Friday, May 31, 2013

'उर्दू की आख़िरी किताब' : इब्ने इंशा का अनूठा व्यंग्य संग्रह (Urdu Ki Aakhri Kitaab)

पिछली बार विमल मित्र की किताब 'एक और युधिष्ठिर' के बारे में चर्चा करते हुए मैंने उसे आपको ना पढ़ने की सलाह दी थी, पर आज जिस पुस्तक की बात मैं आपसे करूँगा ना सिर्फ वो पढ़ने योग्य है बल्कि सहेज के रखने लायक भी। दरअसल इब्ने इंशा की लिखी 'उर्दू की आख़िरी किताब' की तलाश मुझे वर्षों से थी। हर साल राँची के पुस्तक मेले में जाता और खाली हाथ लौटता। ये किताब आनलाइन भी सहजता से मिल सकती है इसका गुमान ना था। पर जब अचानक ही एक दिन राजकमल प्रकाशन के जाल पृष्ठ पर ये किताब दिखी तो वहीं आर्डर किया और एक सप्ताह के अंदर किताब मेरे हाथों में थी। इससे पहले इब्ने इंशा की ग़ज़लों व गीतों से साबका पड़ चुका था पर उनके व्यंग्यों की धार का रसास्वादन करने से वंचित रह गया था।


वैसे अगर आप अभी तक इब्ने इंशा के लेखन से अपरिचित हैं तो इतना बताना लाज़िमी होगा कि भारत के जालंधर जिले में सन् 1927  में जन्मे इंशा , उर्दू के नामी शायर, व्यंग्यकार और यात्रा लेखक के रूप में जाने जाते हैं।। वैसे उनके माता पिता ने उनका नाम शेर मोहम्मद खाँ रखा था पर किशोरावस्था में ही उन्होंने अपने आप को इब्ने इंशा कहना और लिखना शुरु कर दिया। इंशा जी के लेखन की ख़ासियत उर्दू के अलावा हिंदी पर उनकी पकड़ थी। यही वज़ह है कि उनकी शायरी में हिंदी शब्दों का भी इस्तेमाल प्रचुरता से हुआ है। लुधियाना में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद इंशा जी विभाजन के बाद कराची चले गए। इस दौरान पहले आल इंडिया रेडिओ और पाकिस्तानी रेडिओ में काम किया। पाकिस्तान में पहले क़ौमी किताब घर के निदेशक और फिर यूनेस्को के प्रतिनिधि के तौर पर भी उन्होंने अपना योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने इस व्यंग्य संग्रह के अतिरिक्त भी कई किताबें लिखीं जिनमें चाँदनगर, इस बस्ती इस कूचे में और आवारागर्द की डॉयरी प्रमुख  हैं। 

'उर्दू की आख़िरी किताब' व्यंग्य लेखन का एक अद्भुत नमूना है जिसका अंदाज़े बयाँ बिल्कुल नए तरीके का है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि ये पूरी किताब एक पाठ्यपुस्तक की शैली में लिखी गई है जिसमें   इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान और नीति शिक्षा के अलग अलग पाठ हैं। इन पाठों में इंशा जी ने जो ज्ञान बाँटा है उसे पढ़कर हो सकता है आपको अपनी अब तक की शिक्षा व्यर्थ लगे। इंशा जी को भी इस बात का इल्म था इसीलिए किताब की शुरुआत में वो कहते हैं

ये किताब हमने लिख तो ली लेकिन जब छपाने का इरादा हुआ तो लोगों ने कहा, ऐसा ना हो कि कोर्स में लग जाए। बोर्ड वाले इसे मंजूर कर लें और अज़ीज़ तालिब इल्मों का ख़ूनेनाहक हमारे हिसाब में लिखा जाए, जिनसे अब मलका ए नूरजहाँ के हालात पूछे जाएँ तो मलका ए तरन्नुम नूरजहाँ के हालात बताते हैं। 

इंशा ख़ुद ही अपनी इस कृति को मज़ाहिया लहजे में बाकी की 566 कोर्स की किताबों को व्यर्थ साबित करने की ख़तरनाक कोशिश मानते हैं। इंशा जी को अंदेशा है कि इसे पढ़कर तमाम तालिब इल्म (विद्यार्थी) उस्ताद और उस्ताद तालिब इल्म बन जाएँ।

