Friday, February 28, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 4 : दिल से इतना क्यूँ हारा मैं, ये तूने क्या किया. (Ye Tune Kya Kiya..)

वार्षिक संगीतमाला के शिखर तक पहुँचने के लिए अब बस तीन पायदानों का सफ़र तय करना बाकी रह गया है। पिछली दो पायदानों की तरह इस सीढ़ी पर एक अलग कोटि का गीत है। जी हाँ इस गीतमाला की चौथी पॉयदान पर है एक कव्वाली। आप कहेंगे कव्वालियाँ तो पुरानी फिल्मों में हुआ करती थीं अब तो उनके नाम पर कुछ भी परोस दिया जाता है। आपकी बात गलत नहीं पर वक़्त बदलने के साथ संगीत में जो बदलाव है उसका कुछ असर तो पड़ेगा ही। पर चौथी पॉयदान की इस कव्वाली में कुछ तो बात ऐसी जरूर है जो पुराने दिनों की यादें ताज़ा कर देती है। 



इसे गाने वाले जावेद बशीर को संगीतकार प्रीतम ने खास पाकिस्तान से आयात किया है। चालीस वर्षीय जावेद का ताल्लुक कव्वालों के खानदान से रहा है। उस्ताद मुबारक अली खाँ से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाले जावेद पहली बार मेकाल हसन बैंड से जुड़ने की वज़ह से चर्चा में आए। शास्त्रीय संगीत, कव्वाली और रॉक इन तीनों विधाओं को अपनी गायिकी में पिरोने वाले जावेद ने पिया तू काहे रूठा रे (कहानी),  तेरा नाम जपदी फिरूँ  (कॉकटेल) , मेरा यार और रंगरेज़ (भाग मिल्खा भाग) से बॉलीवुड में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है।

 जावेद बशीर और रजत अरोड़ा

Once upon a time in Mumbai दोबारा की इस कव्वाली को लिखा रजत अरोड़ा ने! रजत ने जयदीप साहनी और निरंजन अयंगार की तरह ही गीतकार बनने के पहले बतौर पटकथा लेखक अपने आप को स्थापित किया है। फिल्म दि डर्टी पिक्चर में उनके संवादों को आम जनता और समीक्षकों दोनों ने ही सराहा। ये अलग बात है कि जब 2001 में उन्होंने दिल्ली से मुंबई का रुख किया था तो उनके मन में गीतकार बनने का ही सपना था। 

अगर एक गीतकार पटकथा लेखक भी हो तो उसे गीत की परिस्थिति और चरित्र के अंदर उठ रहे मनोभावों का पूरा अंदाज़ा होता है। अब इस कव्वाली की परिस्थिति देखिए इस बार प्रेम में भाई यानि डॉन खुद पड़े हैं और प्रेम को भी वे हार जीत की बाजी के रूप में तौलते हैं इसीलिए रजत लिखते हैं इश्क़ की.. साज़िशें, इश्क़ की.. बाज़ियाँ.हारा मैं.. खेल के, दो दिलों.. का जुआ या फिर मुझे तू राज़ी लगती है, जीती हुई बाज़ी लगती है तबीयत ताज़ी लगती है, ये तूने क्या किया.

कव्वाली की शुरुआत में रजत इश्क़ को सहजता से इन अशआरों में ढालते हैं. जावेद बशीर की गहरी आवाज़ में वो और निखर जाते हैं.

इश्क़ वो बला है, इश्क़ वो बला है
जिसको छुआ इसने वो जला है
दिल से होता है शुरू, दिल से होता है शुरू
पर कम्बख़्त सर पे चढ़ा है
कभी खुद से कभी ख़ुदा से, कभी ज़माने से लड़ा है
इतना हुआ बदनाम फिर भी, हर ज़ुबाँ पे अड़ा है

और उसके आगे के अंतरों में शब्दों के साथ वो जिस सलाहियत से खेलते हुए प्रेम में घायल दिल का हाल बयाँ करते हैं कि उसे सुनते ही मन सुर में सुर मिलाने को करता है। कव्वाली पूरे रंग में आती है जब कोरस साथ में आता है। प्रीतम इंटरल्यूड्स में Once upon a time in Mumbai की Signature Tune का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। और चूँकि ये कव्वाली है इसलिए साढ़े तीन मिनट बाद हारमोनियम भी अपने पूरे रंग में दिखता है।

इश्क़ की.. साज़िशें, इश्क़ की.. बाज़ियाँ
हारा मैं.. खेल के, दो दिलों.. का जुआ
क्यूँ तूने मेरी फ़ुर्सत की, क्यूँ दिल में इतनी हरकत की
इसक में इतनी बरक़त की, ये तूने क्या किया..
फिरूँ अब मारा मारा मैं, चाँद से बिछड़ा तारा मैं
दिल से इतना क्यूँ हारा मैं, ये तूने क्या किया..
सारी दुनिया से जीत के, मैं आया हूँ इधर
तेरे आगे ही मैं हारा, किया तूने क्या असर

मैं दिल का राज़ कहता हूँ, कि जब जब साँसें लेता हूँ
तेरा ही नाम लेता हूँ, ये तूने क्या किया
मेरी बाहों को तेरी साँसों की जो आदतें लगी हैं वैसी
जी लेता हूँ अब मैं थोड़ा और
मेरे दिल की रेत पे आँखों की जो पड़े परछाईं तेरी
पी लेता हूँ तब मैं थोड़ा और
जाने कौन है तू मेरी, मैं ना जानूँ ये मगर
जहाँ जाऊँ करूँ, मैं वहाँ तेरा ही ज़िक्र
मुझे तू राज़ी लगती है, जीती हुई बाज़ी लगती है
तबीयत ताज़ी लगती है, ये तूने क्या किया..

