Monday, January 28, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 14 :गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे

वार्षिक संगीतमाला की चौदहवीं पॉयदान पर गाना वो जिसे आपने पिछले साल बारहा सुना होगा और जिसे सुनने के बाद गुन गुन गुनाने पर भी मज़बूर हुए होंगे। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में पिछले साल मराठी फिल्मों के चर्चित संगीतकार अजय अतुल ने फिल्म सिंघम के गीत बदमाश दिल तो ठग है बड़ा से पहली दस्तक दी थी। उसी पोस्ट में मैंने आपको बताया था किस तरह विकट आर्थिक परिस्थितियों में भी इस जोड़ी ने स्कूल के समय से ही संगीत के प्रति अपने रुझान को मरने नहीं दिया था। सिंघम की सफलता के बाद अजय अतुल की झोली में दूसरी बड़ी फिल्म अग्निपथ आई जिसमें उन्होंने अपने प्रशंसकों को जरा भी निराश नहीं किया। ये कहने में मुझे ज़रा भी संकोच नहीं कि अग्निपथ का संगीत इस साल के प्रथम तीन एलबमों में से एक था।

पर आज तो हम बात करेंगे इस फिल्म के मस्ती से भरे उस गीत की जिसे गाया सुनिधि चौहान और उदित नारायण ने। आजकल के संगीत के बारे में हो रहे परिवर्तन के बारे में जब भी पुराने फ़नकारों से पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि आज के संगीत में ताल वाद्यों का प्रयोग कम से कमतर हो जाता है। एक समय था जब हिंदी फिल्म का कोई तबले की थाप के बिना अधूरा लगता था पर आज संगीत मिश्रण की नई तकनीक और सिंथेसाइसर के इस्तेमाल ने इन वाद्यों की अहमियत घटा दी है। ऐसे समय में अजय अतुल जब ताल वाद्यों की डमडमाहट से आनंद और उत्सव वाले माहौल को इस गीत द्वारा जगाए रखते हैं तो ये बीट्स पहली बारिश के बाद आती मिट्टी की सोंधी खुशबू सी लगती हैं। 


गीत की शुरुआत में घुँघरुओं की छम छम हो या शरीर में थिरकन पैदा करते इंटरल्यूड्स,  या फिर अंतरे में सुनिधि की गाई पहली कुछ पंक्तियों के बाद बड़ी शरारत से लिया गया हूँ...... का कोरस हो, अजय अतुल का कमाल हर जगह दिखता है। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के बोलों में एक ताज़गी है जिसका निखार गीत के हर अंतरे में नज़र आता है। अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे गीतों का मैं शैदाई रहा हूँ। वो एक बार संगीतमाला की सर्वोच्च सीढ़ी पर भी चढ़ चुके हैं।  गीत की परिस्थिति ऐसी है कि नायिका मुँह फुलाए नायक के चेहरे में मुस्कुराहटों की कुछ लकीर बिखेरने का प्रयास कर रही है। अमिताभ भट्टाचार्य अपनी शानदार सोच का इस्तेमाल कर हर अंतरे में ऐसे नए नवेले भाव गढ़ते हैं कि मन दाद दिए बिना नहीं रह पाता। जी हाँ मेरा इशारा रात का केक काटना, चाँद का बल्ब जलाने, ग़म को खूँटी पर टाँगने, ब्लैक में खुशी का पिटारा खरीदने, बंद बोतल के जैसे बैठने जैसे वाक्यांशों की तरफ़ है।

सुनिधि चौहान ने इस गीत को उसी अल्हड़ता और बिंदासपन के साथ गाया है जिसकी इस गीत के मूड को जरूरत थी। उदित जी की आवाज़ आज भी जब मैं किसी गीत में सुनता हूँ तो अफ़सोस होता है कि इतनी बेहतरीन आवाज़ का मालिक होने के बावज़ूद उन्हें इतने कम गीत गाने को क्यूँ मिलते हैं? तो आइए सुनते और गुनते हैं फिल्म अग्निपथ का ये गीत।


गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे

हो.. मायूसियों के चोंगे उतार के फेंक दे ना सारे
कैंडल ये शाम का फूँक रात का केक काट प्यारे
सीखा ना तूने यार हमने मगर सिखाया रे
दमदार नुस्खा यार हमने जो आजमाया रे
आसुओं को चूरण चबा के हमने डकार मारा रे

गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे-

हुँ.. है सर पे तेरे उलझनों के जो ये टोकरे
ला हमको देदे हल्का हो जा रे तू छोकरे
जो तेरी नींदे अपने नाखून से नोच ले..
वो दर्द सारे जलते चूल्हे में तू झोंक रे
जिंदगी के राशन पे, ग़म का कोटा ज्यादा है
ब्लैक में खरीदेंगे खुशी का पिटारा रे

गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे

तू मुँह फुला दे तो ये सूरज भी ढ़लने लगे
अरे तू मुस्कूरा दे चाँद का बल्ब जलने लगे
तू चुप रहे तो मानो बहरी लगे जिंदगी
तू बोल दे तो परदे कानों के खुलने लगे
एक बंद बोतल के, जैसा काहे बैठा है
खाली दिल से भर दे ना, ग्लास ये हमारा रे

गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे

हो.. बिंदास हो के हर गम को यार खूँटी पे टाँग दूँगा
थोडा उधार मै इत्मिनान तुमसे ही माँग लूँगा
है.. सीखा है मैने यार जो तुमने सिखाया रे
दमदार नुस्खा यार मैने भी आजमाया रे
आसुओं को चूरण चबा के मैने डकार मारा रे

गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना रे, गुन गुन गुना ये गाना रे

Saturday, January 26, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 15 :जिया रे जिया रे जिया जिया रे जिया रे...

वार्षिक संगीतमाला की पन्द्रहवीं पॉयदान पर पहली और इस साल की संगीतमाला में आख़िरी बार दाखिल हो रही है ए आर रहमान और गुलज़ार की जोड़ी। वैसे तो ये दोनों कलाकार मेरे प्रिय हैं पर मेरा ऐसा मानना है कि जितना अच्छा परिणाम रहमान जावेद अख़्तर के साथ  देते रहे हैं वो गुलज़ार के साथ उनकी जोड़ी में दिखाई नहीं देता । 'जब तक है जान' के गीत 'छल्ला' पर भले ही गुलज़ार फिल्मफेयर एवार्ड लेने में कामयाब रहे हों पर उनकी लेखनी के प्रेमियों को इस एलबम से जितनी उम्मीदें थी उस हिसाब से उन्होंने निराश ही किया। यही हाल रहमान का भी रहा। जब तक है जान में गुलज़ार ने एक गीत में लिखा

साँस में तेरी साँस मिली तो, मुझे साँस आई.. मुझे साँस आई
रूह ने छू ली जिस्म की खुशबू, तू जो पास आई..  तू जो पास आई

