Monday, August 27, 2012

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अँधियारा है...

कभी कभी बेहद पुरानी यादें अचानक ही मस्तिष्क की बंद पड़ी काल कोठरियों से बाहर आ जाती हैं। टीवी पर एक कार्यक्रम देख रहा था जिससे पता चला कि आज मुकेश 36 वीं पुण्य तिथि है और एकदम से वो काला दिन मेरी आँखों के सामने घूम गया। 

शायद मैं स्कूल से लौट कर आया था। पता नहीं किस वज़ह से छुट्टी कुछ जल्दी हो गई थी। कपड़े बदलकर पहला काम तब रेडिओ आन करना ही होता था। विविध भारती पर फिल्म धर्म कर्म से लिया  और मुकेश का गाया नग्मा इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल आ रहा था। वो उस वक़्त का मेरा पसंदीदा गीत हुआ करता था। गाने के बाद उद्घोषिका द्वारा ये बताना कि  हम मुकेश के गाए गीत इसलिए सुना रहे हैं क्यूँकि आज ही अमेरिका में उनका निधन हो गया है मुझे विस्मित कर गया था। बचपन के उन दिनों में बस इतना समझ आता था कि ये खबर, बड़ी खबर है और जल्द ही इसका प्रसारण दौड़कर घर के कोने कोने में कर देना चाहिए। मैंने भी यही किया था और सब के चेहरे पर विषाद की रेखाओं को उभरता देख मन कुछ दुखी अवश्य हो गया था। इस बात को तीन दशक से ऊपर हो गए हैं  पर इन गुजरते वर्षों में मुकेश के गाए गीतों की स्मृतियाँ दिन पर दिन प्रगाढ़ ही होती गयी हैं। 


मुकेश को तकनीकी दृष्टि से बतौर गायक भले ही संगीतकारों ने अव्वल दर्जे पर नहीं रखा पर उनकी आवाज़ की तासीर कुछ ऍसी थी जो सीधे आम लोगों के  दिल में जगह बना लेती थी। दर्द भरे नग्मों को गाने का उनका अंदाज़ अलहदा था। शायद ही उस ज़माने में कोई घर ऐसा रहा होगा जहाँ मुकेश के उदास करने वाले गीतों का कैसेट ना  हो। आज  मुझे ऐसे ही एक गीत की याद आ रही है जिसे संगीतकार शंकर जयकिशन ने 1967 में फिल्म रात और दिन के लिए रचा था। गीत के बोल लिखे थे हसरत जयपुरी ने।

मुकेश, हसरत जयपुरी, शंकर व जयकिशन की चौकड़ी ने ना जाने कितने ही मधुर गीतों को रचा होगा। पर ये जान कर आश्चर्य होता है कि ये सारे कलाकार कितनी मामूली ज़िंदगियों से निकलकर संगीत के क्षेत्र में उन ऊँचाइयों तक पहुँचे जिसकी कल्पना उन्होंने अपने आरंभिक जीवन में कभी नहीं की होगी।   

अब हसरत साहब को ही लें। स्कूल से आगे कभी नहीं पढ़ पाए। क्या आप सोच सकते हैं कि मुंबई आकर उन्होंने अपनी जीविका चलाने के लिए क्या किया होगा? सच तो ये है कि जयपुर का ये शायर मुंबई के शुरुआती दिनों में बस कंडक्टरी कर अपना गुजारा चलाता था। ये जरूर था कि मुफ़लिसी के उस दौर में भी उन्होंने मुशायरों में शिरक़त करना नहीं छोड़ा और यहीं पृथ्वी राज कपूर ने उन्हें सुना और राजकपूर से उनके नाम की सिफारिश की। 

