Sunday, February 24, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 5 : इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ..

वार्षिक संगीतमाला का सफ़र आ पहुँचा है अपनी आखिरी पाँच पॉयदानों के मुकाम तक। संगीतमाला के इन अंतिम पाँच गीतों की शुरुआत गैंग्स आफ वासेपुर में पीयूष मिश्रा के गाए इस गीत के साथ। इस साल जो दो एकल गीत पीयूष ने गाए हैं वे दोनों ही इस संगीतमाला का हिस्सा बने हैं। पीयूष मिश्रा के बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि वो एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने शायद ही फिल्म और रंगमंच जगत से जुड़ी किसी विधा पर हाथ ना आज़माया हो। पर रंगमंच, फिल्म संगीत, पटकथा लेखन, गीतकार, गायक, अभिनेता के विविध किरदारों को निभाने के बाद उनकी ज़िदगी में कुछ और नया करने की चाहत मरी नहीं है और शायद इसीलिए उनकी नई पुरानी कृतिया जब भी श्रोताओं के सामने आती हैं उनकी प्रतिभा का लोहा मानने के आलावा उनके पास दूसरा कोई चारा नहीं बचता। 


पीयूष का मानना है कि एक इंसान के पास इतने गुण छिपे होते हैं जिनका उसे खुद भी भान नहीं होता। पीयूष के अनुसार एक कलाकार की यात्रा अपने अंदर के इन छिपे गुणों के प्रति संशय से लड़ने और उससे सफलतापूर्वक बाहर निकलने की ज़द्दोज़हद है। अपनी इस लड़ाई के पीछे उनका ये दृष्टिकोण माएने रखता है। वे कहते हैं

"मैं कोई भी काम लगातार करते करते बहुत जल्दी ऊब भी जाता हूँ। मैं मानता हूँ कि हर काम बेहतर तरीके से करने की जरूरत होती है पर व्यक्ति को काम कर चुकने के बाद उसे सलाहियत से भूलने की भी आदत होनी चाहिए। अभी गैंग्स आफ वासेपुर की है मैंने पर मैं उसे भूल चुका हूँ इसके आगे भी बहुत सारा काम करना है..."

पर हमारे यहाँ दिक्कत यही है कि फिल्म जगत की इस मायावी दुनिया में गीतकारों को अपनी हुनर लायक काम मिल नहीं पाता है। पीयूष ने हाल ही में NDTV को दिए साक्षात्कार में कहा था गुलाल की सफलता के बाद उन्हें लगा था कि उसके बाद उनका कैरियर बन जाएगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ क्यूँकि जो मौके आए उनमें पीयूष के मन लायक कुछ करने का था नहीं। वैसे ये समस्या सभी प्रतिभाशाली गीतकारों के साथ है राजशेखर ने पिछले साल तनु वेड्स मनु के लिए ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है जैसा शानदार गीत लिखा पर अपनी नई रिलीज़ के लिए उनके प्रशंसकों को एक साल से ज्यादा इंतज़ार करना पड़ रहा है। अमिताभ भट्टाचार्य को 'आमिर' के बाद अपने ऊपर लगे गंभीर गीतकार के टैग को निकालने के लिए आइटम सांग से  लेकर हर तरह के गीत लिखने पड़े। पीयूष इस बारे में कहते हैं
"किसी को जरूरत नहीं है ऐसे गानों की। अनुराग जैसा लफंगा मुझे मिलता रहे ना ज़िंदगी भर तो मैं बड़ा अनुगृहित रहूँगा उसका कि ऐसे लोग मिलते रहेंगे तो करवाते रहेंगे ऐसा कुछ। इक बगल में चाँद होगा ..जाने कहाँ से खोज लिया इसने मेरी किताब से। 1996 दिसंबर में मैंने एक नाटक किया था लेडी श्री राम कॉलेज के सामने, जिसका नाम था एक थी सीपी..एक थी सीपी। उसी नाटक के लिए ये गीत लिखा गया था। अनुराग ने कहा ये गीत करना है। मैंने कहा क्यूँ करना है? फिल्म पूरी हो चुकी थी और मेरा काम सिर्फ अभिनय था और मैं सोच रहा था कि सिर्फ एक्टिंग कर के निकल जाऊँगा  आराम से। पर अनुराग के कहने पर मैंने इसे किया और फिल्म के लिए मुझे इसकी धुन भी बदलनी पड़ी।"

पीयूष का मानना है कि अनुराग, दिवाकर , इम्तियाज़ और विशाल भारद्बाज जैसे निर्देशकों की वज़ह से उनके जैसे गीतकारों के लिए कुछ करने लायक हो पा रहा है।

ख़ैर ये तो थी इस गीत के पीछे की कहानी। तो लौटते हैं पाँचवी पॉयदान के इस संवेदनशील नग्मे की तरफ। गीत के परिदृश्य में पीयूष के अनुसार उस वक़्त का बिहार है जब वहाँ बहुत मुफ़लिसी थी और उस वक़्त धीरे धीरे पलायन हो रहा था लोग बाग शहर जाना शुरु कर रहे थे। गरीबी और बेरोजगारी से उत्पन्न पलायन की इन विषम परिस्थितियों के बावज़ूद भी इन लोगों में जो जीने की ललक है, जो हिम्मत ना हारने का जज़्बा है उसको ही पीयूष मिश्रा ने इस गीत की पंक्तियों में बड़ी खूबसूरती से उभारा है। पीयूष ने गीत के मुखड़े में सितार और इंटरल्यूड्स में बाँसुरी का प्रयोग किया है। पर इस गीत की जान हैं इसके शब्द।

