Monday, May 28, 2012

मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ : क्या था गीता दत्त की उदासी का सबब ?

कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की आख़िरी कड़ी में पेश है वो गीत जिसने उनके संगीत से मेरी पहली पहचान करवाई। अनुभव में यूँ तो गीता दत्त जी के तीनों नग्मे लाजवाब थे पर मुझे जाँ ना कहो मेरी जान.... की बात ही कुछ और है। रेडिओ से भी पहले मैंने ये गीत अपनी बड़ी दी से सुना था। गीता दत्त के दो नग्मे वो हमें हमेशा सुनाया करती थीं एक तो बाबूजी धीरे चलना... और दूसरा अनुभव फिल्म का ये गीत। तब गुलज़ार के बोलों को समझ सकने की उम्र नहीं थी पर कुछ तो था गीता जी की आवाज़ में जो मन को उदास कर जाता था।

आज जब इस गीत को सुनता हूँ तो विश्वास नहीं होता की गीता जी इस गीत को गाने के एक साल बाद ही चल बसी थीं। सच तो ये है कि जिस दर्द को वो अपनी आवाज़ में उड़ेल पायी थीं उसे सारा जीवन उन्होंने ख़ुद जिया था। इससे पहले कि मैं इस गीत की बात करूँ, उन परिस्थितियों का जिक्र करना जरूरी है जिनसे गुजरते हुए गीता दत्त ने इन गीतों को अपनी आवाज़ दी थी। महान कलाकार अक़्सर अपनी निजी ज़िंदगी में उतने संवेदनशील और सुलझे हुए नहीं होते जितने कि वो पर्दे की दुनिया में दिखते हैं।  गीता रॉय और गुरुदत्त भी ऐसे ही पेचीदे व्यक्तित्व के मालिक थे। एक जानी मानी गायिका से इस नए नवेले निर्देशक के प्रेम और फिर 1953 में विवाह की कथा तो आप सबको मालूम होगी। गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में जिस खूबसूरती से गीता दत्त की आवाज़ का इस्तेमाल किया उससे भी हम सभी वाकिफ़ हैं।


पर वो भी यही गुरुदत्त थे जिन्होंने शादी के बाद गीता पर अपनी बैनर की फिल्मों को छोड़ कर अन्य किसी फिल्म में गाने पर पाबंदी लगा दी। वो भी सिर्फ इस आरोप से बचने के लिए कि वो अपनी कमाई पर जीते हैं। हालात ये थे कि चोरी छुपे गीता अपने गीतों की रिकार्डिंग के लिए जाती और भागते दौड़ते शाम से पहले घर पर मौज़ूद होतीं ताकि गुरुदत्त को पता ना चल सके। गुरुदत्त को एकांतप्रियता पसंद थी। वो अपनी फिल्मों के निर्माण  में इतने डूब जाते कि उन्हें अपने परिवार को समय देने में भी दिक्कत होती। वहीं गीता को सबके साथ मिलने जुलने में ज्यादा आनंद आता। एक दूसरे से विपरीत स्वाभाव वाले कलाकारों का साथ रहना तब और मुश्किल हो गया जब गुरुदत्त की ज़िंदगी में वहीदा जी का आगमन हुआ। नतीजन पाँच सालों में ही उनका विवाह अंदर से बिखर गया। आगे के साल दोनों के लिए तकलीफ़देह रहे। काग़ज के फूल की असफलता ने जहाँ गुरुदत्त को अंदर से हिला दिया वहीं घरेलू तनाव से उत्पन्न मानसिक परेशानी का असर गीता दत्त की गायिकी पर पड़ने लगा। 1964 में गुरुदत्त ने आत्महत्या की तो गीता दत्त कुछ समय के लिए अपना मानसिक संतुलन खो बैठीं। जब सेहत सुधरी तो तीन बच्चों की परवरिश और कर्ज का पहाड़ उनके लिए गंभीर चुनौती बन गया। शराब में अपनी परेशानियों का हल ढूँढती गीता की गायिकी का सफ़र लड़खड़ाता सा साठ के दशक को पार कर गया।

