Monday, December 30, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2013 का आगाज़ और एक नज़र पिछली संगीतमालाओं पर...

नये साल के आने के पहले एक शाम मेरे नाम पर वार्षिक संगीतमालाओं के लिए साल भर के पच्चीस बेहतरीन गीत चुनने की क़वायद शुरु हो जाती है। दिसंबर से ही एक बोझ सा आ जाता है मन में कि क्या पच्चीस गीतों की फेरहिस्त आसानी से पूरी हो पाएगी। साल भर में प्रदर्शित हुई लगभग सौ फिल्मों के गीतों से गुजरता हूँ तो कभी कभी गीतों के अटपटेपन से मन में कोफ्त सी हो जाती है पर जैसे जैसे गीतों को चुनने की प्रक्रिया अपने आख़िरी चरण में पहुँचती है अच्छे गीतों को सुनकर सारा कष्ट काफूर हो जाता  है और चुनने लायक गीतों की संख्या पच्चीस से भी अधिक होने लगती है। फिर समस्या आती है कि किसे छोड़ूँ और किसे रखूँ? पर अंत में संगीत, गायिकी, बोल और संपूर्ण प्रभाव के आधार पर कोई निर्णय लेना ही पड़ता है।
 

इस साल भी कुल रिलीज हई फिल्मों में एक दर्जन का संगीत ही औसत से बेहतर था। भाग मिल्खा भाग, रांझणा, लुटेरा, आशिकी 2 और शुद्ध देशी रोमांस कुछ ऐसी फिल्में थीं जो बतौर एलबम काफी सराही गयीं। अब देखना ये है कि इस साल रिलीज़ हई फिल्मों में कौन से गाने वार्षिक संगीतमाला 2013में जगह बना पाते हैं। 

वैसे साल के इस आख़िरी हफ्तों की पार्टियों में तो झूमने झुमाने वाले गीतों का बोलबाला रहता है। हर साल मैं ऐसे गीतों की विस्तार से फेरहिस्त पेश किया करता था पर जब आपके चोरों ओर लोग मेरी तूह और गंदी बात जैसे फूहड़ गानों पर थिरक रहे होते हैं तो उनके बारे में ज्यादा चर्चा करने का दिल ही नहीं करता। पर फिर भी अगर स्वस्थ मनोरंजन के साथ झूमने झुमाने की बात हो तो मुझे इस साल के सात शानदार मस्ती भरे गीतों में भाग मिल्खा भाग का मस्तों का झु्ड और स्लो मोशन अँगरेज़ा, ये जवानी है दीवानी का बदतमीज़ दिल, शुद्ध देशी रोमांस का गुलाबी, मटरू की बिजली.. का ओ माई चार्ली , घुमक्कड़ का लेजी लैडऔर फटा पोस्टर निकला हीरो तू मेरे अगल बगल है नज़र आते हैं। इनमें से कुछ ने वार्षिक संगीतमाला की पॉयदानों पर भी जगह बनाई है।

जैसा कि मैं पहले भी इस चिट्ठे पर कह चुका हूँ कि वार्षिक संगीतमालाएँ मेरे लिए नए संगीत में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उसको आप तक संजों लाने की कोशिश मात्र है। बचपन से रेडिओ सीलोन की अमीन सयानी की बिनाका और फिर विविधभारती पर नाम बदल कर आने वाली सिबाका गीतमाला सुनता रहा। उसका असर इतना था कि जब 2005 के आरंभ में अपने रोमन हिंदी ब्लॉग की शुरुआत की तो मन में एक ख्वाहिश थी कि अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के गीतों को पेश करूँ।

तो आइए एक नज़र डालें पिछली  संगीतमालाओं की तरफ। मैंने अपनी पहली संगीतमाला की शुरुआत 2004  के दस बेहतरीन गानों से की जिसे 2005 में 25 गानों तक कर दिया। 2006 में जब खालिस हिंदी ब्लागिंग में उतरा तो ये सिलसिला इस ब्लॉग पर भी चालू किया। इस साल मैंने पिछली सारी संगीतमालाओं में बजने वाले गीतों को एक जगह इकठ्ठा कर दिया है ताकि नए पाठकों को भी इस सिलसिले (जो अपने नवें साल से गुजर रहा है) की जानकारी हो सके। गर आपको किसी साल विशेष से जुड़े गीत संबंधित आलेख तक पहुँचना है तो उस साल की सूची देखिए और गीत मिलने से उससे जुड़ी लिंक पर क्लिक कीजिए। आप संबंधित आलेख तक पहुँच जाएँगे।


पिछले साल यानि 2012 के संगीतकारों की बात करूँ तो वो साल प्रीतम के नाम रहा था। बर्फी के संगीत ने ये साबित कर दिया था कि प्रीतम हमेशा 'inspired' नहीं होते और कभी कभी उनके संगीत से भी 'inspired' हुआ जा सकता है।

 वार्षिक संगीतमाला 2012 


 वार्षिक संगीतमाला 2011  

वर्ष 2011 में क्रस्ना और राजशेखर की नवोदित जोड़ी ने तनु वेड्स मनू के लिए कमाल का गी संगीत दिया और रंगरेज़ जैसे बेमिसाल गीत की बदौलत सरताज गीत का सेहरा अपने सर बाँध लिया। 

  

वार्षिक संगीतमाला 2010 

2009 की बादशाहत गुलज़ार ने 2010 में भी कायम रखी दिल तो बच्चा है जी में राहत के गाए शीर्षक गीत के द्वारा।
2010 की गीतमाला में  गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...
  1.  दिल तो बच्चा है जी संगीत:विशाल भारद्वाज, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र :दिल तो बच्चा है जी
  2. नैन परिंदे पगले दो नैन.., संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायिका: शिल्पा राव चलचित्र :लफंगे परिंदे
  3. सजदा तेरा सजदा दिन रैन करूँ , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : My Name is Khan
  4. फूल खिला दे शाखों पर पेड़ों को फल दे मौला, संगीत: रूप कुमार राठौड़, गीत : शकील आज़मी, गायक : जगजीत सिंह, चलचित्र : Life Express 
  5.  बिन तेरे बिन तेरे कोई ख़लिश है, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : शफ़कत अमानत अली खाँ, सुनिधि चौहान, चलचित्र : I hate Luv Storys
  6. तेरे मस्त मस्त दो नैन, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : फ़ैज़ अनवर, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : दबंग
  7.  सुरीली अँखियों वाले, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : वीर
  8. तू ना जाने आस पास है ख़ुदा, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : अनजाना अनजानी
  9. मन के मत पे मत चलिओ, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : आक्रोश
  10. मँहगाई डायन खात जात है, संगीत:राम संपत, गायक :रघुवीर यादव, चलचित्र : पीपली लाइव
  11. देश मेरा रंगरेज़ ऐ बाबू, संगीत:Indian Ocean, गीत :स्वानंद किरकिरे, संदीप शर्मा , गायक :राहुल राम, चलचित्र : पीपली लाइव
  12. कान्हा बैरन हुई रे बाँसुरी, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : रेखा भारद्वाज, चलचित्र : वीर
  13. चमचम झिलमिलाते ये सितारों वाले हाथ, संगीत:शैलेंद्र बार्वे, गीत : जीतेंद्र जोशी, गायक : सोनू निगम, चलचित्र : स्ट्राइकर
  14. बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार वे, संगीत: विशाल शेखर, गीत : कुमार, गायक : श्रेया घोषाल, चलचित्र : I hate Luv Storys
  15. आज़ादियाँ, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  16. तुम जो आए, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  17. सीधे सादे सारा सौदा सीधा सीधा होना जी , संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : अनुपम अमोद, चलचित्र : आक्रोश
  18. पी लूँ तेरे गोरे गोरे हाथों से शबनम, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक :मोहित चौहान चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  19. Cry Cry इतना Cry करते हैं कॉय को, संगीत: ए आर रहमान, गीत : अब्बास टॉयरवाला, गायक : राशिद अली, श्रेया घोषाल, चलचित्र : झूठा ही सही
  20. नूर ए ख़ुदा , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : शंकर महादेवन, अदनान सामी, श्रेया घोषाल , चलचित्र : My Name is Khan
  21. मन लफंगा बड़ा अपने मन की करे, संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :लफंगे परिंदे
  22. गीत में ढलते लफ़्जों पर, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  23. यादों के नाज़ुक परों पर, संगीत: सलीम सुलेमान, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :आशाएँ
  24. खोई खोई सी क्यूँ हूँ मैं, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अनुषा मणि, चलचित्र : आयशा
  25. तुम हो कमाल, तुम लाजवाब हो आयशा , संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अमित त्रिवेदी, चलचित्र : आयशा 

