ पढ़ाते रहे। फिर फिल्मों में काम मिलना शुरु हुआ तो गायक बनने का ख़्वाब, ख़्वाब ही रह गया। पर आज भी उन्हें संगीत से प्यार है क्यूँकि अच्छा संगीत उन्हें मन की शांति देता है। एक कलहपूर्ण दामपत्य जीवन की वज़ह से कोर्ट,कचहरी और यहाँ तक कि जेल की हवा खा चुकने वाले रघुवीर यादव को पीपली लाइव में अभिनय के आलावा गायिकी के लिए जो वाहवाही मिल रही है वो उन जैसे गुणी कलाकार के लिए आगे भी सफलता की राह खोलेगी ऐसी मेरी मनोकामना है।

आइए फिलहाल तो सुनते हैं ये गीत।





चलते चलते गीत से जुड़े दो रोचक तथ्य और। फिल्म वैसे तो एक काल्पनिक गाँव पीपली की कहानी कहती है पर इस इस गीत के साथ जो गायन मंडली है वो मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पास स्थित गाँव बदवाई से ताल्लुक रखती है। वहीं इस फिल्म की शूटिंग भी हुई। फिल्म की लोकप्रियता बढ़ने पर इस गाँव के लोगों ने फिल्म के निर्माता आमिर से अस्पताल, विद्यालय, सड़क की माँग नहीं की बल्कि एक अभिनय सिखाने वाले संस्थान खोलने की पेशकश की। शायद गायन मंडली को बतौर पारिश्रमिक मिले छः लाख रुपए इसकी वज़ह रहे हों।

Saturday, February 19, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 11 : देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू, घाट-घाट यहाँ घटता जादू

वार्षिक संगीतमाला की ग्यारहवीं पॉयदान पर स्वागत कीजिए संगीत बैंड ' Indian Ocean' का जो पहली बार किसी संगीतमाला का हिस्सा बन रहा है। पिछले कई महिनों से इनके द्वारा बनाए इस गीत के माध्यम से आप अपने देश के रंग रँगीले प्रजातंत्र के विभिन्न रूपों की झलक देखते रहे है। वैसे भी इस बात में क्या शक हो सकता है कि 'देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू घाट-घाट यहाँ घटता जादू.....'।

निर्देशिका अनुषा रिज़वी ने पीपली लाइव के जिन दो गीतों के लिए 'Indian Ocean' को चुना उनमें से ये वाला गीत उनके एलबम 'झीनी' में शामिल था। हाँ ये जरूर हुआ कि मूलतः संजीव शर्मा के लिखे इस गीत के बोलों में पीपली लाइव के लिए गीतकार स्वानंद किरकिरे ने कुछ बदलाव किए और जो नतीजा निकला वो फिल्म रिलीज़ होने के पहले ही देश की जनता की जुबान पर आ गया।

अपने देश की विसंगतियों को ये गीत व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखता जरूर है पर एक बाहरवाले के नज़रिए से नहीं बल्कि एक आम भारतीय के परिपेक्ष्य से। गीत के बोलों में जहाँ देश की मिट्टी का सोंधापन है वही यह गीत देश के वास्तविक हालातों का आईना भी पेश करता है। अब इन्हीं पंक्तियों को लें जिनमें देश का दर्द समाया सा लगता है..

सूखे नैना, रुखी अँखियाँ
धुँधला धुँधला सपना
आँसू भी नमकीन है प्यारे
जो टपके सो चखना

राहुल की आवाज़ की ताकत और गहरापन इस ज़मीनी हक़ीकत को और पुख्ता करता है।

आइए इस गीत के अन्य पहलुओं पर चर्चा करने के पहले इस बैंड से आपका परिचय करा दूँ। बैंड 1984 में गिटार वादक सुस्मित सेन और गायक असीम चक्रवर्ती जो कि ताल वाद्यों में भी प्रवीण थे ने शुरु किया। 1990 में बैंड का नामाकरण Indian Ocean किया गया। 1991 में राहुल राम जो आज कल इस बैंड के मुख्य गायक हैं, इसका हिस्सा बने। 1994में अमित कीलम ड्रमर के रूप में बैंड में आए। दिसंबर २००९ में असीम का हृदय गति रुक जाने से असामयिक निधन हो गया। आजकल ये बैंड अपने नए एलबम '16/330 खजूर रोड' के लांच में व्यस्त है।

पूरे गीत में बैंड ने ताल वाद्यों और गिटार का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। मुखड़े के बाद ही तबले, ढोलक , डमरू का जो सम्मिलित स्वर उभरता है वो आपको एकदम से देशी वातावरण में खींच ले जाता है। राहुल राम और उनके साथी प्पप परा रा..धूम ततक धिन के कोरस के साथ गीत में एक जोश और उर्जा सी भरते हैं।


पर गीत की सबसे सुंदर तान सुस्मित सेन की उँगलियों से निकलती हैं। गीत शुरु होने के 2.50 मिनट बाद लगभग चालिस सेकेंड तक सुस्मित अपनी थिरकती ऊँगलियों से वो जादू पैदा करते हैं कि मन मंत्रमुग्ध और ठगा सा रह जाता है। लगता है गिटार और सितार का अंतर ही समाप्त हो गया। सुस्मित अपने संगीत को अपने अनुभवों का निचोड़ बताते हैं। उन्हे जाज़ और रॉक से ज्यादा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत पसंद आता है।(चित्र सौजन्य)


वैसे क्या आप जानते हैं कि बैंड के मुख्य गायक राहुल राम जो अपनी लंबी दाढ़ी और अलग सी वेश भूषा से अपनी अलग सी पहचान रखते हैं के पास पीएचडी की उपाधि भी है। और तो और राहुल नर्मदा बचाव आंदोलन का भी हिस्सा रह चुके हैं। अब अगर राहुल अपने आप को बुद्धिजीवियों में गिनते हों तो इसमें क्या गलत हो सकता है। यही वजह हे कि उनके साथी उन्हें 'लॉजिक बाबा' और 'ज्ञानदेव' के नाम से बुलाते हैं। (चित्र सौजन्य)

तो आइए सुनें इस गीत को



देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू
घाट-घाट यहाँ घटता जादू
देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू

देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू
घाट-घाट यहाँ घटता जादू

राई पहाड़ है कंकर-शंकर
बात है छोटी बड़ा बतंगड़
राई पहाड़ है कंकर-शंकर
बात है छोटी बड़ा बतंगड़

इंडिया सर यह चीज़ धुरंधर
इंडिया सर यह चीज़ धुरंधर
रंग रँगीला परजातंतर
रंग रँगीला परजातंतर

प प रे .....

