Thursday, January 30, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 12 : हवन कुंड मस्तों का झुंड.. (Maston ka Jhund)

मस्ती के माहौल को बरक़रार रखते हुए हम आ पहुँचे हैं वार्षिक संगीतमाला 2013 की बारहवीं पायदान पर। शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी ने भाग मिल्खा भाग के गीतों के ज़रिये ये साबित कर दिया कि उनमें अभी भी पिछले सालों का दम खम बाकी है। एक फौज़ी के कठिन जीवन के बीच मस्ती भरे पलों को दर्शाते इस गीत को ही लें। गीत की शुरुआत में मुँह से की जाने वाली आवाज़ हो, या भाँगड़े के साथ रिदम बैठाता इकतारा या फिर फौजी की कठोर ज़िदगी को दिखाने के लिए पार्श्व में बजता पश्चिमी संगीत हो, संगीतकार त्रयी हर जगह श्रोताओं को अपने संगीत संयोजन मुग्ध करने में सफल रही है।


दिव्य कुमार की गायिकी से आप संगीतमाला की 19 वीं पायदान पर रूबरू हो चुके हैं। मस्तों का झुंड उनकी झोली में कैसे आया इसकी कहानी वे कुछ यूँ बयाँ करते हैं।
"शंकर एहसान लॉय के साथ मैंने पहले पहल 2011 के विश्व कप शीर्षक गीत दे घुमा के .....में काम किया था। उसके पहले भी कुछ गीतों और विज्ञापनों के लिए उनके साथ मैंने काम किया था। उनके द्वारा संचालित संगीत कार्यक्रमों के दूसरे चरण में मुझे महालक्ष्मी ऐयर के साथ गाने का मौका मिला। तभी शंकर को लगा था कि मेरी आवाज़ एक सिख चरित्र के लिए आदर्श होगी और मैं 'भाग मिल्खा भाग' का हिस्सा बन सकता हूँ। मैंने मस्तों का झुंड के लिए अपना दो सौ प्रतिशत दिया क्यूँकि इस स्वर्णिम अवसर को मैं यूँ ही हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। परिणाम भी शानदार रहा जैसा शंकर एहसान लॉय के साथ होता है। गाते वक़्त मुझे बस इतना कहा गया था कि मुझे एकदम मस्ती में गाना है और पंजाबी उच्चारण को एकदम पकड़ कर चलना है क्यूँकि मेरी आवाज़ एक सिख किरदार की है।"
और पंजाबियत की सोंधी खुशबू हम तक पहुंचाने के लिए दिव्य 'हवन' को 'हवण' की तरह उच्चारित करते हैं। दरअसल इस गीत में एक तरह का पागलपन है जो इसके संगीत और बोलों में सहज ही मुखरित होता है। जिन लड़कों ने कॉलेज की ज़िंदगी का एक हिस्सा हॉस्टल में रहकर गुजारा है उन्हें ऐसी पागलपनती से अपने को जोड़ने में कोई परेशानी नहीं होगी। गीत में चरित्रों की भाव भंगिमाएँ,उनके थिरकने का अंदाज़ सब कुछ उन पुराने दिनों की याद ताज़ा करा देता है जिसे हम सबने अपने सहपाठियों के साथ जिया है।

जीव जन्तु सब सो रहे होंगे..भूत प्रेत सब रो रहे होंगे जैसे बोल लिखने वाले प्रसून जोशी को सहूलियत ये थी कि वे गीतों को लिखने के साथ साथ फिल्म की पटकथा भी लिख रहे थे। वे कहते हैं कि गीत लिखते समय वो उन चरित्रों को वो नए आयाम दे सके जो पटकथा में स्पष्ट नहीं थे। फरहान अख्तर और साथी कलाकारों ने मस्ती और उमंग से भरे इस गीत में जो भाँगड़ा किया है वो किसी का भी चित्त प्रसन्न करने में सक्षम है। तो आइए एक बार फिर उल्लास के माहौल से सराबोर हो लें इस गीत के साथ..



ओए हवन कुंड मस्तों का झुंड
सुनसान रात अब
ऐसी रात, रख दिल पे हाथ, हम साथ साथ
बोलो क्या करेंगे
हवन करेंगे..हवन करेंगे..हवन करेंगे

ओए जीव जन्तु सब सो रे होंगे
भूत प्रेत सब रो रहे होंगे
ऐसी रात सुनसान रात रख दिल पे हाथ
हम साथ साथ बोलो क्या करेंगे
हवन करेंगे..हवन करेंगे..हवन करेंगे

नहाता धोता, नहाता धोता सुखाता
सारे आर्डर
सारे आर्डर बजाता
परेड थम
नहाता धोता सुखाता आहो ..
सारे आर्डर बजाता आहो ..
तभी तो फौजी कहलाता
परेड थम

दौड़ दौड़ के लोहा अपना
बदन करेंगे ...बदन करेंगे हवन करेंगे
ओए हवन कुंड मस्तों का झुंड ..

ओ जंगली आग सी भड़कती होगी
लकड़ी दिल की भी सुलगती होगी
सुनसान रात अब
ऐसी रात रख दिल पे हाथ हम साथ साथ
बोलो क्या करेंगे
हवन करेंगे..हवन करेंगे..हवन करेंगे


Tuesday, January 28, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 13 : तेरे मेरे बीच में क्या है .. ( Tere Mere Beech Mein Kya Hai..)

हिंदी फिल्म संगीत में नायक नायिका की आपसी बातचीत को गीतों में ढालने की रिवायत पुरानी रही है। इस कोटि में एक और गीत शामिल हो गया है वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं सीढ़ी पर। इसे लिखा पटकथा लेखक व गीतकार जयदीप साहनी ने, धुन बनाई सचिन ज़िगर ने और अपनी बेहतरीन आवाज़ से इसमें जान फूँकी मोहित चौहान और सुनिधि चौहान ने। झीनी रे झीनी के बारे में बात करते हुए मैंने आपको बताया था कि संगीतकार सचिन ज़िगर के लिए ये साल बेहतरीन रहा है। शुद्ध देशी रोमांस की पटकथा और चरित्र चित्रण भले ही मुझे पसंद ना आया हो पर इस फिल्म का संगीत दिल के करीब रहा।

अब इसी गीत के आरंभिक संगीत पर गौर करें।  रिक्शे के हार्न, नुक्कड़ में खेलते बच्चों की आवाज़ों के साथ गिटार और ट्रामबोन्स का मेल आपको एक बार में ही गीत के मस्ती भरे मूड में ले आता है। नायक और नायिका की नोंक झोंक को जयदीप अपने शब्दों में बड़ें प्यार अंदाज़ में विकसित करते हैं। गीत में इस्तेमाल किए गए उनके कुछ रूपक 'चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के...'  या 'अरमान खुले हैं , जिद्दी बुलबुलें हैं ..' मन को सोहते हैं।

ये नोंक झोंक सजीव लगे इसके लिए जरूरी था कि मोहित और सुनिधि की गायिकी का गठजोड़ शानदार हो और गीत सुनने के बाद आप तुरंत इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि इन दोनों ने इस गीत की अदाएगी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सचिन जिगर का मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है के बाद एकार्डियन, गिटार और ट्रामबोन्स का सम्मिलित संगीत संयोजन आप को थिरकने पर मजबूर कर देता है।

तो आइए थोड़ा झूमते हैं सचिन जिगर की इस बेहतरीन संगीत रचना के साथ..


ऐ सुन, सुन ले ना सुन मेरा कहना तू
हो गफ़लत में ..गफ़लत में ना रहना तू
हम्म जो दिन तेरे दिल के होंगे, तो होगी मेरी रैना..
तू अभी भी सोच समझ ले , कि फिर ये ना कहना
कि तेरे मेरे बीच में क्या है
ये तेरे मेरे बीच में क्या है
हम्म चद्दर..
हो चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के
हो चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है
फाइनली चली है मेरी लव लाइफ
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है
literally silly है मेरी लव लाइफ

हो तेरे तेरे मेरे मेरे
तेरे मेरे तेरे  बीच में
ये तेरे मेरे बीच में
तेरे तेरे ..तेरे मेरे तेरे बीच में
तेरे मेरे बीच में, कभी जो राज़ हो कोई
धूप में छिपी-छिपी, कहीं जो रात हो कोई

हो तेरे मेरे बीच में, कभी जो बात हो कोई
जीत में छिपी-छिपी, कहीं पे मात हो कोई
पूछूँगा हौले से, हौले से ही जानूँगा
जानूँगा मैं हौले से, तेरा हर अरमान
अहां… अरमान खुले हैं , जिद्दी बुलबुलें हैं
अरमान खुले हैं, जिद्दी बुलबुलें हैं
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है ..लव लाइफ
हे सुन ....