वार्षिक संगीतमाला 2009  

साल 2009  में पहली बार मेरे चहेते गीतकार गुलज़ार पहली पायदान पर कमीने फिल्म के लिए विशाल भारद्वाज के संगीतबद्ध गीत इक दिल से दोस्ती के सहारे कब्जा जमाया।

2009 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...

 वार्षिक संगीतमाला 2008   

में सरताज गीत का  का सेहरा बँधा युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी के सर पर। सरताज गीत था शिल्पा राव के गाए और अमिताभ द्वारा लिखे इस बेहद संवेदनशील नग्मे के बोल थे इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला !.

2008 की गीतमाला में बाकी गीतों का सिलसिलेवार क्रम ये था..

वार्षिक संगीतमाला 2007 में एक बार फिर प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध, 'तारे जमीं पर' के गीतों के बीच ही प्रथम और द्वितीय स्थानों की जद्दोजहद होती रही। पर माँ...जैसे नग्मे की बराबरी भला कौन गीत कर सकता था


2007 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी..

वार्षिक संगीतमाला 2006 में ओंकारा और गुरु के गीत छाए रहे पर बाजी मारी 'उमराव जान' के संवेदनशील गीत 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' ने। इस गीत और दूसरे नंबर के गीत 'मितवा ' को लिखा था जावेद अख्तर साहब ने


2006 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी.
  1. अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो (उमराव जान)
  2. मितवा... ( कभी अलविदा ना कहना )
  3. ओ साथी रे दिन डूबे ना... (ओंकारा)
  4. जागे हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो (गुरू)
  5. तेरे बिन मैं यूँ कैसे जिया... (बस एक पल )
  6. बीड़ी जलइ ले, जिगर से पिया.... (ओंकारा)
  7. अजनबी शहर है, अजनबी शाम है.... ( जानेमन )
  8. तेरे बिना बेसुवादी रतिया...(गुरू)
  9. मैं रहूँ ना रहूँ ....( लमहे-अभिजीत )
  10. लमहा लमहा दूरी यूँ पिघलती है...(गैंगस्टर)
  11. नैना ठग लेंगे...... (ओंकारा)
  12. तेरी दीवानी.... ( कलसा- कैलाश खेर)
  13. रूबरू रौशनी है...... (रंग दे बसंती)
  14. क्या बताएँ कि जां गई कैसे...(कोई बात चले)
  15. ये हौसला कैसे झुके.. ( डोर )
  16. ये साजिश है बूंदों की.....( फना )
  17. सुबह सुबह ये क्या हुआ....( I See You.)
  18. मोहे मोहे तू रंग दे बसन्ती....( रंग दे बसंती )
  19. चाँद सिफारिश जो करता.... ( फना )
  20. बस यही सोच कर खामोश मैं......( उन्स )

वार्षिक संगीतमाला 2005 में बाजी मारी स्वानंद किरकिरे और शान्तनु मोइत्रा की जोड़ी ने जब परिणिता फिल्म का गीत 'रात हमारी तो चाँद की सहेली' है और हजारों ख्वाहिशें ऍसी के गीत 'बावरा मन देखने चला एक सपना' क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान पर रहे थे।




वार्षिक संगीतमाला 2004 में मेरी गीतमाला के सरताज गीत का सेहरा मिला था फिर मिलेंगे में प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध गीत "खुल के मुस्कुरा ले तू" को जबकि दूसरे स्थान पर भी इसी फिल्म का गीत रहा था कुछ खशबुएँ यादों के जंगल से बह चलीं। ये वही साल था जब कल हो ना हो, रोग, हम तुम, मीनाक्षी और पाप जैसी फिल्मों से कुछ अच्छे गीत सुनने को मिले थे।



अब ये स्पष्ट कर दूँ कि इस गीतमाला का पॉपुलरटी से कोई लेना देना नहीं है। गायिकी, संगीत , बोल और इनका सम्मिलित प्रभाव इन सभी आधारों को बराबर वज़न दे कर मैं अपनी पसंद के गीतों का क्रम तैयार करता हूँ। कई बार ये स्कोर्स लगभग बराबर होते हैं इसलिए गीतों को ऊपर नीचे करना बड़ा दुरुह होता है।

Saturday, December 28, 2013

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो : ग़ज़लें बशीर बद्र की भाग 2

तो मैं बात कर रहा था बशीर बद्र की ग़ज़लों के बारे में। पिछली पोस्ट में आपको उनकी तीन ग़ज़लों को पढ़ कर सुनाया था। आज उनकी तीन और ग़ज़लों को पढ़ने की कोशिश की है। बद्र साहब की सबसे मक़बूल ग़ज़लों में उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो..न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए का जिक्र सबसे ऊपर आता है।


उनसे कई साक्षात्कारों में ये पूछा जाता रहा है कि उन्होंने किन हालातों में और कैसे इस ग़ज़ल की रचना की..जवाब में बार बार बद्र बड़ी विनम्रता से सारा श्रेय ऊपरवाले को थमाते हुए कहते रहे हैं

"बस ये समझिए की वह जो आसमानों में बैठा है अज़ीम ख़ुदा सब कुछ वही करता है हम कुछ नहीं करते। वह शायरों के दिलों को अपने नूर से रोशन कर के ऐसे अशआर अता कर देता है जो लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं। यह सब कुछ अल्लाह का है। शायर कुछ नहीं करता लफ़्ज अता वही करता है। शेर को शोहरत वही बख्शता है। ये सब उसी के काम हैं।"
तो आइए एक बार फिर से पढ़े और सुनें उनकी इस कालजयी ग़ज़ल को
 (4)
हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए

मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए


अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए


मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए




बशीर बद्र की शायरी की खास बात ये रही कि उन्होंने अपनी ग़ज़लों को कठिन उर्दू और फ़ारसी के शब्दों से दूर रखा। सहज शब्दों का प्रयोग के बावज़ूद उनके कथ्य की गहराई वैसी ही रही। अयोध्या में जन्में व कानपुर और अलीगढ़ में पठन पाठन करने वाले इस शायर की ज़िंदगी में कई ऐसे मोड़ आए जिनकी वज़ह से वो उदासियों के गर्त में जा पहुँचे। 1984 के मेरठ दंगों में दंगाइयों ने बद्र साहब का घर जला दिया और इसका उन्हे जबरदस्त सदमा पहुँचा। इसीलिए वो अपने एक शेर में कहते हैं लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में.. तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में। 

बद्र साहब की एक ऐसी ही उदास ग़ज़ल मेरी आज की दूसरी पेशकश है।


(5)
मैं उदास रस्ता हूँ शाम का तिरी आहटों की तलाश है
ये सितारे सब हैं बुझे-बुझे मुझे जुगनुओं की तलाश है

वो जो दरिया था आग का सभी रास्तों से गुज़र गया
तुम्हें कब से रेत के शहर में नयी बारिशों की तलाश है

नए मौसमों की उड़ान को अभी इसकी कोई ख़बर नहीं
तिरे आसमाँ के जाल को नए पंछियों की तलाश है


मिरे दोस्तों ने सिखा दिया मुझे अपनी जान से खेलना
मिरी ज़िंदगी तुझे क्या ख़बर मुझे क़ातिलों की तलाश है

तिरी मेरी एक हैं मंजिलें, वो ही जुस्तजू, वो ही आरज़ू
तुझे दोस्तों की तलाश है मुझे दुश्मनों को तलाश है



 
मेरठ के उस हादसे के बाद बद्र साहब भोपाल चले गए। यहीं उनकी मुलाकात डा. राहत से हुई जो बाद में उनकी ज़िदगी की हमसफ़र बनी। उनकी सोहबत और उत्साहवर्धन ने बद्र साहब को एक नए जोश से भर दिया और उनकी लेखनी एक बार फिर से चल पड़ी। अपनी किताब में राहत बद्र के लिए उन्होंने बड़ा प्यारा सा शेर कहा है जो कुछ यूँ है
चाँद चेहरा, जुल्फ़ दरिया, बात ख़ुशबू, दिल चमन
इक तुम्हें देकर ख़ुदा ने, दे दिया क्या क्या मुझे


चलते चलते उनकी एक और ग़ज़ल सुन ली जाए...
(6)
ख़्वाब इन आँखों का कोई चुराकर ले जाए
क़ब्र के सूखे हुए फूल उठाकर ले जाए


मुन्तज़िर फूल में ख़ुश्बू की तरह हूँ कब से
कोई झोंके की तरह आये उड़ा कर ले जाए


ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी
जो हथेली पे रची मेहँदी छुड़ाकर ले जाए


मैं मोहब्बत से महकता हुआ ख़त हूँ मुझको
ज़िंदगी अपनी किताबों में छुपाकर ले जाए


ख़ाक इंसाफ़ है इन अंधे बुतों के आगे
रात थाली में चराग़ों से सजाकर ले जाए


उनसे ये कहना मैं पैदल नहीं आने वाला
कोई बादल मुझे काँधे पे बिठाकर ले जाए  


 

आशा है बद्र साहब की चुनिंदा ग़ज़लों से मुख़ातिब होना आप सबको पसंद आया होगा। अब अगली मुलाकात होगी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला में..

Wednesday, December 25, 2013

ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता...ग़ज़लें बशीर बद्र की भाग 1

अक्सर ग़ज़ल गायिकी को आम जन तह पहुँचाने का श्रेय हम जगजीत सिंह को देते रहे हैं। जो काम सारी ज़िंदगी जगजीत ने ग़ज़ल गायिकी के लिए किया वही डा. बशीर बद्र ने शायरी के लिए किया है। आसान शब्दों में गहरी बात कहने का हुनर बड़े कम शायरों के पास होता है और बशीर बद्र इसी प्रतिभा के धनी हैं। 

जैसा कि मैंने पहले भी इस ब्लॉग पर लिखा है कि जब भी मुझसे उर्दू के सामान्य लफ़्ज समझने वाला शेर ओ शायरी में अपनी दिलचस्पी ज़ाहिर करता है और पूछता है कि शुरुआत किससे करूँ तो मेरे होठों पर बशीर बद्र का नाम सबसे पहले आता है। मैं जानता हूँ कि कविता से प्रेम करने वाले सभी जन बशीर बद्र को पढ़ना शुरु करेंगे तो उन्हें ना केवल बद्र साहब की लेखनी से बल्कि ग़ज़ल की इस विधा से ही मोहब्बत हो जाएगी।

इस साल को विदा करने से और अगले साल वार्षिक संगीतमाला के शुरु होने के पहले एक शाम मेरे नाम पर ये हफ्ता बद्र साहब की ग़ज़लों और शेरों से गुलज़ार रहेगा। बशीर बद्र साहब की यूँ तो तमाम ग़ज़लें मेरी पसंदीदा हैं पर उनमें से कुछ को यहाँ पढ़ कर आपसे साझा करूँगा। साथ ही इस ब्लॉग के फेसबुक पेज पर उनके तमाम बेहतरीन शेरों का जिक्र चलता रहेगा इस पूरे हफ्ते तक 


तो आइए इस सिलसिले को शुरु करते हैं बद्र साहब की उस ग़ज़ल से जो मेरे दिल के बेहद करीब रही है

(1)
उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता
हज़ारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता

कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता

बहुत से लोग दिल को इस तरह महफूज़ रखते हैं
कोई बारिश हो ये कागज़ ज़रा भी नम नहीं होता


बिछुड़ते वक़्त कोई बदगुमानी दिल में आ जाती
उसे भी ग़म नहीं होता मुझे भी ग़म नहीं होता

ये आँसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना
ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता 



बशीर बद्र के वैसे तो ना जाने कितने काव्य संकलन बाजार में हैं पर इनमें से जितनों पर नज़र गुजरी है उनमें वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'उजाले अपनी यादों के' में उनकी ज्यादातर यादगार ग़ज़लें शामिल हैं। उनकी कुछ ग़ज़लों जैसे कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, सर झुकाओगे तो पत्थर देवता बन जाएगा, कौन आया रास्ते आइनाखाने हो गए,ना जी भर के देखा ना कुछ बात की आदि को जगजीत सिंह और अन्य ग़ज़ल गायक अमरत्व प्रदान कर चुके हैं।

पर सौ के करीब ग़ज़लों के इस संकलन का ये अदना सा हिस्सा है। बशीर बद्र की जो दूसरी ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ इसे जगजीत जी ने गाया है पर इसे पढ़ना इसे सुनने से ज्यादा सुकून देता है। इस ग़ज़ल में बद्र साहब ने रदीफ़ के तौर पर 'कुछ भी नहीं' का जिस खूबसूरती से इस्तेमाल किया है वो गौरतलब है।

 (2)

सोचा नही अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नही
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नही

देखा तुझे सोचा तुझे चाह तुझे पूजा तुझे
मेरी खाता मेरी वफ़ा तेरी खता कुछ भी नही

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नही 

इस शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नही

दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जाएगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकि बचा कुछ भी नही 

