Sunday, August 24, 2014

डाली मोगरे की : नीरज गोस्वामी Dali Mogre Ki by Neeraj Goswami

नीरज गोस्वामी की ग़ज़लों को पिछले कुछ सालों से पढ़ता आ रहा हूँ। कुछ महीनों पहले उनकी ग़ज़लों का संग्रह एक किताब की शक़्ल में प्रकाशित हुआ तो बड़ी खुशी हुई क्यूँकि बहुत दिनों से उनके संग्रह के बाजार में आने की उम्मीद थी। नीरज की लेखन शैली की जो दो विशिष्टताएँ मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती आई हैं वो हैं उनके कथ्य की सहजता और उसके अंदर का प्रवाह।   

चौसठ वर्षीय नीरज जी पेशे से इंजीनियर हैं और फिलहाल इस्पात उद्योग से जुड़ी एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर आसीन हैं। पर इंटरनेट जगत में उन्हें एक तकनीकी विशेषज्ञ या प्रबंधक के तौर पर कम और एक ग़ज़लकार के रूप में ज्यादा जाना जाता है। इसकी वज़ह ढूँढने के लिए आपको सिर्फ उनके ब्लॉग का एक चक्कर लगाना होगा। नीरज ना केवल ग़ज़ल लिखते हैं बल्कि अपने पाठकों को ग़ज़ल के तमाम नामचीन और अनसुने लेखकों की शायरी से रूबरू भी कराते हैं।

मुझे उम्मीद थी कि अपनी किताब डाली मोगरे की भूमिका में वो पाठकों को तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा होते हुए भी ग़ज़लों के प्रति पनपे अपने प्रेम के बारे में कुछ लिखेंगे पर लगता है कि इसके लिए मुझे उनकी दूसरी पुस्तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। बहरहाल जो उनके ब्लॉग को नियमित पढ़ते हैं वे जानते हैं कि ग़ज़ल विधा के छात्र से बतौर शायर के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए वो प्राण शर्मा और पंकज सुबीर का हमेशा आभार व्यक्त करते रहे हैं। 

शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डाली मोगरे की में नीरज जी की लिखी सौ के लगभग ग़ज़लों का संग्रह है। आख़िर नीरज जी की शायरी किन बातों पर केंद्रित है? अपने एक शेर में नीरज इस बात का जवाब कुछ यूँ देते हैं ... कहीं बच्चों सी किलकारी..कहीं यादों की फुलवारी..मेरी ग़ज़लों में बस यही सामान होता है। अब इन यादों की फुलवारी में खिड़कियों से झाँकती वो आँखें भी हैं, चंद ख़्वाब और उनसे जुड़ी अधूरी चाहतें भी. और प्रेम का सच्चा अहसास भी।  संकलन से उनकी इन्ही भावनाओं को व्यक्त करते कुछ अशआर चुने हैं .मुलाहिज़ा फरमाएँ

जब तलक झाँकती आँख पीछे ना हो
क्या फ़रक़ बंद है या खुली खिड़कियाँ


ख़्वाब देखा है रात में तेरा
नींद में भी हुई कमाई है

चाहतें मेमने सी भोली हैं
पर ज़माना बड़ा कसाई है


वो जकड़ता नहीं है बंधन में
प्यार सच्चा रिहाई देता है


किसी का ख़ौफ दिल पर, आज तक तारी ना हो पाया
किया यूँ प्यार अपनों ने, लगा डरना जरूरी है


अब मान मुनौवल के बिना कौन सा प्रेम हुआ है, नीरज इस परिस्थिति को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं

हो ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रूमाल होते जा रहे हैं


पर इस किताब में इश्क़ की भावनाओं से जुड़े ये अशआर मुझे बेहद पसंद आए

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीं मौजूद पाता हूँ 
गर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

गणित ये प्यार का यारों किसी के तो समझ आए
सिफ़र बचता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूँ


नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें सिर्फ प्रेम से लबरेज़ नहीं पर उससे कहीं ज्यादा इनकी लेखनी का सरोकार आज के सामाजिक हालातों और घटते मानवीय मूल्यों से है।  उनकी इस चिंता को उनके तमाम शेर जगह जगह व्यक्त करते हैं। उनमें से कुछ की बानगी नीचे दे रहा हूँ

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
वो समझ पूजा की थाली हो गई

झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब
सच तो बेचारा है दुबका, काँपता डरता हुआ

साँप को बदनाम यूँ ही कर रहा है आदमी
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी

इस पाप की परत को है उम्र भर चढ़ाया
अब चाहते हटाना गंगा में बस नहाकर

रोटियाँ देकर कहा ये शहर ने
गाँव की अब रुत सुहानी भूल जा
जिस्म की गलियों में उसको ढूँढ अब
इश्क़ वो कल का रुहानी, भूल जा

कब तक रखेंगे हम भला इनको सहेज कर
रिश्ते हमारे शाम के अखबार हो गए
हमने किये जो काम उन्हें फ़र्ज कह दिया
तुमने किये तो यार उपकार हो गए


जीवन की विसंगतियों को उनके रूपकों के माध्यम से देखना कभी मन को लाजवाब कर देता है

जिस शजर ने डालियाँ पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते जाते बस उसको पत्थर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ़्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए


तो कहीं प्रकृति के आचरण को सूक्ष्मता से अवलोकित कर वो आपको धनात्मक उर्जा से भर देते हैं।

अपनी बदहाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िए
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ


नीरज गोस्वामी की सहज लेखन शैली हर उस पाठक को पसंद आएगी जो ग़ज़लों में रूचि तो रखता है पर उसमें प्रयुक्त उर्दू व फ़ारसी शब्दों की अनिभिज्ञता से अपने आपको उससे जोड़ पाने में अक्षम है। नीरज गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों में ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो उर्दू का ज्ञान ना रखने वालों को भी समझ आ सके। राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाले नीरज गोस्वामी  ने मुंबई के पास अपना कार्यक्षेत्र होने की वज़ह से अपने इस संकलन में कुछ मुंबइया जुबान की ग़ज़लें कही हैं जो भले ग़ज़ल पंडितों को कुछ खास आकृष्ट ना करे पर उनकी आम जनता तक ग़ज़ल के कलेवर को ले जाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।  चलते चलते मैं उनकी एक ग़ज़ल को सुनाना चाहूँगा जिसे पढ़कर मन एक जोश से भर उठता है.. वैसे इस ग़ज़ल का सबसे प्यारा शेर मुझे ये लगता है..