मैं दिल का राज़ कहता हूँ, कि जब जब साँसें लेता हूँ
तेरा ही नाम लेता हूँ, ये तूने क्या किया..

दिल करता है तेरी बातें सुनूँ, सौदे मैं अधूरे चुनूँ
मुफ़्त का हुआ यह फ़ायदा..
क्यूँ खुद को मैं बर्बाद करूँ, फ़ना होके तुझसे मिलूँ
इश्क़ का अजब है क़ायदा..
तेरी राहों से जो गुज़री है मेरी डगर
मैं भी आगे बढ़ गया हूँ, हो के थोड़ा बेफ़िक्र
कहो तो किससे मर्ज़ी लूँ, कहो तो किसको अर्ज़ी दूँ
हँसता अब थोड़ा फ़र्ज़ी हूँ
ये तूने क्या किया.. ये तूने क्या किया..

तो आइए आनंद लें इस गीत का...

Wednesday, February 26, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 5 : कैसी तेरी खुदगर्जी तू धूप चुने या छाँव.. (Kabira...)

वार्षिक संगीतमाला की अगली पायदान का गीत जब भी सुनता हूँ तो कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूँ। व्यक्ति आख़िर किसके लिये ये जीवन जीता है ? अपने सपनों को पूरा करने के लिए या परिवार तथा समाज द्वारा दिए गए दायित्वों का निर्वाह करने के लिए? 

आप कहेंगे कि इसमें मुश्किल क्या है? इन दोनों को साथ ले कर क्यूँ नहीं चला जा सकता ? मुश्किल है जनाब ! अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की राह में कई बार प्रेम आड़े आ जाता है तो कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियों मुँह उठाए आगे चली आती हैं। फिर आपके मन को ये प्रश्न भी सालता है कि अगर अपने संगी साथियों को छोड़कर वो सब कुछ पा भी लिया तो क्या मन का सूखापन मिट पाएगा? क्या मुझे दुनिया एक सफल इंसान के रूप में आकेंगी या मैं एक खुदगर्ज इंसान माना जाऊँगा?
 

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका कोई सीधा जवाब नहीं। फिल्म ये जवानी है दीवानी में सिनेमाई अंदाज़ में ही सही पर कुछ ऐसी ही उधेड़बुन की गिरफ्त में नायक भी अपने आप को पाता है। सारी दुनिया देखने का ख़्वाब और उन सपनों को पूरा करने का हुनर एक तरफ और दोस्तों, परिवार और माशूका का साथ दूसरी तरफ़। कोई भी रास्ता ऐसा नहीं जिसे आसानी से चुना या छोड़ा जा सके। अमिताभ भट्टाचार्य का लिखा ये गीत एक घुमक्कड़ मन के अंदर की इस बेचैनी को कुछ हद तक टटोलता जरूर है। हालांकि अमिताभ फिल्म की कहानी के अनुरूप अपनों का साथ नहीं छोड़ने की बात करते हैं पर अगर आपको The Alchemist  की कथा याद हो तो वहाँ अपने ख़्वाबों को पूरा करना ही आपकी नियति बताया जाता है।

बहरहाल अमिताभ सूफ़ियत की चादर ओढ़े इस गीत में टूटी चारपाई, ठंडी पुरवाई जैसे कुछ नए पर बेहतरीन रूपकों का प्रयोग करते हैं। तोची रैना और रेखा भारद्वाज की आवाज़ ऐसे गीतों के लिए ही जानी जाती है और उनकी गायिकी एक सुकून देने के साथ साथ गीत की भावनाओं में डूबने पर मज़बूर करती है। संगीतकार प्रीतम का संगीत मुख्यतः गिटार और ड्रम्स के ज़रिए पार्श्व से सहयोग देता नज़र आता है। 
 
 तो आइए सुनें इस गीत को

कैसी तेरी खुदगर्जी ना धूप चुने या छाँव
कैसी तेरी खुदगर्जी  किसी ठौर टिके ना पाँव
बन लिया अपना पैगंबर,तर लिया तू सात समंदर
फिर भी सूखा मन के अंदर क्यूँ रह गया

रे कबीरा मान जा रे फकीरा मान जा
आजा तुझको पुकारे तेरी परछाइयाँ
रे कबीरा मान जा रे फकीरा मान जा
कैसा तू है निर्मोही कैसा हरजाइया
 टूटी चारपाई वही,ठंडी पुरवाई रस्ता देखे
दूधों की मलाई वही, मिट्टी की सुराही रस्ता देखे

कैसी तेरी खुदगर्जी लब नमक रमे ना मिसरी
कैसी तेरी खुदगर्जी तुझे प्रीत पुरानी बिसरी
मस्त मौला मस्त कलंदर तू हवा का एक बवंडर
बुझ के यूँ अंदर ही अंदर क्यूँ रह गया..


वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 6 :जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके (Piya Milenge)

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर है एक बार फिर ए आर रहमान और इरशाद क़ामिल की जोड़ी, फिल्म रांझणा के नग्मे के साथ। तुम तक की तरह प्रेम का रंग यहाँ भी है पर फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ बात ईश्वरीय प्रेम की हो रही है। रहमान ज़रा सी भी गुंजाइश रहने पर अपनी संगीतबद्ध हर फिल्म में एक सूफ़ी गीत जरूर डालते हैं। फिल्म जोधा अकबर का गीत ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा और रॉकस्टार का नग्मा कुन फाया कुन इसकी दो बेहतरीन मिसालें हैं। 

इरशाद क़ामिल ने इस गीत के लिए कबीर की पंक्तियों घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे से प्रेरणा ली। कबीर की इस कृति को 1950 में फिल्म जोगन में गीता दत्त ने अपनी आवाज़ से सँवारा था। पर इरशाद ने इस Catch line के इर्द गिर्द जो गीत बुना उसे अगर सुखविंदर सिंह की बेमिसाल गायिकी के साथ शांति से सुनें और गुनें तो इसमें कोई शक़ नहीं कि आप ईश्वर को अपने और करीब पाएँगे।