इन्ही हालातों में कनु राय, गीता जी के पास फिल्म अनुभव के गीतों को गाने का प्रस्ताव ले के आए। बहुत से संगीतप्रेमियों को ये गलतफ़हमी है कि कनु दा गीता दत्त के भाई थे। (गीता जी के भाई का नाम मुकुल रॉय था)  दरअसल कनु दा और गीता जी में कोई रिश्तेदारी नहीं थी पर कनु उनकी शोख आवाज़ के मुरीद जरूर थे क्यूँकि अपने छोटे से फिल्मी कैरियर में उन्होंने लता जी की जगह गीता जी के साथ काम करना ज्यादा पसंद किया। गीता जी के जाने के बाद भी लता जी की जगह उन्होंने आशा जी से गाने गवाए। कनु दा के इस गीत में भी उनके अन्य गीतों की तरह न्यूनतम संगीत संयोजन है। जाइलोफोन (Xylophone) की तरंगों के साथ गुलज़ार के अर्थपूर्ण शब्दों को आत्मसात करती गीता जी की आवाज़ श्रोताओं को गीत के मूड से बाँध सा देती हैं।

 

गुलज़ार शब्दों के खिलाड़ी है। कोई भी पहली बार इस गीत के मुखड़े को सुन कर बोलेगा ये जाँ जाँ क्या लगा रखी है। पर ये तो गुलज़ार साहब हैं ना ! वो बिना आपके दिमाग पर बोझ डाले सीधे सीधे थोड़ी ही कुछ कह देंगे। कितनी खूबसूरती से जाँ (प्रियतम)और जाँ यानि (जान,जीवन) को एक साथ मुखड़े में पिरोया हैं उन्होंने। यानि गुलज़ार साहब यहाँ कहना ये चाह रहे हैं कि ऐसे संबोधन से क्या फ़ायदा जो शाश्वत नहीं है। जो लोग ऐसा कहते हैं वो तो अनजान हैं ..इस सत्य से। वैसे भी कौन स्वेच्छा से  इस शरीर को छोड़ कर जाना चाहता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को


मेरी जाँ, मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ

जाँ न कहो अनजान मुझे
जान कहाँ रहती है सदा
अनजाने, क्या जाने
जान के जाए कौन भला
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ ...

अगले अंतरों में गुलज़ार एकाकी दिल की व्यथा और उसके प्रेम की पाराकाष्ठा को व्यक्त करते नज़र आते हैं। साथ ही अंत में सुनाई देती है गीता जी की खनकती हँसी जो उनके वास्तविक जीवन से कितनी विलग थी।

सूखे सावन बरस गए
कितनी बार इन आँखों से
दो बूँदें ना बरसे
इन भीगी पलकों से
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ   ...

होंठ झुके जब होंठों पर
साँस उलझी हो साँसों में
दो जुड़वाँ होंठों की
बात कहो आँखों से
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ   ...


गीता दत्त और कनु रॉय ने जो प्रशंसा अनुभव के गीतों से बटोरी उसका ज्यादा फ़ायदा वे दोनों ही नहीं उठा सके। अनुभव के बाद भी गीता जी ने फिल्म रात की उलझन ,ज्वाला व मिडनाइट जैसी फिल्मों में कुछ एकल व युगल गीत गाए पर 1972 में गीता जी के लीवर ने जवाब दे दिया और उनकी आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए फिल्मी पर्दे से खो गई।

वहीं कनु रॉय भी बासु दा की छत्रछाया से आगे ना बढ़ सके। दुबली पतली काठी और साँवली छवि वाला ये संगीतकार जीवन भर अंतरमुखी रहा। उनके साथ काम करने वाले भी उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में कम ही जानते थे। इतना जरूर है कि वे अविवाहित ही रहे। आभाव की ज़िंदगी ने उनका कभी साथ ना छोड़ा। उसकी कहानी (1966) से अनुभव, आविष्कार, गृहप्रवेश, श्यामला से चलता उनका फिल्मी सफ़र  स्पर्श (1984) के संगीत से खत्म हुआ। पर जो मेलोडी उन्होंने मन्ना डे और गीता दत्त की आवाज़ों के सहारे रची उसे शायद ही संगीतप्रेमी कभी भूल पाएँ। 

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

Thursday, May 17, 2012

मेरा दिल जो मेरा होता...क्या था कनु दा का गीत के मीटर को बताने का अंदाज़ ?

