Wednesday, December 25, 2013

ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता...ग़ज़लें बशीर बद्र की भाग 1

अक्सर ग़ज़ल गायिकी को आम जन तह पहुँचाने का श्रेय हम जगजीत सिंह को देते रहे हैं। जो काम सारी ज़िंदगी जगजीत ने ग़ज़ल गायिकी के लिए किया वही डा. बशीर बद्र ने शायरी के लिए किया है। आसान शब्दों में गहरी बात कहने का हुनर बड़े कम शायरों के पास होता है और बशीर बद्र इसी प्रतिभा के धनी हैं। 

जैसा कि मैंने पहले भी इस ब्लॉग पर लिखा है कि जब भी मुझसे उर्दू के सामान्य लफ़्ज समझने वाला शेर ओ शायरी में अपनी दिलचस्पी ज़ाहिर करता है और पूछता है कि शुरुआत किससे करूँ तो मेरे होठों पर बशीर बद्र का नाम सबसे पहले आता है। मैं जानता हूँ कि कविता से प्रेम करने वाले सभी जन बशीर बद्र को पढ़ना शुरु करेंगे तो उन्हें ना केवल बद्र साहब की लेखनी से बल्कि ग़ज़ल की इस विधा से ही मोहब्बत हो जाएगी।

इस साल को विदा करने से और अगले साल वार्षिक संगीतमाला के शुरु होने के पहले एक शाम मेरे नाम पर ये हफ्ता बद्र साहब की ग़ज़लों और शेरों से गुलज़ार रहेगा। बशीर बद्र साहब की यूँ तो तमाम ग़ज़लें मेरी पसंदीदा हैं पर उनमें से कुछ को यहाँ पढ़ कर आपसे साझा करूँगा। साथ ही इस ब्लॉग के फेसबुक पेज पर उनके तमाम बेहतरीन शेरों का जिक्र चलता रहेगा इस पूरे हफ्ते तक 


तो आइए इस सिलसिले को शुरु करते हैं बद्र साहब की उस ग़ज़ल से जो मेरे दिल के बेहद करीब रही है

(1)
उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता
हज़ारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता

कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता

बहुत से लोग दिल को इस तरह महफूज़ रखते हैं
कोई बारिश हो ये कागज़ ज़रा भी नम नहीं होता


बिछुड़ते वक़्त कोई बदगुमानी दिल में आ जाती
उसे भी ग़म नहीं होता मुझे भी ग़म नहीं होता

ये आँसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना
ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता 



बशीर बद्र के वैसे तो ना जाने कितने काव्य संकलन बाजार में हैं पर इनमें से जितनों पर नज़र गुजरी है उनमें वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'उजाले अपनी यादों के' में उनकी ज्यादातर यादगार ग़ज़लें शामिल हैं। उनकी कुछ ग़ज़लों जैसे कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, सर झुकाओगे तो पत्थर देवता बन जाएगा, कौन आया रास्ते आइनाखाने हो गए,ना जी भर के देखा ना कुछ बात की आदि को जगजीत सिंह और अन्य ग़ज़ल गायक अमरत्व प्रदान कर चुके हैं।

पर सौ के करीब ग़ज़लों के इस संकलन का ये अदना सा हिस्सा है। बशीर बद्र की जो दूसरी ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ इसे जगजीत जी ने गाया है पर इसे पढ़ना इसे सुनने से ज्यादा सुकून देता है। इस ग़ज़ल में बद्र साहब ने रदीफ़ के तौर पर 'कुछ भी नहीं' का जिस खूबसूरती से इस्तेमाल किया है वो गौरतलब है।

 (2)

सोचा नही अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नही
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नही

देखा तुझे सोचा तुझे चाह तुझे पूजा तुझे
मेरी खाता मेरी वफ़ा तेरी खता कुछ भी नही

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नही 

इस शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नही

दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जाएगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकि बचा कुछ भी नही 

एहसास की खुशबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ
खामोश यादों के सिवा, घर में रखा कुछ भी नहीं 

 