सुखविंदर जैसे ही शानदार मुखड़े को गाते हुए अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …तक आते हैं मन गीत की लय को आत्मसात कर लेता है। रहमान ने गीत में सुखविंदर के साथ चेन्नई में अपने कॉलेज KM Music Conservatory (KMMC) में सूफी गायन से जुड़े छात्रों को भी गाने का मौका दिया है। दरअसल ये समूह पहले भी कव्वाल शौक़त अली के मार्गदर्शन में रहमन रचित कव्वालियों की प्रस्तुति देता आया है। इस गीत के अंतरों के बीच की सुरीली सरगम और समूह गान को खूबसूरती से निभा कर KMMC Sufi Ensemble इस गीत में और निखार ला दिया है।

यूँ तो इरशाद क़ामिल के बोल सहज पर दिल पे सीधे असर करने वाले हैं। पर इस गीत की शुरुआत में उन्होंने एक अप्रचलित शब्द तुपके तुपके का इस्तेमाल किया है। उन्होंने लिखा है तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके ! आप जानना चाह रहे होंगे कि इसका मतलब क्या है? यहाँ क़ामिल कहना चाह रहे हैं जब कि तू तो भगवन को पाने की प्यास में इधर उधर की छोटी मोटी बूँदे खोज़ता फिर रहा है, अरे मूरख तू क्या नहीं जानता कि तेरे अंदर तो पूरा समंदर बह रहा है। जरूरत है उसमें झाँकने की, उस तक पहुँचने की, उसके दिए संकेत समझने की।

तो आइए सुनें इस नग्मे को..


नि नि सा सा ...नि सा नि सा नि सा
जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके
तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके
अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
सा सा सा... ....पा नि सा रे सा

पा के खोना खो के पाना होता आया रे
संग साथी सा है वो तो वो है साया रे
झाँका तूने ही ना बस जी से जी में रे
बोले सीने में वो तेरे धीमे धीमे रे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … जिसको ढूँढे बाहर बाहर...

जो है देखा वो ही देखा तो क्या देखा है
देखो वो जो औरों ने ना कभी देखा है
नैनो से ना ऐसा कुछ देखा जाता है
नैना मींचो तो वोह सब दिख जाता है
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
उसी को पाना उसी को छूना
कहीं पे वो ना कहीं पे तू ना
जहां पे वो ना वहाँ पे सूना
यहाँ पे सूना...
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …  

Sunday, February 16, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 7 - सुन रहा है ना तू...कौन हैं अंकित तिवारी ? (Sun Raha hai na Tu. Ankit Tiwari)

वार्षिक संगीतमाला के प्रथम दस के सफ़र को आगे बढ़ाते हुए आज हमारे सामने हैं सातवीं पायदान का गीत जो इस साल चारों तरफ़ इतना बज चुका है कि अब ये गीत किसी परिचय का मुहताज़ नहीं रहा। हाँ ये जरूर है कि इस गीत की सफ़लता के पीछे जिस शख़्स का हाथ है उसके बारे में आप जरूर जानना चाहेंगे। जी हाँ मेरा इशारा है आशिक़ी 2 के गीत सुन रहा है तू के संगीत निर्देशक अंकित तिवारी की ओर।


कानपुर से ताल्लुक रखने वाले अंकित की पारिवारिक पृष्ठभूमि भक्ति संगीत से जुड़ी है। उनके माता पिता भक्ति संगीत के कार्यक्रमों जैसे 'जागरण' और 'माता की चौकी' को एक युगल जोड़ी (राजू सुमन एंड पार्टी ) के रूप में प्रस्तुत करते थे और छोटे से अंकित को भी अपने साथ  ले जाया करते थे। अंकित इसी माहौल में पले बढ़े। स्कूल के दिनों में उन्होंने अपने माता पिता को ये बता दिया था कि उन्हें आगे जाकर संगीत से जुड़ा ही कुछ करना है। पर मुंबई जाने के बाद पहली बड़ी सफलता मिलने में उन्हें छः सालों का लंबा इंतजार करना पड़ा। इसीलिए अंकित कहते हैं कि सफलता व प्रसिद्धि  तो कुछ दिनों की होती है पर उसके लिए व्यक्ति को हमेशा मेहनत करनी पड़ती है।




आशिक़ी 2 का ये गीत अंकित तिवारी की झोली में कैसे गिरा इस प्रश्न का जवाब अंकित कुछ यूँ देते हैं..
"लखनऊ में मेरे एक मित्र रहते है। उन्होंने ही महेश भट्ट से मेरे बारे में बताया। मुझे इस बात की खुशी है कि महेश भट्ट ने मुझे वापस फोन किया और कहा कि अपनी पाँच बेहतरीन संगीत रचना संगीत निर्देशक मोहित सूरी को सुना दो। मैंने वही किया। पियानों पर अपनी पाँचों धुनें तैयार कर ले गया। सबसे पहले मैंने 'सुन रहा है ना तू 'ही सुनाई। ये आशिक़ी के प्रदर्शित होने के एक साल पहले की बात है। उन्होंने मेरे पाँचों गीत सुने और कहा सभी अच्छे हें पर इसमें वो कौन सा फिल्म में इस्तेमाल करेंगे वे ये अभी नहीं बता सकते। पर किसी दूसरे को इन धुनों को देने के पहले तुम मुझे फोन जरूर कर लेना।"

जब ये धुन आशिक़ी 2 के लिए चुनी गई तो अंकित ने गाकर भी इसको सुनाया। महेश भट्ट और मोहित सूरी को उनकी आवाज़ भी जँच गई और इस तरह बतौर गायक भी उन्होंने इस गीत के लिए अपना योगदान दिया। पर अंकित के लिए गायिकी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण संगीत निर्देशन है और आगे वो उसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।

