Thursday, February 09, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 7 : कोई दिल बेकाबू कर गया और इश्काँ दिल में भर गया...

संत वैलेंटाइन के मजे ही मजे हैं। पहले उनका ज़लवा साल में एक दिन देखने को मिलता था अब दुनिया के आशिक़ पूरे हफ्ते उनकी चरण वंदना कर ही नित्य नए कृत्यों (rose, propose, hug....) को अंज़ाम देने निकल पड़ते हैं। ख़ैर संत का आशीर्वाद आपके प्रेम के मार्ग को प्रशस्त कर पाया या नहीं ये तो अगले हफ़्ते ही आपको पता चलेगा। हाँ, मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि इस प्रेम पर्व पर आपको एक ऐसा खुशनुमा नग्मा सुनवाऊँ जो प्रेम के प्रथम अंकुर फूटने के अहसास को बखूबी श्रोताओं तक पहुँचाता है। जी हाँ आपने सही पहचाना वार्षिक संगीतमाला की सातवीं पॉयदान का गीत है फिल्म 'मौसम' का। इस गीत के बोल लिखे इरशाद क़ामिल ने, धुन बनाई प्रीतम ने और इस गीत को गवाया गया दो अलग अलग गायकों शाहिद मलया और राहत साहब से।



पंजाब के गाँवों में पनपती इस पहले प्यार की खुशबू को बड़े क़रीने से समेटा है क़ामिल ने अपने सहज पर असरदार बोलों में। किसी की एक उड़ती सी नज़र और इधर हमारे नायक का दिल धाराशायी। उन आँखों का दिल पे अक़्स लिए बेचारा बेचैन फिरता है नायिका की एक अदद झलक पाने के लिए। इरशाद क़ामिल आँखों की इस लुका छुपी को 'तकनी' का नाम देते हैं। पहले अंतरे में नायक के दिल का हाल बताने के बाद गीतकार दूसरे अंतरे में नायिका की सुंदरता को प्राकृतिक बिंबों में बड़ी खूबसूरती से बाँधते हैं। 


रही प्रीतम के मोहक संगीत की बात तो मुखड़े के पहले गिटार पर आधारित धुन बड़ी आसानी से श्रोता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। दूसरे अंतरे के बाद बाँसुरी की धुन भी सुनने में अच्छी लगती है। यूँ तो प्रीतम ने इस गीत को नवोदित गायक शाहिद और राहत से गवाया पर एक नई सी आवाज़ के रूप में मुझे शाहिद मलया का गाया हुआ वर्सन दिल के ज्यादा करीब लगता है।

बतौर गायक शाहिद का नाम आपके लिए नया जरूर होगा।शाहिद के पिता रफ़ी साहब के जबरदस्त प्रशंसक थे और ख़ुद भी गायक बनने की तमन्ना रखते थे। वो तो अपनी हसरत पूरी नहीं कर पाए पर शाहिद को उन्होंने ख़ुद संगीत की शिक्षा दी। वैसे शाहिद मलया को फिल्मों में गाने का मौका अपने गीतकार मित्र कुमार के ज़रिए मिला। कुमार ने ना केवल शाहिद की भेंट प्रीतम से करवाई बल्कि उन्हें इस फिल्म के दो गीतों को गाने का मौका भी दिलवाया। शाहिद की इस अलग सी आवाज़ का इस्तेमाल बाकी संगीतकार किस तरह करते हैं ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। चलिए प्रेम के रंग से रँगे इस गीत को सुनते हैं।

कोई दिल बेकाबू कर गया
और इश्काँ दिल में भर गया
आँखों-आँखों में वो लाखों गल्लां कर गया ओए
ओ रब्बा मैं तो मर गया ओए
शैदाई मुझे कर गया ओए
ओ रब्बा मैं तो मर गया ओए
शैदाई मुझे कर गया कर गया ओए

अब दिल चाहे ख़ामोशी के होठों पे मैं लिख दूँ
प्यारी सी बातें कई
कुछ पल मेरे नाम करे वो, मैं भी उसके नाम पे
लिखूँ मुलाकातें कई
पहली ही तकनी में बन गयी जान पे
नैणा-वैणा उसके मेरे दिल पे छपे
अब जाऊँ कहाँ पे, दिल रुका है वहाँ पे
जहाँ देख के मुझे वो आगे बढ़ गया ओए
ओ रब्बा मैं तो...

मौसम के आज़ाद परिंदे, हाथों में है उसके
या वो बहारों सी है
सर्दी की वो धूप के जैसी, गर्मी की शाम है
पहली फुहारों सी है
मेरे प्यार का मौसम भी है, लगे मेरी महरम भी है.
जाने क्या क्या दो आँखों में मैं पढ़ गया ओए रब्बा मैं तो..


चलते चलते मैं तारीफ़ करना चाहूँगा निर्देशक पंकज कपूर की जिन्होंने इस गीत का इतना खूबसूरत फिल्मांकन किया है मानो  पर्दे पर प्रेम की वैतरणी बह रही हो। सोनम और शाहिद कपूर पर फिल्माए गए इस गीत को देखना ना भूलें...शायद उसे देखकर आप भी अपने उस छोटे से गाँव या कस्बे की यादों में खो जाएँ..



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7 comments:

प्रवीण पाण्डेय on February 09, 2012 said...

यह गाना सुनकर आनन्द आ जाता है।

Prashant .. on February 09, 2012 said...

वाकई....

Sonal Rastogi on February 09, 2012 said...

aapki ye geetmala padhne mein bahut rochak hai ...good job

Amita Maurya on February 09, 2012 said...

lovely song .... but Manish G , evryone says spread love so now evrybody spreading love for a week .... :))

Mrityunjay Kumar Rai on February 09, 2012 said...

सुंदर गीत

Deepak Shukla said...

Manish,

I live in NY and your blog, for me, is one way to connect with my home.
Love your song selection.

Deepak

Manish Kumar on February 17, 2012 said...

शु्क्रिया प्रवीण, सोनल, अमिता , मृत्युंजय, प्रशांत इस गीत को पसंद करने का..

दीपक जान कर अच्छा कि मेरी ये गीतमाला आपको अपने देश से जुड़ने का एक माध्यम बन रही है।

 

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