गीत में पीयूष ने कहना चाहा है कि कहीं तो कोई चाँद से खेल रहा है तो कहीं रोटियों के लिए मारामारी है। एक ओर मुद्राओं की खनक है तो दूसरी ओर रुदन के स्वर हैं । पर सामाजिक असमानता के इस माहौल में क्या गरीबों की कोई  सुध लेने वाला है?  पर इन्हें अब इस बात का आसरा भी नहीं कि कोई इनका उद्धार करने बाहर से आएगा। अपने भाग्य से इन्हें ख़ुद ही लड़ना है। इतनी हिम्मत पैदा करनी है अपने आप में कि आती मौत भी इनके जज़्बे को देख दूर भाग जाए।

तो उन्हीं की आवाज़ में सुनते हैं ये नग्मा


इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ
हम चाँद पे रोटी की चादर डालकर सो जाएँगे
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे

इक बगल में खनखनाती सीपियाँ हो जाएँगी
इक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी
हम सीपियों में भरके सारे तारे छूके आएँगे
और सिसकियों को गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे

अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा
गम न कर जो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी

होनी और अनहोनी की परवाह किसे है मेरी जाँ
हद से ज्यादा ये ही होगा कि यहीं मर जाएँगे
हम मौत को सपना बता कर उठ खड़े होंगे यहीं
और होनी को ठेंगा दिखाकर खिलखिलाते जाएँगे

 

एक शाम मेरे नाम पर पीयूष मिश्रा

Thursday, February 21, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 6 : साँवली सी रात हो..ख़ामोशी का साथ हो

वार्षिक संगीतमाला की आठवीं और सातवीं पॉयदान के गीत को सुनाने की बजाए आज आपको सीधे लिए चलते हैं छठी पॉयदान के गीत की तरफ़। आप भी सोचे रहे होंगे कि ये क्या बात हुई पर क्या कहें हुजूर संत वैलेंटाइन ने मुझे आज के दिन इस गीत के आलावा किसी और गीत के बारे में लिखने की सख़्त ताकीद कर दी है। दिल तो पहले ही उनके खेमे में था और अब तो दिमाग भी संत वैलेंटाइन का कोपभाजन नहीं बनना चाहता। तो आइए जानते हैं कि ऐसा क्या है छठी पॉयदान के गीत में जो मुझे वार्षिक संगीतमाला का क्रम तोड़ने पर मजबूर कर रहा है?
अरिजित, स्वानंद और प्रीतम

यूँ तो फिल्म बर्फी के तमाम गीत इस साल खूब खूब बजे और सराहे गए हैं पर इनमें एक ऍसा गीत भी है जो टीवी के पर्दे पर ज्यादा नहीं दिखा। फिल्म देखते हुए ख़ुद मेरा ध्यान इसके बोलों पर नहीं गया। कुछ गीत ऐसे होते हैं जिन्हें हृदय के अंतःस्थल से महसूस करने के लिए आप तनिक व्यवधान भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये गीत उसी श्रेणी का गीत है। तो मेरा सुझाव ये है कि अगर इसका पूर्ण आनंद उठाना हो तो रात्रि के प्रथम प्रहर का इंतज़ार कीजिए। वसंत की इस हल्की ठंड में अपने कमरे में जाइए और रोशनी बंद कर चुपचाप लिहाफ के अंदर दुबक लीजिए और फिर उस प्यारे से अँधेरे में गीत की हर पंक्ति को अपने आप तक पहुँचने दीजिए। फिर देखिए स्वानंद किरकिरे की अद्भुत लेखनी का जादू किस तरह आपको इश्क़ की ख़ुमारी से मदहोश कर देता है।

घुप्प अँधेरी काली रातों ने आपको कभी ना कभी तो डराया होगा? या उसके उलट  रोशनी से जगमगाती रातों ने आपकी ज़िंदगी में खुशियाँ बिखेरी होंगी। पर साँवली सी रात ..रात के इस रूप का रहस्य तो बस स्वानंद की कलम ही खोल सकती थी। कितनी खूबसूरती से मुखड़े में अपने हमसफ़र के साथ बिताए उन हसीन लमहों का ख़ाका खींचते हुए वो कहते है. साँवली सी रात हो ख़ामोशी का साथ हो..बिन कहे,बिन सुने बात हो तेरी मेरी..नींद जब हो लापता..उदासियाँ ज़रा हटा..ख्वाबों की रजाई में..रात हो तेरी मेरी

उफ्फ.. अब शब्दों कै कैनवास पर इससे ज्यादा रूमानी रंग भला क्या भरे जा सकते थे?.. ? मुखड़े के पहले प्रीतम का संगीत संयोजन नदी की कलकल बहती धारा सा लगता है और फिर अरिजित सिंह की फुसफुसाती आवाज़ हृदय को स्पंदित सी करती है। स्वानंद की कल्पनाशीलता दूसरे अंतरे नए आयाम तलाशती है जब वो कहते हैं बर्फी के टुकड़े सा,चन्दा देखो आधा है...धीरे धीरे चखना ज़रा.. हूँ ..हँसने रुलाने का..आधा पौना वादा है, कनखी से तकना ज़रा :)

वैसे एक रोचक तथ्य ये है कि ये अंतरा शुरु में कुछ दूसरी शक़्ल लिए था। क्या आप नहीं देखना चाहेंगे कि किस तरह फिल्म के पर्दे पर आने के पहले काग़ज़ के टुकड़ों पर ये गीत पलते बढ़ते हैं?