जो नींद तूने छीन ली तो, तो मैं भी लूँगा चैना
तू अभी भी सोच समझ ले , तो फिर ये ना कहना
कि तेरे मेरे बीच में क्या है ...क्या है ?
तुम्हें पता तो है क्या है
कि तेरे मेरे बीच में क्या है
बातें...लम्बी बातें हैं छोटी सी रातें हैं
लम्बी लम्बी बातें हैं, छोटी सी रातें हैं
मिली मिली है ...


वैसे ज़रा बताइए तो आपको आपसी गपशप में बढ़ते ऐसे कौन से गीत सबसे ज्यादा गुदगुदाते हैं?

Saturday, January 25, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 14 बन के तितली दिल उड़ा उड़ा उड़ा हैं, कहीं दूर .. ( Ban ke Titli...)

गीतमाला की अगली सीढ़ी पर एक बड़ा ही सुरीला नग्मा खड़ा है आपके इंतज़ार में। एक ऐसा गीत जिसे मात्र एक दो बार सुनकर ही आप इसकी गिरफ़्त में आ जाएँ। कम से कम मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ जब मैंने चेन्नई एक्सप्रेस के इस गीत को पहली बार सुना। विशाल शेखर द्वारा संगीतबद्ध रोमांटिक गीतों की मुलायमियत से हम सब वाकिफ़ हैं। अगर पिछले कुछ सालों के उनके रिकार्ड को देखा जाए तो हलके हलके रंग छलके.., जाने हैं वो कहाँ जिसे ढूँढती है नज़र.., फ़लक तक चल साथ मेरे.., कुछ कम रौशन है रोशनी..कुछ कम गीली है बारिशें.., बिन तेरे कई ख़लिश है हवाओं में बिन तेरे, बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार रे... जैसे रूमानियत का रंग बिखेरते गीतों की लंबी झड़ी तुरंत ही दिमाग में आ जाती है। तितली.. विशाल शेखर की तरफ़ से इस तरह के गीतों को पसंद करने वाले श्रोताओं के लिए नया तोहफा है।


चेन्नई एक्सप्रेस के लिए विशाल शेखर ने गीतकार के रूप में अमिताभ भट्टाचार्य को चुना और क्या मुखड़ा लिखा अमिताभ ने बन के तितली दिल उड़ा उड़ा उड़ा है, कहीं दूर ...चल के खुशबू से जुड़ा जुड़ा जुड़ा है, कहीं दूर .. विशाल की मधुर धुन पर चिन्मयी श्रीप्रदा की आवाज़ में इन शब्दों को सुन मन मयूर सब कुछ भूल कर सचमुच उड़ने लगता है भावनाओं के क्षितिज में। अमिताभ ने ''ख़्वाबदारी'' और ''रागदारी'' जैसे अप्रचलित शब्दों का प्रयोग कर अंतरे में नया रंग भरने की कोशिश की है। 

इस गीत में चिन्मयी का साथ दिया है मलयाली संगीतकार व गायक गोपी सुंदर ने। इस साल भले ही चिन्मयी श्रीपदा ऐ सखी साजन, तू रंग शरबतों का और तितली जैसे गीतों में सुनी गई हैं पर गुरु के गीत तेरे बिना बेसुवादी रतियाँ के बाद उनकी हिंदी फिल्मों मे उपस्थिति नगण्य ही रही है। इसकी एक वज़ह ये भी है कि जिस कोटि के गीत उनकी आवाज़ में जँचते हैं वहाँ श्रेया घोषाल ने अपनी पहचान पहले से बना रखी है। चिन्मयी इस गीत को अपनी झोली में आने के बारे में कहती  हैं..
"मुझे मुंबई फिल्मों में और गाने गाने का मन तो करता है पर समझ नहीं आता कि उसके लिए मैं काम करूँ। अपने लिए काम ना मै चेन्नई में माँगती हूँ और ना ये तरीका मैंने मुंबई वालों के लिए अपनाया है। नवंबर में जब शेखर सर चेन्नई आए तो उन्होंने कहा कि मुझे तेरे बिना गाने वाली लड़की से मिलना है। मुझे बुलाया गया, गीत की परिस्थिति बताई गयी और गीत रिकार्ड भी हो गया। बाद में जब शाहरुख सर ने ट्वीट किया कि उन्हें मेरा गाया गीत बेहद पसंद आया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

बन के तितली दिल उड़ा उड़ा उड़ा है, कहीं दूर ...
चल के खुशबू से जुड़ा जुड़ा जुड़ा है, कहीं दूर
...
हादसे ये कैसे, अनसुने से जैसे
चूमे अँधेरों को, कोई नूर ...

सिर्फ कह जाऊँ या, आसमाँ पे लिख दूँ
तेरी तारीफों में, चश्मेबददूर ...

भूरी भूरी आँखें तेरी
कनखियों से तेज़ तीर कितने छोड़े
धानी धानी बातें तेरी
उडते-फिरते पंछियों के रुख भी मोड़े


अधूरी थी ज़रा सी, मैं पूरी हो रही हूँ
तेरी सादगी में हो के चूर ....
बन के तितली ...

रातें गिन के नींदें बुन के
चीज़ क्या है ख़्वाबदारी हम ने जानी
तेरे सुर का साज़ बन के
होती क्या है रागदारी हम ने जानी

जो दिल को भा रही हैं, वो तेरी शायरी है
या कोई शायरना है फितूर..
बन के तितली ...



 

चलते चलते इस गीत से जुड़ी एक बात और। हिंदी भाषी लोगों के मन में ये प्रश्न जरूर उठता होगा कि इस गीत की शुरुआत में और अंतरे में जो तमिल श्लोक सुनाई देता है उसका क्या अर्थ है। इस श्लोक के धार्मिक महत्तव पर बिना विस्तार में जाए बस आपको इतना बताना चाहूँगा कि भगवन को संबोधित करते इसमें कहा गया है कि भगवान एक बार जब तुम्हारे अद्वितीय रूप के दर्शन हो गए तो मुझे इस संसार में अब कुछ और देखने की इच्छा नहीं बची।

Thursday, January 23, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 15 : स्लो मोशन अँग्रेज़ा.. (Slow Motion angreza) आख़िर ये वुलुमुलु क्या है?

वार्षिक संगीतमाला की पन्द्रहवीं पायदान का गीत अब तक प्रस्तुत गीतों से अलग एक भिन्न कोटि का गीत है।  अगर आपको अपने तन मन को तरंगित करना हो तो बस इस गीत की एक खुराक ही काफी होगी। शंकर एहसान लॉय द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को लिखा प्रसून जोशी ने और इसे आपनी बेशकीमती आवाज़ से बख्शा है सुखविंदर सिंह ने। वैसे गायिकी में उनका साथ दिया है लॉय मेन्डोसा और शंकर महादेवन ने। 

इस गीत में एक तरह की शोख़ी और शरारत है जो आपको ना केवल झूमने पर मज़बूर करती है बल्कि साथ आपके मूड को भी तरोताज़ा कर देती है। फिल्म भाग मिल्खा भाग के इस गीत को मिल्खा सिंह के मेलबर्न ओलंपिक के परिपेक्ष्य में फिल्माना था। इस गीत के संगीत  संयोजन के बारे में लॉय मेन्डोसा कहते हैं..
हमें ये पता लगाना था कि पचास और साठ के दशक में किस तरह का आस्ट्रेलियाई संगीत प्रचलित था। अपने अनुसंधान से हमें लगा कि इस गीत के संगीत में Country और Western संगीत का मिश्रण करना होगा। शंकर ने कहा कि मुखड़े में किसी ध्यान खींचने वाले जुमले की जरूरत है और हमारी खोज वुलुमुलु पर खत्म हुई। दरअसल इसी नाम की एक स्ट्रीट सिडनी में भी है। जब हम सिडनी गए तो वहाँ से भी गुजरे और वो जगह हमें बेहद पसंद आई।

इस गीत की शुरुआत की पंक्तियाँ ख़ुद
I just met a girl
And she is from wulu-mulu wulu-mulu wonder
I can dance and she can sing
We can rock the whole night longer

लॉय मेंडोसा ने गायी हैं और इतना ही नहीं अगर आपने फिल्म देखते हुए ध्यान दिया हो वो ख़ुद ही इस गीत को गाते हुए भी दिखाई दिए हैं। पर गीत में अपनी बेमिसाल गायिकी से जान डालने वाले सुखविंदर सिंह की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। गीत में पंजाबी तड़का लगाने पहुँचे सुखविंदर अपनी गायिकी से इसके शब्दों में वो मस्ती ले आते हैं कि तन मन थिरक उठता है और जब तक वो पीने दे रज के... तक आते हैं शरीर को स्थिर रखना बड़ा मुश्किल हो जाता है।। प्रसून के शब्द गीत के मूड के हिसाब से लिखे गए हैं इसीलिए गीत के असर से लहरें भी टल्ली हो रही हैं ।

हो स्लो मोशन अँग्रेज़ा, हुन क्यों टाइम गँवाए
सीधे बाहों में भर ले, सरसरी क्यों बढ़ाए
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए, तू मैनू चढ़ गयी मेरी सोनिए
रोको ना टोको ना, हो.. मुझको पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल लौंडा घुल मिल घुल मिल
घुल मिल घुल मिल लौंडा घुल मिल घुल मिल
सिंग..वुलु मुलु वुलु मुलु वंडर, वुलु मुलु वुल मुलु..
.