सात रंग सतरंगा मेला
बदरंगा सा बड़ा झमेला
सात रंग सतरंगा मेला
बदरंगा सा बड़ा झमेला

गिरा गगन से खजूर ने झेला
सुच-दुःख पकड़म-पकड़ी खेला

है..एक रंग गुनियों का निराला
एक रंग अज्ञानी
रंग रंग मैं होड़ लगी है
रंगरंगी मनमानी

देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू
घाट-घाट यहाँ घटता जादू
देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू
घाट-घाट यहाँ घटता जादू

सूखे नैना, रुखी अँखियाँ
धुँधला धुँधला सपना
आँसू भी नमकीन है प्यारे
जो टपके सो चखना

धुँधला धुँधला सपना प्यारे
धुँधला धुँधला सपना

सूखे नैना, रुखी अँखियाँ
सूखे नैना, रुखी
धुँधला धुँधला सपना प्यारे
धुँधला धुँधला सपना
देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू हे....

और अगर आमिर खान को ड्रमर का रोल सँभालते देखना चाहें तो गीत का वीडिओ ये रहा...

Wednesday, February 16, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 12 : कान्हा . बैरन हुयी बाँसुरी... दिन तो कटा, साँझ कटे, कैसे कटे रतियाँ ?

बारहवी पॉयदान पर पहली बार इस साल की संगीतमाला में प्रवेश कर रहे हैं संगीतकार साज़िद वाज़िद। पर फिल्म दबंग के लिए नहीं बल्कि साल के शुरु में आई फिल्म 'वीर' के लिए। गीत के बोल लिखे हैं गुलज़ार साहब ने और इसे अपनी आवाज़ दी है रेखा भारद्वाज ने। जब भी किसी गीत के क्रेडिट में रेखा जी का नाम आता है गीत की प्रकृति के बारे में बहुत कुछ अंदाज मिल जाता है। सूफ़ी संगीत से अपने कैरियर की शुरुआत और पहचान बनाने वाली रेखा जी ने जहाँ पिछले कुछ वर्षों में लोकगीत के रंग में समाए ठेठ गीत गाए हैं वहीं उप शास्त्रीय गीतों में भी उनकी आवाज़ और लयकारी कमाल की रही है।

अपने उसी अंदाज़ को रेखा जी ने वीर फिल्म की इस 'ठुमरी' में बरक़रार रखा है। वैसे शास्त्रीय संगीत से ज्यादा नहीं जुड़े लोगों के लिए उप शास्त्रीय संगीत की इस विधा के बारे मे् कुछ बातें जानना रोचक रहेगा। शास्त्रीय संगीत के जानकार उन्नीसवी शताब्दी को ठुमरी का उद्भव काल बताते हैं। ठुमरी से जुड़े गीत रूमानी भावों से ओतप्रोत होते हुए भी सात्विक प्रेम पर आधारित होते हैं और अक्सर इन गीतों में नायक के रूप में भगवान कृष्ण यानि हमारे कान्हा ही नज़र आते हैं। ठुमरी की लोकप्रियता लखनऊ में नवाब वाज़िद अली शाह के शासनकाल में बढ़ी।

ठुमरी में रागों के सम्मिश्रण और अदाकारी का बड़ा महत्त्व है। वैसे तो अक्सर ठुमरियाँ राग खमाज़,पीलू व काफ़ी पर आधारित होती हैं पर संगीतकार साज़िद वाज़िद ने इस ठुमरी के लिए एक अलग राग चुना। अपने इस गीत के बारे में वो कहते हैं
हमने इस ठुमरी में किसी एक थाट का प्रयोग नहीं किया जैसा कि प्रायः होता है। जिस तरह हमने इस गीत में मिश्रित राग से विशुद्ध राग नंद में प्रवेश किया वो रेखा जी ने खूब पसंद किया। गीत में तबला उसी तरह बजाया गया है जैसा आज से डेढ सौ वर्षों पहले बजाया जाता था। हमने ऐसा इसलिए किया ताकि जिस काल परिवेश में ये फिल्म रची गई वो उसके संगीत में झलके।

ठुमरी उत्तरप्रदेश मे पली बढ़ी इस लिए इस रूप में रचे गीत बृजभाषा में ही लिखे गए। गुलज़ार साहब ने ठुमरी का व्याकरण तो वही रखा पर गीत के बोलों से (खासकर अंतरों में) किसी को भी गुलज़ारिश भावनाओं की झलक मिल जाएगी। कान्हा की याद में विकल नायिका की विरह वेदना को जब दिन के उजियारे, साँझ की आभा और अँधियारी रात की कालिमा जैसे प्राकृतिक बिंबों का साथ मिलता है तो वो और प्रगाढ़ हो जाती है।


गीत एक कोरस से शुरु होता हैं जिसमें आवाज़े हैं शरीब तोशी और शबाब साबरी की। फिर रेखा जी की कान्हा को ढूँढती आवाज़ दिलो दिमाग को शांत और गीत में ध्यानमग्न सा कर देती है। मुखड़े और कोरस के बाद गीत का टेम्पो एकदम से बदल जाता है और मन गीत की लय के साथ झूम उठता है। वैसे भी गुलज़ार की लेखनी मे..साँझ समय जब साँझ लिपटावे, लज्जा करे बावरी. जैसे बोलों को रेखा जी का स्वर मिलता है तो फिर कहने को और रह भी क्या जाता है..