और हाँ ये बता दूँ कि ये चित्र मुझे एक शाम मेरे नाम के पाठकों से बाँटने के लिए साथी ब्लॉगर अंकित जोशी ने मुहैया कराया है।

अरिजित ने भी इस गीत को ठीक ठाक निभाया है। ये जरूर है  है कि अरिजित इस गीत को उस सहजता से नहीं गा पाए जिसकी जरूरत थी और कहीं कहीं वो बोलों पर ज्यादा ही मेहनत करते दीखते हैं ।  उनका एक जगह  'रजाई' को 'राजाई' कहना थोड़ा खलता जरूर है। पर स्वानंद के दिल को छूते शब्द और उनके अनुरूप प्रीतम का दिया संगीत श्रोताओं को ये गीत बार बार सुनने को बाध्य करता है।

तो वेलेंटाइन डे के अवसर पर ये गीत मेरे उन सभी मित्रों को समर्पित है जो ख़ुद को Die Hard Romantic मानते हों...तो आइए बहें प्रेम की अविरल धारा में इस गीत के साथ..


साँवली सी रात हो
ख़ामोशी का साथ हो
हम्म.. साँवली सी रात हो
ख़ामोशी का साथ हो.
बिन कहे,बिन सुने
बात हो तेरी मेरी
नींद जब हो लापता
उदासियाँ ज़रा हटा
ख्वाबों की रजाई में
रात हो तेरी मेरी


झिल मिल तारों सी, ऑंखें तेरी
खारे खारे पानी की, झीलें भरे
हरदम यूँ ही तू, हँसती रहे
हर पल है दिल में
ख्वाहिशें यहीं
ख़ामोशी की लोरियाँ
सुन तो रात सो गई
बिन कहे बिन सुने
बात हो तेरी मेरी

साँवली सी रात हो,ख़ामोशी का साथ हो
बिन कहे, बिन सुने,बात हो तेरी मेरी

बर्फी के टुकड़े सा,चन्दा देखो आधा है
धीरे धीरे चखना ज़रा.. हूँ ..हँसने रुलाने का
आधा पौना वादा है, कनखी से तकना ज़रा
ये जो लमहे हैं,लमहों की बहती नदी में
हाँ भीग लूँ हाँ भीग लूँ
ये जो आँखे हैं
आँखों की गुमसुम ज़ुबाँ को
मै सीख लूँ हाँ सीख लूँ
अनकही सी गुफ्तगू, अनसुनी सी जुस्तजू
बिन कहे, बिन सुने, अपनी बात हो गई
साँवली सी रात हो....

Wednesday, February 20, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 7 : इत्ती सी हँसी, इत्ती सी ख़ुशी, इत्ता सा टुकड़ा चाँद का..

अच्छा जरा बताइए तो हिंदी फिल्मों में दो प्रेम के मारों को अपने नए नवेले ख़्वाबों का घर बनाते आपने कितनी बार सुना और गुना है। अपने हमसफ़र के साथ नयी ज़िदगी अपने नए घोंसले में शुरु करने का ख़्याल इतना प्यारा है कि गीतकारों ने अलग अलग रंगों में इस जज़्बे को हमारे साथ बाँटा है। 

आज जब आँखें मूँद उन गीतों को याद करने की कोशिश कर रहा हूँ तो सबसे पहले फिल्म घरौंदा में गुलज़ार का लिखा वो गीत याद आ रहा है दो दीवाने शहर में रात को और दोपहर में, आबोदाना ढूँढते हैं इक आशियाना ढूँढते हैं.. नए नीड़ की कल्पनाओं को भूपे्द्र की आवाज़ के पंख मिल गए थे उस गीत को। सो आज भी वो नग्मा हृदय के पास ही फड़फड़ाता रहता है। तनिक पीछे चलूँ तो फिल्म नौकरी के लिए किशोर दा का गाया वो नग्मा छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में, आशा दीवाने मन में बाँसुरी बजाए याद आता है जिसे रेडिओ पर हम बारहा सुनते थे। और हाँ जग्गू दा का वो नग्मा तो छूट ही रहा था जिसे उन्होंने चित्रा जी के साथ फिल्म साथ साथ में गाया था ये तेरा घर वो मेरा घर किसी को देखना हो गर तो पहले आ के माँग ले तेरी नज़र मेरी नज़र। कितने प्यारे गीत थे ये सब जो पर्दे के चरित्रों के साथ हमें भी कुछ पल के लिए ही सही उन्हीं ख़्वाबों में गोते लगाने का मौका दे देते थे।
 
आप तो जानते ही हैं कि किशोर दा, गुलज़ार और जगजीत सिंह मुझे कितने प्रिय रहे हैं शायद यही वज़ह है कि इनसे जुड़े गीत मेरे ज़ेहन में पहले आए। वैसे आप भी बताइएगा कि इस ख्याल से जुड़ा कौन सा गीत आपके मन में पहले आता है।


तो जब तक आप सोचें मैं आपको एक ऐसे ही भावों को लिए वार्षिक संगीतमाला की पॉयदान संख्या सात के गीत से मिलवा देता हूँ जिसे लिखा है स्वानंद किरकिरे ने, धुन बनाई संगीतलकार प्रीतम ने और जिसे अपने मधुर स्वर से सँवारा श्रेया घोषाल और निखिल पॉल जार्ज की जोड़ी ने। जी हाँ ये गीत है फिल्म बर्फी का जिसमें थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी और थोड़े ख्वाबों के मिश्रण से चाँद जैसे खूबसूरत आशिये का निर्माण कर रहे हैं। कहना ना होगा कि अब जब भी तिनकों से आशियाँ बनाने की बात आएगी ये गीत ऊपर की सूची का हिस्सा होगा।

गीत  एकार्डियन की शानदार प्रील्यूड से शुरु होता है। प्रीतम का संगीत संयोजन पश्चिम यूरोपीय संगीत से निकट पर लाजवाब है। श्रेया की आवाज़ में ये गीत इतना प्यारा बन पड़ा है कि आप इसे घंटों लगातार सुन सकते हैं। निखिल पॉल जार्ज जिनके बारे में पहले ही आपको बता चुका हूँ  अंतरों में श्रेया के पूरक का काम बखूबी करते हैं। जिस तरह श्रेया ने इस गीत को निभाया है, युगल गीत होने के बाद भी ये श्रेया का हो के रह गया है। तो चलिए थोड़ा सा हम सब भी झूम लें इस ख़ुशनुमा गीत के साथ...