हसरत  जयपुरी की तरह ही शंकर जयकिशन का मुंबई का सफ़र संघर्षमय रहा। शंकर हैदराबाद में छोटे मोटे कार्यक्रमों में तबला बजाते थे तो गुजरात के जयकिशन हारमोनियम में प्रवीण थे। इनकी मुलाकात और फिर पृथ्वी थियेटर में काम पाने के किस्से कोतो मैं पहले ही आपसे साझा कर चुका हूँ। दस बच्चों के परिवार में पले बढ़े मुकेश ने भी दसवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया था। छोटी मोटी सरकारी नौकरी मिली तो साथ में शौकिया गायन भी करते रहे। बहन की शादी में यूँ ही गा रहे थे कि अभिनेता मोतीलाल (जो उनके रिश्तेदार भी थे) की नज़र उन पर पड़ी और वो उन्हें मुंबई ले आए। इससे ये बात तो साफ हो जाती है कि अगर आपमें हुनर और इच्छा शक्ति है तो परवरदिगार आपको आगे का रास्ता दिखाने के लिए मौका जरूर देते हैं और इन कलाकारों ने उन मौकों का पूरा फ़ायदा उठाते हुए फिल्म संगीत जगत में अपनी अमिट पहचान बना ली।

तो लौटते हैं रात और दिन के इस गीत पर।  गीत का मुखड़ा हो या कोई भी अंतरा , हसरत कितने सहज शब्दों में नायक की व्यथा को व्यक्त कर देते हैं और फिर मुकेश की आवाज़ ऐसे गीतों के लिए ही बनी जान पड़ती है।   आप इस गीत को सुनकर क्या महसूस करते हैं ये तो मैं नहीं जानता पर रात और दिन के इस गीत को मैं जब भी सुनता हूँ पता नहीं क्यूँ बिना बात के आँखे नम हो जाती हैं। गीत का नैराश्य मुझे भी शायद अपने मूड में जकड़ लेता है। मन अनमना सा हो जाता है।



रात और दिन दीया जले
मेरे मन में, फिर भी अँधियारा है
जाने कहाँ, है वो साथी
तू जो मिले जीवन उजियारा है
रात और दिन.....

पग-पग मन मेरा ठोकर खाए
चाँद सूरज भी राह न दिखाए
ऐसा उजाला कोई मन में समाए
जिससे पिया का दर्शन मिल जाए
रात और दिन.....

गहरा ये भेद कोई मुझको बताए
किसने किया है मुझ पर अन्याय
जिसका हो दीप वो सुख नहीं पाए
ज्योत दीये की दूजे घर को सजाए
रात और दिन....

खुद नहीं जानूँ, ढूँढे किसको नज़र
कौन दिशा है मेरे मन की डगर
कितना अजब ये दिल का सफ़र
नदिया में आए जाए, जैसे लहर

Friday, August 17, 2012

विभाजन की विरह गाथा कहता जावेद का ख़त हुस्ना के नाम : पीयूष मिश्रा

याद है आपको 2009 की वार्षिक संगीतमाला जब इस ब्लॉग पर पीयूष मिश्रा की चर्चा गुलाल के लिखे गीतो के लिए बार बार  हुई थी। गुलाल के बाद फिल्मों में उनके लिखे और गाए गीतों को सुनने के लिए दिल तरस गया था। वैसे बतौर अभिनेता वो लाहौर, लफंगे परिंदे,तेरे बिन लादेन,भिंडी बाजार व रॉकस्टार जैसी फिल्मों में दिखते रहे। पर एक संगीतप्रेमी के लिए असली आनंद तो तब है जब उनके खुद के लिखे नग्मे को उनकी आवाज़ में सुन सकें। और लगभग ढाई साल के इस लंबे इंतज़ार के बाद जब उनकी आवाज़ कान के पर्दों से छनती दिल की दरो दीवार से टकराई तो यकीन मानिए उन्होंने जरा भी निराश नहीं किया। 


जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ 'हुस्ना' की जिसे हाल ही में कोक स्टूडिओ के सीज़न दो में प्रस्तुत किया गया था। पीयूष ने हुस्ना को 1995 में लिखा था। कोक स्टूडिओ में इस गीत के संगीत संयोजक हीतेश सोनिक ने ये गीत यार दोस्तों की एक महफिल में 1997 में सुना और तभी से ये गीत उनके ख़्यालों में रच बस गया। हीतेश कहते हैं कि जब पीयूष कोई गीत गाते हैं तो उनके गाए हर एक शब्द के माएने यूँ सामने निकल कर आते हैं। उनकी आवाज़ में एक ग़ज़ब का सम्मोहन है।

