Monday, March 26, 2012

'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए 6 साल : आज की शाम आपके नाम !

आज मेरे ब्लॉग एक शाम मेरे नाम का छठा जन्मदिन है। गुजरे छः सालों में अपने चिट्ठे के माध्यम से मैंने वैसे लोगों का सानिध्य व प्रेम पाया है जो बगैर ब्लागिंग किए बिना मुश्किल था। सच कहूँ तो आज भी ये सिलसिला ज़ारी है। 

ये आपका प्रेम ही है कि विगत छः सालों में इस ब्लॉग के पृष्ठ पलटने की संख्या (Page loads) साढ़े चार लाख और इसे ई मेल से पढ़ने वालों की संख्या 900 के करीब पहुँच गई है वो भी तब जबकि मेरे लेखन की आवृति पिछले सालों से कम हुई है।


मैं इसके लिए अपने मित्रों और इस चिट्ठे को अलग अलग ज़रिए ( e-mail, Networked Blogs, Facebook Page, Google Friend Connect) से अनुसरण करने वाले तमाम जाने अनजाने चेहरों को हार्दिक धन्यवाद देना चाहता हूँ और आशा करता हूँ कि उनका साथ भविष्य में भी बना रहेगा।

अब वर्षगाँठ मनानी है तो कुछ अलग होना चाहिए ना हमेशा के ढर्रे से तो आइए देखें कि गुजरे साल इस चिट्ठे पर संगीत और साहित्य का ये सफ़र कैसा रहा आपकी नज़रों में..

नए पुराने गीतों की बात करते हुए जब मैं आपसे उस गीत से जुड़ी यादें पढ़ता हूँ तो बेहद आनंद आता है। चर्चा हो रही थी हिंदी गीतों में आपसी नोंक झोंक की। गीत था ठहरिए होश में आ लूँ तो चले जाइएगा। साथी चिट्ठाकार कंचन सिंह चौहान का कहना था
"ये गीत कॉलेज में खूब गाया गया है। गीत एक लड़की और ऊँहु बीच में कोई भी या सब के सब....!! वैसे प्रेमिका की उलाहना और प्रेमी के कूल रिएक्शन पर इसी फिल्म का एक गीत "तुमको होती मोहब्बत जो हमसे, तुम ये दीवानापन छोड़ देते" की वार्ता व्यक्तिगत रूप से मुझे और अधिक पसंद है।"
वहीं गुलज़ार के लिखे नग्मे पूछे जो कोई मेरी निशानी रंग हया लिखना पर फेसबुक मित्र शैली शर्मा का कहना था
"वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे" ये गीत कई बार सुना था पर इस पक्ति पर आज पहली बार आपका लेख पढ़कर गौर किया....... और याद आ गया कि आज भी हर हिन्दुस्तानी के दिल में कही न कही ये सपना है कि कश्मीर फिर से धरती का स्वर्ग बन जाए...."
पिछले साल जगजीत सिंह की गायी ग़ज़लों के आरंभिक दौर पर विस्तार से चर्चा की थी। हिंदी ब्लॉग जगत के मेरे पसंदीदा शायरों में से एक दानिश भाई का कहना था.. 
"पुरानी यादों का फिर से ताज़ा हो जाना....मानो लफ्ज़ लफ्ज़ में धडकनों का महसूस होने लगना, बड़ा एहसान फरमाया आपने जनाब !! "
वहीं हिमांशु ने कहा."बाद मुद्दत यहाँ आना, और अपने प्रिय गायक जगजीत को सुनना, उनके बारे में पढ़ना अद्भुत अनुभव है ! आपकी लिखावट की कारीगरी देखते बनती है, जब आप गम्भीर गायकों/गायकी को अपनी रोचक लेखनी के सुन्दर संतुलन से सहज बना कर प्रस्तुत कर रहे होते हैं .."
जगजीत जी की पुरानी ग़ज़लों पर अपनी लेखमाला मैंने पूरी भी नहीं की थी कि वे हमारा साथ छोड़ कर चले गए। मेरी कोशिश रहेगी अपनी यादों से जुड़े उनके बाकी एलबमों को भी आपके सामने इस साल प्रस्तुत करूँ।
शम्मी कपूर ने भी पिछले साल हमारा साथ छोड़ा दिया। श्रद्धंजलि स्वरूप मैंने मोहम्मद रफ़ी के साथ उनके फिल्मी सफ़र के चंद रोचक लमहे आपके साथ बाँटे। साथी चिट्ठाकार रंजना जी ने लिखा
"काफी समय तक शम्मी जी के लटके झटके से मुझे भी खासी अरुचि रही...पर बाद में जब उनके व्यक्तित्व के विषय में जाना कि वे कितने नेकदिल इंसान हैं, तो उन्हें गंभीरता से लेने लगी..बड़ी तफ़सील में जानकारी दी आपने युगल जोड़ी की...बड़ा ही अच्छा लगा...सच है, जैसे मुकेश जी ने राज कपूर जी की शोहरत चमकाई ,वैसे ही मुहम्मद रफ़ी जी ने शम्मी जी की. गंभीर और शर्मीले स्वभाव के रफ़ी साहब ने शम्मी जी का चुहलपन कैसे ओढा होगा,सचमुच काबिले तारीफ़ है..."
हिंदी ग़ज़ल के लोकप्रिय स्तंभ अदम गोंडवी लंबी बीमारी के बाद चल बसे। उनकी कविता मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको की प्रस्तुति पर साथी चिट्ठाकार डा. सोनरूपा विशाल का कहना था..
"सामाजिक सरोकारों के कवि ,आम जन की आवाज ,विडंवनाओं के धुर विरोधी अदम जी जैसे कवि विरले ही होते हैं जो सम्मान के लिए नहीं समाज के लिए लिखते हैं ! दुखद अवसान !"
फिल्म और साहित्यिक विभूतियों के आलावा कुछ साथी चिट्ठाकार भी हमारा साथ छोड़ गए। डा. अमर कुमार को उनकी ईमानदार टिप्पणियों के लिए पूरे ब्लॉग जगत में जाना जाता था। इब्नें इंशा से जुड़ी एक नज़्म पर दिए उनके विचार इस चिट्ठे पर उनके अंतिम हस्ताक्षर थे..
आज दिल में वीरानी, अब्र बन के घिर आयी
आज दिल को क्या कहिये, बावफ़ा न हरज़ाई