पढ़ने में तो भले ही ये पंक्तियाँ आपको प्रभावित करे पर जब रहमान ने इन बोलों को संगीतबद्ध किया तो सुन कर घुटन सी होने लगी यानि साँस आने के बजाए रुकने लगी। पर जिया रे जिया रे  के लिए रहमान ने जिन दो कलाकारों पर भरोसा किया उन्होंने द्रुत गति की रिदम के इस गीत के साथ पूरा न्याय किया। ये कलाकार थे टेलीविजन के चैनल वी के रियल्टी शो पॉपस्टार की विजेता नीति मोहन और नामी गिटारिस्ट चन्द्रेश कुड़वा। ये गीत फिल्म में बिंदास चरित्र अकीरा यानि अनुष्का शर्मा पर फिल्माया जाना था। नीति ने ये गीत खुली आवाज़ में स्वछंदता से पूरी तह आनंदित होकर गाया है जिसकी गीत के मूड को जरूरत थी। (वैसे नीति इस साल एक और चर्चित गीत गा चुकी हैं जो इस संगीतमाला का हिस्सा नहीं है। बताइए तो कौन सा गीत है वो ?)


चन्द्रेश गिटार पर अपनी उँगलियों की थिरकन शुरु से अंत तक बरक़रार रखते हैं। पार्श्व से दिया उनका सहयोग गीत के रूप को निखार देता है। रहमान इंटरल्यूड्स में गिटार के साथ बाँसुरी और ताली का अच्छा मिश्रण करते हैं।
 
गुलज़ार के बोल ज़िदगी के हर लमहे को पूरी तरह से जीने के लिए हमें उद्यत करते हैं। गीतकार ने कहना चाहा है कि अगर हम जीवन की छोटी छोटी खुशियों को चुनते रहें तो उसकी मिठास ज़ेहन में सालों रस घोलती रहती है। ज़िदगी के उतार चढ़ावों को खुशी खुशी स्वीकार कर हम ना केवल ख़ुद बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी अच्छी मनःस्थिति में रख सकते हैं। जब भी ये गीत सुनता हूँ मन में एक खुशनुमा अहसास सा तारी होने लगता है। तो आइए सुनें इस गीत को



चली रे, चली रे...जुनूँ को लिए
कतरा, कतरा...लमहों को पीये
पिंजरे से उड़ा, दिल का शिकरा
खुदी से मैंने इश्क किया रे
जिया, जिया रे जिया रे

छोटे-छोटे लमहों को, तितली जैसे पकड़ो तो
हाथों में रंग रह जाता है, पंखों से जब छोडो तो
वक़्त चलता है, वक़्त का मगर रंग
उतरता है अकीरा
उड़ते-उड़ते फिर एक लमहा
मैंने पकड़ लिया रे
जिया रे जिया रे जिया जिया रे...

हलके-हलके पर्दों में, मुस्कुराना अच्छा लगता है
रौशनी जो देता हो तो, दिल जलाना अच्छा लगता है
एक पल सही, उम्र भर इसे
साथ रखना अकीरा
ज़िन्दगी से फिर एक वादा
मैंने कर लिया रे
जिया जिया रे जिया रे...

Thursday, January 24, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 16 : कौन हैं 'मैं क्या करूँ' गाने वाले निखिल पॉल जार्ज ?

वार्षिक संगीतमाला की सोलहवीं पॉयदान पर के गीत की ख़ास बात ये है कि इसे गाया है मूलतः एक गिटार वादक ने। ये अलग बात है फिल्म रिलीज़ होने के पहले लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ने में ये गाना अव्वल था। प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को लिखा है आशीष पंडित ने जिनके बारे में इस संगीतमाला की शुरुआत में आपको यहाँ बता चुका हूँ। फिल्म बर्फी के इस गीत के गायक हैं निखिल पॉल जार्ज (Nikhil Paul George)

निखिल का पैतृक निवास केरल में है पर भारत में उनका ज्यादा समय नागपुर में बीता। अब आप सोच रहे होंगे कि निखिल आखिर नागपुर में कर क्या रहे थे? नागपुर में तो निखिल ने कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली पर साथ साथ निजी तौर पर परीक्षा देकर पश्चिमी शास्त्रीय गिटार में भी डिप्लोमा हासिल कर लिया। कंप्यूटर और गिटार दोनों में डिग्रियाँ हासिल करने के बाद एक वज़ीफे की तहत संगीत संयोजन सीखने के लिए निखिल, रॉयल कॉलेज आफ लंदन जा पहुँचे और आजकल वे वहीं रहते हैं। 

प्रीतम से परिचय में आने के बाद उन्होंने उनके कई गीतों में बतौर वादक, प्रोग्रामर, ध्वनि संयोजक का काम किया। प्रीतम के तमाम सफल गीतों टी एमो, रब्बा मैं तो. क्यूँ दूरियाँ ...आदि में वो उनकी टीम का हिस्सा रह चुके हैं। बर्फी के पार्श्व संगीत और फिल्म के गीतों के संगीत संयोजन में भी निखिल ने अपना योगदान दिया था।

एक आम से दीवाने लड़के के दिल की व्यथा को कहते इस गीत के लिए निर्देशक अनुराग बसु और संगीतकार प्रीतम को किसी होनहार गायक की नहीं बल्कि एक ऐसी आवाज़ की तलाश थी जो सिर्फ गीत की भावनाओं को अपनी आवाज़ में उतार सके। निखिल जिस बेचारगी और विवशता से मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ... दसियों बार दोहराते है कि सुनने वाला भी सोचने लगता है कि सच इस हालत में ये लड़का अब करे तो क्या करे? :) आशीष पंडित द्वारा लिखी प्यार में डूबे दिल की ये दास्तां कोई नई नहीं है पर नया है उसे पेश करने का प्रीतम का अंदाज़ जो मन को एक बार में ही मोह लेता है। तो आइए सुनें उनका गाया ये नग्मा...


निखिल शायद ही आगे बतौर गायक हिंदी फिल्म संगीत में आपको नज़र आएँ पर प्रीतम की आगामी फिल्मों में भी वो उनकी टीम का हिस्सा बने रहेंगे।


दिल ये मेरा, बस में नहीं
पहले कभी ऐसा होता था नहीं
तू ही बता इस दिल का मैं
अब क्या करूँ
कहने पे, चलता नहीं
कुछ दिनों से, मेरी भी सुनता नहीं
तू ही बता इस दिल का मैं
उफ्फ अब मैं क्या करूँ
मैं क्या करूँ, मैं क्या करूँ,मैं क्या करूँ, मैं क्या करूँ

करता हैआवारगी
इसपे तो धुन चढ़ी, है प्यार की
ना जाने गुम है कहाँ
बातों में है पड़ा, बेकार की
उलटी ये बात है
ऐसे हालात है
गलती करे ये, मैं भरूँ
उफ़ दिल का क्या करूँ
मैं क्या करूँ...