आशिक़ी 2 के इस गीत को लिखा है गीतकार संदीप नाथ ने। आपको याद होगा कि संदीप नाथ द्वारा फिल्म 'साहब बीवी और गैंगस्टर' के लिए लिखा गीत रात मुझे ये कह के चिढ़ाए तारों से भरी मैं और तू अकेली हाय  वार्षिक संगीतमाला 2011 के प्रथम दस गीतों में अपनी जगह बन चुका है। इसी फिल्म के दौरान अंकित तिवारी को उनके साथ बतौर पहली हिंदी फिल्म में काम करने का मौका मिला था। संदीप ने गीत की शब्द रचना युवाओं को ध्यान में रखकर सहज ही रखी है। मुझे इस गीत की सबसे अच्छी पंक्तियाँ दिल को ठिकाने दे, नए बहाने दे ...ख़्वाबों की बारिशों को, मौसम के पैमाने दे लगती हैं।


आशिक़ी 2 के इस गीत के दो वर्जन हैं। अंकित तिवारी ने अपने वर्सन को फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से संगीत संयोजन ऐसा रखा है जैसे मंच पर कोई रॉक शो चल रहा है। इसलिए गीत के इंटरल्यूड्स में इलेक्ट्रानिक गिटार और ड्रम्स और जिटार (जो नीलाद्रि कुमार द्वारा ईजाद किया सितार का परिवर्तित रूप है) का प्रचुरता से उपयोग हुआ है। गीत के अंत में श्रोताओं के कोरस को भी इसीलिए डाला गया है। इसमें कोई शक़ नहीं कि अंकित अपनी संगीत रचना से सुनने वालों के मन को द्रवित करते हैं पर कहीं कहीं मुखर संगीत संयोजन के बीच उनकी आवाज़ दब सी जाती है।



अपने करम की कर अदाएँ, यारा ...यारा ...यारा ...
मुझको इरादे दे ..कसमें दे, वादे दे
मेरी दुआओं के इशारों को सहारे दे
दिल को ठिकाने दे, नए बहाने दे
ख़्वाबों की बारिशों को , मौसम के पैमाने दे

अपने करम की कर अदाएँ,  कर दे इधर भी तू निगाहें

सुन रहा है ना .. रो रहा हूँ मैं
सुन रहा है ना तू , क्यूँ रो रहा हूँ मैं

मंजिलें रुसवा हैं, खोया है रास्ता
आए ले जाए , इतनी सी इल्तिज़ा
ये मेरी ज़मानत है, तू मेरी अमानत है हाँ ...
अपने करम की कर अदाएँ, कर दे इधर भी तू निगाहें
सुन रहा है ना तू ....

वक़्त भी ठहरा है, कैसे क्यूँ ये हुआ
काश तू ऐसे आए, जैसे कोई दुआ
तू रूह की राहत है, तू मेरी इबादत है
अपने करम की कर अदाएँ,  कर दे इधर भी तू निगाहें
सुन रहा है ना तू ...




इस गीत की सबसे बड़ी खूबी इसकी मधुरता है जो श्रेया घोषाल के गाए वर्जन में ज्यादा उभर कर आती है। गीत के दूसरे वर्जन की तुलना में यहाँ संगीत संयोजन ज्यादा मुखर नहीं है। अगर आप गीत को ध्यान से सुनेंगे तो पाएँगे गीत के साथ और इंटरल्यूड्स में बजती बाँसुरी को घाटम और सरोद का सुरीला साथ मिला है। अंकित जानते हैं कि ये उनके सफ़र की शुरुआत भर है । इस गीत की सफलता के बाद उनकी आने वाली फिल्मों से अपेक्षाएँ बढ़ गयी हैं। आशा है भविष्य में वे हमारी अपेक्षाओं पर ख़रा उतरेंगे।

Tuesday, February 11, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 8 :'तुम तक' (Tum Tak)

पिछला हफ्ते कार्यालय और व्यक्तिगत व्यस्तताओं की वज़ह से वार्षिक संगीतमाला अपना अगला कदम नहीं बढ़ा सकी। आइए देखें कि संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर कौन सा गीत आसन जमाए बैठा है? संगीतमाला की आठवीं पायदान पर प्यार की मीठी मीठी खुशबू फैलाता ये नग्मा है फिल्म रांझणा का जिसे लिखा इरशाद क़ामिल ने और संगीतबद्ध किया ए आर रहमान ने। गीत को स्वर दिया है जावेद अली और कीर्ति सागथिया ने।


शब्द रचना की दृष्टि से ये गीत थोड़ा अनूठा है। इरशाद क़ामिल और रहमान ने मिलकर पूरे गीत में 'तुम तक' की पुनरावृति कर प्रेम का जो माहौल रचा है वो अद्भुत है। एक बार व्यक्ति किसी के प्रेम में पड़ जाए तो उसका दृष्टि संसार बस अपने प्रिय तक ही सीमित रह जाता है। उसके सारे तर्क, सारी इच्छाएँ बस अपने प्रिय का ख्याल आते ही उस में विलीन हो जाती हैं। सोते जागते, उठते बैठते  कोई भी सोच घूम फिर कर बस उनकी बातों और यादों पर ही विराम लेती है। इरशाद क़ामिल ने प्रेम के इसी रासायन को 'तुम तक' के शाब्दिक जाल में बखूबी बाँधा है।