कनु रॉय से जुड़ी इस श्रृंखला में पिछली पोस्ट में हम बातें कर रहे थे उनके व्यक्तित्व के कुछ अछूते पहलुओं के बारे में गुलज़ार की यादों के माध्यम से। पिछले दो गीतों में आपने सुना कनु दा, कपिल और मन्ना डे की तिकड़ी को। पर आज  इस तिकड़ी से मन्ना डे और कपिल कुमार रुखसत हो रहे हैं और उनकी जगह आ रहे हैं गुलज़ार और गीता दत्त।

कनु दा ने गीता दत्त से चार गीत गवाए। ये गीत खासे लोकप्रिय भी हुए।  इनमें से दो को लिखा था गुलज़ार ने। उनमें से एक गीत था मेरा दिल जो मेरा होता। सच ही तो है ये दिल धड़कता तो इस शरीर के अंदर है पर इसकी चाल को काबू में रखना कब किसी के लिए संभव हो पाया है। गुलज़ार ने इसी बात को अपने गीत में ढालने की कोशिश की है।



पहले अंतरे में गुलज़ार अपनी काव्यात्मकता से मन को प्रसन्न कर देते हैं। जरा गौर कीजिए इन पंक्तियों को सूरज को मसल कर मैं, चन्दन की तरह मलती...सोने का बदन ले कर कुन्दन की तरह जलती। इन्हें सुनकर तो स्वर्णिम आभा लिया हुआ सूरज भी शर्म से लाल हो जाए। गुलज़ार तो जब तब हमें अपनी कोरी कल्पनाओं से अचंभित करते रहते हैं। पर कनु दा के संगीत निर्देशन में काम करते हुए एक बार गुलज़ार भी अचरज में पड़ गए। इसी सिलसिले में कनु दा के बारे में अपने एक संस्मरण में वो कहते हैं..
"गीत का मीटर बताने के लिए अक्सर संगीतकार कच्चे गीतों या डम्मी लिरिक्स का प्रयोग करते रहे हैं। और वो बड़ी मज़ेदार पंक्तियाँ हुआ करती थीं जिनमें से कई को तो मैंने अब तक सहेज कर रखा हुआ है। जैसे कुछ संगीतकार मेरी जान मेरी जान या कुछ जानेमन जानेमन की तरन्नुम में गीत का मीटर बतलाते थे। कुछ डा डा डा डा ...तो कुछ ला ला ला ला... या रा रा रा रा....। पर कनु का मीटर को बताने का तरीका सबसे अलग था। वो अपनी हर संगीत रचना का मीटर ती टा ती ती, ती टा ती ती.. कह के समझाते थे। उनका ये तरीका थोड़ा अज़ीब पर मज़ेदार लगता था।  अपने इस ती टा ती ती को उन्होंने अंत तक नहीं छोड़ा।"
कनु दा ने अपने अन्य गीतों की तरह फिल्म अनुभव के इस गीत में भी कम से कम वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया है। संगीत सुनने का आनंद तब दूना हो जाता है गीता जी की आवाज़ के साथ प्रथम अंतरे की हर पंक्ति के बाद सितार की धुन लहराती सी  गीत के साथ साथ चलती है। तो आइए सुनें इस गीत को..

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मेरा दिल जो मेरा होता
पलकों पे पकड़ लेती
होंठों पे उठा लेती
हाथों मे. खुदा होता
मेरा दिल   ...

सूरज को मसल कर मैं
चन्दन की तरह मलती
सोने का बदन ले कर
कुन्दन की तरह जलती
इस गोरे से चेहरे पर
आइना फ़िदा होता
मेरा दिल   ...

बरसा है कहीं पर तो
आकाश समन्दर में
इक बूँद है चंदा की
उतरी न समन्दर में
दो हाथों की ओट मिली
गिर पड़ता तो क्या होता
हाथों में खुदा होता
मेरा दिल   ...