रात बढ़ती जो जाए, हाथ क्या क्या टटोले
झूठ बोले ज़ुबान भी, धरम ईमान डोले हाए..
तू जो दरिया में उतरे, सारा पानी गुलाबी हाए..
हो तू जो दरिया में उतरे सारा पानी गुलाबी
टल्ली टल्ली हों लहरें, मछलियाँ भी शराबी
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए....पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल................

हो काँच सी है तू नाज़ुक,
काँच सी है तू नाज़ुक, साँस लेना संभल के
टूट जाए कहीं ना, बस करवट बदल के

तुझको मेरी ज़रूरत, आ मैं तुझको उठा लूँ
तुझको मेरी ज़रूरत, आ मैं तुझको उठा लूँ
धीरे धीरे से चलना, अपनी आदत बना लूँ
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए....पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल................





ये तो सब जानते हैं कि इस गीत को फरहान अख़्तर पर फिल्माया गया है और सच पर्दे पर उनकी उर्जात्मक प्रस्तुति के क्या कहने ! पर क्या आपको पता है कि इस गाने में फरहान का साथ किसने निभाया ? फरहान अख्तर के साथ फिल्मी पर्दे पर दिखने वाली अभिनेत्री रिबेका ब्रीड्स (Rebecca Breeds) हैं जो आस्ट्रेलिया से ताल्लुक रखती हैं।

Monday, January 20, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 16 : क्यूँकि तुम ही हो, ज़िंदगी..अब तुम ही हो (Tum Hi Ho..)

कुछ गीत ऐसे होते हैं जिन्हें संगीत के बिना भी सुना जाए तो वो लगभग वही असर छोड़ते हैं। पर ऐसे गीतों को दिल में उतरने में वक़्त लगता है। वार्षिक संगीतमाला की 16 वीं पायदान पर ऐसा ही एक गीत है। सच बताऊँ तो जब कुछ महिने पहले इस गीत को पहली बार सुना था तो गीत श्रवणीय होने के बावज़ूद मुझ पर उतना असर नहीं कर पाया था।  पर  जैसे जैसे इस गीत की लोकप्रियता बढ़ी मुझे इस गीत को कई बार सुनने का अवसर मिला और मैंने पाया कि सीधे सहज बोलों को गायक ने जिस गांभीर्य और प्रबलता से निभाया है और गीत के अंदर की जो मधुरता व दर्द है वो दिल में धीरे धीरे घर कर जाती है। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ आशिक़ी 2 के गीत तुम ही हो की जिसे अपनी आवाज़ दी है उदीयमान गायक अरिजित सिंह ने और जिसकी धुन बनाई और लिखा है मिथुन ने



पर पहले बात अरिजित की। अरिजित सिंह का नाम भले ही आशिक़ी 2 की सफलता के बाद चारों ओर लिया जा रहा है पर जहाँ तक एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं का सवाल है अरिजित के गाए दो गीतों साँवली सी रात हो..खामोशी का साथ हो और फैली थी स्याह रातें ने पिछले साल के प्रथम दस गीतों में अपनी जगह बनाई थी। अगर आपको याद हो तो सोनी टीवी में आज से आठ साल पहले यानि 2005 में फेम गुरुकुल नाम का रियालिटी शो प्रसारित हुआ था। अरिजित उस शो में छठे स्थान पर रहे थे पर उस कार्यक्रम ने इतना नाम तो दिया कि संगीत समारोहों में बंगाल के इस गायक को मौके मिलते रहे। पिछले सात सालों के संघर्ष के बाद इस गीत को जो लोकप्रियता मिली है उससे वो खुश जरूर हैं पर उन्हें मालूम है कि ये उनके सांगीतिक सफ़र का प्रारंभिक मोड़ ही है। आशिकी 2 के इस गीत से जुड़े अनुभवों के बारे में बताते हुए अरिजित कहते हैं

"मैं इस गीत को गाते समय बिल्कुल नर्वस नहीं था क्यूँकि तब मुझे ये पता ही नहीं था कि ये गाने आशिक़ी के लिए प्रयुक्त होने हैं। मुझे ये गीत इसलिए पसंद है क्यूँकि इसमें मधुरता है। इसे और कोई भी गाता तो भी मुझे ये गीत पसंद आता। मुझे बड़ी खुशी है कि डान्स नंबर या फड़कता हुआ संगीत ना होते हुए भी ये गीत मशहूर हुआ। ये ऐसा सुरीला नग्मा है जिसे आप शांति से बैठकर सुनना चाहेंगे। रिकार्डिंग के समय मुझसे ये गीत पाँच से छः बार गवाया गया। कभी तो मुझे लगता था कि कितना करेंगे बहुत ज़्यादा हो रहा है। फिर मुकेश (मुकेश भट्ट) आ कर कहते ये अच्छा है पर और कोशिश करो बेहतर परिणाम आएँगे।"

ख़ैर अरिजित की मेहनत के साथ इस गीत की सफलता में संगीतकार मिथुन शर्मा का भी कम योगदान नहीं है। संगीतज्ञ नरेश शर्मा के पुत्र मिथुन पिछले छः सात सालों से हिंदी फिल्म जगत में सक्रिय हैं। पर तेरे बिना मैं कैसे जिया (बस एक पल), ज़िंदगी ने ज़िंदगी भर गम दिए (दि ट्रेन) और दिल सँभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू (मर्डर 2) मौला मेरे मौला मेरे (अनवर) जैसे लोकप्रिय गीतो् को संगीतबद्ध करने वाले मिथुन को खूब सारा काम करने की कोई जल्दी नहीं है। अगर आप ध्यान दें तो पाएँगे कि उनके गीतों में पियानो का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से होता है। इस गीत की शुरुआत और इंटरल्यूड्स में पियानो और गीत के पार्श्व में गिटार की ध्वनि आपको गीत के साथ मिलेगी।

अक्सर गीतकार सईद क़ादरी के साथ काम करने वाले मिथुन ने इस बार ख़ुद बोलों को लिखा भी है। उनका कहना है कि आशिक़ी दो में प्रेम के जिस स्वरूप का चारित्रिक निरूपण किया गया है ये गीत उसी की अभिव्यक्ति है। मुझे लगता है कि अगर मिथुन बोलों में थोड़ी और गहराई ला पाते तो ये गीत मेरी इस सूची में और ऊपर होता।तो आइए एक बार फिर सुनें इस गीत को..


हम तेरे बिन अब रह नही सकते
तेरे बिना क्या वजूद मेरा
तुझ से जुदा अगर हो जायेंगे
तो खुद से ही हो जायेंगे जुदा
क्योंकि तुम ही हो, अब तुम ही हो
ज़िंदगी, अब तुम ही हो
चैन भी, मेरा दर्द भी
मेरी आशिकी, अब तुम ही हो

तेरा मेरा रिश्ता हैं कैसा
इक पल दूर गवारा नही
तेरे लिये हर रोज़ हैं जीते
तुझको दिया मेरा वक़्त सभी
कोई लम्हा मेरा ना हो तेरे बिना
हर साँस पे नाम तेरा
क्योंकि तुम ही हो

तेरे लिये ही जिया मैं
खुद को जो यूँ दे दिया हैं
तेरी वफ़ा ने मुझको संभाला
सारे ग़मों को दिल से निकाला
तेरे साथ मेरा हैं नसीब जुड़ा
तुझे पा के अधूरा ना रहा
क्योंकि तुम ही हो

वैसे अरिजित की आवाज़ से आगे भी मुलाकात होगी इस संगीतमाला में...:)

Saturday, January 18, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 17 : मैं रंग शरबतों का, तू मीठे घाट का पानी (Main Rang Sharbaton ka..)