इस किताब के  अनुवादक अब्दुल बिस्मिल्लाह बखूबी इन शब्दों में इस किताब को सारगर्भित करते हैं

इंशा के व्यंग्य में जिन बातों को लेकर चिढ़ दिखाई देती है वो छोटी मोटी चीजें नहीं हैं। मसलन विभाजन, हिंदुस्तान पाकिस्तान की अवधारणा, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आजादी का छद्म, शिक्षा व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति आदि। अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन गंभीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं ताकि पाठकों को लज़्ज़त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वो ख़ुद को शामिल महसूस करे।

हम अंग्रेजो् से तो स्वाधीन हो गए पर बदले में हमने जिस हिंदुस्तान या पाकिस्तान की कल्पना की थी क्या हम वो पा सके ? इंशा जी इसी नाकामयाबी को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं
अंग्रेजों के ज़माने में अमीर और जागीरदार ऐश करते थे। गरीबों को कोई पूछता भी नहीं था। आज अमीर लोग ऐश नहीं करते और गरीबों को हर कोई इतना पूछता है कि वे तंग आ जाते हैं।

आज़ादी के पहले हिंदू बनिए और सरमायादार हमें लूटा करते थे। हमारी ये ख़्वाहिश थी कि ये सिलसिला ख़त्म हो और हमें मुसलमान बनिए और सेठ लूटें।

इतिहास के पूराने दौरों को इंशा की नज़र आज के परिपेक्ष्य में देखती है। अब देखिए पाषाण युग यानि पत्थर के दौर को इंशा की लेखनी किस तरीके से शब्दों में बाँधती है..
राहों में पत्थर
जलसों में पत्थर
सीनों में पत्थर
अकलों में पत्थर
.......................
पत्थर ही पत्थर
ये ज़माना पत्थर का ज़माना कहलाता है...
वहीं आज के समय के बारे में इंशा का कटाक्ष दिल पर सीधे चोट करता है। इंशा इस आख़िरी दौर को वो कुछ यूँ परिभाषित करते हैं..
पेट रोटी से खाली
जेब पैसे से खाली
बातें बसीरत (समझदारी) से खाली
वादे हक़ीकत से खाली
...............................
ये खलाई दौर (अंतरिक्ष युग, Space Age) है

इंशा जी इस उपमहाद्वीप के इतिहास को इस तरीके से उद्घाटित करते हैं कि उनके बारे में सोचने का एक नया नज़रिया उत्पन्न होता है। गणित व विज्ञान के सूत्रों को वो हमें नए तरीके से समझाते हैं। नीति शिक्षा से जुड़ी उनकी कहानियों को पढ़कर शायद ही कोई हँसते हँसते ना लोटपोट हो जाए। बहरहाल इस पोस्ट को ज्यादा लंबा ना करते हुए इस किताब के बेहद दिलचस्प पहलुओं पर ये चर्चा ज़ारी रखेंगे इस प्रविष्टि के अगले भाग में...

किताब के बारे में
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्या १५४
मूल्य   पेपरबैक मात्र साठ रुपये..


एक शाम मेरे नाम पर इब्ने इंशा

Tuesday, May 21, 2013

पानियों की छत पर, बूँदों के भीतर बह चलो...

पिछले साल एक फिल्म आई थी टुटिया दिल। फिल्म कब आई और कब गई ये तो पता नहीं चला पर पिछले साल RMIM पुरस्कार के लिए बतौर जूरी ये गाना जब हिंदी फिल्म संगीत प्रेमियों द्वारा नामांकित हो कर आया तो मैंने इसे पहली बार सुना। तब तक वार्षिक संगीतमाला 2012 के सारे गीत चयनित हो चुके थे इसलिए ये गीत संगीतमाला में स्थान नहीं बना पाया। पर नवोदित कलाकारों द्वारा रचा ये गीत मुझे बेहद पसंद आया था। अक्सर कम बजट की फिल्मो के ऐसे बेहतरीन गीत श्रोताओं तक पहुँच नहीं पाते। पर ये गीत इतनी काबिलियत रखता है कि इस पर चर्चा जरूरी है।

फिल्म टुटिया दिल के इस गीत को लिखा है मनोज यादव ने और इसकी धुन बनाई है गुलराज सिंह ने। जब पहली बार इस गीत को सुना तो माहौल गुलज़ारिश सा लगा।  फिर मनोज यादव के बारे में जो जानकारी अंतरजाल से हासिल हुई उससे ये तो समझ आ गया कि आख़िर इस गीत पर गुलज़ार की सी छाप क्यूँ है?