बासु भट्टाचार्य के गीतों को फिल्माने का एक अलग अंदाज था। गीतों के दौरान वो फ्लैशबैक को ऐसे दिखाते थे मानो स्क्रीन पर लहरें उठ रही हों और उन्हीं में से पुरानी यादें अनायास ही प्रकट हो जाती हों।  ये गीत  अभिनेत्री तनुजा पर फिल्माया गया था।



अगली प्रविष्टि में बात करेंगे कनु दा, गुलज़ार और गीता दत्त के सबसे ज्यादा सराहे जाने वाले नग्मे के बारे में..
 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

Thursday, May 10, 2012

हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है :कौन थे कनु रॉय ?

पिछली पोस्ट में आपसे बात हो रही थी मन्ना डे, कपिल कुमार और कनु रॉय की तिकड़ी की। इस त्रिमूर्ति का एक और गीत मुझे बेहद पसंद है।पर इससे पहले 1974 में आई फिल्म आविष्कार के इस संवेदनशील नग्मे की बात करूँ कुछ बातें इसके संगीतकार कनु रॉय के बारे में। 


कनु राय ने अपने संगीत का सफ़र बंगाली फिल्मों से शुरु किया था। पचास के दशक में वे गायक बनने का सपना लेकर हावड़ा से मुंबई पहुँचे। गायिकी का काम नहीं मिला पर सलिल दा से परिचित होने की वज़ह से उन्हें उनके सहायक का काम जरूर मिल गया। सलिल दा ही के यहाँ उनकी मुलाकात बासु भट्टाचार्य से हुई। हिंदी फिल्मों में बतौर संगीतकार उन्हें बासु भट्टाचार्य ने मौका दिया और फिर वे बासु दा की सारी फिल्मों के
ही संगीत निर्देशक बन गए। उसकी कहानी, अनुभव, आविष्कार, श्यामला और स्पर्श में उनका काम सराहा गया। 

कनु राय एक अंतरमुखी इंसान थे। काम माँगने के लिए निर्देशकों के पास जाने में उन्हें झिझक महसूस होती थी। शायद इसके लिए उनकी पिछली पृष्ठभूमि जिम्मेदार रही हो। क्या आपको पता है कि कनु रॉय फिल्मों में काम करने से पहले एक वेल्डर का काम किया करते थे? कहते हैं कि युवावस्था में कनु ने हावड़ा ब्रिज की मरम्मत का काम भी लिया था।

फिल्मफेयर को दिये अपने एक साक्षात्कार में गुलज़ार अविष्कार का जिक्र करते हुए कहते हैं कि बासु दा वैसे तो बेहद भले आदमी थे पर फिल्मों को बनाते समय खर्च कम से कम करते थे। वो अक्सर ऐसे कलाकारों के साथ काम करते जिनसे कम पैसों या मुफ्त में भी काम लिया जा सके। गुलज़ार को उन्होंने आविष्कार की पटकथा लिखने के लिए दो सौ रुपये देते हुए कहा था कि मैं इतना तुम्हें इसलिए दे रहा हूँ कि तुम बाद में ये ना कह सको कि बासु ने तुमसे इस फिल्म के लिए मुफ्त में काम करवाया। आप सोच सकते हैं कि जब गुलज़ार का ये हाल था तो कनु दा की क्या हालत होती होगी। 

गुलज़ार ऐसे ही एक प्रसंग के बारे में कहते हैं
"कनु के पास कभी भी छः से आठ वादकों से ज्यादा रिकार्डिंग के लिए उपलब्ध नहीं रहते थे। और बेचारा कनु उसके लिए कुछ कर भी नहीं पाता था। मुझे याद है कि कितनी दफ़े कनु , बासु दा से एक या दो अतिरिक्त वॉयलिन के लिए प्रार्थना करता रहता। बासु दा और कनु मित्र थे। सो जब भी कनु का ऐसा कोई अनुरोध आता बासु दा उसे वो वाद्य अपने पैसों से खरीदने की सलाह दिया करते थे। अब उसके पास कहाँ पैसे होते थे। बासु की बहुत हुज्जत करने के बाद वे उसे वॉयलिन और सरोद देने को राजी होते थे।"
ताज्जुब होता है कि इतनी कठिनाइयों के बीच भी कनु दा ने इन चुनिंदा फिल्मों में इतनी सुरीली धुनें बनायीं और वो भी लगभग न्यूनतम संगीत संयोजन से।। आज तकनीक कहाँ से कहाँ पहुँच गई। संगीत पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है फिर भी मधुर धुनों को सुनने के लिए कितना इंतज़ार करना पड़ता है।