 इसी संकलन की प्रस्तावना में प्रकाशक बद्र साहब की शायरी के बारे में लिखते हैं कि
"डा. बशीर बद्र को उर्दू का वह शायर माना जाता है जिसने कामयाबी की बुलंदियों को फतेह कर बहुत लंबी दूरी तक अपनी शायरी में उतारा है। बशीर की शेर ओ शायरी के प्रशंसक जहाँ जुल्फीकार अली भुट्टो, ज्ञानी जैल सिंह, श्रीमती इंदिरा गाँधी हैं वहीं आम आदमी से लेकर रिक्शेवाला, ट्रकवाला तथा कुली मज़दूर तक भी हैं और क्यूँ ना हों? जिसकी शायरी में एक आम आदमी की ज़िंदगी के महफूज़ लमहे शामिल हों, ऐसे व्यक्ति की शायरी क्यूँ ना जगज़ाहिर होगी।"
 तो आइए सुनते हैं उनकी एक और नायाब ग़ज़ल

(3)

होठों पे मोहब्बत के फ़साने नही आते
साहिल पे समन्दर के खज़ाने नही आते

पलके भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते


दिल उजडी हुई एक सराये की तरह है
अब लोग यहाँ रात बिताने नही आते

उडने दो परिंदो को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नही आते


क्या सोचकर आए हो मोहब्बत की गली में
जब नाज़ हसीनों के उठाने नहीं आते

अहबाब (दोस्त) भी गैरो की अदा सीख गये है
आते है मगर दिल को दुखाने नही आते





बशीर बद्र की शायरी का एक पहलू ये भी है कि उनके लिखे तमाम शेर उनकी जानी मानी ग़ज़लों से भी ज्यादा प्रसिद्धि पा चुके हैं । कई बार तो बाद में पता चलता है कि जो शेर हर गली कूचे पर दिखाई सुनाई दे जाता है वो बद्र साहब का ही लिखा है। इन तमाम शेरों को यहाँ समेट पाना तो एक पोस्ट में मुश्किल होगा पर इससे पहले इस कड़ी के दूसरे भाग के साथ मैं आपके पास पहुँचूँ उनके पसंदीदा अशआरों को इस ब्लॉग के फेसबुक पेज पर बाँटता रहूँगा।
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7 comments:

Jiten Dobriyal on December 26, 2013 said...

waah... mere pasandeeda shayar ka kalaam..

lori ali on December 26, 2013 said...

बेहद खूबसूरत दिनों को समेटे बेहद प्यारे अशआर!
बद्र साहब से आशनाई के वे दिन जब पूरे चाँद की सर्द रातों में " धूप की पत्तियाँ और हरा रिबन "सीने से लगाये, खुली छत पर सब भाई बहिन कैम्प फ़ायर किया करते थे……
वे दिन और बशीर साहबका कलाम !!!
"खोया हुआ सा कुछ " याद दिलाने के लिए शुक्रिया!
आप का ब्लॉग तो सचमुच हम जैसे थके हारे मुसाफ़िरों के लिए जन्नत है ……

ranjeet singh said...

Really very good. In fact I was waiting for long Bashir Badra Sahib's Gazals....I also request for Munnavar Rana's Gazals collection. I always follows your ek shaam tere naam, it is my favorite....from..Ranjeet Singh . Thanks !

Manish Kumar on December 26, 2013 said...

लोरी इतने प्यार से आपने अपने बीते दिनों को याद किया कि मुझे लगा कि मेरा ये प्रयास सार्थक हो गया।

रंजीत जी इस पोस्ट को सराहने के लिए धन्यवाद। मुन्नवर राणा की ग़ज़लों की किताब घर अकेला हो गया पर कभी लिखा था यहाँ
'घर अकेला हो गया' : क्या है मुन्नवर राना का दुख ?

मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती

ब्लॉग - चिठ्ठा on December 27, 2013 said...

आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (26 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

Sunita Pradhan on December 29, 2013 said...

Wow!Manish ji very beautiful.Thanks a lot.

Yudhisthar raj on February 06, 2015 said...

बेहतरीन पेशकश ...
ये आपके लिये....
मुझको अपनी नज़र ऐ ख़ुदा चाहिए
कुछ नहीं और इसके सिवा चाहिए

एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा
ज़िन्दगी मुझको तेरा पता चाहिए

इस ज़माने ने लोगों को समझा दिया
तुमको आँखें नहीं, आईना चाहिए

तुमसे मेरी कोई दुश्मनी तो नहीं
सामने से हटो, रास्ता चाहिए
बशीर बद्र साहब

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

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