दिल पे मेरा काबू नहीं
फितरत कभी इसकी ऐसी थी नहीं
तू ही बता...


इस गीत को अभिनीत करने में रणवीर कपूर की कलाकारी भी कमाल की थी जिसका वीडिओ आप यहाँ देख सकते हैं...


Monday, January 21, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 17 : आओ यारों आओ तुमको राह बताऊँ दिल्ली की...

हिंदी सिनेमा में बाल फिल्मों का दायरा बड़ा सीमित रहा है। हर साल रिलीज़ होने वाली फिल्मों में उनका हिस्सा पाँच फीसदी से भी कम रहता है और उसमें भी कई फिल्में बनने के बाद भी उन बच्चों की पहुँच के बाहर रहती हैं जिनके लिए वो बनाई गयी हैं। कार्टून चरित्रों को टीवी पर देखने के लिए बच्चे कितना लालायित रहते हैं ये तो जगज़ाहिर है और यही वज़ह है कि आज डिस्नी चरित्र हों या जापानी डोरेमोन या शिंगचाँग, बच्चों की पहली पसंद बने हुए हैं। हिंदी चरित्रों में 'छोटा भीम' ने विदेशी चरित्रों के बच्चों के मन पर किए गए एकाधिकार को तोड़ा जरूर है पर जातक कथाओं, पंचतंत्र और तमाम राजा रानियों की कहानियों से भरी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के लिए इस क्षेत्र में हिंदी फिल्मों और टेलीविजन को कुछ नया करने की गुंजाइश बहुत है। 

पिछले साल जंगल के चरित्रों को लेकर एक फिल्म बनी नाम था दिल्ली सफ़ारी । संयोग से पिछले महिने जब इसे टीवी पर दिखाया गया तो मैंने भी इस फिल्म को देखा और पर्यावरण को बचाने का संदेश देता हुआ इसी फिल्म का एक गीत आज विराजमान है वार्षिक संगीतमाला की सत्रहवीं पॉयदान पर।

विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधु्ध कटाई को विषय को लेकर बनाई गयी इस फिल्म में ये गीत तब आता है जब जंगल के जानवर अपने घटते रिहाइशी इलाके के ख़िलाफ़ दिल्ली की संसद में अपनी आवाज़ बुलंद करने का फ़ैसला लेते हैं। दिल्ली की इस लंबी राह पर चलते चलते वो भटक जाते हैं पर रास्ते में पूछताछ करते हुए जो उन्हें बताया जाता है वो व्यक्त होता है इस गीत के माध्यम से।

इस गीत को लिखा है समीर ने और धुन बनाई है शंकर अहसान लॉय ने। हम किस तरह अपने आस पास की प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं इसे गीत के हर अंतरे में बड़ी खूबी से चित्रित किया गया है। गीत को आगे बढ़ाने का ढंग मज़ेदार है। पहले गायक उस स्थिति का बयान करते हैं जिस हालत में हमारी ये भारत भूमि पहले थी। फिर एक कोरस उभरता है नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं। फिर आज की स्थिति बताई जाती है। बच्चों को अपने आस पास के वातावरण को बचाए रखने के प्रति सजग रखने के लिए ये सुरीला अंदाज़ बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है।

इस गीत को गाया है मँहगाई डायन खावत जात है.. को गाने वाले रघुवीर यादव ने। जिस तरह किसी नाटक में कोई सूत्रधार गा गा कर कहानी को आगे बढ़ाता है वैसे ही रघुवीर यहाँ दिल्ली के रास्ते का बखान करते जंगली जानवारों को आगे का रास्ता दिखाते हैं। इंसानों पर समीर के मारक व्यंग्यों के साथ रघुवीर की आवाज़ खूब फबती है। गीत की शुरुआत से अंत तक शंकर अहसॉन लाय घड़े जैसे ताल वाद्यों के साथ एक द्रुत लय रचते हैं जिसे सुनते सुनते रघुवीर के साथ सुर में सुर मिलानी की इच्छा बलवती हो जाती है।

तो आइए गीत के बोलों को पढ़ते हुए सुनिए ये शानदार गीत
धड़क धड़क धड़क धड़क..,धड़क धड़क धड़क धड़क..
आओ यारों आओ तुमको राह बताऊँ दिल्ली की
जाओ यहाँ से सीधा जाओ, हिम्मत रखो मत घबराओ
हरियाली का डेरा होगा, जंगल यहाँ घनेरा होगा

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं.....
हरे भरे इस जंगल की इंसानों ने मारी रेड़
काट दिया सारे जंगल को छोड़ दिया इक सूखा पेड़

वहाँ से फिर तुम आगे जाना, हुआ जो उसपे ना पछताना
बहती हुई लहरों का जहाँ, मिलेगी तुमको नदी वहाँ

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं
अरे नदी जहाँ पर कल बहती थी आज वहाँ पर नाला है
मत पूछो इंसानों ने हाल उसका क्या कर डाला है

थोड़ी दूरी तुम तय करना, बस इंसानों से तुम डरना
खेतों की दुनिया सुनसान वहाँ पे होगा रेगिस्तान

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं
खो गई बंजारों की टोली रहे ना वो मस्ताने हीर
खेतों की वो सुंदर हील गई हाइवे में तब्दील

सबकी दुआ रंग लाएगी संसद वहाँ से दिख जाएगी
संसद में खामोश ना रहना, इंसानों से बस ये कहना

सुनो सुनो वहशी इंसानों सुनो सुनो वहशी इंसानों
अब तो इसका कहना मानो
क़ुदरत ये कहती है हर दम, हमसे तुम हो और तुमसे हम
हमको अगर मिटाओगे तो ख़ुद भी मिट जाओगे।



तो आपसे ये गुजारिश है कि इस गीत को ख़ुद तो सुने ही पर अपने बच्चों को जरूर सुनवाएँ । बहुत बार हमारी और आपकी कही बात से ज्यादा असर ये गीत डाल सकते हैं ...

Friday, January 18, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 18 : ख़्वाहिशों का चेहरा क्यूँ धुंधला सा लगता है ?