फिल्म आविष्कार में एक बार फिर कपिल कुमार का लिखा ये गीत देखिए। मुखड़े के पहले बाँसुरी की जो धुन बजती है वो वाकई लाजवाब है। इंटरल्यूड्स में बाँसुरी के साथ कनु दा का प्रिय वाद्य यंत्र सितार भी आ जाता है। खुली छत पर एकाकी रातों में दुख से बोझल साँसों के बीच आसमान में टिमटिमाते तारों के लिए कपिल जी का ये कहना कि किसी की आह पर तारों को प्यार आया है.....मन को निःशब्द कर देता है। मन्ना डे की दर्द में डूबती सी आवाज़ और उसका कंपन इतना असरदार है कि गीत को सुनकर आप भी अनमने से हो जाते हैं। तो आइए सुनते हैं ये नग्मा....

  

हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है
कोई हमदर्द नहीं, दर्द मेरा साया है
हँसने की चाह ने इतना मुझे रु..ला..या है

दिल तो उलझा ही रहा ज़िन्दगी की बा..तों में
साँसें  चलती हैं कभी कभी रातों में 

किसी की आह पर तारों को प्यार आया है
कोई हमदर्द नहीं ...

सपने छलते ही रहे रोज़ नई रा..हों से
कोई फिसला है अभी अभी बाहों से
 
किसकी ये आहटें ये कौन मुस्कुराया है
कोई हमदर्द नहीं ...

राजेश खन्ना वा शर्मिला टैगौर द्वारा अभिनीत फिल्म आविष्कार में ये गीत शुरुआत में ही आता है.. 


 कनु दा से जुड़ी अगली कड़ी में बातें होगी गीता दत्त के गाए और उनके द्वारा संगीतबद्ध कुछ बेहतरीन गीतों की...

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

Monday, May 07, 2012

फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको : क्या आप निराशावादी हैं?

आप आशावादी (optimist) हैं या निराशावादी (pessimist) ये तो मुझे नहीं पता पर बचपन में ये प्रश्न मुझे बड़ा परेशान करता था। अक्सर बड़े लोगों के साक्षात्कार पढ़ता तो ये जुमला बारहा दिख ही जाता था कि I am an eternal optimist। अपने दिल को टटोलता तो कभी भी इन पंक्तियो को वो पूरी तरह स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होता।  होता भी कैसे? बचपन से ही उसे अपनी आशाओं को वास्तविकता के तराजू में तौलने की आदत जो हो गई थी। परीक्षा के बाद दोस्त लोग नंबर पूछते तो मैं मन में अंक देने में कंजूस आध्यापक की छवि बनाता और उस हिसाब से गणना कर अपने दोस्तों को अपना अनुमान बता देता। ज़ाहिर है उनके अनुमान मेरे से हमेशा ज्यादा होते पर जब परिणाम आते तो नतीजा उल्टा होता। इंटर में रहा हूँगा जब पहली बार मुझे देखकर एक कन्या ने बड़े प्यार से हाथ हिलाया। प्रचलित जुबान में कहूँ तो wave.. किया। पर जनाब उस का प्रत्युत्तर देने के बजाए मैंने ये देखा कि मेरी नीचे और ऊपर की मंजिल की बॉलकोनी पर कोई लड़का खड़ा तो नहीं है। ऐसे में आप ही बताइए मैं अपने आप को आशावादी कैसे कह सकता हूँ? पर मन ये मानने को तैयार नहीं था कि मैंने नैराश्य की चादर अपने ऊपर ओढ़ रखी है। दिन बीतते गए पर मुझे अपने व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए उपयुक्त जवाब नहीं मिला और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान कब ये प्रश्न मुझसे दूर हो गया मुझे पता ही नहीं चला।

और फिर एक दिन अखबार में छपी किसी के ये उक्ति नज़रों से गुजरी 

"Success or failure..I will  always be pleasantly surprised rather than bitterly disappointed."

