Saturday, July 27, 2013

मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते : क्या आपको याद हैं घनशाम वासवानी ? (Ghansham Vaswani)

घनशाम वासवानी.. अस्सी के दशक में  इस नाम को मैंने पहली बार सुना था विविध भारती के रंग तरंग कार्यक्रम में। उस ज़माने में जगजीत सिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, चंदन दास और पीनाज़ मसानी की ग़ज़ल गायिकी में तूती बोलती थी। इनके आलावा जो ग़ज़ल गायक इस दशक में उभरे उन्हें श्रोताओं के सामने लाने में जगजीत सिंह का बड़ा हाथ था। तलत अजीज़ , घनशाम वासवानी, अशोक खोसला, विनोद सहगल कुछ ऐसे ही नाम हैं जो जगजीत के प्रोत्साहन से ग़जल गायिकी के सीमित क्षितिज में चमके। 

पर मैं तो आपसे बात घनशाम वासवानी की कर रहा था जिन्हें जगजीत और चित्रा ने अंतर महाविद्यालय संगीत प्रतियोगिता में पहली बार सुना था और उनकी गायिकी से खासे प्रभावित भी हुए थे। घनशाम वासवानी एक सांगीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता संतू वासवानी सिंधी के जाने माने सूफ़ी गायक थे। विज्ञान में स्नातक और कानून की पढ़ाई पढ़ने वाले घनश्याम वासवानी का झुकाव शुरु से संगीत की ओर रहा। उस्ताद आफताब अहमद खाँ, पंडित अजय पोहनकर और पंडित राजाराम शु्क्ल से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और उसके बाद जगजीत के मार्गदर्शन में वो एक ग़ज़ल गायक बन गए।

अस्सी के ही दशक में ही जगजीत सिंह के संगीत निर्देशन में घनशाम वासवानी का एक एलबम HMV पर आया । एलबम का नाम था Jagjit Singh presents Ghansham Vaswani..। जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया था कि इसी एलबम की एक ग़ज़ल विविधभारती पर उन दिनों खूब बजा करती थी। ग़ज़ल का मतला था मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते..हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते.............। जख़्म खाने की उम्र थी सो उस ग़ज़ल के पहले श्रवण के पश्चात ही मैं घायल हो गया था। लिहाजा स्कूल की एक कॉपी में वो ग़ज़ल सहेज कर रख ली गई थी। पर वक्त के साथ पिताजी के तबादले हुए और वो कॉपी कब रद्दी वाले की भेंट चढ़ गई पता ही नहीं चला। उस ज़माने में ना कंप्यूटर था और ना ही इंटरनेट, इसलिए अपनी इस प्रिय ग़ज़ल को अपने मस्तिष्क के कोने की 'मेमोरी' में डालने के आलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। दशक बीतते गए और साथ ही ग़ज़ल के शेर होठो पर गाहे बगाहे दस्तक देते रहे।

कुछ ही दिनों पहले फेसबुक पर घनशाम वासवानी का नाम दिखा तो वो ग़ज़ल फिर से याद आ गई।  ग़ज़ल को सुना गया और खूब खूब सुना गया। आप में से जो पुराने ग़ज़ल प्रेमी होंगे उन्होंने जरूर कभी ना कभी ये ग़ज़ल सुनी होगी। इस ग़ज़ल के शायर का नाम तो मुझे नहीं मालूम पर इसके सादगी से कहे अशआरों में अपने मीत को दी जाने वाली जो मीठी उलाहनाएँ हैं वो आपका मन जीत लेती हैं। तो आइए सुनें घनशाम वासवानी की आवाज़ में ये दिलकश ग़ज़ल..



मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते?
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?

ये रात, ये तनहाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते?

है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते?

गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते

क्या आपको पता है कि जिस तरह के जगजीत के संगीत निर्देशन में घनशाम वासवानी ने ग़ज़ले गायी हैं वैसे ही घनशाम जी ने भी जगजीत सिंह की एलबम फॉरगेट मी नॉट (Forget Me Not) में अपना संगीत दिया है।

घनशाम वासवानी और उनके समकालीन गायकों को अपना हुनर दिखाने के मौके कम ही मिल पाए। ग़ज़लों की लोकप्रियता अस्सी के दशक में शीर्ष पर पहुँचने के बाद नब्बे में फिल्म संगीत के स्तर में सुधार के कारण गिरने लगी। इस दौरान वे रेडिओ और दूरदर्शन के कार्यक्रमों और देश विदेश की ग़ज़ल की महफिलो में शरीक होते रहे और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर ज़ारी है। वैसे क्या आप नहीं जानना चाहेंगे कि साठ वर्ष की आयु में घनश्याम आजकल क्या कर रहे हैं? हाल ही में अपने एक लाइव कान्सर्ट में उन्होंने जगजीत जी की याद में हो रहे एक कार्यक्रम ये ग़जल सुनाई तो श्रोतागण खुशी से झूम उठे।  इस ग़जल को सुनने के बाद तो मुझे यही लगा कि  आज भी उनकी आवाज़ में वही आकर्षण है जो दशकों पहले होता आया था।

बरसात के इस मौसम में वासवानी जी के रससिक्त स्वरों में गाई ये ग़ज़ल आपको यक़ीनन पसंद आएगी। ज़रा सुन के तो देखिए जनाब..

चोट वो खाई है इस दिल पे कि बस अबके बरस
ग़म को भी आया मेरे दिल पे तरस, अबके बरस

उनको नादों पे भी होने लगा नग्मों का गुमाँ
किस क़दर है मेरी फ़रियाद में रस, अबके बरस

हम मसर्रत* से बहुत दूर रहे तेरे बगैर
ग़म में डूबा रहा एक एक नफ़स**, अबके बरस
*खुशी, **साँस

 
मुझसे रूठी हुई तक़दीर ये कहती है 'सबा'
फूल तो फूल हैं काँटों को तरस, अबके बरस


आशा है वे इसी तरह ग़ज़ल साधना में लीन होकर हमारे जैसे ग़ज़ल प्रेमियों को आनंदित करते रहेंगे।

Monday, July 15, 2013

यादें पंचम की : क्या जादू था मेरे जीवन साथी के संगीत में ? ( The magic of Pancham in 'Mere Jeewan Sathi' !)

पंचम और किशोर दा कॉलेज के ज़माने में हमारे कानों लिए वो खुराक हुआ करते थे जिसके बिना नींद हमारी आँखों से कोसों दूर भागती थी। बात नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों की है। तब कैसेट्स बेचने वाली दुकानों में अपनी पसंद के गानों की सूची ले जाने और फिर उसे एक खाली कैसेट में रिकार्ड करने का चलन शुरु ही हुआ था। किशोर कुमार की ऐसी ही एक कैसेट मैंने भी तब बनवाई थी। उस सूची में किशोर के सदाबहार नग्मों के आलावा एक ही फिल्म के तीन गाने थे।  

पंचम द्वारा संगीत निर्देशित ये फिल्म थी मेरे जीवनसाथी जिसे मैंने उस वक़्त क्या, आज तक नहीं देखा है। पर इस फिल्म के तीन गीतों दीवाना ले के आया है...., ओ मेरे दिल के चैन......... और चला जाता हूँ किसी की धुन में........ को  कॉलेज से निकलने के बाद भी मैंने इतना सुना कि वो कैसेट बुरी तरह घिस गई। आज भी जब इन गीतों को सुनता हूँ तो सोचता हूँ कि आख़िर क्या था इन गीतों में जो अपने आने के इतने दशकों बाद भी ये उसी चाव से सुने जा रहे हैं?