इत्ती सी हँसी
इत्ती सी ख़ुशी
इत्ता सा टुकड़ा चाँद का
ख़्वाबों के, तिनकों से
चल बनाएँ आशियाँ

दबे दबे पाँव से
आये हौले हौले ज़िन्दगी
होंठों पे ऊँगली चढ़ा के
हम ताले लगा के चल
गुमसुम तराने चुपके-चुपके गायें
आधी-आधी बाँट लें
आजा दिल की ये ज़मीं
थोड़ा सा तेरा सा होगा
थोड़ा मेरा भी होगा
अपना ये आशियाँ

ना हो चार दीवारें
फिर भी झरोखें खुले
बादलों के हो परदे
शाखें हरी, पंखा झले
ना हो कोई तकरारें
अरे मस्ती, ठहाके चले
प्यार के सिक्कों से
महीने का खर्चा चले
दबे दबे पाँव से...

Sunday, February 17, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 8 : जो भेजी थी दुआ ..वो जा के आसमान से यूँ टकरा गयी...

जिंदगी की राहें हमेशा सहज सपाट नहीं होती। कभी कभी ये ज़िंदगी बड़े अज़ीब से इम्तिहान लेने लगती है। आपके और आपके करीबियों के साथ कुछ ऐसा होता है जो आप एकदम से स्वीकार नहीं कर पाते। मन अनायास ही ये सवाल कर उठता है..ऐसा मेरे साथ ही क्यूँ भगवन ? पर उस सवाल का जवाब देने के लिए ना आपके संगी साथी ही आते हैं ना ये परवरदिगार। अपने आँसुओं के बीच की ये लड़ाई ख़ुद आपको लड़नी पड़ती है। मन की इन्हीं परिस्थितियों को उभारता हैं वार्षिक संगीतमाला की आठवी पॉयदान का ये संवेदनशील नग्मा जिसे लिखा है कुमार राकेश ने और जिसे संगीतबद्ध किया है विशाल शेखर की जोड़ी ने। 


गीतकार कुमार, जिनसे आपकी मुलाकात मैंने 2010 की वार्षिक संगीतमाला में बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार रे  गीत के साथ कराई थी ने गीत की इन भावनाओं के लिए कमाल के बोल लिखे हैं। ज़िंदगी के कठोर हालातों से उपजी बेबसी और हताशा उभर कर सामने आती है जब कुमार कहते हैं पसीजते है सपने क्यूँ आँखो में..लकीरें जब छूटे इन हाथो से यूँ बेवजह..जो भेजी थी दुआ ..वो  जा के आसमान से यूँ टकरा गयी कि आ गयी है लौट के सदा ...

फिल्म शंघाई के इस गीत को गाया है एक ऐसी गायिका ने जिनकी आवाज़ में कुछ ऐसा जरूर है जिसे पहली बार सुनकर आप ठिठक से जाते हैं। ये आवाज़ है नंदिनी सिरकर (Nandini Sirkar) की। नंदिनी की आवाज़ पर  हिंदी फिल्म संगीत प्रेमियों का ध्यान भले ही 2011 में प्रदर्शित फिल्म रा वन के गीत भरे नैना.. से गया हो पर बहुमुखी प्रतिभा की नंदिनी पिछले एक दशक से सांगीतिक जगत में सक्रिय रही हैं। 

नंदिनी को सांगीतिक विरासत अपनी माँ शकुंतला चेलप्पा से मिली जो कर्नाटक संगीत की हुनरमंद गायिका थी। बारह साल की उम्र तक नंदिनी ने वीणा, सितार और फिर एकाउस्टिक गिटार बजाना सीख लिया था। पर नंदिनी ने युवावस्था में संगीत को एक शौक़ की तरह ही लिया । संगीत की तरह पढ़ने लिखने में नंदिनी अपना कमाल दिखलाती रही। गणित में परास्नातक की डिग्री लेने वाली और भौतिकी को बेहद पसंद करने वाली नंदिनी सूचना प्राद्योगिकी से जुड़ी नौकरी में लीन थीं जब संयोग से हरिहरण जी ने उनका गाना सुना।  इस तरह पहली बार 1998 में एक तमिल फिल्म में उन्हें पार्श्व गायिका का काम मिला। पिछले एक दशक में उन्हें दक्षिण  भारतीय  और हिंदी फिल्मों में गाने के इक्का दुक्का अवसर मिलते रहे। पर 2011में रा वन  (भरे नैना..) और फिर 2012 में एजेंट विनोद  (दिल मेरा मुफ्त का ..)  में उनके गाए गीतों ने खूब सुर्खियाँ बटोरीं।

शंघाई के इस गीत में जिस दर्द की आवश्यकता थी वो नंदिनी के स्वर में स्वाभाविक रूप से फूटती नज़र आती है। इस गीत में नंदिनी का बतौर गायक साथ दिया है संगीतकार शेखर रवजियानी ने। विशाल शेखर ने इस गीत में अपने हिप हाप संगीत से अलग हटकर संगीत संयोजन देने की कोशिश की है। जब गीत की लय शुरुआती सवालों से उठती हुई जो भेजी थी दुआ.. तक पहुँचती है तो वो पुकार सीधे दिल से टकराती प्रतीत होती है।

तो आइए कुमार के दिल को छूते शब्दों के साथ महसूस करें इस गीत की पीड़ा को..