पवन उडावे बतियाँ हो बतियाँ, पवन उडावे बतियाँ
टीपो पे न लिखो चिठिया हो चिठिया, टीपो पे न लिखो चिठिया
चिट्ठियों के संदेसे विदेसे जावेंगे जलेंगी छतियाँ

रेत के टीले पर क्या लिखने बैठ गई? जानती नहीं कि पवन का एक झोंका इन इबारतों को ना जाने कहाँ उड़ा कर ले जाएगा और एक बार तुम्हारे दिल की बात उन तक पहुँच गई तो सोचो उनका हृदय भी तो प्रेम की इस अग्नि से धधक उठेगा ना..

कान्हा आ.. बैरन हुयी बाँसुरी

हो कान्हा आ आ.. तेरे अधर क्यूँ लगी
अंग से लगे तो बोल सुनावे, भाये न मुँहलगी कान्हा
दिन तो कटा, साँझ कटे, कैसे कटे रतियाँ

कान्हा अब ये बाँसुरी भी तो मुझे अपनी सौत सी लगने लगी है। जब जब सोचती हूँ कि इसने तेरे अधरों का रसपान किया है तो मेरा जी जल उठता है। और तो और इसे प्यार से स्पर्श करूँ तो उल्टे ये बोल उठती है। तुम्हीं बताओ मुझे ये कैसे भा सकती है? तुम्हारे बिना दिन और शाम तो कट जाती है पर ये रात काटने को दौड़ती है

पवन उडावे बतियाँ हो बतियाँ, पवन उडावे बतियाँ..
रोको कोई रोको दिन का डोला रोको, कोई डूबे, कोई तो बचावे रे
माथे लिखे म्हारे, कारे अंधियारे, कोई आवे, कोई तो मिटावे रे
सारे बंद है किवाड़े, कोई आरे है न पारे
मेरे पैरों में पड़ी रसियाँ

चाहती हूँ के इस दिन की डोली को कभी अपनी आँखो से ओझल ना होने दूँ। जानती हूँ इसके जाते ही मन डूबने लगेगा। मेरे भाग्य में तो रात के काले अँधियारे लिखे हैं।  समाज की बनाई इस चारदीवारी से बाहर निकल पाने की शक्ति मुझमें नहीं और कोई दूसरा भी तो नहीं जो मुझे इस कालिमा से तुम्हारी दुनिया तक पहुँचने में सहायता कर सके।

कान्हा आ.. तेरे ही रंग में रँगी
हो कान्हा आ आ... हाए साँझ की छब साँवरी
साँझ समय जब साँझ लिपटावे, लज्जा करे बावरी
कुछ ना कहे अपने आप से आपी करें बतियाँ

जानते हो जब ये सलोनी साँझ आती है तो मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लेती है। तेरे ख्यालों में डूबी अपने आप से बात करती हुई तुम्हारी ये बावरी उस मदहोशी से बाहर आते हुए कितना लजाती है ये क्या तुम्हें पता है?

दिन तेरा ले गया सूरज, छोड़ गया आकाश रे
कान्हा कान्हा कान्हा.....



अब 'एक शाम मेरे नाम' फेसबुक के पन्नों पर भी...

Monday, February 14, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 वेलेंटाइन डे स्पेशल - पॉयदान संख्या 13 : चमचम झिलमिलाते,ये सितारों वाले हाथ,भीनी भीनी खुशबू, जैसे तेरी मीठी बात

वेलेंटाइन डे के मौके पर 'एक शाम मेरे नाम' के स्नेही पाठकों को प्यार भरी शुभकामनाएँ।  इस अवसर पर आपके लिए तोहफे के रूप में पेश है वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं पॉयदान पर प्रेम की सोंधी सोंधी खुशबू फैलाता हुआ ये प्यारा सा नग्मा। इस नग्मे को आप में से ज्यादातर ने नहीं सुना होगा क्यूँकि जिस फिल्म में ये नग्मा था वो मुख्यतः म्ल्टीप्लेक्सों की शोभा कुछ दिन बढ़ाकर चलती बनी। ये फिल्म थी 'स्ट्राइकर'। अब इस स्ट्राइकर से इसे कोई मार धाड़ वाली फिल्म ना मान लीजिएगा। ये स्ट्राइकर कैरमबोर्ड वाला है और फिल्म भी कैरम खेलने वाले एक खिलाड़ी की कहानी कहती है।

ये बात ध्यान देने की है कि लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशक आजकल संगीत में जिस विविधता और प्रयोग की छूट अपने संगीतकारों को देते हैं वो मुख्यधारा के नामी निर्माता निर्देशकों से देखने को नहीं मिलती। अब Striker को ही लें। निर्देशक चंदन अरोड़ा ने फिल्म के आठ गीतों के लिए छः अलग अलग संगीतकारों का चुना। इनमें विशाल भारद्वाज और स्वानंद किरकिरे के संगीतबद्ध गीत भी थे। पर इन गीतों में जो गीत संगीतमाला में जगह बना पाया है वो है एक नई मराठी गीत संगीतकार जोड़ी का। इस गीत के संगीतकार हैं शैलेंद्र बार्वे और गीतकार हैं जीतेंद्र जोशी

जीतेंद्र जोशी एक बहुमुखी प्रतिभा वाले कलाकार है। मराठी फिल्मों, नाटकों और सीरियलों में बतौर अभिनेता का काम करते हैं और कविताएँ लिखने का शौक भी रखते हैं। पुणे से अपनी आंरंभिक और कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने वाले जीतेंद्र गुलज़ार और विशाल भारद्वाज के बड़े प्रशंसक हैं। ये गीत देखकर उन दिनों की याद दिला देते है जब प्यार संवाद से नहीं पर मूक भावनाओं, आँखों के इशारे और छत पर पत्थर से बाँध के फेंके गए ख़तों से आगे बढ़ता था।