एहसास की खुशबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ
खामोश यादों के सिवा, घर में रखा कुछ भी नहीं 

 

 इसी संकलन की प्रस्तावना में प्रकाशक बद्र साहब की शायरी के बारे में लिखते हैं कि
"डा. बशीर बद्र को उर्दू का वह शायर माना जाता है जिसने कामयाबी की बुलंदियों को फतेह कर बहुत लंबी दूरी तक अपनी शायरी में उतारा है। बशीर की शेर ओ शायरी के प्रशंसक जहाँ जुल्फीकार अली भुट्टो, ज्ञानी जैल सिंह, श्रीमती इंदिरा गाँधी हैं वहीं आम आदमी से लेकर रिक्शेवाला, ट्रकवाला तथा कुली मज़दूर तक भी हैं और क्यूँ ना हों? जिसकी शायरी में एक आम आदमी की ज़िंदगी के महफूज़ लमहे शामिल हों, ऐसे व्यक्ति की शायरी क्यूँ ना जगज़ाहिर होगी।"
 तो आइए सुनते हैं उनकी एक और नायाब ग़ज़ल

(3)

होठों पे मोहब्बत के फ़साने नही आते
साहिल पे समन्दर के खज़ाने नही आते

पलके भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते


दिल उजडी हुई एक सराये की तरह है
अब लोग यहाँ रात बिताने नही आते

उडने दो परिंदो को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नही आते


क्या सोचकर आए हो मोहब्बत की गली में
जब नाज़ हसीनों के उठाने नहीं आते

अहबाब (दोस्त) भी गैरो की अदा सीख गये है
आते है मगर दिल को दुखाने नही आते





बशीर बद्र की शायरी का एक पहलू ये भी है कि उनके लिखे तमाम शेर उनकी जानी मानी ग़ज़लों से भी ज्यादा प्रसिद्धि पा चुके हैं । कई बार तो बाद में पता चलता है कि जो शेर हर गली कूचे पर दिखाई सुनाई दे जाता है वो बद्र साहब का ही लिखा है। इन तमाम शेरों को यहाँ समेट पाना तो एक पोस्ट में मुश्किल होगा पर इससे पहले इस कड़ी के दूसरे भाग के साथ मैं आपके पास पहुँचूँ उनके पसंदीदा अशआरों को इस ब्लॉग के फेसबुक पेज पर बाँटता रहूँगा।

Monday, December 16, 2013

उज्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं : दाग़ देहलवी की ग़ज़ल मेहदी हसन की आवाज़ में !

एक शाम मेरे नाम पर आज की महफिल सजी है जनाब नवाब मिर्ज़ा ख़ान की एक प्यारी ग़ज़ल से। ये वही खान साहब हैं जिन्हें उर्दू कविता के प्रेमी दाग़ देहलवी के नाम से जानते हैं।

दाग़ (1831-1905) मशहूर शायर जौक़ के शागिर्द थे। जौक़, बहादुर शाह ज़फर के दरबार की रौनक थे वहीं दाग़ का प्रादुर्भाव ऐसे समय हुआ जब जफ़र की बादशाहत में मुगलिया सल्तनत दिल्ली में अपनी आख़िरी साँसें गिन रही थी। सिपाही विद्रोह के ठीक एक साल पहले दिल्ली में गड़बड़ी की आशंका से दाग़ रामपुर के नवाबों की शरण में चले गए। दो दशकों से भी ज्यादा वहाँ बिताने के बाद जब नवाबों की नौकरी छूटी तो हैदराबाद निज़ाम के आमंत्रण पर वे उनके दरबार का हिस्सा हो गए और अपनी बाकी की ज़िंदगी उन्होंने वहीं काटी।


उर्दू साहित्य के समालोचक मानते हैं कि दाग़ की शायरी में उर्दू का भाषा सौंदर्य निख़र कर सामने आता है। इकबाल, ज़िगर मुरादाबादी, बेख़ुद देहलवी, सीमाब अकबराबादी जैसे मशहूर शायर दाग़ को अपना उस्ताद मानते थे। बहरहाल चलिए देखते हैं कि दाग़ ने क्या कहना चाहा है अपनी इस ग़ज़ल में

उज्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं

देखते ही मुझे महफिल में ये इरशाद हुआ
कौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं

उन्हें मेरे यहाँ आने में भी संकोच है तो दूसरी तरफ़ अपनी महफ़िलों में उन्होंने मुझे बुलाना ही छोड़ दिया है। अगर ग़लती से वहाँ चला जाऊँ तो वो भी लोगों को नागवार गुजरता है। दुख तो इस बात का है कि मुझसे ना मिलने की उसने कोई वज़ह भी नहीं बतलाई है।

दाग़ का अगला शेर व्यक्ति की उस मनोदशा को निहायत खूबसूरती से व्यक्त करता है जिसमें कोई शख्स चाहता कुछ है और दिखाना कुछ और चाहता है। मन में इतनी नाराजगी है कि उनके सामने जाना गवारा नहीं पर दिल की बेचैनी उन्हें एक झलक देख भी लेना चाहती है। ऐसी हालत में चिलमन यानि बाँस की फट्टियों वाले पर्दे ही तो काम आते हैं..

खूब पर्दा है के चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

और ये तो मुझे ग़ज़ल का सबसे खूबसूरत शेर लगता है..

हो चुका क़ता ताल्लुक तो जफ़ायें क्यूँ हों
जिनको मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं

यहाँ दाग़ कहते हैं जब आपस में वो रिश्ता रहा ही नहीं फिर क्यूँ मुझे प्रताड़ित करते हो। दरअसल तुम मुझे भूल नहीं पाए हो वर्ना मुझे सताने की इस तरह कोशिश ही नहीं करते।

मुंतज़िर हैं दमे रुख़सत के ये मर जाए तो जाएँ
फिर ये एहसान के हम छोड़ के जाते भी नहीं

तुम्हें इंतज़ार है कि मैं इस ज़हाँ को छोड़ूँ तो तुम जा सको और मैं हूँ कि ये एहसान करना ही नहीं चाहता :)

सर उठाओ तो सही, आँख मिलाओ तो सही
नश्शाए मैं भी नहीं, नींद के माते भी नहीं

अरे तुमने कैसे समझ लिया कि मैं नींद में हूँ या नशे में हूँ। मेरे चेहरे की रंगत तो यूँ ही बदल जाएगी..बस एक बार तुम सिर उठाकर, आँखों में आँखें डाल कर तो देखो।

क्या कहा, फिर तो कहो; हम नहीं सुनते तेरी
नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

देखिए दाग़ प्रेमियों की आपसी नोंक झोक को कैसे प्यार भरी उलाहना के रूप में व्यक्त करते हैं। लो सारा दिन तुम्हारा ख़्याल दिल से जाता ही नहीं । तिस पर तुम कहते हो कि हम तुम्हारी सुनते नहीं। ऐसे लोगों को कुछ कहने से क्या फ़ायदा जो दिल की बात भी ना समझ सकें।

मुझसे लाग़िर तेरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझसे नाज़ुक मेरी आँखों में समाते भी नहीं