 

किसे पूछूँ, है ऐसा क्यूँ
बेजुबाँ सा ये ज़हाँ है
ख़ुशी के पल, कहाँ ढूँढूँ
बेनिशान सा वक्त भी  यहाँ है
जाने कितने लबो पे गिले हैं
ज़िन्दगी से कई फासले हैं
पसीजते है सपने क्यूँ आँखो में
लकीरें जब छूटे इन हाथो से यूँ बेवजह

जो भेजी थी दुआ ..वो  जा के आसमान
से यूँ टकरा गयी
कि आ गयी है लौट के सदा

साँसो ने कहाँ रूख मोड़ लिया
कोई राह नज़र में न आये
धड़कन ने कहाँ दिल छोड़ दिया
कहाँ छोड़े इन जिस्मो ने साए
यही बार बार सोचता हूँ
तनहा मैं यहाँ
मेरे साथ साथ चल रहा है
यादों का धुआँ
....

Tuesday, February 12, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 9 : फैली थी स्याह रातें आया तू सुबह ले के...

कितनी विशाल है ना ये दुनिया? अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में हम ना जाने कितने लोगों से रूबरू होते हैं। पर ऐसा क्यूँ है कि किसी से कुछ घंटों की मुलाकात जीवन पर्यन्त याद रहती है और कभी तो रोज़ मिलने वाले भी हमारे ख़्यालों में दूर दूर तक नहीं फटकते? दरअसल मन तो हमेशा तलाश में रहता है उस ख़ास शख़्सियत के जिसकी छवियाँ हम अपने सपनों में गढ़ते रहते हैं। पर ऐसा इंसान जल्द मिलता कहाँ है? अकेलेपन के अंधेरे में हमें अपना जीवन बेमानी लगने लगता है। और फिर... तनहा सी इस ज़िंदगी में अचानक हमारे सपनों का सौदागर प्रकट हो कर समंदर में डोलती अपनी कश्ती को  इतनी सहजता से किनारे लगा देता है कि हमें कहना ही पड़ता है कुछ तो है तुझसे राबता कुछ तो है तुझसे राबता ..


वार्षिक संगीतमाला की नौवीं सीढ़ी पर है ऐसी ही भावनाओं की प्रतिध्वनि करता एक प्यारा सा नग्मा। फिल्म एजेंट विनोद के इस गीत से मेरा पहला परिचय दो महिने पहले साल भर के गानों को सुनते समय हुआ और एक बार सुनकर ही इस गीत की धुन ने मुझे ऐसा आकर्षित किया कि ये मेरी संगीतमाला का हिस्सा बन गया। संगीतकार प्रीतम सुरीले गीत रचने में तो पहले से ही माहिर हैं पर अमिताभ भट्टाचार्य जैसे प्रतिभाशाली गीतकार उनकी मधुर धुन को अपने शब्दों से एक अलग स्तर पर ले जाते हैं। प्रीतम ने इस गीत के तीन रूपों को तीन अलग अलग गायिकाओं से गवाया है। श्रेया घोषाल, हमसिका अय्यर और अदिति सिंह शर्मा के गाए अलग अलग वर्जन में सबसे ज्यादा मुझे हमसिका और अरिजित सिंह का वर्जन पसंद आया जिसे एलबम में स्याह रातें का नाम दिया गया है।

सा रे गा मा के 1995 के संस्करण के फाइनल में जगह बनाने वाली गायिका हमसिका का सांगीतिक सफ़र पिछले दशक में बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है। वर्ष 2007 में एकलव्य दि रॉयल गार्ड के गीत चंदा रे से चर्चा में आयी हमसिका को पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्म जगत में ज्यादा मौके नहीं मिल पाए हैं। इस युगल गीत में उनका साथ दिया है युवा प्रतिभाशाली गायक अरिजित सिंह ने। गीत के मुखड़े में प्रीतम पहले पियानो और फिर इलेक्ट्रिक गिटार की मधुर धुन से श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं और फिर द्रुत पर सुरीली रिदम में गीत के बोल मूड को रूमानी बना देते हैं। इंटरल्यूड्स में गिटार के प्रयोग के बाद गीत का आनंद तब दूना हो जाता है जब अरिजित सिंह की आवाज़ आपके कानों से टकराती है। सरगम के साथ अरिजित ऊँचे सुरों को जिस सहजता से सँभालते हैं कि मन उनकी गायिकी को दाद दिए बिना नहीं रह पाता। तो आइए सुनें इस नग्मे को

फैली थी स्याह रातें आया तू सुबह ले के
बेवजह सी ज़िंदगी में जीने की वज़ह ले के
खोया था समंदरों में, तनहा सफीना मेरा
साहिलों पे आया है तू जाने किस तरह ले के
कुछ तो है तुझसे राबता कुछ तो है तुझसे राबता
कैसे हम जानें, हमें क्या पता
कुछ तो है तुझसे राबता
तू हमसफ़र है, फिर क्या फिकर है

अब क्या है कहना ,हमको है रहना
जन्नतें भुला के तेरी बाहों में पनाह ले के
फैली थी स्याह रातें आया तू सुबह ले के

मेहरबानी जाते-जाते मुझपे कर गया
गुज़रता सा लमहा एक दामन भर गया
तेरे नज़ारा मिला, रोशन सितारा मिला
तकदीर की कश्तियों को किनारा मिला

रूठी हुई ख़्वाहिशों से, थोड़ी सी सुलह ले के
आया तू ख़ामोशियों में बातों की जिरह ले के
खोया था समंदरों में, तनहा सफीना मेरा
साहिलों पे आया है तू जाने किस तरह ले के
फैली थी स्याह रातें ....
(साहिल - किनारा, सफ़ीना - नाव,  राबता - रिश्ता)

वैसे ये गीत मुझे किशोर दा के गाए एक गीत की याद दिलाता है। क्या आपको ऐसा कोई गीत याद आता है? अगर हाँ तो बताइए ज़रा।

Sunday, February 10, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 10 : मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ...