वार्षिक संगीतमाला 2013 के पिछले दो हफ्तों के सफ़र के बाद हम आ पहुँचे हैं संगीतमाला की 25 वीं पॉयदान से 17 वीं पॉयदान पर। गीतमाला की सत्रहवीं सीढ़ी पर है एक बड़ा प्यारा  नग्मा जिसे खूबसूरत बोलों से नवाज़ा है एक बार फिर इरशाद क़ामिल ने। फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो का ये गीत इस साल के बेहतरीन रूमानी नग्मों में से एक है।

इस गीत की जान इसका मुखड़ा है। शरबती रंग को मीठे पानी से घोलने की कल्पना दो प्यार भरे दिलों के मिलन का सटीक रूपक बन पड़ी है जो किसी संगीतप्रेमी श्रोता का ध्यान पहली बार में ही अपनी ओर खींचती है। अंतरों में भी प्यार का ये रंग फीका नहीं पड़ा है। इरशाद क़ामिल के लिए पिछला साल बतौर गीतकार उतना अच्छा नहीं रहा था पर इस साल उन्होंने अपनी कलम का  वो जलवा दिखाया है जो 'अजब प्रेम की गजब कहानी', 'रॉकस्टार', 'जब वी मेट', 'Once upon a time in Mumbai' और 'मौसम' जैसी कामयाब फिल्मों में दिखा था। 


वैसे क्या आपको पता है कि इरशाद क़ामिल को प्रेम गीतों को लिखने का चस्का कैसे लगा ? कॉलेज के ज़माने में उनके मित्र उनसे प्रेम पत्र लिखवाया करते थे। अब शेर ओ शायरी के बिना पत्रों से रूमानियत टपकती तो कैसे? इस वज़ह से कविता व शायरी पढ़ने लिखने में उनकी दिलचस्पी बढ़ गई। अपने दोस्तों में वो सुंदर लिखावट के लिए भी वे मशहूर थे तो मित्र उनसे किसी अज़ीम शायर की ग़ज़ल लिखवा कर अपने पत्रों में डलवा देते। ये सिलसिला इतना बढ़ गया कि एक ही शायरी को बार बार डालने में इरशाद को उकताहट होने लगी और इस हमेशा की परेशानी से बचने के लिए उन्होंने खुद से ही लिखना शुरु कर दिया।

फटा पोस्टर निकला हीरो के संगीतकार प्रीतम ने इस गीत के दो वर्सन रिकार्ड किये। एक को तो उन्होंने युगल गीत के रूप में पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम और चिन्मयी श्रीपदा से गवाया जब कि दूसरे वर्सन में एकल गीत के तौर पर इसे अरिजित सिंह से गवाया। दोनों वर्सनों को सुनने के बाद मुझे आतिफ़ और चिन्मयी का युगल गीत ही ज्यादा पसंद आता है। आपका इस बारे में क्या ख़्याल है?



ख्वाब है तू, नींद हूँ मैं, दोनो मिलें, रात बने
रोज़ यही माँगूँ दुआ, तेरी मेरी बात बने

मैं रंग शरबतों का, तू मीठे घाट का पानी
मुझे खुद में घोल दे तो,मेरे यार बात बन जानी


ओ यारा तुझे प्यार की बतियाँ क्या समझावाँ
जाग के रतियाँ रोज़ बितावाँ, इससे आगे अब मैं क्या कहूँ
ओ यारा तुझे बोलती अँखियाँ सदके जावाँ
माँग ले पकियाँ आज दुआवाँ, इससे आगे अब मैं क्या कहूँ

मैंने तो धीरे से, नींदों के धागे से, बाँधा है ख्वाब को तेरे
मैं ना जहान चाहूँ, ना आसमान चाहूँ, आजा हिस्से में तू मेरे

तू ढंग चाहतों का, मैं जैसे कोई नादानी
मुझे खुद से जोड़ दे तो ,मेरे यार बात बन जानी
रंग शरबतों का…

तेरे ख़यालों से, तेरे ख़यालों तक, मेरा तो है आना जाना
मेरा तो जो भी है, तू ही था, तू ही है
बाकी जहान है बेगाना,

तुम एक मुसाफ़िर हो, मैं कोई राह अनजानी

मनचाहा मोड़ दे तो, मेरे यार बात बन जानी
मैं रंग शरबतों का, तू मीठे घाट का पानी

फिल्म में इस गीत को फिल्माया गया है शाहिद कपूर और इलीना पर..


Thursday, January 16, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान 18 :ओ बस तू भाग मिल्खा (Bas Tu Bhag Milkha...)

वार्षिक संगीतमाला की सात सीढियाँ चढ़ते हुए आज हम आ पहुँचे हैं गीतमाला की अठारवीं पॉयदान पर। वैसे तो इस गीत के संगीतकार के रूप में शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी है पर नाममात्र संगीत पर बने इस गीत को इस पॉयदान तक पहुँचाने के असली हक़दार इसके गायक और गीतकार हैं। गायक ऐसा जिसकी आवाज़ की गर्मी से पानी भी भाप बन जाए और गीतकार ऐसे जिनके लिखे काव्यात्मक गीत हृदय में भावनाओं का ज्वार उत्पन्न कर दें। अगर आप अभी तक इस गायक गीतकार की जोड़ी को लेकर असमंजस में हैं तो बता दूँ कि मैं बात कर रहा हूँ पाकिस्तान के पंजाबी लोक गायक आरिफ़ लोहार और अपने गीतकार कवि प्रसून जोशी की।


आरिफ लोहार की आवाज़ से मेरा प्रथम परिचय कोक स्टूडियो में उनके मीशा सफ़ी के साथ गाए जुगनी गीत अलिफ़ अल्लाह चंबे दी बूटी...दम गुटकूँ दम गुटकूँ से हुआ था। उनकी आवाज़  की ठसक, उच्चारण की स्पष्टता और ऊँचे सुरों को आसानी से निभा लेने की सलाहियत ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। इस गीत को भारत में इतनी लोकप्रियता मिली कि इसमें थोड़ा बदलाव ला के  इसका प्रयोग हिंदी फिल्मों में भी हुआ। ख़ुद आरिफ़ का अपनी गायिकी के बारे में क्या कहना है उनकी ही जुबानी पढ़िए..
"मेरा एक अलग ही अंदाज़ होता है। मैं समझता हूँ कि हर कलाकार का एक अलग अंदाज़ होना चाहिए। मुझे जानकर अच्छा लगता है कि भारत में लोग मुझे दमगुटकूँ के गायक के नाम से जानते हैं। मेरा सूफी संगीत उस समय लोकप्रिय हुआ जब उसकी जरूरत थी। मैं जब भी गाऊँगा अपने तरीके से गाऊँगा। मैं चिमटा ले कर भी अपने आप को राकस्टार मानता हूँ।"
जी हाँ आरिफ़ जब भी स्टेज पर होते हैं उनके हाथ में चिमटा होता है।  उनके  गीतों की धुनें चिमटों के टकराहट से उपजी बीट्स से निकलती हैं। इस गीत में भी शुरु से आख़िर तक शंकर अहसान लाए ने लोहार के चिमटे के साथ इकतारे और गिटार का ही प्रयोग किया है। पर फिल्म भाग मिल्खा भाग के इस शीर्षक गीत में आरिफ़ गायन की जिस बुलंदी पर पहुँचे हैं उसमें प्रसून जोशी के शब्दों की उड़ान का बहुत बड़ा हाथ है।  इस गीत की एक एक पंक्ति किस तरह एक धावक के मन में उत्साह का संचार करती है उसके लिए इस लंबे गीत को बस एक बार पढ़ कर देखिए।

अरे शक्ति माँग रहा संसार, अब तू आने दे ललकार
तेरी तो बाहें पतवार, कदम हैं तेरे हाहाकार
तेरी नस नस लोहाकार, तू है आग मिल्खा
ओ बस तू भाग मिल्खा

अरे छोड़ दे बीते कल की बोरी, काट दे रस्सी सुतली डोरी
तुझ से पूछेगी ये मट्टी, करके साँस साँस को भट्टी
अब तू जाग मिल्खा, बस तू भाग मिल्खा

ओ सरिया, ओ कश्ती,
ओ सरिया ओ सरिया, ओए मोड़ दे आग का दरिया
ओ कश्ती ओ कश्ती, ओ डूब जाने में ही है हस्ती
हो जंगल, हो जंगल, आज शहरों से है तेरा दंगल
अब तू भाग भाग, भाग भाग भाग मिल्खा़ अब तू भाग मिल्खा

धुआँ धुआँ धमकाए धूल, राह में राने बन गए शूल
तान ले अरमानों के चाकू, मुश्किलें हो गयीं सारी डाकू
तू बन जा नाग ,नाग , नाग मिल्खा़ अब तू भाग मिल्खा

तेरा तो बिस्तर है मैदान, ओढना धरती तेरी शान
तेरे सराहने है चट्टान, पहन ले पूरा आसमान
तू पगड़ी बाँध मिल्खा, अब तू भाग मिल्खा....

हो भँवर भँवर है चक्कर चक्कर चक्कर
गोदी में उठाया माँ ने, चक्कर चक्कर चक्कर
गोदी उठाया बापू ने, चक्कर चक्कर चक्कर
भँवर भँवर है आज खेल तू, भँवर को खेल बना दे
आँधियाँ रेल बना दे, पटखनी दे उलझन को
चीख बना दे सरगम को, ओ चक्कर चक्कर चक्कर
उतार के फेंक दे सब जंजाल, बीते कल का हर कंकाल
तेरे तलवे हैं तेरी नाल, तुझे तो करना है हर हाल
अब तू जाग मिल्खा़, जाग मिल्खा़, जाग मिल्खा़, अब तू...