वार्षिक संगीतमाला की 18 वीं पॉयदान पर इस गीतमाला में आखिरी बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है सलीम सुलेमान की जोड़ी। जोड़ी ब्रेकर और हीरोइन के अधिकांश गीतों में वो कोई नया कमाल नहीं दिखा सके। उनके कई गीतों में उनकी पुरानी धुनों की झलक भी मिलती रही। अगर हीरोइन का ये दूसरा गीत इस गीतमाला में दाखिला ले रहा है तो इसकी वज़ह सलीम सुलेमान का संगीत नहीं बल्कि गीतकार और पटकथा लेखक निरंजन अयंगार के बोल हैं।

फैशन या कुर्बान के गीतों को याद करें तो आपको पियानों पर  इन दोनों भाइयों की पकड़ का अंदाजा हो जाएगा।  हीरोइन फिल्म का ये गीत भी पियानों की मधुर धुन से शुरु होता है। पर जैसे ही पौने दो मिनटों बाद इंटरल्यूड में संगीत सॉफ्ट रॉक का स्वरूप ले लेता है गीत का आनंद आधा रह जाता है।

पर सलीम सुलेमान जहाँ चूकते हैं उसके बाद भी निरंजन अयंगार के शब्द अपनी मजबूती बनाए रखते हैं। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में शामिल होने वाला निरंजन का ये तीसरा गीत है। वार्षिक संगीतमाला 2010 में My Name is Khan के दो गीत सजदा.... और नूर ए ख़ुदा... शामिल हुए थे और तभी मैंने इस तमिल मूल के लेखक की गीतकार बनने की कहानी आपसे बाँटी थी। हीरोइन फिल्म के इस गीत में कमाल की काव्यात्मकता है।इसलिए गीत के बोल पढ़ते हुए भी गीतकार की लेखनी को दाद देने को जी चाहता है। अपनी तारीफ़ पर वो कुछ ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं
मुझे अच्छा लगता है जब लोग मेरा काम सराहते हैं। पर एक मँजा हुआ गीतकार समझे जाने के लिए मुझे अभी ढेर सारा काम करना है। जब हम गुलज़ार साहब के कृतित्व पर टिप्पणी करते हैं तो हमारे ज़ेहन में उनका वर्षों से किया गया अच्छा काम रहता है। मैं अपनी एक सफलता से खुश नहीं होना चाहता और ना ही किसी एक विफलता से निराश।
निरंजन का ये गीत हमारी उस मानसिकता की पड़ताल करता है जो हमें अपनी इच्छाओ का दास बना देती है। एक चाह पूरी हुई कि दूसरी ने डेरा डाल दिया। उनको पूरा करने की सनक कब हमारी छोटी छोटी खुशियों , हमारे बने बनाए रिश्तों को डस लेती हैं इसका हमें पता ही नहीं चलता। इसलिए निरंजन गीत में कहते हैं

ख़्वाहिशों का चेहरा क्यूँ धुंधला सा लगता है
क्यूँ अनगिनत ख़्वाहिशें हैं
ख़्वाहिशों का पहरा क्यूँ, ठहरा सा लगता है
क्यूँ ये गलत ख़्वाहिशें हैं

हर मोड़ पर, फिर से मुड़ जाती हैं
खिलते हुए, पल में मुरझाती हैं
हैं बेशरम, फिर भी शर्माती हैं ख़्वाहिशें

ज़िंदगी को धीरे धीरे डसती हैं ख़्वाहिशें
आँसू को पीते पीते हँसती हैं ख़्वाहिशें
उलझी हुई कशमकश में उमर कट जाती है


निरंजन हमें आगाह करते हैं कि ख़्वाहिशों के इस भँवर में फँसे इंसान की नियति उसी भँवर में डूबने की होती है। खुशियों की चकाचौंध में आँखें मिचमिचाने से क्या ये अच्छा नहीं कि उसकी एक हल्की किरण की गुनगुनाहट का हम आनंद लें ?

आँखें मिच जाएँ जो उजालों में
किस काम की ऐसी रोशनी
भटका के ना लाए जो किनारों पे
किस काम की ऐसी कश्ती

आँधी है, धीरे से हिलाती है
वादा कर धोखा दे जाती है
मुँह फेर के, हँस के चिढ़ाती हैं ख़्वाहिशें

ज़िंदगी को धीरे धीरे डसती हैं ख़्वाहिशें


इस गीत को  गाया है श्रेया घोषाल ने। इस में कोई दो राय नहीं कि नीचे और ऊँचे सुरों में भी वो गीत के शब्दों की गरिमा के साथ पूरी तरह न्याय करती हैं। तो आइए श्रेया की आवाज़ के साथ डूबते हैं हम ख़्वाहिशों के इस समर में...

Sunday, January 13, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 19 : बरगद के पेड़ों पे शाखें पुरानी पत्ते नये थे हाँ...

वार्षिक संगीतमालाओं में पीयूष मिश्रा की अद्भुत सांगीतिक प्रतिभा से मेरा सबसे पहले परिचय हुआ था गुलाल में उनके लिखे और संगीतबद्ध गीतों से। पर चुनिंदा फिल्मों में काम करने वाले पीयूष की झोली से पिछले साल संगीतप्रेमियों को कुछ हाथ नहीं लगा था। पर इस साल सबसे पहले GOW में दिखने वाले पीयूष ने बाल फिल्म जलपरी में भी एक गीत लिखा, गाया और संगीतबद्ध किया था। अब इस फिल्म का नाम आपने सुना होगा इसकी उम्मीद कम ही है क्यूँकि साल में बहुत सी फिल्में बिना किसी मार्केटिंग के कब आती और कब चली जाती हैं ये पता ही नहीं लगता। I am Kalam से चर्चा में आए इस फिल्म के निर्देशक नील माधव पंडा की भ्रूण हत्या पर आधारित ये फिल्म  पिछले साल अगस्त में प्रदर्शित हुई थी। 


पीयूष मिश्रा के लिखे गीतों की विशेषता है कि वो अपनी ठहरी हुई गंभीर आवाज़ और अर्थपूर्ण शब्दों से आपको एक अलग मूड में ले जाते हैं।  गीत ख़त्म होने के बाद भी गीत में व्यक्त भावनाएँ जल्दी से आपका पीछा नहीं छोड़तीं।  इस गीत में पीयूष हमें अपने बचपन में ले जाते हैं। बचपन की बातों से ख़ुद को जोड़ते गीतों के बारे में जब सोचता हूँ तो एक गीत और एक नज़्म तुरंत दिमाग में आती है। याद है ना आशा जी का गाया वो गीत बचपन के दिन भी क्या दिन थे उड़ते फिरते तितली बन के और फिर जगजीत व चित्रा सिंह की गाई उस कालजयी नज़्म  को कौन भूल सकता है...