जोशी और बार्वे को भी फिल्म में एक ऍसी परिस्थिति दी गई जहाँ नायक अपने ठीक सामने के घर में रहने वाली एल लड़की के मोहजाल में इस क़दर डूब जाता है कि दिन रात उसकी हर इक गतिविधि का साझीदार हो जाता है। ये तो आप भी मानेंगे कि जब प्रेम संवादविहीन होता है तो उसकी गहराई दिन दूनी रात चौगुनी कुलाँचे भरने लगती है। आप किसी के बारे में सोचना शुरु करते हैं, दिन रात सोचते हैं तो आपकी कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। अपने प्रेमी का हर कृत्य आपको इस अवस्था में अद्बुत सा नज़र आता है। जोशी नायक के मन में चल रही कल्पनाओं की उड़ान को अपने लफ़्जों में इस तरह बुनते हैं कि मन का हर कोना रूमानियत के रंगों से भींग जाता है।

शैलेंद्र बार्वे ने इस गीत में प्रेम के सच्चे और भोले स्वरूप को जाग्रृत करने के लिए सूफ़ी संगीत का रंग देने का प्रयास किया है। हिंदुस्तानी वाद्य यंत्र और ताली के सम्मिलित संगीत संयोजन के साथ उन्होंने गीत का टेम्पो धीमा रखा है जिससे हर शब्द को एक खिंचाव के साथ गाना पड़ता है। इस गीत को निभाने के लिए एक ऐसे कलाकार की आवाज़ की जरूरत थी जो कुछ नया करने में विश्वास रखता हो और इसीलिए गायक के तौर पर सोनू निगम को चुना गया। सोनू ने इस कठिन गीत को इस बेहतरीन तरीके से निभाया है कि उनकी गाई हर पंक्ति, हर आलाप पर बस वाह वाह ही निकलती है। सोनू निगम ख़ुद इस गीत को अपने द्वारा गाए गीतों में सबसे अच्छों में से एक गिनते हैं।

तो आइए सुनते हैं इस प्यारे से गीत को इसके लाजवाब बोलों के साथ
हो जन्नतों के दर खुले, कुछ बाशिंदे थे चले
ले आए वो, नन्ही जान
उस ख़ुदा का इक पयाम
तब से तू है ज़हाँ में
बनके रौनक यहाँ की मेरी जान
ख़्वाहिशों से भी आगे जो ख़ुशी का मिले वो अरमान
रा रे रा रा आ..

चमचम झिलमिलाते,ये सितारों वाले हाथ
भीनी भीनी खुशबू, जैसे तेरी मीठी बात
उजला उजला सा ये तन, जैसा महका हो चन्दन
बाहों में तेरी गुजरे, मेरा ये सारा जीवन
तेरी अदा में मासूमियत है
फिर भी है शोखी, रंगीनियत है
तारों से भर दूँ मैं, आँचल तेरा
रब से भी प्यारा है, चेहरा तेरा, चेहरा तेरा, चेहरा तेरा
रा रे रा रा आ...

फूल होंठों पे खिले, चाँद आँखों में मिले
फूल होंठों पे खिले, चाँद आँखों में मिले
बिखरे मोती जुबान की जैसे किरणें तेरी यह मुस्कान
नूर बरसे नज़र से नूरी तुझमें बसी है मेरी जान
नूर बरसे नज़र से नूरी तुझमें बसी है मेरी जान
तेरी झलक की प्यासी नज़र है, दीवानगी ये तेरा असर है
रूहाने रंगों का ये आँचल तेरा
सपनो इरादों का ये बादल मेरा बादल मेरा बादल मेरा
रा रे रा रा आ

धीरे धीरे सर चढ़ा, तेरा जादू, आगे बढ़ा
धीरे धीरे सर चढ़ा, तेरा जादू, आगे बढ़ा
हुआ खुद से जुदा फिर भी तुझपे फ़िदा मैं मेरी जान
इश्क ले ले तू ले ले ,ले ले तू मेरा इम्तिहान
इश्क ले ले तू ले ले ,ले ले ले ले मेरा इम्तिहान
सूने सफ़र की तू सोहबत है.
बख्शी खुदा ने, यह मिलकियत है
आजा सजा दे गोरी आँगन मेरा
जैसे सजाया तूने लमहा मेरा

रा रे रा रा आ....

ये गीत एक ऐसा गीत है जिसका नशा धीरे धीरे चढ़ता है इसलिए इसे जब भी सुनिएगा फुर्सत से सुनिएगा...

चलते चलते इस गीत के फिल्मांकन के बारे में कुछ बातें। दो सटे सटे घरों के बीच होते प्रेमपूर्ण भावनाओं के आदान प्रदान को मेरी पीढ़ी ने अपनी आँखों से देखा और महसूस किया है। गीत में भी इस वास्तविकता का बखूबी चित्रण हुआ है। शूटिंग के दौरान एक बड़ा मजेदार वाक़या हुआ।  

नायक को अपना प्रेम पत्र कागज के तिकोने जहाज के रूप में ऐसा फेंकना था कि वो सामने की बॉलकोनी में खड़ी नायिका के पास गिरे। पर पहले चार टेकों में बच्चों वाला ये मामूली काम नायक अंजाम नहीं दे पाए। दो बार वो जहाज नायिका के घर के खपड़ैल की छत पर जा पहुँचा और दो बार नीचे जा गिरा। :)

तो आइए देखते हैं इस गीत का वीडिओ..