एक आम माँ बाप की तरह मनोज के माता पिता ने भी उनके डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखा था। मनोज पढ़ाई में मन भी लगा रहे थे कि अचानक कविता लिखने का शौक़ जागृत हो गया उनके मन में। इसकी वज़ह थे गुलज़ार । मनोज तब स्कूल में थे जब उन्होंने गुलज़ार का गीत जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्ढी पहन कर फूल खिला है फूल खिला है.. सुना। गुलज़ार की इस अद्भुत कल्पनाशीलता से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी लिखना शुरु कर दिया।  

छठी सातवीं कक्षा की बात है। मनोज के स्कूल में इतिहास का पीरियड चल रहा था। इतिहास मनोज को जरा भी नहीं रुचता था तो उन्होंने  शिक्षिका को ब्लैकबोर्ड पर तन्मयता से पढ़ाते देख अपनी गीतो की कॉपी में कलम चलानी शुरु कर दी। अभी  ब्लैकबोर्ड को देखते हुए कविता की पहली पंक्ति काली रात की स्याही में..लिखी ही थी कि टीचर उनके पास आयीं और इनके गीतों  की उस कॉपी को वहीं फाड़कर रखते हुए बोलीं -अब ऐसा नहीं चलेगा। मनोज को क्रोध बहुत आया। उन्होंने टीचर से बहस की और तमतमाते हुए कक्षा के बाहर निकल गए। तभी से स्कूल में मशहूर हो गया कि एक नवोदित लेखक पैदा हो गया। वे अपने इस शौक़ की वज़ह से उपहास के भी पात्र बने पर उन्हें यह अहसास हो चुका था कि ऊपरवाले ने उन्हें यही करने के लिए भेजा है। संयोग से मनोज शंकर महादेवन के संपर्क में आए और  फिर उनके साथ पहले एयरसेल के जिंगल के लिए लिखा। फिर लक्स और ऐसे ही कई और विज्ञापनों से बढ़ता मनोज का सफ़र विश्व कप क्रिकेट के गीत दे घुमा के......तक पहुँचा और आज वो फिल्मों के गीत भी लिख रहे हैं।

मनोज की तरह उनके  मित्र गुलराज सिंह को स्कूल में ही वाद्य वादन का चस्का लग गया था। उनके माँ बाप ने उनकी इस प्रतिभा को पहचाना और उन्हें काफी प्रोत्साहित किया। जिस तरह मनोज के प्रेरणास्रोत गुलज़ार हैं वहीं गुलराज अपनी ज़िदगी में ध्वनियों के प्रति आकर्षण पैदा करने का श्रेय ए आर रहमान के फिल्म रोजा में दिए गए संगीत को देते हैं। संगीतकार लॉए को उन्हें अपना हुनर दिखाने का मौका मिला और फिर तो वो  बतौर की बोर्ड प्लेयर शंकर अहसान लॉय की टीम का हिस्सा बन गए। 

मीनल जैन, मनोज यादव, गुलराज सिंह

टुटिया दिल के इस  रूमानी नग्मे में गुलराज ने मीनल जैन और जसविंदर सिंह की जोड़ी को गायिकी के लिए चुना। ये वही मीनल हैं जो इंडियन आइडल के वर्ष 2006 के प्रथम दस प्रतिभागियों का हिस्सा बनी थीं। मीनल की आवाज़ मे उनकी उम्र से ज्यादा  परिपक्वता है। उनकी आवाज़ जब पहली बार कानों से टकराई तो ऐसा लगा मानो कविता सेठ या रेखा भारद्वाज गा रही हों। इस गीत में उनका बखूबी साथ दिया है जसविंदर सिंह ने जिन्हे लोग कैफ़ी और मैं नाटक में बतौर ग़ज़ल गायक ज्यादा जानते हैं।

गीत के लिए मनोज ने जिस शब्द विन्यास का प्रयोग किया है वो अलग हट के है। एक विशाल जलधारा की बूँद के भीतर बह कर चलने के अहसास के बारे में कभी सोचा है आपने? ऐसे कई नए नवेले से अहसासों के साथ आइए घुलते हैं इस प्यारे से गीत के साथ..