"अपने ललित लेख और व्यंग्य संकलन "उर्दू की आख़िरी किताब" में इंशा ने इसे स्वीकार भी किया है.. पर वज़ह को लेकर नामालूम की अदा ओढ़ ली ।यह लाइनें बहुत उदास कर जाती हैं। इस दुर्लभ रचना से आज की प्रस्तुति विशिष्ट बन गयी है ।"
पिछले साल भी पुस्तकों पर चर्चा चली। सागर ने मुन्नवर राणा की किताब घर अकेला हो गया के बारे में कहा
"मुनव्वर राणा की एक सी डी मेरे पास है पठानकोट में मुशायरे की, इतवार को सुनता हूँ.. घर को वो अनोखे अंदाज़ से याद करते हैं और माँ तो फेमस है ही. यहाँ लिखे सारे शेर उसमें उनके मुंह से सुनना राहत देता है, कई बार वो शेर पढ़ते पढ़ते रोने लगते हैं और उनका हाथ क्षितिज की ओर उठता है."
वहीं विभा को वरुण के बेटे को आंचलिक ऊपन्यास करार देने पर ऐतराज था..
"सुंदर समीक्षा. बाबा ने अपने मिथिला इलाके का जीवन चित्र खींचा है तो जाहिर है कि वहां की भाषा की गंध आएगी ही. मगर इसका यह मतलब नहीं कि उनके लेखन को आंचलिक लेखन के खाते में डाल दिया जाए. एक समय था, जब तथाकथित मुख्य धारा के हिंदी लेखकों ने अपनी राजनीति और अपने वर्चस्व के लिए फणीश्वर नाथ रेणु जैसे साहित्यकर को आंचलिकता के खाते में डाल दिया था. जो जिस प्रदेश की पृष्ठभूमि पर लिखेगा, उसकी लेखनी में वह भाषा बोली, संस्कृति आयेगी ही, यही सच्चे लेखक की ईमानदारी भी है. बाबा या रेणु आंचलिक नहीं पूरे देश के कथाकार हैं."
हमेशा की तरह इस चिट्ठे पर नए साल की शुरुआत हुई वार्षिक संगीतमाला के साथ और इस बार मैंने सीधे गीतकारों से बातें कर उन गीतों की तह तक पहुँचने का प्रयास किया। राजशेखर, सीमा सैनी और पंक्षी जालौनवी से बात कर लगा ही नहीं कि मैं किसी से पहली बार बात कर रहा हूँ। पंक्षी जालोनवी से जुड़ी पोस्ट पर बेहद पुख्ता टिप्पणी रही अपूर्व श्रीवास्तव की जब उन्होंने कहा..
"शुक्रिया...जालौनवी साहब के बारे मे जानना अच्छा लगा..अपनी म्यूजिक इंडस्ट्री की बिडम्बना मुझे लगती है कि गीतकार को कोई पहचान कोई हाइलाइट जल्द नही मिलती..जब तक कि वो खुद गुलजार या प्रसून जैसा सेलिब्रिटी ना हो जाये..सो कुछ अच्छे बोल भी सिंगर को कम्पोजर, ऐक्टर को ज्यादा फ़ायदा पहुचाते हैं बनिस्बत कि उन्हे लिखने वाले के.गीतकारों के लिये इंडियन-आइडल जैसे स्टेजेज भी नही होते ग्लैमर का इस्तकबाल करने के लिये...नये और अच्छे गीतकारों के बारे मे लोगों को और भी ज्यादा पता चलना चाहिये.."
विशाल के संगीतबद्ध गीत बेकराँ से जुड़ी पोस्ट पर डा. अनुराग आर्य का कहना था
"विशाल इन लफ्जों की रूह को समझते है , इनकी उदासियो को भी , ओर गुलज़ार को भी ....दरअसल शायर से मुतासिर हुए बगैर अच्छा कम्पोज़ करना मुश्किल काम है .सच कहूँ तो आर डी के बाद अगर किसी ने गुलज़ार को "पूरा "समझा है तो वो विशाल ही है ....बेकराँ मुझे बेहद अज़ीज़ है....विशाल की आवाज को बहुत सूट करता है , विशाल जानते है रहमान की तरह उन्हें कहाँ ओर कब गाना है।"
गीतकार स्वानंद किरकिरे जो मेरे फेसबुक मित्र भी हैं  ने ये साली ज़िंदगी के अपने लिखे गीत को संगीतमाला में पाकर टिप्पणी की उफ्फ ये गाना जिंदा है ?

इस चिट्ठे की पुरानी पाठिका मृदुला तांबे ने कुन फ़ाया कुन की इन पंक्तियों जब कहीं पे कुछ भी नहीं था वही था को इस श्लोक से जोड़कर देखा
"नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत|
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम ||

सृष्टि से पहले सत नहीं था। असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था।  छिपा था क्या, कहाँ किसने ढका था उस पल तो अगम अतल जल भी कहां था |"
संगीतमाला के सरताज गीत रंगरेज़ पर अंकित सफ़र का कहना था 
राज शेखर जी को बन्दे का सलाम! क्या खूब लिखा है, हर शब्द अपना एक अलग आकाश ढूंढ रहा है, सब मिलके अनंत हो जा रहे हैं.
वहीं इस चिट्ठे के शुरुवाती दौर से साथ रही सुपर्णा का रंगरेज़ और वार्षिक संगीतमाला के बारे में कहना था
"I was waiting for the 'Sartaj Geet' :) am thrilled its this one! When this album/song released i listened to it and talked about it so much that i almost can't say anything about it anymore except how much i love it. sheer brilliance! the lyrics and singing are super ..loved the countdown , lots of stuff i hadn't heard before. congratulations on the steady run and trust it will last a long time to come despite how busy you are :). I get breathless even thinking of how you must manage it ."
पूरे साल में विभिन्न प्रविष्टियों में व्यक्त आपके उद्गारों में से कुछ को ही यहाँ समेट पाया हूँ। एक शाम मेरे नाम के संगीतमय सफ़र में आप यूँ ही मेरे साथ बने रहेंगे ऐसी आशा करता हूँ।

Monday, March 19, 2012

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो :हुसैन बंधुओं की आवाज़ में

भारतीय ग़ज़लकारों में बशीर बद्र एक ऐसे शायर रहे हैं जिनकी ग़ज़लें समाज के हर तबके में मशहूर हुई हैं। जब भी कोई काव्य प्रेमी पहली बार शेर ओ शायरी में अपनी दिलचस्पी ज़ाहिर करता है और मुझसे पूछता है कि मुझे शुरुआत किन शायरों से करनी चाहिए तो मैं सबसे पहले बशीर साहब का ही नाम लेता हूँ। बशीर बद्र साहब अपनी ग़ज़लों में भारी भरकम अलफ़ाजों के चयन से बचते रहते हैं। पर ये सहजता बरक़रार रखते हुए भी उन्होंने अपने भावों की गहराइयाँ कम नहीं होने दी है। यही उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है।