Thursday, February 10, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 14 : बहारा बहारा, हुआ दिल पहली बार वे...बहारा बहारा, कि चैन तो हुआ फरार वे

वसंत हमारे द्वार पर दस्तक दे रहा है। सर्दी अपनी कड़क छोड़ चुकी है। मौसम भी आशिकाना है और संत वेलेंटाइन के पुण्य प्रताप से ये सप्ताह भी। और तो और इस मौसम को और रूमानी बनाने का आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला 2010 की चौदहवीं पॉयदान पर का ये बेहद सुरीला नग्मा।

इस नग्मे को गाया है कोकिल कंठी श्रेया घोषाल ने। पर श्रेया की मधुर आवाज़ के साथ गीत की शुरुआत और अंतरों के बीच एक और स्वर सुनाई देगा आपको जिसमें गँवई मिट्टी की खुशबू भी है और लोक गीत सी मिठास भी। ये स्वर है सोना महापात्रा का। वर्ष 2006 में सोनी द्वारा निकाले एलबम सोना से अपने संगीत के कैरियर की शुरुआत करने वाली सोना महापात्रा को लोग एक रॉक गायक के रूप में ज्यादा जानते हैं। पर शायद इस गीत की सफलता के बाद पार्श्व गायिका के रूप में उन्हें ज्यादा मौके मिले।


पर फिल्म I Hate Luv Storys का ये गीत यहाँ है तो श्रेया घोषाल की वज़ह से। इस गीत में श्रेया की मिसरी सी मीठी आवाज़ का बेहतरीन उपयोग किया है संगीतकार युगल विशाल शेखर ने। हर अंतरे को जब श्रेया वो ओ ओ ओ.. की स्वर लहरी से शुरु करती हैं तो मन झूम जाता है। वैसे भी रोमांटिक गीतों को गाने में फिलहाल श्रेया का कोई सानी नहीं है।

विशाल शेखर इस साल के सबसे सफल संगीतकारों में रहे हैं। इस गीत में भी इंटरल्यूड्स में उनका संगीत संयोजन बेहद कर्णप्रिय है। वैसे विशाल शेखर ने इस एलबम में राहत फतेह अली खाँ से भी इस गीत का एक वर्जन गवाया है। पर ये गीत श्रेया की आवाज़ पर ज्यादा जमता है।

इस गीत को लिखा है 'कुमार' ने। एक तो ये नाम आप को आधा अधूरा सा लग रहा होगा और दूसरे एक गीतकार के रूप में ये नाम आपके लिए नया भी होगा। तो चलिए पहली बार एक शाम मेरे नाम की संगीतमाला में शिरक़त करने वाले कुमार साहब से आपका परिचय करा दें। कुमार का पूरा नाम है 'राकेश कुमार'। राकेश पंजाब के जालंधर शहर से ताल्लुक रखते हैं। मुंबई फिल्म उद्योग में इनके कदम पन्द्रह साल पहले पड़े। पर पहली फिल्म में गीतकार बनने का मौका 2004 में फिल्म 'प्लॉन' के लिए मिला। वैसे देश के फिल्मी बाजार में लोकप्रिय होने के लिए इन्हें 2009 तक इंतज़ार करना पड़ा। फिल्म दोस्ताना में इनके लिखे गीतों 'देशी गर्ल' और 'माँ का लाडला बिगड़ गया' पर पूरा भारत झूमा था और आज भी नाच गानों की महफिलों में ये गीत बारहा बजते सुनाई दे जाते हैं। और हाँ अगर गीत के साथ उनके नाम की जगह 'Kumaar' दिखे तो इस अतिरिक्त 'a' को देखकर चौंकिएगा नहीं। अपने फिल्मी नामाकरण में उन्होंने इसी spelling का उपयोग किया है।

बहरहाल अपने धूमधड़ाका गीतों के विपरीत 'कुमार' ने इस गीत के रूमानी मूड को देखते हुए बड़ी प्यारी शब्द रचना की है जो श्रेया की आवाज़ में और निखर उठती है। तो चलिए अब बातों का क्रम बंद करते हैं और खो जाते हैं इस सुरीले गीत के आगोश में..



हूँ तोरा साजन, आयो तोरे देश
बदली बदरा बदला सावन
बदला जग ने भेस रे
तोरा साजन, आयो तोरे देश..

सोयी सोयी पलकों पे चल के
मेरी सपनों की खिड़की पे आ गया
आते जाते फिर मेरे दिल के
इन हाथों में वो ख़त पकड़ा गया
प्यार का, लफ़्ज़ों में रंग है प्यार का
बहारा बहारा, हुआ दिल पहली बार वे
बहारा बहारा, कि चैन तो हुआ फरार वे
बहारा बहारा, हुआ दिल पहली पहली बार वे
हो तोरा साजन...

वो कभी दिखे ज़मीन पे, कभी वो चाँद पे
ये नज़र कहे उसे यहाँ मैं रख लूँ
बाँध के इक साँस में
धडकनों के पास में, हाँ पास में घर बनाए
हाय भूले ये ज़हाँ
बहारा बहारा, हुआ दिल पहली बार वे...

प्रीत में तोरी ओ री सँवारिया
पायल जैसे छमके बिजुरिया
छम छम नाचे तन पे बदरिया हूँ हो हो ओ हो
बादालिया तू बरसे घना
बरसे घना, बरसे घना

ये बदलियाँ, वो छेड़ दे,तो छलके बारिशें
वो दे आहटें, करीब से
तो बोले ख़्वाहिशें कि आज कल, ज़िन्दगी हर एक पल,
हर एक पल से चाहे, हाय जिसका दिल हुआ

बहारा बहारा, हुआ दिल पहली बार वे...
सोयी सोयी पलकों पे चल के....
बहारा बहारा.... हो तोरा साजन...



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Monday, February 07, 2011

तुझमें खोया रहूँ मैं , मुझमें खोयी रहे तू .. खुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी : मधुर है M S Dhoni The Untold Story का संगीत !