पानियों की छत पर
बूँदों के भीतर बह चलो
पलकों के तट पर
प्यार के पते पर ले चलो रे
ओ चलो चलें परछाइयाँ बाँधकर
इश्क़ के आबशारों पर
बातें सारी सी लें
प्यार सारा जी लें
बाँधे यूँ ही आँखों से आँखों को चलना
(

ख्वाहिशें पहन कर
धड़कनों में घुल कर बह चलो
चाहतों के भीतर
प्यार के सिरे पर ले चलो रे
ओ आओ चलें दुश्वारियाँ बाँधकर
इश्क़ के आबशारों* पर  
बातें सारी सी लें
प्यार सारा पी लें
बाँधे यू ही हाथों में हाथों को चलना
*झरना)

उजले उजले दिल के परों पे आ
सदियाँ सदियाँ रख ले पिरो के आ
गहरे गहरे  उतरें दिलों में  आ
छलके छलके पगले पलों में आ
सारी दोस्ती तुझे आज दे दूँ मैं आ
तेरे वास्ते ले के रास्ता चलूँ
आ चलें
राहें सारी सी लें
साथी साथ जी लें
बाँधे यू ही राहों से राहों को चलना

Wednesday, May 15, 2013

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा : कौन हैं इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी ( Iftikhar Imam Siddiqui ) ?

फिल्म 'अर्थ' और उसका संवेदनशील संगीत तो याद  है ना आपको। बड़े मन से ये फिल्म बनाई थी महेश भट्ट ने। शबाना, स्मिता का अभिनय, जगजीत सिंह चित्रा सिंह की गाई यादगार ग़ज़लें और कैफ़ी आज़मी साहब की शायरी को भला कोई कैसे भूल सकता है। पर फिल्म अर्थ में शामिल एक ग़ज़ल के शायर का नाम शायद ही कभी फिल्म की चर्चा के साथ उठता है। ये शायर हैं इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी  ( Iftikhar Imam Siddiqui ) साहब जिनकी मन को विकल कर देने वाली ग़ज़ल तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा ..को चित्रा सिंह ने बड़ी खूबसूरती से निभाया था।


आगरा से ताल्लुक रखने वाले जाने माने शायर सीमाब अकबराबादी के पोते इफ़्तिख़ार इमाम को कविता करने का इल्म विरासत में ही मिल गया था। सीमाब अकबराबादी  ने उर्दू शायरी की पत्रिका 'शेर' (Shair) का प्रकाशन आगरा में 1930 से शुरु किया था।  सीमाब तो विभाजन के बाद पाकिस्तान यात्रा पर गए और वहीं लकवा मारे जानी की वज़ह से स्वदेश नहीं लौट पाए। सीमाब के पाकिस्तान जाने के बाद ये जिम्मेदारी इफ़्तिख़ार इमाम के पिता इज़ाज सिद्दिकी ने सँभाली और 1951 में अपने आगरा के पुश्तैनी मकान से बेदखल होने के बाद मुंबई आ गए। आज भी मध्य मुंबई के ग्रांट रोड के एक कमरे के मकान से इस पत्रिका को इफ्तिख़ार इमाम अपने भाइयों के सहयोग से बखूबी चलाते हैं। इस पत्रिका की खास बात ये है कि इसके पाठकों द्वारा भेजे गए सारे ख़तों को आज भी सुरक्षित रखा गया है । 'शेर' ने कई नौजवान शायरों की आवाज़ को आम जन तक पहुँचाने का काम किया। इसमें निदा फ़ाजली जैसे मशहूर नाम भी थे। इमाम के पास आज भी वो चिट्ठियाँ मौज़ूद हैं जब निदा उनसे 'शेर' पत्रिका में अपनी कविताएँ छापने का आग्रह किया करते थे।

तो इससे पहले कि इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी के बारे में कुछ और बाते हों उनके चंद खूबसूरत रूमानी अशआरों से रूबरू हो लिया जाए। देखिए तो किस तरह एक आशिक के असमंजस को यहाँ उभारा है उन्होंने..