सत्तर का दशक पंचम का उद्भव काल था। पंचम ने इस दौरान जितनी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया उसमें ज्यादातर का संगीत सफल रहा। यहाँ तक वैसी फिल्मों का संगीत भी जो अपेक्षा के अनुरूप नहीं चल पायीं। 'मेरे जीवन साथी' इसका जीता जागता उदाहरण है। फिल्म के गाने फिल्म प्रदर्शित होने के कुछ महिने पहले से ही धूम मचाने लगे थे पर गानों ने दर्शकों को जो उम्मीद बँधाई , वो फिल्म में नज़र नहीं आई। नतीजन मेरे जीवन साथी चली नहीं पर इसके गाने चलते रहे और आज तक चल रहे हैं।

फिल्म निर्माता हरीश शाह और राजेश खन्ना ने इस फिल्म के लिए पंचम की बनाई पहली धुन अस्वीकृत कर दी थी और फिर उसके बाद पंचम ने रची ओ मेरे दिल के चैन... । इसके मुखड़े के पहले की धुन पूरे फिल्म की ट्रेडमार्क धुन बन गई और उसका इस्तेमाल अन्य गीतों में भी हुआ। फिल्मफेयर में सितंबर 1973 में छपे आलेख में वी श्रीधर ने जब इस गीत के बारे में पंचम से बात की तो उन्होंने कहा था कि
"इसकी धुन जब अचानक से दिमाग में आई तो मन बेचैन हो उठा। उद्विग्नता इतनी बढ़ गई कि चार बजे सुबह उठकर मैंने उसे गुनगुनाते हुए कैसेट रिकार्डर में टेप किया और फिर अपने संगीत कक्ष में चला गया । इस तरह गीत की पूरी धुन तैयार हुई। उसी शाम ये धुन मैंने मजरूह को थमाई और मिनटों में पूरा गीत बन कर तैयार हो गया।"



मेरे जीवन साथी का दूसरा चर्चित नग्मा दीवाना ले के आया है दिल का तराना... था। संगीत संयोजन में आपको इस गीत में ओ मेरे दिल के चैन से कई समानताएँ सुनाई देंगी। खासकर गीत के पीछे बजने वाला तालवाद्य और इंटरल्यूडस। मजरूह के लिखे इस गीत में बीते हुए कल के लिए हताशा भी है और आने वाले कल के लिए धनात्मक सोच भी। पहले अंतरे के बाद पंचम फिर अपनी सिगनेचर धुन का इस्तेमाल करते है जिसका जिक्र मैंने ऊपर भी किया है। उत्तम सिंह के बजाए वायलिन के खूबसूरत टुकड़े से ये इंटरल्यूड समाप्त होता है।



अगर लोगों की जुबाँ पर ये गाने चढ़े तो उसमें पंचम की कर्णप्रिय धुन, मजरूह के सहज सपाट बोल और किशोर की बेमिसाल आवाज़ का बड़ा हाथ था। साथ ही ऊँचे सुरों का ना इस्तेमाल होने की वजह से पंचम के इन गीतों को गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए बेहद आसान रहा।

पर आज की तारीख़ में मेरे जीवन साथी के जिस गीत को मैं बारहा सुनना पसंद करता हूँ वो है किशोर कुमार का गाया चला जाता हूँ ...किसी की धुन में ..धड़कते दिल के ..तराने लिए..। कोई भी सफ़र हो, कैसी भी डगर हो जब भी मन प्रफुल्लित होता है गीत की धुन चुपचाप कब होठों पर रेंगने लगती है पता ही नहीं चलता। किसी गीत के सफल होने में संगीतकार और गीतकार का जबरदस्त योगदान होता है क्यूँकि कोई भी गीत उनके मातृत्व में ही कोख से निकल कर पल बढ़कर तैयार होता है। पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनकी सफलता की कल्पना, उन्हें हम तक पहुँचाने वाले गायकों के बिना करना मुश्किल हो जाता है। चला जाता हूँ ....को मैं ऐसे ही गीतों की श्रेणी में रखता हूँ। किशोर कुमार इस गीत में अपनी बेमिसाल यूडलिंग से मस्ती और उमंग का जो माहौल रचते हैं उससे मन तो क्या पूरा शरीर ही तरंगित हो जाता है।