जिस दो किमी के रास्ते से आप सुबह शाम आफिस जाते हों। जहाँ के मैदानों में घूमते टहलते या खेल का आनंद लेने के लिए कई हँसती मुस्कुराती सुबहें आपने फुर्सत में गुजारी हों। जिस मोहल्ले में आपके साथी सहकर्मी रहते हों उन्हें सिनेमा के रूपहले पर्दे पर देखना कितना रोमांचक होगा। धोनी अपनी  फिल्म M S Dhoni The Untold Story की बदौलत हमारे चौक चौबारों को आप के ड्राइंगरूम तक ले आए हैं। फिल्म के रिलीज़ होने में अभी भी लगभग तीन हफ्तों का समय शेष है पर पिछले महीने से इसके गाने पहले आडियो और फिर वीडियो के रूप में रिलीज़ हो रहे हैं। फिल्म ने आशाएँ तो जगा दी हैं पर फिलहाल तो इसका संगीत हमारे सामने है तो क्यूँ ना उसके बारे में आज थोड़ी बातें कर लें। 

M S Dhoni The Untold Story नीरज पांडे द्वारा निर्देशित फिल्म हैं। ये वहीं नीरज पांडे हैं जिन्होंने  A Wednesday, Special 26, Baby और हाल फिलहाल में रुस्तम  जैसी सफल फिल्म का निर्देशन किया है। फिल्म का संगीत निर्देशन किया है उभरते हुए संगीतकार अमल मलिक ने और इन गीतों में किरदारों की भावनाओं को शब्द दिए हैं हुनरमंद गीतकार मनोज मुन्तशिर ने।


फिल्म में यूँ तो कुल छः गाने हैं। अगर आप पूरा एलबम सुनेंगे तो आप समझ लेंगे कि हर गीत धोनी की ज़िदगी के विभिन्न हिस्सों से जुड़ा हुआ है।  फुटबाल से क्रिकेट का खिलाड़ी बनना, बतौर क्रिकेटर स्कूल व फिर झारखंड की रणजी टीम में चयनित होना। पिता के दबाव में क्रिकेट के साथ टीटी की नौकरी करना और फिर झारखंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीम से भारत के लिए चयनित होना। बेसब्रियाँ धोनी की छोटे छोटे सपनों को पूरा कर एक बड़े स्वप्न की ओर कदम बढ़ाने की इसी ज़द्दोज़हद को व्यक्त करता है।

कौन तुझे  (Kaun Tujhe..) गर उनके पहले प्रेम की आवाज़ है तो फिर कभी (Phir Kabhi...) उसी प्रेम में रचता बसता उस रिश्ते को बड़े प्यारे तरीके से आगे बढ़ाता है। वक़्त के हाथ कैसे इस रिश्ते को अनायास ही तोड़ देते हैं वो तो आप फिल्म में ही देखियेगा। फिल्म का अगला गीत जब तक (Jab Tak...) उनकी ज़िदगी में नए शख़्स के आने की बात करता है। परवाह नहीं (Parwah Nahin...) में जीवन की राह में लड़ते हुए आगे बढ़ने का संदेश है तो पढ़ोगे लिखोगे बनोगे खराब खेलोगे कूदेगे बनोगे नवाब दशकों से घर घर में कही जा रही है हमारी कहावत को उल्टा कर माता पिता के परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने की चुटीली कोशिश करता है।

Manoj Muntashir (Left) with Amaal Malik
अमल मलिक का संगीत कुछ अलग सा भले नहीं हो पर उसमें मधुरता पूरी है। परवाह नहीं छोड़ दें जिसकी प्रकृति भिन्न है तो बाकी गीत कानों को सुकून देते हुए कब खत्म हो जाते हैं पता ही नहीं लगता। गिटार और पियानो  का जैसा प्रयोग उन्होंने किया है वो मन को सोहता है। गीत के बोलों पर वे संगीत को हावी नहीं होने देते। बेसब्रियाँ में उनका संगीत संयोजन अमित त्रिवेदी की फिल्म उड़ान की याद दिलाता है तो फिर कभी के इंटरल्यूड्स प्रीतम के गीत जाने क्या चाहे मन बावरा से प्रभावित दिखते हैं।



मनोज मुन्तशिर की नीरज पांडे की फिल्म बेबी में उनके गीत मैं तुझसे प्यार नहीं करती में मुझे बहुत प्यारी लगी थी। उन्होंने इस एलबम के हर गीत में कुछ पंक्तियाँ ऍसी दी हैं जो आपके ज़ेहन से जल्दी नहीं जाएँगी। बेसब्रियाँ के इन प्रेरणादायक बोलों पर गौर करें

क्या ये उजाले, क्या ये अँधेरे....दोनों से आगे हैं मंज़र तेरे
क्यूँ रोशनी तू बाहर तलाशे.. तेरी मशाले हैं अंदर तेरे


जब तक में उनका ये रूमानी अंदाज़ भी खूब भाने वाला है युवाओं को

जब तक मेरी उँगलियाँ तेरे बालों से कुछ कह ना लें
जब तक तेरी लहर में ख्वाहिशें मेरी बह ना लें
हाँ मेरे पास तुम रहो जाने की बात ना करो..


या फिर पलक की मिश्री सी आवाज़ में गाए हुए गीत कौन तुझे की इन पंक्तियों को लें।

तू जो मुझे आ मिला सपने हुए सरफिरे
हाथों में आते नहीं, उड़ते हैं लम्हे मेरे


पर मनोज की जो पंक्तियाँ फिलहाल मेरे होठों पर हैं वो है गीत फिर कभी से जिसे अरिजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी है..

तुझमें खोया रहूँ मैं , मुझमें खोयी रहे तू
खुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी
तुझसे मिलता रहूँ मैं, मुझसे मिलती रहे तू
ख़ुद से हम मिलेंगे फिर कभी, हाँ फिर कभी




बेहद सहजता व आसान लफ़्जों में प्रभावी ढंग से आम लोगों की मोहब्बत की कहानी कह दी है मनोज मुन्तसिर ने। तो सुनिए ये पूरा एलबम और बताइए कौन सा गाना आपको सबसे ज्यादा पसंद आया इस एलबम का...

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 15 : सुबह की किरणों को रोके जो सलाखें हैं कहाँ..जो ख़यालों पे पहरे डाले वो आँखें हैं कहाँ ?