काव्य समीक्षक विजय वाते उनके ग़ज़लों के संग्रह 'उजाले अपनी यादों के' की प्रस्तावना में उनकी भाषा की इसी सादगी के बारे में कहते हैं
"...डा. बद्र की कविता का अत्यंत प्रीतिकर पक्ष उनकी सादगी है। कितने भोलेपन से वे कह सकते हैं
हम से मुसाफ़िरों का सफ़र इंतज़ार है
सब खिड़कियों के सामने लंबी कतार है

सहजता में कविता एक चिंतन को कैसे रूप दे सकती है ये डा. साहब की कविता में देखा जा सकता है और ये भी कि संप्रेषण के स्तर पर सरलता से उपलब्ध कविता अनुभूति और रचना प्रक्रिया के स्तर पर सहज होते हुए भी अपने पीछे से कवि के आत्म संघर्ष, भीतरी खोजें, बेचैनी, उसके अध्ययन और चिंतन के सराकोरों से लबालब होती है।.."

यही कारण है कि बशीर बद्र साहब के लिखे शेर तुरंत याद हो जाते हैं। यही हाल उन ग़ज़लों की गेयता का भी है। बशीर बद्र की तमाम ग़ज़लों को अलग अलग गायकों ने अपने मुख्तलिफ़ अंदाज में गाया है। इनमें जगजीत सिंह अग्रणी रहे हैं। आज बद्र साहब की जिस मक़बूल ग़ज़ल को आपके सामने पेश कर रहा हूँ उसे बारहा आपने जगजीत जी की आवाज़ में सुना होगा। पर आज उसी ग़ज़ल को सुनिए हुसैन बंधुओं की आवाज़ में। 

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ जनाब अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की। हुसैन बंधुओं की ग़ज़लों से मेरा साथ स्कूल के दिनों का है। उस ज़माने में रेडिओ पर उनकी तमाम ग़ज़लें सुनने को मिलती थीं। उनमें से कुछ के बारे में तो पहले भी चर्चा कर चुका हूँ। चल मेरे साथ ही चल, मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा, इलाही कोई हवा का झोंका और दो जवाँ दिलों का ग़म तो हाई स्कूल और इंटर के ज़माने में मेरी पसंदीदा ग़ज़लें हुआ करती थीं।

पर  कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मैंने सबसे पहले जगजीत जी की आवाज़ में ही सुनी थी। पर जब हुसैन बंधुओं की जुगलबंदी में इसे सुना तो उसका एक अलग ही लुत्फ़ आया। डा. बशीर बद्र की ये ग़ज़ल वाकई कमाल की ग़जल है। क्या मतला लिखा है उन्होंने

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

सहर : सुबह

कितना प्यारा ख़्याल है ना  किसी को चुपके से  हमेशा हमेशा के लिए अपनी आँखों में बसाने का। पर बद्र साहब का अगला शेर भी उतना ही असरदार है

वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

सिफ़त :  विशेषता, गुण,    अता करे :  प्रदान करे

अब भगवन ने ना भूलने का ही वर दे दिया तब तो उनसे ज़ुदा होने का तो मौका ही नहीं आएगा। और देखिए तो यहाँ बशीर बद्र का अंदाज़े बयाँ

मिरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

यानि मेरी गोद में थकी हुई निद्रामग्न चाँदनी लेटी  है।  बस अब तो मेरी यही इल्तिज़ा  है कि तारों से भरी इस रात की पालकी कभी ना उठे और ख़ामोशी का आलम बदस्तूर ज़ारी रहे।

कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब को फूल को चूम के
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

पर जगजीत ने इस ग़ज़ल का एक और शेर गाया है और वो इस ग़ज़ल के रोमांटिक मूड को और पुख्ता कर देता है

मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो

तो आइए सुने इस ग़ज़ल को हुसैन बंधुओं की आवाज़ में...



चलते चलते इसी ग़ज़ल का एक और शेर जिसे जगजीत या हुसैन बंधुओं ने अपने वर्सन में शामिल नहीं किया है..

ये ग़ज़ल के जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो

Sunday, March 18, 2012

'एक शाम मेरे नाम' पर अब तक पेश ग़ज़लों और नज़्मों की लिंकित सूची

उर्दू शायरी से मेरा लगाव कॉलेज के जमाने से रहा है और उसकी एक बड़ी वज़ह वो फ़नकार थे जिनकी ग़ज़लें सुन सुन के हम उर्दू शायरी की बारीकियों को समझ सके। कॉलेज के बाद ये सिलसिला तब तक छूटा रहा जब तलक इंटरनेट के उर्दू शायरी मंचों से रूबरू नहीं हुए थे। मंचों पर एक दूसरे की पसंद को पढ़ना और अशआरों के बारे में चर्चा करना बहुत सुखद और ज्ञानवर्धक अनुभव रहा। फिर जब से ये चिट्ठा अस्तित्व में आया तो इसके माध्यम से अपनी पसंद की गज़लों और नज़्मों और शायरों के बारे में लिख कर आप तक पहुँचाता रहा हूँ।

अगले हफ्ते मेरा हिंदी चिट्ठा 'एक शाम मेरे नाम' अंतरजाल पर अपना छठा साल पूरा कर रहा है तो मुझे लगा कि इस चिट्ठे पर पेश की गई ग़ज़लों और नज्मो की फेरहिस्त को वर्णमाला के क्रम के अनुसार सूचीबद्ध किया जाए ताकि पाठकों को अपनी पसंद को ढूंढने में और मुझे भी ये याद रखने में कि कोई चीज दोबारा तो नहीं जा रही, सहूलियत हो । तक आप इस ब्लॉग के ऊपर बने ग़ज़लें और नज़्में के टैब पर क्लिक कर सीधे पहुँच सकते हैं। इन गज़लों और नज्मों की लिंक पर क्लिक करने पर आप उस पोस्ट तक पहुँचेगे जहाँ इनके बारे में लिखा गया है। जिस पोस्ट के साथ आडियो है वहाँ शायर के नाम के साथ साथ गायक गायिका का नाम भी लिखा गया है। साथ ही इस पृष्ठ पर उन सभी लेखों की कड़ियाँ भी होंगीं जो शेर -ओ- शायरी से जुड़े हैं। आशा करता हूँ कि मेरा ये प्रयास आपके लिए उपयोगी होगा।