कुछ तो चाहत है हम दोनों के बीच जो हम जैसे भी हैं एक दूसरे को पसंद करते हैं। वर्ना क्या ऐसा होता कि मुझसे दुबली पतली काया वाले तुम्हें अच्छे नहीं लगते वहीं तुमसे भी हसीन, नाजुक बालाएँ मुझे पसंद नहीं आतीं।

ज़ीस्त से तंग हो ऐ दाग़ तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं

और मक़ते में दाग दार्शनिकता का एक पुट ले आते हैं। हम हमेशा अपनी ज़िंदगी, अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। वही ज़िदगी जब हमें छोड़ कर जाने लगती है तो उसे किसी हालत में खोना नहीं चाहते। इसलिए अपनी तंगहाली का रोना रोने से अच्छा है कि उससे लड़ते हुए अपने जीवन को जीने लायक बनाएँ।

ये तो थी दाग़ की पूरी ग़ज़ल। इस ग़ज़ल के कुछ अशआरों को कई फ़नकारों ने अपनी आवाज़ से सँवारा है मसलन बेगम अख्तर, फरीदा खानम, रूना लैला व मेहदी हसन। पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे इसे मेहदी हसन की आवाज़ में इस ग़ज़ल को सुनना पसंद है। जिस तरह वो ग़जल के एक एक मिसरे को अलग अंदाज़ में गाते हैं उसका कमाल बस सुनकर महसूस किया जा सकता है।


वैसे ग़ज़ल गायिकाओं की बात करूँ तो इस ग़ज़ल को गुनगुनाते वक़्त फरीदा खानम का ख़्याल सबसे पहले आता है।


वैसे आपको इस ग़ज़ल का सबसे उम्दा शेर कौन सा लगा ये जानने का इंतज़ार रहेगा मुझे।

Thursday, December 05, 2013

कविताएँ बच्चन की चयन अमिताभ बच्चन का : बच्चन प्रेमियों के लिए एक अमूल्य पुस्तक !

पिछले हफ्ते हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के इस संकलन को पढ़ा। इस संकलन की खास बात ये है कि इसमें संकलित सत्तर कविताओं का चयन अमिताभ बच्चन ने किया है। अमिताभ ने इस संकलन में अपने पिता द्वारा चार दशकों में लिखी गई पुस्तकों आकुल अंतर, निशा निमंत्रण, सतरंगिनी, आरती और अंगारे, अभिनव सोपान, मधुशाला, मेरी कविताओं की आधी सदी, मधुबाला, चार खेमे चौंसठ खूँटे, बहुत दिन बीते, दो चट्टानें , त्रिभंगिमा, मिलन यामिनी, जाल समेटा, एकांत संगीत और कटती प्रतिमाओं की आवाज़ में से अपनी पसंदीदा कविताएँ चुनी हैं।


अमिताभ के लिए उनके पिता की लिखी ये कविताएँ क्या मायने रखती हैं? अमिताभ इस प्रश्न का जवाब इस पुस्तक की भूमिका में कुछ यूँ देते हैं..
मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे उनकी सभी कविताएँ पूरी तरह समझ आती हैं। पर यह जरूर है कि उस वातावरण में रहते रहते, उनकी कविताएँ बार बार सुनते सुनते उनकी जो धुने हैं, उनके जो बोल हैं वह अब जब पढ़ता हूँ तो बिना किसी कष्ट के ऐसा लगता है कि यह मैं सदियों से सुनता आ रहा हूँ, और मुझे उस कविता की धुन गाने या बोलने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। मैंने कभी बैठकर उनकी कविताएँ रटी नहीं हैं। वह तो अपने आप मेरे अंदर से निकल पड़ती हैं।
ज़ाहिर है कि इस संकलन में वो कविताएँ भी शामिल हैं जिनसे शायद ही हिन्दी काव्य प्रेमी अनजान हो पर जिन्हें बार बार पढ़ने पर भी मन एक नई धनात्मक उर्जा से भर उठता है। जो बीत गई सो बात गई, है अँधेरी रात तो दीवा जलाना कब मना है, इस पार प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा, जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला.., नीड़ का निर्माण फिर फिर, मधुशाला की रुबाइयाँ, अग्निपथ व बुद्ध और नाचघर को ऐसी ही लोकप्रिय कविताओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। पर इनके आलावा भी इस पुस्तक में आम बच्चन प्रेमियों के लिए उनकी उन रचनाओं का भी जखीरा है जिसे शायद आपने पहले ना पढ़ा हो और जिसका चुंबकीय आकर्षण उनके सस्वर पाठ करने पर आपको मजबूर करता है।

इस पुस्तक में शामिल बच्चन जी कुछ जानी अनजानी  रचनाओं को आज आपके सम्मुख लाने की कोशिश कर रहा हूँ जिनमें दर्शन भी है और प्रेम भी,एकाकीपन के स्वर हैं तो दिल में छुपी वेदना का ज्वालामुखी भी।

 (1)
मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूँ।
चिड़िया नें मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?'
मैंने कहा, 'नहीं'।
'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?'
'नहीं।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?'
'नहीं।'
'जान है?'
'नहीं।'
'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?'
मैनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है'
चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?'
एक अनुभव हुआ नया।
मैं मौन हो गया!


(2)
जानकर अनजान बन जा।

पूछ मत आराध्य कैसा,
जब कि पूजा-भाव उमड़ा;
मृत्तिका के पिंड से कह दे
कि तू भगवान बन जा।
जानकर अनजान बन जा।


आरती बनकर जला तू
पथ मिला, मिट्टी सिधारी,
कल्पना की वंचना से
सत्‍य से अज्ञान बन जा।
जानकर अनजान बन जा।


किंतु दिल की आग का
संसार में उपहास कब तक?
किंतु होना, हाय, अपने आप
हत विश्वास कब तक?
अग्नि को अंदर छिपाकर,
हे हृदय, पाषाण बन जा।
जानकर अनजान बन जा।

(3)
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमनें कान लगाया,
फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं

उपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा उपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं


 (4)
कोई पार नदी के गाता!

भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर, आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!

होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई, उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!

आज न जाने क्यों होता मन,
सुन कर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता, सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!

(5)
आज मुझसे बोल, बादल!

तम भरा तू, तम भरा मैं,
गम भरा तू, गम भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

भेद यह मत देख दो पल--
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूँद है अनमोल बादल!
आज मुझसे बोल, बादल

171 पृष्ठों की इस पुस्तक का सबसे रोचक पहलू है इसके साथ दिया गया परिशिष्ट जिसमें अमिताभ बच्चन ने बड़ी संवेदनशीलता से बाबूजी से जुड़ी अपने बचपन की स्मृतियों को पाठकों के साथ बाँटा है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित 180 रुपये मूल्य की ये पुस्तक बच्चन प्रेमियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होगी ऐसा मेरा मानना है।

Monday, November 25, 2013

नी मै जाणा जोगी दे नाल : क्या आप भी इस जोगी के साथ नहीं जाना चाहेंगे ? 'Jogi' by Fariha Pervez