आज़ादी एक बड़ा ही परतदार सा शब्द है। अलग अलग परिस्थितियों और परिदृश्यों में इसके नए मायने निकलते ही जाते हैं। आज से छः दशकों पहले इसका मतलब अंग्रेजों की गुलामी से निज़ात पाने से लिया जाता रहा। समय बीतता रहा पर आम जन कभी सत्ता के दलालों, धर्म और समाज के ठेकेदारों और अपने आस पास के दबंगों की दासता झेलते रहे।

ये कहानी हमारे देश की हो ऐसी बात भी नहीं है। कल तक शांत और अरब देशों में अपेक्षाकृत खुशहाल दिखने वाला मिश्र आज किसी तरह आतातायी के शासन से मुक्त होने के लिए पंख फड़फड़ा रहा है, वो हम सब देख ही रहे हैं।। व्यक्ति की सामान्य प्रवृति अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की होती है। पर कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो निरंकुशता को बर्दाश्त नहीं करते। वो ना केवल उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं वरन आपने विचारों से अपने आस पास के जनसमूह का मन भी उद्वेलित कर देते हैं।

वार्षिक संगीतमाला के पन्द्रहवीं पॉयदान पर फिल्म उड़ान का गीत ऐसे ही लोगों का गीत है जो अपनी ज़िदगी की लगाम किसी दूसरे के हाथ में सौंपने के बजाए, ख़ुद लेने की आज़ादी चाहते हैं। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य गीत के मुखड़े में खूबसूरत बिम्बों का इस्तेमाल करते हुए जब कहते हैं




पैरों की बेड़ियाँ ख़्वाबों को बांधे नहीं रे
कभी नहीं रे
मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरे
धीरे धीरे

इरादे हरे भरे, जिनके सीनों में घर करे
वो दिल की सुने, करे
ना डरे,ना डरे

तो मन की तंद्रा एकदम से भंग होती जान पड़ती है..एक नए कल के अहसास की उम्मीद जगने लगती है। अमिताभ अगली पंक्तियों में आज़ादी के जज़्बे के प्रति और जोश दिलाते हुए कहते हैं

सुबह की किरणों को रोके जो सलाखें हैं कहाँ
जो ख़यालों पे पहरे डाले वो आँखें हैं कहाँ
पर खुलने की देरी है परिंदे उड़ के चूमेंगे
आसमान, आसमान, आसमान ...


आज़ादियाँ, आज़ादियाँ, माँगे ना कभी मिले, मिले, मिले
आज़ादियाँ, आज़ादियाँ, जो छीने वही जी ले, जी ले, जी ले

और जब गायकों का कोरस इन शब्दों के साथ उभरता है तो आप भी अपने को उनमें से एक पाते हैं। वैसे क्या आप मानेंगे के इतने बेहतरीन काव्यात्मक गीत को लिखने वाला ये लड़का जब 11 साल पहले लखनऊ की सरज़मीं छोड़कर मुंबई पहुँचा था तो इसका ख़्वाब एक गीतकार बनने से ज़्यादा गायक बनने का था। गायक के रूप में उसे काम तो नहीं मिला पर गीत लिखने के कुछ प्रस्ताव जरूर मिल गए। हालांकि उनके मित्र अमित त्रिवेदी ने बीच बीच में समूह गीतों में उन्हें गाने के मौके दिए। पर सबसे पहले उनकी आवाज़ वेक अप सिड के लोकप्रिय नग्मे इकतारा में लोगों के ध्यान में आई। आपको याद है ना कविता सेठ की आवाज़ के पीछे से उभरता इकतारा इकतारा... का पुरुष स्वर। आमिर, देव डी और अब उड़ान में भी संगीतकार अमित त्रिवेदी के साथ इस गीत में अपनी आवाज़ दी है अमिताभ ने । कोरस में उनका साथ दिया है न्यूमन पिंटो और निखिल डिसूजा ने।


संगीतकार अमित त्रिवेदी की तारीफ़ों के पुल मैं पहले भी बाँधता रहा हूँ। मुझे बड़ी खुशी हुई जब मैंने सुना कि उन्हें फिल्म उड़ान के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व संगीत रचने के लिए फिल्मफेयर के क्रिटिक अवार्ड से सम्मानित किया गया है। इस गीत के मुखड़े के पहले का गिटार हो या हो या उसके बाद की सितार की सप्तलहरियाँ, जोश भरती पंक्तियों के पार्श्च से उभरती ड्रमबीट्स हों या गीत के अगले इंटरल्यूड में प्रयुक्त वॉयलिन की तान सब उनके बेहतरीन संगीत संयोजन की गवाही देते हैं।

अमित मानते हैं कि आज एक संगीतकार का किरदार हाल के वर्षों से बदल गया है। आज संगीतकार भी स्क्रिप्ट की तह तक जाते हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि उनक गीत कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करें ना कि दर्शकों को बीच में आरोपित से दिखें। उड़ान के गीत संगीत की रचना भी इसी तरह की गई है।

बस मेरी तो यही इच्छा है कि अमित अमिताभ की इस जोड़ी के कई और बेहतरीन गीत आने वाले वर्षों में आप तक पहुँचाने का मौका मिले

कहानी ख़त्म है, या शुरुआत होने को है
सुबह नयी है ये, या फिर रात होने को है
कहानी ख़त्म है, या शुरुआत होने को है
सुबह नयी है ये, या फिर रात होने को है
आने वाला वक़्त देगा पनाहें, या फिर से मिलेंगे दोराहे

मुझे तो लगता है कि इस युगल जोड़ी की कहानी शुरु हुई है वैसे आपको क्या लगता है?



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Thursday, February 03, 2011

वार्षिक संगीतमाला 2010 - पॉयदान संख्या 16 : तुम जो आये ज़िन्दगी में बात बन गयी...