वार्षिक संगीतमाला 2012 में बाकी रह गए हैं अंतिम दस पॉयदानों के गीत और आज प्रथम दस की पहली कड़ी के रूप में जो गीत है वो काफ़ी परेशानियाँ खड़ी कर रहा है। पर ये परेशानी हमारी या आपकी नहीं है बल्कि फिल्म इशकज़ादे के उन चरित्रों की है जो ज़िंदगी भर नफ़रत की आग के बीच पले बढ़े हैं। अब इसी बीच हालात कुछ इस तरह के हो जाएँ कि जिस शख़्स को आपको देखना भी पहले गवारा ना हो उसी की चाहत आपको उसके प्रति अपना व्यवहार बदलने पर मज़बूर कर दे तो दिल की इस अंदरुनी उठापटक से परेशानी तो होगी ना।

एक तरुणी के दिल में चल रही मीठी परेशानी को अपने शब्दों से सँवारा है गीतकार क़ौसर मुनीर ने। वर्षों से दबी नफ़रत को मोहब्बत में बदलने के अहसास को मुनीर ज़रा-ज़रा काँटों से लगने लगा दिल मेराचाहत के छीटें हैं, खारे भी मीठे हैं, आतिशें वो कहाँ, रंजिशें हैं धुआँ जैसे जुमलों से बड़ी खूबसूरती से आकार देती हैं। गीत की पंचलाइन मैं परेशाँ परेशाँ...के बारे में मुनीर कहती हैं कि उन्होंने इसी तरह का उद्घोष किसी सूफी रचना में सुना था और वो उनके मन में कहीं बैठा हुआ था। जब उन्हे इस गीत की परिस्थिति बताई गयी तो इसी के केंद्र में रखकर उन्होंने ये गीत बुन दिया।

संगीतकार अमित त्रिवेदी अपनी इस कम्पोजीशन को रॉक बैलॉड की श्रेणी में रखते हैं जिसके इंटरल्यूड्स में हारमोनियम की सुरीली तान है। वैसे भी अगर आप अमित त्रिवेदी के संगीत पर शुरु से पैनी नज़र रखते हों तो आप जानते होंगे कि हारमोनियम उनके संगीतबद्ध गीतों का अहम हिस्सा रहा है। अमित ने इस गीत के लिए एक नई आवाज़ का चुनाव किया। ये आवाज़ थी शाल्मली खोलगडे की।

इशकज़ादे से अपना हिंदी फिल्म संगीत का सफ़र शुरु करने वाली शाल्मली ने पिछले साल अइया और कॉकटेल के गाने भी गाए हैं। अपनी माँ उमा खोलगडे और फिर शुभदा पराडकर से संगीत सीखने वाली शाल्मली हिंदी और अंग्रेजी गायन में समान रूप से प्रवीण हैं। 

 शाल्मली खोलगडे, अमित त्रिवेदी और क़ौसर मुनीर

पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में आगे की शिक्षा के लिए विदेश जाने का मन बना चुकी शाल्मली के लिए अमित द्वारा बुलाना उनके सांगीतिक सफ़र का अहम मोड़ साबित हुआ। शाल्मली बताती हैं कि जब पहली बार इस गीत के कच्चे बोलों को उन्होंने अमित त्रिवेदी जी के सामने गुनगुनाया तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी : कहाँ बैठी थी इतनी देर से तू छोरी? हिंदी फिल्म जगत के अपने पहले गीत को जिस तरह उसकी भावनाओं में डूबकर उन्होंने निभाया है वो काबिलेतारीफ़ है

 नए-नए नैना रे ढूँढे हैं दर-बदर क्यूँ तुझे
नए-नए मंज़र ये तकते हैं इस कदर क्यूँ मुझे
ज़रा-ज़रा फूलों पे झड़ने लगा दिल मेरा
ज़रा-ज़रा काँटों से लगने लगा दिल मेरा
मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ 

आतिशें वो कहाँ
मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ
रंजिशें हैं धुआँ..
मैं परेशाँ..
 

गश खाके गलियाँ, मुड़ने लगी हैं.. मुड़ने लगी हैं
राहों से तेरी जुड़ने लगी हैं जुड़ने लगी हैं
चौबारे सारे ये, मीलों के मारे से
पूछे हैं तेरा पता
ज़रा ज़रा चलने से थकने लगा मन मेरा
ज़रा ज़रा उड़ने को करने लगा मन मेरा

मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ
दिलकशीं का समा
मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ
ख़्वाहिशों का समा..
मैं परेशाँ..

बेबात खुद पे मरने लगी हूँ, मरने लगी हूँ
बेबाक आहें भरने लगी हूँ, भरने लगी हूँ
चाहत के छीटें हैं, खारे भी मीठे हैं
मैं क्या से क्या हो गयी
ज़रा-ज़रा फितरत बदलने लगा दिल मेरा
ज़रा-ज़रा किस्मत से लड़ने लगा दिल मेरा

मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ
कैसी मदहोशियाँ
मैं परेशाँ., परेशाँ, परेशाँ, परेशाँ
मस्तियाँ मस्तियाँ..
मैं परेशाँ..