सच ये सम्मोहन ही तो हमें उनकी आवाज़ को बार बार सुनने को मजबूर करता है। गीतों के जरिए किसी कहानी को कहना अब तक बहुत कम हुआ है और इस कला में पीयूष जैसी प्रवीणता शायद ही संगीत जगत में अन्यत्र कहीं दिखाई देती है। इससे पहले कि ये गीत सुना जाए ये जानना जरूरी होगा कि आख़िर हुस्ना की पृष्ठभूमि क्या है? कौन थी हुस्ना और इस गीत में कौन उसकी याद में  इतना विकल हो रहा है? पीयूष का इस बारे में कहना है
हुस्ना एक अविवाहित लड़की का नाम है जो वैसी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती है जिनकी जिंदगियाँ देश के विभाजन की वज़ह से तबाह हो गई थीं। बात 1947 की है। जावेद और हुस्ना लाहौर में शादी के बंधन में बँधने वाले थे। पर विभाजन ने उनका सपना तोड़ दिया। विभाजन के बाद जावेद लखनऊ आ गया जबकि हुस्ना लाहौर में ही रह गई। 1960 में जावेद की शादी हो गई और फिर वो दो बच्चों का पिता भी बन गया।  ऐसे ही हालातों में जावेद, हुस्ना को एक ख़त लिखता है और जानना चाहता है कि क्या परिवर्तन हुआ नए पाकिस्तान में? क्या मिला हमें हिंदुस्तान और पाकिस्तान बनाकर? देश को दो सरहदों में बाँटकर क्या हम कुछ नया मुकाम हासिल कर सके?
पीयूष जी ने कभी हुस्ना को नहीं देखा। ना वो लाहौर के गली कूचों से वाकिफ़ हैं। पर उनका पाकिस्तान उनके दिमाग में बसता है और उसी को उन्होंने शब्दों का ये जामा पहनाया है। गीत की शुरुआत में  पीयूष द्वारा 'पहुँचे' शब्द का इस्तेमाल तुरंत उस ज़माने की याद दिला देता है जब चिट्ठियाँ इसी तरह आरंभ की जाती थीं। पुरानी यादों को पीयूष, दर्द में डूबी अपनी गहरी आवाज़ में जिस तरह हमारे साझे रिवाज़ों, त्योहारों, नग्मों के माध्यम से व्यक्त करते हैं मन अंदर से भींगता चला जाता है। जावेद की पीड़ा सिर्फ उसकी नहीं रह जाती हम सबकी हो जाती है।

 
लाहौर के उस, पहले जिले के
दो परगना में पहुँचे
रेशम गली की, दूजे कूचे के
चौथे मकाँ में पहुँचे
और कहते हैं जिसको
दूजा मुलुक उस, पाकिस्तां में पहुँचे...
लिखता हूँ ख़त मैं
हिंदुस्तान से, पहलू ए हुस्ना में पहुँचे
ओ हुस्ना...

मैं तो हूँ बैठा ओ हुस्ना मेरी
यादों पुरानी में खोया..
पल पल को गिनता, पल पल को चुनता
बीती कहानी में खोया..
पत्ते जब झड़ते हिंदोस्तान में, यादें तुम्हारी ये बोलें
होता उजाला, हिंदोस्तान में बातें तुम्हारी ये बोलें
ओ हुस्ना मेरी ये तो बता दो
होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में
रहती हो नन्ही कबूतर सी गुम तुम जहाँ
ओ हुस्ना....

पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में
वैसे ही जैसे झड़ते यहाँ
ओ हुस्ना....
होता उजाला क्या वैसा ही है
जैसा होता हिंदोस्तान में हाँ..
ओ हुस्ना....