और  मुझे लगा कि अपने बारे में ये ख्याल मुझे पहले क्यूँ नहीं आया। संयोग देखिए उस दिन के मात्र एक हफ्ते बाद ही बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक कैंपस इंटरव्यू में ये सवाल मुझपे दागा गया Are you an optimist or pessimist ? मैंने भी छूटते ही ऊपर वाली पंक्ति दोहरा दी। अब मुझे क्या पता था कि मैनेजमेंट फिलॉसफी के तहत मेरा जवाब ठीक नहीं बैठेगा। मेरे जवाब के बाद कुछ देर शांति छाई रही फिर उन्होंने मुझे रफा दफ़ा कर दिया। पर इतने दशकों बाद भी मैं अपने फलसफ़े पर कायम हूँ। ख़्वाबों की दुनिया में उड़ने से मुझे कभी परहेज़ नहीं रहा पर पैर धरातल से उखड़े नहीं ये बात भी दिमाग में रही बहुत कुछ मेरी इस कविता की तरह।

वैसे इन सब बातों को आपसे साझा मैं क्यूँ कर रहा हूँ? उसकी वज़ह है आज का वो गीत जो मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ। इस गीत का मर्म भी वही है। जीवन में घट रही तमाम धनात्मक घटनाओं को उतना ही आँकें जिनके लायक वो हैं। नहीं तो अपने सपनों के टूटने की ठेस को शायद आप बर्दाश्त ना कर पाएँ।

ये गीत है फिल्म अनुभव का  जिसे लिखा था कपिल कुमार ने और धुन बनाई थी कनु रॉय ने। कपिल कुमार फिल्म उद्योग में एक अनजाना सा नाम हैं। कनु रॉय के साथ उन्होंने दो फिल्मों में काम किया है अनुभव और आविष्कार। पर इन कुछ गीतों में ही वो अपनी छाप छोड़ गए। यही हाल संगीतकार कनु रॉय का भी रहा। गिनी चुनी दस से भी कम फिल्मों में काम किया और जो किया भी वो सारे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बैनर तले। बाहर उनको काम ही नहीं मिल पाया। पर इन थोड़ी बहुत फिल्मों से भी अपनी जो पहचान उन्होंने बनाई वो आज भी संगीतप्रेमियों के दिल में क़ायम है।

अब इसी गीत को लें गीत के मुखड़े में मन्ना डे का स्वर उभरता है फिर कहीं और पीछे से कनु  की संयोजित वाइलिन और सितार की धुन आपके कानों में पड़ती है। इंटरल्यूड्स में भी यही सितार आपके मन को झंकृत करता है। कनु के संगीत की खासियत ही यही थी कि वे बेहद कम वाद्य यंत्रों में भी सुरीले गीतों को जन्म देते थे। पर  सबसे अद्भुत है मन्ना डे की गायिकी । बेहद  अनूठे अंदाज़ में उन्होंने गीतकार की भावनाओं को अपनी गायिकी से उभारा है।  मन्ना डे साहब हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में बदलती लय में लहरों का लगा जो मेला..... या दिल उनसे बहल जाए तो.... गाते हैं तो बस मन एकाकार सा हो जाता है उन शब्दों के साथ। 

पिछले हफ्ते अपना 93 वाँ जन्मदिन मनाने वाला ये अनमोल गायक आज भी हमारे बीच है, यह हमारी खुशनसीबी है। मन्ना डे ने शास्त्रीय से लेकर हल्के फुल्के गीतों को जितने बेहतरीन तरीके से निभाया है वो ये साबित करता है उनके जैसा संपूर्ण पार्श्वगायक बिड़ले ही मिलता है।

फिर कहीं...
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको
फिर कहीं ...

मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
लहरों का लगा जो मेला.., तू..फ़ां ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...

देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
दिल उनसे बहल जाए तो, राहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...


फिल्म अनुभव में इस गीत को फिल्माया गया है मेरे चहेते अभिनेता संजीव कुमार और तनुजा पर..


पर  कनु रॉय और उनके संगीत का ये सफ़र अभी थमा नहीं है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे इस तिकड़ी के एक और बेमिसाल गीत की..

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

 

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