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी


पीयूष जी का ये गीत भी जगजीत की उस नज़्म और बहुत कुछ उन्हीं भावनाओं को पुनर्जीवित करता है। आपको याद होगा कि कितनी खूबसूरती से उस नज़्म में कहानी सुनाने वाली बूढ़ी नानी और बचपन में खेले जाने वाले खेलों चिड़िया, तितली पकड़ना, झूले झूलना, गुड़िया की शादी आदि का जिक्र हुआ है। इस गीत में भी पीयूष बीते समय की छोटी सुनहरी यादों को हमसे बाँटते हुए उसी अंदाज़ में युवावस्था से वापस अपने बचपन में लौट जाने की बात करते हैं

बरगद के पेड़ों पे शाखें पुरानी पत्ते नये थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ
लाओ बचपन दोबारा, नदिया का बहता किनारा
मक्के की रोटी, गुड़ की सेवैयाँ,
अम्मा का चूल्हा, पीपल की छैयाँ
दे दूँ कसम से पूरी जवानी, पूरी जवानी हाँ

पनघट पे कैसे इशारे, खेतों की मड़िया किनारे
ताऊ की उठती गिरती चिलम को, हैरत से देखे थे सारे
हाए..गुल्ली के डंडे की बाते, गाँव में धंधे की बातें
बस यूँ गुटर गूँ इक मैं कि इक तू
यूँ ही गुजरती थी रातें
...

ग्रामीण पृष्ठभूमि में लिखा ये गीत गाँव की उन छोटी छोटी खुशियाँ को क़ैद करता है जिनसे आज का शहरी बचपन महरूम है। बरगद का पेड़ हो या पीपल की छैयाँ, अम्मा का चूल्हा हो या खेतों की मड़िया, बेमकसद की गुटरगूँ में गुजरते वो इफ़रात फुर्सत के लमहे हों या फिरताऊ की चिलम से उठता धुआँ,  इन सारे बिम्बों से पीयूष एक माहौल रचते चले जाते हैं। जिन श्रोताओं का बचपन गाँव - कस्बों में गुजरा हो उन्हें इस गीत से जुड़ने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। गीत के आखिरी अंतरे में बचपन के अनायास ही खो जाने का दर्द फूट पड़ता है। पीयूष अपने इस गीत के बारे में कहते हैं "बरगद के बोल मेरे दिल की आवाज़ हैं जो मुझे अपनी पुरानी यादों तक खींच ले जाते हैं।"

देखो इन्ही गलियों में वो खोया था हमने
यादों के सीने में थोड़े पिघल के जम से गए थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ

यादों में है कैसा कभी आया था बचपन
कैसे कहूँ मेरा कभी साया था बचपन
इनके कदम खिल खिल हँसी लाया था बचपन
जाने को था फिर भी मुझे भाया था बचपन
भोली जुबाँ के नग्मे, भोले से मन के सपने 
लोरी बने थे...
रुकने की ख़्वाहिश बड़ी थी लेकिन गुजर से गए थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ
लाओ बचपन दोबारा, नदिया का बहता किनारा...

बरगद के पेड़ों पे...

ये एक ऐसा गीत है जो धीरे धीरे आपके दिल में जगह बनाता है तो आइए सुनते हैं इस संवेदनशील नग्मे को..


गीत का वीडिओ देखना चाहें तो ये रहा... 

Thursday, January 10, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 20 : कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ...

वार्षिक संगीतमाला की पॉयदान संख्या 20 पर पहली बार इस साल दाखिल हो रही है संगीतकार सलीम सुलेमान और इरशाद कामिल की जोड़ी, फिल्म जोड़ी ब्रेकर के इस गीत के साथ। इरशाद कामिल रूमानी गीतों में हमेशा से अपना हुनर दिखाते आए हैं और ये गीत भी उसकी एक मिसाल है। प्रेमानुभूति की गहनता कवि हृदयों को नए नए तरीके से अपनी बात कहने का अवसर देती रही है। यही वज़ह है कि दशकों से ऍसे गीतों को सुनते रहने के बावज़ूद भी हर साल हमें कुछ ऐसे गीत सुनने को मिल ही जाते हैं जिनकी काव्यात्मकता दिल को छू जाती है। 


प्रेम में रिश्ते बनते हैं, पलते हैं, प्रगाढ़ होते हैं और फिर टूट भी जाते हैं। पर रिश्तों को तोड़ना किसी के लिए आसान नहीं होता। बरसों लगते हैं उन साझी यादों को मिटाने के लिए। जो मंजिलें साथ साथ चल कर सामने दिखती थीं वो एकदम से आँखों से ओझल हो जाती हैं और हम भटकने लगते हैं मन के बियावान जंगलों में निरुद्देश्य..... दिशाविहीन.....

इरशाद क़ामिल इन्ही भावनाओं को अपने बोलों में खूबसूरती से उतारते हैं।.सलीम सुलेमान का संगीत तो मधुर है पर एक Déjà vu का सा आभास देता है। गीत के पार्श्व में गिटार और तबले की संगत अंत तक चलती है। प्रीतम और विशाल शेखर की हिंदी अंग्रेजी मिश्रित शैली को यहाँ सलीम सुलेमान भी कुशलता से अपनाते नज़र आते हैं। तो आइए सुनें शफक़त अमानत अली खाँ की आवाज़ में ये गीत..



लफ़्ज़ों से जो था परे
खालीपन को जो भरे
कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ
रिश्ते को क्या मोड़ दूँ
नाता यह अब तोड दूँ
या फिर यूँ ही छोड़ दूँ ,
दरमियाँ
बेनाम रिश्ता वो ..बेनाम रिश्ता वो ,
बेचैन करता जो हो ना .. सके जो बयान , दरमियाँ दरमियाँ
दरमियाँ दरमियाँ दरमियाँ दरमियाँ कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ

Oh its a special feeling
These moments between us
How will I live without you

आँखों में तेरे साये चाहूँ तो हो न पाए
यादों से तेरी फासला हाय
जा के भी तू ना जाए
ठहरी तू दिल में हाए
हसरत सी बन के क्यूँ भला
क्यूँ याद करता हूँ मिटता हूँ बनता हूँ
मुझको तू लाई यह कहाँ
बेनाम  रिश्ता  वो..दरमियाँ

Hard for us to say
It was so hard for us to say
Can't close a day by day
But Then the world's got me in way

चलते थे जिन पे हम तुम
रास्ते वो सारे हैं गुम
अब  ढूँढें कैसे  मंजिलें
रातें हैं जैसे मातम
आते हैं दिन भी गुमसुम
रूठी हैं सारी महफ़िलें
इतना सताओ ना, यूँ याद आओ ना
बन जाएँ आँसू ही जुबाँ
बेनाम  रिश्ता  वो..दरमियाँ

इस गीत के एक अंतरे को श्रेया घोषाल ने भी गाया है। श्रेया से ये गीत धीमे टेम्पो में गवाया गया है। गिटार की बीट्स की जगह पियानो की टनटनाहट के बीच से आती श्रेया की मधुर आवाज़ दिल पर सीधे चोट करती है।


Tuesday, January 08, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 21 : आला आला मतवाला बर्फी !