वो हीरों के राँझे के नग्मे मुझको
अब तक आ आके सताएँ
वो बुल्ले शाह की तकरीरों में
झीने झीने साए
वो ईद की ईदी, लंबी नमाज़ें
सेवइयों की ये झालर
वो दीवाली के दीये संग में
बैसाखी के बादल
होली की वो लकड़ी जिनमें
संग संग आँच लगाई
लोहड़ी का वो धुआँ
जिसमें धड़कन है सुलगाई
ओ हुस्ना मेरी ये तो बता दो
लोहड़ी का धुआँ क्या अब भी निकलता है
जैसा निकलता था उस दौर में वहाँ
ओ हुस्ना....
 

हीतेश सोनिक ने गीत के आरंभिक भाग में नाममात्र का संगीत दिया है। वैस भी पीयूष की आवाज़ के सामने जितना कम संगीत रहे गाना उतना ही ज्यादा कर्णप्रिय लगता है। संगीत की पहली स्वर लहरी तीन मिनट और दस सेकेंड के बाद उभरती है जो पुरानी यादों में डूबे मन को सहलाती हुई निकल जाती है। 

जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है जावेद के दिल के अंदर बढ़ती बैचैनी और हताशा के साथ साथ संगीत और मुखर हो उठता है। गीत के आखिरे हिस्से में इस हताशा को अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचाने के लिए संगीत का टेंपो एकदम से बदल जाता है और उसके बीच निकलता है एक कोरस जो जीवन में बढ़ते अंधकार की ओर इशारा भर करता है।

धुएँ में गुलिस्ताँ ये बर्बाद हो रहा है
इक रंग स्याह काला ईजाद हो रहा है
धुएँ में गुलिस्ताँ ये बर्बाद हो रहा है
इक रंग स्याह काला ईजाद हो रहा है


और आखिर की पंक्तियाँ मानो सब कुछ कह जाती हैं..

कि हीरों के राँझों के
के नग्मे क्या अब भी
सुने जाते हैं वहाँ
ओ हुस्ना
और रोता है रातों में
पाकिस्तान क्या वैसे ही
जैसे हिंदोस्तां ओ हुस्ना


 एक शाम मेरे नाम पर पीयूष मिश्रा

Saturday, August 11, 2012

बोले तो बाँसुरी कहीं बजती सुनाई दे..

राजश्री प्रोडक्सन्स.. सत्तर के उत्तरार्ध में रेडिओ पर किसी नई फिल्म के प्रचार के लिए आने वाले कार्यक्रम में जब ये नाम सुनाई देता था तो तीन बातें शर्तियाँ होती थीं। पहली तो ये कि फिल्म का संगीत मधुर होगा, दूसरी ये कि फिल्म पारिवारिक होगी और सबसे महत्त्वपूर्ण ये कि पिताजी अवश्य हमें वो फिल्म दिखाने ले जाएँगे। बचपन के उन दिनों में हमने अँखियों के झरोखे से, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, सावन को आने दो और नदिया के पार जैसी फिल्में सपरिवार सिनेमा हॉल में देखीं और जहाँ तक मुझे याद है हम सभी भाई बहनों को फिल्म की कहानी और गीत बड़े भले लगे थे।

जहाँ तक "सावन को आने दो"  की बात है 1979 में प्रदर्शित इस फिल्म के गीतों ने उस वक़्त एक जादू सा कर दिया था। उस छोटी उम्र में भी चाँद जैसे चेहरे पे बिंदिया सितारा और तुझे गीतों में ढालूँगा, तेरे बिना सूना मोरे मन का मंदिर आ रे आ जैसे गीत होठों पर रच बस गए थे। बोलों से ज्यादा शायद उस वक़्त गीत का माधुर्य और येसूदास की आवाज़ दिल पर असर करती थी। इसलिए उसी फिल्म का ये गीत बोले तो बाँसुरी .. उस वक़्त मन पर अंकित नहीं हुआ और करीब एक दशक बाद मेरी पसंदीदा गीतों की फेरहिस्त में शामिल हो सका।