चमक है जुगनुओं में कम, मगर उधार की नहीं
तू चाँद आबदार (चमकदार) हो तो हो रहे, तो हो रहे

 

पुस्तक के बारे में
नाम : डाली मोगरे की,  लेखक : नीरज गोस्वामी
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, मूल्य : Rs.150  

पुनःश्च : एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशखबरी..
नीरज गोस्वामी जी ने सूचित किया है जो इस पुस्तक को पढ़ने में रुचि रखते हैं वो अपना पोस्टल अड्रेस उनके मोबाइल न 9860211911 पर एस एम एस करें या उन्हें neeraj1950@gmail.com पर मेल से भेज दें । पुस्तक उपहार स्वरुप आपके दिए अड्रेस पर भिजवा दी जाएगी।
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10 comments:

सदा on August 24, 2014 said...

सबसे पहले तो आदरणीय नीरज जी को 'डाली माेगरे की' के प्रकाशन पर बधाई सहित अनंत शुभकामनाएँ .... उनके ब्‍लॉग पर हमेशा ही जाना होता है ... कभी किसी पुस्‍तक की चर्चा तो कहीं उनकी गज़लों से रू-ब-रू होते हुये उनके लेखनी के हम भी क़ायल हैं .... आपका बहुत-बहुत आभार इस प्रस्‍तुति के लिये

parul singh on August 24, 2014 said...

नीरज सर की किताब "डाली मोगरे की " की हर ग़ज़ल
दिल ओ दिमाग़ में उतर जाने वाली हैं।
क़िताब में भूमिका की कमी हमें भी खलती हैं
,आप ही की तरह हमें भी आशा है कि नीरज जी
की अगली किताब में अपनी रचनाओं
क़े साथ साथ सर अपने पाठकों से अपने संवाद से भी
संपर्क स्थापित करेंगे।
समीक्षा और साउंडट्रैक लाजवाब,
बधाई आपको।

नीरज गोस्वामी on August 24, 2014 said...

मनीष भाई पुस्तक 'डाली मोगरे की ' पर लिखी आपकी समीक्षा से अभिभूत हूँ। आपने किताब पढ़ी और उसे सराहा भला इस से बढ़ कर और क्या चाहिए ? मेरी ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दे कर उसे और भी प्रभावशाली बना दिया है। अपना ये स्नेह यूँ ही बनाये रखें।

आपके ब्लॉग के माध्यम से मैं इस पुस्तक में रूचि रखने वाले सभी पाठकों से अनुरोध करना चाहता हूँ कि इस पुस्तक की प्राप्ति के लिए आप सभी अपना पोस्टल अड्रेस मुझे मेरे मोबाइल न 9860211911 पर एस एम एस करें या मुझे neeraj1950@gmail.com पर मेल से भेज दें । पुस्तक उपहार स्वरुप आपके दिए अड्रेस पर भिजवा दी जाएगी।

नीरज

Sunita Pradhan on August 24, 2014 said...

सब से पहले तो नीरज सर को‘डाली मोगरे की’सुन्दर पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई और मनीष जी को इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद एवं बधाई।

सर्व on August 25, 2014 said...

"​कहा कर बात तू ऐसी, कहा इस तरह से कर तू ,
कि लगे नई - नई सी , कोई छोड़े वो असर भी "

'डाली मोगरे की.. ' का हर शेर ही एक नई और असरदार बात कहता है ! ​

गुरुदेव ! एक बार फिर से बधाई !

और मनीष जी !अपनी पोस्ट पर ऐसे बढ़िया कलाम और लेखकों से रूबरू करवाने के लिए आप का धन्यवाद !

सर्व

सज्जन धर्मेन्द्र on August 25, 2014 said...

नीरज जा जिस सहजता से बोलचाल की भाषा में ग़ज़ल कहते हैं वो अपने आप में बहुत बड़ी बात है। इस संग्रह ने बहुत प्रभावित किया है। उम्मीद है आगे भी उनके अनेक ग़ज़ल संग्रह आएँगें।

Pramod Kumar on August 25, 2014 said...

नीरज जी की विशिष्टता को शब्द देना बहुत मुश्किल कार्य है ..............बेमिसाल ....सरल सहज आत्मीयता से लबालब ........निस्वार्थ साहित्य सेवी .........सतत क्रियाशील कर्मठ ....चुम्बकीय आकर्षक व्यक्तित्व...........लाजवाब शायर ।

Prakash Singh Arsh on August 31, 2014 said...

Neeraj ji jitane kamaal ke shayar hai usase behad achhe wo insaan hain.

Manish Kumar on August 31, 2014 said...

नीरज जी की लेखन व उनकी पुस्तक की चर्चा करती इस पोस्ट को आप सब ने पसंद किया जानकर खुशी हुई।

Pooja bhatiya on November 24, 2015 said...

Neeraj ji or unke qalaam ke mutmayinon mein ek naam mera bhi jod deejiye....
Sadar
Pooja bhatiya

 

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