तो आइए सुनते हैं शाल्मली की आवाज़ में ये गीत

Friday, February 08, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 11 :महक भी कहानी सुनाती है..सुन लो अगर

पिछली चौदह सीढ़ियाँ पार कर  आज वक़्त आ गया है ग्यारहवीं पॉयदान के गीत से आपको रूबरू कराने का। इतना तो तय है कि अइया फिल्म का ये  गीत आपमें से बहुतों के लिए अनसुना होगा। वैसे तो फिल्म अइया का नाम सुनते ही  मन में ड्रीमम वेकपम के लटके झटके याद आ जाते हैं पर इस गीत की प्रकृति  उस नग्मे से बिल्कुल जुदा है। फिल्म  सत्यम शिवम सुंदरम का  वो गीत याद है आपको ...शीतल, निर्मल, कोमल संगीत की देवी स्वर सजनी.....। बस इस गीत को मैं भी इन्हीं तीन विशेषणों से परिभाषित करना चाहूँगा यानि ये एक ऐसा गीत है जो आपके मन को शीतल, निर्मल और कोमल कर देता है।  दिन भर की थकान के बाद जब कुछ पल आपके पास  अपने लिए हों तो आँखें बंद कीजिए और इस गीत को सुनिए। देखिएगा आप कितने तरो ताज़ा महसूस करते हैं।

ग्यारहवीं पॉयदान के इस गीत में एक अलग सी बात है। अमित त्रिवेदी का संगीतबद्ध ये गीत साल के उन गीतों में शुमार होता है जिनका प्रील्यूड सबसे लंबा है। यानि मुखड़े में श्रेया की खनकती आवाज़ सुनने के लिए आपको लगभग पौने दो मिनटों का इंतज़ार करना पड़ता है। पर ये इंतज़ार आपके कानों में पार्श्व में बजती शहनाई और पियानो के अद्भुत मिश्रण से वो मिठास घोल जाता है जिसका ज़ायका घंटों तक आपके ज़ेहन में बना रहता है। उसके बाद तो हमारी स्वर सजनी यानि श्रेया ने जिस मुलायमियत से अपनी शहद घुली आवाज़ में अमिताभ भट्टाचार्य के शब्दों को सहलाती हुई गाती हैं कि मन बिल्कुल शांत हो जाता है ।


अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य की जोड़ी उन दो मित्रों की जोड़ी है जो एक दशक से साथ साथ काम कर चुके हैं। आमिर और डेव डी के बाद पहली बार फिल्म जगत ने उनके काम को गंभीरता से लेना शुरु किया। आज अमित और अमिताभ साथ काम करने के आलावा दूसरे गीतकारों और संगीतकारों के लिए काम कर रहे हैं पर अमिताभ मानते हैं कि अमित के साथ काम करने में वो सबसे ज्यादा सहज रहते हैं। अमित और अमिताभ के बारे में बात करने के लिए तो आगे की पॉयदानें भी हैं तो आइए लौटते है इस गीत पर और देखते हैं कि इस गीत में क्या कमाल दिखला रही है ये युवा जोड़ी..


महक भी कहानी सुनाती है
सुन लो अगर
हवाओं के ज़रिए बताती है
समझो अगर

हौले दिल हौले दिल,फूलों की जुबाँ,
महफिल महफिल,कहती है सुबह
झिलमिल झिलमिल तारे दिन में भी
तुम पे हैं गिन लो अगर
महक भी कहानी सुनाती है

छींटे रंगों के पड़ते ही
कोरे ख़्वाबों में जड़ते ही
महफिल हो गई, हो गई
वो सभी जो कभी, सूनी सूनी
सूनी सूनी सी गलियाँ थी
वो सभी काफिला बन गईं

कर लो कर लो तय ये फासला
सपनों सपनों का ये घोसला
तिनका तिनका नींदे चुन के भी
तुम पे है चुन लो अगर

महक कहानी सुनाती है
हवाओं के ज़रिए बताती है

वार्षिक संगीतमालाओं में अमिताभ भट्टाचार्य और अमित त्रिवेदी की जुगलबंदी

Tuesday, February 05, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 12 : तोरे नैना बड़े दगाबाज रे...

हिंदी फिल्म संगीत में आज का दौर प्रयोगधर्मिता का दौर है। युवा संगीतकार लीक से हटकर नए तरह के संगीत संयोजन को बेहतरीन आयाम दे रहे हैं। पिछले कुछ सालों से अमित त्रिवेदी और पिछले साल गैंग आफ वासीपुर में स्नेहा खानवलकर का काम इसी वज़ह से सराहा भी गया था। पर प्रयोगधर्मिता तभी तक अच्छी लगती है जब तक उसका सुरीलापन बरक़रार रहे। मेलोडी के बिना कभी कभी ये प्रयोग कौतुक तो जगाते हैं पर इनका असर कुछ दिनों में ही हल्का पड़ने लगता है।

वार्षिक संगीतमाला की बारहवीं पॉयदान पर विशुद्ध भारतीय मेलोडी की चाशनी में डूबा गीत पाश्चात्य संक्रमण और प्रयोगधर्मिता की परिधि से परे है और एक बार में ही कानों के रास्ते सीधे हृदय में जगह बना लेता है। संगीतकार साज़िद वाज़िद का संगीतबद्ध ये गीत है फिल्म दबंग 2 का और इसे लिखा है समीर ने।

गाने की परिस्थिति ऐसी है कि नायक अपनी रूठी पत्नी को मना रहा है। ज़ाहिर सी बात है समीर को गीत में मीठी तकरार का पुट देना था। समीर सहज शब्दों में ही इस नोंक झोंक को गीत के दो अंतरों की सहायता से आगे बढ़ाते हैं। समीर ने गीत के बोलों में इस बात का ध्यान रखा है कि उसमें उत्तर प्रदेश की बोली का ज़ायका मिले आखिर हमारे चुलबुल पांडे इस प्रदेश के जो ठहरे।

पर गीत का असली आनंद है राहत की सुकून भरी गायिकी और साज़िद वाज़िद के मधुर संगीत संयोजन में। मुखड़े में तबले ताली और हारमोनियम का अद्भुत मिश्रण गीत की मस्ती को आत्मसात किए चलता है। इंटरल्यूड्स में पहले सितार और फिर हारमोनियम का प्रयोग बेहद मधुर लगता है। जिस मुलायमियत की जरूरत इस गीत को थी उसे राहत अपनी दिलकश आवाज़ से साकार करते दिखते हैं। उनकी गायिकी का असर ये होता है कि मन श्रेया के हिस्से से जल्द निकलने को करने लगता है।

तो आइए सुनें इस गीत को राहत और श्रेया की आवाज़ों में..