कलम के सिपाही
  1. अदम गोंडवी (1947-2011) : एक जनकवि की दुखद विदाई !
  2. अहमद फ़राज़ जिसकी कलम थी अमानत आम लोगों की  
  3. अहमद फ़राज़ :कैसे शुरु हुआ इस महान शायर की शायरी का सफ़र ?
  4. उबैद्दुलाह अलीम
  5. क़तील शिफ़ाई भाग:१, भाग: २, भाग: ३, भाग : 4, भाग : 5
  6. कुँवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर'
  7. मज़ाज लखनवी भाग:१, भाग: २
  8. फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३
  9. परवीन शाकिर भाग:१, भाग: २
  10. मुन्नवर राना
  11. सुदर्शन फ़ाकिर
शायराना गुफ़्तगू
  1. आँखों की कहानी, शायरों की जुबानी भाग :1, भाग : 2
  2. चाँद और चाँदनी भाग :1, भाग: 2, भाग : 3 ,
 ग़ज़ल गायिकी के बादशाह स्व. जगजीत सिंह
  1.  क्या उनके जाने के बाद ग़जलों का दौर वापस आएगा ?
  2.  क्या रहा जगजीत की गाई ग़ज़लों में 'ज़िंदगी' का फलसफ़ा ?
  3.  कुछ यादें उनके एलबम Love is Blind से..
  4. जगजीत सिंह : वो याद आए जनाब बरसों में...
  5. Visions (विज़न्स) भाग I: एक कमी थी ताज महल में, हमने तेरी तस्वीर लगा दी!
  6. Visions (विज़न्स) भाग II :कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?
  7. Forget Me Not (फॉरगेट मी नॉट) : जगजीत और जनाब कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' की शायरी
  8. जगजीत का आरंभिक दौर, The Unforgettables (दि अनफॉरगेटेबल्स) और अमीर मीनाई की वो यादगार ग़ज़ल ...
  9. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 1
  10. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 2
  11. अस्सी के दशक के आरंभिक एलबम्स..बातें Ecstasies , A Sound Affair, A Milestone और The Latest की  
  कुछ ग़ज़लें कुछ नज़्में
    1. अक़्स-ए-खुशबू हूँ बिखरने से ना रोके कोई ..... परवीन शाकिर
    2. अज़ब पागल सी लड़की है... आतिफ सईद
    3. अज़ब पागल सी लड़की थी... आतिफ सईद
    4. अजीब तर्ज-ए-मुलाकात अब के बार रही....... परवीन शाकिर
    5. अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ...क़तील शिफ़ाई, गायक जगजीत सिंह
    6. अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए ..गोपाल दास नीरज
    7. आए कुछ अब्र कुछ शराब आए फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़', गायिका : रूना लैला
    8. आए हैं समझाने लोग...कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर', गायक जगजीत सिंह
    9. आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता.. मीना कुमारी
    10. आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है...सुदर्शन फ़ाकिर
    11. आदमी बुलबुला है पानी का...गुलज़ार
    12. आप आए जनाब बरसों में..रुस्तम सहगल 'वफ़ा',गायक जगजीत सिंह
    13. आपकी याद आती रही रात भर...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    14. आती जाती हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही..निदा फ़ाज़ली,  गायक :चंदन दास
    15. अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिये हैं...जां निसार अख्तर
    16. इतना मालूम है, ख्वाबों का भरम टूट गया...परवीन शाकिर
    17. इतनी मुद्दत बाद मिले हो....मोहसीन नक़वी, गायक : दिलराज कौर/गुलाम अली
    18. ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ? ... मज़ाज लखनवी गायक : जगजीत सिंह
    19. ऐ नौजवान बज़ा कि जवानी का दौर है कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर'
    20. ऐ हुस्न ए लालाफ़ाम ज़रा आँख तो मिला गायक : गुलाम अली
    21. ऐसी न शब बरात, न बकरीद की खुशी.....नज़ीर अकबराबादी 
    22. कोई ये कैसे बताए, कि वो तनहा क्यों है..कैफ़ी आज़मी, गायक जगजीत सिंह
    23. कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?.. बशीर बद्र, गायक जगजीत सिंह
    24. क्या बतायें कि जां गई कैसे ? ...गुलज़ार गायक जगजीत सिंह
    25. कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले... दाग़ देहलवी , गायिका पीनाज़ मसानी
    26. किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी...सुदर्शन फ़ाकिर गायिका : चित्रा सिंह
    27. कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी.... परवीन शाकिर
    28. खेलने के वास्ते अब दिल किसी का चाहिए ...मुराद लखनवी, गायक :चंदन दास
    29. ख़ुमार-ए-गम है महकती फिज़ा में जीते हैं...गुलज़ार, गायक : जगजीत सिंह
    30. 'गर मुझे इसका यकीं हो , मेरे हमदम मेरे दोस्त' ...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' गायिका: टीना सानी
    31. गरचे सौ बार ग़म- ए -हिज्र से जां गुज़री है..सैफुद्दीन सैफ़ गायिका : रूना लैला
    32. गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे.. .क़तील शिफ़ाई की आवाज़ में
    33. चन्द रोज और मेरी जान ! फकत चन्द ही रोज !...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    34. चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी...सुदर्शन फ़ाकिर, गायक : जगजीत सिंह
    35. चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल....हसरत जयपुरी, गायक अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन 
    36. चाँद के तमन्नाई..इब्ने इंशा 
    37. जब तेरे शहर से गुज़रता हूँ... सैफुद्दिन सैफ़
    38. जब मेरी हक़ीकत जा जा कर उनको जो सुनाई लोगों ने....इब्राहिम अश्क़, गायक : चंदन दास
    39. जरा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था.. जां निसार अख्तर, गायक : मुकेश
    40. झूम के जब रिंदों ने पिला दी,कैफ़ भोपाली  गायक : जगजीत सिंह
    41. टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली ..मीना कुमारी
    42. तमाम फिक्र जमाने की टाल देता है....इंदिरा वर्मा, गायिका : शोमा बनर्जी
    43. तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक ..गुलज़ार स्वर नाना पाटेकर
    44. तेरे खुशबू मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे...राजेंद्रनाथ रहबर, गायक : जगजीत सिंह
    45. तेरी आँखों से ही खुलते हें सवेरों के उफक...गुलज़ार
    46. तेरी ख़ुशबू का पता करती है,मुझ पे एहसान हवा करती है.... परवीन शाकिर
    47. तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे...क़ैसर-उल-जाफ़री, गायक : अनूप जलोटा
    48. तुम ना मानो मगर हक़ीकत है..क़ाबिल अजमेरी, गायक : पंकज उधास
    49. दर्द रुसवा ना था ज़माने में.... इब्ने इंशा
    50. दश्ते- तनहाई में ऐ जाने- जहाँ लर्जां हैं...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़', गायिका: इकबाल बानो
    51. देख लो ख्व़ाब मगर ख्व़ाब का चर्चा न करो..कफ़ील आज़र
    52. दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया.......मीर तकी 'मीर' , गायिका: लता मंगेशकर
    53. दिल की हालत को कोई क्या जाने, या तो हम जाने या ख़ुदा जाने... नूर देवासी, गायिका : रूना लैला