खोल तू रथ के पहिए खोल, बना के चक्र सुदर्शन गोल
जंग के फीते कस के बाँध, खुली है आज शेर की माँद
तू गोली दाग मिल्खा, दाग मिल्खा, दाग मिल्खा, अब तू...

दाँत से काट ले बिजली तार, चबा ले तांबे की छनकार
फूँक दे खुद को ज्वाला ज्वाला, बिन खुद जले  ना होए उजाला
लपट है आग मिल्खा, आग मिल्खा, आग मिल्खा, अब तू..
अब तू जाग मिल्खा, तू बन जा नाग मिल्खा
तू पगड़ी बाँध मिल्खा, तू गोली दाग मिल्खा,
ओह तू है आग मिल्खा, ओह तू भाग मिल्खा, अब तू..
अब तू भाग मिल्खा...



प्रसून ने गीत में उस ओजमयी भाषा का प्रयोग किया है जिसे लिख कर वीर रस का कवि भी गर्व महसूस करेगा। इन उत्प्रेरक शब्दों को जब आरिफ लोहार की बुलंद आवाज़ का सहारा मिलता है तो बस भागने के आलावा चारा क्या बचता है? :)

Monday, January 13, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 19 : अल्लाह मेहरबान तो दिल गुले गुल गुलिस्तान (Allah Meherban...)

आप को कव्वाली तो जरूर पसंद होगी। पर आज कल बीते ज़माने की तरह की कव्वालियाँ होती कहाँ हैं? आज के संगीत के लिहाज से Out of Fashion जो हो गई हैं। पर कुछ प्रयोगधर्मी संगीतकार गायिकी की इस विधा पर भी फ्यूजन के दाँव आज़मा रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयास किया है अमित त्रिवेदी ने अपनी फिल्म घनचक्कर के इस गीत में जो की 19 वीं सीढ़ी की शोभा बढ़ा रहा है। इस गीत को जब पहली बार मैंने सुना तो मन मस्ती से झूम उठा पर ये नहीं समझ पाया कि इस गीत के पीछे की दमदार आवाज़ किस की है। बाद में पता चला कि घनचक्कर की इस फ्यूजन कव्वाली को अपनी आवाज़ दी है दिव्य कुमार ने ।

ये वही दिव्य कुमार हैं जिनके भाग मिल्खा भाग के गीत 'मस्तों का झुंड...' ने पूरे देश में लोकप्रियता हासिल की है। पर बिना किसी विधिवत शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के बतौर पार्श्वगायक मुंबई फिल्म उद्योग में कदम रखने के लिए दिव्य कुमार को छः साल का कठिन संघर्ष करना पड़ गया। दिव्य कुमार एक सांगीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके दादा को वी शातारांम और पिता को पंचम के साथ काम करने का मौका मिल चुका है। गायक बनने की सोच उन्हें उनकी माँ ने दी।


बचपन से ही वो संगीत से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहे और बाद में वो कल्याण जी-आनंद जी के संगीत समूह से जुड़ गए। इसी बीच उन्होंने संगीत के रियालटी शो में भी हाथ आज़माया पर कई कोशिशों के बाद भी वो इन कार्यक्रमों में अपनी जगह नहीं बना सके। अपने दोस्तों के माध्यम से उनका परिचय अमित त्रिवेदी से हुआ और इशकज़ादे से उनके हिंदी फिल्म कैरियर की शुरुआत हुई।

ख़ैर दिव्य कुमार के बारे में तो आगे भी वार्षिक संगीतमाला में बातें होती रहेंगी, आइए देखें गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य ने इस गीत में क्या कहना चाहा है। ये गीत फिल्म में तब आता है जब नायक अपनी याददाश्त भूल जाने के बाद डाक्टर के पास जाता है और उसकी रिपोर्ट देख वो उसके ठीक होने के लिए दवा से ज्यादा दुआ की जरूरत बताते हैं। अमिताभ ने फिल्म की इस परिस्थिति को ध्यान में रखकर ये याद दिलाना चाहा है कि इंसान कितना भी होशियार, हुनरमंद और सफल क्यूँ ना हो ईश्वर के दिये एक ही झटके से उसे अपनी औकात का अंदाज़ा हो जाता है। दिव्य कुमार जीवन से जुड़े इस सत्य को अपनी ज़मीनी आवाज़ में पूरी बुलंदी से हम तक पहुँचाते हैं। 



अल्लाह अल्लाह
तेरी साँसों की उजड़े है खेत रे..उजड़े है खेत रे..उजड़े है खेत रे
जैसे मुट्ठी से फिसली है रेत रे..फिसली है रेत रे..फिसली है रेत रे..
माने रे..माने रे..माने रे..नइयो नन्ही जान
चौड़ा सीना तान, चला रे इंसान
अल्लाह मेहरबान तो दिल गुले गुल गुलिस्तान

अपनी कमज़ोरी में घोल दे जर्दा, ख़ुदा मददगार है गर हिम्मते मर्दा
जैसा आगाज़ वैसा अंजाम है, हरक़त मैली तो मैला ही नाम है
माया माया माया रे माया दोज़ख का सामान
बचा के ईमान चला रे इंसान
अल्लाह मेहरबान तो ...

दो दिन की चाँदनी के चाँद भी झूठे
काली करतूतों के दाग ना छूठें
सारी उस्तादी कब्रों में गाड़ के, एक दिन हर ऊँट नीचे पहाड़ के
आया आया आया रे आया माने या ना मान
काहे का बलवान, ठहरा तू इंसान
अल्लाह मेहरबान तो ...


तो हुज़ूर अल्लाह की मेहरबानी का शुक्रिया अदा कीजिए और गीत की मस्ती में अपने दिल को गुले गुल गुलिस्तान बना ही डालिए।

Saturday, January 11, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 20 : ऐ सखी साजन.. जब ' कह मुकरनी' ने शक़्ल ली एक गीत की ! (Aye Sakhi Sajan...)

वार्षिक संगीतमाला की बीसवीं पॉयदान पर गीत वो जो एक पुरानी साहित्यिक विधा  को एक बार फिर से गीत के लफ़्जों में पिरो कर लाया है। ये गीत है फिल्म रांझणा का, बोल हैं इरशाद क़ामिल के और धुन बनाई है ए आर रहमान ने। आप सोच रहे होगें कि मै किस विधा की बात कर रहा हूँ? इस विधा का नाम है 'कह मुकरनी' जिसे जनाब आमिर खुसरो ने तेरहवीं सदी में विकसित किया था। 

‘कह-मुकरनी’ का अर्थ है ‘कहकर मुकर जाना’ यानी अपनी कही हुई बात को वापस ले लेना। कह मुकरनी चार पंक्तियों की छोटी कविता की एक विशेष शैली है जिसमें संवाद दो सखियों के बीच होता है। इस संवाद में बातें कुछ इस तरह से कही जाती हैं कि वो स्त्री के पति के बारे में हो सकती है या किसी और वस्तु विशेष को इंगित कर रही होती हैं। जब सखी ये कहती है कि अरे तुम तो अपने पिया की बातें कर रही हो तो झट से जवाब आता है नहीं नहीं मैं तो उस वस्तु विशेष की बात कर रही थी। अमीर खुसरो ने यूँ तो तमाम कह मुकरनी लिखीं और उनमें कुछ इंटरनेट पर सहज ही उपलब्ध हैं । मिसाल के तौर पर ये नमूना देखिए..

वो आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय।
मीठे लागें वाके बोल। ए
सखी साजन? ना सखी ढोल

ऊँची अटारी पलंग बिछायौ। मैं सोयी मेरे सिर पर आयौ।
खुल गयीं अखियाँ भयौ अनन्द। ए
सखी साजन? ना सखी चंद!