मैं जानता हूँ वो रखता है चाहतें कितनी
मगर ये बात उसे किस तरह बताऊँ मैं

जो चुप रहा तो समझेगा बदगुमाँ मुझे
बुरा भला ही सही कुछ तो बोल आऊँ मैं

ज़िदगी में जब तब कोई ख़्वाहिश अपने पर फड़फड़ाने लगती है। मन की ये सारी इच्छाएँ जायज नहीं होती या यूँ कहूँ तो ज्यादा बेहतर होगा कि व्यक्ति की वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल नहीं होतीं । पर दिल तो वो सीमाएँ लाँघने के लिए कब से तैयार बैठा है बिना उनके अंजाम की परवाह किए। इसी बात को इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी कितनी खूबसूरती से अपने शब्द देते हैं..

दिल कि मौसम के निखरने के लिए बेचैन है
जम गई है उनके होठों की घटा अपनी जगह

कर कभी तू मेरी ख़्वाहिशों का एहतराम
ख़्वाहिशों की भीड़ और उनकी सजा अपनी जगह


हम अपने लक्ष्य के पीछे  भागते हैं और वो हमारी बेसब्री पर मन ही मुस्कुराते हुए और ऊँचा हो जाता है। नतीजा वही होता है जो इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी इस शेर में कह रहे हैं...

इक मुसलसल दौड़ में हैं मंजिलें और फासले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह

इफ़्तिख़ार साहब जितना अच्छा लिखते हैं उतना ही वो उसे तरन्नुम में गाते भी हैं। ग़ज़ल गायिकी का उनका अंदाज़ इतना प्यारा है कि आप उनकी आवाज़ को बार बार सुनना पसंद करें। इस ग़ज़ल में उनके शब्द तो सहज है पर अपनी गायिकी से वो उसमें एक मीठा रस घोल देते हैं।

ग़म ही चाँदी है गम ही सोना है
गम नहीं तो क्या खुशी होगी

उस को सोचूँ उसी को चाहूँ मैं
मुझसे ऐसी ना बंदिगी होगी



इमाम साहब की ज़िंदगी ने तब दुखद मोड़ लिया जब वर्ष 2002 में चलती ट्रेन पर चढ़ने की कोशिश में वो गिर पड़े और उस दुर्घटना के बाद उमका कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। आज उनकी ज़िंदगी व्हीलचेयर के सहारे ही घिसटती है, फिर भी वो इसी हालत में 'शेर' के संपादन में जुटे रहते हैं।

उनकी ये ग़ज़ल जिस कातरता से अपने प्रियतम के विछोह से पैदा हुई दिल की भावनाओं को बयाँ करती है वो आँखों को नम करने के लिए काफी है। फिल्म में इस ग़ज़ल का दूसरा शेर प्रयुक्त नहीं हुआ है।

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा,
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा

कीजिए क्या गुफ़्तगू, क्या उन से मिल कर सोचिए
दिल शिकस्ता ख़्वाहिशों का जायक़ा रह जाएगा

दर्द की सारी तहें और सारे गुज़रे हादसे
सब धुआँ हो जाएँगे इक वाक़या रह जाएगा

ये भी होगा वो मुझे दिल से भुला देगा मगर
यूँ भी होगा ख़ुद उसी में इक ख़ला रह जाएगा

दायरे इंकार के इकरार की सरग़ोशियाँ
ये अगर टूटे कभी तो फ़ासला रह जाएगा


(ख़ला : खालीपन,शून्य,  सरग़ोशियाँ : फुसफुसाहट)
तो आइए सुनते हैं इस ग़ज़ल को चित्रा जी की आवाज़ में...



इसी जज़्बे के साथ अपनी पत्रिका को वो अपना वक़्त देते रहें यही मेरी मनोकामना है। चलते चलते उनके ये अशआर आपकी नज़र करना चाहता हूँ

वो ख़्वाब था बिखर गया ख़याल था मिला नहीं
मगर ये दिल को क्या हुआ क्यूँ बुझ गया पता नहीं

हम अपने इस मिज़ाज में कहीं भी घर ना हो सके
किसी से हम मिले नहीं किसी से दिल मिला नहीं

Wednesday, May 08, 2013

इक ये आशिक़ी है...इक वो आशिक़ी थी !