लोकगीतों में उस माटी की खुशबू होती है जिनमें वो पनप कर गाए और गुनगुनाए जाते हैं। पर भारत, पाकिस्तान, बाँग्लादेश की सांस्कृतिक विरासत ऐसी है कि हमारा संगीत आपस में यूँ घुल मिल जाता है कि उसे सुनते वक़्त भाषा और सरहदों की दीवारें आड़े नहीं आतीं। कुछ दिन पहले सूफी संत बुल्ले शाह का लिखा सूफ़ियत के रंग में रँगा ये पंजाबी लोकगीत नी मै जाणा जोगी दे नाल ... सुन रहा था और एक बार सुनते ही रिप्ले बटन दब गया और तब तक दबता रहा जब तक मन जोगीमय नहीं हो गया।


कोक स्टूडियो के छठे सत्र में इस गीत को अपनी आवाज़ से सँवारा है पाकिस्तानी गायिका फारिहा परवेज़ ने। टीवी पर सूत्रधार और धारावाहिकों में अभिनय करते हुए फारिहा ने 1995 में शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरु की। 1996 से लेकर आज तक उनके सात एलबम आ चुके हैं और बेहद मकबूल भी रहे हैं। फारिहा सज्जाद अली और आशा भोसले को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं।

नी मै जाणा जोगी दे नाल
कन्नी मुंदड़ा पाके, मत्थे तिलक लगा के
नी मै जाणा जोगी दे नाल

ऐ जोगी मेरे मन विच बसया, ऐ जोगी  मेरा जूड़ा कसया
सच आख्याँ मैं कसम कुराने, जोगी मेरा दीन ईमाने

जोगी मेरे नाल नाल, मैं जोगी दे नाल नाल
जोगी मेरे नाल नाल, मैं जोगी दे नाल नाल

जोगी दे नाल नाल, जोगी दे नाल नाल
कोई किस दे नाल, कोई किस दे नाल ते
मैं जोगी दे नाल नाल...

जदोंदी मैं जोगी दी होई, मैं विच मैं ना रह गई कोई
जोगी मेरे नाल नाल, मैं जोगी दे नाल नाल
सा मा गा मा गा रे गा रे गा सा...सा मा गा मा पा ....

नायिका कहती हैं मुझे तो अब अपने जोगी के साथ ही जाना है। कानों में बड़े से झुमके पहन और माथे पे तिलक लगा कर मैं अपने जोगी को रिझाऊँगी। और क्यूँ ना करूँ  मैं ऐसा ? आख़िर ये जोगी मेरे मन में जो बस गया है। मेरा जूड़ा मेरे जोगी ने ही बनाया है। सच, पवित्र कुरान की कसम खा कर कहती हूँ ये जोगी मेरा दीन-ईमान बन गया है। अब तो जोगी मेरे साथ है और मैं जोगी के साथ हूँ । वैसे इसमें विचित्र लगने वाली बात क्या है ? इस दुनिया में कोई किसी के साथ है तो कोई किसी और के साथ। मैंने जोगी को अपना सहचर मान लिया है और जबसे ऐसा हुआ है मेरा कुछ अपना अक़्स नहीं रहा।

जोगी नाल जाणा..जोगी नाल जाणा.. जोगी नाल जाणा.
नी मै जाणा जाणा जाणा , नी मै जाणा जोगी दे नाल

सिर पे टोपी ते नीयत खोटी, लैणा की टोपी सिर तर के ?
तस्बीह फिरी पर दिल ना फिरया, लैणा की तस्बीह हथ फड़ के ?
चिल्ले कीते पर रब ना मिलया, लैणा की चिलेयाँ विच वड़ के ?

बुल्लेया झाग बिना दुध नयीं कढ़दा, काम लाल होवे कढ़ कढ़ के
जोगी दे नाम नाल नाल, नी मै जाणा जोगी दे नाल
कन्नी मुंदड़ा पाके, मत्थे तिलक लगा के
नी मै जाणा जोगी दे नाल....

तुम्हें इस जोगन की भक्ति सही नहीं लगती ? तुम सर पर टोपी रखते हो पर दूसरों के प्रति तुम्हारे विचारों में शुद्धता नहीं है। फिर ऐसी टोपी किस काम की? तुम्हारे दोनों हाथ प्रार्थना के लिए उठे हुए हैं पर उसके शब्द दिल में नहीं उतर रहे। फिर ऐसी पूजा का अर्थ ही क्या है? तुम सारे रीति रिवाज़ों का नियमपूर्वक अनुसरण करते हो पर तुमने कभी भगवान को नहीं पाया। फिर ऐसे रीति रिवाज़ों का क्या फायदा ? इसीलिए बुल्ले शाह कहते है कि जैसे बिना जोरन के दूध से दही नहीं बनता वैसे ही बिना सच्ची भक्ति के भगवान नहीं मिलते। सो मैं तो चली अपने जोगी की शरण में..



नुसरत फतेह अली खाँ की इस कव्वाली को रोहेल हयात ने फाहिदा की आवाज़ का इस्तेमाल कर एक गीत की शक़्ल देनी चाही है जिसमें एक ओर तो सबर्यिन बैंड द्वारा पश्चिमी वाद्य यंत्रों (Trumpet, Saxophone, Violin etc.) से बजाई जाती हुई मधुर धुन है तो दूसरी ओर पंजाब की धरती में बने इस गीत की पहचान बनाता सामूहिक रूप से किया गया ढोल वादन भी है। मुअज्जम अली खाँ की दिलकश सरगम गीत की अदाएगी में निखार ले आती है। फाहिदा परवेज़ की गायिकी और कोरस जोगी की भक्ति में मुझे तो झूमने पर मजबूर कर देता है> देखें आप इस गीत से आनंदित हो पाते हैं या नहीं ?..

Monday, November 18, 2013

बेनाम सी ख़्वाहिशें, आवाज़ ना मिले..बंदिशें क्यूँ ख़्वाब पे..परवाज़ ना मिले (Benaam si khwahishein...)

पापोन यानि 'अंगराग महंता' की आवाज़ से मेरा परिचय बर्फी में उनके गाए लाजवाब गीतों से हुआ था। आपको तो मालूम ही है कि एक शाम मेरे नाम पर साल 2012 की वार्षिक संगीतमाला में सरताज गीत का खिताब पापोन के गाए गीत क्यूँ ना हम तुम... को मिला था। उस गीत के बारे में लिखते हुए बहुमुखी प्रतिभा संपन्न पापोन के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और जाना । पर बतौर संगीतकार उन्हें सुनने का मौका पिछले महिने MTV के कार्यक्रम कोक स्टूडियो में मिला।

पापोन यूँ तो उत्तर पूर्व के लोक गीतों और पश्चिमी संगीत को अपनी गायिकी में समेटते रहे हैं। पर इस कार्यक्रम के दौरान पिंकी पूनावाला की लिखी एक दिलकश नज़्म के मिज़ाज को समझते हुए जिस तरह उन्होंने संगीतबद्ध किया उसे सुनने के बाद बतौर कलाकार उनके लिए मेरे दिल में इज़्ज़त और भी बढ़ गयी। पापोन ने इस गीत को गवाया है अन्वेशा दत्ता गुप्ता (Anwesha Dutta Gupta) से। 


