Tuesday, July 09, 2013

कैसे देखते हैं गुलज़ार 'बारिश' को अपनी नज़्मों में... (Barish aur Gulzar)

बारिश का मौसम हो तो औरों को कुछ हो ना हो शायरों को बहुत कुछ हो जाता है और अगर बात गुलज़ार की हो रही हो तब तो क्या कहने ! कुछ साल पहले बारिशों के मौसम में परवीन शाकिर पर बात करते हुए उनकी उससे जुड़ी नज़्मों की चर्चा हुई थी। कुछ दिनों पहले ही एक गुलज़ार प्रेमी मित्र ने  इस ब्लॉग पर कई दिनों से उनकी नज़्मों का ज़िक्र ना होने की बात कही थी। तो मैंने सोचा क्यूँ ना बारिश के इस मौसम को इस बार गुलज़ार साहब की आँखो से देखने का प्रयास किया जाए उनकी चार अलग अलग नज़्मों के माध्यम से..


 (1)

सच पूछिए तो कुछ घंटों की बारिश से हमारे शहरों और कस्बों का हाल बेहाल हो जाता है। नालियों का काम सड़के खुद सँभाल लेती हैं। कीचड़ पानी में रोज़ आते जाते कोफ्त होने लगती है। पर जब गुलज़ार जैसा शायर इन बातों को देखता है तो इसमें से भी मन को छू जाने वाली पंक्तियाँ का सृजन कर देता है। बारिश के मौसम में साइकिल को गड्ढ़े भर पानी में उतारते वक़्त अपना संतुलन ना खोने और कपड़े मैले हो जाने के ख़ौफ के आलावा तो मुआ कोई और ख़्याल मेरे मन में नहीं आया। पर गुलज़ार की साइकिल का पहिया पानी की कुल्लियाँ भी करता है और उनकी छतरी आकाश को टेक बनाकर बारिश की टपटपाहट का आनंद भी उठाती है।

बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला
सब बजने लगते हैं

तंग गली में जाते-जाते,
साइकल का पहिया पानी की कुल्लियाँ करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं क़द भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूब के चलता है

ख़ुश्क था तो रस्ते में टिक टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप टप चलते हैं !


 (2)
गुलज़ार की इस दूसरी नज़्म में बारिश काव्य का विषय नहीं बल्कि सिर्फ एक बिंब है । एक ऐसा बिंब जिसकी मदद से वो दिल के जख्मों को कुरेदते चलते हैं। गुलज़ार की इस भीगी नज़्म को पढ़ते हुए सच में इक अफ़सोस का अहसास मन में तारी होने लगता है...



मुझे अफ़सोस है सोनां....

कि मेरी नज़्म से हो कर गुज़रते वक्त बारिश में,
परेशानी हुई तुम को ...
बड़े बेवक्त आते हैं यहाँ सावन,
मेरी नज़्मों की गलियाँ यूँ ही अक्सर भीगी रहती हैं।
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है,
अगर पाँव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है
मुझे अफ़सोस है लेकिन...

परेशानी हुई तुम को....
कि मेरी नज़्म में कुछ रौशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीज़ों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाखून कितनी बार टूटे हैं...
हुई मुद्दत कि चौराहे पे अब बिजली का खम्बा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुम को...
मुझे अफ़सोस है सचमुच!!

 (3)
यूँ तो गर्मी से जलते दिनों के बाद बारिश की फुहार मन और तन दोनों को शीतल करती है। पर जैसा कि आपने पिछली नज़्म में देखा गुलज़ार की नज़्में बारिश को याद कर हमेशा उदासी की चादर ओढ़ लिया करती हैं। याद है ना आपको फिल्म इजाजत के लिए गुलज़ार का लिखा वो नग्मा जिसमें वो कहते हैं "छोटी सी कहानी से ,बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई, ना जाने क्यूँ दिल भर गया ....ना जाने क्यूँ आँख भर गई...."

ऐसी ही एक नज़्म  है बस एक ही सुर में ..जिसमें गुलज़ार मूसलाधार बारिश की गिरती लड़ियों को अपने हृदय में रिसते जख़्म से एकाकार पाते हैं।  देखिए तो नज़्म की पहली पंक्ति लगातार हो रही वर्षा को कितनी खूबसूरती से परिभाषित करती है..