आशिक़ी 2 फिल्म और उसके गीतों के आज काफी चर्चे हैं। सोचा आज इसके गीतों को सुन लिया जाए। सुन रहा है..और कुछ हद तक तुम ही हो के आलावा फिल्म के बाकी गीत सामान्य ही लगे। हाँ ये जरूर हुआ कि जिस फिल्म की वज़ह से ये दूसरा भाग अस्तित्व में आया  है उसके गीत संगीत की इस फिल्म ने यादें ताज़ा कर दीं।

1990 में जब आशिक़ी आई थी तब मैं इंजीनियरिंग कर रहा था। फिल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इसके संगीत ने ऐसी धूम मचा दी थी कि हॉस्टल के हर कमरे से इसका कोई ना कोई गीत बजता ही रहता था। राँची के संध्या सिनेमा हाल में फिल्म देखने के बाद फिल्म की कहानी से ज्यादा उसके गीत ही गुनगुनाए गए थे और आज भी इस फिल्म के बारे में सोचने से इसकी पटकथा नहीं पर इसके गाने जरूर याद आ जाते हैं।


आशिक़ी के गीतों की लोकप्रियता ने नदीम श्रवण की संगीतकार जोड़ी को फर्श से अर्श तक पहुँचा दिया था। अस्सी का दशक इस जोड़ी के लिए संघर्ष का समय था। छोटी मोटी फिल्में करते हुए उन्होंने उस ज़माने में ही अपनी बनाई धुनों का बड़ा जख़ीरा बना लिया था जो नब्बे के दशक में गुलशन कुमार द्वारा आशिक़ी में बड़ा ब्रेक दिए जाने के बाद खूब काम आया। आशिक़ी हिंदी फिल्म उद्योग की उन चुनिंदा फिल्मों का हिस्सा रही है जिसका हर गीत हिट रहा था। नदीम श्रवण के संगीत में कर्णप्रिय धुनों के साथ मेलोडी का अद्भुत मिश्रण था।


आज भी आशिक़ी के गीतों के मुखड़ों को याद करने के लिए दिमाग पर ज़रा भी जोर देना नहीं पड़ता। शीर्षक गीत साँसों की जरूरत हो जैसे ज़िंदगी के लिए बस इक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए या फिर नज़र के सामने जिगर के पास कोई रहता है वो हो तुम या फिर धीरे धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना धीरे धीरे से दिल को चुराना या अब तेरे बिन जी लेंगे हम जहर ज़िदगी का पी लेंगे हम  ये सारे गीत एक बार ज़ेहन में जो चढ़े वे कभी वहाँ से उतरे ही नहीं।

आशिक़ी ने बतौर संगीतकार नदीम श्रवण की जोड़ी के साथ गायक कुमार शानू और अनुराधा पोडवाल को सीधे शिखर पर पहुँचा दिया और पूरे नब्बे के दशक में इन्हीं कलाकारों की हिंदी फिल्म संगीत पर तूती बोलती रही। यहाँ तक कि गीतकार समीर का परचम भी इसी दौर में फहरा। गुलशन कमार की कंपनी टी सीरीज़ का कारोबार यूँ बढ़ा कि HMV के कदम भी डगमगाने लगे।

आशिक़ी फिल्म का मेरा सबसे प्रिय गीत वो हे जो ऊपर के गीतों की तुलना में उतना तो नहीं बजा पर मेरे दिल के बेहद करीब रहा है। मेरी समझ से इस फिल्म में कुमार शानू द्वारा गाया ये सबसे मधुर गीत था। तो आइए सुनते हैं कुमार शानू को आशिक़ी फिल्म के इस गीत में..


तू मेरी ज़िन्दगी है,तू मेरी हर खुशी है
तू ही प्यार तू ही चाहत
तू ही आशिक़ी है
तू मेरी ज़िन्दगी है....

पहली मुहब्बत का अहसास है तू
बुझ के भी बुझ न पाई, वो प्यास है तू
तू ही मेरी पहली ख्वाहिश,तू ही आखिरी है
तू मेरी ज़िन्दगी है...........