वार्षिक संगीतमाला की पिछली तीन सीढ़ियों को चढ़कर हम आ पहुँचे हैं बाइसवीं पॉयदान पर जहाँ पर इस साल की सफलतम फिल्मों से एक फिल्म 'बर्फी' का गीत है। वैसे जिन्होंने बर्फी फिल्म के सारे गीत सुने हैं उन्हें ये अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि इस संगीतमाला में बर्फी के गीत कई बार बजेंगे।  आज जिस गीत की चर्चा हो रही है वो है बर्फी का शीर्षक गीत। वैसे तो इस गीत के दो वर्सन हैं एक खुद गीतकार स्वानंद किरकिरे का गाया हुआ और दूसरा मोहित चौहान की आवाज़ में।



स्वानंद को इस गीत के ज़रिये फिल्म की शुरुआत में ही बर्फी का चरित्र बयाँ कर देना था। हम अक्सर किसी गूँगे बहरे के बारे में सोचते हैं तो मन में दया की भावना उपजती है। पर इस फिल्म में इस तरह के चरित्र को इतने खुशनुमा तरीके से दिखाया गया है कि अब किसी मूक बधिर की बात होने पर अपने ज़ेहन में हमें बर्फी का हँसता मुस्कुराता ज़िदादिल चेहरा उभरेगा ना कि करुणा के कोई भाव।

पिछली पोस्ट में संगीतकार स्नेहा खानवलकर की एक बात मैंने उद्धृत की थी कि  अगर निर्देशक एक फिल्म में कहानी के परिवेश और चरित्र को अपनी सूझबूझ से गढ़ सकता है तो मैं भी अपने संगीत के साथ वही करने का प्रयास करती हूँ। और यही बात इस गीत में बर्फी का चरित्र गढ़ते स्वानंद बखूबी करते दिखाई पड़ते हैं। मुखड़े में बर्फी से हमारा परिचय वो कुछ यूँ कराते हैं..

आँखों ही आँखो करे बातें
गुपचुप गुपचुप गुपचुप गुप
खुस फुस खुस फुस खुस
आँखों ही आँखों में करे बातें
गुपचुप गुपचुप गुपचुप गुप
खुस फुस खुस फुस खुस
ओ ओ ये..
ख़्वाबों की नदी में खाए गोते
गुड गुड गुड गुड गुड गुड होए
बुड बुड बुड बुड बुड बुड.
आला आला मतवाला बर्फी
पाँव पड़ा मोटा छाला बर्फी
रातों का है यह उजाला बर्फी
गुमसुम गुमसुम ही मचाये यह तो उत्पात
खुर खुर खुर खुर ख़ुराफ़ातें करे नॉन-स्टॉप

आपको इससे पता चल जाता है कि जिस शख़्स की बात हो रही है भले ही वो बोल सुन नहीं सकता पर है बला का शरारती। पर ये तो बर्फी की शख़्सियत का मात्र एक पहलू है। गीत के दूसरे अंतरे में स्वानंद हमें बर्फी के चरित्र के दूसरे पहलुओं से रूबरू कराते हैं। धनात्मक उर्जा से भरपूर बर्फी दूसरों के दुखों के प्रति संवेदनशील है। आत्मविश्वास से भरा वो किसी से भी खुद को कमतर नहीं मानता। उसके लिए ज़िंदगी एक नग्मा है जिसे वो अपनी धड़कनों की तान के साथ गुनगुनाता चाहता है। पर जहाँ बर्फी मासूम है वहीं इतना नासमझ भी नहीं कि इस टेढ़ी दुनिया की चालें ना समझ सके।

कभी न रुकता रे, कभी न थमता रे
ग़म जो दिखा उसे खुशियों की ठोकर मारे
पलकों की हरमुनिया, नैनो की गा रे सारे
धड़कन की रिदम पे ये गाता जाए गाने प्यारे
भोला न समझो यह चालू खिलाडी है बड़ा बड़ा हे.. हे
सूरज ये बुझा देगा, मारेगा फूँक ऐसी
टॉप तलैया, पीपल छैय्या
हर कूचे की ऐसी तैसी हे..

स्वानंद ने गीत के मूड को हल्का फुल्का बनाए रखने के लिए खुस फुस ,खुर खुर, गुड गुड, बुड बुड जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। हँसी हँसी में वो मरफी मुन्ने की कहानी कहते हुए उसके जीवन की त्रासदी भी बयाँ कर देते हैं।

बर्फी जब अम्मा जी की कोख में था सोया
अम्माँ ने मर्फी का रेडियो मँगाया
मर्फी मुन्ना जैसा लल्ला अम्मा का था सपना
मुन्ना जब हौले-हौले दुनिया में आया
बाबा ने चेलों वाला स्टेशन
रेडियो आन हुआ अम्मा ऑफ हुई
टूटा हर सपना...
ओह ओ ये..
मुन्ना म्यूट ही आंसू बहाए ओ..
ओ ओ ये मुन्ना झुनझुना सुन भी न पाए
झुन झुन झुन झुन....

कहना ना होगा कि प्रीतम द्वारा संगीबद्ध और मोहित द्वारा गाए इस गीत के असली हीरो स्वानंद हैं । जब जब ये गीत हमारे कानों से गुजरेगा बर्फी के व्यक्तित्व के अलग अलग बिंब हमारी आँखों के सामने होंगे। तो आइए सुनें ये हँसता मुस्कुराता गीत...


Monday, January 07, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 22 : मेरे साइयाँ रे, साचा बोले ना झूठा माहिया रे...

वार्षिक संगीतमाला की अगली पॉयदान पर के गीत को लिखा है अमिताभ भट्टाचार्य ने। बेवफाई से व्यथित हृदय की वेदना को व्यक्त करते इस गीत को गाया है राहत फतेह अली खाँ ने। गीत साइयाँ के कोरस से शुरु होता है और जैसे ही  राहत के स्वर में मेरे साइयाँ रे की करुण तान आपके कानों में पड़ती हैं आपको गीत का मूड समझने में देर नहीं लगती। फिल्म 'हीरोइन' के इस गीत की धुन बनाई है सलीम सुलेमान ने। दर्द की अभिव्यक्ति के लिए इंटरल्यूड्स में वॉयलिन का प्रयोग संगीतकार बखूबी करते हैं।


प्रेम की सबसे बड़ी शर्त है आपसी विश्वास और एक दूसरे के प्रति सम्माऩ। पर जो आपका सबसे प्रिय हो वही आपके भरोसे की धज्जियाँ उड़ा दे तो..पैरों तले ज़मीन खिसकने सी लगती है। सच्चा प्यार कुछ होता भी है इस पर भी मन में संशय उत्पन्न होने लगता है। अपने आस पास के लोग, सारी दुनिया  बेमानी लगने लगती है। 

अमिताभ के बोल इसी टूटे दिल की भावनाओं को टटोलते हैं इस गीत में। पर अमिताभ भट्टाचार्य के शब्दों से ज्यादा राहत की गायिकी और गीत की लय श्रोताओं को अपनी ओर खींचती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को।

साइयाँ रे, मेरे साइयाँ रे
साचा बोले ना झूठा माहिया रे हो
मेरे साइयाँ रे, साइयाँ रे
झूठी माया का झूठा है जिया रे हो
अब किस दिशा जाओ, कित मैं बसेरा पाऊँ
तू जो था मैं सँभल जाऊँ
साइयाँ रे
मेरे साइयाँ रे
दामन में समेटे, अँधेरा लाई है
बहुरूपिया रौशनी
हो...लोरियाँ गाए तो
नींदे जल जाती हैं
लागे कलसुरी चाँदनी
दिल शीशे का टूटा आशियाँ रे
साइयाँ रे, मेरे साइयाँ रे

Sunday, January 06, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 23 : मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर..

वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं सीढ़ी पर जो गाना है वो एक सामान्य हिंदी फिल्म गीतों से थोड़ा हट कर है। पहली बार सुनने पर ये आपके कानों को अटपटा लग सकता है पर यही इसका मजबूत पहलू भी है। इस गीत की संगीतकार  हैं स्नेहा खानवलकर। इंदौर में पली बढ़ी तीस वर्षीय स्नेहा की माँ का परिवार शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर घराने से ताल्लुक रखता है। पहले एनीमेशन और फिर कला निर्देशिका का काम करने वाली स्नेहा को पहली बार 2005 में फिल्म 'कल: Yesterday and Tomorrow' के शीर्षक गीत को संगीतबद्ध का मौका मिला पर  हिंदी फिल्मो में पहला बड़ा ब्रेक उन्हें राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'Go' में मिला। वर्ष 2008 में स्नेहा ओए लक्की लक्की ओए से संगीत जगत में चर्चा में आयीं। स्नेहा खानवलकर की खासियत ये है वे अपनी फिल्मों में कहानी की पृष्ठभूमि के हिसाब से गीतों में आंचलिक गायकों और वहाँ की ध्वनियों को स्थान देती हैं। स्नेहा का मानना है कि..

हर शहर हर कस्बे की अपनी एक खूबी होती है। वहाँ के लोगों का सोचने का नज़रिया या बोलने का तरीका, बड़े शहरों से सर्वथा भिन्न होता है। इसलिए मेरे लिए ये जानना जरूरी है कि वहाँ के लोग किस तरह गाते हैं? कैसे संगीत रचते हैं? किसी जगह की संस्कृति से जुड़ी इन बारीकियों को जानकर ही हम उनकों गीतों में ढाल सकते हैं। अगर निर्देशक एक फिल्म में कहानी के परिवेश और चरित्र को अपनी सूझबूझ से गढ़ सकता है तो मैं भी अपने संगीत के साथ वही करने का प्रयास करती हूँ।

ओए लक्की.. के संगीत के लिए जहाँ स्नेहा पंजाब और हरियाणा के गाँवों में घूमी वहीं 'Gangs of वासेपुर' के लिए बिहार के संगीत को उन्होंने वहाँ जाकर करीब से सुना। मजे की बात ये है कि GOW में अधिकांश गायक गायिकाओं को भी उन्होंने फिल्म के परिवेश के हिसाब से बिहार और यूपी से चुना पर ठेठ उत्तर भारतीय आवाज़ की तलाश उन्हें एक ऐसी गायिका तक ले गई जिसकी मातृभाषा हिंदी ना हो कर तेलगु है। जी हाँ ये गायिका थीं आंध्र प्रदेश की दुर्गा ! 12 वर्षीय दुर्गा मुंबई की ट्रेनों में गाती थीं। आपने अक्सर देखा होगा कि ट्रेनों में गाने वाले बच्चे ज्यादातर ऊँचे सुरों और बुलंद आवाज़ में गाते हैं। दुर्गा की इसी खासियत को आनंद सुरापुर ने देखा और उन्हें एक एलबम में गाने का न्योता दिया। उनका एलबम तो अभी बाजार में नहीं आया पर इसी बीच स्नेहा को उन्हें सुनने का मौका मिला और अनुराग कश्यप की इस छीछालेदर के लिए उन्होंने उनकी आवाज़ को उपयुक्त पाया।




इस गीत की संगीतकार और गायिका के बारे में तो आपने जान लिया अब ये मजेदार गीत  कैसे बना ये जानना भी आपके लिए रोचक होगा। फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप बताते हैं
छीछालेदर शब्द बहुत समय से मेरे दिमाग में था। वो डॉयलाग में भी इस्तेमाल हुआ था Dev D में। इमोशनल अत्याचार के बाद एक छीछालेदर करना था।  बस इतनी लाइन थी मेरे दिमाग में मेरा जूता वाइट लेदर (अभी तो फेक हो गया) दिल है छीछालेदर वो हमसे पूछी Whether I like the weather ? Whether I like the weather हमारा बनारस का बहुत पुराना joke है weather  के ऊपर। वो टीचर क्लॉस में आकर बोलते हैं Open the window let the climate come in.:)
तो अनुराग के रचित मुखड़े को इस गीत में ढाला गीतकार वरुण ग्रोवर ने। जैसा कि आपको पता है GOW-II की कहानी धनबाद के कोल माफिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई पर आधारित है। फिल्म में ये गीत पार्श्व में बजता हुआ हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच जान बचाने की क़वायद में एक आपराधिक ज़िदगी की छीछालेदर को चित्रित करता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को

मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
वो हमसे पूछा whether I like the weather
चमचम वाली गॉगल भूल के सर मुँह भागे
मखमल वाला मफलर छोड़ के सर मुँह भागे
तेरे नाम के राधे भइया
नज़र कटीली लेजर

मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
हेदर बेदर हेदर बेदर दिल छीछालेदर



वैसे ऊपर गाने में जिन राधे भइया का जिक्र हुआ है वो इस फिल्म के नहीं बल्कि इंडस्ट्री के सबसे बड़े भैया सल्लू भइया के फिल्म तेरे नाम के निभाए हुए किरदार के लिए है। अगर आपकी दिलचस्पी इस गीत की किशोर गायिका के बारे में और जानने की है तो ये वीडिओ देख लीजिए..


Friday, January 04, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 24 : पानी दा रंग दिखा रहें हैं आयुष्मान खुराना...