आज पंचम हमारे बीच नहीं हैं पर उनके रचे संगीत की लोकप्रियता दशकों बाद भी कम नहीं हुई है। पचास और साठ का दौर हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर कहा जाता है। इस दौर में हिंदी फिल्म संगीत के महानतम संगीतकारों का काम श्रोताओं तक पहुँचा। पंचम इस दौर के आखिरी चरण में आए पर जब उनके संगीत की उनके पूर्ववर्ती संगीतकारों से तुलना करता हूँ तो जावेद अख्तर की वो बात याद आ जाती है जो उन्होंने किताब R D Burman The Man, The Music के प्राक्कथन में कही हैं..

"..पंचम के बारे में मैं क्या कहूँ? कुछ लोग एक विशेष कालखंड में सफल होते हैं। जैसे जैसे वक़्त बीतता है, तौर तरीके और शैलियाँ बदलती हैं। पुराने लोग गुजर जाते हैं या स्मृतियों के धुंधलके में खो जाते हैं। उनकी जगह नए लोग ले लेते हैं। हम सिर्फ उन लोगों को याद रख पाते हैं जो ना सिर्फ सफल हुए बल्कि जिन्होंने ऐसा कुछ अभूतपूर्व किया जिससे उनकी कला एक नए स्तर तक पहुँची और जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपने हुनर को और तराशने के लिए नई सोच मिली। पंचम ने एक नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। आज हम संगीत में जिन तकनीकी सुविधाओं को  सामान्य मानते हैं वो साठ या सत्तर के दशक में थी ही नहीं। ये पंचम की विलक्षणता ही है कि तब भी उनका संगीत ताजा और आज के युग का लगता है।.."

Tuesday, July 09, 2013

कैसे देखते हैं गुलज़ार 'बारिश' को अपनी नज़्मों में... (Barish aur Gulzar)

बारिश का मौसम हो तो औरों को कुछ हो ना हो शायरों को बहुत कुछ हो जाता है और अगर बात गुलज़ार की हो रही हो तब तो क्या कहने ! कुछ साल पहले बारिशों के मौसम में परवीन शाकिर पर बात करते हुए उनकी उससे जुड़ी नज़्मों की चर्चा हुई थी। कुछ दिनों पहले ही एक गुलज़ार प्रेमी मित्र ने  इस ब्लॉग पर कई दिनों से उनकी नज़्मों का ज़िक्र ना होने की बात कही थी। तो मैंने सोचा क्यूँ ना बारिश के इस मौसम को इस बार गुलज़ार साहब की आँखो से देखने का प्रयास किया जाए उनकी चार अलग अलग नज़्मों के माध्यम से..


 (1)

सच पूछिए तो कुछ घंटों की बारिश से हमारे शहरों और कस्बों का हाल बेहाल हो जाता है। नालियों का काम सड़के खुद सँभाल लेती हैं। कीचड़ पानी में रोज़ आते जाते कोफ्त होने लगती है। पर जब गुलज़ार जैसा शायर इन बातों को देखता है तो इसमें से भी मन को छू जाने वाली पंक्तियाँ का सृजन कर देता है। बारिश के मौसम में साइकिल को गड्ढ़े भर पानी में उतारते वक़्त अपना संतुलन ना खोने और कपड़े मैले हो जाने के ख़ौफ के आलावा तो मुआ कोई और ख़्याल मेरे मन में नहीं आया। पर गुलज़ार की साइकिल का पहिया पानी की कुल्लियाँ भी करता है और उनकी छतरी आकाश को टेक बनाकर बारिश की टपटपाहट का आनंद भी उठाती है।

बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला
सब बजने लगते हैं

तंग गली में जाते-जाते,
साइकल का पहिया पानी की कुल्लियाँ करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं क़द भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूब के चलता है

ख़ुश्क था तो रस्ते में टिक टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप टप चलते हैं !