    54. दिल भी बुझा हो शाम की परछाइयाँ भी हों अहमद फ़राज़
    55. दुख फ़साना नहीं के तुझसे कहें..अहमद फ़राज़
    56. दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है...दुष्यन्त कुमार
    57. प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं... .क़तील शिफ़ाई
    58. परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ...क़तील शिफ़ाई, गायक - जगजीत सिंह
    59. पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाजी देखी मैंने...नज़्म गुलज़ार की आवाज़ में
    60. फूलों की तरह लब खोल कभी..गुलज़ार गायक जगजीत सिंह 
    61. बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स.... उबैद्दुलाह अलीम,  गायिका :रूना लैला
    62. बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा... अहमद फ़राज़
    63. बस एक लमहे का झगड़ा था....नज़्म गुलज़ार की आवाज़ में
    64. बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा..अहमद फ़राज़
    65. बहार आई तो जैसे इक बार.......फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' गायिका: टीना सानी
    66. बहुत दिन हो, गए सच्ची, तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं नज़्म गुलज़ार की आवाज़ में
    67. बहुत दिनों की बात है शबाब पर बहार थी..., सलाम 'मछलीशेहरी', गायक : जगजीत सिंह
    68. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.. कफ़ील आज़र गायक : जगजीत सिंह
    69. बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना...परवीन शाकिर गायिका : ताहिरा सैयद
    70. बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गये .... परवीन शाकिर
    71. बोल कि लब आजाद हैं तेरे, बोल, जबां अब तक तेरी है...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' गायिका: टीना सानी
    72. भले दिनों की बात है, भली सी एक शक्ल थी.....अहमद फ़राज
    73. मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है..जावेद अख्तर... गायक जगजीत सिंह
    74. मुकद्दर खुश्क पत्तों का, है शाखों से जुदा रहना...... मखमूर सईदी
    75. मुझे अपने ज़ब्त पे नाज था.....इकबाल अज़ीम, गायिका नैयरा नूर
    76. मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना माँग फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' गायिका: नूरजहाँ
    77. मेरे महबूब, मेरे दोस्त नहीं ये भी नहीं..शौकत
    78. मैं हूँ तेरा खयाल है और चाँद रात है... वाशी शाह
    79. मेरे महबूब, मेरे दोस्त नहीं ये भी नहीं..शौकत जयपुरी गायक मुकेश
    80. मोहब्बत अब रुह -ए-ख़मदार भी है..कुँवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर'
    81. ये आलम शौक़ का देखा न जाये...अहमद फ़राज गायक गुलाम अली
    82. ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    83. ये ज़िन्दगी..तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है..निदा फ़ाज़ली, गायक जगजीत सिंह
    84. ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सह..फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़', नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ में
    85. ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा.....दुष्यन्त कुमार
    86. ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे...सुदर्शन फ़ाकिर
    87. यूँ उनकी बज्म-ए-खामोशियों ने काम किया....सईद राही, गायिका:पीनाज़ मसानी
    88. यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज का रंग... गायिका आशा भोंसले
    89. रात जो तूने दीप बुझाए.... सलीम गिलानी, गायिका आशा भोंसले
    90. रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने.. गुलज़ार की नज़्म 'अलाव'
    91. रात यूँ दिल में खोई हुई याद आई....फ़ैज अहमद फ़ैज गायिका : नैयरा नूर
    92. रुक गया आँख से बहता हुआ दरिया कैसे ..कृष्ण बिहारी नूर, गायक : अभिजीत सावंत  
    93. रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख..दुष्यन्त कुमार
    94. रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम... हसरत मोहानी, गायक : जगजीत सिंह और फरीदा खानम
    95. वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या...अथर नफ़ीस   गायिका: फरीदा खानम
    96. वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी..सुदर्शन फ़ाक़िर, गायक : जगजीत सिंह
    97. वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे,जो इश्क को काम समझते थे ...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    98. शहर के दुकानदारों ...तुम ना जान पाओगे...जावेद अख्तर, गायक : नुसरत फतेह अली खाँ
    99. शायद मैं ज़िन्दगी की सहर ले के आ गया...सुदर्शन फ़ाकिर, गायक जगजीत सिंह
    100. शीशों का मसीहा कोई नहीं,क्या आस लगाए बैठे हो .....फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    101. शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना बुनती है रेशम के धागे...गुलज़ार
    102. सच्ची बात कही थी मैंन..सबीर दत्त, गायक जगजीत सिंह
    103. सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं...क़तील शिफ़ाई, गायक जगजीत सिंह
    104. सब्ज़ मद्धम रोशनी में सुर्ख़ आँचल की धनक .... परवीन शाकिर
    105. साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं..बशीर बद्र
    106. सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है?..शहरयार, गायक सुरेश वाडकर
    107. सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानाँ .... परवीन शाकिर
    108. सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं !....अहमद फ़राज़
    109. सुनो अच्छा नहीं लगता कि कोई दूसरा देखे
    110. सुनो जानाँ चले आओ तुम्हें मौसम बुलाते हैं.... आतिफ सईद
    111. समझते थे मगर फिर भी ना रखी दूरियाँ हमने.. वाली असी, गायक जगजीत सिंह
    112. सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता..अमीर मीनाई, गायक जगजीत सिंह
    113. हम कि ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद....फ़ैज अहमद फ़ैज गायिका : नैयरा नूर
    114. हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे...फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
    115. हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद...राही मासूम रज़ा गायक: जगजीत सिंह
    116. हमने हसरतों के दाग आँसुओं से धो लिए गायक: गुलाम अली
    117. हमसे वो दूर दूर रहते हैं दिल में लेकिन जरूर रहते हैं गायिका: मुन्नी बेगम
    118. हमारी साँसों में आज तक वो हिना की ख़ुशबू महक रही है गायिका नूरजहाँ/महदी हसन
    119. हाथ दिया उसने मेरे हाथ में .क़तील शिफ़ाई की आवाज़ में 
     पुनःश्च : कुछ पुरानी पोस्टों में लॉइफलॉगर के काम ना करने की वजह से आडियो लिंक नहीं दिख रहा। इसे बदलने का प्रयास कर रहा हूँ।