बस एक ही सुर में, एक ही लय पे
सुबह से देख
देख कैसे बरस रहा
है उदास पानी
फुहार के मलमली दुपट्टे से
उड़ रहे हैं
तमाम मौसम टपक रहा है

पलक-पलक रिस रही है ये
कायनात सारी
हर एक शय भीग-भीग कर
देख कैसी बोझल सी हो गयी है

दिमाग की गीली-गीली सोचों से
भीगी-भीगी उदास यादें
टपक रही हैं

थके-थके से बदन में
बस धीरे-धीरे साँसों का
गरम लोबान जल रहा है...


(4)

बारिश से जुड़ी गुलज़ार की नज्मों में ये मेरी पसंदीदा है और शायद आपकी हो। इंसान बरसों के बने बनाए रिश्ते से जब निकलता है तो उससे उपजी पीड़ा असहनीय होती है। टूटे हुए दिल का खालीपन काटने को दौड़ता है। गुलज़ार की ये नज़्म वैसे ही कठिन क्षणों को अपने शब्दों में आत्मसात कर लेती है। जब भी इसे सुनता हूँ मन इस नज़्म में व्यक्त भावनाओं से निकलना अस्वीकार कर देता है। गुलज़ार की आवाज़ में खुद महसूस कीजिए इस नज़्म की विकलता को..

किसी मौसम का झोंका था....
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है
गए सावन में ये दीवारें यूँ सिली नहीं थी
न जाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है ,
दरारे पड़ गयी हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे खुश्क रुखसारों पे गीले आँसू चलते हैं

ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर
ये घर की खिडकियों के काँच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे...
बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानो के पीछे
दुपहरें ऐसी लगती हैं बिना मुहरों के खाली खाने रखे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी और न कोई चाल चलता है
ना दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झोंका था जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है


वैसे बारिश से जुड़ी गुलज़ार की लिखी और किन नज़्मों को आप पसंद करते हैं?

एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

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13 comments:

सागर on July 10, 2013 said...

Pehli barsaat ka mausam to ajab tha jaana....

प्रवीण पाण्डेय on July 10, 2013 said...

सच है, बारिश बहकाती है।

सागर on July 11, 2013 said...

Bas ek hi sur mein, ek hi lay pe - Gulzar

mail id den to aapko bhejun...

rahul0731verma on July 12, 2013 said...

Manishbhai,very nice post about Gulzarsaab

Manish Kumar on July 12, 2013 said...

सागर बड़ी उम्दा नज़्म भेजी आपने। तहे दिल से शुक्रिया...

expression on July 13, 2013 said...

बहुत दिन हो गए सच्ची.....
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं.

खोलती हूँ कोई पुस्तक गुलज़ार की नज्मों से भीगी.
शुक्रिया
अनु

Ravi Dabral on July 14, 2013 said...

din wo bhi yaad aata hai...us ped ke tale pattiyon se risey pani se bana taalab, kuch doobte- tairte jeev jantu...jab bahar nikalne ki jaddo-jahet main...thak haarte...to main usee ped ki tehni se unhein bachaata...jaane kyon wo din, mere bachpan ke din, mujhe yaad aate hain...

आशा जोगळेकर on July 27, 2013 said...

ये आंसुओं को छुपाती बारिस
ये कभी चेहेरे हंसाती बारिश ।

गुलजार जी के बरसते नग्मे आनंद दे गये ।

MANISH KUMAR on June 25, 2015 said...

thanks manishji..#Gulzar sahab such me kalamkejadugar hain..mod par dekha hai budha sa ek ped kabhi..ne dil chhu liya.

Asha Kiran on July 11, 2016 said...

.बहुत अच्छा आलेख है ,बस आप लिखते ज़ांये और हम सब पढते ज़ांये ..

Manish Kumar on July 11, 2016 said...

आशा जी :जरूर आप सब का साथ बना रहे तो कलम बदस्तूर चलती रहेगी

Manish Kaushal on July 11, 2016 said...

साइकल का पहिया भी पानी की कुल्लियां करता है.. ये बस गुलज़ार साहब ही देख सकते हैं.. बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई सर जी..

Manish Kumar on July 11, 2016 said...

हाँ मनीष ये तो गुलज़ार जैसे शायर ही सोच सकते हैं :)

 

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