अगर इन पंक्तियों को ध्यान से देखें तो आप पाएँगे कि ये पंक्तियाँ कोई अपने पिया के बारे में भी कह सकता है और वास्तव में कह भी रहा है पर आख़िर समय में वो स्वीकारोक्ति ना कर ये कह देती है कि ना जी मैं तो 'ढोल' या  'चंद्रमा' की बात कर रही थी। रांझणा में भी सहेलियों की आपसी बातचीत को इस गीत में 'कह मुकरनी' के अंदाज़ में कहा गया है। वैसे फिल्म संगीत में इस अंदाज़ को लाने का श्रेय  रहमान और इरशाद कामिल को दिया जा सकता है पर इससे पहले भी अस्सी के दशक में  आमिर खुसरो पर बने HMV के गैर फिल्मी एलबम Great Works of Amir Khusro  में संगीतकार मुरली मनोहर स्वरूप ने वाणी जयराम और कृष्णा की आवाज़ में कुछ कह मुकरनियों को रिकार्ड किया गया था।



रहमान ने बड़ी खूबसूरती से इस गीत शास्त्रीयता का रंग भरा है । गीत की शुरुआत चिन्मयी श्रीप्रदा और मधुश्री की मोहक शास्त्रीय सरगम  होती है और फिर शुरु होती हैं कह मुकरनी के अंदाज़ में कही जाने वाली पहेलियाँ। रहमान का संगीत में दक्षिण भारतीय वाद्य घाटम का प्रयोग मन को सोहता है। इरशाद कामिल अपनी पहली पहेली को कह मुकरनी का ज़ामा कुछ यूँ पहनाते हैं

बताओ बताओ है क्या ये सहेली
बताओ बताओ है क्या ये पहेली
हाँ ऐ सखी उलझन, क्या सखी उलझन
ऐ सखी उलझन,, क्या सखी उलझन

हर दर्द सारा बदल है जाता
जनम जनम का उस से नाता
हो .. कभी है बादी हो, कभी सुवादी
कभी है बादी हो, कभी सुवादी 

ऐ सखी साजन, ना सखी शादी

देख रहें हैं ना कि जो बातें शादी के लिए लागू होती हैं वही साजन के लिए। और ये रही गीत की दूसरी पहेली

चाहे तो वो कर दे अँधेरा, गीला कर दे तन मन मेरा
चाहे तो वो कर दे अँधेरा, गीला कर दे तन मन मेरा
मैं तो सुखाती हूँ फिर दामन, ऐ सखी साजन, ना सखी सावन..

गीत के इंटरल्यूड्स में सह गायिकाओं द्वारा पैं पैं... की ध्वनि का प्रयोग कर रहमान सहेलियों के बीच के हल्के फुल्के माहौल का संकेत दे देते हैं। गीत के आख़िरी अंतरे में इरशाद क़ामिल सचमुच के साजन को कुछ यूँ परिभाषित करते हैं।

हाय पास ना हो बड़ा सताए..(सताए)
पास जो हो बड़ा सताए..(सताए)
पास बुलाये बिना बतलाये..(बताए)
पास वो आये बिना बतलाये..(बताए)
पास रहे नज़र ना आये..(ना आये)
पास रहे नज़र लगाये..(लगाये)
पास उसी के रहे ख्वाहिशें..ख्वाहिशें
पास उसी के कहें ख्वाहिशें..ख्वाहिशें

कुल मिलाकर चिन्मयी और मधुश्री के मधुर स्वर में ये गीत हमें आनंद के कुछ और क्षण दे जाता है। आपका क्या ख्याल है?

Thursday, January 09, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 21 : मुझे छोड़ दो मेरे हाल पे ...ज़िदा हूँ यार काफी है. (Zinda Hoon Yaar...)

कभी कभी जीवन में ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं जिसे करने के बाद की ग्लानि अपने आपको माफ करने नहीं देती। इस आत्मग्लानि से बचने के लिए हम खुद को ऐसी दिनचर्या में व्यस्त कर लेते हैं जिसमें स्वयं से भागने की पूरी गुंजाइश रहे। पर ऍसे भागमभाग भरे जीवन का कोई मोल है भला? यूँ ही घिसटती ज़िंदगी को ढोते हुए अगर ऊपरवाला आपको अपनी गलती सुधारने का मौका दे तो क्या आप उसका तहे दिल से शुक्रिया अदा नहीं करेंगे ? उससे ये नहीं कहेंगे कि जिस पश्चाताप की अग्नि में मैं जल रहा था उससे जीते जी तूने निकलने की राह दिखाई ..बस मेरे लिए वही काफी है। इन्हीं मनोभावनाओं को उदासी की चादर में लपेटे खड़ा है वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं पॉयदान की नग्मा जिसे गाया और संगीतबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने और जिसके बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने।


लुटेरा फिल्म का ये गीत फिल्म के अन्य गीतों से उलट संगीत संयोजन में आज के युग का ही प्रतिनिधित्व करता है।गिटार,वॉयलिन और ड्रम्स के साथ पूरा आर्केस्ट्रा इस्तेमाल किया है अमित ने इस गीत के संगीत में। इस गीत की कुछ पंक्तियों की काव्यात्मकता कमाल की है। जब अमिताभ लिखते हैं कि हवाओं से जो माँगा हिस्सा मेरा...तो बदले में हवा ने साँस दी, अकेलेपन से छेड़ी जब गुफ़्तगू ...मेरे दिल ने आवाज़ दी तो बस उनकी सोच पर दाद देने को जी चाहता है। उड़ान की तरह अमित त्रिवेदी एक बार फिर माइक्रोफोन के पीछे हैं और उनकी आवाज़ गीत में छुपे दर्द को हमारे ज़हन के करीब ले आती है। 

अमित गीत की भावनाओं को Celebration of Tragedy का नाम देते हैं। तो आइए सुनें अमित के स्वर में ये गीत...



मुझे छोड़ दो मेरे हाल पे
ज़िदा हूँ यार काफी है...ज़िदा हूँ यार काफी है

हवाओं से जो माँगा हिस्सा मेरा
तो बदले में हवा ने साँस दी
अकेलेपन से छेड़ी जब गुफ़्तगू
मेरे दिल ने आवाज़ दी
मेरे हाथों, हुआ जो किस्सा शुरु
उसे पूरा तो करना है मुझे
कब्र पर मेरे
सर उठा के खड़ी हो ज़िन्दगी
ऐसे मरना है मुझे

कुछ माँगना बाकी नहीं
कुछ माँगना बाकी नहीं
जितना मिला काफी है
ज़िंदा हूँ यार काफी है

मुझे छोड़ दो मेरे हाल पे
मुझे छोड़ दो मेरे हाल पे
ज़िन्दा हूँ यार काफी है
ज़िन्दा हूँ यार काफी है

मुझे छोड़ दो..
मुझे छोड़ दो..
मेरे हाल पे...

शुरुआत में इस गीत की जगह वो थी जहाँ 'शिकायतें' का फिल्मांकन किया गया था। विक्रमादित्य मोटवाने को ये गीत फिल्म के अंत में क्लाइमेक्स के साथ लाना ठीक लगा और इसलिए उसी के अनुरुप इसे फिर से रिकार्ड किया गया। बर्फबारी के बीच इस गीत में पेड़ की सबसे ऊँची शाख पर नायक द्वारा एक सूखे पत्ते को जोड़ने के दृश्य को बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है।


Tuesday, January 07, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 22 : मेरे बिना तू...मेरे बिना ख़ुश रहे तू ज़माने में (Mere Bina Tu)

पिछली वार्षिक संगीतमाला के सिरमौर प्रीतम इस साल पहली बार दाखिल हो रहें गीतमाला की अगली पॉयदान पर। संगीत संयोजन के मामले में प्रीतम का अपना एक अलग ही अंदाज़ रहा है। उनकी धुनों की मधुरता ऐसी होती है कि कई बार आप शब्दों की तह तक पहुँचने के पहले ही उन्हें गुनगुनाने लगते हैं। फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में प्रीतम एक बार फिर अपने पसंदीदा गीतकार इरशाद कामिल के साथ नज़र आए हैं। पर वार्षिक संगीतमाला की बाइसवीं पॉयदान पर जो गीत है उसके यहाँ होने की वज़ह इसके गायक राहत फतेह अली खाँ और प्रीतम हैं।

राहत फतेह अली खाँ की गायिकी का जादू  पहली बार फिल्म पाप के गीत लगन लागी तुमसे मन की लगन सुनने के बाद सम्मोहित कर गया था। पिछले एक दशक में वार्षिक संगीतमालाओं में नैणा ठग लेंगे, धागे तोड़ लाओ चाँदनी से नूर के,मैं जहाँ रहूँ तेरी याद साथ है,मन बावरा तुझे ढूँढता, मन के मत पे मत चलिओ, तू ना जाने आस पास है ख़ुदा, सुरीली अँखियों वाले, तेरे मस्त मस्त दो नैन, तोरे नैना बड़े दगाबाज़ रे,  सज़दा, दिल तो बच्चा है जी जैसे बेमिसाल गीतों के माध्यम से वो छाए रहे हैं।



विछोह की भावना को प्रदर्शित करता फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो का ये गीत गिटार और पियानो की मिश्रित प्रारंभिक धुन से शुरु होता है। ये धुन ऐसी है कि इसकी खनक मिलते ही कानों के राडार एकदम से खड़े हो जाते हैं । इस धुन को प्रीतम ने इस गीत की सिग्नेचर ट्यून की तरह जगह जगह इस्तेमाल किया है। प्रीतम आरंभिक संगीत से गीत में रुचि  जागृत करते हैं और फिर राहत की आवाज़  गीत के अंत तक आपका ध्यान हटने नहीं देती। सच कहूँ तो इरशाद क़ामिल के सहज शब्दों को राहत अपनी गायिकी से वो गहनता प्रदान करते हैं जो गीत को सामान्य से उत्कृष्ट की श्रेणी में खड़ा कर देती है।

तो आइए सुनते हैं इस गीत को। 


मेरे बिना तू, मेरे बिना तू
मेरे बिना ख़ुश रहे तू ज़माने में
कि आऊँ ना मैं याद भी अनजाने में
मेरे बिना तू...