वार्षिक संगीतमाला की 24 वीं पॉयदान पर गीत है फिल्म विकी डोनर का। ऐसा बहुत कम ही होता है कि किसी फिल्म का हीरो अपने ऊपर फिल्माए जाने वाले गीत का गीतकार,संगीतकार और गायक भी खुद ही हो। ये अजूबा कर दिखाया है चंडीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले आयुष्मान खुराना ने। 

आयुष्मान ने संगीत की विधिवत शिक्षा तो नहीं ली पर अनौपचारिक रूप से ही सही संगीत सीखा जरूर। उनके संगीतप्रेमी पिता ख़ुद एक बाँसुरी वादक थे।  चंडीगढ़ के डी ए वी कॉलेज में पढ़ते हुए आयुष्मान को संगीत के साथ थिएटर करने का चस्का भी लग गया। आयुष्मान ने पानी दा रंग.... कॉलेज में रहते हुए ही वर्ष 2003 में लिखा और संगीतबद्ध कर लिया था। वो जानते थे कि जो कुछ उन्होंने रचा है वो बेहतरीन है। पर उसे सबके सामने लाने के पहले उन्हें उचित अवसर की तलाश थी।

उनकी ये तलाश खत्म हुई दस साल बाद जब निर्देशक शूजित सिरकार ने विकी डोनर के नायक के किरदार में उन्हें चुना। आयुष्मान अपने साक्षात्कारों में इस गीत के विकी डोनर में समावेश के बारे में कहा था

मैं विकी डोनर के सेट पर एक बार साथ में अपना गिटार ले कर पहुँचा था। फिल्म के निर्देशक से कुछ विचार विनिमय हो ही रहा था कि मैंने शूजित दा से कहा कि मैंने एक गीत संगीतबद्ध किया है। क्या आप उसे सुनना चाहेंगे? शूजित पहले तो अचरज में पड़ गए पर उन्होंने कहा बिल्कुल सुनूँगा। और इस तरह ये गीत इस फिल्म का हिस्सा बना। वैसे तो पंजाबी लोग अपने अक्खड़पन के लिए जाने जाते हैं पर यह उनकी छवि से उलट एक मुलायमियत भरा  प्रेम गीत है।
पानी दा रंग के बोल भले पंजाबी में हों पर इसकी मन को सुकून देने वाली धुन  इस गीत की लोकप्रियता का मुख्य कारण हैं। वैसे गीत के मुखड़े में जिस तरह पानी के रंग को आयुष्मान ने एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है वो सुधी श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींचता है। 

पानी दा रंग वेख के
पानी का रंग वेख के
अँखियाँ जो अंजू रुल दे
माहिया ना आया मेरा
राँझना ना आया
आँखो दा नूर वेख के
अँखियाँ जो अंजू रुल दे

पानी का रंग या यूँ कहें की उसकी रंगविहीनता को देखकर मुझे लगा कि मेरा जीवन भी तो तुम्हारे बिना बेरंग है और ये ख़्याल आते ही मेरी आँखों से आँसू बह निकले। यूँ तो 2003 में बने इस गीत का मूल रूप वही रहा पर फिल्म में डाले जाने पर इसमें एक अंतरा कोठे उत्ते..अँखियाँ मिलौंदे...और जुड़ा।  

नायक और गायक के बहुमुखी किरदार की किशोर दा की परंपरा को आयुष्मान कितना आगे ले जाते हैं ये तो वक़्त ही बताएगा पर फिलहाल सुनते हैं विकी डोनर के इस प्यारे से गीत को...


Wednesday, January 02, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 25 : दिल ये बेक़रार क्यूँ है ?

नए साल का स्वागत तो आपने इन झूमने झुमाने वाले गीतों से कर लिया होगा। तो मेहरबान और कद्रदान, वर्ष 2012 की वार्षिक संगीतमाला को लेकर आपका ये संगीत मित्र उपस्थित है। वर्ष 2005 से आरंभ होने वाली ये संगीतमाला अपने आठवें साल में है। हर साल ये मौका होता है साल भर में रिलीज हुई फिल्मों में से कुछ सुने अनसुने मोतियों को छाँट कर उनसे जुड़े कलाकारों को आपसे रूबरू कराने का। एक साल में लगभग सौ के करीब फिल्में के करीब पाँच सौ गानों में पच्चीस बेहतरीन गीतों को चुनना और उन्हें अपनी पसंद के क्रम में क्रमबद्ध करना मेरे लिए साल के अंत में एक बड़ी चुनौती बन जाता है। दिसंबर के सारे रविवार और छुट्टियाँ इसी क़वायद में चली जाती हैं पर इसी बहाने जो नया चुनने और गुनने को मिलता है उसे आपके सम्मुख लाने की खुशी इस मेहनत को सार्थक कर देती है।


तो चलिए आरंभ करते हैं ये सिलसिला। वार्षिक संगीतमाला 2012 की 25 वीं पॉयदान पर  गीत है फिल्म Players का जो पिछले साल जनवरी महिने में रिलीज हुई थी। इस गीत को गाया था मोहित चौहान और श्रेया घोषाल ने। अब जहाँ मोहित और श्रेया एक साथ हों गीत का मूड तो रोमानियत से भरा होगा ना। वैसे भी संगीतकार प्रीतम अपने गीतों में मेलोडी का खासा ध्यान रखते हैं और इसीलिए उनके गीत जल्द ही श्रोताओं की गुनगुनाहट में शामिल हो जाते हैं।

इस गीत को लिखा है देहदादून से ताल्लुक रखने वाले आशीष पंडित ने। भातखंडे संगीत विश्व विद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाले आशीष ने कुछ दिनों अविकल नाम के थियेटर में काम किया। दस साल पहले यानि 2003 में मुंबई आए। शुरुआती जद्दोहत के बाद वो संगीतकार प्रीतम के सानिध्य में आए। गायक, नाटककार से गीतकार बनाने का श्रेय आशीष प्रीतम को ही देते हैं। वैसे तो आशीष को प्रीतम का फिल्मों में इक्का दुक्का गीत मिलते रहे हैं पर फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी के गीत तेरा होने लगा हूँ ने उन्हें फिल्म जगत में पहचान दिलाने में बहुत मदद की।

प्लेयर्स फिल्म के इस गीत में भी आशीष ने वही सवाल पूछे हैं जो आशिकों के मन में जन्म जन्मांतर से आते रहे हैं। कुछ पंक्तियाँ मुलाहिजा फरमाइए

क्यूँ रातों को मैं अब चैन से सो ना सकूँ
क्यूँ आता नहीं मुझे दिन में भी चैन ओ सुकूँ
क्यूँ ऐसा होता है मैं ख़ुद से ही बातें करूँ

दिल ये बेक़रार क्यूँ है
इसपे धुन सवार क्यूँ है
क्यूँ है ये ख़ुमार क्यूँ है तू बता
तेरा इंतज़ार क्यूँ है
क्यूँ है ये ख़ुमार क्यूँ है तू बता

प्रीतम गीत का टेम्पो धीरे धीरे बढ़ाते हैं और दिल ये बेकरार क्यूँ है आते आते श्रोता गीत की लय में पूरी तरह आ चुका होता है । और हाँ गीत में करीब ढाई मिनट बाद आने वाला गिटार का इंटरल्यूड भी बेहद कर्णप्रिय बन पड़ा है।

तो आइए सुनते हैं ये नग्मा...

 

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इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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