    Sunday, March 11, 2012

    बस एक चुप सी लगी है... नहीं उदास नहीं !

    होली का हंगामा थम चुका है। सप्ताहांत की इन छुट्टियों के बाद एक अज़ीब सी शान्ति का अहसास तारी है। ये सन्नाटा उदासी का सबब नहीं। मन तो माहौल में बहती खामोशी में ही रमना चाहता है। वैसे भी उत्साह और उमंग की पराकाष्ठा के बाद कौन सा मन सुकून के दो पल नहीं चाहेगा। ऐसे पलों में जब गुलज़ार के लिखे और हेमंत दा के गाए इस गीत का साथ आपके पास हो तो समझिए बस परम आनंद है।

    वैसे तो गुलज़ार और हेमंत दा का नाम जब भी एक साथ आता है तो सबसे पहले याद फिल्म ख़ामोशी की ही आती है। वो शाम कुछ अज़ीब थी, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो और तुम्हारा इंतज़ार है पुकार लो जैसे संवेदनशील गीतों को भला कौन भूल सकता है ? पर आज जिस फिल्म के गीत की बात मैं कर रहा हूँ वो गीत है फिल्म 'सन्नाटा 'से जो कि फिल्म 'ख़ामोशी' के तीन साल पहले यानि 1966 में प्रदर्शित हुई थी।

    ये एक छोटा सा नग्मा है। गुलज़ार ने अंतरों में ज्यादा शब्द खर्च नहीं किए, ना ही उनके भावों में जटिलता है। जैसा कि गुलज़ार प्रेमी जानते हैं कि गुलज़ारिश गीत एकबारगी में ही पकड़ में आ जाते हैं। पर पहली बार जब मैंने इस गीत को सुना था तो कम से कम मैं तो अंदाज़ नहीं ही लगा पाया था कि इसे गुलज़ार ने लिखा है।

    पर इस गीत में कुछ तो ऐसा है कि एक बार सुन कर ही आप इसके हो के रह जाते हैं। एक तो गुजरते जीवन के प्रति संतोष का भाव मन को सुकून पहुँचाता है तो दूसरी ओर जिस भावपूर्ण अंदाज़ में हेंमंत दा गीत को निबाहते हैं कि अन्तरमन तक गदगद हो जाता है। हेमंत दा ने गीत में संगीत नाममात्र का रखा है। उनके स्वर को संगत देता घड़ा और हारमोनियम पूरे गीत में पार्श्व में बजता रहा है।

    वैसे ये तो बताइए मुझे इस गीत का कौन सा अंतरा सबसे प्रिय लगता है? हाँ जी वही जिसमें गुलज़ार सहर, रात और दोपहर के बदले शाम को चुनने की बात करते हैं। आख़िर इस चिट्ठे का नाम एक शाम मेरे नाम यूँ ही तो नहीं पड़ा ना :) !


    बस एक चुप सी लगी है नहीं उदास नहीं
    कहीं पे साँस रुकी है नहीं उदास नहीं
    बस एक चुप सी लगी है

    कोई अनोखी नहीं ऐसी ज़िंदगी लेकिन
    खूब न हो..
    मिली जो खूब मिली है.
    नहीं उदास नहीं
    बस एक चुप सी लगी है ...

    सहर भी ये रात भी
    दुपहर भी मिली लेकिन
    हमीं ने शाम चुनी,
    हमीं ने....शाम चुनी है
    नहीं उदास नहीं
    बस एक चुप सी लगी है ...

    वो दास्ताँ जो हमने कही भी
    हमने लिखी
    आज वो ...खुद से सुनी है
    नहीं उदास नहीं
    बस एक चुप सी लगी है

    यूँ तो ये गीत मुझे हेमंत दा की आवाज़ में ही सुनना पसंद है पर इस गीत को हेमंत दा ने लता जी से भी गवाया है। इस वर्जन में हेमंद दा ने संगीत थोड़ा भिन्न रखा है। तो चलते चलते लता जी को भी सुन लीजिए..

    Tuesday, March 06, 2012

    होली के रंग इब्ने इंशा के संग : जले तो जलाओ गोरी, पीत का अलाव गोरी..

    एक पाकिस्तानी शायर का गीत और वो भी होली के माहौल के अनुरूप । कुछ अटपटा सा नहीं लगता । बिल्कुल लगता अगर वो शायर इब्ने इंशा की जगह कोई और होते।

    इब्ने इंशा को उनके गद्य और पद्य दोनों के लिए याद किया जाता है। जालंधर में जन्मे इब्ने इंशा ने स्नातक की पढ़ाई पंजाब यूनिवर्सिटी से की। और शायद इसी अंतराल में उन्हें हिंदी भाषा से लगाव पैदा हुआ जो आगे जाकर उनकी कविताओं और गीतों में झलका। कुछ काव्य समीक्षकों का मानना है कि उनकी काव्य शैली पर अमीर खुसरो की भाषा और कबीर की सोच का जबरदस्त प्रभाव था।

    उर्दू शायरी के समीक्षक अब्दुल बिसमिल्लाह इब्ने इंशा की कविता के बारे अपनी दिलचस्प टिप्पणी में कहते हैं

    इब्ने इंशा को रूप-सरूप, जोग-बिजोग, परदेसी, बिरहन और माया आदि का काव्यबोध कैसे हुआ, कहना कठिन है। किंतु यह बात असंदिग्ध है कि उर्दू शायरी की केंद्रीय अभिरुचि से यह काव्यबोध विलग है। यह उनका निजी तख़य्युल (अंदाज़) है और इसीलिए उनकी शायरी जुते हुए खेत की मानिंद दीख पड़ती है।
    इब्ने इंशा की शायरी पर विस्तृत चर्चा तो फिर कभी। अभी तो माहौल होली का है तो बात उनकी इस रसभरे गीत की की जाए।

    इब्ने इंशा का ये गीत मैंने तीन चार महिने पहले अपनी एक रेल यात्रा के दौरान पढ़ा था। गीत की भावनाओं के साथ इस तरह की मस्ती थी कि मन कर रहा था कि इसे जोर जोर से गा कर पढ़ूँ। अब ट्रेन के डिब्बे में वो तो संभव नहीं था पर तभी ये इरादा किया था कि होली के अवसर पर अपनी ये इच्छा अपने ब्लॉग पर पूरी करूँगा। ट्रेन में पढ़ते वक्त अपने आप ही इस कविता की लय बनती चली गई थी। आज उसी रूप में ये आपके सामने पेश है। अगर मेरा ये अंदाज़ आपको नागवार गुजरे तो सारा दोष इब्ने इंशा जी का ही है :)

    जले तो जलाओ गोरी, पीत का अलाव गोरी
    अभी ना बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना ।
    पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है
    पीत बुरा रोग भी है लगे तो लगाओ ना ।।

    गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से
    जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना ।
    आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल पूछो
    एक दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना ।।

    रात को उदास देखे, चाँद का निरास देखे
    तुम्हें ना जो पास देखें, आओ पास आओ ना
    रूप रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें
    कहो तुम्हें जान दे दें, माँग लो लजाओ ना

    और भी हजार होंगे, जो कि दावेदार होंगे
    आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना
    शेर में नज़ीर ठहरे, जोग में कबीर ठहरे
    कोई ये फक़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना

    जले तो जलाओ गोरी, पीत का अलाव गोरी
    अभी ना बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना ।
    पीत में बिजोग भी हे , कामना का सोग भी है
    पीत बुरा रोग भी है लगे तो लगाओ ना ।।


    तो चलिए हुज़ूर अगर आपने मुझे झेल लिया तो इसके लिए कुछ तोहफ़ा तो मिलना ही चाहिए आपको। तो आइए सुनते हैं इसी गीत को कोकिल कंठी नैयरा नूर की आवाज़ में। पिछले हफ्ते ही मुझे पता चला कि नैयरा नूर ने भी इस गीत को अपनी आवाज़ दी है जिसकी धुन बहुत कुछ पुराने फिल्मी गीतों की याद दिलाती है। पर गीत में कुछ शब्दों का हेर फेर है जो किताब वाले वर्सन से मेल नहीं खाता

    Thursday, March 01, 2012

    वार्षिक संगीतमाला 2011 :सरताज गीत - ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है !

    वार्षिक संगीतमाला 2011 के सफ़र में दो महिने साथ चलते चलते वक़्त आ गया है सरताज गीत की घोषणा का। इस गीत का दारोमदार सँभाल रही है एक युवा संगीतकार और गीतकार की जोड़ी जिन्होंने अपने पहले प्रयास में वो कर दिखाया है,जिसे करने में मँजे हुए कलाकारों को वर्षों लगेंगे। इस फिल्म के गीत संगीत को मिल रही मक़बूलियत का अंदाज़ा शायद उन्हें भी इसे बनाते वक़्त ना रहा हो। ये गीत है फिल्म तनु वेड्स मनु का जिसे लिखा है राजशेखर ने और जिसकी धुन बनाई है कृष्णा ने। इस गीत के दो रूप हैं जिसमें एक में स्वर है वडाली बंधुओं का और दूसरा वर्जन जो फिल्म में प्रयुक्त हुआ है उसे आवाज़ दी है कृष्णा ने। तो आइए जानते हैं पहले इन दोनों प्रतिभावान गीतकार संगीतकार की जोड़ी के बारे में। 


    इस गीत के सिलसिले में राजशेखर से मेरी लंबी बातचीत हुई और सच बताऊँ बड़ा अच्छा लगा उत्तर बिहार में मधेपुरा के एक किसान परिवार में जन्मे इस कलाकार से बात कर। जैसा कि बिहार में आमतौर पे होता है राजशेखर को भी हाईस्कूल करने के बाद इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए पटना भेजा गया। राजशेखर उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैलकुलस के सवाल देखते ही उनका दिमाग शून्य हो जाया करता था। कोचिंग आने जाने से ज्यादा उन्हें रास्ते में हिंदी किताबों की दुकानों पर बैठ कर साहित्यिक पुस्तकों के पन्ने पलटना अच्छा लगता। एक दिन पिता से साफ साफ कह दिया कि ये पढ़ाई अब मेरे से नहीं होगी और जा पहुँचे दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज। वहीं से हिंदी में एमए किया। कॉलेज में रहते ही उन्हें रंगमंच का चस्का लगा और केएमसी की नाट्य संस्था “द प्लेयर्स” से बतौर अभिनेता और निर्देशक बने। कुछ दिनों तक NDTV में नौकरी भी की पर वो भी उन्हें रास नहीं आई। दिल्ली से मुंबई जाने की कहानी के बारे में वे कहते हैं  
    "दोस्तों के बहकावे में आकर 2004 के एक बेनाम दिन मुँह उठाए और एक बैग लिए मुंबई आए। जाने माने निर्देशकों को एसिस्ट करने के नाम पर क्लर्की कबूल नहीं की और फिल्म लेखन की दुनिया में आ गए। बीच-बीच में ‘अनवर’ और ऐसी ही दूसरी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर दोस्तों को अपने मुंबई में रहने और स्ट्रगल करने का भान कराते रहे। 2011 में अपनी शादी इसलिए नहीं की क्योंकि तन्नू और मन्नू की शादी के गीत लिखने थे।"
    राजशेखर की मुलाकात तनु वेड्स मनु के निर्देशक आनंद राय से उनके एक मित्र व फिल्म के पटकथा लेखक हिमांशु ने करवाई। फिल्म के लिए वैसे तो पहला गीत उन्होंने 'मन्नू भैया का करिहें' लिखा जो आनंद को पसंद आ गया। पर जब उन्होने आनंद को रंगरेज़ सुनाया तो वे एकदम से सन्न रह गए और फिर उन्होंने राजशेखर को गले से लगा लिया। गीतों का चुनाव तो हो चुका था अब खोज थी एक अदद संगीतकार की जो की कृष्णा के रूप में पूरी हुई।

    राजशेखर की तरह ही कृष्णा को गीत संगीत विरासत में नहीं मिला था। अहमदाबाद के NID से फिल्म और वीडिओ कम्यूनिकेशन पढ़ने वाले कृष्णा अपने सांगीतिक हुनर का श्रेय गुरु जवाहर चावड़ा को देते हैं। मुंबई में अपने शुरुआती दौर में कृष्णा विज्ञापन फिल्मों, डाक्यूमेंट्री में संगीत देने का काम करते रहे और साथ ही गुरु से संगीत की शिक्षा भी लेते रहे। राजशेखर के ज़रिए आनंद से हुई मुलाकात ने उन्हें फिल्म संगीतकार बनने का पहला मौका दिला दिया।

    राजशेखर और कृष्णा से तो आप मिल लिए आइए अब जानते हैं कि रंगरेज़ को अपने गीत कें केंद्रबिंदु में रखने का ख्याल राजशेखर को आया कैसे? राजशेखर इस बारे में कहते हैं..