भूल अब जाना गुज़रा ज़माना
कह तो रहे हो मुझको मगर
तस्वीरें ले लो, ख़त भी ले जाओ
लौटा दो मेरे शाम-ओ-सहर
जान जाए रे, जान जाए रे
जान जाए मेरी तुझको भुलाने में
कि आऊँ ना मैं याद भी अनजाने में
मेरे बिना तू...

तुझसे है वादा, है ये इरादा
अब ना मिलेंगे तुझसे कभी
दे जाओ मुझको सारे ही आँसू
ले जाओ मुझसे मेरी खुशी
मेरी खुशी तो, मेरी खुशी तो
मेरी खुशी आँसुओं को बहाने में
कि आऊँ ना मैं याद भी अनजाने में
मेरे बिना तू...

फिल्म में ये गीत राहत का गीत ना होके राहत और हर्षदीप कौर के युगल गीत के रूप में आया है। प्रीतम ने वहाँ संगीत संयोजन में कुछ प्रयोग करने की कोशिश की है पर मुझे युगल गीत से ज्यादा अकेले राहत का गाया वर्सन ही पसंद आता है। वैसे आपका इस गीत के बारे में क्या ख्याल है?

Sunday, January 05, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 23 : हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गये..सँवार लूँ (Sanwaar Loon)

अमित त्रिवेदी  व अमिताभ भट्टाचार्य के गीत संगीत का मैं उनकी पहली फिल्म आमिर के दिनों से ही शैदाई रहा हूँ और इसकी अभिव्यक्ति गुजरे साल की वार्षिक संगीतमालाओं में होती रही है। 2013 में इस जोड़ी द्वारा किया गया बेहतरीन काम आपको इस संगीतमाला के विभिन्न पड़ावों पर दिखेगा। पिछले साल उनका जो गीत देश के टीवी और रेडियो चैनलों ने सबसे अधिक बजाया है वो है सँवार लूँ ...और यही गीत बैठा है वार्षिक संगीतमाला 2013 की अगली सीढ़ी पर। 

पिछले कई सालों से आपने एक बात गौर की होगी कि जब जब हमारे संगीतकारों को गुज़रे ज़माने से जुड़ी कोई पटकथा हाथ लगी है तो उन्होंने उसके अनुरूप संगीत देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ए आर रहमान की 'जोधा अकबर' और 'लगान', प्रीतम की 'बर्फी', शांतनु मोइत्रा की 'परिणिता', इस्माइल दरबार की 'देवदास' इसके कुछ जीते जागते उदाहरण है। लुटेरा के साथ अमित त्रिवेदी का नाम भी ऐसे संगीतकारों की सूची में जुड़ा है।

'उड़ान' के संगीत निर्देशन के दौरान अमित और विक्रमादित्य के बीच जो आपसी समझ बूझ विकसित हुई उसका विस्तार लुटेरा के दृश्यों में रचे बसे गीतों में मिलता है। निर्देशक अमित त्रिवेदी कहते हैं कि विक्रमादित्य की पटकथाएँ ही अपने आप में इतनी उत्प्रेरक होती हैं कि उसका संगीत रचने के लिए अलग से हमें किसी 'brief' की आवश्यकता नहीं होती। विक्रमादित्य मोटवाने जब अमित त्रिवेदी के सामने लुटेरा की पटकथा लाए तो उनके सामने पचास और साठ के दशक का बंगाल घूम गया। ये वो दौर था जब वहाँ के संगीत में सलिल चौधरी, सचिन देव बर्मन और राहुल देव बर्मन की तूती बोलती थी और उन्होंने इस फिल्म के गीतों को इन्हीं दिग्गज़ों द्वारा रचे संगीत जैसी ही आवाज़ दी। यही वज़ह है कि जहाँ सँवार लूँ की धुन एस डी बर्मन को समर्पित है वहीं 'अनकही' का गीत संगीत गुलज़ार-पंचम द्वारा इजाज़त के किए गए काम से प्रेरित।"

अमित के संगीत और अमिताभ के बोलों को साथ मिला है नवोदित गायिका  मोनाली ठाकुर के स्वर का । यूँ अब मोनाली को सिर्फ गायिका कहना ठीक नहीं क्यूँकि शीघ्र ही बतौर नायिका वो हिंदी फिल्मों के पर्दों पर नज़र आने वाली हैं। इंडियन आइडल-2, 2006 के प्रथम दस में स्थान बनाने वाली 28 वर्षीय मोनाली, यूँ तो बंगाल के एक सांगीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आती हैं पर उन्हें गायिकी के आलावा नृत्य और अभिनय करने से भी परहेज़ नहीं है।


इंडियन आइडल 2 में चर्चित होने के बाद उन्हें हिंदी फिल्म जगत में अपनी  पहली सफलता दो साल के संघर्ष के बाद 2008 में रेस  के गीत 'ज़रा जरा टच मी ' से मिली। वैसे पिछले पाँच सालों में उनकी झोली में दर्जन भर से थोड़े ज्यादा गीत ही आ पाए हैं। सँवार लूँ और फिल्मों में अभिनय की शुरुआत के बाद उनका कैरियर किस करवट बैठेगा ये तो वक़्त ही बताएगा।

सँवार लूँ का सबसे आकर्षक हिस्सा मुझे इसका आरंभिक संगीत और मुखड़ा लगता है। मुखड़े का आकर्षण पहले और फिर दूसरे अंतरे तक आते आते थोड़ा क्षीण हो जाता है।  गीत के साथ चलती हुई ताल वाद्यों की थपक  जहाँ पंचम की तो वहीं इंटरल्यूड्स में सुनाई देने वाली बाँसुरी और सीमिल आर्केस्ट्रा सचिन दा के संगीत की याद दिला जाता है। मोनाली ठाकुर की चुलबुली आवाज़ में शोखी के साथ जो मिठास है वो गीत सुने वक़्त दिल को तरंगित कर देती है।

अमिताभ भट्टाचार्य नायिका के दिल का मूड परखने के पहले उसकी आँखों से प्रकृति की कारगुजारियों का जो खाका खींचते हैं वो वाकई शानदार है। मिसाल के तौर पर गीत का मुखड़ा देखिए जहाँ अमिताभ लिखते हैं कि पवन देवता इसलिए रुष्ट हो गए कि इससे पहले वे फूलों की पंखुड़ियों को सहला पाते, भौंरे उन पुष्पों की सुंदरता का रसपान करके फुर्र हो लिए। किसी अजनबी के लिए नायिका के हृदय में कोमल भावनाओं का आगमन को अमिताभ पहले अंतरे में कुछ यूँ बाँधते हैं पंक्तियाँ बरामदे पुराने हैं, नयी सी धूप हैं, जो पलके खटखटा रहा हैं किसका रूप है अब आप ही बताइए ऐसी शरारतें कर दिल को गुदगुदाने वाले को  नायिका कैसे अपनी शर्मो हया छोड़कार नाम कैसे पुकार ले ?

तो आइए सुनते हैं इस गीत को एक बार फिर से..


हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गये
गुलों की शोखियाँ जो भँवरे आ के लूट गये
बदल रही हैं आज ज़िंदगी की चाल ज़रा
इसी बहाने क्यूँ ना मैं भी दिल का हाल ज़रा
सँवार लूँ , सँवार लूँ ,सँवार लूँ  हाए सँवार लूँ


बरामदे पुराने हैं, नयी सी धूप हैं
जो पलके खटखटा रहा हैं किसका रूप हैं

शरारातें करे जो ऐसे, भूल के हिजाब
कैसे उसको नाम से, मैं पुकार लूँ
सँवार लूँ .....

ये सारी कोयलें बनी हैं आज डाकिया
कूहु-कूहु में चिठ्ठियाँ पढ़े मज़ाकिया

इन्हे कहो की ना छुपाये
किसने है लिखा बताये
उसकी आज मैं नज़र उतार लूँ
सँवार लूँ ....हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गये
...

 वैसे इस गीत का फिल्मांकन भी बड़ा खूबसूरत है ...