सावन को आने दो फिल्म का संगीत निर्देशन संगीतकार राजकमल ने किया था। बचपन में ही तबला वादन में निपुणता हासिल कर चुके राजकमल अपनी धुनों और वाद्य वादन से अपने कार्यक्रमों में श्रोताओं को मुग्ध करते रहते थे।। राजकमल को शास्त्रीय और लोक संगीत दोनों के बारे में अच्छी जानकारी थी। सावन के आने दो के विभिन्न गीतों में उनकी ये पकड़ साफ झलकती है। इन्हीं खूबियों के चलते आखिरकार ताराचंद जी ने उन्हें राजश्री प्रोडक्सन्स की इस फिल्म में काम करने का मौका दिया। अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर मैं ये कहूँ कि संगीतकार राजकुमार के तीन दशकों के फिल्मी कैरियर में सावन को आने दो सफलता के मापदंडों में शिखर पर रही। वैसे चश्मेबद्दूर और महाभारत टीवी सीरियल में भी राजकमल का काम बेहद सराहा गया।

अब इस गीत की बात करें जिसे राजकमल जी ने राग केदार  पर आधारित किया था जो कि रात्रि के प्रथम प्रहर में गाया जाने वाला राग है। भगवान शिव के नाम से जन्मे कल्याण थाट के इस राग से कई मधुर हिंदी गीतों की रचना हुई है और बोले तो बाँसुरी... उन सब में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। मुखड़े में येशुदास का आलाप तबले और बाँसुरी की संगत के साथ उभरता है। राजकमल जी ने इस गीत में द्रुत गति के इंटरल्यूड्स के साथ सितार और जलतरंग का खूबसूरत मिश्रण किया है और फिर वहाँ बाँसुरी की स्वरलहरी साथ है ही। और आखिर क्यूँ ना हो ये गीत बाँसुरी की बात से ही तो शुरु होता है।

संगीतकार राजकमल जी के तो कई और मधुर गीत आपने सुने होंगे पर शायद आप इस गीत के गीतकार के बारे में ऐसा नहीं कह पाएँगे। इस गीत के गीतकार हैं पूरन कुमार 'होश' । मुझे याद नहीं पड़ता कि इस गीत के आलावा पूरन जी का नाम किसी और गीत के क्रेडिट्स में आया है। पर अपने इस इकलौते गीत में पूरन अपने लाजवाब रूपकों से वो कमाल दिखला गए हैं जो कई गीतकार सैकड़ों गीतों को लिखकर भी नहीं कर पाते।

मुखड़े को ही लीजिए....  कितना प्यारी आवाज़ होगी उसकी जो बाँसुरी की धुन सी मीठी हो और शायद नायिका के पवित्र हृदय और श्याम वर्ण (ज़रीना वहाब इस फिल्म की नायिका थीं वैसे ये गीत रीता भादुड़ी पर फिल्माया गया है) को देखकर गीतकार ने कृष्ण के मंदिर जैसे बिंब की कल्पना की होगी।


बोले तो बाँसुरी कहीं बजती सुनाई दे..

बोले तो बाँसुरी कहीं बजती सुनाई दे
ऐसा बदन कि कृष्ण का मन्दिर दिखाई दे
बोले तो बाँसुरी कहीं..

इस गीत का पहला और आखिरी अंतरा मुझे बेहद प्रिय है। गीतों में ऍसी कविता जब पढ़ने को मिलती है तो मन गदगद हो उठता है। चेहरे की भाव भंगिमाओं में जिंदगी का गान अनुभव करने की सोच हो या फिर आँखों में तैरती परछाई की तुलना पानी को शीतलता भरी चमक देने वाले उस बर्फ के टुकड़े से की गई हो.. गीतकार की इन कल्पनाओं में डूबते हुए मन मंत्रमुग्ध सा हो जाता है।

चेहरा तमाम नग्मयी आँखें तमाम लय
देखूँ उसे तो ज़िंदगी गाती दिखाई दे
बोले तो बाँसुरी कहीं....

वो बोलता बदन है घटाओं के भेस में
बूँदों में उसका लहजा खनकता सुनाई दे
बोले तो बाँसुरी कहीं

तैरे हैं यूँ निगाह में परछाई आपकी
पानी में जैसे बर्फ़ का टुकड़ा दिखाई दे
बोले तो बाँसुरी कहीं ...

काश पूरन जी को कुछ मौके और मिले होते। ख़ैर अभी तो आप इस गीत का आनंद लें




 

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