ए आर रहमान हमेशा अपनी फिल्मों में जावेद अली को मौके देते रहे हैं और जावेद ने हर बार अपनी गायिकी से संगीतप्रेमियों को मंत्रमुग्ध ही किया है। वर्ष 2008 में जोधा अकबर में उनका मन को सहलाता नग्मा कहने को जश्ने बहारा ..हो या फिर सूफ़ियत के रंग में रँगा फिल्म रॉकस्टार का गीत कुन फाया कुन या दिल्ली 6 का अर्जियाँ हो, उन्होंने हमेशा अपनी गायिकी का लोहा मनवाया है। रहमान के इतर गाए उनके गीतों में भी उनकी गायिकी की विविधता नज़र आती है। जब वी मेट के गीत नगाड़ा में जहाँ उनकी आवाज़ में एक जोश नज़र आता है तो वहीं फिल्म ये साली ज़िंदगी के गीत कैसे कहें अलविदा में उनकी आवाज़ दर्द से छटपटाती सी महसूस होती है।

संगीतज्ञों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले और ग़ज़ल गायक गुलाम अली के शागिर्द रह चुके जावेद मुंबई ग़ज़ल गायक बनने आए थे। मुंबई की फिल्मी दुनिया में आकर उन्हें एहसास हुआ कि बतौर पार्श्व गायक उन्हें अपनी आवाज़ को गायिकी के अलग अलग रंगों के अनुरूप ढालने के ज्यादा अवसर मिलेंगे। भले ही उन्होंने खालिस ग़ज़ल गायिकी का दामन नहीं पकड़ा पर अपने गुरु के सम्मान में अपना नाम जावेद हुसैन से बदलकर जावेद अली कर लिया।

क्या आप नहीं जानना चाहेंगे कि जावेद इस गीत के बारे में क्या सोचते हैं ? जावेद इस गीत के बारे में कहते हैं
'तुम तक'  एक आम प्रेम गीत से अलग है। किशोरों के बीच की चाहत को दर्शाते इस गीत में मस्ती है चंचलता है और अपने महबूब को पाने की विकलता भी । इस गीत में इतनी ताकत है कि ये आपको फिर प्यार करने पर मजबूर कर दे।। रहमान सर का संगीत एक मीठा ज़हर है जो धीरे धीरे चढ़ता है। गीत में उनके द्वारा रचा माधुर्य अद्भुत है। हमने शब्दों के साथ खेलते हुए इस गीत को एक बनारसी रंग में रँगा है।"

सच, मुझ पर भी इस गीत का असर धीरे धीरे ही हुआ और इतना हुआ कि ये गीत 'एक शाम मेरे नाम' के प्रथम दस गीतों का हिस्सा बन गया। तो आइए सुनते हैं फिल्म राँझणा के इस गीत को...


मेरी हर मनमानी बस तुम तक
बातें बचकानी बस तुम तक
मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक
मेरे सुख-दु:ख आते जाते सारे
तुम तक, तुम तक, तुम तक, सोणे यार

तुम तक तुम तक अर्ज़ी मेरी
फिर आगे जो मर्ज़ी
तुम तक तुम तक अर्ज़ी मेरी
फिर तेरी जो मर्ज़ी
मेरी हर दुश्वारी बस तुम तक
मेरी हर होशियारी बस तुम तक
मेरी हर तैयारी बस तुम तक
तुम तक, तुम तक, तुम तक, तुम तक
मेरी इश्क़ खुमारी बस तुम तक

इक टक इक टक, ना तक, गुमसुम
नाज़ुक नाज़ुक दिल से हम तुम
तुम ... तुम तुम तुम तुम तुम तुम ...

तुम चाबुक नैना मारो
मारो तुम तुम तुम तुम तुम तुम!
तुम... मारो ना नैना तुम
मारो ना नैना तुम

तुम तक
चला हूँ तुम तक
चलूँगा तुम तक
मिला हूँ तुम तक
मिलूँगा तुम तक

तुम तक, तुम तक, तुम तक
तुम तक, तुम तक, तुम तक, तुम तक ...

हाँ उखड़ा उखड़ा
मुखड़ा मुखड़ा
मुखड़े पे नैना काले
लड़ते लड़ते लडे, बढ़ते बढ़ते बढ़े
हाँ अपना सजना कभी, सपना सजना कभी
मुखड़े पे नैना डाले

नैनो के घाट ले जा, नैनो की नैय्या
पतवार तू है मेरी, तू खेवैय्या
जाना है पार तेरे
तू ही भँवर है
पहुँचेगी पार कैसे
नाज़ुक सी नैय्या

तुम तक, तुम तक, तुम तक ...

मेरी अकल दीवानी तुम तक
मेरी सकल जवानी तुम तक
मेरी ख़तम कहानी तुम तक
मेरी ख़तम कहानी बस तुम तक

तुम तक, तुम तक, तुम तक, तुम तक


वैसे आपकी क्या राय है इस गीत के बारे में?

Wednesday, February 05, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 9 रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे ..माँझा ( Manjha)

वार्षिक संगीतमाला की नवीं पायदान पर गाना वो जो  उलझते रिश्तों के सुलझाव की उम्मीद जगाता है और साथ ही कठिन परिस्थितियों से लड़ कर सुखद भविष्य का स्वप्न देखने को प्रेरित करता है। गीत की इस भूमिका से आप पहचान गए होंगे की मैं माँझा  की बात कर रहा हूँ जिसे लिखा स्वानंद किरकिरे ने और धुन बनाई अमित त्रिवेदी ने। स्वानंद किरकिरे परिणिता के ज़माने से ही मेरे चहेते गीतकार रहे हैं और यही वज़ह है उनके लिखे दर्जन से भी ज्यादा गीत वार्षिक संगीतमालाओं की शोभा बढ़ा चुके हैं।