वार्षिक संगीतमाला की सोलहवीं पॉयदान पर इस साल पहली बार तशरीफ ला रहे हैं जनाब राहत फतेह अली खाँ साहब। राहत ने इस साल की गीतमाला पर कितनी गहरी छाप छोड़ी है वो आप गीतमाला के सफ़र के आख़िर तक पहुँचते पहुँचते देख ही लेंगे। फिल्म पाप के गीत 'लगन लागी तुमसे मन की लगन' से मुंबईया फिल्मों में अपने गीतों का सफ़र शुरु करने वाले राहत आज अपनी बेमिसाल गायिकी के ज़रिए हर संगीतकार की पहली पसंद बन गए हैं। पर इस पसंद की वज़ह क्या है?

दरअसल सूफ़ी गायिकी में महारत रखने वाले राहत ने जब आपनी आवाज़ हिंदी फिल्मों में देनी शुरु की तभी संगीतकारों को समझ आ गया था कि इस सुरीली आवाज़ के ताने बाने में ऐसे गीत रचे जा सकते हैं जो तब तक मौज़ूद गायकों से नहीं गवाए जा सकते थे। आज हर संगीतकार गायिकी में उनकी आवाज़ के कमाल, लंबी पहुँच, ऊँचे सुरों की जबरदस्त पकड़ के हिसाब से गीत तैयार करता है। राहत उन गीतों में अपनी ओर से भी कुछ नवीनता लाते हैं। अलग अलग तरह से गाए एक ही गीत को संगीतकारों को वे भेज देते हैं और संगीतकार फिल्म की स्थितियों के हिसाब से उनमें से एक का चुनाव कर लेते हैं। अगर आपको सांगीतिक समझ रखने वाला इतना गुणी फ़नकार मिल जाए तो फिर आपको क्या चाहिए।

सोलहवीं पॉयदान पर फिल्म Once Upon a Time in Mumbai के गीत को गीतमाला के इस मुकाम तक पहुँचाने में भी राहत की गायिकी का बहुत बड़ा हाथ है। साथ ही संगीतकार प्रीतम की भी तारीफ करने होगी कि उन्होंने इस गीत में राहत की आवाज़ के साथ कोरस का बेहतरीन इस्तेमाल किया है।

पाया मैंने पाया तुम्हें
रब ने मिलाया तुम्हें
होंठों पे सजाया तुम्हें
नग्मे सा गाया तुम्हें
पाया मैंने पाया तुम्हें
सब से छुपाया तुम्हे
सपना बनाया तुम्हें
नींदों में बुलाया तुम्हें

कोरस की तेज रफ्तार और कर्णप्रिय गायिकी बस आपका मूड एकदम से मस्त कर देती है। विज्ञान के असफल विद्यार्थी से लेकर हिंदी कविता में डॉक्टरेट की उपाधि का सफ़र तय करने वाले इरशाद क़ामिल जब गीतकार होंगे तो ही इश्क़ में दिन को सोना और रात को चाँदी में तब्दील होने की सोच तो देखने को मिलेगी ही। राहत के लिए लिखे गए अंतरों में भी उनकी पंक्तियाँ सीधे दिल पर असर करती हैं। सहगायिका के रूप में राहत का साथ दिया है तुलसी कुमार ने। पर नवोदित गायिका के रूप में तुलसी ने भी राहत जैसे मँजे कलाकार के साथ गाते हुए अपना हिस्सा बड़े करीने से निभाया है। हाँ ये जरूर है कि अगर ये हिस्सा श्रेया घोषाल को दिया गया होता तो मुझे इस गीत को सुनने में शायद ज्यादा आनंद आया होता।

वैसे आप में से बहुतों को शायद मालूम ना हो कि तुलसी, टी सीरीज के मालिक स्वर्गीय गुलशन कुमार की सुपुत्री हैं। अपनी गायिकी का सफ़र उन्होंने भजन व भक्ति गीत से शुरु किया था। देखना है कि हिंदी फिल्म संगीत में उनका आगे का सफ़र कैसा रहता है। तो आइए गीत के बोलों के साथ आनंद लें राहत की अद्भुत गायिकी का



तुम जो आये ज़िन्दगी में बात बन गयी
इश्क़ मज़हब, इश्क़ मेरी ज़ात बन गयी

पाया मैंने पाया तुम्हें...

तुम जो आये ज़िन्दगी में बात बन गयी
सपने तेरी चाहतों के
सपने तेरी चाहतों के
सपने तेरी चाहतों के देखती हूँ अब कई
दिन है सोना और चाँदी रात बन गयी

पाया मैंने पाया तुम्हें...

चाहतों का मज़ा फासलों में नहीं
आ छुपा लूँ तुम्हें हौसलों में कहीं
सबसे ऊपर लिखा है तेरे नाम को
ख्वाहिशों से जुड़े सिलसिलों में कहीं

ख्वाहिशें मिलने की तुमसे
ख्वाहिशें मिलने की तुमसे रोज़ होती है नयी
मेरे दिल की जीत मेरी बात बन गयी
हो तुम जो आये ज़िन्दगी में बात बन गयी

पाया मैंने पाया तुम्हें, रब ने मिलाया तुम्हें

ज़िन्दगी बेवफा है ये माना मगर
छोड़ कर राह में जाओगे तुम अगर
छीन लाऊँगा मैं आसमान से तुम्हे
सूना होगा न ये दो दिलों का नगर

रौनके हैं दिल के दर पे
रौनके हैं दिल के दर पे धड़कने हैं सुरमई
मेरी किस्मत भी तुम्हारी साथ बन गयी
हो तुम जो आये ज़िन्दगी में बात बन गयी
इश्क मज़हब, इश्क मेरी ज़ात बन गयी
सपने तेरी चाहतों के...बन गयी
पाया मैंने पाया तुम्हें...


सोलहवी पॉयदान के साथ इस गीतमाला का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव समाप्त हो रहा है। बस इतना कहना चाहूँगा कि इसके ऊपर आने वाले पन्द्रहों गीत किसी ना किसी दृष्टि से विलक्षण है। मुझे यकीन है कि इन पन्द्रह गीतों में हर एक के साथ एक शाम क्या आपका पूरा हफ्ता गुजर सकता है तो बने रहिए गीतमाला के आने वाले इन नगीनों के साथ...

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