तोरे नैना बड़े दगाबाज रे
कल मिले, कल मिले ई हमका भूल गए आज रे
दगाबाज रे, हाए दगाबाज रे..तोरे नैना बड़े दगाबाज रे


काहे ख़फा ऐसे, चुलबुल से बुलबुल
काहे ना तू माने बतियाँ
काहे पड़ा पीछे, जान पे बैरी
ना जानूँ क्या तोरी बतियाँ
ज़िंदगी अपनी हम तोका दान दई दें
मुस्कुराके जो माँगे परान दई दें
कल मिले, कल मिले ई हमका भूल गए आज रे..
दगाबाज रे, हाए दगाबाज रे..तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

डरता ज़हाँ हमसे, हम तोसे डरते
इ सब जानें मोरी रनिया हाए
मसका लगाओ ना छोड़ो जी छोड़ो
समझती है तोरी धनिया
इस अदा पे तो हम कुर्बान गए जी
तोहरी ना ना में हामी है जान गए जी
कल मिले, कल मिले ई हमका भूल गए आज रे..
तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

Sunday, February 03, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 13 : फिर ले आया दिल मजबूर क्या कीजे..

वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं पॉयदान पर है एक बार फिर बर्फी फिल्म का एक और रूमानी नग्मा जिसे लिखा है सईद क़ादरी साहब ने। बतौर गीतकार पिछले छः सालों में सईद कादरी के लिखे गीत चार बार वार्षिक संगीतमालाओं की शोभा बढ़ा चुके हैं। तेरे बिन मैं कैसे जिया (2006), तो फिर आओ मुझको सताओ (2007), ज़िदगी ने ज़िदगी भर गम दिए जितने भी मौसम दिए सब नम दिए (2007) और पिछले साल दिल सँभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू (2011)।  पर क्या आप जानते हैं कि रोमांटिक गीतों में अपनी अलग पहचान बनाने वाला ये गीतकार पेशे से एक बीमा एजेंट है?

अस्सी के दशक में पहली बार काम की तलाश में सईद क़ादरी जोधपुर से मुंबई आए तो वो महेश भट्ट से मिले। महेश भट्ट को उनका काम तो पसंद आया पर तब तक उन्होंने अपने पारिवारिक बैनर तले फिल्में बनानी शुरु नहीं की थीं सो क़ादरी खाली हाथ ही वापस लौट आए। पर 'जिस्म' के गीतों के लिए महेश भट्ट ने सईद क़ादरी को जो मौका दिया उसके बाद उन्हें काम के लिए फिर दौड़ना नहीं पड़ा।

क़ादरी अपना ज्यादातर समय अभी भी अपने पेशे को देते हैं। उनके बारे में मशहूर है कि वो अपने गीत संगीतकारों को जोधपुर में रहते हुए ही फोन पर ही लिखा देते हैं। उनके लिए गीत लिखना एक शौक़ है। साहिर जैसे शायर उनके आदर्श रहे हैं और उनका मानना है कि ऐसे महान शायरों को पढ़कर उन्हें जो आनंद मिला है उसे वो अपने गीतों में ढाल सकें तो उससे बेहतर उनके लिए कुछ भी नहीं है। प्रीतम की फिल्मों के लिए सईद क़ादरी पहले भी लिखते रहे हैं और इस फिल्म में लिखा उनका इकलौता नग्मा उसमें व्यक्त भावनाओं के लिए बेहद सराहा गया।

शायद ही कोई शख़्स होगा जो प्रेम जैसी भावना से दो चार ना हुआ हो। पर प्रेम होना एक बात है और अपने दिल की बात को हिम्मत करके अपने प्रेमी तक पहुँचाना दूसरी। एकतरफा प्रेम के किस्से किसने नहीं सुने। कहीं दिल में एक आँच जल चुकी होती है पर दूसरा शख़्स उसकी तपन का अंदाज़ ही नहीं लगा पाता। सईद कादरी साहब अपने इस गीत में यही कहना चाहते हैं कि प्रेम की जो आस तुमने अपने मन में जगाई है उसे अधूरा मत छोड़ो। वैसे भी प्यार में डूबा मन तुम्हें कहाँ इसकी इज़ाजत देने वाला है?

मुखड़े के पहले का प्रीतम द्वारा दिया संगीत मन में एक शीतलता सा भरता है। गीत के मिज़ाज को ध्यान में रखते हुए प्रीतम ने संगीत को अर्थपूर्ण बोलों पर चढ़ने नहीं दिया है। वैसे तो इस गीत को रेखा भारद्वाज, अरिजित सिंह और शफक़त अमानत अली खाँ तीनों से गवाया गया है पर मुझे रेखा जी का वर्जन ज्यादा पसंद आता है तो आइए सुनते हैं उनकी आवाज़ में ये नग्मा...


फिर ले आया दिल मजबूर
क्या कीजे
रास न आया रहना दूर
क्या कीजे
दिल कह रहा उसे मुकम्मल कर भी आओ
वो जो अधूरी सी बात बाकी है
वो जो अधूरी सी याद बाकी है
(मुकम्मल - पूरा करना)

करते हैं हम आज कुबूल
क्या कीजे
हो गयी थी जो हमसे भूल
क्या कीजे
दिल कह रहा उसे मयस्सर कर भी आओ
वो जो दबी सी आस बाकी है
वो जो दबी सी आँच बाकी है
(मयस्सर - उपलब्ध, प्राप्त)

किस्मत को है ये मंज़ूर
क्या कीजे आए
मिलते रहे हम बादस्तूर
क्या कीजे
दिल कह रहा है उसे मुसलसल कर भी आओ
वो जो रुकी सी राह बाकी है
वो जो रुकी सी चाह बाकी है
(मुसलसल - सिलसिलेवार )

 

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