जब ये गीत पहले पहल बजना शुरु हुआ था तो मेरे एक पाठक ने एक प्रश्न किया था आख़िर स्वानंद ने इस गीत में उलझते रिश्तों की पेंच को माँझा जैसे रूपक से क्यूँ जोड़ा ? पतंग उड़ाने का शौक़ रखने वाले ये भली भाँति जानते होंगे कि पतंगबाजी में माँझा का प्रयोग डोर की धार तेज करने के लिए किया जाता है। प्रश्न वाजिब था और इसका सही उत्तर तो शायद स्वानंद ही दे पाएँ पर मुझे गीत की भावनाओं को देख कर यही महसूस होता है कि स्वानंद का रिश्तों का माँझा से तात्पर्य रिश्तों की रुखड़ी डोर से होगा।

पहली पार जब ये गीत सुना तो इस गीत से मेरी ये शिकायत रही कि अरे ये इतनी जल्दी क्यूँ खत्म हो गया ! मुझे बाद में पता चला कि फिल्म में पूरा गीत इस्तेमाल नहीं हुआ है। गीत के अप्रयुक्त कुछ हिस्सों में स्वानंद के बोल लाजवाब हैं। खासकर रिश्तों के बारे में कितनी सहजता से वो कह जाते हैं रिश्ते पंखों को हवा देंगे...रिश्ते दर्द को दवा देंगे...रिश्ते दहलीज़े भी लाँघेंगे....रिश्ते लहू भी तो माँगेगे। वहीं दूसरी ओर बर्फीली आँखों में पिघला सा देखेंगे हम कल का चेहरा..पथरीले सीने में उबला सा देखेंगे हम लावा गहरा.... जैसी पंक्तियाँ मन को एक नए जोश से भर देती हैं।

वैसे जो लोग अमित त्रिवेदी के संगीत का अनुसरण करते आए हैं उनके मन में जरूर प्रश्न उठा होगा कि अमित तो अक्सर अमिताभ भट्टाचार्य के साथ ही संगीत रचते नज़र आते हें तो इस फिल्म में बतौर गीतकार स्वानंद कहाँ से आ गए? दरअसल इस फिल्म में स्वानंद के चुनाव और इस गीत के अस्तित्व में आने की मज़ेदार कहानी है।

निर्देशक अभिषेक कपूर ने जब स्वानंद का लिखा और जएब व हानीया के साथ गाया नग्मा कहो क्या ख्याल है.... सुना तभी ये निर्णय ले लिया था कि उनकी फिल्म के गीतकार स्वानंद किरकिरे होंगे। दूसरी तरफ़ संगीतकार के लिए अमित त्रिवेदी का नाम पहले ही तय हो चुका था। अमित को बुलाकर गीत की परिस्थितियाँ बताई गयीं और अमित ने दो हफ्तों के अंदर तीन गीतों को संगीतबद्ध कर  निर्देशक को सुना दिया। अभिषेक को धुनें बुरी नहीं लगीं पर इतनी जल्दी अमित त्रिवेदी के धुनें बनाकर देने से उन्हें ये लगा कि संगीतकार ने गीतों को जल्दी बाजी में बना दिया है। इसलिए अमित त्रिवेदी को कहा गया कि वे थोड़ा और दिल लगाकर काम करें। अभिषेक बताते हैं कि एक दिन जब वो  सोकर अचानक उठे तो उन्हें सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का माँझा  की धुन मन में घूमती सी लगी और उन्हें लगा कि इतनी अच्छी धुनों को लौटाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। फिर क्या था अगले दिन ही अमित को बुलाकर उन्होंने उनके बताए तीनों गीतों को हरी झंडी दे दी।

वहीं अमित त्रिवेदी कहते हैं कि कभी कभी किसी गीत की धुन के बारे में निर्णय लेने में मुझे महिनों लग जाते हैं पर इस गीत की धुन मुझे पहली ही रात ख्याल में आ गई । अगले दिन मैंने स्वानंद को बुलाया और हमारे गीत तैयार थे। बाकी गीतों को तैयार करने में हमें दस दिन लगे। 

अमित त्रिवेदी अपने संगीत संयोजन में भारतीय वाद्यों का पश्चिमी वाद्यों का खूबसूरत मिश्रण करते रहे हैं। उनकी पिछली फिल्मों में हारमोनियम का उनका प्रयोग लाजवाब लगा था। इस गीत की शुरुआत में उन्होंने इसराज का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। तो आइए सुने बिना कटा हुआ ये पूरा नग्मा



रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे
कटी पतंगों को थामेंगे
हो हो है जज़्बा हो हो है जज़्बा
सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का माँझा

सोयी तकदीरें जगा देंगे
कल को अंबर भी झुका देंगे
हो हो है जज़्बा हो हो है जज़्बा
सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का माँझा

रिश्ते पंखों को हवा देंगे
रिश्ते दर्द को दवा देंगे

जीत कभी हार कभी
गम तो यारों होंगे दो पल के मेहमाँ
रिश्ते दहलीज़े भी लाँघेंगे
रिश्ते लहू भी तो माँगेगे

आँसू कभी मोती कभी
जाँ भी माँगे यारों कर देंगे कुरबाँ
सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का माँझा
बिसरे यारों को बुला लेंगे
सोई उम्मीदें जगा लेंगे हो ...माँझा

ओ बर्फीली आँखों में पिघला सा देखेंगे हम कल का चेहरा
ओ पथरीले सीने में उबला सा देखेंगे हम लावा गहरा

अगन लगी लगन लगी
टूटे ना टूटे ना
इस बार ये टूटे ना
मगन लगी लगन लगी
कल होगा क्या कह दो
किस को है परवाह
रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे
कटी पतंगों को थामेंगे
हो हो है जज़्बा हो हो है जज़्बा
सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का माँझा

Monday, February 03, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 10 : भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए (Bhagan Ke Rekhan ki...)