ये वही अन्वेशा है जिन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ से कुछ साल पहले अमूल स्टार वॉयस आफ इंडिया में अपनी गायिकी के झंडे गाड़े थे। 19 साल की अन्वेशा ने चार साल की छोटी उम्र से ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी। इतनी छोटी उम्र में उन्होंने अपनी आवाज़ में जो परिपक्वता हासिल की है वो आप इस गीत को सुन कर महसूस कर सकते हैं। ग़ज़ल और नज़्मों को गाने के लिए उसके भावों को परखने की जिस क्षमता और ठहराव की जरूरत होती है वो अन्वेशा की गायिकी में सहज ही नज़र आता है। नज़्म के बोल जहाँ मीटर से अलग होते हैं उसमें बड़ी खूबसूरती से अन्वेशा अपनी अदाएगी से भरती हैं। मिसाल के तौर पर दूसरे अंतरे में उनका क्यूँ ना जाए..आ जा को गाने का अंदाज़ मन को मोह लेता है।

इस नज़्म को लिखा है नवोदित गीतकार पिंकी पूनावाला ने। अक्सर हमारी चाहतें ज़मीनी हक़ीकत से मेल नहीं खाती। फिर भी हम अपने सपनों की उड़ान को रुकने नहीं देना चाहते, ये जानते हुए भी को वो शायद कभी पूरे ना हों। पिंकी दिल की इन्हीं भावनाओं को रूपकों के माध्यम से नज़्म के अंतरों में उतारती हैं। वैसे आज के इस भौतिकतावादी समाज में पिंकी भावनाओं की ये मुलायमित कहाँ से ढूँढं पाती हैं? पिंकी का इस बारे में नज़रिया कुछ यूँ है...
"मुझे अपनी काल्पनिक दुनिया में रहना पसंद है। मेरी उस दुनिया में सुंदरता है, प्यार है, सहानुभूति है, खुशी है। इस संसार का सच मुझे कोई प्रेरणा नहीं दे पाता। अपनी काल्पनिक दुनिया से मुझे जो  प्रेरणा और शक्ति मिलती है उसी से मैं वास्तविक दुनिया के सच को बदलना चाहती हूँ।"
कोक स्टूडिओ जैसे कार्यक्रमों की एक ख़ासियत है कि आप यहाँ आवाज़ के साथ तरह तरह के साज़ों को बजता देख सकते हैं। पापोन ने इस नज़्म के इंटरल्यूड्स में सरोद और दुदुक (Duduk) का इस्तेमाल किया है। सरोद पर प्रीतम घोषाल और दुदुक पर निर्मलया डे की थिरकती ऊँगलियों से उत्पन्न रागिनी मन को सुकून पहुँचाती हैं। बाँसुरी की तरह दिखता दुदुन आरमेनिया का प्राचीन वाद्य यंत्र माना जाता है। इसके अग्र भाग की अलग बनावट की वज़ह से ये क्लारिनेट जैसा स्वर देता है।

तो आइए सुनते हैं अन्वेशा की आवाज़ में ये प्यारा सा नग्मा...


बेनाम सी ख़्वाहिशें, आवाज़ ना मिले
बंदिशें क्यूँ ख़्वाब पे..परवाज़ ना मिले
जाने है पर माने दिल ना तू ना मेरे लिए
बेबसी ये पुकार रही है आ साजन मेरे

चाँद तेरी रोशनी आफ़ताब से है मगर
चाह के भी ना मिले है दोनों की नज़र
आसमाँ ये मेरा जाने दोनों कब हैं मिले
दूरियाँ दिन रात की हैं, तय ना हो फासले

पतझड़ जाए, बरखा आए हो बहार
मौसम बदलते रहे
दिल के नगर जो बसी सर्द हवाएँ
क्यूँ ना जाएँ
आ जा आ भी जा मौसम कटे ना बिरहा के
 (परवाज़ :उड़ान,  आफ़ताब :  सूरज)

तो इन बिना नाम की ख़्वाहिशों की सदा आपके दिल तक पहुँची क्या?

Thursday, November 14, 2013

बाल दिवस विशेष : जब इब्ने इंशा ने दौड़ाया कछुए और खरगोश को !

कुछ महीने पहले मैंने इब्ने इंशा की लिखी 'उर्दू की आख़िरी किताब' के बारे में विस्तार से चर्चा की थी। उस चर्चा में ये भी बताया था कि इस किताब का एक विशेष पहलू ये भी है कि इसके अंतिम खंड में शामिल कहानियाँ यूँ तो बचपन में नैतिक शिक्षा की कक्षा में पढ़ाई गई कहनियों से प्रेरित है पर इब्ने इंशा अपनी धारदार लेखनी और जबरदस्त तंज़ों से  इन कहानियों में ऐसा घुमाव ले आते हैं कि हँसी के फव्वारे छूट पड़ते हैं। इस पुस्तक के बारे में लिखते हुए आपको 'एकता में बल है' वाली कहानी तो पहले ही सुना ही चुका हूँ। आज बाल दिवस के अवसर पर सोचा कि बच्चों के साथ साथ आपको भी 'कछुए और खरगोश' की कहानी सुनाई जाए। 


अब आप ही बताइए भला हममें से किसका बचपन पचतंत्र की इस कहानी को बिना सुने गुजरा होगा? उस कहानी में जरूरत से ज्यादा आत्म विश्वास खरगोश मियाँ को धूल चटा गया था। और तभी से हम सब को ये कहावत 'Slow and Steady wins the race'  तोते की तरह कंठस्थ हो गयी थी। पर इब्ने इंशा ने जिस खरगोश और कछुए की जोड़ी का ज़िक्र इस किताब में किया है वो दूसरी मिट्टी के बने थे। इब्ने इंशा कि कहानी कुछ यूँ शुरु होती है..
"एक था कछुआ, एक था खरगोश। दोनों ने आपस में दौड़ की शर्त लगाई। कोई कछुए से पूछे कि तूने ये शर्त क्यूँ लगाई? क्या सोचकर लगाई? बहरहाल तय ये हुआ कि दोनों में से जो नीम के टीले तक पहले पहुँचे उसे एख़्तियार है कि हारनेवाले के कान काट ले.."

आगे क्या हुआ?  किसकी कान कटी? जानने के लिए सुनिए इब्ने इंशा की ये मज़ेदार कहानी मेरी ज़ुबानी...

..

Sunday, November 10, 2013

जाने भी दो यारों : एक मनोरंजक फिल्म पर लिखी गई रोचक किताब !