 चलते चलते एक बात और ! इस गीत से जुड़ी एक विचित्र बात मुझे ये लगी कि हर जगह इसके गीत को सवार लूँ (Sawaar Loon) के नाम से क्यूँ प्रचारित किया गया जबकि गीत में ये सँवार लूँ  (Sanwaar Loon) की तरह आया है? अर्थ का अनर्थ करती इस भूल के प्रति विक्रमादित्य मोटवाने और अमित त्रिवेदी जैसी हस्तियाँ सजग नहीं रहीं ये देख कर अच्छा नहीं लगा।

Friday, January 03, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 24 : सितारे भी जिनको ना दे सके पनाह...हमने कर दिया जिन्हें धुआँ...Dhuan

वार्षिक संगीतमाला 2013 की अगली सीढ़ी पर है एक बेहद संवेदनशील नग्मा जिसे लिखा निरंजन अयंगार ने धुन बनाई शंकर अहसान लॉए ने और आवाज़ दी राहुल राम व सिद्धार्थ महादेवन ने। 

इस गीत की व्यक्त भावनाएँ मुझे माखन लाल चतुर्वेदी की स्कूल में पढ़ी उस कविता की याद दिला देती हैं जिसमें चतुर्वेदी जी एक पुष्प की अभिलाषा को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं।

मुझे तोड़ लेना वन माली 
उस पथ पर देना तुम फेंक 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने 
जिस पथ जायें वीर अनेक

पर क्या इस अनुकरणीय सोच को हमारा समाज वास्तव में अपने मन में डाल पाया है?


ये गीत हमें अपने उन वीर जवानों की याद दिलाता है जो अपनी जान की परवाह किए बिना देश के बाहरी और भीतरी शत्रुओं से हमारी रक्षा करते हैं। जब ये जवान शहीद होते हैं तो सारा देश कुछ दिनों तक उनकी वीरता की गाथा गाता है और फिर कुछ दिनों बाद लोग उस शहीद की यादों को अपने दिमाग से निकाल देते हैं। निरंजन की कलम हमारी इसी प्रवृति पर इस गीत में कटाक्ष करती नज़र आती है।

शंकर एहसान लॉए ने इंडियन ओशन बैंड के गिटार वादक और मुख्य गायक राहुल राम की ज़ोरदार आवाज़ का गीत में बेहतरीन उपयोग किया है। इस गीत के अंतरों के बीच निरंजन ने गीत की सबसे मारक पंक्तियाँ लिखी हैं जिन्हें सुनकर मन में शर्मिंदगी का अहसास घर करने लगता है। सितारे भी जिनको ना दे सके पनाह...कहानी ये उनकी जिन्हें भूले दो जहाँ..हमने कर दिया जिन्हें धुआँ । संगीतकार त्रयी ने इन पंक्तियों को शंकर महादेवन के सुपुत्र सिद्धार्थ महादेवन से गवाया है। वैसे आपको ध्यान होगा कि बतौर गायक सिद्धार्थ ने इस साल भाग मिल्खा भाग में ज़िदा हैं तो प्याला पूरा भर ले को भी अपनी आवाज़ दी है।




जा रहा कहीं यादों का कारवाँ
मिट चुका यूँ हीं होने का हर निशाँ
क्यूँ भूली इन्हें ज़मीं क्यूँ भला ये आसमाँ
ना जाने ये खो गए कहाँ

रंग ख़्वाबों के जिनके खून से रँगे
रास्ते नए जुनून से बने
क्यूँ भूली इन्हें ज़मीं
क्यूँ भला ये आसमाँ
ना जाने ये खो गए कहाँ

सितारे भी जिनको ना दे सके पनाह
कहानी ये उनकी जिन्हें भूले दो जहाँ
हमने कर दिया जिन्हें धुआँ

माँगना नहीं बस देना है जिनकी जुबाँ
लूटकर जिन्हें हमनें बाँधा है ये समा
जो भूली इन्हें ज़मीं जो भूला ये आसमाँ
ना कहलाएँगे हम इंसान

सितारे भी जिनको ना दे सके पनाह
कहानी ये उनकी जिन्हें भूले दो जहाँ
हमने कर दिया जिन्हें धुआँ
क्यूँ हमने कर दिया उन्हें धुआँ ?.

ये गीत हमारे हृदय को झकझोरने और इस माटी के वीर सपूतों के बलिदान को उचित सम्मान देने के लिए कटिबद्ध करता है। तो आइए सुनें फिल्म डी डे के इस गीत को...

Wednesday, January 01, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 25 : अम्बरसरिया..मुंडयावे कचिया कलियाँ ना तोड़ (Ambarsariya)

साल का शुभारंभ और स्वागत है आपका एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के नवें वर्ष (9th year) में पिछले साल के 25 बेहतरीन गीतों के साथ। वार्षिक संगीतमाला 2013 की पच्चीस वीं पॉयदान में विराजमान है वो गीत जो पंजाब के गली मोहल्लों में पूरे साल जोर शोर से बजा और इसकी एक खास वज़ह रही गीत में एक ऐसे आंचलिक शब्द का प्रयोग जो पंजाब के एक नामी शहर से जुड़ा हुआ है। वैसे हिंदी फिल्मों में हर साल निर्माता निर्देशक अपनी फिल्मों के गीतों में कुछ अनूठे अनजाने शब्द (चाहे वो आंचलिक भाषाओं से लिए गए हों या विदेशी भाषा से) डलवाते रहें हैं ताकि लोगों की पहले उस गीत और फिर उस फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़े। रॉकस्टार में प्रयुक्त कतिया करूँ हो या फिर दम मारो गम का Te Amo , अपनी इसी नवीनता के कारण ये गीत लोकप्रिय हुए।


फिल्म फुकरे के लिए संगीतकार राम संपत को एक रोमांटिक गीत की तलाश थी तो वो पंजाबी लोक गीत अम्बरसरिया को ढूँढ लाए। गीतकार मुन्ना धीमन ने उस लोक गीत में थोड़ा हिंदी पंजाबी का तड़का लगाया और सोना महापात्रा की जादुई आवाज़ की चाशनी में ये गीत निखर उठा। वैसे किसी हिंदी भाषी से अंबरसरिया का मतलब पूछा जाए तो वो बेचारा या तो आसमान (अम्बर) की ओर ताकेगा या फिर लोहे की छड़ों (सरिया) के बारे में सोचेगा पर पंजाबी में अंबरसरिया का मतलब होता है अमृतसर का लड़का (थोड़े लफंगे वाले भाव में :))

गायिका सोना महापात्रा  इस गीत के बारे में बताती हैं कि
"जब इस फिल्म का एलबम विकसित हो रहा था तब इसमें केवल धूम धड़ाके वाले गाने ही थे। अम्बरसरिया वाला गीत लाने की बात एलबम को पूरा करने के थोड़े ही पहले हुई और मुझे इसे एक लड़की के लिहाज़ से इस गीत में अपने आपको प्रकट करने का मौका मिला। मुझे इस गीत को गाते हुए खूब मजा आया । आजकल के युवाओं की फिल्म होते हुए भी इसमें प्यार के उसी पुराने तौर तरीके को दिखाया गया है जो मन को सोहता है।"

सही तो कह रही हैं सोना।  मध्यम वर्गीय कॉलोनियों में गली का नुक्कड़, घर की बॉलकोनी और पड़ोसन की छत तो प्यार के बीज को अंकुरित होने के लिए मुनासिब जगहें हुआ करती थीं। अब इस गीत को ही लें, गीत में नायक के तौर तरीकों को समझती हुई हमारी नायिका  अमृतसर के मुंडे को  कुछ यूँ संबोधित कर रही है

गली में मारे फेरे, पास आने को मेरे
कभी परखता नैन मेरे तो, कभी परखता तोर (चाल)
अम्बरसरिया..मुंडयावे कचिया कलियाँ ना तोड़ 
तेरे माँ ने बोले हैं मुझे तीखे से बोल
अम्बरसरिया..हो अम्बरसरिया..


वैसे सोना को गीत की वो पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगती हैं जब नायिका कहती है कि पहले तो मैं काजल लगा और चूड़ियाँ पहन कर खूब सजती सँवरती थी पर अब मुझे पता लग गया है कि जिसके पास मेरे जैसे नशीले नैन हों उसे ना तो किसी सूरमे की आवश्यकता है ना किसी साज श्रंगार की।

गोरी गोरी मेरी कलाई ,चूड़ियाँ काली काली
मैं शर्माती रोज़ लगाती ,काजल सुरमा लाली
नहीं मैं सुरमा पा
ना  ,रूप ना मैं चमकाना
नैन नशीले हों अगर तो सुरमे दी कि लोड़

राम संपत ने इस गीत के संगीत में गिटार का खूबसूरत प्रयोग किया है तो आइए सुनते हैं सोना की आवाज़ में ये नग्मा...


वैसे फिल्म फुकरे में प्यार के इस रासायन को पनपता देख पाना भी एक सुखद अनुभव है...


 

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