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर एक बार फिर गीत है फिल्म इसक का।  पर इस गीत की प्रकृति एक पॉयदान पहले आए गीत झीनी झीनी से सर्वथा अलग है। इस गीत में प्यार की फुहार नहीं बल्कि शादी के बाद अपने घर से विदा होती एक बिटिया का दर्द छुपा है।  जहाँ लोक गायिका मालिनी अवस्थी इस दर्द को अपनी सधी आवाज़ से जीवंत कर देती हैं वहीं रघुबीर यादव अपने गाए अंतरे में शादी के माहौल को हमारे सामने रचते नज़र आते हैं। 


बनारस की सरज़मीं पर रची इस प्रेम गाथा में निर्देशक इस विदाई गीत को आंचलिक रूप देना चाहते थे। यही वज़ह है कि इसके लिए गीत की भाषा में भोजपुरी के कई शब्द लिये गए और गीतकार भी ऐसा चुना गया जो इस बोली से भली भांति वाकिफ़ हो। गीतकार के रूप में अनिल पांडे चुन लिए गए तो गायक गायिका की खोज़ शुरु हुई। अब बात भोजपुरी की हो तो NDTV Imagine रियालटी शो जुनून कुछ कर दिखाने का से बतौर लोकगायिका अपनी पहचान बनाने वाली मालिनी अवस्थी को चुनाव लाज़िमी था। जहाँ तक रघुबीर यादव का सवाल है तो उनकी गायिकी में हमेशा ज़मीन की मिट्टी की सी सोंधी खुशबू से भरपूर रही है। 


अनिल पांडे ने एक लड़की के भाग्य में आते उतार चढ़ाव के लिए "बँहगी" का रूपक चुना। बँहगी का शाब्दिक अर्थ भार ढोने वाले उस उपकरण से लिया जाता है जिसमें  एक लम्बे बाँस के टुकड़ें के दोनों सिरों पर रस्सियों के बडे बड़े  दौरे लटका दिये जाते हैं और जिनमें बोझ रखा जाता है। जब कोई श्रमिक इस बँहगी को ले कर चलता है तो बँहगी  लचकती चलती है। इसीलिए अनिल लिखते हैं भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए ...

इसक फिल्म के इस गीत को संगीतबद्ध किया है क्रस्ना ने। ये वही क्रस्ना हैं जिन्होंने तनु वेड्स मनु के गीतों के माध्यम से दो साल पहले वार्षिक संगीतमाला की सर्वोच्च पॉयदान पर अपना कब्जा जमाया था। पहली बार मैंने जब इस गीत की आरंभिक पंक्तियाँ सुनी तो मुझे आश्चर्य हुआ कि क्रस्ना ने छठ की पारम्परिक धुन को गीत के मुखड़े में क्यूँ प्रयुक्त किया। क्रस्ना इस बारे में अपने जालपृष्ठ पर लिखते हैं

"बहुत से लोग ये समझेंगे कि ये एक परम्परागत लोक गीत है। पर पहली दो पंक्तियों की धुन को छोड़ दें  तो मैंने इसे अपनी तरह से विकसित किया है। हालांकि मैं चाहता तो छठ की इस धुन के बिना भी इस गीत को बना सकता था पर कई बार बरसों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा से लोग जल्दी जुड़ जाया करते हैं। इस मुद्दे पर मेरी फिल्म के निर्देशक जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं से काफी बहस हुई पर उनके आग्रह पर मैंने शुरुआत उस धुन से कर एक दूसरे रूप में गाने को आगे बुना। मुझे लगता है कि मालिनी अवस्थी और रघुबीर यादव ने गाने के बारे में मेरी सोच को अपनी गायिकी के माध्यम से परिपूर्ण कर दिया है।"

सच मालिनी जी ने इस तरह  भावनाओं में डूबकर इस नग्मे को निभाया  है कि इसे सुन एकबारगी आँखें नम हो उठती हैं। यकीन नहीं होता तो आप भी सुन कर देखिए...



भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए 
भेजो रे काहे बाबा हमका पीहर से
बिटिया से बन्नी बनके कहाँ पहुँचाए
सहा भी ना जाए ओ का करें हाए
कहाँ ख़ातिर चले रे कहरिया
बँहगी कहाँ पहुँचाए ? बँहगी कहाँ पहुँ...चाए

बचपन से पाले ऐसन बिटिया काहे
बहियन के पालना झुलाए
खुसियन के रस मन में काहे रे
बाबा तुमने बरतिया लीओ बुलवाए
काहे डोली बनवाए अम्मा मड़वा छवाए
चले सिलवा हरदी त पिस पिस जाए

(सिलवा - सिल,  हरदी - हल्दी, बरतिया - बाराती, खुसियन - खुशी, बहियन -बाँह)

सूरज सा चमकेगा मोर मुकुट पहनेगा, राजा बनके चलेगा बन्ना हमारा रे
जीजा को ना पूछेगा. ओ हो ,अरे फूफा को ना लाएगा ओ हो
मामा को लूटेगा, चाचा खिसियाएगा, बहनों को ठुमका लगाता लाएगा
काला पीला टेढ़ा मेढ़ा बन्ना बाराती ऐसा लाया रे
का करें हाए कहाँ चली जाए, बन्नो शरम से मर मर जाए...बन्नो शरम से मर मर जाए...
भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए

सोनवा स पीयर बिटिया सुन ले, तोरे निकरत ही निकरे ना जान
बिटिया के बाबा से ना पूछले , मड़वा के कइसन होला बिहान
चले चलेंगे कहार मैया असुवन की धार
बन्नी रो रो के हुई जाए है तार तार
भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए

जिन्हें भोजपुरी बिल्कुल नहीं समझ आती उनके लिए बता दूँ कि इस अंतरे में कहा जा रहा है सोने सी गोरी (यहाँ पीयर यानि पीला रंग गौर वर्ण को इंगित कर रहा है) बिटिया सुनो, शायद तुम्हारे इस घर से विदा होते ही हमारी जान ना निकल जाए। ये बेटी के बाबू का दिल ही जानता है कि शादी की अगली सुबह कितनी पीड़ादायक होती है। कहार चलने को तैयार हो रहे हैं। माँ की आँखों से आँसू की वैतरणी बह चली है और बिटिया तो रो रो के बेहाल है ही।

Saturday, February 01, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 11 : झीनी रे झीनी याद चुनरिया (Jheeni Re Jheeni Yaad Chunaria)

वार्षिक संगीतमाला की पिछली चौदह सीढ़ियाँ चढ़ कर आ पहुँचे है हम ग्यारहवीं पायदान पर। ग्यारहवीं पायदान का ये गीत संगीतमाला में शामिल अन्य सभी गीतों से एक बात में अलहदा है और वो है इसकी लंबाई। करीब साढ़े सात मिनट लंबे युगल गीत पर जो सम्मिलित परिश्रम इसके संगीतकार, गीतकार और गायक द्वय ने किया है वो निश्चय ही काबिलेतारीफ़ है। ये गीत है फिल्म 'इसक' का और इसके संगीतकार हैं सचिन ज़िगर, जबकि शब्द रचना है नीलेश मिश्रा की।

इससे पहले उन्होंने 2011 में अपने गीत धीरे धीरे नैणों को धीरे धीरे , जिया को धीरे धीरे भायो रे साएबो से मुझे प्रभावित किया था। सचिन जिगर के संगीतकार बनने से पहले की दास्तान मैं आपको यहाँ बता चुका हूँ। पिछला साल तो इस जोड़ी के लिए फीका रहा पर इस साल रमैया वस्तावइया, ABCD, इसक और शुद्ध देशी रोमांस में उनके संगीतबद्ध गीतों को साल भर सुना जाता रहा। जब जब सचिन जिगर ने लीक से हटकर संगीत देने की कोशिश की है उनका काम शानदार रहा है। अब इसी गीत को लें हिंदुस्तानी वाद्यों से सजे संगीत संयोजन में तबले व सारंगी का कितना सुरीला इस्तेमाल किया हैं उन्होंने। इंटरल्यूड्स के बीच पार्श्व से आती सरगम की ध्वनि भी मन को बेहद सुकून पहुँचाती है।

गीतकार नीलेश मिश्रा एक बार फिर अपने हुनर का ज़ौहर दिखलाने में सफल रहे हैं। इतना लंबा गीत होने के बावज़ूद वे अपने खूबसूरत अंतरों द्वारा श्रोताओं का ध्यान गीत की भावनाओं से हटने नहीं देते। मिसाल के तौर पर इन पंक्तियों पर गौर करें ज़हर चखा है आग है पीली...चाँदनी कर गई पीड़ नुकीली..पर यादों की झालन चमकीली या फिर धूप में झुलस गए दूरियों से हारे...पार क्या मिलेंगे कभी छाँव के किनारे । मन खुश कर देती हैं ये पंक्तियाँ  खासकर तब जब उस्ताद राशिद खाँ और प्रतिभा वाघेल उसे अपनी आवाज़ से सँवारते हैं।


उस्ताद राशिद खाँ तो किसी परिचय के मुहताज नहीं पर प्रतिभा वाघेल के बारे में ये बताना जरूरी होगा कि वर्ष 2009 में वो जी सारेगामा के फाइनल राउंड में पहुँची थीं। रीवा से ताल्लुक रखने वाली प्रतिभा बघेल ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ली है।अपना अधिकतर समय संगीत से जुड़े कार्यक्रमों में बिताने वाली प्रतिभा की 'प्रतिभा' को हिंदी फिल्म संगीत में और मौके मिलेंगे इसकी उम्मीद रहेगी। राशिद साहब की भारी आवाज़ के सामने प्रतिभा का स्वर मिश्री की डली सा लगता है।

इससे पहले की आप ये गीत सुनें ये बता दूँ कि शायद गीत की लय की वज़ह से राशिद खाँ साहब इस गीत के मुखड़े में याद को 'यद' की तरह उच्चारित करते हैं जो पहली बार सुनने पर थोड़ा अटपटा लग सकता है।




अखिया किनारों से जो, बोली थी इशारों से जो
कह दे फिर से तू ज़रा
फूल से छुआ था तोहे, तब क्या हुआ था मोहे
सुन ले जो फिर से तू ज़रा
झीनी रे झीनी याद चुनरिया..लो फिर से तेरा नाम लिया

सारे जख़म अब मीठे लागें,
कोई मलहम भला अब क्या लागे
दर्द ही सोहे मोहे जो भी होवे
टूटे ना टूटे ना. टूटे ना टूटे ना......

सूझे नाही बूझे कैसे जियरा पहेली
मिलना लिखा ना लिखा पढ़ले हथेली
पढ़ली हथेली पिया, दर्द सहेली पिया
ग़म का है ग़म  अब ना हमें
रंग ये लगा को ऐसो, रंगरेज़ को भी जैसो
रंग देवे अपने रंग में
झीनी रे झीनी याद चुनरिया..लो फिर से तेरा नाम लिया

सुन रे मदा हूँ तेरे जैसी
काहे सताये आधी रात निदिया बैरी भयी
ज़हर चखा है आग है पीली
चाँदनी कर गई पीर नुकीली
पर यादों की झालन चमकीली
टूटे ना टूटे ना. टूटे ना टूटे ना......

धूप में झुलस गए दूरियों से हारे
पार क्या मिलेंगे कभी छाँव के किनारे
छाँव के किनारे कभी, कहीं मझधारे कभी
हम तो मिलेंगे देखना
तेरे सिराहने कभी, नींद के बहाने कभी
आएँगे हम ऐसे देखना
झीनी रे झीनी याद चुनरिया



 

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