    " जब मैं कॉलेज में था तो अक्सर लड़कियों को बेरंगी चुन्नियों को रंगवाने पास के कमला नगर मार्केट ले जाते देखता था। मुझे तभी से रंगरेज़ की शख्सियत से एक तरह का फैसिनेशन यानि लगाव हो गया था। जब आनंद ने मुझे गीत की परिस्थितियाँ बतायीं  तो मन की तहों में दबे उस रंगरेज़ का चेहरा मेरे फिर सामने आ गया।"
    राजशेखर के बोल तो लाजवाब हैं ही कृष्णा की सांगीतिक समझ की भी दाद देनी होगी कि जिस तरह से इस मुश्किल से गीत को कम्पोज किया। कृष्णा इस बारे में कहते हैं

    "मुझे पता था कि ये गीत एक ऐसे प्रेमी के दिल के हाल को व्यक्त कर रहा है जो पूरी तरह अपनी प्रेमिका पर आसक्त होने के बावजूद भी अपने दिल की बात नहीं कह पा रहा। जब जब व्यक्ति अपने हृदय को ऐसे चक्रवात में फँसा पाता है तो  प्रेम प्रेम नहीं रह जाता वो उससे ऊपर उठता हुआ निष्काम भक्ति का रूप ले लेता है। कव्वाली और सूफ़ियाना संगीत ऐसी भावनाओं को उभारने के लिए सबसे सटीक माध्यम हैं। बतौर संगीतकार इस गीत में मैंने मुखड़े और अंतरों के बँधे बँधाए ढर्रे से अलग कुछ करने की कोशिश की है। इस गीत को सुनने वालों ने जरूर ध्यान दिया होगा मुखड़ा शुरु के बाद फिर एकदम आख़िर में बजता है। मैं नहीं चाहता था कि राजशेखर के शब्दों का प्रवाह इंटरल्यूड्स के संगीत से टूट जाए।"
    कृष्णा कितना सही कह रहे हैं ये आपको गीत सुनकर ही समझ आ जाएगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है आप पर गीत का सुरूर छाने लगता है। गीत सुनते वक़्त मुझे तो ऐसा लगता है कि ख़ुदा की इबादत कर रहा हूँ। गीत का टेम्पो जैसे जैसे बढ़ता है मन पूर्ण समर्पण और भक्ति के पृथक संसार में जा पहुँचता है। संगीत के रूप में भारतीय वाद्यों के  साथ में ताली की उत्तरोत्तर गति पकड़ती थाप मन पर जादू सा असर करती है। तो आइए सुनें कृष्णा की आवाज़ में ये गीत !



    ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे
    ये बात बता रंगरेज़ मेरे
    ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
    ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
    कि दिल बन गया सौदाई
    मेरा बसंती चोला है, मेरा बसंती चोला है
    अब तुम से क्या मैं शिकवा करूँ
    मैने ही कहा था ज़िद कर के
    रंग दे चुनरी पी के रंग में
    रंग रंग दे रंग दे चुनरी पी के रंग में
    पर मुए कपास पे रंग ना रुके
    रंग इतना गहरा तेरा कि जान-ओ-जिगर तक को भी रंग दे
    जिगर रंग दे....

    रंगरेज़ तूने अफ़ीम क्या है खा ली
    जो मुझसे तू यह पूछे कि कौन सा रंग
    रंगों का कारोबार है तेरा
    ये तू ही तो जाने कौन सा रंग
    मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग
    मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग
    मेरा फाग़न रंग, मेरा सावन रंग
    पल पल रंगते रंगते मेरे आठों पहर मनभावन रंग

    इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई तू
    इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई मेरे सातों समंदर जाए रंग
    मेरी हद भी रंग, सरहद भी रंग दे
    बेहद रंग दे, अनहद भी रंग दे
    मंदिर, मस्जिद, मैकद रंग

    रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
    रंगरेज़ मेरे दो घर क्यूँ रहे
    एक ही रंग में दोनो घर रंग दे, दोनो रंग दे
    पल पल रंगते रंगते, रंगते रंगते
    नैहर पीहर का आँगन रंग
    पल पल रंगते रंगते रंगते रंगते
    मेरे आठों पहर मनभावन रंग

    नींदे रंग दे, करवट भी रंग
    ख़्वाबों पे पड़े सलवट भी रंग
    यह तू ही है, हैरत रंग दे
    आ दिल में समा हसरत रंग दे
    आजा हर वसलत रंग दे
    जो आ ना सके तो फुरक़त रंग दे

    दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में,
    दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में, दर्द ए, मैं ज़िंदा रहूँ
    मैं ज़िंदा रहूँ, ज़ुररत रंग दे
    रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
    तेरा क्या है अस्ल रंग अब तो यह दिखला दे


    मेरा पिया भी तू, मेरी सेज भी तू
    मेरा रंग भी तू, रंगरेज़ भी तू
    मेरी नैया भी तू, मँझधार भी
    तुझ में डूबू, तुझ में उभरूँ
    तेरी हर एक बात सर आँखों पे
    मेरा मालिक तू, मेरा साहिब तू
    मेरी जान, मेरी जान तेरे हाथों में
    मेरा क़ातिल तू, मेरा मुनसिफ़ तू
    तेरे बिना कुछ सूझे ना, तेरे बिना कुछ सूझे ना
    मेरी राह भी तू, मेरा रहबर तू
    मेरा सरवर तू, मेरा अकबर तू
    मेरा मशरिक़ तू, मेरा मगरिब तू
    ज़ाहिद भी मेरा, मुर्शिद भी तू

    अब तेरे बिना मैं जाऊँ कहाँ, जाऊँ कहाँ
    तेरे बिना अब जाऊँ कहाँ, तेरे बिना अब मैं जाऊँ कहाँ

    तेरे बिना, तेरे बिना …..

    ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे... मेरा बसंती चोला है
    वडाली बंधुओं ने भी अपने गायन से इस गीत को एक अलग ऊँचाइयाँ दी हैं। वडाली बंधुओं इस गीत में इतना रमे कि गीत की रिकार्डिंग खत्म होने में बारह घंटे लग गए। बीच में जब उन्हें कृष्णा ने विराम लेने के लिए पूछा तो उनका जवाब था

    "बेटा जब हम स्टेज पर चढ़ते हैं तो दुनिया भूल जाते हैं और आज अगर गाते गाते चौबीस घंटे भी हो जाएँ तो हम गाकर ही उठेंगे।"
    तो आइए सुनते हैं पूरनचंद और प्यारेलाल वडाली द्वा गाया ये गीत...

    कंगना और माधवन पर फिल्माए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं..


    इसी के साथ वार्षिक संगीतमाला 2011 की ये यात्रा यहीं समाप्त हुई। जो लोग इस सफ़र में साथ बने रहे उनका मैं हृदय से आभारी हूँ। पिछले छः वर्षों से चल रहे सिलसिले के प्रति आपका प्रेम ही मेरा प्रेरणास्रोत रहा है।

     

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