 (2)
गुलज़ार की इस दूसरी नज़्म में बारिश काव्य का विषय नहीं बल्कि सिर्फ एक बिंब है । एक ऐसा बिंब जिसकी मदद से वो दिल के जख्मों को कुरेदते चलते हैं। गुलज़ार की इस भीगी नज़्म को पढ़ते हुए सच में इक अफ़सोस का अहसास मन में तारी होने लगता है...



मुझे अफ़सोस है सोनां....

कि मेरी नज़्म से हो कर गुज़रते वक्त बारिश में,
परेशानी हुई तुम को ...
बड़े बेवक्त आते हैं यहाँ सावन,
मेरी नज़्मों की गलियाँ यूँ ही अक्सर भीगी रहती हैं।
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है,
अगर पाँव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है
मुझे अफ़सोस है लेकिन...

परेशानी हुई तुम को....
कि मेरी नज़्म में कुछ रौशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीज़ों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाखून कितनी बार टूटे हैं...
हुई मुद्दत कि चौराहे पे अब बिजली का खम्बा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुम को...
मुझे अफ़सोस है सचमुच!!

 (3)
यूँ तो गर्मी से जलते दिनों के बाद बारिश की फुहार मन और तन दोनों को शीतल करती है। पर जैसा कि आपने पिछली नज़्म में देखा गुलज़ार की नज़्में बारिश को याद कर हमेशा उदासी की चादर ओढ़ लिया करती हैं। याद है ना आपको फिल्म इजाजत के लिए गुलज़ार का लिखा वो नग्मा जिसमें वो कहते हैं "छोटी सी कहानी से ,बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई, ना जाने क्यूँ दिल भर गया ....ना जाने क्यूँ आँख भर गई...."

ऐसी ही एक नज़्म  है बस एक ही सुर में ..जिसमें गुलज़ार मूसलाधार बारिश की गिरती लड़ियों को अपने हृदय में रिसते जख़्म से एकाकार पाते हैं।  देखिए तो नज़्म की पहली पंक्ति लगातार हो रही वर्षा को कितनी खूबसूरती से परिभाषित करती है..

बस एक ही सुर में, एक ही लय पे
सुबह से देख
देख कैसे बरस रहा
है उदास पानी
फुहार के मलमली दुपट्टे से
उड़ रहे हैं
तमाम मौसम टपक रहा है

पलक-पलक रिस रही है ये
कायनात सारी
हर एक शय भीग-भीग कर
देख कैसी बोझल सी हो गयी है

दिमाग की गीली-गीली सोचों से
भीगी-भीगी उदास यादें
टपक रही हैं

थके-थके से बदन में
बस धीरे-धीरे साँसों का
गरम लोबान जल रहा है...


(4)

बारिश से जुड़ी गुलज़ार की नज्मों में ये मेरी पसंदीदा है और शायद आपकी हो। इंसान बरसों के बने बनाए रिश्ते से जब निकलता है तो उससे उपजी पीड़ा असहनीय होती है। टूटे हुए दिल का खालीपन काटने को दौड़ता है। गुलज़ार की ये नज़्म वैसे ही कठिन क्षणों को अपने शब्दों में आत्मसात कर लेती है। जब भी इसे सुनता हूँ मन इस नज़्म में व्यक्त भावनाओं से निकलना अस्वीकार कर देता है। गुलज़ार की आवाज़ में खुद महसूस कीजिए इस नज़्म की विकलता को..

किसी मौसम का झोंका था....
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है
गए सावन में ये दीवारें यूँ सिली नहीं थी
न जाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है ,
दरारे पड़ गयी हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे खुश्क रुखसारों पे गीले आँसू चलते हैं

ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर
ये घर की खिडकियों के काँच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे...
बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानो के पीछे
दुपहरें ऐसी लगती हैं बिना मुहरों के खाली खाने रखे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी और न कोई चाल चलता है
ना दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झोंका था जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है


वैसे बारिश से जुड़ी गुलज़ार की लिखी और किन नज़्मों को आप पसंद करते हैं?

एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

 

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