कुछ सालों पहले एक मित्र ने फिल्म जाने भी दो यारों पर जय अर्जुन सिंह की लिखी पुस्तक  Jane Do Bhi Yaaro Seriously funny since 1983 की सिफारिश की थी। अपने शहर में तो मिली नहीं। कुछ बड़े शहरों में जब गया तो वहाँ खोजा पर किसी फिल्म के बारे में लिखी किताब लीक से हट कर ही होती है। सो वहाँ भी निराशा हाथ लगी और फिर मैं इस किताब के बारे में भूल ही गया। पिछले महीने अचानक ही दोस्तों के बीच 'जाने भी दो यारों' के सबसे पसंदीदा दृश्य की चर्चा चली तो फिर एकदम से इस किताब की याद आ गई। इंटरनेट पर इसे खँगाला और कुछ ही दिनों में ये मेरे स्टडी टेबल की शोभा बढ़ा रही थी। 'जाने दो भी यारों' को मेरी पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने दूरदर्शन पर ही देखा। वैसे भी उन दिनों मल्टीप्लेक्स तो थे नहीं तो NFDC द्वारा निर्मित फिल्मों का हम जैसे छोटे शहरों के बाशिंदों तक पहुँच पाना बेहद मुश्किल था।


किशोरावस्था के दिनों में देखी इस फिल्म का मैंने खूब आनंद उठाया था। फिल्म का चर्चित संवाद 'थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको..., म्युनिसिपल कमिश्नर डिमेलो के रूप में फिल्म के आधे हिस्से में चलती फिरती लाश का किरदार निभाने वाले सतीश शाह का अभिनय, तरनेजा और आहूजा की डील पर पलीता लगाता वो सीक्रेट कॉल और अंत का महाभारत वाला दृश्य दशकों तक फिल्म ना देखने के बाद भी दिमाग से उतरा नहीं था इसीलिए ये किताब हमेशा मेरी भविष्य में पढ़ी जाने वाली किताबों की सूची में आगे रही।  पिछले हफ्ते जब दीपावली की छुट्टियों में 272 पृष्ठों वाली इस किताब को पढ़ने का मौका मिला तो इस फिल्म के सारे दृश्य एक एक कर फिर से उभरने लगे।

पर इस किताब की बात करने से पहले इसके लेखक से आपका परिचय करा दूँ। 1977 में जन्मे जय अर्जुन सिंह विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र रूप से लिखते तो रहे ही हैं पर साथ ही वे एक ब्लॉगर भी हैं अपने ब्लॉग Jabberwock पर फिल्मों के बारे में नियमित रूप से लिखते हैं। उनकी दूसरी किताब Popcorn Essayists : What Movies do to Writers ? 2011 में प्रकाशित हुई थी।


अर्जुन ने इस किताब को तीन अहम हिस्सों में बाँटा है। पहले हिस्से की शुरुआत वो फिल्म के निर्देशक कुंदन शाह के छात्र जीवन से करते हैं। वे पाठकों को बताते हैं कि किस तरह 'स्टोर एटेंडेंट' का काम करने वाला ये शख़्स पुणे के फिल्म और टेलीविजन इंस्टट्यूट में जा पहुँचा? किस तरह वहाँ से उत्तीर्ण होने के कई सालों बाद उसके मन में अपनी एक फिल्म बनाने के सपने का जन्म हुआ। अपने आस पास की परिस्थितियों और अपने दोस्त की आप बीती से प्रभावित हो कर कुंदन शाह जब इस फिल्म की पटकथा लिखने बैठे तब जाकर इस फिल्म की कहानी का प्रारूप तैयार हुआ। कुंदन शाह, रंजीत कपूर व सतीश कौशिक के सहयोग से इस फिल्म की पटकथा किस तरह विकसित हुई ये जानना इस फिल्म के चाहने वालों के लिए तो दिलचस्प है ही पर साथ ही फिल्म निर्माण के दौरान पटकथा में आने वाले परिवर्तन की प्रक्रिया फिल्म निर्माण के प्रति हमारी समझ को बढ़ाती है।

किताब के दूसरे संक्षिप्त हिस्से में फिल्म में काम करने वाले किरदारों के चयन से जुड़े मज़ेदार तथ्य हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि फिल्म के मुख्य किरदार और सबसे बड़े नाम नसीरुद्दीन शाह को मेहनताने के रूप में तब सिर्फ 15000 रुपये मिले थे। पंकज कपूर, रवि वासवानी, सतीश शाह, ओम पुरी जैसे कलाकारों की हालत तो उससे भी गयी गुजरी थी। पर सात लाख से थोड़े ज्यादा बजट की ये फिल्म पैसों के लिए नहीं बनी थी। इसमें काम करने वाले अधिकांश कलाकार अपने कैरियर के उस पड़ाव पर थे जहाँ कुछ अच्छा और सामान्य से अलग करने का जज़्बा किसी भी पारिश्रमिक से कहीं ऊपर था। कलाकारों की इसी भावना ने फिल्म की इतनी बड़ी सफलता की नींव रखी।

इस किताब का सबसे रोचक हिस्सा तब आरंभ होता है जब अर्जुन पाठकों के सामने इसमें आने वाले हर दृश्य के पीछे की कहानी को परत दर परत उधेड़ते हैं। ऐसे तो किसी भी उत्पाद का मूल्यांकन उसके आख़िरी स्वरूप के आधार पर होता है पर अगर आप उस उत्पाद को उस स्वरूप तक लाने के लिए आई मुश्किलों और उन कठिनाइयों पर सामूहिक चेष्टाओं के बल पर पाई विजय के बारे में जान लें तो उस उत्पाद के प्रति आपका नज़रिया पहले से ज्यादा गहन और परिष्कृत हो जाता है। किसी फिल्म को पहली बार देखने वाला पर्दे पर घटने वाली कई बातों को सहज ही नज़रअंदाज कर देता है। इस किताब को पढ़ने के बाद अर्जुन द्वारा लिखी बातों के मद्देनज़र इस फिल्म को दोबारा देख रहा हूँ और हर दृश्य के बारे में एक अलग अनुभूति हो रही है। 


अब भला आप ही बताइए 'तनेजा' और 'आहूजा' की मीटिंग के पहले मारे गए चूहे को देख कर क्या आप सोचेंगे कि चूहे की लाश कैसे जुगाड़ी गई होगी? महाभारत वाले दृश्य के ठीक बाद, लाश को ले कर भागते किरदारों को बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ में घुसते देख कर क्या आपको ये अजीब लगा होगा कि इन बुर्कों का रंग सिर्फ काला क्यूँ नहीं है? क्या आप कल्पना करेंगे कि सतीश कौशिक और नसीर के टेलीफोन वाले दृश्य में रिसीवर को नीचे पटकने के बजाए नसीर दृश्य के लॉजिक के परे होने की वज़ह से अपना सर पटक रहे होंगे? फिल्म के निराशाजनक अंत को देखकर कहाँ जाना था कि मेरी तरह राजकपूर को भी ये अंत नागवार गुजरा होगा?  क्या आप जानते हैं कि अनुपम खेर ने इस फिल्म में 'डिस्को किलर' का दिलचस्प चरित्र किया था। पर इतनी मेहनत के बाद उन्हें क्या पता था कि उनका चरित्र सिर्फ इस वजह से फिल्म से कट जाएगा क्यूँकि 145 मिनट से ज्यादा लंबी फिल्म होने से नियमों के मुताबिक निर्माता NFDC को ज्यादा टैक्स भरना पड़ता। ऐसी तमाम घटनाओं का इस पुस्तक में जिक्र है जो आपको पुस्तक से अंत तक बाँधे रखती है।

लेखक ने जहाँ इस फिल्म के सशक्त पक्षों को पाठकों के सामने रखा है वहीं इसकी कमियों की ओर इशारा करने से भी गुरेज़ नहीं किया है। कुल मिलाकर इंटरनेट पर दौ सौ रुपयों में उपलब्ध ये किताब उन सभी लोगों को पसंद आएगी जिन्हें समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को अपने तीखे व्यंग्यों से कचोटती और अपनी निराली पटकथा से गुदगुदाती ये फिल्म हिंदी सिनेमा में अपनी कोटि की बेहतरीन फिल्म लगती है।
 

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