हर ज़ख्म दिल का मेरे, दिल से दुआ दे
खुशियां तुझे ग़म सारे, मुझको खुदा दे
तुझको भुला ना पाया, मेरी बेबसी है
तू मेरी ज़िन्दगी है...........

वैसे पुरानी वाली आशिक़ी का आप को कौन सा गीत सबसे पसंद है?

Wednesday, May 01, 2013

जड़ की मुस्कान : हरिवंश राय बच्चन

ज़िंदगी की दौड़ में आगे भागने की ज़द्दोज़हद मे हमें कई सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। हर सीढ़ी पर चढ़ने में नामालूम कितने जाने अनजाने चेहरों की मदद लेनी पड़ती है। पर जब हम शिखर पर पहुँचते हैं तो कई बार उन मजबूत हाथों और अवलंबों को भूल जाते हैं जिनके सहारे हमने सफलता की पॉयदानें चढ़ी थीं।

जाने माने कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपने काव्य संग्रह 'कटती प्रतिमाओं की आवाज़' में एक बेहद सहज पर दिल को छू लेने वाली कविता लिखी थी। देखिए इंसानों की इस प्रवृति को एक पेड़ के बिंब द्वारा कितनी खूबसूरती से उभारा है बच्चन साहब ने..
 

एक दिन तूने भी कहा था,
जड़?
जड़ तो जड़ ही है,
जीवन से सदा डरी रही है,
और यही है उसका सारा इतिहास
कि ज़मीन में मुँह गड़ाए पड़ी रही है,

लेकिल मैं ज़मीन से ऊपर उठा,
बाहर निकला, बढ़ा हूँ,
मज़बूत बना हूँ,
इसी से तो तना हूँ।


एक दिन डालों ने भी कहा था,
तना?
किस बात पर है तना?
जहाँ बिठाल दिया गया था वहीं पर है बना;
प्रगतिशील जगती में तील भर नहीं डोला है,
खाया है, मोटाया है, सहलाया चोला है;
लेकिन हम तने में फूटीं,
दिशा-दिशा में गयीं
ऊपर उठीं,
नीचे आयीं
हर हवा के लिए दोल बनी, लहरायीं,
इसी से तो डाल कहलायीं।


एक दिन पत्तियों ने भी कहा था,
डाल?
डाल में क्‍या है कमाल?
माना वह झूमी, झुकी, डोली है
ध्‍वनि-प्रधान दुनिया में
एक शब्‍द भी वह कभी बोली है?
लेकिन हम हर-हर स्‍वर करतीं हैं,
मर्मर स्‍वर मर्म भरा भरती हैं
नूतन हर वर्ष हुईं,
पतझर में झर
बाहर-फूट फिर छहरती हैं,
विथकित चित पंथी का
शाप-ताप हरती हैं।


एक दिन फूलों ने भी कहा था,
पत्तियाँ?
पत्तियों ने क्‍या किया?
संख्‍या के बल पर बस डालों को छाप लिया,
डालों के बल पर ही चल चपल रही हैं;
हवाओं के बल पर ही मचल रही हैं;
लेकिन हम अपने से खुले, खिले, फूले हैं-
रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-
हमारी यश-गंध दूर-दूर  दूर फैली है,
भ्रमरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं,
हम पर बौराए हैं।

सबकी सुन पाई है,
जड़ मुस्करायी है!


जड़ की इस मुस्कुराहट से जनाब राहत इंदौरी का ये शेर याद आता है।

ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते है

इस चिट्ठे पर हरिवंश राय 'बच्चन' से जुड़ी कुछ अन्य प्रविष्टियाँ


  •  जड़ की मुस्कान
  • मधुशाला के लेखक क्या खुद भी मदिराप्रेमी थे ?
  • रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने...
  • मैं हूँ उनके साथ खड़ी, जो सीधी रखते अपनी रीढ़ 
  • मधुशाला की चंद रुबाईयाँ हरिवंश राय बच्चन , अमिताभ और मन्ना डे के स्वर में...
  • एक कविता जिसने हरिवंश राय 'बच्चन' और तेजी बच्चन की जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया !
  •  

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